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Feb 14, 2018

तीन सामयिक बातें

तीन बातें का मतलब तीन ही नहीं, अब शीर्षक कुछ तो रखना पड़ेगा न ...बातें निकलेगी तो एक दुसरे से लिंकित होते दूर तलक जाए या आस-पास ही मंडराती रहे ...तीन पर तो नहीं ही रुकने वाली। पढ़ते हुए जहाँ भी लिंक मिले लपक के (क्लिक कर के) पढ़ आइयेगा क्योंकि असली बात वहीँ है. -


१. जेएनयू

आधी बात तो आपको जेएनयू पढ़ते ही समझ आ गयी होगी. अब ये कहने को तो यूनिवर्सिटी ही है पर न्यूज में हर बात के लिए आता है ...केवल पढाई-लिखाई से जुड़ी बातों को छोड़कर. किसी नाम को एक विचारधारा विशेष का पर्याय बन जाने के लिए प्रयास तो बहुत करना पडा होगा, नहीं ?

मेरी आदत है वहां टांग नहीं घुसाने की जहाँ का कोई आईडिया नहीं पर यहाँ आइडिया था तो...

एक व्हाट्सऐप ग्रुप पर जब जेएनयू के प्रोफ़ेसरों के लिखे कुछ (अटेंडेंस के मुद्दे पर)आर्टिकल आये तो हमें लगा कि लोग कुछ भी लिख दे रहे हैं ! अखबार में छपे और टीवी पर दिखने वाले विद्वताझाड़कों (शब्द सोर्स) से हम प्रभावित होना बहुत पहले छोड़ चुके। उसके कई कारण है. एक कारण ये भी है कि खुद भी थोड़ा बहुत तथाकथित विशेषज्ञ की हैसियत से छप चुके हैं (अब बताइये आज से तीन साल पहले जो बिटकॉइन पर लिखता था उसे तो भर-भर के पैसे बना लेने चाहिए थे, नहीं? ☺) और हार्वर्ड, स्टेंफर्ड, एमआईटी जैसे भारी-भारी डिग्री और प्रोफाइल वाले लोगों के साथ उठाना बैठना कुछ यूँ है कि (बैरीकूल की भाषा में कहें तो -) घंटा हम अब उससे इम्प्रेस नहीं होते☺ ... प्रोफ़ेसरी का भी आईडिया है. और फिर ‘धन्य धन्य ट्विट्टर कुमारा, तुम समान नहि कोउ उपकारा’. ट्विट्टर न होता तो हम बहुत से बे सिर पैर के बात करने वाले विद्वताझाड़कों को सीरियसली ही लेते रह जाते.


तो कुल मिला के हमें लगा कि आर्टिकल लिखने वालों की बात में टांग घुसाने भर का आईडिया हमें है. और ये लिखने वाले लोग कोई तोप-तमंचा नहीं है. तो हमने एक बड़ा संयमित सा जवाब लिखा. कॉलेज के दोस्तों ने कहा ‘चापे हो’ (माने अच्छा है). लेकिन ऐसा है कि विचारधारा विशेष के लोग अपनी बात कह के निकल लेते हैं. आपके तर्क सुनते हैं या नहीं ये आप सोचिये. खैर... तो वो बात यूँ थी. पढ़ा जाय - JNU Attendance Row (वैसे हम बोरिंग बात तो नहीं करते पर पढ़ते-पढ़ते आप पर अगर बोरियत माता सवार हो जाएँ तो अगली बात पर चले जाएँ, शायद उसमें कुछ मजे की बात मिल जाए. फिर से वापस आकर पढ़ने का विकल्प कहीं गया थोड़े है). सोचा हिंदी में अनुवाद किया जाय पर अंग्रेजी में ही पढ़ आइये.


२. आँख मारने वाली लड़की


वायरल, एपिडेमिक, मारक सब हो चूका तो ऐसा तो नहीं है कि आपने क्लिप नहीं देखा होगा. और मौसम भी है फगुआ का तो वैसे भी भूगोल, कर्व, तरंग, एपिडेमिक सबका मतलब और इक्वेशन बदल जाता है. सब कुछ ऐसे पढ़ा जाता है -

तन्वी श्यामा शिखरि दशना पक्व बिम्बाधरोष्ठी. मध्ये क्षामा चकित हरिणी प्रेक्षणा निम्ननाभि।
श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्यां. या तत्रा स्याद्युवतिविषये सृष्टिराद्येव धातुः।

इसका अर्थ गूगल करके पढ़िए. (मघा पर लिखने का साइड इफ़ेक्ट है).

पर सच बताएं तो हमें इस क्लिप में कुछ अलौकिक सा नहीं नहीं लगा (अपना अपना स्टैण्डर्ड है भाई ☺). ये जरूर लगा कि लोग फ़ोन, फ़िल्टर और स्क्रीन में कुछ यूँ घुसे होते हैं कि भूलने लगे हैं अदा होती क्या है ! नैन नक्श, चाल-ढाल, मुस्कुराना, शर्माना ... धीरे-धीरे साधारण बातें भी अद्भुत हो ही जानी है. जैसे फसलें कौन पहचान पाता है? आलू, टमाटर, गेंहू, बैगन, चना इन्हीं को खेत में लगा दिखा दो... कितने लोग पहचान पायेंगे? और एवोल्युशनरी बायोलॉजी की मानें तो इन्हें पहचानना तो हमारे जींस (पहनने वाला नहीं गुणसूत्र वाला) में हो जाना चाहिए था अब तक. वैसे ही... फेसबुक पर फ़िल्टर के पीछे के चेहरे लाइक करते करते हम भूल ही गए हैं कि ‘अदा’, हाव भाव, एक्सप्रेशन होता क्या है ! ज्यादा छोड़िये पिछली बार आपने किसी को सुकून से सोते हुए कब देखा था? किसी को प्यार से कब जगाया था? धुप्प अँधेरी रात में आकशगंगा कब देखा था? किसी के साथ सुकून से बैठ के बात के अलावा और कुछ भी नहीं किया हो... ऐसा कितना समय बिताया.? कभी किसी के साथ बैठकर आकाश में सप्तर्षि और ध्रुव तारा के साथ मृग-लुब्धक-व्याध देखते हुए दिशा और समय का अनुमान लगाया? (एक उम्र में मैंने घडी के साथ साथ इनसे भी देखा है कि रात को पढ़ते पढ़ते कितना समय हो गया!) कितने काम हैं जी.... जो आपने कभी नहीं किया? या अब नहीं करते? खाली पैर चले किसी के साथ? किसी की धड़कन सुने हैं क्या कभी? भारी काम नहीं है ये सब. विशेषज्ञता नहीं चाहिए. लेकिन पता नहीं क्यों मुझे चेतावनी दी जाती है कि तुम रोजमर्रा का काम लिख दो तो “रोमांटिक होने के १००१ तरीके” की किताब हो जायेगी. पर उसके बाद लड़के सब मिले के तुम्हें कूट देंगे और लडकियां तो वैसे ही पीछे पड़ी रहती हैं तुम्हारे”.

हमें नहीं पता था कि ये सब पुरातन काम भी रोमांटिक होना है – बताया गया तो लगा होता होगा. शायद नेचुरले रोमांटिक होते हैं कुछ लोग. जो कर दें वही रोमांटिक हो जाता है. वैसे क्लिप पर लौटें तो। ...हमको कुछ भी समझना-समझाना-पढ़ाना बहुत अच्छा लगता है और जब भी किसी लड़की को फिजिक्स और गणित का ‘तत्व’ समझाने की कोशिश किये... खुदा कसम (खुदा कसम की व्याख्या सीट नंबर ६३ वाली पोस्ट में है) उसके बाद वो हमें जिस नजर से देखी ...उसके सामने ये क्लिप कुछ नहीं है! किसी ने दुनिया में सोचा होगा कि ये भी रोमांटिक होता है? – स्ट्रिंग थ्योरी?! खैर अब और नहीं... बहुत लोग मेरा ब्लॉग पढ़ते हैं ईमेज का बंटाधार हो जाएगा. अब श्री श्री १००८ तरीके में ही लिखा जाएगा डिटेल में. ये सब इसलिए भी कि वायरल होने में तो अदा वगैरह जो था सो तो था ही... पता चला एक फतवा भी आ गया (सही न्यूज़ है न?. नहीं भी है तो ये क्या कम है कि पढ़ के लगा जरूर ऐसा हो सकता है !). फतवा के ऊपर एक लतवा भी जारी होना चाहिए. फतवा जारी करने वाले को देखते ही लतिया देने का. ऐसा फतवा वही जारी कर सकता है जिसने कभी “चकित-हरिणी-काम-कमान” जैसा कुछ देखा ही नहीं. या फिर जिसे कभी किसी ने उस नजर से नहीं देखा जैसे बिल्ली कबूतर को देखती है (ये वाला मेरा अपना ओरिजिनल है). नैन तो बुरखे (ख होता है कि क?), हिजाब में भी दीखते हैं, माने अब क्या? ! खैर... सौंदर्य रस पर कभी और लिखा जाएगा. और वैलेंटाइन से इस पोस्ट का कोई लेना देना नहीं है. वो क्या है कि - सदा भलेनटाईन प्रेमी का, बारह मास वसंत. पर पोस्ट लिखने का मुहूर्त आज ही बन गया. आप वैलेंटाइन की पोस्ट मानकर पढ़ रहे हैं तो भी हमें कोई आपत्ति नहीं. जो बारह मास वसंत वाले नहीं नही उनके लिए एक दिन ही सही ☺


३. पकौड़े बेचना

पकौड़े बेचने का बड़ा हौव्वा रहा आजकल. मेरा एक गुजराती दोस्त है. सिविल इंजिनियर. वो पिछले पांच साल से कह रहा है – “बाबा, बहुत हुई नौकरी. अब एक फ़ूड जॉइंट खोलते हैं. डॉलर छापेंगे. देख दीप फ़ूड वाले को”. वो बस इसीलिए नहीं खुल पा रहा क्योंकि सारी रेसिपी मेरी है. और भगवान ने गिने-चुने लोगों के भाग्य में लिखा मुझ जैसे आलसी के हाथ का खाना ! नौकरी की इतनी तौहीन और पराठा बेचने की ऐसी इज्जत उससे ज्यादा कोई और नहीं कर सकता. पर लोग साधारण सी बात को भी अपनी विचारधारा में लपेट के उलझा देते है. एक लाइन की बात है – मज़बूरी और शौक का फर्क. मैकडोनाल्ड्स भी अमरीकी वडा पाव बेचने वाला रहा होगा कभी. दीप फ़ूड वगैरह वगैरह तो खैर पकौड़ा ही बेचते थे. अगर आपको रूचि हो तो पूछियेगा हम सुनायेंगे दो चार सक्स्सेस स्टोरी.

हमको जिंदगी में सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बातों में से एक सीख मिली थी – ‘जो काम करो अच्छे से करो, घास ही छिलो तो ऐसे कि उधर से जाने वाला देख के कह उठे ...कौन है जो ऐसा काट के गया है? ! (प्लीज नोट दैट घास काटने की बात है कुछ और नहीं.)’ कालान्तर में हमने उसे थोड़ा मॉडिफाई कर दिया कि ‘जिंदगी में घास ही छिलो तो ऐसे कि कम से कम दो चार गोल्फ कोर्स का कॉन्ट्रेक्ट तो मिले ही!’ काम छोटा बड़ा नहीं होता. मैं जहाँ भी रहा वहां किसी न किसी चाय वाले की आमदनी जरूर जोड़ा और हमेशा लगा कि उसकी आमदनी ज्यादा है. मार्जिन-रेवेन्यु-प्रॉफिट हम जोड़ते ही रह गए वो आगे बढ़ते चले गए. दुनिया-जहाँ के तर्क-कुतर्क पढ़े. चिदंबरम साहब को कहते सुना कि मैं आपको देता हूँ ४५,००० रुपये - करके दिखाओ बिजनेस.

इससे पता चलता है कि किस दुनिया में जी रहे हैं लोग ! जब लोग कहते हैं कि पचास हजार महीने में बहुत मुश्किल है आज के टाइम में सरवाइव करना. सरवाइवल शब्द की बेइज्जती लगती है मुझे. मुझे पचास हजार वाली मुद्रा योजना का कुछ नहीं पता. उससे किस किस ने क्या किया वो भी मुझे नहीं पता. कितना सफल होगा... नहीं पता.

