Dec 2, 2013

धनुहां बोस ! (पटना १८)


बात उस दिन के एक दो दिन बाद की है जिस दिन एक शोरूम  के काउंटर पर बैठे लड़के ने १०% छूट देते हुए कहा था - "आपको बताना था न की बीरेंदर भईया के दोस्त हैं". वो दूकान थी बैरी के दोस्त मंटू के पिताजी की - मंटू, मंटूआ, मंटू  डॉन और दउन मिंटा सब उसी एक इंसान के नाम हैं. हर नाम के पीछे एक किस्सा. दउन मिंटा नाम की कहानी बतायी बैरी ने - 'मंटूआ के बाबूजी के बिजनेस ओहि ज़माना से था। उनको बरी मन था कि पर्ह-लिख के मंटूआ सर्विस में आ जाए. बिजिनेस का झमेला-झंझट से दूर।  उ का है कि बिजनेस वाला को लगता है कि बिजनेस में कुछ नही रखा आ नौकरी वाला के लगता है की बिजनेसे करते त बर्हिया होता. त हुआ का कि उसके बाबूजी पूरा ध्यान देते थे मंटूआ पर. पर्हायी-लिखाई से लेके खाने पीने हर एक चीज का. इस्कूल  का अकेला लरका था बोर्न बीटा पीने वाला. एक दिन कह दिया इस्कूल में कि बरनबीटा पीता है उ। बरनबीटा किसी को बुझैबे नहीं किया कि होता का है आ ओहि दिन से सब इसका नामे धर दिया - दउन मिंटा"

"आ डॉन त बाद में हुआ। हीहें एएन कालेज में आईएसी में था त अपना आपके बरका बोस समझता था। हम लोग  पाहिले नाम रखे थे धनुहां बोस। उ एसे की लम्बा त  हइए है आ ऊपर से इस्टाइल में तनी झुक के चलता था. आ मार पीट में सबसे आगे. भले हर  झगड़ा में पीटाइये के वापस आता था.  लेकिन एगो बात त है केतनो लात खाके भी कभी डरा नहीं होगा किसी से।  जानते हैं  भईया, फेमस त इ हो गया था आठवे क्लास में। अप्लिकेशन लिखा था अंग्रेजी में कि "डियर सर, माई फादर इस नाट फीलिंग वेल. आई वेंट टू हॉस्पिटल विथ हिम एंड आई  डोंट नो इंग्लिश आफ बलतोड़" अब आपे बताइये ? आ अइसा भी नही की भोला था। भोला त छोरिये उ दर दर्जे वाला था. जान बुझ के लिखा था, हम लोग से बाजी लगा के. "

मैंने कहा - यार ! तुम्हारे भी अजब-गजब दोस्त हैं ! तुम बाजी हारने का बदला तो नहीं निकाल रहे उसकी बातें सुना के ?

बैरी ने कहा - "आरे नहीं भईया ! उ का है कि ई पटना है, आ मंटूआ तो कुछो नहीं है। हर मोहल्ला में एगो-दुगो नहीं सब का कहानी अइसने होता है. इहे मंटूआ एक बार अउर बोल दिया था - सर आप 'हिंदी एंड' काहे बोलते हैं हर क्लास का अंत में ? बोलते हिंदी में हैं आ कहते हैं हिंदी एंड !"

फिजिक्स के सर उसको थपड़िया दिए थे बोले कि एक साल से हम तुमको पढ़ा रहे हैं आ अभी तक तुमको नहीं बुझाया कि हम क्लास का अंत में कहते हैं 'इन दी एंड' कौंची पढ़ाये उसका समरी बताने के लिए कहते हैं आ तुमको हिंदी एंड सुनायी देता है ?

" वैसे कई बार ऐसे हो जाता है कुछ का कुछ सुनाई दे जाना. पर जो भी हो मजेदार कैरेक्टर  है ये तुम्हारा मंटू डॉन !"

"अरे मजेदार का मत पूछिए, जब दसवा क्लास में था त मुहला का छोटा छोटा बच्चा-बुतरू सब से चंदा लगा के बॉम्बे भाग गया था।"
"फिर?"
"फिर क्या, कुछ दिन उधरे रहा एक ठो रिश्तेदार के यहाँ. फिर आ गया. वैसे पईसा का कमी तो था नहीं. त बाद में चला गया इंजीनियरिंग पर्हने औरंगाबाद। असल में तेज वहीँ जाके हुआ। पाहिले साल के बाद हिलते हुए आया। धनुहाँ त था ही एक दम डोलते हुए लौटा. माने एतना न पीता  था कि का बताएं आपको . आप मानियेगा? फस्ट इयर  में चिट्ठी लिख के पइसा मंगा लीया था कि पिताजी के मालूम कि प्रयोग कर रहे थे त  लोग टेबल टूट गया है। अब बाबूजी को का मालूम कि लॉग टेबल कैसा होता है ! उनको  लगा बेटा इंजीनियरिंग पढ़ रहा है त होता होगा कोई स्पेसल टेबुल. भेज दिए मनीआर्डर. आ उसमें भी सरत लगाया था दोस्तन सब से कि बाबूजी पैसा भेज देंगे. उनको नहीं बुझाएगा कि लोग टेबल क्या होता है. सेकेंड इयर में नया शौक लगा था इसको एक दम भोरे-भोर उठ के हाथ में दारु आ गाना बजा देता था कम्पूटर पर 'करना फकीरी-फिर क्या दिल गिरी'. आ जम के हेमा मालिनी के साथ भक्ति नाच नाचता था.  साथ रहने वाला लइका सब जो न गरिआता था इसको। आ दारु के साथ बीरी पीने लगा. अब भी बीरीये पीता  है सिगरेट कभी नहीं... एक बार उसके  बाबूजी लतिआए त बोलता का है कि ... नानी से सीखे हैं ! उ भी त  पीती थी। उहे हमको सिखायी पहिला बार। अब का बोलेगा कोई !"

"दारु, बीड़ी और  फकीरी वाला गाना?"

"अरे वही तो ! जानते  हैं उसके बाद वहाँ बिहारी लइकन सब का लीडर बन गया। मार-पीट किया. छुरा-चाक़ू सब.  फिर वहीँ कोई नेता उता का कन्टेक्ट भी निकाल लिया था। इलेक्सन भी लड़ा कालेज में लेकिन ई एक साल का हीरोगिरी में एतना  तेज हो गया कि... मेस चालू कर दिया ओहि पर इस्टूडेंट सब के लिए ... फिर भारा पर फ्लैट लेके उ भी तीन-चार स्टूडेंट का ग्रुप बना के देने लगा. लेकिन असिली कमाई किया उसके बाद. ओहि कालेज का मेनेजमेंट से मिल के ओहि कालेज में कमिसन लेके एडमिसन कराने लगा। पटना, मुज्जफरपुर, दरभंगा ई सब इलाका का बहुते लइकन सब का एडमिसन करवाया।

"यार कुछ भी कहो लेकिन मानना तो पड़ेगा, तेज तो है ! "

हाँ भैया ! आ सर तो देखबे किये होंगे आप उसका ? सब बाल उर गया है. कालेजे में चालू हो गया था झरना.  कोई इसको बता दिया कि उहाँ का पानी खराब है त पूरा फाइनल इयर में बिजलेरिये से बाल  धोया। लेकिन अब का कीजियेगा केतनो बिजलेरी बहाए जब जमीने बंजर है त उखारने भर का भी कुछो कैसे बचेगा?"

