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Nov 2, 2012

वो लोग ही कुछ और होते हैं - III


कुछ लोगों से मिलकर अच्छा लगता है। वो अपनी एक अलग छाप छोड़ जाते हैं। ऐसे ही कुछ लोगों से हम ना भी मिले तो उनके बारे में सुनकर ही अच्छा लगता है। अलग तरह के लोग ... भले ही दुनिया उन्हें पागल कहे। पर  उन लोगों की एक क्लास होती है। और जहां क्लास हो...

पिछले दिनों जेईई 2012 के परीक्षाफल का विश्लेषण पढ़ा तो एक प्रोफेसर का कमेन्ट था कि पाँच लाख  अभ्यर्थियों में से जिसके सबसे कम अंक  आए हैं... उतने कम अंक तभी संभव है जब उस अभ्यर्थी को लगभग सारे उत्तर आते हों और उसने जान बुझ कर गलत उत्तर मार्क किए हों !  इस साल जेईई में किसी के कम से कम -72 से लेकर अधिकतम 408 अंक तक आ सकते थे। अधिकतम 385 आया और न्यूनतम -64 !  -64 लाने के लिए इतनी ज्यादा गलतियाँ करनी पड़ेगी कि वो तुक्का मार कर नहीं किया जा सकता। वो तभी संभव है जब कोई हर एक सवाल को हल कर जानबूझ कर गलत उत्तर मार्क करे । उसने ऐसा क्यूँ किया ये मुझे नही पता । पर ऐसे लोगों के लिए मन में एक सम्मान की भावना आती है। उनमें प्रतिभा होती है - विशुद्ध, निःस्वार्थ ।  अगर मैं किसी संस्थान का डायरेक्टर होता तो इस अभ्यर्थी को बुलाकर नामांकन देता।

मुझे अकादमिक बातों में हमेशा से रुचि रही है। और मैं ऐसे कई अद्भुत सिरफिरे लोगों से मिला हूँ। कई लोग याद आ रहे हैं। आज बात बस उसकी जिसका नाम मुझे नहीं पता । क्योंकि जमाना खराब है कोई अपना नाम सुन भड़क न जाये !

बात है आईआईटी दिल्ली की। प्लेसमेंट के पेपर का एक सेक्शन मैंने सेट किया था। एक स्टूडेंट ने एक सवाल के उत्तर में जो लिखा था उसका मतलब था -  "मुझे पता है कि ये सवाल आई ई ईरोड़ोव की पुस्तक प्रॉब्लम्स इन जनरल फिजिक्स के सवाल 1.12  से बनाया गया है। मैं इसे हल कर सकता हूँ क्योंकि मुझे उस सवाल का हल याद है। पर इसका हल देख अगर आप ये मतलब निकालें कि मैं उतना ही मेधावी हूँ जितना चार साल पहले था तो सॉरी मैं उतना मेधावी नहीं रहा।" उसी लड़के ने एक और सवाल के उत्तर में लिखा "सवाल तो जिओमेट्रिक प्रोग्रेशन से बन जाएगा पर हाइअसिन्थ का बैंकिंग से क्या लेना देना?"।  सवाल में हाइअसिन्थ प्लांट का ग्रोथ रेट दिया हुआ था और उससे कुछ और निकालना था।

(ये सबसे हल्का सवाल था पर बहुत कम लोग सही हल कर पाये थे, अब आप मुझसे ये मत पूछिएगा कि मैंने इसी प्लांट का नाम क्यों इस्तेमाल किया Smile )।

उसने दोनों ही सवाल हल नहीं किए थे पर उसका इतना लिखना ही ये बता गया कि वो दोनों सवाल हल कर सकता था। अगर वो हल करता तो आसानी से वो बाकियों से ज्यादा अंक लेकर आता। उसी दिन साक्षात्कार में एक लड़का बिन नहाये, बिखरे बाल और चप्पल में भी आया था। मेरा बस चलता तो मैं इन दोनों को ही....

खैर... मैं पहले लड़के से अलग से भी मिला। अच्छी बातें हुई। आते-आते मैंने बस इतना कहा - "नॉट योर लॉस" ! पता नहीं मेरा ये कहना उसे कितना अच्छा लगा होगा.... पर मुझे वो अब तक याद है !

~Abhishek Ojha~

PS: बहुत दिनों से ब्लॉग अपडेट नहीं हो पाया था। कारण ? ऐसा कोई कारण तो मुझे भी नहीं मिल रहा :)  आज ये पोस्ट कर दिया... ब्लॉग जिंदा रहे।

कुछ बहुत पुरानी पोस्ट्स -
वो लोग ही कुछ और होते हैं ... (भाग II)
वो लोग ही कुछ और होते हैं...

Aug 25, 2011

अन्ना: एक चैट लॉग - नवंबर २००६

 

अंतराग्नि २००६ के इंडिया इंस्पायर्ड इवेंट में अन्ना हजारे को मैंने १० फीट दूर से सुना था. तब शायद अन्ना का नाम भी पहली बार ही सुना था. अंतराग्नि का अंतिम दिन था और मेरा सर दर्द कर रहा था. जहाँ तक मुझे याद है मुझे कोई पकड़ कर ले गया था इस इवेंट में.

आज अपने जीमेल में ‘अन्ना’ सर्च किया तो अंतराग्नि के ठीक बाद दो दोस्तों से किये गए चैट मिल गए. ये उसी चैट का एक अंश हैं.  २००६ अंतराग्नि में नुक्कड़ नाटक और पैनल डिस्कशन दोनों में आरटीआई छाया रहा था. आरटीआई पर नुक्कड़ नाटक काफी मशहूर हुआ था जो एमटीवी के ‘क्या बात है’ पर भी आया था. बाद में उस टीम को राज कुमार संतोषी से भी प्रसंशा मिली थी. उन्होंने ये भी कहा थे कि वो कुछ अंश अपनी आने वाली फिल्म (हल्ला बोल) में इस्तेमाल करना चाहेंगे. 

उस पैनल डिस्कशन में कई लोग थे सबकी अपनी उपलब्धियां थी लेकिन अन्ना सबसे इम्प्रेसिव थे. Annaठीक इसी तरह पिछले दिनों न्यू योर्क में एक कॉन्फ्रेंस में मुझे ईला बेन ने भी बहुत प्रभावित किया था. ये वार्तालाप जब हुआ था तब अन्ना इतने प्रसिद्द नहीं थे. तब मैं फाइनल इयर का छात्र था और कुछ दोस्त जो चार साल वाले प्रोग्राम में थे, ग्रेजुएट हो गए थे. उन्हीं दोस्तों में से दो के साथ ये बात हुई थी. खतरनाक, इंट्रेस्टिंग और ‘क्या आदमी है !’ जैसे शब्द आये हैं अन्ना के लिए. बाकी बातें तो अब सबको पता है उस समय के लिए नयी थी. आप शायद उतना एन्जॉय ना कर पाएं जितना मैंने किया. फिर भी…

कुछ सेंसर कर बाकी चैट लॉग वैसे का वैसा:

चैट लॉग १:


2:45 PM me: भाई, कहाँ रहते हो आजकल?

2:49 PM Friend-beta: हाय

Friend-beta: कैसे हो?

2:50 PM me: ठीक हूँ, तुम बताओ

Friend-beta: बस मजे में हूँ

2:51 PM me: इस बार अंतराग्नि का पैनल डिस्कशन मिस कर दिया तुमने. आरटीआई पर था. बहुत ही मस्त हुआ.

2:52 PM Friend-beta: हाँ पता चला है

me: अन्ना हजारे, अरुणा रॉय, मधु भंडारी, प्रभाष जोशी, संदीप पांडे और ओ पी केजरीवाल.

2:53 PM मेरा सर दर्द कर रहा था जाने के पहले ऐसे ही जाके बैठ गया. फिर ३ घंटे तक उठाने का मन ही नहीं किया. अन्ना हजारे क्या आदमी है. सुनके लगा कि कैसे लोग गांधी को बैठ के सुनते और इंस्पायर होते होंगे.

…इरिलेवेंट कन्वर्सेसन…

2:59 PM me: वैसे तुम्हे तो पता ही होगा इन्हीं लोगों ने बहुत हद तक आरटीआई बनवाया है.

3:00 PM Friend-beta: हाँ भाई इतना तो पता है.

me: ओ पी केजरीवाल सीआईसी कमिशनर हैं.. बेचारे को बहुत गाली दी सबने. बोल रहे थे कि ये तो अच्छे आदमी हैं लेकिन सीआईसी बहुत बेकार काम कर रहा है.

3:01 PM एक मनीष कुमार भी आया था पहले जी टीवी में था अब परिवर्तन में है.

3:02 PM Friend-beta: सीआईसी का तो हिद्यातुल्ला है?