दो बातें जो पता हैं –

पहली ये कि मैं जानता हूँ ऐसे व्यक्ति को जिन्होंने किसान क्रेडिट के लोन से गाडी खरीद लिया एक के बाद दूसरी और फिर तीसरी. लोन माफ़ होता गया...  किसान जो हैं.

ये करप्शन है? - हाँ.
इससे किसी को फायदा हुआ – हाँ.
जैसे होना था हुआ - नहीं.

पर वो क्या है कि चीजें इतनी साधारण नहीं होती कि जिसे भी ५०,००० रुपये मिलेंगे वो बिजनेस ही खड़ा कर देगा. वो उससे अपनी बेटी की शादी भी कर सकता है. करेगा भी. गरीबी के उस स्तर पर विचारधारा और अर्थशास्त्र नहीं चलता. और आपको लगता है कि पचास हजार में बेटी की शादी नहीं होती तो.. पचास हजार में पाँच भी होती है. आपने बस वो भारत देखा नहीं. जिसने देखा है वो जानता है. योजना की बात है तो स्वच्छ भारत योजना में बने टॉयलेट में गोईठा रखाएगा। हमने देखा है रखाते. लेकिन... कोई तो जाना चालु करेगा. आपका तर्क वैसे ही है जैसे... मनी कैन’ट बाई हैप्पीनेस सो तो ठीक है लेकिन व्हाट द हेल कैन पॉवर्टी बाई?

क्या ५०,००० से बिजनेस खड़ा हो सकता है?

इस पर दूसरी बात. स्वयं का अनुभव –

ये २०११ की बात है. इस लिंक पर इस नाचीज का लिखा. पेज नंबर ५. पढ़िए इसमें कितने रुपये के लोन की बात है और कितने रुपये के रिचार्ज कूपन का. किराए पर लेकर रिक्शा चलाने वाले के लिए ५०,००० नहीं... सिर्फ उतना जो वो रोज किराए के लिए देता है वो अपने खुद के रिक्शे के लिए क़िस्त में भरने लगता है तो उसकी जिंदगी बदल जाती है. जब मैंने माइक्रोफाइनांस में काम किया था (खाली पटना सीरीज  लिखने नहीं गया था, कुछ काम भी किया था).. लोन ५०००, १०००० के होते थे. ५०,००० के तो सबसे बड़े लोन थे. किश्तें ... २०, ५०,१००... आश्चर्य है कहाँ रहते हैं लोग? किस दुनिया में? जब किरोसिन को सोलर से रिप्लेस करने के प्रोजेक्ट पर काम किया था तो आईडिया था कि जितना एक परिवार किरोसिन के लिए महीने में खर्च करता है अधिक से अधिक उतनी ही क़िस्त होनी चाहिए सोलर लैम्प की.

क्या ये जो भी मुद्रा योजना है उसी तरह काम करेगी जैसे माइक्रोफाईनांस? –संभवतः नहीं. माइक्रोफिनांस में ब्याज दर सुन कर आपके होश उड़ जायेंगे. पर वहां स्वार्थ (इन्सेन्टिव) होता है पैसे देने वाले का कि वो सही बिजनेस में लगे. ताकि पैसे वसूल हो सके... सरकारी बाबुओं के पास ऐसा कोई इन्सेन्टिव नहीं. पर बिल्कुल ही बेकार, व्यर्थ या ये कह देने वाले कि ४०-५०,००० रुपये में कुछ हो नहीं सकता ! बिडम्बना है कि आपने कभी देखा ही नहीं भारत ढंग से. खाए पीये अघाए लोग कुछ भी लिखते-कहते हैं. और उसी तरह के लोग फिर बिना सोचे समझे जो दीखता है बिना पढ़े, सोचे फॉरवर्ड कर देते हैं. कम से कम सिर पैर तो देख लेना चाहिए ! आपके लिए पचास हजार कुछ नहीं. लेकिन आपके एक कॉफ़ी के पैसे से कम में दिन भर का खर्चा चल जाता है किसी का !

चलिए अब जाइए मौज कीजिये. पहले ही बोला था तीन पर नहीं रुकने वाली बात J

वैलेंटाइन हैं आज. तो अमेरिका में प्यार ‘सेल’ पर होता है – सुपर मार्किट, रेस्टोरेंट – हर जगह. और फ्लावर की तो खैर महिमा अपरम्पार है ही.  बाकी १००८ वाली किताब कभी आयी तो पढियेगा जरूर :)

~Abhishek Ojha~

Nov 30, 2016

न चोरहार्यं न च राजहार्यंन...


मैं लगभग कैशलेस इंसान हूँ. मुद्राहीन - चैन से रहने वाला !*
(*शर्ते लागू)

पिछले कई सालों से कभी मेरे जेब में नोट या सिक्के रहे हो... और वो भी एक दिन से ज्यादा के लिए - मुझे याद नहीं. यात्राएं अपवाद रही. इस अपवाद के दिनों में नोट को लेकर कई अनुभव हुए (जिंदगी में लोग हो या घटनाएं अपवादों का बहुत महत्त्व है - इस पर फिर कभी). कुछ अनुभव सामान्य लेकिन याद रह गए. वैसे तो मुझे बहुत कुछ याद नहीं रहता लेकिन कुछ बातों में कुछ बात होती है जो याद रह जाती है. 'नोट' सामयिक बात है तो ऐसी ही कुछ याद रह गयी बातों से कुछ नोट्स - 

दृश्य १: (पटना)

उन दिनों मैं एटीम से पांच हजार रुपये निकालता, जब-जब जेब में पांच सौ से कम हो जाते.* जिस दिन की बात है उस दिन मेरे पास छुट्टे नहीं थे और मुझे अपने कपडे वापस लेने थे. दुकानदार ने कहा - "अरे ले जाइए. आपका कौन सा एक दिन का है. फिर त ऐबे करियेगा. तब दे दीजियेगा. कहाँ रहते हैं? नया आये हैं इधर?" मैंने कभी खाता नहीं लिखवाया. पर ये बात कभी भूल नहीं पाया. पहली बार मैंने कपडे दिए थे उस दूकान पर. कुल ढाई महीने के लिए था मैं उस शहर में, रोज का जाना नहीं था मेरा. और कोई मुझे बिना मांगे उधार देने को राजी हो गया था.

जो कह रहे हैं कि... नोट की कमी से किसानों की बुवाई नहीं होगी मुझे नहीं समझ उन्होंने किस तरह के भारत को देखा है ! एक तो किसान की बुवाई में लाखों रुपये नहीं लगते. फिर बीज बेचने वाला, ट्रैकर वाला... ट्रैक्टर का तेल बेचने वाला. सबको एक दुसरे के साथ ही उठना बैठना होता है. सब एक दुसरे के यहाँ खाते हैं और सबके यहां सबके खाते चलते हैं. अगर आपको लगता है कि विमुद्रीकरण से किसी का खेत बंजर रह गया होगा तो पता नहीं आप किस हिन्दुस्तान में पले बढे हैं ! शायद आपको लगता है कि खेती और फैक्ट्री का प्रोडक्शन एक ही बात है. और जिन्हें लग रहा है कि कुछ दिन ५०० और १००० के नोट नहीं रहने से बार्टर सिस्टम हो गया है. उन्हें एक बात बता दें... दुनिया में कभी भी शुद्ध वस्तु-विनिमय (बार्टर सिस्टम) रहा ही नहीं. भरोसा रहा. उधार रहा. और वो हमेशा मुद्रा से ज्यादा चलन में रहा. आज  भी है. सालभर कोई आपको आपकी जरुरत का सामान दे और साल में एक बार या दो बार जो आपके पास है वो आप उसे दे दें- इसे वस्तु विनिमय नहीं कहते. भरोसा कहते हैं या उधार (डेट). ये दुनिया में मुद्रा के आने के बहुत पहले से है. पर बाते ये है कि जिन्होंने कभी गाँव देखा ही नहीं वो गाँव वालो की समस्या से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं.

*दो लाइने लग रहा है कंप्यूटर प्रोग्राम है. :)
इफ (मनी_इन_जेब < ₹५००){
विदड्रा ₹५०००
}


दृश्य २: (बलिया)

मेरे हाथ में ₹५०० के कुछ नोट थे. किसी ने मुझसे कहा  - "क्यों लहरा रहे हो? ढेर पैसा हो गया है? रुपया दिखाने का चीज नहीं होता है. कोई ठाएँ से मार देगा तो आज ही सब काम हो जाएगा. गंगाजी भी बगले में हैं".
"इतने से रुपये के लिए?"
"इतने से? पैसठ रूपया का कारतूस आता है. सौ रूपया के लिए भी कोई मारेगा तो पैंतीस रूपया का शुद्ध मुनाफा. जोड़-घटाव आता है कि नहीं?"

इस पर कोई टिप्पणी नहीं.

दृश्य ३: (स्विट्ज़रलैंड)

आपको लगेगा कि जरूर कोई राजनितिक बात करने जा रहा है. सारी बातें बना कर बोल रहा है, ज़माना ही वही है. तो २००५ में घटी एक घटना, जो २००८ में पोस्ट की गयी थी - ब्लॉग्गिंग वाले दिनों की पोस्ट है - यहाँ जाकर बांचा जाय - वो लोग ही कुछ और होते हैं ... (भाग II)

दृश्य ४: (रोम)

कॉफ़ी का बिल और साथ में रखा नोट उठाकर  पुनः वापस रखते हुए वेट्रेस बोली  - "इत इज ब्यूयूयूऊऊतीफुल ! बट नोत यूरो माय फ्रेंड" मुझे कुछ समझ नहीं आया कि बोला क्या उसने. और मैं वैसे हँसा जैसे... कुछ ढंग से नहीं सुनाई देने पर या समझ में न आने पर हम फर्जी ही ही करते हुए मुस्कुराते हैं. और वैसे ही मुस्कुराते हुए मैंने धीरे से हिंदी में पूछा - 'क्या बोल रही है? ले क्यों नहीं गयी? बीस का नोट ही तो रखा है'
"ये बोल रही है कि यूरो नहीं है. फिर से देखो तुमने क्या रखा है".

 
हमारे पास एक छोटा सा बैग है. पासपोर्ट रखने भर का. उसमें बची खुची विदेशी मुद्रा पड़ी रहती है. वो तभी निकलता है जब कहीं पासपोर्ट लेकर जाना होता है - माने अंतरराष्ट्रीय. वापस आकर फिर वैसे ही रख दिया जाता है. भूले भटके, मज़बूरी में जिन नोट और सिक्को को देखना हो... क्या समझ में आएगा किस देश की चवन्नी-किसकी अठन्नी, क्या यूरो-क्या फ्रैंक !. हमने यूरो की जगह स्विस फ्रैंक रख दिया था. गांधीजी पहचान में आते हैं और वाशिंगटन, हैमिल्टन, लिंकन धीरे धीरे आ गए है. बाकी सब बिन पढ़े थोड़े पता चलेगा. एक रुपये के नोट का बॉम्बे हाई या पांच रूपये के नोट वाली ट्रैक्टर थोड़े न है कि जीवन भर के लिए छप जाएगा दिमाग पर. (वैसे नोटों की खूबसूरती/डिजाइन और जारी करने वाले देश के विकसित होने में क्या संबंध है ये भी एक रिसर्च की बात हो सकती है. लेकिन खूबसूरती आते ही परिभाषित करने की समस्या आ खड़ी होती है. खूबसूरती न सिर्फ देखने वाले इंसान की आँखों में होती है वक़्त के साथ उन आखों का नंबर भी बदलता रहता है!).

दृश्य ५: (सेंटोरिनी)

एक और पुरानी पोस्ट पढ़ा जाए. वैसे कैश इतना बुरा भी नहीं है. देखिये कैसी कैसी बातें हो जाती हैं छुट्टा न होने से. - ग्रीक म्यूजिक.