मंटू कथा सुनते सुनते बहुत देर हो गयी थी तो मैं चलने लगा... जाते जाते बैरी ने कहा -

"आ लीजिये सबसे बिसेस बात त  आपको बतइबे नहीं किये। तेज है,  बिजनेस भी बर्हिया कर रहा है लेकिन एगो बात है. आपसे बात करेगा नु  त  बुझइबे नहीं करेगा कि अपना दुःख रो रहा है कि बराई कर रहा है। जइसे  एक ठो  बेटा है उसका त  कहेगा कि 'एतना न तेज आ परहाकु हो गया है कि परेसान कर दिया है, हम  को ई सब पर्हायी-उराई  पसंद नहीं है'.
इस्कूल में भी ओइसहीं करता था कि हम पर्हबे  नईं करते हैं नहीं त पर्ह दें त  हमसे जादे नंबर कोई नहीं ला सकता है । हम एक बार उसको बोले की  'तुम्हरा पिछवाड़ा में चक्कर है बे, अस्थिर बैठोगे तब न पर्ह  पाओगे?' त पीनक गया था हमसे।
ओइसहीं कहेगा कि बिजनेस का का कहें एतना  तो टेक्से  भरना पर जाता है कि ...
अब बताइये न का बोलेगा कोई उससे ? कमाई है तबे न टेक्स भर रहा है?

 इहे सब थोरा उसके धनुहा बोस वाला सब आदत नहीं गया. नहीं त है त बरी तेज. आ अइसने सब तेज तर्रार आदमी का ज़माना है. नहीं त उहे कालेज से पर्ह-लिख के इंजीनियर बन के हिहाँ बिना पैसा के भी काम करने वाला भी मिल जाएगा. बताएँगे कभी आपको.  आप कुछो बोलिए नहीं रहे हैं आज !

:)

--
~Abhishek Ojha~

Oct 26, 2013

जंजाल बनाम कंगाल

ग़ालिब के  'बहर गर बहर न होता तो बयाबां होता' के तर्ज पर भोजपुरी में एक कहावत होती है - 'जंजाल नीमन,  कंगाल ना नीमन' (नीमन = अच्छा)। कंगाल अगर फक्कड़ या निराला न हो तो फिर ये कहने की जरुरत नहीं कि क्यों अच्छा नहीं। वैसे कंगाल से एक और भोजपुरी कहावत याद आ रही है - 'राजा लो के का, उ त गुरे खाई के रही जात होई लो' (राजाओं का क्या है, वो तो गुड़ खाकर ही रह जाते होंगे !)  आप इस कहावत के मतलबों पर गौर कीजिये हम आगे बढ़ते हैं।

Screenshot_2013-10-22-17-12-31

बात शुरू हुई जेपी मॉर्गन बैंक पर लगे 13 अरब डॉलर के जुर्माने से। (13 अरब डॉलर ! वैसे जेपी मॉर्गन ये आराम से झेल जाएगा... आप सोचिए कितनी बड़ी रकम है Smile ) थोड़ा और पहले जाएँ तो मंदी के लिए जब बैंको को जिम्मेदार माना गया तो एक जुमला प्रसिद्ध हुआ - टू बिग टु फ़ेल। दरअसल बैंको ने ऐसे काम किए थे जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। और जैसे कि करनी का फल मिलता है. जब बुरे दिन आए तो कई बैंको को इतना बड़ा घाटा हुआ कि वो डूब गए। पर सरकार को कुछ बड़े बैंको को  मदद कर बचाना पड़ा क्योंकि वो इतने बड़े थे कि अगर डूब जाते तो अर्थव्यवस्था के लिए तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम हो जाता !  उसके बाद सरकारजी ने कहा कि आगे से ऐसा न हो उसके लिए हम कड़े नियम बनाएँगे। जैसा कि होता आया है बहुत सी समितियां बनी। कड़े क़ानूनों का प्रस्ताव हुआ। फिलहाल जब कुछ दिनों पहले जेपी मॉर्गन पर जुर्माना लगा तो फिर ये बात आई कि जेपी मॉर्गन भी 'टू बिग टु फ़ेल' और 'टू बिग टु मैनेज' है। ये खबर पढ़ हमने ट्वीट किया.. और अजित ने जवाब। अजित के जवाब (तस्वीर में) से मुझे लगा कि कुछ लोग बिल्कुल वही समझ लेते हैं जो हम कहना  चाहते हैं -  भले हम कैसे भी कहें ! उदाहरण, बिम्ब, उपमा के नाम पर कुछ भी कहें (वैसे ये बात भी है कि कई लोग, हम कितने ही साफ-सरल शब्दों में क्यों न कहें, कुछ और ही समझ लेते हैं !)

बात तो सही है जब बैंको को इसलिए डूबने नहीं दिया जा सकता कि वो बहुत बड़े हैं तो उन्हें बड़ा होने ही क्यों दिया जाये?

वैसे बात आ गयी बैंक से - रियल लाइफ, इमोशन, रिलेशनशिप पर ! 

बात थोड़ी दार्शनिक सी हो गयी। आप कहेंगे की ये बैंक और 'टू बिग टु फ़ेल' का गणित घुसाना जरूरी है? सीधे नहीं कह सकते जो कहना है? अब बात ऐसी है कि रविदासजी के सामने कठौती थी तो उसी में उनको गंगा दिखी, अगर सामने कॉफी मग होता तो कहावत कुछ और होती। और कबीर दासजी भी सीधे कह सकते थे कि "दुर्बल को न सताइये" इसके लिए "मुई खाल की स्वास से सार भसम होई जाये" कहने की क्या जरूरत थी? हमें कितने दिनों तक यही समझ में नहीं आया था कि किसकी मुई खाल से किसका सार भस्म हो गया ! (सार का मतलब साला भी होता है।)

वास्तविक जीवन में भी क्या चीजें टू बिग टु फ़ेल हो सकती हैं? टू बिग टु फ़ेल तो अच्छी बात है पर उन बैंको की तरह चीजें इस तरह अनियंत्रित हो जाएँ कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने का विकल्प भी न बचे? अगर जंजाल इतना हो जाये कि इंसान  को लगने लगे कि इससे अच्छा तो कंगाल ही होता? वास्तविक जीवन में रिशतें, भावनायें, आसक्ति, भौतिकता ये जीवन के लिए उतने ही जरूरी लगते हैं जितने अर्थव्यवस्था के लिए बैंक। लेकिन कैसे और किस हद तक? कुछ भी  टू बिग हो जाना बुरी बात नहीं है। ग़ालिब चाचा कहते - जेपीमॉर्गन गर जेपीमॉर्गन न होता सेठ दौलतराम बैंक होता। (ये मत पूछिएगा कि ये कौन सा बैंक है Smile )सब कुछ बहुत ही अच्छा था तभी बैंक इतने बड़े होते गए और किसी ने सवाल भी नहीं किया। पर धीरे धीरे वो अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर के काम भी काम करने लगे। जहां नहीं होना था वहाँ भी वो इतने जरूरी हो गए कि बहुत कुछ उन पर आश्रित होता गया  ।