3:04 PM me: यार अब यहाँ तो केजरीवाल ही आया था clip_image001

Friend-beta: चीफ इन्फोर्मेशन कमिश्नर? वो भी होगा. ३ लोग हैं.

Friend-beta: वो क्या बोल रहा था

3:05 PM me: वो कुछ बोला ही नहीं. पहले उसे ही मोडरेट करना था. लेकिन बोला कि मैं गवर्मेंट का आदमी हूँ… यहाँ आये लोग बोलेंगे कि मुझे बोलने नहीं दिया. इसलिए संदीप पाण्डेय को मोडरेटर बना दिया.

3:06 PM Friend-beta: ओके

me: एंड में बोला कि आप लोग जो बोल रहे हैं वो सही है और ९०% केस हमारे पास गोवेंमेंट ईम्प्लोयीज और ओफिसर्स के आते हैं. जनरली प्रोमोशन से रिलेटेड. कोई पब्लिक इंटरेस्ट में केस फाइल ही नहीं करता. और सजेस्ट किया कि आप लोग गंगा एक्शन प्लान पर आरटीआई में एक अप्लिकेशन डालिए.

Friend-beta: पांडे भी आये थे.

me: हाँ

3:07 PM Friend-beta: प्रोमोशन से रिलेटेड ?

me: हाँ.  मेरा प्रोमोशन क्यों नहीं हुआ. मेरे जूनियर का कैसे हो गया. मुझे छुट्टी क्यों नहीं मिली यही सब. ये भी बोला कि आरटीआई में अमेंडमेंट आये तो आपलोग विरोध कीजिये clip_image001[1]

Friend-beta: clip_image001[2]वो तो होगा ही.

3:09 PM me: और बोला कि जब उसकी सीआईसी में पोस्टिंग हुई तो उसे खुद घर नहीं मिला था तब उसने खुद ही आरटीआई फ़ाइल करके पूछा तब उसे घर मिला clip_image001[3]

3:10 PM बाकी खूब सारी सक्सेस और स्ट्रगल की कहानियाँ सुनाई सबने.

3:15 PM Friend-beta: गंगा एक्शन प्लान में क्या हो रहा है.


5 minutes

3:20 PM me: गंगा एक्शन प्लान सुप्रीम कोर्ट के आर्डर पर बना था टू प्रोटेक्ट गंगा फ्रॉम पोल्यूशन (पता नहीं स्टेट का है या सेण्टर का)… और कानपुर में अभी तक वाटर क्लीनिंग प्लांट्स नहीं लगे. लेदर इंडस्ट्री वाले लोबी और फ्रॉड करके अभी भी गन्दा पानी डाल रहे हैं गंगा में.

Friend-beta: हाँ ये तो राजीव गाँधी के टाइम ही शुरू हुआ था. कई फेज में काम हो रहा था पर फ्रॉड तो हुआ ही है.

3:22 PM देखो अगर कुछ ठीक हो जाए तो बढ़िया है.

me: हाँ. एक मधु भंडारी भी थी अभी परिवर्तन के लिए काम करती है. रिटायर्ड आईएफएस है. पोर्चुगल की अम्बेसडर थी रिटायर्ड होने के पहले.

3:23 PM अन्ना हजारे का लेकिन जवाब नहीं है… क्या आदमी है.

Friend-beta: क्या बोला?

3:24 PM me: वो बुड्ढा ८X६ फीट का रूम, एक गद्दा, एक ओढने का, एक थाली/लोटा, और २ धोती-कुरता. ये उसकी सारी संपत्ति है. आरटीआई के लिए महारष्ट्र सर्कार से लेकर सेंटर तक…

3:26 PM बोलता है कि मैंने आडवाणी को बोला कि देखो कल तक कर दो नहीं तो मैं तुम्हारे दरवाजे पर बैठ रहा हूँ, आगे तुम्हारी मर्जी clip_image001[4]तेलगी वाला केस कोई लेके नहीं जा रहा था… इसे कहीं से डिटेल मिल गया… लेके पहुँच गया सीधे मिनिस्ट्री में. खूब सिक्यूरिटी मिली थी उसके बाद… उसी दिन सबको भगा दिया.

3:27 PM Friend-beta: खतरनाक आदमी है तब तो.

me: एक आइडियल विलेज बनाया है महाराष्ट्र में. जहाँ अभी रहता है पहले वहाँ दारु की भट्ठियां थी. बोल रहा था अब वहाँ पान भी नहीं बिकता.

3:28 PM पहले वहाँ पानी की प्रॉब्लम थी अब वहाँ से पानी बाहर जाता है. गांधीयन थोट का आदमी है. और सब कुछ किया है जीवन में.

3:29 PM २६ साल की उम्र तक आर्मी में था. बोल रहा था कि उसे नहीं पता अभी उसके घर वाले कहाँ है और घर में कौन-कौन है. सब छोड़ के उस गाँव में ही लग गया,

3:30 PM Friend-beta: कितना बुड्ढा है?

me: बोलता है कि उसके पहले दारु भी पिया है आर्मी में था तब... थोडा-बहुत छोटी-मोती मारपीट भी. तब मुंबई में फूल बेचता था.

3:31 PM १९४० टाइप का है... विवेकानंद की एक किताब पढ़ी तब से कूल हो गया.

Friend-beta: रुको मैं भी उसके बारे में कुछ पढता हूँ.

3:32 PM me: अभी एक स्कूल भी चलाता है जिसमें वो बच्चे पढते हैं जिन्हें मुंबई-पुणे जैसी जगहों के स्कूलों से निकाल दिया जाता है. या वैसे जिनका कहीं और एडमिशन नहीं होता.

Friend-beta: इंटरेस्टिंग आदमी है.

me: अरे जरुरत से ज्यादा इंटरेस्टिंग आदमी है. रुको विडियो आने दो तो भेजने का जुगाड करता हूँ. मुझे तो बहुत अच्छा लगा.

Friend-beta: ओके

me: आता हूँ थोड़ी देर में.

3:33 PM Friend-beta: ओके

बाय

मैं भी जा रहा हूँ फ्रूटी पीने, बाय.


चैट लॉग २: (इसमें अन्ना से जुड़ी बस एक ही लाइन है, लेकिन सर्च रिजल्ट में आया तो… )

12:01 PM me: हाँ बोलो

Friend-Alpha: कहाँ थे इतने दिन !!

me: अंतराग्नि. अभी सोके उठा हूँ, अभी ब्रश भी नहीं किया.

Friend-Alpha: कर के आओ

me: आता हूँ


9 minutes

12:11 PM me: मैं आ गया clip_image001[5]

Friend-Alpha: clip_image001[6]कैसी रही अंतराग्नि ?

me: अच्छी रही. मैं जिस-जिस इवेंट में गया वो तो अच्छे थे. ओपनिंग थोड़ी ठीक रही.

Friend-Alpha: सही. कोई कन्या पटाई?

12:12 PM me: नहीं यार, कन्या कहाँ…

Friend-Alpha: (एक नाम) मुझे कुछ कुछ बता रहा था तुम्हारे और (एक और नाम) के बारे में clip_image002

me: ही ही, हमने कुछ नहीं किया भाई.

12:13 PM Friend-Alpha: हाँ मुझे पता है. और सुना… कि हाल. ?

…इरिलेवेंट कन्वर्सेसन…

me: खैर… और बताओ

12:17 PM Friend-Alpha: बस सब ठीक

me: कल कवि सम्मेलन अच्छा हुआ.

Friend-Alpha: अच्छा? गुड. यूफोरिया कैसा था.

me: ठीक ठाक.

12:18 PM खूब इधर उधर के गाने गाये उसने. डिस्क बना दिया बाद में तो.

Friend-Alpha: अब अपने गाने इतने अच्छे नहीं होंगे तो कोई क्या करेगा.

me: और एक पैनल डिस्कशन भी था आरटीआई पर. वो भी बहुत अच्छा था.

12:19 PM Friend-Alpha: अच्छा… कूल.

me: बहुत इन्फ्लुएंसिंग स्पीकर आये थे.

Friend-Alpha: सही है

12:20 PM me: अन्ना हजारे का लेक्चर सुन कर लगा कि शायद लोग गाँधी को ऐसे ही सुन कर इन्फ्लुएंस होते होंगे. बहुत अच्छा बोला…

Friend-Alpha: अच्छा… सही है.

me: बाकी डांस इवेंट्स वगैरह नोर्मल ही थे… ऋतंभरा भी ठीक था. बहुत अच्छी टीम्स नहीं थी एक चंडीगढ़ को छोड़कर.

12:21 PM Friend-Alpha: अच्छा, निफ्ट टाइप कुछ नहीं था?

me: थे ३-४ आईएनआईएफडी

12:22 PM Friend-Alpha: अच्छा. और सुनाओ… बाकी जनता कैसे है?

me: सब मस्त हैं.