दृश्य ६: (न्यू यॉर्क)

बात उन दिनों की है जब हम नए नए अमेरिका में आये थे. बिल था $८.२५. मैंने दस डॉलर का नोट दिया और साथ में २५ सेंट का सिक्का. मतलब अब आदत थी तो थी. और ये तो फर्ज बनता है कि छुट्टा आपके पास है तो सामने वाले का काम आसान बनाइये. ₹४१० देना है तो सामने वाले को ₹५०० की जगह ₹५१० दीजिये. इतना गणित तो सबको आता है. पर यहाँ न टॉफ़ी पकडाते हैं न उन्हें छुट्टे का खेल समझ आता है -
काउंटर पर खड़ी लड़की ने ऐसे देखा जैसे... किसी महामूर्ख अजूबे को देख रही हो. "व्हाई वुड यू गिव मी दिस?" अमरीकी चवन्नी दिखाते हुए उसने मुझसे पूछा.
"आई थोट.... हम्म.. सॉरी" मुझे लगा अब इसको समझाने का क्या फायदा कि व्हाट आई थोट और कैसे करना होता है लेन देन. न ही वो ज्ञान इस देश में किसी के काम आता. लम्बी कहानी अलग होती. अजीब भी लगा कि इस देश में इतनी साधारण बात नहीं पता लोगों को ! उसने मुझे वापस एक मुट्ठी सिक्का पकड़ा दिया. एक एकसेंट लौटा देते हैं लोग ! और हर चीज की कीमत डेसीमल में ही रखेंगे. शुरू के दिनों में इतने सिक्के जमा हो जाते और सिक्के किसी को देने में गिनने का झंझट. ये झंझट मेरे कैशलेस होने के पीछे का सबसे बड़ा कारण था.

..आजकल अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का हवाला देकर जो कुछ भी किसी के मन में आये लिख दे रहे हैं वे सारे सिद्धांत ऐसी ही मूलभूत बातों पर आधारित है. जिनमें से कई भारतीय परिवेश में लागू नहीं होते. उनके तर्क आपको सही लगेंगे पर... जिन बातों को आधार बनाकर वो तर्क देना चालु कर पूरा लेख लिख मारते हैं. जिसे पढ़कर आपको लगता है अरे इतना बड़ा आदमी इतने बड़े बड़े सिद्धांतों की बात कर रहा है.. उसकी बात अगर आप ध्यान से पढ़ें तो पता चलेगा सिर्फ राजनितिक कचरा है ! किसी का भी  लिखा हो उसे दिमाग लगाकर पढ़िए - हाल फिलहाल में जितना पढ़ा ये बात और दृढ होती गयी. इतनी गलत बातें ! अखबार में लिखने और टीवी पर एक्सपर्ट बने सभी विशेषज्ञ निष्पक्ष नहीं होते. विशेषज्ञ तो खैर शायद ही होते हैं. उनके पूर्वाग्राह आपसे बड़े हैं. उनका एजेंडा भी. आँखे खोल कर दुनिया देखना सीखिए. आप किसी को ८.२५ की जगह १०.२५ देकर गलत नहीं कर रहे. ज्यादातर तथाकथित बुद्धिजीवी विशेषज्ञों को पता ही नहीं ये कैसे काम करता है और वो आपको मुर्ख कह दे रहे हैं !

दृश्य ७: (राँची)

"आपको सुखी कहते हैं? आपको ज्यादा पता है कि हमको? अमीर कहते हैं सेठ-मारवाड़ी को ! आप जैसे लोगों को नहीं. आपके कहने से हम आपको अमीर कह देंगे और मान लेंगे कि आपको कोई तकलीफ नहीं है?"

सड़क के किनारे हाथ देखने वाले और साथ में अंगूठी बेचने वाले ज्योतिषी ने एक आदमी को बिल्कुल डांटने वाले अंदाज में कहा था. उस आदमी का गुनाह ये था कि... अंगूठी बेचने वाले की बतायी गयी बात -

 "आप तकलीफ में तो हैं..., आपकी आमदनी से ज्यादा खर्चा हो रहा है. आप दिल के तो बहुत अच्छे हैं लेकिन लोग आपको समझ नहीं पाते हैं. गरीबी आपको परेशान कर रही है"

के जवाब में उसने कह दिया - "नहीं, ऐसा तो नहीं है. हम तो बहुत सुखी हैं. भगवान का दिया सब कुछ है".

मैं तब ग्यारहवीं में पढता था. और ये बात मैंने इतने लोगों को सुनाई है कि मैं क्या मुझे जानने वाले कई लोग भी ये बात नहीं भूलेंगे. वे दिन थे कि पैदल चलते-चलते कहीं रुक कर ऐसी बाते सुन लेते. कभी भटकिये ऐसे... बहुत मजेदार बातें सीखने को मिलेंगी :)

तो.. ये विशेषज्ञ ऐसे ही हैं. अगर आप कहेंगे कि आपको तकलीफ नहीं है तो वो आपके मुंह में ठूस कर उगलवा लेंगे कि आपको तकलीफ है. वो विशेषज्ञ हैं कि आप? आप कौन होते हैं फैसला करने वाले कि आपको तकलीफ है या नहीं? आप कैसे बता सकते हैं कि आपके लिए क्या अच्छा है? बस यही हो रहा है और कुछ नहीं. आप खुद सोचिये और फैसला लीजिये. क्यों अंगूठी बेचने वाले के चक्कर में पड़े हैं. अखबार वाला भी अंगूठी ही बेच रहा है. टीवी वाला भी. चलिए वो तो कुछ बेंच रहे हैं... पर वो जो उनके कहे को ब्रह्मसत्य मान तर्क पर तर्क दिए जा रहे हैं. व्हाट्सऐप पर फॉरवर्ड किये जा रहे हैं उनका क्या?

गाइड सिनेमा में जब राजू के पास एक व्यक्ति रोजी के हस्ताक्षर लेने आता है... वो सीन याद है आपको?
राजू: 'तो मार्को रोजी के जेवरात हडपना चाहता है?'
'जी नहीं, बल्कि वो तो चाहते हैं कि... सारे गहने रोजी को ही दे दिये जाएँ.'
राजू: 'तो मार्को ये दिखाना चाहता है कि वो बहुत अमीर है" (संवाद अक्षरशः नहीं है, बात याद रह गयी संवाद भूल गया)

दोनों ही निष्कर्षों में गलत तो कुछ नहीं है! पर उदहारण का मतलब ये है कि विशेषज्ञ ऐसे ही दुनिया देखने लगे हैं. वो फैसला  पहले ही कर के बैठे हैं मुद्दा जो भी हो. सामाजिक विज्ञान के बारे में हमारे एक सांख्यिकी के प्रोफ़ेसर कहा करते कि - "सोसिओलोजी के हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट आकर बोलते हैं. सर, एक बहुत अच्छा पेपर लिखा है. कोई अच्छा सा मॉडल बताइये जो उस पर फिट हो जाए. डाटा है बस एक अच्छा मॉडल चाहिए.क्वांटिटेटिव हो जाएगा तो आराम से छप जाएगा और थोडा वजन भी आ जाएगा." खैर इस बात को कहने से जो बात आपके दिमाग में आई वो तो आप समझ ही गए होंगे? आप बोलिये किस बात पर किस पक्ष में लिखना है. हम लिख देते हैं - आंकड़ा, सिद्धांत सब फिट करके।**

बात चली थी कैशलेस होने के फायदे से और कहीं और निकल गयी. खैर शीर्षक से याद आया - कोई भी और धन विद्याधन तो कभी नहीं हो सकता. लेकिन... कैशलेस होने से.. वो क्या है कि..  विद्या के कुछ गुण तो उसमें आ ही जाते हैं जैसे विदेश में इन्सान की बंधु - न एक्सचेंज रेट की समस्या न कमीशन की, न ही अनजान मुद्रा पहचानने-गिनने की (वैसे आपके पास अच्छे वाले कार्ड न हो तो बैंक कमीशन  लेते हैं), धन जिसे कोई चुरा नहीं सकता, राजा नहीं ले सकता, उसका भार नहीं होता और उसका कभी नाश नहीं होता... विद्याधन पर ये सारे श्लोक तो आपने पढ़े ही होंगे?. डिजिटलधन के लिए भी सही है.*

दिमाग अच्छे कामों में लगाइए...अन्यत्र हमने कहा कि दिमागी व्यायाम होना जरूरी है सोच अच्छी रहती है.
बाकी तो भावना अच्छी हो तो दुनिया खुबसूरत ही खुबसूरत है. जाकी रही भावना जैसी -

--
~Abhishek Ojha~

पुनश्चः एक और बात - आजकल लोग लिखना शुरू करते हैं - मेरी काम वाली बाई, मेरा  ड्राइवर, मेरा दोस्त, मजदूर, मेरा पलम्बर, किसान फिर बताते हैं कि उसे विमुद्रीकरण से कितनी तकलीफ है. पढ़े लिखे लोग आजकल ऐसे ही बात करते हैं. संभवतः ऐसे लोगों को खुद कभी कोई परेशानी नहीं होती, खासकर जब पैसे की बात हो. काम करने वाले और गरीब लोगों को क्या आप इंसान नहीं समझते? वो क्या बेवकूफ हैं? अशिष्ट हैं. हमें लगता था दासप्रथा अंत हुए कुछ साल हो चुके हैं - आपके ड्राइवर? खैर हमें व्यक्तिगत रूप से न तो ड्राइवर रखने का अनुभव है न काम वाली बाई का. पर जो शुरू ही ऐसे करते हैं उनकी बात आगे क्या पढ़ी जाए ! आप बताएंगे कि उनको तकलीफ है क्योंकि उन्हें खुद नहीं पता? और आपको कोई तकलीफ नहीं?... उनके पास इफरात में ५०० और १००० के नोट हैं जो ख़त्म ही नहीं हो रहे, ये कह कर आप गरीब का अपमान नहीं कर रहे? और आपके पास तो कुछ था नहीं? और उनको तकलीफ है तो मदद करने की जगह आप उसे ट्वीट करते हैं? अंगूठी बेचने वाले विशेषज्ञ! - जो कह रहा है मुझे कोई तकलीफ नहीं उसे तो जीने दो. मेरी मानो तो गया चले जाओ - बहुत स्कोप है. वहां मुर्दे को भी तकलीफ में दिखा देने वाले लोग होते हैं :)

**पता चला किसी ने खुले में शौच के समर्थन में लेख लिख दिया. उसके बाद लगा अपने इस स्टेटमेंट पर भी स्टार लगा देना चाहिए. मुझमें उतनी योग्यता नहीं. :)

Jan 9, 2012

२०११...

 

साल 2011 का कुछ-कुछ अपने पास पड़ा रह गया है... वो तो अब वापस लेने आएगा नहीं... ये अब अपने साथ ही रह जाएँगे। हमारा कुछ अगर किसी के पास रह गया होगा तो ये उन्हें पता होगा... हमें याद नहीं। हाँ, हमारे पास जमा हो गए हैं... - कुछ अनुभव – कुछ यादें – कुछ किताबें – कुछ तस्वीरें - कुछ अपेक्षित - कुछ अनापेक्षित – कुछ लोगों से मिलना - कुछ जगहों से ।

कुछ जगहों और लोगों से लगभग एक दशक बाद मिलना हुआ। बचपन के चौराहों और मुहल्लों से गुजरना हुआ। बस स्टैंड, मंदिर, चौक... वो हर हर टूटी फूटी चीजें जिनसे यादें जुड़ी हुई हैं।  ऐसी जगहों पर भी जाना हुआ जहां शायद योजना बनाकर कभी नहीं जा पाता। कुल मिलाकर वैसे ही जैसे एक मानव के जीवन के दिन गुजरते हैं...

पटना – रांची - मुंबई - दिल्ली - सुंदरबन - कोलकाता - बोध गया - राजगीर - नालंदा - पावापुरी - वाराणसी - सारनाथ - बैंगलोर - न्यू यॉर्क –

बहुत सारे अच्छे लोग... और कुछ... हम्म... अच्छे लोग। बाकी अनुभव और ज्ञान सिखा देने वाले लोग। ऐसे अनुभव देने वाले चंद लोगों को (एक ही) जब मैं याद कर रहा हूँ... तो...  दरअसल मेरा कुछ बिगड़ा नहीं  ! बल्कि एक बात सीखने को ही मिली और ये कि मैं किसी और के साथ उनके जैसा कभी कर नहीं पाऊँगा। बिन उनके ऐसे कहाँ से सीख पाता जी !  मैं उनसे जीवन में शायद दुबारा नहीं नहीं मिलूँ... मुझे तो लग रहा है कि वो बस मिले ही थे मुझे सीखाने के लिए :)

बहुत कुछ लिखने का मन हो तो समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करें। वो सारे शिक्षक जो एक दशक बाद पहचान गए और... या फिर वो जिनसे मिलना था और... ! वो अनजाने लोग जो  आपके लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं... निःस्वार्थ-अकारण प्रेम करने वाले... या वो जिनके लिए बिन वास्तविकता जाने जाने मन गुस्से से भर जाता हो और अंत में आपको वो कुछ भी बोलने का मौका ही नही देते ! दुनिया भले लोगों से भरी हुई है। इतने अच्छे लोगों से कि उनसे मिल कर लगता है... 'इनसे अच्छे लोग भी होते हैं क्या? अगर होते हैं तो कैसे होते होंगे  !'