ऐसी उलझन वास्तविक जीवन में भी वैसे ही होती है जैसे बैंको में। तब तक 'अपार सफल' जब तक डूब न जाएँ ! जैसे हम मानने को तैयार नहीं होते कि हम फेल भी हो सकते हैं। हमें लगता है कि हम बाकियों की तरह नहीं हैं। एक बार कुछ बुरा होने लगे तो भी हम एक घाटा छुपाने को और गलत इनवेस्टमेंट करने लग जाते हैं। फिर एक स्तर के बाद हम ये सोचने लगते हैं कि इतना किया तो हार कैसे मान लें ! हम अपनी गलतियाँ भी नहीं देखते।  फिर से वही गलती करते हैं। हम जीवन में कितने ऐसे काम करते हैं कि इतना किया तो अब कैसे छोड़ दें?... जैसे... मान लीजिये एक मोबाइल फोन कंपनी ने एक नया फोन बनाने में करोड़ो खर्च किए। और उसके पहले ही बाजार में उससे अच्छे फोन आ गए। उन्हें पता है कि ये फोन नहीं चलना... फिर भी उस पर सिर्फ इसीलिए खर्च करते रहना कि... इतना किया तो कैसे छोड़ दें।  इससे बेहतर ये नहीं होगा कि जैसे ही पता चले उसे छोड़ नए प्रोडक्ट में लग जाएँ? पर अक्सर ये नहीं हो पाता... हम हार कहाँ मानने वाले होते हैं। ईमोशनल इनवेस्टमेंट जितना होता है उतना कठिन होता है बाहर निकलना। पर फंसे रहना है तो बेवकूफी। जैसे खाना खराब भी  हो तो इसलिए खाना कि पैसे वसूलने हैं :) एक नुकसान के लिए दूसरा और बड़ा नुकसान। जो गया उसकी सोच में हम बहुत कुछ बर्बाद करते हैं। इतना बड़ा करते जाते हैं कि... टू बिग टु फेल ! पीढ़ी दर पीढ़ी लोग अनुभव से कुछ बातें समझाते रहें पर हमें लगता है कि हम अलग हैं -  उन्हें तो करना ही नहीं आया था।  पर परिणाम वही, दुख वैसे ही!  बैंक में काम करने वालों को भी पिछली गलतियों की केस स्टडी पढ़ाई जाती है और लोग फिर से वैसी ही नयी गलतियाँ करते रहते हैं। हमेशा एक जैसा ही पैटर्न - पहले खूब सफल दिखते हैं फिर बैंक दिवालिया। बैंक में इन सब का कारण लाभ का लालच होता है,  वास्तविक जिंदगी में भावनाएँ, भौतिकता और आसक्ति - स्वार्थ दोनों में । 


टू बिग टु फ़ेल आसक्तियाँ वैसी होती हैं जिनमें आगे बढ़ना आसान होता है वापस लौटना असंभव। और ये बातें तभी पता चलती हैं जब चीजें टू बिग हो जाएँ। इतना आगे चले जाएँ, इतना उलझ जाये कि...


2008 से 2012 के बीच अमेरिका में 465 बैंक डूबे... पर एक लेहमेन का ही नाम आजतक क्यों आता है? कितनी नावें रोज डूबती हैं... एक खबर भी आ जाये तो बहुत है। पर टाइटनिक का डूबना 100 साल बाद भी किसी न किसी रूप में पढ़ने-देखने को मिल जाता है ।  क्योंकि वो 'वर्चुअली अंसिंकेबल' था। क्योंकि लेहमेन कुछ इस तरह जुड़ा ही था बाकी बैंको और कंपनियों से... वरना कितना फर्क पड़ता है सब झाड कर आगे बढ़ जाने में? छोटे मोटे झगड़ों और रिश्तों से कहाँ फर्क पड़ता है।  पर कुछ 'टू बिग टु फ़ेल'  धोखा दे या डूब जाये तो जीवन भर के लिये... सिस्टम हिल जाता है। डूबने लगे तो न उसे ढो सकते हैं न डूबने दे सकते हैं !

जब बैंको को पता होता है कि सरकार उन्हें कठिन दौर में बचाएगी ही, तो वो और खुल कर खेलते हैं।  वास्तविक जीवन में भी 'मॉरल हजार्ड'  हर कदम पर दिखता है जिसे हम कहते हैं 'मजबूरी का फायदा'। जब लोगों को पता होता है कि ये तो सरकार (भले मानस) हैं ! कहाँ जाएँगे ? मदद करेंगे ही। तो फिर वो और ज्यादा मन मर्जी के काम करते हैं। उसी तरह जैसे बड़े बैंक मन मर्जी रिस्क लेते हैं... ऐसे लोगों को भी कभी-कभी वैसे ही कह देना चाहिए जैसे सरकार ने लेहमेन को कह दिया -  भले हिल जाये पूरी दुनिया। सरकार कहती है कि, अर्थव्यवस्था के लिए, किसी को बचाने की कीमत अगर उसके डूबने की कीमत से कम है तो बचाना ही बेहतर है।  जीवन में भी ऐसी हालत क्यूँ हो जाती है कि - कुआं या खाई ! कुछ उस तरह का कि रिश्ते टूटे तो या बचे तो... कौन कम बुरा है सोचना पड़े ।

जब एक बड़ा बैंक डूबता है तो बरगद के पेड़ कि तरह उसपर आश्रित और फिर आश्रित के आश्रित बहुत कुछ ध्वस्त हो जाता है। वैसे ही हमारे भी तार कहाँ-कहाँ से जुड़ जाते हैं। कई बार हम जो कुछ करते हैं उससे जाने-अनजाने कितने लोग प्रभावित होते हैं। 

और सरकार कितने नियम बनायेगी? क्या निगरानी करेगी? किसे अच्छे दिनों में उड़ना पसंद नहीं? कौन यथार्थ सोचना चाहता है ? और उड़ने वाले एक दिन जमीन पर आएंगे ही ! जैसे... मीर साहब ने जीवन भर की शायरी के बाद वसीयत की - "कुछ भी होना तो आशिक न होना"। हमने कहा - मीर साहब, बहुत केस स्टडी पढ़ी आपके वसीयत के जैसी... आपकी वसीयत से आशिको का बनना उतना ही रुका होगा जितना नए नियमों से बैंको का फेल होना ! आग से नाता और किससे रिश्ता वाला गाना है एक? - किशोर दा आप अकेले नहीं हैं किसी का मन समझ नहीं पाता :)

सवाल अब भी वही है कितना बड़ा 'टू बिग' होता है ? कितनी आसक्ति ? कितनी भौतिकता? कैसे (स्वार्थी) रिश्ते?  बेहतर है सब कुछ वैसे हो जैसे हमारे शरीर के अंग... सब अपना काम करते रहते हैं। बिन उनके कुछ नहीं चलना पर ...हम कभी महसूस भी नहीं करते उन्हें ! 

ये तुलना पर बात निकली तो बहुत दूर चली जाएगी। फिलहाल इस  बकवास के बाद कुछ अनुभवी लोगों के ज्ञान पढ़िये -
परिभ्रमसि किं मुधा क्वचन चित्त विश्राम्यतां स्वयं भवति यद्यथा भवति तत्तथा नान्यथा.
अतीतमननुस्मरन्नपि च भाव्यसंकल्पयन् नतर्कितसमागमाननुभवामि भोगानहम्. - भर्तृहरि
(हे मन  ! क्यों निरर्थक भटकता रहता है? कहीं ठहर जा। जो होना है वो वैसा ही होगा। इसीलिए जो बीत गया उसे बिन याद किए, भविष्य के लिए बिन योजनाएँ बनाए,  मैं बिन सवाल किए, जो आता है उसी में आनंद अनुभव करता हूँ)
और  -
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥  - गीता (जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं का त्यागकर निर्मम, निरहंकार और निःस्पृह होकर विचरता है, वह शान्ति प्राप्त करता है।)


सबको शांति प्राप्त हो ... या जैसा कि मैं कहता हूँ जिसके पास जो नहीं है वो प्राप्त हो... ताकि उन्हें समझ आए कि उसमें भी कुछ न रखा :)
---
और अब काम की बात -
हमारे नए ब्लॉग को देख आयें। नियमित देखिएगा। आसक्ति होने लायक नहीं  है - गारंटी। फैशन के दौर वाली नहीं,  असली गारंटी :)
ये रहा ब्लॉग के बारे में और ये रही पहली पोस्ट।

--

~Abhishek Ojha~

Sep 8, 2013

संयोग

 