…इरिलेवेंट कन्वर्सेसन…

[एसेट मैनेजमेंट, क्वांटिटेटीव जोब्स, बीसीजी, मैकेंजी, ऑयल कंपनीज, एक दोस्त की गर्लफ्रेंड, उसका ब्रेकअप … उससे जुड़ी कुछ बातें जैसे ‘इतनी जल्दी थी क्या उसे शादी की? थोड़े दिन वेट नहीं कर सकती थी.?… बुरा हुआ. अनलिमिटेड टॉक की स्कीम लिया… फिर उसने १३ रेडिफ अकाउंट बनाए थे एसेमेस करने के लिए… वैसे अभी भी ये चाहे तो वो कहीं गयी नहीं है… लेकिन बोलता है अजीब लड़की है ! …और अभी कोई उम्र है कम से कम २-४ साल तो जॉब करनी ही चाहिए. पर उस कन्या के लिए तब तक तो देर हो जायेगी. …फाईट है ! अरे नहीं… वो भी टाइम पास करता था… लोग ऐसा टाइम पास क्यों करते हैं? सीधे बता देना चाहिए जब भी बात आये कि… लुक मी टाइम पास… सो यू डोंट गेट सीरियस clip_image001[7]

फिर लंच के लिए जाने की बात हुई… मेस बंद हो जाएगा. और एक हिप्पो दोस्त की जो अब तक सो रहा था. मुझसे कहा गया ‘लंच करने मत जाओ.' प्लीज जल्दी आना क्योंकि मेरे पास आज कोई काम नहीं है clip_image001[8]‘. तकरीबन १३.४५ पर ये वार्तालाप खतम हुई थी मेस बंद होने के १५ मिनट पहले. ]


अल्फा-बीटा को मेरे कॉलेज के दोस्त आसानी से पहचान लेंगे. अंतराग्नि का ग्लैमर कैम्पस के मरुस्थल की दो बूंद हुआ करती. उसके बाद भी जिसे यही मिले बात करने को Smile  उसे पहचानना कौन सी बड़ी बात है जी.

~Abhishek Ojha~

(पटना सीरीज जारी रहेगी)

Jan 16, 2011

बकरचंद

अनावश्यक चेतावनी: पोस्ट में उतरोत्तर ऐसी बातें हो सकती हैं जो... छोडिये ऐसा कुछ नहीं है. वैसे भी चेतावनी दे डाली तो आप अंत तक पढेंगे. इससे अच्छा चेतावनी को रहने ही देते हैं.  और हाँ इस पोस्ट के सारे पात्र वास्तविक हैं. बकरचंद ने पोस्ट पढ़ी तो दुखी जरूर हो सकते हैं कि उनका असली नाम क्यों नहीं दिया गया.

दृश्य १: (क्लासरूम)
प्रो: हे यू, व्हाट आर यू डूइंग ?
बकरचंद: (दबी आवाज में नोटबुक पर आँख गडाये हुए) अबे किसको बोल रहा है?
पडोसी छात्र: तुझे !Kanpur
प्रो: आई ऍम टॉकिंग टू यू... यू इन ब्लू टी-शर्ट.
बकरचंद: (दबी आवाज में) अबे ये तो मुझे ही बोल रहा है. (अलर्ट होकर) सर... सर... एक्चुअली... $%#$^

दृश्य २: (क्लासरूम)
प्रो: लास्ट रो... कैन समवन प्लीज वेक हिम अप? ... स्टैंड अप?
बकरचंद: (खड़े होते हुए) सॉरी सर.
प्रो: ओह ! तो आप भी सो रहे थे... ?

दृश्य ३: (क्लासरूम)
प्रो: ओके कैन समवन टेल मी व्हाट विल हैपेन इफ ए एंड बी आर एलिमेंट्स ऑफ एन ओडरड फिल्ड? यू?
बकरचंद:  सर.. %^%& ७८&*७  #%$^&%^*
प्रो: तुम तो मुँह नहिये खोलते तो अच्छा रहता. सॉरी टू डिस्टर्ब यू. (इस दृश्य के अलावा शायद ही कभी किसी ने इन प्रोफ़ेसर साब को हिंदी बोलते सुना हो. बकरचंद ने बड़ा क्रन्तिकारी सा जवाब दे डाला था).

दृश्य ४: (कानपुर, एक रेस्टोरेंट)
- अबे ये तो बहुत महंगा है. कहीं और चलते हैं.
- कुछ तो ऑर्डर करोगे?
- ठीक है कोल्ड्रिंक/कॉफी कर दो.
----
- कितना बिल आया?
- ८५
----
- अबे ये तो २० लौटा गया है? क्या करें?
- चेंज नहीं होगा उसके पास. अब दे दिया है तो ले चल. कौन सा इसका दामाद बनना  है तुझे.
--- थोड़ी देर में वेटर दौड़ा-दौड़ा बाहर आया.
-'सर टिप? आपने तो... हे हे'
- भैया अब आपने ही लौटा दिया तो हम क्या करें... लो (१० रुपये)
- साले ने पांच ले ही लिए.

दृश्य ५: (भारतीय रेलवे) मासूम बकरचंद जनरल के टिकट पर स्लीपर कोच में चढ गए और रात के अँधेरे में उन्होंने टीटी को १०-१० के दो नोट पकडाए. अगले दिन सुबह...
- कहाँ से आ रहे हो?
- कानपुर से
- पढते हो
- जी अंकल
- कहाँ?
- जी आईआईटी में
- टिकट तो ले लिया करो. तुम्हे तो पास भी मिलता होगा.
- अंकल वो तो है पर क्या करें टाइम नहीं मिलता है टिकट कराने का. बहुत पढ़ना पड़ता है. रात-रात को क्लासेस होती है और छुट्टी के ठीक पहले एक्जाम... अभी तो मैं परेशान हूँ कि घर कैसे जाऊँगा. सारे पैसे तो मैंने आपको दे दिए. अब ऑटो के पैसे भी नहीं बचे. ये देखिये वालेट में कुछ भी नहीं बचा.
- गजब हो तुम भी. कितना लगता है ऑटो का?
- जी अंकल ३०.
- ये लो.
- थैंक यू अंकल.
.... (१० मिनट बाद फोन पर)... 'अबे सुन १० रुपये कमाए मैंने... %^$%^&^&'

दृश्य ६: (कानपुर, एक रेस्टोरेंट)
- अबे बहुत महँगा है. कटते हैं यहाँ से. अबे बकर, कुछ कर. यहाँ नहीं खा सकते.
बकरचंद: एक्सक्यूज मी? आप वेज और नॉन-वेज एक साथ बनाते हैं?
वेटर: नहीं सर अलग-अलग.
बकरचंद: किचन एक ही है?
वेटर: यस सर लेकिन...
बकरचंद: मैं तो यहाँ नहीं खा पाउँगा, यार तुम लोग देख लो.
- अब यार ऐसा कैसे होगा  कि तुम नहीं खाओगे और हम खायेंगे.
बकरचंद वेटर से: आप आस पास किसी ऐसे रेस्टोरेंट के बारे में जानते हैं क्या जहाँ वेज और नॉन-वेज के लिए अलग किचन हो या कोई प्योर-वेज रेस्टोरेंट?
---

दृश्य ७: (बकरचंद का ऑफिस)
जूनियर: बकर ये RukBahanKe फंक्शन क्या करता है?
बकरचंद: वो टेस्ट करने के लिए है. कुछ भी एक लाइन अंट-शंट लिख दो तो स्क्रिप्ट वहीँ रुक जाती है.
जूनियर: लेकिन कुछ और भी तो लिख सकते थे... ये कोई देखेगा तो क्या कहेगा?
बकरचंद: क्या कहेगा? रोकना था तो रुक लिख दिया और फिर आगे मन में आया तो लिख दिया. अच्छा ख़ासा काम कर रहा है, तुझे क्या प्रॉब्लम है इससे?
----

दृश्य ८: (पुणे, आईसीसी टावर रूफ टॉप)
बकर डिनर पर थोड़ी देर से आये...
- अबे यहाँ या तो अंदर बैठना पड़ेगा या फिर इटालियन आर्डर करना पड़ेगा.
बकरचंद: ऐसा क्यों? एक मिनट रुक. भैया... भैया, इधर आइयेगा जरा?
वेटर: यस सर?
बकरचंद: आपको भैया बोला तो बुरा तो नहीं लगा?
वेटर: नो सर... नॉट एट आल.
बकरचंद: देखो भैया अब क्या करें हमलोग यूपी के हैं. और वहाँ पर तो ऐसा ही चलता है. भूख लगी है  कुछ खिला दीजिए... अच्छा सा. एकदम फटाफट. 
वेटर: स्योर सर. वी हैव... $#%%#
बकरचंद: अब देखिये भैया ये सब नहीं बुझाता है. बुझाने का मतलब बुझते हैं न? हम यूपी के भाई लोग हैं, कुछ देसी खिलाइए...
---- (कुछ देर तक निरर्थक चर्चा… तिलक, शिवाजी… अंग्रेज चले गए तो आपको ही छोड़ गए क्या? जैसी बातों के बाद…)

वेटर: सॉरी सर, यू विल हैव टू सिट इनसाइड.
बकरचंद: अब नजारा देखने के लिए ही तो आये हैं.
---
वेटर: सर मैं अपने मैनेजर को बुला देता हूँ आप बात कर लीजिए.
--- (लगभग १० मिनट बाद. )
बकरचंद: भैया चिकन लोलीपॉप और एक कुछ वेज घास-फूस. अब तो बोल दिया आपके बड़े भैया ने. अब तो खिलाओगे? कि अभी भी नाराज हो?