ऐसी जगहों से गुजरना हुआ जहां से गुजरना अपने आप में एक अजीब अनुभव था। कई जगहें तीर्थंकर महावीर और तथागत दोनों से जुड़ी हुई हैं.... एक विचार अक्सर आता कि क्या दोनों कभी मिले होंगे? संभव है ! अगर हाँ, तो कैसा रहा होगा ? मैं अक्सर तुलसी और सुर सूर को लेकर भी ऐसा सोचता हूँ... अक्सर एक कहानी सी चल उठती है मन में... कैसा अद्भुत रहा होगा ! क्या बातें की होंगी उन्होने ? हिन्दू-बौद्ध-जैन ये धर्म सहिष्णुता के अद्भुत मिसाल  हैं !  राजगीर, बराबर की गुफाएँ और एलोरा इन जगहों पर ये सोच कर रोमांच हो उठता है कि कैसे इन तीनों धर्मों के लोग एक साथ मंत्रणा करते होंगे ! खैर...

इस साल की साथ रह गयी यादें... कभी न कभी, कहीं न कहीं... किसी बात में, किसी पोस्ट में, किसी कहानी में, किसी से बात करते हुए जाने-अनजाने आते रहेंगे। मैं अक्सर लोगों की तस्वीरें नहीं लेता... शायद जरूरी नहीं। वो अपने साथ रह गए हैं... वो याद रहें ना रहें उनकी बातें अचेतन मन पर अपना असर छोड़ जाती हैं। डायरी पलटता हूँ तो कितनी बातें हैं...

फिलहाल कुछ तस्वीरें...

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वणावर (बराबर) गुफाएँ, जहानाबाद बिहार। तीसरी शताब्दी पूर्व तक की गुफाएँ। हिन्दू, बुद्ध, और जैन तीनों धर्मों से जुड़ी हुई धार्मिक सहिष्णुता की प्रतीक, संभवतः भारत की प्रथम ज्ञात मानव निर्मित गुफाएँ हैं। गुफाओं  की अद्भुत चिकनी भीतरी दीवारें मौर्यकालीन कला की उत्कृष्टता दर्शाती हैं।

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बोधगया। अद्भुत शांति !

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मैनहट्टन -मेरे अपार्टमेंट से, और ब्रोन्क्स ज़ू में रॉयल बंगाल टाइगर।

microfinancepatna

पटना में एक माइक्रोफाइनान्स ग्राहक और गोलघर से पटना।

nalandapawapuri

नालंदा विश्वविद्यालय अवशेष और जल मंदिर पावापुरी।

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विश्व शांति स्तूप राजगीर और रांची में मेरी पसंदीद जगह - जगन्नाथ मंदिर।

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सुंदरबन और कोलकाता।

varanasisarnath

वाराणसी और सारनाथ।

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मुंबई में एक दिन।

~Abhishek Ojha~

Sep 30, 2011

लेबंटी चाह (पटना ६)

 

‘सर, लेबंटी चाह पीएंगे ?’ एक दिन सुबह सुबह फील्ड ट्रिप पर मुझसे किसीने पूछा.

‘वो क्या होता है?’ मैंने दिमाग पर जोर डालने के बाद पूछा.

‘सर लाल चाह - लेम्बू डाल के !’ उसने स्पष्ट किया.

‘अरे सर ऊ लेमन टी बोल रहा है. ब्लैक टी बिथ लेमन' – राजेशजी ने मुझे समझाया.

‘हाँ हाँ ले आइये… ये अंग्रेजी भी न’ - मैंने राजेशजी की तरफ देखते हुए कहा.

राजेशजी से मेरे पहली मुलाकात थी. गाडी में बजने वाले गाने पर वो अपनी अंगुलियों को कभी अपने जांघों पर और कभी सीट पर फिरा रहे थे. इस तरह संगीत में डूबे हुए मैंने किसी को पहले देखा हो ऐसा याद नहीं… आँखे बंद, सिर मंद-मंद एक छोटी गोलाई में घूमता हुआ और दाहिने हाथ की अंगुलियाँ संगीत के हर सुर का साथ देती हुई. गाना रुका तो उनकी तंद्रा भंग जरूर हुई पर फिर उसी मुद्रा में जाकर ‘पंछी बिछड गए मिलने से पहले’ गुनगुनाते हुए कहीं खो गए. इस गाने को गाते हुए असीम दर्द सा झलक रहा था उनके चेहरे पर. उनकी तन्मयता के कारण उनसे ज्यादा बात नहीं हो पा रही थी। सुषुप्तावस्था से कब वो संगीतप्रेमी वाली मुद्रा में आते और कब वापस सुषुप्त हो जाते ये समझ पाना थोडा कठिन हो रहा था. बीच में जब-जब इनोवा झटके लेती तब तब उनकी अंगुलियों और सिर में गति आ जाती।IMG-20110925-00457

‘लिया जाय’ - उनकी आवाज और लेबंटी चाह सामने देख मैंने प्लास्टिक के कप की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘बैगवा को सुता दीजिए न’ - उन्हें चाह लेने में थोड़ी परेशानी हुई तो उन्होंने मेरी गोद में 'खड़े' बैग की तरफ इशारा किया.

'जानते हैं?' - ये शब्द सुनकर मुझे आनंद की सी अनुभूति हुई। ऐसा लगा जैसे इनकी मुझे वर्षो से तलाश थी। स्कूल के दिनों में रेणु की एक कहानी में ठीक यही सवाल पढ़ा था जिसमें उन्होने अगली लाइन लिखी थी 'मैं कुछ भी नहीं समझ सका कि मैं क्या जानता हूँ और क्या नहीं !' ऊँ डीनो की पढ़ी वो लाइन अब भी याद है पहली बार अनुभूति हुई।

मैंने कहा 'नहीं बताइये'

'आप जब लेबंटी सुन के कन्फ़्यूजिया गए त हमको याद आया। अङ्ग्रेज़ी में बहुत बर्ड का मीनिंग हम लोग उलट दिये हैं। अब देखिये खाना खाने वाले जगह को हमलोग क्या बोलते हैं?'

'रेस्टोरेन्ट?'

'यहीं मार खा गया न इंडिया ! होटल कहते हैं। का समझे ?'

'होटल'

'हाँ। होट माने गरम, त गरमागरम खाना जहां मिलेगा उसको होटले ना कहेंगे? और जहां दु-चार दिन ठहरना हो उसे क्या कहते हैं?'

'आप ही बताइये !' मैंने कहा।

'रेस्टूरेंट ! अच्छा आपे बताइये रेस्ट माने का होता है ?'

'आराम करना?' - मुझे ये बताते हुए भी थोड़ा ड़र तो था ही पता नहीं वो इसका मतलब क्या बता देते !

'तो रेंट देके जहां आराम करना हो उसको  कहेंगे?....' और वो मेरे बोलने का इंतज़ार करने लगे।

'रेस्टोरेन्ट' मैंने उनकी बात पूरी की।

'हाँ ! ये भासा का असली ज्ञान जो है न बहुत कम लोगों के पास होता है। जादेतर सब्द जो है सब आइसही न बना है... आछे एक ठो और... आपको मालूम है कि बिर्हनी किसको कहते हैं?'

'...'

'अरे एक ठो पीला रंग के कीरा होता है... काट लेता है तो बरी फनफनता है। मधुमक्खीये समझिए बस उ सब मधु जमा नहीं करता है। अब बिर्हनी से हो गया बीहनी आ बीहनी से बी आ हनी अलगा करके अङ्ग्रेज़ी में हो गया मधु आ ?...का समझे?....'

'मक्खी' मैंने उन्हें एक बार फिर पूरा किया।

'हाँ - यही सब है भासा के ज्ञान' - उन्होने सगर्व बताया।

ड्राइवर ने किसी चौराहे पर गाड़ी रोकी और फिर आगे का रास्ता पूछने के लिए हमने खिड़की का काँच नीचे किया । 'भैया, शकुंतला एन्क्लेव किधर होगा?' मैंने पूछा तो जवाब देने के लिए चार-पाँच लोग उत्सुकता से आगे आ गए।

'सकुन्तला एंक्लेभ...' एक ने सोचते हुए दुहराया। 'अरे सकुन्तला एंक्लाभ जानता है किधर है?' उसने सवाल आगे बढ़ाया।

'सकुन्तला का ? हूँऊँऊँ... उ जज के मेहरारू हैं का?' एक ने सोचते हुए पूछा।

'आरे जज-कलक्टर आ मेहरारू नहीं रे बुरबक ! आपाटमेंट है सकुन्तला एनकलेभ' - राजेशजी ने मामला संभाला।

'आपाटमेंट? त इधर कहाँ होगा... आप गलत आ गए आपको त किदवई नगर जाना परेगा। आपाटमेंट सब त उधरे है ' - एक ने बताया।

'रुकिए ना जी ई धोबिया के पाता होगा। अरे सुंदरवा... सुन इधर। सकुन्तला इंकलैब अपार्टमेंट जानता है कहाँ है?'

'सकुन्ताला इंकलाब? अइसा त नहीं है इधर' -सुंदरवा ने बताया।

इंक्लेभ, इंकलाभ, इंकलैब, इंकलाब इत्यादि होता देख राजेशजी थोड़े जोश में आ गए। 'साला गलत पता बताया है, देख लेंगे *&^% को...'

'अरे कोई गलत पता क्यों देगा?' मैंने पूछा।

'अरे आप को का बुझाएगा... जब-जब कुछ गरबर करता है तब तब ई मा*#^#* सब गलत रास्ता आ पता बताता है। रुकिए साले को फोन करते हैं।'
---
'देखे ! नहीं उठा रहा $%&$% का ! किसी के केरेक्टर का कीजिएगा साला अब उ आज गायबे रहेगा' पटना में पहली बार पूरे फ्लो में गाली सुनने को मिल रही थी ।

'अजीब हाल है !' - मैं कह भी क्या सकता था।

'अरे सर आप निश्चिंत रहिए, हम यही तो करते हैं... अभी देखिये न आधा घंटा में कईसे सब ठीक होता है। हमारा यही सब काम है... आप लोग से ई सब नहीं न हो पाएगा। हम तो अइसा-अइसा प्रोडक्ट पर काम किए हैं इस एरिया में कि आपको क्या बताएं। आ एक-से-एक %$#$^ सब को ठीक किए हैं...  जब $%^& (एक मोबाइल सर्विस) आया था त उसका नाम कुत्तो-बिलाई भी नहीं जानता था। सब हमहीं देखे। फील्ड का बहुते एक्सपीरिएन्स है हमको।

...आता है सब कोट पहिर के होटल में टरेनिंग देने आ दिन भर इस्ट्रेटजी समझाता है। अइसा अक-बक बोलता है कि माथा पगला जाता है। अब इसमें लगाए ससुर कौंची का इस्ट्रेटजी लगाएगा? उ त हमलोग हैं कि अपने हिसाब से काम कर लेते हैं। आपको एक ठो बात बाताते हैं जो भी लेपटोप लेके अङ्ग्रेज़ी में भाषणबाजी किया... बुझ जाइए कि उ एक्को काम का बात नहीं बोल रहा ! हमको तो जाना पड़ता है, महाराजा होटलवा में टरेनिंग होता है। खाना-पीना भी होता है त हम तो उसके लिए ही चले जाते हैं। हमारे टरेनिंग में कभी आइये एकदम काम का बात बताते हैं हम... ' - भरपूर जोश और गर्व में राजेशजी ने बताया।

शकुंतला ढूँढने में मदद करने वाली भीड़ तब तक चली गयी थी। और राजेशजी अपने सूत्रों और तरीकों से काम पर लग गए। मुझे खुशी हुई कि साथ में मेरा लैपटॉप नहीं था... और इसी बात पर एक लेबंटी चाह पीने का मन हो आया।

सोच रहा हूँ किसी दिन राजेशजी का ट्रेनिंग सेसन अटेण्ड कर लूँ !