एक वाइनरी में अलग अलग तरह की वाइन के बारे में सुनते हुए अनुराग बस ये सोच रहा था कि आज जो कुछ हुआ वो महज संयोग तो नहीं हो सकता। वैसे अनुराग शराब नहीं पीता पर शराब ही नहीं दुनिया के किसी भी चीज के बारे में जानने का उसको नशा है। बात कैसी भी हो रही हो उसके पास हमेशा कुछ नया कहने को होता है। बीच-बीच में वो अपने दोस्तों को कुछ न कुछ नयी जानकारी देता ही रहता है। इतना कि उसके दोस्त उसे 'एनसाइक्लोपेडिया' कहते हैं। 


खासकर ऐसी जगहों पर तो वो इन बातों में खो सा जाता है। आश्चर्य था कि आधे घंटे से उसने कुछ नहीं कहा ! आज वो कहीं और ही खोया हुआ है। उसके कानों से कुछ शब्द टकराते तो उसे अंदाजा होता कि यहाँ क्या चल रहा है। थोड़ी देर बाद बिना किसी से कुछ कहे वो उठ कर अंगूर के बागान में टहलने चला गया। आज उसे वो सभी याद आ रहे हैं जिनसे जीवन में पता नहीं कैसे मिलना हो गया! वो अपने खुद के जीवन के बारे में सोच आश्चर्यचकित सा हो रहा है। एक दार्शनिक के से विचार उसके दिमाग में चले जा रहे हैं - दुनिया के किस-किस कोने में जन्मे, कहीं से कहीं होते हुए कैसे 'अनजान' लोगों से जीवन के रास्ते टकराए और जीवन की दिशा बदलती गयी। इतने ही सालों में कितनी जगहें और कितने लोगों से मिलना हुआ  - कितने अच्छे लोग। जहां कोई और भी मिल सकता था उसे वही लोग क्यूँ मिले? जैसे लॉटरी में हर बार उसका वही नंबर लगा हो जो लगना चाहिए था। वो पीछे मुड़ कर देखे तो क्या ऐसा नहीं है कि वो इन्हीं सब के लिए ही तो बना था ! चुन-चुन कर तराशे हुए ऐसे लोग मिले जैसे उसकी किस्मत बड़ी फुर्सत से किसी ने बैठ कर लिखी हो। कुछ चेहरे अब तक कितने साफ दिखाई देते हैं... वहीं कुछ के पीछे के इंसानी नाम तक याद नहीं। और कुछ जिनके नाम तो याद हैं पर और कुछ भी याद नहीं !  एक समय जो सब कुछ थे आज बस हल्की यादें हैं...  जैसे किसी पुराने गड्ढे को साल दर साल बरसात धीरे धीरे भर कर लगभग समतल कर गयी हो। स्कूल के दिन के दोस्तों के चेहरे धुंधले पड़ गए हैं। फेसबुक के जमाने में भी किसी से संपर्क नहीं रहा। उसका बचपन रहा भी तो ऐसा जहां अब भी किसी को फेसबुक नहीं पता ! कहाँ से  चला और किन-किन मोड़ों से होते हुए कहाँ तक आया है वो । और अब जो जीवन में हैं ये भी तो बस संयोग से आते गए... कुछ सालों बाद क्या ये भी वैसे हीं धुंधले हो जाएँगे? कभी तो स्थिर नहीं रहा उसका जीवन... कितना तेज और बदलता रहा है - सब कुछ !  कभी रुककर कुछ देखने का वक़्त ही न मिला हो जैसे !


आज जो हुआ ये तो निश्चय संयोग ही था। पर शायद कुछ भी एक बार घटित हो जाये उसके बाद जब हम पीछे मूड कर देखते हैं तो लगता है कि नहीं ये महज संयोग नहीं हो सकता। ये तो नियति ही रही होगी।


इन दिनो अनुराग अपने कुछ दोस्तों के साथ यूएस-कनाडा के सीमावर्ती इलाके में छुट्टियाँ बीताने आया है। आज होटल वापस आते हुए अनुराग ने जीपीएस बंद कर दिया। गाँवो से होकर जाने वाला एक दूसरा रास्ता निकाल लिया था उसने। अगर एक जैसी ही जगहें हों तो उसे घूमना बेकार लगने लगता है। जिस रास्ते गया उसी रास्ते से वापस तो वो आ ही नहीं सकता था। कल ही तो वो कह रहा था कि यायावरी में बुरे अनुभव भी होने चाहिए बस दो चार जगहें देखने और तस्वीरें खीचने को घूमना नहीं कहते।  अनुभव याद रहते हैं... जगहें और तस्वीरें तो बस कहने और दिखाने के लिए होती हैं। अंजान रास्ते से गुजरते हुए उसने अचानक एक हरे भरे फार्म के सामने गाड़ी रोक दी और कहा चलो देख कर आते हैं। आनाकानी करने के बावजूद उस 'प्राइवेट प्रॉपर्टी'  पर सभी उसके पीछे आ ही गए। यूँ भटकते हुए अनायास ही कहीं रुक जाने को संयोग ही तो कहेंगे? या सचमुच ऐसा है  कि जहां जहां जाना लिखा है, जिनसे मिलना लिखा है... वहाँ हम चले ही जाते हैं? और कुछ हो जाता है जीवन के रैंडमनेस में खूबसूरत पैटर्न सा।


घास के मैदान में अपनी मशीन दौड़ाते हुए एक बुजुर्ग सबसे पहले मिले। पर ऐसे मिले जैसे वर्षों से उन्हें जानते हों। उन्होने अपने फार्म की जानकारी बड़े गर्व और प्यार से दी। फिर उनकी पत्नी भी मिल गयीं। दोनों उम्र के सत्तर वर्ष पार कर चुके हैं... पता चला वो किसी जमाने में मशहूर ठीकेदार और शिकारी थे और उनकी पत्नी शिक्षिका। उन्होने अपने फार्म और घर की एक एक चीज ऐसे दिखायी जैसे कोई म्यूजियम की गाइड रहीं हो। एक घंटे से ज्यादा का वक़्त कैसे निकला किसी को कुछ पता ही नहीं चला।


सब कुछ पर्फेक्ट ! इतना अच्छा जैसे सपना हो। इतनी गर्मजोशी से उनका मिलना। एक एक बात प्यार से बताना... कैसे सब कुछ उन्होने खुद अपने हाथों से बनाया। टाइल, पर्दे, दीवार, हीटिंग सिस्टम ... सबकुछ उन्होने खुद डिज़ाइन  किया। सब कुछ अविश्वसनीय सा लगा। कितनी तो नयी बातें पता चली। उनके घर का तीन तरफ से मिट्टी में होना। सब कुछ अत्याधुनिक के साथ साथ प्राकृतिक भी। सेव और ब्लूबेरी के बागान, भेड़ें, तालाब, बतखें, मछलियाँ... घर में शिकारी बंदूक, अलास्का में शिकार किए हुए भालू के साथ पत्रिका में छपी तस्वीर और दीवारों पर ढेर सारे शिकार किए हुए जानवर ।

सभी को बहुत अच्छा लगा.। सबने यही कहा - ये होती है जिंदगी !  कितने अच्छे लोग हैं ।


अनुराग के लिए सब कुछ इतना रोचक था कि वो खुद बीच बीच में बताता जा रहा था कि इसका क्या मतलब है। पर सब कुछ ही बदल गया जब एक कोने में लगे पत्थर और उन पर पड़े फूलों पर नजर गयी... पूछने पर पता चला उनके एकलौते बेटे... 25 साल पहले प्लेन क्रैश... उनका इस दुनिया में अब कोई नहीं... इस अंजान जगह में ये विशाल फार्म और...