दृश्य  ९: (आईआईटी कानपुर, एक कंप्यूटर लैब)
बकरचंद: अबे क्या है ये? कब है लास्ट डेट? मैं रात को करूँगा अभी कुछ नहीं कर रहा. अबे वो साईट कौन सी थी?
- www.@#$@#$.com
बकरचंद ने अपने लैपटॉप पर वो देखना चालु किया जो इंटरनेट पर सबसे ज्यादा मात्रा में मौजूद होता है. थोड़ी देर में पीछे से प्रोफ़ेसर ने कंधे पर हाथ रखा: 'बकरचंद हैव यू सीन अभिषेक टूडे?'
--- लैब मैं सन्नाटा---
बकरचंद: (बिल्कुल गंभीर मुद्रा में गंभीर, लैपटॉप का ढक्कन नीचे करते हुए) नो सर. ही मस्ट हैव गोन फॉर लंच.
प्रो: ओके. कंटीन्यू... टेल हिम दैट आई वाज लूकिंग फॉर हिम.
--- (१० मिनट बाद. ) '#$% अबे आज तो...'

मैं सोच रहा हूँ ऐसे कितने प्रतिशत प्रोफ़ेसर होते होंगे? मुझे तो लगता है एक वही.... और बकर भाई के अनगिनत किस्से… फिर कभी.

- सुना है आजकल पोस्ट में चेतावनी देने का दौर चल रहा है तो हमने भी दे दी. फिलहाल जनवरी के लिए एक पोस्ट हुई Smile

~Abhishek Ojha~

Dec 13, 2009

उन गलियों से गुजरना

पिछले दिनों ऑफिस के काम से एक यात्रा पर जाना हुआ. दिल्ली, कानपुर और बीच में लखनऊ. यूँ तो बहुत दिन नहीं हुए पर पता नहीं क्यों लगा कि एक अरसे Unpublished Postबाद आना हुआ है इन गलियों में. थोड़ी भाग-दौड़ वाली यात्रा जरूर थी पर बड़ी रोचक और ज्ञानवर्धक रही. अब भाग-दौड़ का क्या है... अभी ९ दिसंबर को सोचा जन्मदिन के बहाने एक पोस्ट ठेली जाए तो टाइप की हुई पोस्ट को ठेलने के पहले ही ९ का १० हो गया. उसका स्नैपशॉट ले लिया था तो आज चिपकाये दे रहा हूँ आपको मन हो तो क्लिक करके पढ़ लीजिये. 

वैसे आजकल व्यस्तता को नापने के मैंने अपने नए तरीके निकाले हैं जैसे रीडर में कितने अपठित लेख जमा हैं, औसत कितने लेख शेयर किये जा रहे हैं, कितने दिनों से लैपटॉप की जगह आईपॉड पर सर्फिंग हो रही है, ऑफिस में कितने मिनट तक तशरीफ़ कुर्सी से दूर रही (तशरीफ़ का शाब्दिक अर्थ छोडिये मतलब तो आप समझ गए ना !), कितने ईमेल का जवाब देना बाकी है, औसत कितने पोस्ट/कमेन्ट किये और अगर घर फ़ोन करने का समय नहीं मिला तो सही में व्यस्त !  सोच रहा हूँ इन सारे पारामीटर्स को कलेक्ट कर एक बिजिनेस इंडेक्स (व्यस्तता सूचकांक) बना लूं दिन में एक बार तो अपडेट कर ही सकता हूँ कि आज कितना बिजी रहा.

रोचक और ज्ञानवर्धक को तो एक पोस्ट में समेटना कहाँ संभव है ! हाँ कई बातों पर भरोसा और पक्का हुआ. जैसे 'समाज में कुछ चीजें बस कुछ लोगों द्वारा, कुछ लोगों के लिए ही बनाई गयी हैं'. खैर इस पर फिर कभी. फिलहाल तो इसी बात की ख़ुशी है कि कुछ गेजुएट हो रहे बच्चों को नौकरी मिली जो इस यात्रा का मकसद भी था. कुछ दोस्तों से एक छोटी मुलाकात भी हुई. जब से तथाकथित ब्लोगर हो गए हैं तो अब 'ब्लोगर मीट' भी यात्रा का एक हिस्सा है. तो इसी बहाने कुछ धुरंधरों से भी मिल आये... कुछ को तो १० मिनट की 'मीट' के लिए एक घंटे तक इंतज़ार करवा दिया. लेकिन कुछ तो बात है जो पहली बार मिलने पर भी सॉरी कहना तक फोर्मलिटी  लगती है.

दिल्ली और लखनऊ तो ठीक लेकिन सुबह-सुबह जब कानपुर पहुचे और एक ऑटो(विक्रम) में गाना बजता सुनाई दिया... 'जब-जब इश्क पे पहरा...'. हम तो वही नोस्टालजिक हो गए. ये मिस करना भी अजीब चीज है वो थकेले ऑटो, उसमें बजते फास्ट फॉरवर्ड स्पीड में चीं-चों करते गाने और १२ लोग ! ये भी कोई मिस करने की चीज है वो भी तब जब आप उस गाडी में बैठे हो जो आपको सबसे अच्छी लगती है. वालस्ट्रीट फिल्म में माइकल डगलस का एक डायलोग याद आया उस पर एक पोस्ट लिखनी कब से पेंडिंग है. इन ऑटो में जो गाने बजते हैं उनकी लिस्ट ५० से ज्यादा लम्बी नहीं है... सारे क्लासिक ! मेरे एक दोस्त आपके प्लेलिस्ट से आपका भूत और आप किस परिवेश में रहे हो ये बता देते हैं... इन ऑटो में बजने वाले गानों के ट्रेंड पर गौर करें तो ये बता देना कोई बड़ी बात नहीं लगती.

गाडी वाला भी उन रास्तों से ले गया जहाँ से कभी सबसे ज्यादा गुजरना होता था. फिर वो जगह... जहाँ पर जीवन के सबसे यादगार दिन गुजारे हैं.. अपना कॉलेज, अपना कैम्पस. तो अब क्या हमारे साथ बुरे दिन बीत रहे हैं ? (गनीमत है ये सवाल किसी सेंटी टाइप लड़की ने नहीं पूछा, वरना समझाने में ही दिन निकल जाता). जीवन के २-४ सबसे ज्यादा भावुक क्षणों में से एक था जब मैंने ये कैम्पस छोड़ा था और दूसरा जब मेरे कुछ दोस्तों ने मुझसे एक साल पहले छोड़ा था. इंसान सच में बड़ा Bloggers meet विचित्र जीव है... किसी चीज का पीछा करता रहता है फिर मिलने पर पता चलता है कि उसे पाने के लिए क्या कुछ गंवा दिया. गनीमत है मैंने ज्यादा नहीं गंवाया. उन नहीं गंवाए गए मस्ती के क्षण... अलंकारिक भाषा में कहूं तो उस कैम्पस में हर तरफ दिखने वाले लाल ईंटों से कहीं ज्यादा यादें जुडी हुई हैं उस जगह से. उस समय व्यस्त से लगने वाले दिन अब जिंदगी के सबसे अधिक फुर्सत वाले दिन लगते हैं. गुजरी हुई बातों के मामले में मुझे अपनी मेमोरी पर कभी ज्यादा भरोसा नहीं रहता लेकिन वहां पहुच कर  लगा सब कुछ जैसे अभी हो रहा हो. समय तो नहीं मिल पाया पर आते-आते गाडी से ही सही दो चक्कर लगा आया. मेरे साथ गयी एचआर को लगा कि मैं कुछ ज्यादा ही सेंटी हो रहा हूँ. वैसे उनको जितना लगा मैं उससे कहीं अधिक सेंटी था. अभी तक गेट पास की पर्ची पड़ी हुई है बटुए में... !