~Abhishek Ojha~

*तस्वीर: रेल और सड़क मार्ग का बंटवारा करती दीवार पर गोइंठा आर्ट !

Apr 3, 2011

ससराँव

 

एक भोजपुरी आंचलिक कहावत है. 

काहाँ जाताऽर? ससराँव. एगो जाँत लेले अईह.

भोजपुरी के केवल कुछ इलाकों में ही ये कहावत सुनी जाती है. जहाँ तक मुझे पता है बहुत ही Chakki-Jaantछोटे  इलाके में इस्तेमाल होती है. पर है बहुत शानदार  !. कहावत का अनुवाद कुछ यूँ है:

कहाँ जा रहे हो? सासाराम. एक जाँत (जाँता) लेते आना.

सासाराम बिहार का एक जिला** के रोहतास जिले का मुख्यालय है जहाँ पत्थरों की कटाई का काम होता है और उनसे घरेलु इस्तेमाल की सामग्री भी खूब बनती होगी (है?). वहाँ कभी जाँत बहुतायत में मिलते होंगे और ये मनोभावना भी होती होगी कि अच्छे मिलते हैं. वैसे जिन इलाकों में ये कहावत है वहाँ के सारे जाँत सासाराम में ही बनते होंगे तो अच्छे वाली बात का ज्यादा मतलब नहीं है. वैसे ही जैसे अब सबकुछ चीन में  ही बनता है. एपल के सामान आप अमेरिका से लो या सिंगापुर से बने हुए तो चीन के  ही मिलेंगे. हाँ सासाराम में जाँत थोड़े सस्ते जरूर मिल जाते होंगे. यही सासाराम कहावत में ससराँव या सासाराँव हो गया। वैसे कुछ लोग जब ज्यादा जोश में होते हैं तो सरसराँव भी कहते हैं.

तो कहावत का पहला हिस्सा तो स्पष्ट ही है: किसी के पूछने पर जब पता चला कि कोई सासाराम lady crushing wheat on traditional chakkiजा रहा है. तो पूछने वाले ने तपाक से कह दिया कि ठीक है अब जा रहे हो तो मेरे लिए एक जाँत (जाँता) लेते आना. जाँत अर्थात घर की चक्की. वही चक्की जिसे चलता देख कबीर बाबा रो पड़े थे. (चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोए. दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोए.) दुई पाटन के बीच  में कोई साबुत तो नहीं ही बचेगा लेकिन सासाराँव से जाँत लेकर आये तो भी… खैर मैं सोच रहा  था कहावत की व्यापकता. इस आंचलिक हिस्से में उस जमाने में (जब घर की चक्कियां होती थी) यातायात के साधन का अंदाजा लगाना तो मुश्किल काम है क्योंकि आज भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं है. वैसे में अगर किसी से जाँत लाने को कह दिया जाय तो...? !

एक तो जाते हुए को टोका गया जो कि अशुभ माना जाता है. अब भले ना माना जाय उस जमाने में तो अशुभ माना ही जाता होगा। फिर कोई अपने काम से जा रहा है तो उसे एक और काम पकड़ा दिया गया. और फिर काम भी ऐसा जो वैसे तो आसानी से हो सकता है लेकिन करने वाले का कचूमर निकल जाए. कुछ लोगों की आदत सी होती है कुछ मंगाना. "वहाँ का क्या प्रसिद्द है?" अब भले ही नागपुर से संतरे लाने में सड़ जाएँ लेकिन मंगाने वाले तो मंगाएंगे ही !

अब इसे सोचिए: कोई भारी भरकम जाँत लेकर आया होगा सासाराम से 200-250 किलोमीटर दूर। कैसे लाया होगा ये तो अब लाने वाला ही बता सकता है: गोबिन्द की गति गोबिन्द जानै। कहावत ऐसे तो नहीं ही बनी. कोई तो लेकर आया ही होगा क्योंकि उस जामने में भी लोग होते ही होंगे जिन्हें 'ना' कहना नहीं आता होगा। उफ़्फ़ ! उसकी दुर्गति मुझसे सोची नहीं जा रही। दो भारी पत्थर घसीटते, लुढ़काते, कंधे पर, सिर पर... बैलगाड़ी, ना जाने कैसे लेकर आया होगा। सड़कें तो होंगी नहीं। खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, नदी पार करते... रास्ते में लोग पूछ भी लेते होंगे और उसकी मूर्खता पर हँसते भी होंगे 'यहाँ नहीं मिल जाता जो सासाराम से लेकर आ रहे हो?' बेचारा कह भी नहीं पाया होगा कि किसी और के लिए है !  कुछ बच्चे भी चिढ़ाने के लिए पीछे पड़ गए होAn Old Man is Dressing a Millstone - 19th Century Watercolor on Paper शायद। भगवान जाने कहीं ढेला भी ना मार रहे हों पीछे से।

और मजे की बात तब हुई होगी जब मंगाने वाले ने कह दिया होगा अच्छा नहीं है। ऐसा तो यहाँ भी मिल जाता है। थोड़ा हल्का है, टुँगाई अच्छी नहीं है। वगैरह... और अंत में 'ले लो हींग उधारी, वैशाख के करारी'* के तर्ज पर अगर कह दिया होगा: पैसे तो अभी हैं नहीं वैशाख में ले लेना। तो और मस्त। Thumbs up

मैं ये क्यों सोच रहा हूँ ? अव्वल तो खुश हो रहा हूँ कि जाँतों का जमाना चला गया और दूसरे साथ में वैशाख का इंतज़ार भी तो कर रहा हूँ Smile

*किसी जमाने में नेपाल से हिंग विक्रेता भारत में हींग बेचने आते थे और उधार में हींग देकर चले जाते फिर वैशाख में पैसे वसूलने आते। जाँत की तरह अब वो भी शायद ही कहीं दिखते हों। मैंने भी शायद सुना ही है !
**मनीषजी के कमेन्ट के बाद सुधार: सासाराम जिला नहीं बल्कि रोहतास जिले का मुख्यालय है.

~Abhishek Ojha~

Jul 19, 2010

आई = आई+२

हमारे एक दोस्त हैं और जबसे मैं उन्हें जानता हूँ उनकी शादी 'दो साल बाद' होने वाली है. जब भी पूछो 'कब हो रही है?' जवाब होता है 'दो साल बाद'. वैसे एक बार उन्होने कहा फरवरी में होगी... पर जब फिर से उन्होने एक बार २ साल बाद वाली बात कह दी तो हमने ये मान लिया कि महिना भले तय हो गया हो इनकी शादी तो दो साल बाद ही होगी.  वो अभी भी २ साल बाद वाली बात पर अडिग हैं... इस बीच हमने इसे 'आई=आई+२' नाम दे दिया. मतलब वर्तमान को दो से बढ़ाते जाओ.

प्रोग्रामिंग से परिचय रखने वाले इस कथन का मतलब बखूबी जानते हैं. बहुत ज्यादा इस्तेमाल होने वाला कथन है. ऐसे कथन को प्रोग्रामिंग में रोकना होता है... किसी भी एक Loopशर्त पर. रोकना है तो शर्त तो रखनी ही पड़ती है. अगर बोल-चाल की भाषा में कहूँ तो कहा जायेगा कि आई को दो से तब तक बढ़ाते रहो जब तक कुछ 'ऐसा' नहीं हो जाता. अगर गलती से 'ऐसा' हो जाने वाली शर्त लगाना भूल गए तो प्रोग्राम अनंत समय तक चलता  रहेगा !  वैसे ही जैसे हमारे दोस्त की शादी दो साल बाद होनी है. किस दिन से दो साल बाद ये तो बताया नहीं उन्होने. ऐसा ही एक अनंत तक चलने वाला लूप पहले भी फंसा था. अब क्या करें थोड़ी बहुत जो प्रोग्रामिंग की उसमें लूप में अक्सर फंस ही गया, और याद भी वही रह गया :)

प्रोग्रामिंग के अभ्यास करते समय कई बार ऐसे अनंत तक चलने वाले फंदों में फँसना हुआ है. हर बार यही लगता: 'ओह फिर शर्त लगाना भूल गया !  या फिर गलत या उल्टी शर्त लगा दी.' देखने में बहुत स्वाभाविक गलती लगती है लेकिन प्रोग्रामिंग करने वाले ही बता पायेंगे कि कितनी आसानी से हर बार ये गलती हो ही जाती है.
व्हाइल (<शर्त >){
आई= आई+२;
}

प्रोग्राम लिखते समय यही बात कागज पर लिखी हुई रहती है लेकिन कोड़ में अक्सर उल्टी शर्त लग जाती है या फिर शर्त लगाना ही भूल गए और फंस गए इनफाइनाइट लूप में ! 
प्रोग्रामिंग वाले मामले में प्रोग्राम को रोक देने या फिर डब्बे* को ही फिर से चालू कर देने का विकल्प होता है. लेकिन यही विकल्प हमारे पास हमेशा कहाँ होता है ? बिना ठोस समय सीमा के कोई भी बात कह देना या योजना बना लेना बहुत आसान है. लेकिन उसे पूरा करने के लिए जो समर्पण चाहिए वो अक्सर आई = आई+२ वाले फंदे में उलझ कर रह जाता है. वक्त अपनी गति से चलता जाता है. और हम सोचे गए काम को और आगे ठेलते जाते हैं कभी २ से कभी ४ से. कितनी भी धुन पक्की हो एक बार अगर नहीं हो पाया तो बहाने तो हमेशा ही तैयार रहते हैं. आपके कितने काम हैं जो एक साल के भीतर पूरे होने वाले थे (हैं)?

अब ऐसा ही कुछ-कुछ अपने साथ भी हो रहा है. घुमा फिरा कर हमारी कंपनी ने इस बार तथाकथित हमेशा के लिए न्यूयॉर्क ऑफिस भेज दिया. (वैसे मिनटो में निकाल बाहर करने वाले या खुद ही लूट जाने वाले उद्योग से जुड़े लोग जब 'परमानेंट' शब्द इस्तेमाल करते हैं तो... इस उद्योग में काले सूट पहने और ब्लैकबेरी पर अंगुली नचाते लोग जब आधे घंटे में दस-बीस साल बाद की योजना बना  कर कमरे से बाहर निकलते हैं और सामने टीवी पर दिखता है... कंपनी दिवालिया हो गयी ! खैर... अभी बात आई=आई+२ की)... कुछ लोगों ने पूछा कब तक रहोगे? तो कइयों ने बड़े दावे से कहा  'लौट नहीं पाओगे ! ' कइयों ने पूछा कि ऐसा क्या है जो यहाँ रहकर नहीं कर पाओगे? वैसे तो हमें अटल बिहारी वाजपई की तरह सबकी बात ठीक ही लगी. पर अपने हर बात पर चर्चा हो जाती है... तिल का ताड़...टाइप्स. वैसे यहाँ से लौट कर गए कई लोगों के साथ एक... वेल... उन्हें लगता है कि उन्होने बड़ा भारी काम किया है... कुछ त्याग-व्याग टाइप का.... और उनके हिसाब से किसी और के लिए ये संभव नहीं है. खैर इस पर कोई टिपण्णी नहीं. हाँ कई लोग हैं जो साथ काम करते थे और वापस जाकर बहुत खुश हैं.

जो भी हो हमने इसी बहस के बीच दस हजार रुपये की शर्त लगा दी... दो साल में लौट जाने की. अब ये दो साल 'आई=आई+२' ना हो जाये इसलिये ये पोस्ट ठेल दी. तो अपना आई+२ होता है जुलाई २०१२. अगर नहीं लौटा तो इस तर्क पर दस हजार तो नहीं बचने वाले... तो दो साल बाद की जगह २०१२ पढ़ा जाय.

फिलहाल तो दिसंबर में आता हूँ [इस या अगले में ये तो वक्त जाने ;)]! वैसे फंदा-वंदा अपनी जगह... हमें तो थोड़ा फंडा मारना था तो पोस्ट लिख दी.

और भाइयों, बहनो, दोस्तों, दोस्तनियों, हमारी कोई चाहने वाली टाइप, चाचा-चाचियों वॉटएवर-ववॉटएवर और टिपण्णी के बदले टिपण्णी की अभिलाषा रखने वालों  (शॉर्ट में कहने का मतलब ये कि यह पढ़ कर टाइम खराब हमारे कोई शुभचिंतक ही करेंगे वरना किसे फुर्सत है!) एक बार और क्लियर कर दूँ ये ब्रेन-ड्रेन उरेन-ड्रेन नहीं है, अपने पास इतना ब्रेन नहीं है कि ड्रेन की समस्या हो. उस हिसाब से तो जितना दूर ही रहे तो बढ़िया है :) खैर हमें जानने वाले हमारी असलियत जानते हैं उन्हें इस डिसक्लेमर की जरूरत नहीं है.  