उसके बाद उन्होने और क्या-क्या बताया... उसे याद नहीं। वो सुन ही कहाँ पाया कुछ। डिज़ाइन वाली बात में से बस एक ही लाइन उसके कानो में गूँजती रही... "हमने ये इसलिए ऐसा बनाया कि व्हील चेयर आसानी से आ जा सके "!


वो सोचता रहा... क्या ऐसा नहीं है कि इन सबके होते हुए भी जो खालीपन है वो कहीं ज्यादा गहरा है? क्या ये इसलिए इतने प्यार से सब कुछ बता रहे थे क्योंकि इन्हें बात करने को लोग ही नहीं मिलते? क्या सब कुछ होने और कुछ न होने में इतना महीन अंतर है?  ये सब कुछ क्या वो खालीपन दूर करने को है जो भरा ही नहीं जा सकता ? क्या हर पूर्णता में खालीपन होता ही है? उसे याद आ रही हैं उसके दोस्त की माँ... उनके पास भी सब कुछ है। बेटे ऐसे जो कोई भी सपना देखता है। दुनिया जीत सी ली हो उन्होने.... वो अनुराग से घंटो बात करती हैं... बस बड़ी हवेली में अकेली रहती हैं।  अजीब दर्द दिखता हैं उसे उनकी बातों में ! जीवन की  हर उपलब्धि बताते हुए एक अजीब खालीपन... बेटों की सफलता वाली पत्रिकाओं की कतरन दिखाते हुए गर्व और खालीपन का जो मिश्रण होता है उसे पता नहीं क्या कहते हैं !


अनुराग को उत्तर नहीं मिल पा रहा क्यूँ मिलना हुआ इस दंपत्ति से. उसे इतना पता है कि कुछ भी यूँ ही तो नहीं होता संयोग हो या नियति.. फिलहाल वो इतना जानता है कि जिनका नाम भी नहीं पता उन्हें वो इस जन्म भुला नहीं पाएगा ।


'इतने सेंटी क्यूँ हो बे? हुआ क्या तुम्हें?" जब ये आवाज कानो में पड़ी तो अनुराग ने बस इतना कहा - "नहीं, कुछ नहीं। चलो"।


उसे पता है वो बुद्ध नहीं हो सकता... दो चार दिन में... ये बातें वैसे ही समतल हो जाएंगी जैसे हर साल की बरसात से कुछ सालों में गड्ढे... !

--

~Abhishek Ojha~

Aug 16, 2013

खलल दिमाग का !


वैसे तो ग़ालिब ने कहा है – “कहते हैं जिसको इश्क़ खलल है दिमाग का”। पर इश्क़ ही नहीं बहुत कुछ है जो, और कुछ नहीं, सिर्फ दिमाग का खलल है... जैसे –


-------------------------------------------
कभी वो चमकता सितारा था
अब एक ‘ब्लैकहोल’ है !
- हुआ क्या?
किसे पता सिंगुलारिटी में होता क्या है !
- तुम्हारा गणित क्या कहता है?
गणित के समीकरण ही तो जवाब दे जाते हैं...
...निरर्थक तरीके से असीमित विध्वंस.  इंटेलेक्चुअल्स के इश्क़ की तरह !


-------------------------------------------
- अगर मैं ब्लैकहोल में कूद जाऊँ तो?
मरोगी !
- क्या होगा मेरा?
संभवतः... उस अनंत घनत्व में चूर हो विलीन हो जाओ...
- मुझे ये दुनिया छोड़ कहीं और चले जाना हो तो?
पलायन वेग से भाग पाओगी?
- एक बार उस ब्लैकहोल से मिल लूँ फिर
नहीं, पॉइंट ऑफ नो रिटर्न हैं वहाँ...
वहाँ से भागना असंभव...
प्रकाश की गति के लिए भी !


-------------------------------------------
- क्वान्टम उलझन क्या होता है?
रोमांटिक फिजिक्स !
- वो कैसे?
दो कण...  अलौकिक प्रेम की तरह जुड़े होते हैं
जैसे उनका अस्तित्व एक ही हो !
परकृति के उस सूक्ष्मतम स्तर पर स्वच्छंदता भी नहीं होती – अद्वितीय जोड़े !
- अगर दूर हुए तो?
ब्रह्मांड में कहीं भी रहें एक को छेड़ो तो दूसरा भी उसी क्षण प्रभावित हो जाता है !
- ये कैसे हो सकता है?
क्वान्टम इश्क़ !
समझ ही आना होता तो...
पिछली सदी के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क ने इसे ‘भुतहा प्रक्रिया’ न कहा होता !
- तो क्या ऐसा कहने वाले आइन्सटाइन गलत थे?
नहीं...
आस पास जो है सब वैसे मस्तिष्कों के कहे पर चल रहा है
- फिर?
‘बेहतर सच’ आते रहते हैं!
- सच समझ के बाहर कैसे?
गणित और प्रयोग सही कह दे तो भी...
कभी-कभी सच इंद्रियबोध के बाहर होता है !
…at times, truth makes no sense!
- जैसे ?
अगर गणित कहता है कि कोई घटना ब्रह्मांड की उम्र बीतने के बाद होगी तो...


-------------------------------------------
- क्या हम कुछ प्रकाशवर्ष की दूरी तय कर सकते हैं?
हाँ ! कुछ सालों में शायद...
- अगर वहाँ हम एक दर्पण रख आयें तो क्या हम अपना बीते दिन देख पाएंगे?
हाँ !
- हम कोई भी दूरी तय कर पाएंगे?
शायद हाँ..
.... अपनों के बीच आ गयी दूरी का पता नहीं !


-------------------------------------------
- क्या तुम भी टूट सकते हो?
हाँ। हर चीज की एलास्टिक लिमिट होती है...
मेरी भी अनंत नहीं।


-------------------------------------------
- सुना, एक रोबोट को प्रोग्राम किया था इश्क़ करने को?
हाँ और वो कुछ ज्यादा ही आगे निकल गया?
- गलत प्रोग्रामिंग?
...गलत कैसे? इंसान से ही कौन सा संभल जाता है !


-------------------------------------------
- श्रोडिंगर कैट जैसा कुछ होता है?
जैसे... जब कुछ पाने का बहुत मन हो और उसे ना पाने का भी।
मनोवैज्ञानिक उसे अपोरिया कहते हैं !


-------------------------------------------
- क्या कोई और भी ऐसा सोच रहा होगा?
हाँ ! बिलकुल अलग लोग अलग समय-काल में एक जैसा सोचते हैं।
- बहुत अजीब नहीं है?
अगर कुछ बहुत अजीब है तो उसमें कुछ बहुत रोचक भी जरूर होता है।
- सब कुछ गणित का समीकरण तो नहीं होता ! बहुत कुछ अनचाहा समझ के बाहर का भी होता है।
गणित भी तो विकसित होता रहता है। हर जगह अपूर्णता है।
- हमेशा रहेगी?
हाँ।


-------------------------------------------
- तुमने एक बार ‘लॉन्गर दैन फॉरएवर’ सा कुछ कहा था?
हाँ। फाइनाइटनेस का स्ट्रोक लगने के पहले तक।


-------------------------------------------
- क्या पैराडॉक्स हल नहीं होते? जीवन भी ऐसा ही हैं न?
हाँ।
पर कभी-कभी जेनो जैसों को सुलझाने के लिए एक फॉर्मूला ही काफी होता है।


-------------------------------------------
- मुझे खुश रहना है !
पानी के लिए चाँद पर नहीं जाना होता।
- ज्ञानी खुश रहते हैं?
नहीं। अक्सर कर्ण की धनुर्विद्या की तरह।
कलह परमर्शदाताओं के घर भी होता है।
- फिर?
खुश रहने की चिंता में दुखी रहना बंद करो।