फिलहाल इतना ही... बिजिनेस इंडेक्स अभी भी ऊपर चल रहा है. मंदी आ नहीं पा रही इसमें.

'मीट' की चर्चा तो यहाँ और यहाँ आई ही है, मैं भी कुछ यदा-कदा ठेलता रहूँगा, वैसे एक क्लारिफिकेशन देना था. मुझे लगता था इस ड्रेस में थोडा स्मार्ट लगता हूँ लेकिन अनूपजी के इ७१ का कैमरा कुछ सही नहीं लग रहा :)

~Abhishek Ojha~

Dec 14, 2008

माँ का दूध

एक ज़माना था जब सोते-जागते कंपनी खोलने का भूत सर पर सवार रहता, और हर बात में बिजनेस आईडिया के अलावा कुछ दिखता ही नहीं था. हमारे एक मित्र इसमें बड़ा सक्रिय रहते... उनके आईडिया बड़े कमाल के होते, उसमें सफलता मिलती या नहीं ये तो बिजनेस स्टार्ट करने पर पता चलता पर आईडिया मजेदार जरूर होते ! आजकल ये मित्र रोयल डच शेल में तेली हैं। और नीदरलैंड से सिंगापुर तक तेल के कारोबार में हाथ बटाते हैं. अब कहने को तो इस तेल की कंपनी में शोध वैज्ञानिक है लेकिन अब हमारी भाषा में तेल बनाने/बेचने वाले को तेली ही तो कहते हैं... अब मैं तो इन्हें यही कहता हूँ !

एक समस्या ये होती कि इनके नए विचार अक्सर ऐसे होते जिन पर सदियों पहले से कंपनियाँ चल रही होती. अब क्या करें बेचारे दिमाग के किसी कोने से ढूंढ़ के लाते और दो मिनट में हम उस पर खड़ी बड़ी-बड़ी कंपनियां गिना देते... दो मिनट में रात के डिनर से सुबह के बाथरूम तक के सोचे गए उनके सारे 'इनोवेटिव' बिजनेस आईडियाओं पे पानी फिर जाता. खैर एक दिन उछलते-कूदते आए बिल्कुल आर्कीमिडिज के 'यूरेका' वाले क्षण की तरह...

--
'अबे यार मस्त आईडिया आया है... दूध की कंपनी खोलते हैं ...'

'क्या यार इसी पे इतना उछल रहे थे... जा अमूल की साईट खोल के देख।'

'अबे नहीं भाई पुरा आईडिया सुन तो लो'
'देखो हम बच्चों के लिए दूध बनायेंगे... पाउडर और लिक्विड दोनों'

'ओके... तो?'

'प्रोडक्ट का नाम रखेंगे... "माँ का दूध"'

'व्हाट?'

'अबे देख डॉक्टर सलाह देते हैं... 'बच्चे को माँ का दूध पिलाइए', वो तो छोड़ जितने डब्बे वाले दूध आते हैं उन पर लिखा होता है 'माँ का दूध शिशु के लिए सर्वोत्तम है' तो हमारे ब्रांड को एडवटाइज करने की भी जरुरत नहीं है' सारे कंपटीटर ख़ुद ही हमारे प्रोडक्ट का इनडायरेक्टली प्रचार करेंगे !'

'हा हा ! जियो मेरे लाल क्या आईडिया है ! चलो इसी मेगाबक्स* में प्रेजेंट कर देते हैं। सारे वेंचर कैपिटलिस्ट लाइन लगा देंगे पैसे देने के लिए...'

'वही तो ... '

'भाग साले... कुछ तो ढंग का सोच लिया करो कभी, वैसे मदर डेयरी है तो तेरा कंपटीटर'

'अबे यार, क्या तुलना कर रहे हो, कभी सुना है 'मदर का दूध पिया हो तो...''

'देख एडवटाइज वाला आईडिया तो दुरुस्त है ही... उसके अलावा ६०-७०-८० के दशक की किसी भी हिन्दी फ़िल्म का क्लिप दिखा दो... "माँ का दूध पिया है तो..." और फिर दिखाएँगे 'आ गया माँ का दूध !' डब्बा से निकाल के दूध पिया और फिर साले विलियंस का सफाया ! बिजनेस का तो बाद में सोचना पहले ये बता क्रिएटिव एडवटाइजमेंट का अवार्ड मिलेगा की नहीं?'

'अबे क्यों गन्दगी फ़ेंक रहा है भाग यहाँ से' (ये एक टिपिकल लाइन होती थी होस्टल में)

'अरे यार मैं मजाक नहीं कर रहा सीरियसली सोच, अबे यार तू रिपोर्ट बना दे फिर प्रेजेंट करते हैं... कम से कम मजा बहुत आएगा। बड़े-बड़े लोग आते हैं सुनने'

'तुम्हें लगता है की एक राउंड भी आगे जा पाओगे?'

'साले मैं इस आईडिया पे फाइनल जीत सकता हूँ ! लेकिन अकेले नहीं कर सकता, भाई मेरे करते हैं न इसपे काम...'
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खैर काफ़ी चर्चा के बाद ये आईडिया ड्राप हो गया पर था. पर था तो सच में 'इनोवेटिव'...
अब इस पर तो काम नहीं हो पाया (ओह ! ऐसे कितने ही इनोवेटिव आईडिया बरबाद हो गए) मैंने सोचा चलो हम नहीं कोई और सही... आईडिया है, और हम भारतीय ! मुफ्त का आईडिया/सलाह दूसरों को बांटना हमारा पहला-दूसरा नहीं तो तीसरा-चौथा धर्म तो होता ही है.
अब किसी ने इस आईडिया पर कंपनी खोल दी और हमें नाम का भी क्रेडिट दे दिया तो घाटा क्या है !

चलो क्रेडिट ना भी दे तो कोई बात नहीं :-)

*मेगाबक्स आईआईटी कानपुर का वार्षिक बिजनेस और एंतार्प्रेनार्शिप समारोह है.

~Abhishek Ojha~

Oct 30, 2008

तेरे नाम का पासवर्ड

कल एक करीबी मित्र का फ़ोन आया. हॉस्टल में हुई इस दोस्ती के मतलब ही अलग होते हैं... इसमें एक-दुसरे की हर एक बात पता होती है. उस समय वो यात्रा कर रहा था और अविलम्ब उसे एक ईमेल किसी को फॉरवर्ड करना था... ये सूचित करने के तुरंत बाद उसने अपना पासवर्ड एसेमेस किया।

यहाँ तक तो सबकुछ ठीक पर उनका पासवर्ड देखकर अचानक ही चेहरे पे मुस्कान आ गई। ये पासवर्ड स्पष्ट रूप से उस लड़की के नाम से बना था जिसे देखकर (देखकर ही क्यों उसके बारे में सुनकर भी) कभी हमारे मित्र का दिल धड़का करता था।

खैर उसके इश्क के किस्से फिर कभी... वो अक्सर कहा करता 'आज फिर से पहला प्यार हो गया !' पर ऐसा पासवर्ड रखा जाना ये तो दिखाता ही है कि उन सारे पहले प्यारों में ये थोड़ा ज्यादा पहला था . *

हाँ इसके साथ ही एक और बात साफ़ हुई... पहले जिस अधूरे प्यार की जगह किसी किताब में, किसी नोवेल में या फिर क्लास नोट्स के आखिरी पन्नों पर होती थी (दिल के किसी कोने में होने के अलावा) उसको एक नई जगह मिल गई है... और कमाल की सुरक्षित जगह है... पासवर्ड ! अभी-अभी एक और फायदा सूझा... पासवर्ड भुलाने की समस्या से मुक्ति ! कुछ भी भूल जाओ ये भूलना थोड़ा मुश्किल है... हाँ अगर आपको रोज एक नई शख्शियत से प्यार हो जाता हो तो थोड़ा मुश्किल है पर उसमें भी वरीयता तो होगी ही !

हर लम्हा तेरी याद दिल में और
तू निगाहों में होती थी,
कभी किताबों में तो
कभी उनमें भटकते-सूखते फूलों पर,
कभी हथेली पर भी तो लिखा करता था...
अब तेरे उस नाम का पासवर्ड बना रखा है !


कहीं आपने भी ऐसा पासवर्ड तो नहीं रखा है? अगर मजबूरी में किसी को बताना पड़ जाए तो आपको कोई समस्या तो नही? खैर जब आप अपना पासवर्ड ही किसी को बता सकते हैं तो उसे ये जानकारी देने में भी कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए.

* 'All animals are equal, but some animals are more equal than others.' इसी के तर्ज पर.

~Abhishek Ojha~

Jun 4, 2008

इनवेस्टमेंट बैंकिंग... 'F' शब्द... खोया-खोया चाँद और एक खूबसूरत सुबह !