~Abhishek Ojha~

(...अगर लूप-वूप में फँसे तो पीड़ीजी हैं न प्रोग्रामिंग समझाने के लिए. सुना है 'जी' लगाने पे बहुत खुश रहते हैं आजकल. 'कहते हैं पीडीजी बोलो जी'... )

*डब्बा माने कंप्यूटर

Sep 30, 2009

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ महात्मा गाँधी

०२ अक्टूबर २०३०: सरकार ने आज एक विज्ञप्ति जारी की जिसके अनुसार 'इंडिया दैट इज भारत' की जगह 'डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ महात्मा गाँधी' कर दिया गया. इसके साथ ही सरकार का दो साल पहले का 'भारत' को देश का राष्ट्रीय नाम घोषित करने वाला फैसला रद्द हो जाएगा. कई लोगों ने इसका विरोध किया है... विपक्ष का कहना है कि सारे दस्तावेजों पर परिवर्तन करना बहुत महंगा होगा जबकि प्रधानमंत्री ने कहा है कि सारे दस्तावेजों को इलेक्ट्रोनिक कर दिए जाने के बाद इस खर्च का कुछ ख़ास असर नहीं पड़ेगा. उधर गृहमंत्री ने कहा है कि इसी gandhi तरह के बेबुनियाद सवाल उठाये गए थे जब हमने 'भारत' को देश का राष्ट्रीय नाम घोषित किया था. भारत गणराज्य, भारतवर्ष, हिन्दुस्तान जैसे कई नामों में से हमने सबसे सटीक नाम को जब राष्ट्रीय नाम घोषित किया था तब भी कई लोगों ने यह आरोप लगाया था कि हमारे पास कुछ भी राष्ट्रीय घोषित करने को नहीं बचा इसलिए हम देश के नाम के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. लेकिन हमने तब भी जनता की भावनाओं का सम्मान किया था और आज भी कर रहे हैं. सोचिये तो शोर्टफॉर्म में ‘ड़ीआर महात्मा गाँधी’ कितना अच्छा लगेगा. लोग डॉक्टर महात्मा गाँधी भी कह लिया करेंगे.

उधर एक मंत्री के ब्लॉग पोस्ट से नया विवाद खडा हो गया है. अपने ही मंत्री से ऐसी पोस्ट देखकर सरकारी खेमे के कई लोग सकते में है. मंत्रीजी ने अपनी पोस्ट में कहा है कि ये तो होना ही था. इतिहास इस बात का गवाह रहा है... जो कुछ भी राष्ट्रीय घोषित हो जाता है वो धीरे-धीरे विलुप्त हो जाता है. चाहे वो राष्ट्रीय पक्षी हो, पशु हो, खेल हो, भाषा या नदी. गंगा के राष्ट्रीय नदी घोषित होने के बाद ही मुझे तो ये समझ में आ गया था. कैबिनेट मीटिंग में तो पानी को राष्ट्रीय सम्पदा घोषित करने पर भी विचार चल रहा है. वैसे सच में बात ये है कि सरकार के पास अब राष्ट्रीय घोषित करने के लिए कुछ बचा नहीं है. पहले किसी सरकार द्वारा चालु की गयी परियोजना का नाम नयी सरकार अपने नेताओं के नाम पर रख लेती थी. लेकिन जब से योजना शुरू होने के पहले ही नेताओं के नाम पर फैसला होने लगा तब से नयी सरकारों के पास अपने नेताओं के नाम पर घोषित करने के लिए भी कुछ नहीं बचा. पिछले दिनों एक नेता ने २० वर्षीय पुराने पुल का नाम अपने नाम पर रख लिया था तबसे एक नयी होड़ चालु हो गयी.

कई नेताओं ने इस ब्लॉग पोस्ट पर मंत्री का इस्तीफा माँगा है.

उधर बहनजी ने लगभग दो दशक पहले बनाए गए स्मारकों को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करवाने की मांग की है. उनका कहना है की राष्ट्रीय स्मारकों में आ रही कमी को देखते हुए यह कदम जरूरी हो गया है.

हिंदी दिवस पर हिंदी ब्लोगरों के एक संगठन ने हिंदी को ब्लॉग्गिंग की राष्ट्रीय भाषा बनाने की मांग की है और कांग्रेस पार्टी ने एक्सवायजेड गाँधी को प्रधान मंत्री का नया उम्मीदवार बनाते हुए प्रधान मंत्री का राष्ट्रीय उपनाम ‘गांधी’ करने की मांग की है…

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और मेरा अलार्म बज गया… मैं ०२ अक्टूबर २०३० से ०१ अक्टूबर २००९ पर वापस आ गया... सोचा जल्दी से ये पोस्ट ठेल दूं नहीं तो भूल जाऊँगा. वैसे सुना है सुबह के सपने सच होते हैं :)

~Abhishek Ojha~

May 13, 2009

घूस दे दूँ क्या?

‘आपका क्या ख्याल है घूस दे दूँ क्या?’

अगर आपसे कोई अधेड़ अजनबी ऐसा सवाल पूछे तो आप क्या कहेंगे?

छुट्टी के बाद घर से वापस आ रहा था. रात का समय… बलिया (यूपी) से बक्सर (बिहार) (तकरीबन ३० किलोमीटर) जाने के लिए टैक्सी पकड़नी थी. जल्दी-जल्दी रिक्शे से उतरा ताकि आखिरी टैक्सी छूट ना जाए. गर्मी का दिन... उतरते ही पानी निकाला ही था की आवाज सुनाई दी:

'बोतल का ही पानी पीते हो, नहीं? इंसान भी कितना शौकीन हो गया है !'

सच कहूं तो बहुत गुस्सा आया… अरे मैं बोतल का पानी पियूँ या गड्ढे का तुम्हे क्या पड़ी है? लेकिन फिर उनकी उम्र देखकर मुस्कुरा दिया. 'नहीं… वो छुट्टे नहीं थे तो एक बोतल पानी ले लिया'.

फिर बातचीत चालु हुई. पहले तो पानी का बोतलीकरण और फिर बेचने वालो को गाली... फिर बाद में बाकी बातें... अंकलजी रिटायर्ड फौजी थे और एक साक्षात्कार के लिए पटना जा रहे थे. कोई सीआईएसऍफ़/सीआरपीऍफ़ या फिर किसी बैंक में सेक्युरिटी के लिए कोई पोस्ट थी. इन सबका उन्होंने जिक्र किया था तो ठीक-ठीक याद नहीं किस वाली नौकरी के लिए जा रहे थे. रिटायर्ड फौजी… लेकिन बेटे पढने वाले हैं तो पेंशन पर गुजारा नहीं हो रहा तो काम करना जरूरी है ! आधे भारत की यही कहानी है. ये आधे खुशहाल में आते हैं बाकी आधों के लिए तो कपडे मकान का संघर्ष है. रोटी शायद अब सबको मिल जाती है. और जो बाकी बचे वो थोड़े आराम की जिंदगी जीते हैं. अब ये मत पूछियेगा कि आधे-आधे हो ही गए तो ये बाकी वाले कहाँ से आ गए? ये जो बाकी हैं इन्हें मैं भारत नहीं इंडिया मानता हूँ.

बच्चों की पढाई और नौकरी की बात करते रहे फिर मेरे बारे में भी कुछ पूछा. ‘पुणे में काम मिल सकता है क्या? ५-६ हजार में किसी के यहाँ खाना बनाने का भी...?’ फिर अचानक ही बोल पड़े:

‘तुम्हारा क्या ख्याल है दे दूं घूस? बिना घूस के तो नौकरी मिलेगी नहीं. ’

'मैं क्या बताऊँ… आप अनुभवी हैं. पर ऐसा नहीं है… बिना घूस के भी काम होता है, अगर आप योग्य हैं तो आपको क्यों नहीं मिलेगी नौकरी? आपको इतने सालों का अनुभव है. ऐसे छोटे काम के लिए क्यों परेशान हो रहे हैं, हो जाएगा आपका.’

‘अरे योग्य तो सभी हैं. चार में से एक का होना है. और उनमें से ऐसा कोई नहीं जो योग्य नहीं इस पोस्ट के लिए. सभी ओवर क्वालिफाइड ही हैं. बस एक ही बात बची है पूरी प्रक्रिया में जो १ लाख देगा उसको रख लेंगे. मेरे पास तो साक्षात्कार का लेटर आने के पहले ही दलाल आ गया था. और वो तो चैलेन्ज करके गया है कि बिना पैसे के होना संभव ही नहीं है ! मैं नहीं दूंगा तो कोई और देगा…’

'पर मान लीजिये पैसा भी ले ले और नौकरी भी नहीं लगी तो?' इसके अलावा और कोई तर्क बचा नहीं था मेरे पास. ईमानदारी से भूखो मरने की सलाह उनकी समस्या और 'सभी ओवर क्वालिफाइड ही हैं' वाली बात सुनकर मैं नहीं दे पाया.

'नहीं ऐसा बहुत कम होता है. उनका एक दिन का काम तो है नहीं... प्रोफेशनल लोग हैं. काम होने के बाद आधा पैसा लेते हैं.'

अब क्या बोलता मैं?... मैंने बस इतना ही कहा 'अगर आप योग्य हैं तो नौकरी आपको मिलनी ही चाहिए. और इन सबके चक्कर में ना पड़े तो ही बेहतर है'

अंकलजी ने बस इतना ही कहा... 'तुमने दुनिया देखी कहाँ है? मैं पटना जा रहा हूँ... और वो भी ऐसे पोस्ट के लिए जिस पर कई सालों से बिना घूस के कोई नहीं रखा गया... तुम्हे क्या पता कैसे दुनिया चल रही है... फौज और पारा मिलिट्री में नॉन-ऑफिसर की बहाली कैसे होती है ! मैंने दुनिया देखी है... २० वर्ष के फौज की नौकरी के आधार पर कह रहा हूँ ! '

पता नहीं उनकी नौकरी का क्या हुआ !

पिछ्ली पोस्ट में अन्न मसूर था. जिसे काली दाल भी कहते हैं.

~Abhishek Ojha~

Dec 14, 2008

माँ का दूध

एक ज़माना था जब सोते-जागते कंपनी खोलने का भूत सर पर सवार रहता, और हर बात में बिजनेस आईडिया के अलावा कुछ दिखता ही नहीं था. हमारे एक मित्र इसमें बड़ा सक्रिय रहते... उनके आईडिया बड़े कमाल के होते, उसमें सफलता मिलती या नहीं ये तो बिजनेस स्टार्ट करने पर पता चलता पर आईडिया मजेदार जरूर होते ! आजकल ये मित्र रोयल डच शेल में तेली हैं। और नीदरलैंड से सिंगापुर तक तेल के कारोबार में हाथ बटाते हैं. अब कहने को तो इस तेल की कंपनी में शोध वैज्ञानिक है लेकिन अब हमारी भाषा में तेल बनाने/बेचने वाले को तेली ही तो कहते हैं... अब मैं तो इन्हें यही कहता हूँ !

एक समस्या ये होती कि इनके नए विचार अक्सर ऐसे होते जिन पर सदियों पहले से कंपनियाँ चल रही होती. अब क्या करें बेचारे दिमाग के किसी कोने से ढूंढ़ के लाते और दो मिनट में हम उस पर खड़ी बड़ी-बड़ी कंपनियां गिना देते... दो मिनट में रात के डिनर से सुबह के बाथरूम तक के सोचे गए उनके सारे 'इनोवेटिव' बिजनेस आईडियाओं पे पानी फिर जाता. खैर एक दिन उछलते-कूदते आए बिल्कुल आर्कीमिडिज के 'यूरेका' वाले क्षण की तरह...

--
'अबे यार मस्त आईडिया आया है... दूध की कंपनी खोलते हैं ...'

'क्या यार इसी पे इतना उछल रहे थे... जा अमूल की साईट खोल के देख।'

'अबे नहीं भाई पुरा आईडिया सुन तो लो'
'देखो हम बच्चों के लिए दूध बनायेंगे... पाउडर और लिक्विड दोनों'

'ओके... तो?'