-------------------------------------------
- मुझे 'कोई' प्यार नहीं करता !
आईना झूठ नहीं बोलता।
- मतलब?
तुम बुरे तो जग बुरा की तरह। तुम मुस्कुराओ तो 'कोई' भी मुस्कुराएगा ! Smile


-------------------------------------------

बैरीकूल ने कहा था –  भैया, दिमाग के रसायन इधर-उधर हो जाये तो आदमी कुछो सोच कर सकता है !  Smile


--
~Abhishek Ojha~
*based on my twits.
1. इसके लिए कभी लिखा था कि - सिंगुलरिटी में फंक्शन फट जाता है :)


Jul 20, 2013

इंजीनियर साहेब 'भुट्टावाले' (पटना १७)

 

बीरेंदर एक दिन अपने बागान के अमरूद लेकर आया था। मैंने खाते हुए कहा - 'बीरेंदर, अमरूद तो मुझे बहुत पसंद है। इतना कि मैं रेजिस्ट नहीं कर पाता। पर ऐसे नहीं थोड़े कच्चे वाले'। बीरेंदर को ये बात याद रही और अगले दिन हमारे ऑफिस में उसने वैसे अमरूद भिजवाया भी। फिर एक दिन शाम को बोला 'चलिये भईया, आज आपको बर्हीया वाला अमडूद खिला के लाते हैं। टाइम है १०-१५ मिनट?'

मैं कब मना करता! वैसे भी मूड थोड़ा डाउन था। एक स्कीम पर काम करते हुए मैंने उसी दिन लिखा था - "आज मैंने एक रिक्शे वाले से बात की। उसने बताया कि उनका बिजनेस पहले की तरह नहीं रहा। शाम तक उसने सात ट्रिप कर लगभग सौ रुपये कमाए थे। उसमें से चालीस रुपये एक दिन के रिक्शे का किराया । बीवी बच्चो  और बाकी के खर्चे छोड़ भी दें तो साठ रुपये में भी क्या वो इतनी कैलोरी खरीद सकता है कि सात ट्रिप कर सके ?"  मैंने ये बात बीरेंदर को बताई तो बोला 'भईया, ई सब भारी भरकम बात मत किया कीजिये। आपको लगता है उहे सबसे सबसे बरका गरीब था देस का त... छोरिए ई सब... चलिये'।

हम एसपी वर्मा रोड तक चल कर गए। वहाँ बीरेंदर ने एक नौजवान भुट्टे वाले को दिखाया - 'जानते हैं भईया, ई राजेसवा इंजीनियर के सार है। अइसा काम कर देगा कि बरका बरका ओवरसियर, इंजीनियर नहीं कर पाएगा। मारिए गोली अमडूद के चलिये आज भुट्टे खा लेते हैं। अमडूद हम मांगा देंगे किसी को भेज के'। हम राजेश के ठेले के पास रुक गए।

'का हो इंजीनियर साहेब? कईसा धंधा चल रहा है?  दुगो बर्हीया वाला तनी छांट के भूनिए त।'

राजेश शर्मिला सा जवान था। लगभग नहीं बोलने वाला। बैरी ने आगे कहा - 'केतना बोले तुमको की मेरे लिए भी  एक ठो पंखा बना दो लेकिन तुम नहीये बना पाये। '

'अरे बीरेंदर भईया समनवे नहीं नू मिल पा रहा है त कइसे बना दे'

'कौंची नहीं मिल पा रहा है तुमको हम सब बुझ रहे हैं।'  राजेश बस मुस्कुरा दिया। मेरे ध्यान राजेश के सेटअप पर गया। पूरी तरह से अस्थायी। ठेला नहीं  था कुछ लकड़ी लोहे को जोड़कर बनाया गया एक बेस और उस पर

पेंट के डब्बे को काट कर बनाया गया कोयले का चूल्हा। पर इससे कहीं अधिक रोचक था  हरे प्लास्टिक के एक स्टूल पर रखा हुआ बैटरी से चल रहा प्लास्टिक की पत्तियों वाला पंखा। मैंने कहा - 'पंखा तो बड़ा शानदार है राजेश का? कहाँ से लिए?"

'अरे एही पंखवा का त बात हम तबसे कर रहे हैं...  इंजीनियर साहेब अइसही थोरे न कहलाता है राजेस। अभी भुट्टा का सीजन है... नहीं त इंजीनियर साहेब कंप्यूटर ठीक करने का ही काम करते हैं'

मुझे लगा बीरेंदर उसकी खिंचाई कर रहा है। पर वो आगे बोला.. 'प्लास्टिक के दो डब्बा जोड़कर फिल्टर भी बनाते  हैं, हम कहे की भले सौ रुपया ले लो लेकिन एक ठो हमारे लिए भी बना दो। लेकिन अब इंजीनियर साहेब कह दिये हैं त हमरा काम काहे करेगा? सही बोले कि नहीं?

राजेश मुसकुराते हुए बोला - 'बात पईसा के नहीं है। बना देंगे... पहिले डिब्बावा त जुगारिए"

मैंने पूछा - 'कैसे बनाए हो ये पंखा? बहुत शानदार आइटम है। बताओ मुझे भी'

राजेश बोला -- 'सब लपटोपे आ कम्पुटर का समान है इसमें। एक्को पईसा नहीं लगा है इसमें। कुछ इस दोकान से कुछ उस दोकान से पुरान-धुरान बेकार समान सब ज़ोर जार के वैल्डिंग-सोल्डिंग कर के बना लिए...  बहुते सिंपल है।'

मैंने पूछा - 'और बैटरी?' Patna

राजेश ने मुसकुराते हुए थोड़े गर्व से कहा - 'चारजर भी बनाए हैं एक ठो'

राजेश ने मुझे समझाते हुए डायोड, यूपीएस और मदर बोर्ड जैसे शब्द बोले तो मुझे भरोसा हो गया कि सच में वो 'इंजीनियर साहेब' है। मैंने कहा "तुम तो सच में इंजीनियर हो !"

राजेश ने भुट्टा सेंकते हुए कहा - 'हम त कामे इहे करते हैं। इंजीनियर सब त बेकार हो जाता है। इंजीनियरे बन गया त उ काम काहे करेगा?'  बाद में पता चला राजेश पास की दुकानों में कंप्यूटर रिपेयरिंग का काम करता है।

चलते चलते बैरीकूल ने कहा - 'हमसे भी छौ-छौ रुपया के हिसाब से लोगे? लो धरो दस रुपया आ काम कर दो हमारा थोड़ा टाइम निकाल के....'

लौटते हुए बीरेंदर ने कहा 'भईया, हर सीजन में अलग काम करता है ई। जिसमें कमाई दिखेगा कर लेगा। एक नंबर का जुगारु है। देखिये केतना सुंदर सिस्टम बना दिया है। शाम को चूल्हा इहे छोर देगा आ बाकी झाम एगो झोरा में भर के घरे लेले जाएगा। इसका भुट्टा से जादे तो हम इसका अलंजर-पलंजर देखने आते हैं। कुछ अइसा हो तो देखिये के मन हरियारा जाता है। जैसे आपका उ पानी का बोतल नहीं है बटन दबाने से 'पक' से खुलता है। उ टेबल पर रहे त नहियों प्यास लगे त दुई घूंट पी लेने का मन करेगा।'

मैंने बैरी को पानी का बोतल देना चाहा तो उसने नहीं लिया बोला जाते समय दे दीजिएगा.... और जाते आते समय...  ध्यान न रहा।  अब भी जब 'पक' से खुलता है... हम दुई घूंट पानी पी लेते हैं । Smile

इस पोस्ट को बहुत पहले आना चाहिए था पर...