इनवेस्टमेंट बैंकिंग बदनाम है बहुत ज्यादा वर्क लोड के लिए... इनवेस्टमेंट बैंकिंग से जुड़ी किताबों ने और बदनाम कर रखा है. नौकरी चालू करने के बाद ये बात बहुत ज्यादा महसूस नहीं हुई... शायद पहले से ही धारणा बनी हुई थी या फिर पहले से ही ऐसा जीवन जीने की आदत हो गई थी. फिलहाल पिछले शुक्रवार की रात २:१५ (या फिर शनिवार सुबह कह लें) पर मोबाइल बजा तो नंबर दिखा: ००*** . तुरत माथा ठनका कि अरे ऐसे नंबर से तो ऑफिस वाले फ़ोन पर कॉल आता है.... कोई न्यूयार्क से अपने ब्लैकबेरी से कॉल कर रहा था... इस समय पर? वैसे उस समय भी मैं जाग रहा था और 'Development with dignity: A case for full employment' पुस्तक पढ़ रहा था. खैर फोन उठाया तो शक सही निकला... उधर मेरी एक अनालिसिस खोली गई थी जिसमें था $४ करोड़ का घाटा. घाटे का कारण किसी को मिला नहीं तो मुझे याद करने का शुभ काम किया गया. मैंने घर से काम करने का एक्सेस नहीं लिया है. ऑफिस का काम वहां से निकलते ही भूल जाने में विश्वास रखता हूँ. घर पर बस थोड़ा-बहुत पढ़ लेता हूँ, जिसका इस्तेमाल अगले दिन होना होता है. पर काम .... ना !

खैर अब मैं देख तो सकता नहीं था की समस्या क्या है. तो थोडी देर में ये फैसला लिया गया कि १ घंटे में मैं ऑफिस चला जाऊँ. जिनका फोन था वो हमारे बड़े वाले बॉस है... बड़े साहब MIT से PhD हैं, अब वो १६-१८ घंटे तक काम कर जाते हैं... ऐसे लोगों को मना भी नहीं कर सकते. जो ख़ुद इतनी लग्न से काम करता हो और इंसान भी अच्छा हो... इतना तो साफ है की मामला बहुत गंभीर था. थोडी खुशी भी हो रही थी की चलो हमारी भी इम्पोर्टेंस है (वैसे इसको कहते हैं पोजिटिव थिंकिंग... रात को २:३० बजे ऑफिस जाना पड़े और सोचो की हमारी इम्पोर्टेंस है)

रास्ते में एक बार ऊपर की तरफ़ देखा तो साफ आसमान, चाँद और हजारों तारे... मुझे याद आया... कि आसमान ऐसा भी होता है (ऑफिस, ऊपर देखो तो स्ट्रीट लाईट और फिर रात को फ्लैट में बंद... व्यस्त जीवन हो जाए तो कितनी जल्दी खूबसूरत चीजें भी दिमाग से निकल जाती हैं). पूरे रास्ते... खोया-खोया चाँद, खुला आसमान... गुनगुनाते रहा. जींस, टी-शर्ट और सैंडल पहने ऑफिस पहुच गया था. उस समय हमारे ऑफिस में तो कोई नहीं था पर हमारा ऑफिस विप्रो कॉम्प्लेक्स में है तो कॉल सेंटर के कई लोग इधर-उधर भटक रहे थे. हमारे फ्लोर पर जो एकाध लोग थे उनका घुरना देख कर मैं सोच में पड़ गया कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है! मैंने मन में सोचा.... 'Its fu**ing friday night dude! what you want me to wear... a suite?' (कई बातें हैं जो हिन्दी में उतनी सहजता से नहीं कही जा सकती खासकर फूहड़ बातें) और हाँ यहाँ आपको बता दूँ कि इनवेस्टमेंट बैंकिंग में जो अपने को जितना होशियार समझता है वो उतना ही ज्यादा 'F शब्द' इस्तेमाल करता है. इस इंडस्ट्री में आने के बाद ही पता चला कि F शब्द इतना व्यापक है और इतने क्रिएटिव इस्तेमाल होते है इसके.

अचानक मुझे ध्यान आया कि मैंने LEHMAN BROTHERS की टी-शर्ट पहन रखी है (IIT से निकलने के बाद कुछ सालों तक कई सारी कंपनियों के टी-शर्ट की कोई कमी नहीं होती). LEHMAN BROTHERS की टी-शर्ट पहन के CREDIT-SUISSE के ऑफिस में... भारत-पाकिस्तान में से किसी एक देश के आर्मी का ड्रेस पहन के दुसरे की सीमा में चले जाना कहूँगा तो थोड़ा ज्यादा हो जायेगा... पर अगर लिखते समय ऐसी बात दिमाग में आ रही है तो आप समझ सकते हैं की मामला संगीन है, वैसे रात थी तो कोई बात नहीं. खैर $४ करोड़ वाला मामला थोडी देर में निपट गया... आपको यहाँ बताता चलूँ की इनवेस्टमेंट बैंक में होते हुए जब तक आप पैसा बना रहे हैं आप सही है... जिस दिन घाटा हुआ... उसी दिन ये साबित हो जाता है की आप अब तक ग़लत कर रहे थे !

५ बजे सुबह ऑफिस से निकला तो एक साथी का फोन आया की पंचगनी के लिए आधे घंटे में निकलना है... मैंने कहा... मैं अभी ऑफिस से वापस आ रहा हूँ ...थोडी देर लग सकती है... 'what the Fu** were you doing in office on a friday night?' खैर दो बातें तो साफ है बिना 'F' शब्द के बोलना कुछ इनवेस्टमेंट बैंक में काम करने वालों को बेमानी लगता है... और शुक्रवार की रात बहुत मायने रखती है. खैर रात के खोये-खोये चाँद की तरह सुबह भी बहुत खूबसूरत निकली... इससे पहले अच्छी सुबह शायद ये मिली थी. पर क्या करें सुबह उठाना तो ५-६ सालों से भूल गया हूँ... कितनी खूबसूरत चीजें खोता जा रहा हूँ... :(

फिलहाल पंचगनी की ये तस्वीर... बाकी तस्वीरें, यात्रा वृतांत और इनवेस्टमेंट बैंकिंग की बाकी बातें फिर कभी


~Abhishek Ojha~

Jun 2, 2008

IIT में एक और आत्महत्या

शनिवार के दिन मैं पंचगनी में था... फोन में सिग्नल ना के बराबर (कभी-कभी ये बहुत शुकुन की बात होती है) पर घंटी बजी और दिल्ली का नंबर दिखा.
एक मित्र का आवाज़ आई: 'ओझा भाई, कैसे हो?'
'मैं ठीक हूँ, तुम सुनाओ कैसे हो?'
'बस सब ठीक है, IIT में एक और सुसाईड हो गया... !'
'what? कब? which year? कैसे? कारण?'
एक-एक करके लगभग सारी बातें पता चली... final year, होस्टल के कमरे में ही फांसी लगाकर, BSBE department, लड़की थी, IIMS से काल्स भी आई थी,... हैल्थ प्रॉब्लम, BTP में फक्का... ! (B.Tech. Project, फक्का: F-ग्रेड) दीक्षांत समारोह के ठीक पहले! शायद समय पर डिग्री ना मिल पाना! सारे प्रयास फिर से विफल, सारी काउंसिलिंग ... सब बेकार.

'अरे यार ये भी कोई कारण होता है... ' 'चलो मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ. '
मैं कुछ भी बोल रहा था... ऐसी सिचुएसन में मैं बिल्कुल नहीं बोल पाता...

अभी डेढ़-दो महीने ही तो हुए... वो फर्स्ट इयर का छात्र था... पहले साल में ऐसी एक घटना हो जाती थी... अब तो एक सेमेस्टर में २-२. अर्जुन सिंह के रिज़र्वेशन के बाद क्या होगा?
फर्स्ट इयर हो या फाइनल... मेरी नज़र में तो आत्महत्या का कोई कारण हो ही नही सकता... चाहे कैसे भी हालात हो जाय. पर मेरे लिए कह देना शायद आसन है...वो ही समझ सकता है जिस पर गुजरी होगी. अलग-अलग सिचुएसन... मौत के भयावह और अलग-अलग तरीके... जिन्हें सोच कर ही डर लगता है.