'प्रोडक्ट का नाम रखेंगे... "माँ का दूध"'

'व्हाट?'

'अबे देख डॉक्टर सलाह देते हैं... 'बच्चे को माँ का दूध पिलाइए', वो तो छोड़ जितने डब्बे वाले दूध आते हैं उन पर लिखा होता है 'माँ का दूध शिशु के लिए सर्वोत्तम है' तो हमारे ब्रांड को एडवटाइज करने की भी जरुरत नहीं है' सारे कंपटीटर ख़ुद ही हमारे प्रोडक्ट का इनडायरेक्टली प्रचार करेंगे !'

'हा हा ! जियो मेरे लाल क्या आईडिया है ! चलो इसी मेगाबक्स* में प्रेजेंट कर देते हैं। सारे वेंचर कैपिटलिस्ट लाइन लगा देंगे पैसे देने के लिए...'

'वही तो ... '

'भाग साले... कुछ तो ढंग का सोच लिया करो कभी, वैसे मदर डेयरी है तो तेरा कंपटीटर'

'अबे यार, क्या तुलना कर रहे हो, कभी सुना है 'मदर का दूध पिया हो तो...''

'देख एडवटाइज वाला आईडिया तो दुरुस्त है ही... उसके अलावा ६०-७०-८० के दशक की किसी भी हिन्दी फ़िल्म का क्लिप दिखा दो... "माँ का दूध पिया है तो..." और फिर दिखाएँगे 'आ गया माँ का दूध !' डब्बा से निकाल के दूध पिया और फिर साले विलियंस का सफाया ! बिजनेस का तो बाद में सोचना पहले ये बता क्रिएटिव एडवटाइजमेंट का अवार्ड मिलेगा की नहीं?'

'अबे क्यों गन्दगी फ़ेंक रहा है भाग यहाँ से' (ये एक टिपिकल लाइन होती थी होस्टल में)

'अरे यार मैं मजाक नहीं कर रहा सीरियसली सोच, अबे यार तू रिपोर्ट बना दे फिर प्रेजेंट करते हैं... कम से कम मजा बहुत आएगा। बड़े-बड़े लोग आते हैं सुनने'

'तुम्हें लगता है की एक राउंड भी आगे जा पाओगे?'

'साले मैं इस आईडिया पे फाइनल जीत सकता हूँ ! लेकिन अकेले नहीं कर सकता, भाई मेरे करते हैं न इसपे काम...'
--

खैर काफ़ी चर्चा के बाद ये आईडिया ड्राप हो गया पर था. पर था तो सच में 'इनोवेटिव'...
अब इस पर तो काम नहीं हो पाया (ओह ! ऐसे कितने ही इनोवेटिव आईडिया बरबाद हो गए) मैंने सोचा चलो हम नहीं कोई और सही... आईडिया है, और हम भारतीय ! मुफ्त का आईडिया/सलाह दूसरों को बांटना हमारा पहला-दूसरा नहीं तो तीसरा-चौथा धर्म तो होता ही है.
अब किसी ने इस आईडिया पर कंपनी खोल दी और हमें नाम का भी क्रेडिट दे दिया तो घाटा क्या है !

चलो क्रेडिट ना भी दे तो कोई बात नहीं :-)

*मेगाबक्स आईआईटी कानपुर का वार्षिक बिजनेस और एंतार्प्रेनार्शिप समारोह है.

~Abhishek Ojha~

Nov 28, 2008

भारत का ९/११ ?

भारत का ९/११?

करीब २ महीने पहले किसी ने मुझसे न्यूयॉर्क में कहा था: '९/११ को अमेरिका में सात साल हो गए. उसके बाद कोई अगर अमेरिका में आतंकवादी कार्यवाही की 'सोचता' भी है तो उसे सीआईए वाले पकड़ के ले जाते हैं !'

भगवान करे यह घटना इस सड़ी राजनीति और नेताओं के लिए यह '९/११' साबित हो.

क्या इससे घटिया गृहमंत्री सम्भव है? गृहमंत्री 'लौहपुरुष' होना चाहिए... जो है उसके लिए अभी कुछ नहीं सूझ रहा !

ज्ञानजी की टिपण्णी के बाद:

One more thing I don't understand 'what the f**k will ISI chief will do here? defend his country?'

~Abhishek Ojha~

Nov 27, 2008

मुंबई

धमाके...
भय...
क्षुब्धता....
आतंक...
गुस्सा...
निष्फलता...
अव्यवस्था...
समाप्य बेकार संसाधन...
जूझते जांबाज...

१५ घंटे बाद भी जारी है.

इस बार कायरता कम, हमला ज्यादा?
क्यों? कैसे? कौन?
आख़िर कब तक?
इस मुद्दे पर राजनीति... क्यों नहीं? पर आज नहीं, कुछ दिनों के बाद !

सलाम उनको जिनके सरकारी 'बुलेट-प्रूफ़' जैकेट को चीर कर गोली लगती है.
श्रद्धांजली उन्हें जिनकी जगह 'हम' कभी भी हो सकते हैं.


शोक ! शोक !! शोक !!!



~Abhishek Ojha~

Oct 22, 2008

रोटी, दवा, दारु और चाँद !

दृश्य १:

एक ग्रामीण सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में एक बच्चा... हड्डी का ढांचा, शायद मांस उनके लिए नहीं होता. पता नहीं सो रहा है या बेहोश है. सरकारी ग्लूकोज की बोतल लगी हुई है... बाप बगल में बैठा है, देखने से तो नहीं लगता कि दो दिन से कुछ खाया होगा.

'आप इसे शाम को घर ले जाइए... ठीक हो जायेगा. मैं दवाई लिख देता हूँ. '
फिर कुछ सोच कर बोला 'आप फिलहाल इसे सुबह-शाम २-२ रोटी खिलाइए और फिर धीरे-धीरे बढ़ाना है २ से ३... ४ तक. '
'रोटी? डॉक्टर साहब कोई सस्ती दवा नहीं मिल सकती?'
भले अजीब लगे लेकिन शायद डॉक्टर को ये सुनने की आदत हो*, बोला 'दारु पीते हो?'
'हाँ साहब कभी-कभी !'
'उसी पैसे से रोटी नहीं खिला सकते?'
'रोज नहीं पीता साहब... जिस दिन पीता हूँ उस दिन तो रोटी के लिए भी बच जाता है...'
'तो उस दिन पीने के बजाय बचा के नहीं रख सकते?'
वो चुप हो गया और उसी के साथ वहां बैठे लोगों का दया-भाव जाता रहा...

दृश्य २:

उसी गाँव का एक छत, रात के १० बजे. शायद इतनी हसीन चाँदनी रात पहले नहीं देखी... शरद ऋतू, चाँद और तारे. क्या ऐसी भी रात होती है? लगा जैसे चाँद को तो भूल ही गया था ! सालों बात सप्तर्षि और फिर ध्रुव देखा... एक बारगी लगा... काश ये बिजली नहीं होती और रोज ऐसी ही रात होती... चाँद ना बढ़ता न घटता बस ऐसा ही रहता, वक़्त थम जाए जैसी बात. (शायद बहुत दिनों के बाद ऐसी रात देखकर कल्पना शक्ति जाती रही कि इससे अच्छी भी रात होती होगी और असल में तो ऐसा रोज ही होता है !)

_ _

दारु सुनते ही फेर लिया जो मुंह,
कभी सोचा क्यों पीता हूँ ?
मेरे लिए रोटी का टुकडा चाँद जैसा होता है !
पर तुम्हारे चाँद की तरह नहीं,
ये असली चाँद है !
बिजली से नहीं चलता...
और घटता-बढ़ता भी है !
_ _

*उस समाज में लोग कुछ भी करते हैं, अगले दिन अखबार में पढ़ा... लोगों ने उस डॉक्टर की पिटाई कर दी. आरोप: 'उसने एक साँप काटे हुए आदमी का इलाज ढंग से नहीं किया जिससे उसकी मृत्यु हो गई'. लोगों की हालात का वैसे ही नहीं पता जैसे उस गरीब के पीने का कारण। हाँ वो डॉक्टर अगर कर सकता तो जरूर इलाज करता। बहुत फर्क है इंडिया और भारत में... दोनों के सोच में भी. वैसे सोच को पैदा करने में हालात का बहुत बड़ा हाथ होता है.

~Abhishek Ojha~

Oct 5, 2008

और दो शून्य... गंगा मैया के नाम पर !

यूपी बिहार के लोग बड़े धार्मिक होते हैं... आप कुम्भ में देख लीजिये सबसे ज्यादा लोग कहाँ से आते हैं? मुझे आंकड़े तो नहीं पता पर जानता हूँ यूपी-बिहार ही टॉप करेगा. किसी भी 'आम आदमी' से बात कर लीजिये ये गारंटी है कि पाँच मिनट के अन्दर भगवान का नाम आना ही है ! फोकट की चीज़ है... कर लो प्रयोग जैसे मर्जी. लूट सको तो लूट लो... राम नाम की लूट. इसका भरपूर पालन होता है भाई.

कुछ भी हुआ, ठोंक दो भगवान की मर्जी पर. कुछ बड़े ही प्रचलित किस्से और वाक्य भी लोग इस्तेमाल करते हैं... जैसे 'लक्ष्मी उल्लूओं के पास ही रहती हैं...', 'आत्मा अमर है इत्यादि'.

आदमी जितना 'आम' होता जाता है ये उतना ही बढ़ता जाता है... ठेठ गाँव में जाइए, खेती-बारी की तो चर्चा चालु ही होती है... भगवान भरोसे ! और ऐसे हर गंवई चौपाल में चर्चा भले ही कुछ भी हो निष्कर्ष तो ऐसे ही होते हैं...

'फलनवां के दिन बड़े अच्छे हैं... अरे भगवान जिसको देता है...'
'भगवान ने भी क्या दिन दिखाए बेचारे को...'
'करने दो भाई अपनी मर्जी का, एक दिन तो सबको जाना है उनके दरबार में...'
'अब भगवान के आगे किसकी चलती है...'

वैसे ये अच्छा भी है... कई लोगों के पास ये ना हो तो बेचारे मर ही जाय, भगवान की इच्छा मान कर कुछ भी झेल जाते हैं लोग... जी हाँ कुछ भी. फिर दो शून्य की क्या कीमत? वो भी जब गंगा मैया के नाम पर हो तो.

भगवान के साथ किस्मत भी बड़े जोर पर चलती है... भगवान और किस्मत कहीं भी एक दुसरे की जगह ले लेते हैं...

'अरे क्या किस्मत है भाई... बड़ी उपरवार कमाई है, भगवान ने तो दिन ही फेर दिए... '

ये ऊपर वाली कमाई तो भगवान के हिस्से में जानी ही है, नीचे वाली भले अपने नाम कर लें... उसे भी अपने नाम करने में थोडी दिक्कत ही होती है... अरे भाई सब उन्हीं का तो है. और वैसे भी ऊपर और नीचे में कोई चीन की दीवार तो है नहीं... नीचे वाली तो होती ही रहती है पता नहीं कब (भगवान और किस्मत का खेल) कमाई ऊपर वाली हो जाय !

अब किस्मत हो, भगवान हो ! जो कुछ भी हो ! ईमानदार आदमी की तो हर जगह इज्जत होती है...

'अरे बड़ा अच्छा अधिकारी आया है... फ़टाफ़ट काम करता है, मजाल है की काम रुक जाय. सबको टाइट कर के रखता है... अब थोड़ा-बहुत तो हर जगह देना ही पड़ता है, अब भाई भगवान ने उसको ऐसी पदवी दिला दी है तो लेना तो पड़ेगा ही ना... पर काम तो करता है.' (लेना तो पड़ेगा ही ! उफ़ क्या हसीन मज़बूरी है)

'हाँ भाई... उ ससुरा पहिले वाला ना ख़ुद पैसा ले ना किसी को लेने दे तो काम कहाँ से होगा?'

'और उ ससुर तो हदे किए थे... पैस्वो ले लेता था और कामो नहीं... यही अच्छा है भाई बड़ा ईमानदार है.'

(हम इ सब सुन रहे थे और इधर चौपाल में बैठे एक बिलागर बंधू बोल पड़े: अब गंगा मैया वाली बतवा पे आओगे... यहीं पे दिन भर नहीं बैठना है, कई जगह टिपियाना है और कुछ जम गया तो ठेल भी आयेंगे एक पोस्ट! इ बिजली का कउनो भरोसा नहीं है... मौसम भी गडबडा रहा है भगवान को भी अभी...)