(पटना सीरीज)

--

~Abhishek Ojha~

Jun 1, 2013

भांति भांति के … !

 
(आगे अभद्र भाषा हो सकती है...)

दृश्य १: न्यू यॉर्क में एक इनवेस्टमेंट बैंक का ऑफिस - मैं खुशी से नाचते हुए से एक इंसान को देखता हूँ। वो मुझसे कह रहे हैं कि १० साल पहले खोयी हुई उनकी घड़ी वापस मिल गयी। कुछ पल पहले ही स्विट्ज़रलैंड से घड़ी कंपनी के खोया-पाया विभाग ने उन्हें कॉल कार बताया था कि उनकी घड़ी रिपेयर के लिए आई है। कंपनी वालो के रिकॉर्ड में घड़ी चोरी हुई दर्ज कर दी गयी थी तो उनके पास आते ही पता चल गया - अनबिलीवेबल ! पर जैसे ही मुझे पता चलता है कि वो दस साल पहले बीस हजार डॉलर की घड़ी थी। मैं बस ये सोचने लगता हूँ कि दस साल पहले - बीस हजार डॉलर की घड़ी !  ("तब और अब इनकी सैलरी कितनी होगी !" आप कुछ और सोचते तो पता नहीं, मैंने तो यही सोचा था)

दृश्य २: पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक खचाखच भरी हुई बस में गर्मी से लोग परेशान से हैं... कुछ औरतें सीटों के बीच की जगह में बैठ गयी हैं। बस चलने में हो रही देरी पर कुछ नौजवान धाराप्रवाह में शरीर के कुछ विशेष अंगो का प्रयोग कर कुछ कुछ कह रहे हैं। – "&^*% हमार हौ हौ कईले बाड़े... अब सवारी आइये जायी त हमारा $%^& पर बैठइहें। आव हेईजा बईठा हम चलाव तानी" (ढीला-ढाला अनुवाद: पता नहीं क्या हौ हौ चिल्ला रहा है अब ये। और सवारी आ ही गयी तो अब क्या मेरे <शरीर का एक विशेष अंग> पर बैठाएगा। आके बैठ जा इधर मैं चलाता हूँ।) मैं एक फोन करने के लिए अपना फोन निकलता हूँ तो मेरे बगल में बैठे अधेड़ पुरुष बहुत गौर से मेरे फोन और मुझे देखने लगते हैं। फोन रखने के बाद वो मुझसे पूछते हैं कि फोन कंपनी का है या चाइना मोबाइल है? मैं कहता हूँ कि कंपनी का ही है तो... "तब त बड़ी महंगा होई, ना? " मैं बस हुंकार में उत्तर दे देता हूँ... "काताना के होई? चार हज़ार?"। मैं सोच में पड़ जाता हूँ क्या जवाब दूँ? चार गुना से भी कम कर कहता हूँ - नहीं उससे थोड़ा महंगा है नौ हज़ार का। मैं उनके चहरे पर आश्चर्य देखता हूँ - "बताव त? काइसन जुग आ गइल बा... नवो हज़ार के मोबाईल मिलता नूँ !" (बताओ तो, कैसा युग आ गया है... नौ हज़ार के मोबाईल भी होते हैं न !)

दृश्य ३: मुंबई: अब तक यही फोन रखे हो?  मुझे लगा... फलां वाला मॉडल...

दृश्य ४: मुंबई: पहले दिन ऑफिस जाने के होटल की कार का बिल रू १२४९ + टैक्स। दूसरे दिन कूल कैब – रू ३००। तीसरे दिन ऑटो - रू ५०। दूरी वही...

दृश्य ५: कानपुर: जाड़े की सुबह लगभग ५ बजे। रिक्शे वाले ने कहा एक सवारी ८ रुपया दो सवारी ५-५ रुपया। मेरे सामने ही एक व्यक्ति ये कहते हुए चले गए - "४ रुपया लगता है। ले चलोगे तो बोलो नहीं तो मैं पैदल ही चला जाऊंगा"। और वो एक रुपये के लिए पैदल चले गए। 
--
This part is intentionally left blank. (कभी समझ नहीं आया कि कुछ किताबों में ऐसे लिखे कुछ खाली पन्ने क्यों होते हैं ! पर आज लिखते हुए कुछ बातें ना लिख ऐसे ही खाली छोड़ देने का मन कर रहा है।)
--
दृश्य ६: "तू मुंबई आ रहा है? मैं उस वीक आईटीसी मराठा में रहूँगा.... पर वहाँ से तो बहुत दूर है तेरा होटल। एक काम कर अपने दिल्ली-मुंबई के फ्लाइट डिटेल्स भेज दे... सेम फ्लाइट में मैं भी चलूँगा वो बैटर रहेगा !" वक़्त और दूरी का हिसाब और कीमत... इस स्टेटमेंट में कई बातें दिखती हैं...

दृश्य ७: ऐसे दोस्तों के साथ हूँ जो साबित कर देते हैं कि साथ पढे सभी दोस्तों में सबसे खराब वित्तीय हालत उसकी है जो.... भारत सरकार में क्लास वन ईमानदार ऑफिसर है। अपने अपने पैमाने हैं - कौन राजा कौन फकीर !

दृश्य ८: वाराणसी जंक्शन: एक पिता पुत्र का वार्तालाप सुन रहा हूँ, जो रात को इसलिए आ गए थे क्योंकि सुबह जल्दी काम था। रात स्टेशन पर बिताई, खाने के लिए सत्तू घर से लेकर आए थे और अब काम निपटा कर वापस जाने वाली पैसेंजर का इंतज़ार कर रहे थे। पुत्र एक कोल्डड्रिंक की प्लास्टिक वाली बोतल ले आया था तो पिता ने उससे कहा - जा दुकानदार से दो प्लास्टिक के ग्लास मांग कर ले आ। बेटा वापस आया - "नहीं दे रहा, पैसे मांग रहा है - दो रुपये"। बाप ने झिड़क कर  - "जा मांग के ले आ... चालीस रुपया लिया है दो ग्लास भी नहीं देगा।" बेटा जाना नहीं चाहता... बाप को लगता है कि ये किसी काम का नहीं ... एक हम थे ! फिलहाल मुझे याद आ रहा था... कुछ दिनों पहले ही मेरे साथ किसी ने कहा था - "पैसे ले लो लेकिन कोल्ड ड्रिंक सोडा नहीं चाहिए... बस ग्लास दे देना"।

दृश्य ९: मेरे एक दोस्त अंततः उस रैस्टौरेंट में डिनर कर ही आए.... दारू नहीं पीते तो बस दो लोगों के खाने का टिप और टैक्स मिलाकर ४८० डॉलर। मैंने कहा मैं तो कभी नहीं जा पाऊंगा... कोई और पे ना करे तो... हाँ, अगर कोई 'वैसी' कंपनी हो <एक कंपनी विशेष की खास मॉडलस और कुछ होलीवूड की हीरोइन के नाम> तो सोचा जा सकता है जीवन में एक बार। ... उन्होने बताया फिर ये जगह 'चीप' हो जाएगी !

.... खैर... रोने धोने की बात नहीं है। हमारे एक बहुत सीनियर कलीग कहते हैं [वो अङ्ग्रेज़ी में कहते हैं :) तो आप वैसे सोचिएगा जैसे टीवी ब्रांड्स वाले डबिंग करके दिखाते हैं]- एक जमाना था जब मेरे अकाउंट में तेरह डॉलर थे, मेरी एक सप्ताह की बेटी थी और उतने में मुझे पूरे सप्ताह का खर्चा निकालना था। तब मुझे अपने अकाउंट में बैलेंस चेक करने की हिम्मत नहीं होती थी। बैलेंस मैं अब फिर नहीं चेक करता पर.. दोनों में बहुत अंतर है! ] - वो ये भी कहते हैं कि - "मुझे इस देश ने मौका दिया दान नहीं ! दान दिया होता तो शायद मैं किसी काम का नहीं बचता।" बाई द वे... ये वही घड़ी वाले भाई साहब हैं !