IIT से मुझे बहुत लगाव है और ऐसी खबरें बहुत दुःख पहुचाती है.. सच बोलूँ तो थोडी देर के लिए तो व्यक्तिगत क्षति लगती ही है. कहते हैं भारत में किसी किशोर के लिए IIT से अच्छा कुछ नहीं हो सकता और इसे शायद वो बेहतर समझता है जो वहाँ रह चुका है... जहाँ अधिकतर लोग इसे अपने जीवन का सबसे सुखद हिस्सा मानते हैं वहीं कुछ लोग इसे अपने जीवन में आए एक बुरे सपने की तरह देखते हैं... जिन्हें लगता है की उनसे उनका सब कुछ छीन लिया गया... किताबों और ग्रेड्स के बीच अपने जीवन को घिरा हुआ पाते हैं। मुझे याद है एक बार एक चर्चा में मैंने कहा था: 'कभी किसी भारतीय इंजिनियर से ये मत पूछना की वो IITian है क्या !, क्योंकि अगर वो होगा तो थोडी देर में ख़ुद ही बता देगा और अगर नहीं तो उसे बुरा लगेगा !' इतने गर्व की बात होना... वो भी उस देश में जहाँ हर जगह इतनी समस्याएं हैं... फिर ऐसा क्यों? आख़िर क्यों? गलती किसकी है?

प्रोफेसर? अक्सर लोग इन्हे ही गालियाँ देते हैं... मेरे बहुत सारे दोस्त भी. पर मैं ऐसा नहीं कर पाता, पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है की कभी कोई प्रोफेसर दुश्मनी से किसी को फक्का नहीं दे सकता... प्रोफेसर मजबूरी में ही फेल करेगा (ये मेरा मानना है, वैसे फेल होना भी तो किसी भी तरह से आत्महत्या का कारण नहीं बनता)
क्या छात्र ख़ुद? नही इस उम्र में इतनी बड़ी गलती के लिए जिम्मेदार नहीं कह सकते... नासमझी जरूर कह सकते हैं.
अभिभावक? मुझे लगता है की कहीं-ना-कहीं अभिभावक, अनजाने में ही सही, ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं... कुछ घटनाओं में तो ऐसा साफ होता है. समस्या ये है कि अभिभावक को भी ऐसी बातों का पता नहीं होता है... जब बेवजह टॉप करने का प्रेशर हो तो क्लास में पीछे रहना तो दूर फेल होने कि बात कोई कैसे बता सकता है? IIT में जाने वाले लगभग हर छात्र अपने स्कूल में टोपर्स रह चुके होते हैं और माता-पिता ये धारणा बना के चलते हैं कि ये तो IIT में जाने का बाद भी चलता ही रहेगा. और यहाँ ऐसा नहीं होने के कई कारण होते हैं सबसे बड़ा कारण है: वैसे ही छात्रों के बीच relative grading ! अभिभावकों द्वारा रिश्तेदारों और अन्य लोगों के सामने अंधाधुंध बड़ाई भी एक कारण है, जो अनायास ही प्रेशर का कारण बन जाता है. कई बार जानकारी ना होते हुए भी माता-पिता बेवजह पढ़ाई में हस्तक्षेप करते हैं.
ऐसा क्यों है कि माता-पिता से बच्चे अपनी समस्याएं बताने में डरते हैं? ख़राब ग्रेड आने पर वो घर वालों को क्यों नहीं बता पाते? फेल होने के बाद summers में रुक कर आसानी से कोर्स निपटाने की व्यवस्था है, पर असली समस्या तो घर वालों को बताने में ही आती है. बच्चों को कोउन्सेलिंग की जरुर तो है पर साथ में ऐसे अभिभावकों को उनसे कहीं ज्यादा काउंसलिंग की जरुरत होती है. यहाँ अभिभावक के साथ समाज का एक हिस्सा भी होता है जो ऐसी बातें पता लगाने में लगा रहता है. और हर वक्त दूसरो की समस्याएं उछलने और उन पर हँसने में लगा रहता है.

वैसे कई बार व्यक्तिगत कारण भी होते हैं, कई तरह की समस्याएं... भागवान जानें...

मेरी बस यही कामना है की ऐसे घटनाएं दुबारा फिर ना हो... पर अब ये आम बात होती जा रही है... इसी बात का दुःख है.

भगवान तोया की आत्मा को शान्ति प्रदान करें और उसके घर वालो को इस संकट की घड़ी में साहस.

~Abhishek Ojha~

तस्वीर साभार : http://www.healthnews-stat.com/?id=857=teen-suicide-CTC

[ IIT पर लिखे पिछले पोस्ट को ठीक एक साल हो गए... कैम्पस से ही लिखा था... कभी सोचा नहीं था की अगली पोस्ट ऐसी लिखनी पड़ेगी :-( ]

Jan 18, 2008

व्हाट'स् योर हॉबी?

जुलाई २००२, हाल २ प्रांगण, आई आई टी कानपुर।
चल खोल... ।
इतना सुनते ही बिना रुके फटाफट आवाज़ आती थी। मेरा नाम 'एक्स' है... मेरे बाप का नाम ... 'वाय' ... भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान द्वारा आयोजित संयुक्त प्रवेश परीक्षा में मेरा अखिल भारतीय स्थान 'ज़ेड' है । मैं यहाँ 'अ' विभाग में नामांकन के लिए आया हूँ । मैं 'बी' शहर से आया हूँ । मेरे शौक हैं... ।

हिन्दी में ये सब बोलना कईयों के लिए तो बहुत मुश्किल का काम था, पर एक बार रटने के बाद लोग बोल ही लेते थे। सबसे ज्यादा दिक्कत दक्षिण भारतीयों को और वो भी डिपार्टमेन्ट का नाम बोलने में... कंप्यूटर साइंस को संगणक विज्ञान और मेकनिकल को यांत्रिकी अभियांत्रिकी, इलेक्ट्रिकल को विद्युत तक तो ठीक है पर धातु विज्ञान एवं धातुकर्म अभियांत्रिकी में लोग अटक जाते थे और फिर हर एक गलती पर गाली खाओ... । और फिर तर्क तो हो ही जाता था की ये गलत है... हिन्दी में ये नहीं कुछ और बोलते हैं ... ।

खैर यहाँ तक तो हो जाता था... पर बात आई होब्बिस की... । बहुत सोचने पर भी कुछ समझ में नहीं आता था ... और सामने वाले को तो बस गाली देने का बहाना चाहिऐ। फिर सुनाई पड़ा ... कुछ लोग बोल रहे थे ... हमारा शौक है खाना खाना ! कुछ ने कहा गाना गाना.... वगैरह वगैरह। गाना तो हम कह नहीं सकते थे... सो खाना पर ट्राई किया... सामने वाले ने तुरत कहा अबे किसका सुनके बोल रहा है... खाना खाने का शौक है तो फिर एक पाव का शारीर क्यों है? चलो फिर हमने कहा सोना... । कितने घंटे सोता है? १० घंटे... तो इसे हॉबी कहते हैं मैं तो १२ घंटे सोता हूँ। चल तू ये ही बता की हॉबी किसे कहते हैं?

अब ये एक और समस्या आ खड़ी हुई....
जिसे हम खाली समय में करते हैं।
.... अबे चुप खाली समय में तो मैं सोता हूँ, अपने घर फोन करता हूँ ... तो क्या ये हॉबी है?
जी .... मैं और बता रहा था अभी पूरा नहीं बोला पाया था, ... वो काम जो हम अक्सर करते हैं और जिसे करने में आनंद आता है।
अब क्या-क्या कमेंट्स आते थे और क्या-क्या मतलब निकाले गए मैं आपको नहीं बता सकता.... मेरे समझ में ये नहीं आता था की सामने वालों को इतना कुछ कैसे आता है। हमने बताया हिन्दी की पुस्तके पढना, सिक्के एकत्रित करना, अखबार पढना, फिल्में देखना, घूमना। आप सोच रहे होंगे की चलो जान बच गयी... हाँ एक दो बार तो बची पर... ऐसे भी मौक़े आये...
अबे मिश्रा इसे हिन्दी पढ़ने का शौक है बे पूछ इससे कुछ... पाठ्यक्रम की कहानियो और कविताओं के अलावा प्रेमचंद तक ही हम संभाल पाते थे ... अखबार पढना तो हॉबी होती ही नहीं और फिल्मों के तो ऐसे उस्ताद थे कि आप न ही बोलें तो बेहतर है। सिक्के वाली बात थोडी झूठ बोल के निकल जाती थी... और घूमने में फिर ये आ जाता था की कहाँ-कहाँ घूम के आये हो? बस ख़त्म बात .... ! खैर वो वक्त निकल गया और अगले साल हम भी लोगो को चुप कर देते थे... ।
आपको बता दूं कि ये रैगिंग के दृश्य थे... ।

पर एक बात तो साफ हो गयी कि कुछ होब्बिस तो होने ही चाहिये। सोचना शुरू किया कि मैं क्या करता हूँ ... जिस काम को करते समय मुझे बाक़ी संसार का ध्यान न रहे.... ऐसा क्या है जो मैं घंटो कर सकता हूँ... ऐसा क्या है जो करते समय दिमाग कुछ और न सोचे यानी फ्री हो जाये सारी चिंताओं से...।