'अरे हाँ ससुर हम भूल ही गए... उ गुप्ता जी हैं न अपने... अरे वही जेइ बाबू, अरे भगवान ने का किस्मत दी है भइया इस बार तो गंगा मैया ने दिन ही फेर दिए उनके'
'भइया इंजिनियर तो सरकारी ही कामात है... अब इ तो बेचारा बड़ा ईमानदार है! इ तो दुइयेठो शुन्ना (दो शून्य) जोड़ा था लेकिन ऊपर तक जाते-जाते...सुने हैं की कागज जोड़ना पड़ गया !'
'अरे लेकिन शुन्ना बढ़ा है तो इसकी भी तो कमाई बढ़ी होगी?'
'हाँ हिस्सा तो मिलेगा ही... गंगा मैया के नाम पे बेईमानी कौन करेगा भाई !'
'नया पन्ना जोड़ना पडा?... तभी बंगला बनाने को जगह देख रहे थे...'

चलो भइया जैसे गंगा मैया ने उनके दिन फेरे वैसे सबके फेर दें !

अब इतने में सब निकल गए और हमें ये गंगा मैया के नाम पर पन्ना जोड़ने की बात ही नहीं समझ आई ! हमने एक चाचा को पकड़ लिया... अरे वही जिनसे एक बार और मिला था. चाचा ने समझाया देखो बबुआ, तुम लोग इ सब का जानोगे... बाढ़ आई तो तुम्हारे टीवी वाले आके खूब नौटंकी रिकार्ड किए और तुम बिलागर लोग भी खूब बिलाग रंगे. लेकिन इसी बीच हमारे गाँव के पास वाले बाँध पर कटाव चालु हो गया... और जेइ बाबू जांच करने गए तो बोले की पत्थर और बालू भर के बोरी डलवाना पड़ेगा. उन्होंने १०० ट्रक का हिसाब बैठाया था, ईमानदार ठहरे बस २ शून्य जोड़ दिए कागज पे कर दिए... १००००. उनके और ठीकेदार के बीच का मामला बना... अब जब कागज ऊपर गया तो चीफ इंजिनियर साहब ने कहा 'अरे भाई तुम ईमानदार ही रहोगे... अरे बहती गंगा है भाई, गंगा मैया के नाम पर २ शुन्य और जोड़ दो... क्या फर्क पड़ना है, अब गंगा मैया तो कितना भी बहा ले जायेंगी कौन रिकॉर्ड रखेगा हम लोग आपस में देख लेंगे' अब कागज पास होने को ऊपर बढ़ता गया और गंगा मैया के नाम पर २ और शून्य जुड़ते गए... सुना है इतने जुड़े की कागज जोड़ना पड़ा.

और जहाँ भी जाए हिस्सा तो जेइ बाबू को मिलना ही था... आख़िर सबसे नीचे के आदमी हैं, और आईडिया भी तो उन्ही का था.
'पर चाचा आया कितना ट्रक?'
'बबुआ, एक दिन तुम्हारे अखबार, टीवी वालों के सामने एक ट्रक आया तो था पर सुना की शाम को जेइ बाबू के नए वाले घर के लिए चला गया.'
'और कटाव?'
'कटाव इ का रोकेंगे बेटा, उ तो सब भगवान की इच्छा है... गंगा मैया जिसको देना देके फिर सीधी हो गई...'
'पर ये सब अखबार में नहीं आया?'
'अरे कमाल करते हो, कटाव हो रहा था... जलमग्न कहाँ हुआ कुछ... कोई मरा भी नहीं... बस २-४ घर बह गए, तो उनको कौन पूछता है... टीवी में ये सब दिखाने से अच्छा पिर्लय नहीं दिखाएँगे? अरे ये सब तो गंगा मैया की माया है !'

जय हो गंगा मैया की !



आजकल ब्लॉग भ्रमण नहीं हो पा रहा है... आप सब के पोस्ट रीडर में उसी गति से बढ़ रहे हैं जिस गति से 'लिहमैन ब्रदर्स' के स्टॉक गिरे थे. इस ग्राफ को देख कर आप ये रेट निकालिए... तब तक मैं चचा की थोडी और बातें सुनता हूँ ! 'लिहमैन ब्रदर्स' का हश्र जो हुआ वो मैं नहीं होने दूंगा, और पोस्ट पढ़े जायेंगे... वैसे रिचर्ड फूल्ड को भी कहाँ लगा था की ये हश्र होगा :-)



~Abhishek Ojha~

Sep 24, 2008

कोंकण यात्रा (भाग... III)

कोंकण और पुणे के आस-पास बिताये गए कुछ सप्ताहांत की झलकियों की तीसरी कड़ी में... हरिहरेश्वर और श्रीवर्धन.

इससे पहले अलीबाग और दिवेआगर हो चुका है... दिवेआगर से श्रीवर्धन और फिर हरिहरेश्वर कुछ ३०-३५ किलोमीटर की यात्रा है. इस यात्रा की सबसे खुबसूरत बात ये है की ये लगभग पूरे समय समुद्र (अरब सागर) के किनारे-किनारे चलता है.  बस दाहिनी तरफ़ देखते रहो और खुबसूरत समुद्री नज़ारा दीखता रहता है.PICT0516 ये नजारे यात्रा को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. बीच में मछुवारों के गाँव से गुजरते समय बस थोडी देर के लिए नज़ारा छुटता है और इसी थोडी देर में ही मछली की तीखी गंध भी नाकों में प्रवेश करती है. तटीय क्षेत्र होने के कारण मुख्य यहाँ के जीवन-यापन पर मछ्ली और नारियल का बहुत बड़ा योगदान दिखना स्वाभाविक ही है.

अगर आप धर्म में रूचि रखते है तो कुछ प्रसिद्द मन्दिर भी हैं इस क्षेत्र में.

श्रीवर्धन का समुद्रतट है तो सुंदर ! पर इस क्षेत्र के अन्य समुद्र तटों को देखने के बाद कुछ ख़ास प्रतीत नहीं होता. पर हरिहरेश्वर पहुचने के बाद चट्टान वाला तट... आपको मोहित कर लेगा. अगर आप प्राकृतिक संरचना और नजारों के शौकीन हैं तो फिर निराशा का सवाल ही नहीं उठता. हरिहरेश्वर का प्रसिद्द 'काल भैरव' शंकर भगवान् का मन्दिर है. मन्दिर के समीप प्रदक्षिणा का मार्ग बना हुआ है. PICT0571 धार्मिक भावना हो न हो अगर एक बार आप वहां तक गए हैं और इस मार्ग पर नहीं गए तो बहुत कुछ छुट जायेगा... एक तरफ़ अरब सागर और दूसरी तरफ़ लहरों से कटे-छंटे चट्टान...  प्रकृति के खुबसूरत नमूने हैं. दो खड़े चट्टानों के बीच बनी सीढी से उतरना और फिर तट तक पहुचना... अगर ज्वार का समय हो तो आप चट्टानों से टकराती हुई लहरों को भी देख सकते हैं. पर पत्थरों की संरचना भी अपने आप में बहुत खुबसूरत है. ऐसी मान्यता है की अगस्त मुनि का आश्रम यहाँ हुआ करता था.

इस मन्दिर के समीप ही महाराष्ट्र पर्यटन विभाग का रिसॉर्ट और एक अन्य खुबसूरत समुद्री तट है. यहाँ से चट्टानयुक्त और बालू दोनों के ही तट समीप ही हैं. एक-आध छोटे वाटर स्पोर्ट्स की भी व्यवस्था हैं.

PICT0524

जब कुछ नहीं ... तो यात्रा वृतांत. अगली बार जब कुछ ठेलने को नहीं मिला तो कोंकण यात्रा में आगे चलेंगे... ! बड़ी मजेदार जगहें हैं.

(ये ठीक ऊपर वाली और पहली तस्वीर दिवेआगर और श्रीवर्धन के बीच के मार्ग पर ली गई थी और ऊपर से दूसरी तस्वीर हरिहरेश्वर के समुद्र के किनारे के चट्टानों की है. नीचे के ये सारे चित्र हरिहरेश्वर के हैं. )

PICT0539 PICT0553
PICT0556 PICT0558
PICT0559 PICT0574

फिलहाल मैं कल से १५ दिनों की छुट्टी पर घर जा रहा हूँ तो तब तक के लिए इधर से भी छुट्टी !


एक पखवाडे के लिए बिलागरी बंद... बस ईमेल और फ़ोन चालु.

Jul 20, 2008

कोंकण यात्रा... (भाग II)

कोंकण यात्रा भाग एक के बाद रुक ही गई थी. उधर अनुरागजी को शिकायत है कि गणित की एक पोस्ट आने में एक सप्ताह से भी ज्यादा समय लग जाता है और इधर ये लगने लगा की जुलाई ओझा-उवाच पर कोई पोस्ट किए बिना ही बीत जायेगी... इधर समय ही कुछ ऐसा चल रहा है, खैर समय का रोना फिर कभी... आज यात्रा को आगे बढ़ाते हैं और चलते हैं अलीबाग.

अलीबाग का नाम आपने जरूर सुना होगा... हिन्दी फिल्मों में अक्सर इसका जिक्र आता है. महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित अलीबाग के आस-पास कई खुबसूरत समुद्री तट हैं. पर सबसे प्रसिद्द है... 'अलीबाग बीच'. पुणे से लोनावाला-खोपोली-पेण होते हुए तक़रीबन १४० किलोमीटर कि यात्रा करने के बाद अलीबाग आता है. मानसून का समय हो तो ये रास्ता भी अपने आप में बड़ा खुबसूरत होता है. (वैसे पुणे-मुंबई के आस-पास मानसून के समय घुमने का मजा ही कुछ और है... मुंबई पुणे के बीच के एक्सप्रेस मार्ग पर भी काफ़ी अच्छे दृश्य देखने को मिलते हैं) अगर मुंबई से आना हो तो यहाँ तक सीधे जल मार्ग से भी पहुँचा जा सकता है.

खुली हवा, ढेर सारे पक्षी और साफ़ दूर तक फैले हुए समुद्री तट के अलावा अलीबाग बीच पर स्थित 'कोलाबा किला' भी दर्शनीय है. (यह मुंबई के कोलाबा से भिन्न है) मुरुड-जलजीरा भी पास में ही स्थित है. समुद्र तट कि खूबसूरती तो आप तस्वीरों में देख ही सकते हैं. कोलाबा किला अलीबाग तट से करीब २ किलोमीटर दूर समुद्र में स्थित है. लो टाइड (भाटा) हो तो पैदल या घोड़ा गाड़ी से आसानी से जाया जा सकता है नहीं तो नाव से जाना पड़ सकता है. कई बार ज्वार कि स्थिति में वहां जाना खतरनाक हो सकता है. वहां पर हुई दुर्घटनाओं तथा सावधान रहने कि चेतावनी आप जरूर ध्यान से पढ़ लें (मैंने नहीं पढ़ा था पर आप ऐसी गलती मत कीजियेगा :-)

अरब सागर है तो सूर्यास्त तो खुबसूरत होना ही है!






समुद्र के किनारे पक्षियों का बसेरा !





पक्षियों के साथ उड़ जाने की असफल कोशिश !





कोलाबा किला







प्रोफेशनल मछुवारे तो नहीं ... पर उनसे कम भी नहीं :-) (इनवेस्टमेंट बैंकिंग के बाद का कैरियर विकल्प)





किले का निर्माण छत्रपति शिवाजी ने १७ वीं सदी के उत्तरार्ध में किया था. इस किले के निर्माण को शिवाजी की दूरदर्शिता और उनके जल सेना के उपयोग के प्रमाण के रुप में भी देखा जाता है. कहते हैं कि शिवाजी ने उसी समय नौ सेना की उपयोगिता समझ ली थी और ऐसे किलों के साथ-साथ उत्तम नौ-सैनिक बेडे की व्यवस्था भी की थी. खँडहर का रूप ले चुके किले के अन्दर मीठे पानी का कुँआ है और गणेश भगवान का एक शांत मन्दिर... आज बस इतना ही अगली कड़ियों में... हरिहरेश्वर, श्रीवर्धन, मुरुड-जलजीरा, और करडे-बीच घुमने चलते हैं।

~Abhishek Ojha~