अंततः कुछ काम ऐसे मिल गए और अब मैं कह सकता हूँ कि मेरे शौक क्या हैं। पहला तो बहुत ही अजीब है... समुद्र के किनारे बैठना... पता नहीं इसे हॉबी कह सकते हैं कि नहीं पर हाँ इतना मैं जानता हूँ कि मैं समुद्र के किनारे बैठकर लहरों को देखते हुए सब कुछ भूल जाता हूँ... । यही एक काम है जिसमें मेरा दिमाग इधर-उधर नहीं भटकता... बिल्कुल फ्री... । एक एकांत किनारे पर मैं घंटो अकेला बैठ सकता हूँ।
दूसरा भी कुछ अजीब सा ही है... किताबों की दुकान .... बस एक किताबों कि दुकान या लाइब्ररी .... । अलग अलग सेक्शन्स और नयी पुरानी किताबें... । किताबें पढना भी अच्छा लगता है मुझे, पर ये देखना कि लोग कैसी-कैसी किताबें लिख जाते हैं... और किसने किस विषय पर कौन सी किताब लिखी है... ज्यादा अच्छा लगता है । और फिर घूमना ... तैरना... फिल्में देखना... पर न तो सारी मूविस अच्छी लगती हैं ना सारी किताबे... । खाना बनाना मुझे अच्छा लगता है... ।

पर क्या अच्छा लगने को ही हॉबी कहते हैं?

~Abhishek Ojha~

Jun 1, 2007

ये कमी तो रहेगी...



इस बार भी संस्थान परिसर में आते समय ये महसूस नहीं हुआ कि अब ये परिसर मेरा नहीं रहा। इस जगह से लगाव ही कुछ ऐसा हो गया है... । यहाँ प्रवेश लेते समय लोगो ने कहा था ... पाँच साल बहुत होते हैं, ऊब जाओगे । आज लग रहा है... कितने कम होते हैं। कैसे बीत गए पता ही नहीं चला... पर अनगिनत यादें, अनुभव, अनमोल दोस्त... सभी कुछ तो दे गए। यहाँ आते समय बच्चे थे... शायद अब नहीं रहे।

पिछले पाँच सालो से यह परिसर और कानपुर हर योजना का केंद्र रहा। धीरे-धीरे घर की जगह संस्थान के कमरे को केंद्र में रखकर यात्राएं निर्धारित होने लगी... कानपुर सेन्ट्रल से गुजरने वाली रेलगाडियों की समय-सारणी याद हो गयी... ।

इतनी यादें हैं... ऐसी यादें हैं... जिन्हे लिखा नहीं जा सकता। जिनकी कमी सबसे ज्यादा महसूस होगी, उनके बारे में तो एक पंक्ति भी नहीं लिखी जा सकती... । उन मित्रों के बारे में क्या लिख सकता हूँ... लिख दिया तो फिर बाक़ी चीजों के बारे में क्या लिखूंगा... 'जनु राकेस उदय भएँ तारे'। एक साथ, एक जगह इतने अच्छे लोग और ऐसी निस्वार्थ मित्रता शायद ही कहीँ मिले।

पता नहीं कितनी कक्षाओं में सोया..., १०० से ज्यादा मिड-सेमेस्टर परीक्षायें, ५० से ज्यादा एंड-सेमेस्टर और अनगिनत क्विज़ दिया। हमेशा इनके नाम से डर लगा... आज फिर से परीक्षायें देने का मन कर रह है। प्रोफेसरों पर फिर ग़ुस्सा करने का मन कर रह है। आज जिंदगी में पहली बार 'फेल हो गया होता' ये ख्याल अच्छा लग रहा है। थोड़े दिन और सही यहाँ रह तो जाता...!

आज दीक्षांत समारोह में अचानक ये सुना कि हम ग्रेजुएट हो गए... हम IITK के अलुम्नी हो गए। आज तक ये शब्द तो काफी अच्छे लगते थे पर आज पता चला ... इनकी student शब्द के सामने कोई औकात नहीं। इन पाँच सालो के हर एक पल कि कमी तो जीवन में शायद ही कभी पूरी हो पायेगी। कुछ नियमित कार्य जो दिनचर्या का हिस्सा बन गए थे... उनकी कमी ज्यादा खलेगी।

दोस्त और अनिश्चित कल तक चलने वाले बिना किसी विषय के वार्तालाप (bulla),
द्वितीय छात्रावास (आज भी वहां जाने पर ऐसा महसूस होता है जैसा वहाँ हमारा बचपन गुजरा हो),
दौलत रामजी जैसे लोग,
२००२ कि ठंड,
कक्षाओं में सोना,
दुनिया का सर्वश्रेष्ठ LAN ,
कुछ प्रोफेसर,
MT कि चाय, (अन्तिम वर्ष में MT जाना चालू किया था)
बुक क्लब कि पुस्तकें,
LAN गेम्स देखना (कभी खेला नहीं पर देखने का अपना ही मज़ा है),
संस्थान में होने वाले व्याख्यान,
मोटे कि बाइक और हिंदी अख़बार,
IITK कि विशिष्ट शब्दावली,
Internships,
झगडे :-),
मूवीस (कभी-कभी एक दिन में ४) , पुस्तकें (सप्ताह में एक),
NewsGroups,
trips,
असीमित सुविधायें,
संस्थान की हरियाली और पंछी,.....

काश! ये सूची कभी पूरी हो जाती... ।

बस २००६ में पहली बार गर्मी कि छुट्टीयों के बाद यहाँ आने का मन नहीं कर रहा था। चार वर्षीय पाठ्यक्रम वाले सारे दोस्त चले गए थे। पर बचे हुए पाँच साल वाले... हमने जिंदगी कुछ यूं ढाली की अन्तिम वर्ष और भी यादगार हो गया। ये जगह ही कुछ ऐसी है... और ये लोग ही कुछ ऐसे हैं... ।

क्या नहीं दिया इस संस्थान ने... आगे जिंदगी का रुख जो भी हो... पर ये कमी तो रहेगी...।
या यूं समझ लिजीये... इस जगह को भूलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

Dancing in Campus

खैर, हर एक अंत एक नयी शुरुआत के लिए होता है। शाम हुई है तो एक नया सवेरा भी होगा... और जैसे बरसात किसान के लिए सुखदायी और कुम्हार के लिए दुखदायी होती है... किसी के लिए ये नयी सुबह लेकर आएगा... उनके लिए शुभकामनायें... ।



Abhishek Ojha
1st june 2007
३९वाँ दीक्षांत समारोह, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर
कैम्पस से किया गया आखिरी पोस्ट

Apr 22, 2007

एक सुबह... गंगा किनारे

आई.आई.टी. के अन्तिम वर्ष के अनगिनत यादगार लम्हों मे एक बिठूर में व्यतीत की गयी वो सुबह भी है। रात्रि के अन्तिम प्रहर से सुबह तक का समय हमने गंगा घाट पर बिताया। ऊषा काल तक की छटा तो मनोरम थी। पर सूर्योदय होने के पश्चात जो प्रदूषण देखने को मिला... गंगा की दुर्दशा।

बिठूर को ब्रह्मावर्त भी कहा जाता है (था)... ऐसी मान्यता है की ब्रह्मा ने यहीं से ब्रह्माण्ड की रचना प्रारम्भ की और ये ब्रह्माण्ड का केंद्र है... । अगर पौराणिक बातों को माने तो कालांतर में यह राजा उत्तानपाद की राजधानी बनी... और ध्रुव ने यहीं कहीँ तपस्या की थी। महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी यहीं था... इसका मतलब ये हुआ की रामायण की रचना, लव-कुश का जन्म तथा लव-कुश युद्ध जैसी घटनाएं भी यहीं हुई होंगी।


ऐतिहासिक
दृष्टि से यह स्थान बाजीराव पेशवा, नाना साहब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई के शैशव काल तथा १८५७ की क्रान्ति से जुड़ा हुआ है।

कुछ खंडहरों के अलावा अनियोजित, अदूरदर्शी और खराब योजनाओं का प्रभाव हर जगह दिख रहा था। प्रदूषण की बात तो पहले ही कर चूका हूँ। यह सुन चूका था की कानपूर में गंगा बहुत प्रदूषित है... परंतु कभी यह नहीं सोचा था की इतनी ज्यादा प्रदूषित है कि पानी छूने में भी ड़र लगे। बहरहाल हमलोगों ने कुछ तस्वीरें ली और वापस आ गए। योजना बनाने वालों कि तरह इन तस्वीरों में भी प्रदूषण की जगह सुन्दरता ही झलकती है... ।


पुल किराया सूची


पुल में लगा हुआ एक पीपा


पीपा का पुल


गंगा किनारे एक नाव















सूर्योदय


~Abhishek Ojha~