चलते-चलते ... वो जो बस में भाई साहब मिले थे  उन्होने दो बातें बताई थी मुझे एक तो ये कि आजकल स्कूल और ईंट भटठे की खेती बहुत हो रही है उत्तर परदेश में। पहले धनी लोग बड़े किसान होते थे अब वो यही दो काम करते हैं। और स्कूल का तो ऐसा है कि घर से दूर और फीस ज्यादा हो तो वो स्कूल उतना ही अच्छा लगता है। तो लड़के आजकल जिले के एक छोर से दूसरे छोर पर पढ़ने जाते हैं - इधर वाले उधर और उधर वाले इधर। लेकिन पढ़ाई सब स्कूल में एक्के है।

और दूसरी बात ये कि... लड़के स्कूल में आजकल टाई तो लगाते हैं लेकिन जब थोड़े बड़े हो जाते हैं तो ऊपर से गमछा भी लेते हैं... और वैसे इसमें कोई हर्जा भी नहीं है  :)

PS: सच बातें हैं... बस 'मैं' की जगह कोई और हो सकता है कुछ दृश्यों में :)
--
~Abhishek Ojha~

May 22, 2013

हम दुबेजी बोल रहे हैं !

 

"हैलो सर ! हम मेरु कैब से दुबेजी बोल रहे हैं" जिस सम्मान और गर्व के साथ दुबेजी ने अपना नाम लिया मन किया कहूँ - "दुबे जी प्रणाम !"

नाटे कद के काली-सफ़ेद दाढ़ी और लंबे बाल वाले दुबेजी  "हरी ॐ" और "शिव-शिव" करते हुए 12.30 की जगह एक बजे पहुँचे।

"बताइये न मीटर ऑन करना भी भूल गया ! घोडा घास की दोस्ती हो गयी ये तो" थोड़ी देर बाद दुबेजी ने मीटर ऑन करते हुए कहा।

"कुछ बोल नहीं पायी आज ये... इसका ताम-झाम थोड़ा गड़बड़ हो गया है नहीं तो बड़ा बढ़िया बेलकम करती है। अपना मेरु कंपनी का बड़ाई करती है अच्छे से।" - दुबेजी ने मीटर की ओर इशारा किया।  "कल इसको ठीक कराना पड़ेगा। हैंग हो गया है... पैसा जोड़ देगी लेकिन रसीद नहीं निकलेगा। लेकिन आपको चाहिए तो आप कस्टमर केयर पर फोन कर दीजिएगा ईमेल में आ जा जाता है आजकल। आपको कोई असुविधा नहीं हो तो पहले ही बता दिया हमने"।

"कोई बात नहीं चलिये"

"इतनी रात को आप क्यूँ चले? कोई रास्ता पूछने के लिए भी नहीं मिल रहा था मुझे। 12 के पहले निकल लेते तो नाईट चार्ज भी बच जाता आपका। किस रास्ते से ले चलें ?"

"रास्ता आप देख लीजिये। मुझे आइडिया नहीं है... जिधर से कम समय लगे ले चलिये। नाईट चार्ज का क्या करें... आने का प्लान तो जल्दी ही था लेकिन लेट हो गया। बात करते करते पता ही नहीं चला"

"हो जाता है..." उसके बाद दुबेजी भजन गाने लगे... "मेरा आपकी दया से... "

"आप अपनी गाड़ी में बाजा लगवा लीजिये" मैंने कहा।

"बाजा के लिए कंपनी का मनाही है। पहले बाजा होता था। लेकिन बहुत कस्टमर कम्पलेन करने लगा कि एक्सिडेंट हो जाता है। सही बात भी है कुछ ड्राइवर जोश वाला होता है... खासकर बीस से तीस एज का नौजवान का जो है गरम खून होता है। उसमें भी कोई वैसा सवारी लड़की जनाना हो तो... अच्छा फैसला है कंपनी का"

जौनपुर के दुबेजी मेरु के पहले मुंबई में पीली-काली पद्मिनी टैक्सी चलाते थे। उन्होने गाड़ी रोक चाय का निमंत्रण दिया और  हम चाय पीने चले गए। वहाँ कुछ लोग बात कर रहे थे कट्टरपंथी लोगों की तो दुबेजी ने कहा - "देखिये ऐसा है कि नशा ऐसा कि... जैसे इश्क़ में सिनेमा दिखाओ चाहे भजन एक ही बात दिखता है वैसे ही कट्टरपंथी को भी बस अपना बात ही दिखता है। और बेवकूफ ऐसा कि सब्जी लेने भी जाये और मोल भाव में कहे कि 10 रुपये नहीं आठ रुपये। और सब्जीवाला अगर कह दे कि नहीं साहब 5 रुपये में ले जाओ तो भी वो कहेगा कि नहीं मुझे आठ रुपये में ही चाहिए !"

चाय पर ही उन्हें पता चला कि मैं बैंक में काम करता हूँ। तो उन्होने पूछा कि - "केशियर हैं कि कलर्क?"

मैंने बताया कि कुछ इनवेस्टमेंट से जुड़ा काम होता है। पहले उन्हें थोड़ी सहानुभूति हुई कि "प्राइवेट" नौकरी है पर फिर उन्होने मामला संभाला - "सर हम बताएं? इनवेस्टमेंट तो बस समय, जगह और भाग्य का खेल है... मेरे हिसाब से सही समय पर सही जगह प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट कर दीजिये भाग्य चल गया तो... इससे अच्छा कुछ नहीं है। बाकी आप लोग अब जो करते हों।" उन्होने एक लाइन में मेरी नौकरी का कच्चा चिट्ठा खोल दिया और असहमति का सवाल ही नहीं था !

"वैसे एक बात बताएं सर? एक नंबर पर जो है वो बैंक का ही नौकरी होता है। वो क्या है कि... पैसा मिले न मिले दिन भर रहना तो पैसे के बीच में ही होता है। अब कोई नौकरी तो पैसे के लिए ही करता है न? संतोष हो जाता है पैसा देख देख के। और दो नंबर पर जो है वो है मास्टर। कोई कितना भी बड़ा जज-कलक्टर बन जाये अपने शिक्षक के सामने तो सर झुकाएगा ही। है कि नहीं?  और तीन नंबर पर जो है...  तीन नंबर... देखिये न... जबान से ही उतर गया... तीन नंबर ? क्या था?..." अंत तक तीन नंबर जबान पर आ ही नहीं पाया दुबेजी के।

इस बीच दुबे जी ने कहा - "जा! देखिये न ध्यान ही नहीं रहा और रास्ता लग रहा है गलत ले लिया मैंने" दुबेजी ने गाड़ी वापस ले ली और हम वापस चाय की दुकान पर आ गए। "ऑटो वाले को पता होगा रुकिए पूछते हैं"। उन्होने कहा तो मैं सोच रहा था कि रास्ता तो टैक्सी वाले को भी पता होना चाहिए पर कुछ कहा नहीं... मीटर देखा और मन ही मन सोचा कि दुबेजी ने कम से कम सौ रुपये मीटर तो बढ़ा ही दिया रास्ते के चक्कर में।

"एलएनटी तो यही है देखिये न आपका होटल यहीं कहीं होगा। गया कहाँ?" इस बार रास्ता सही था और होटल वहीं था जहां उसे होना चाहिए। "यहाँ आपके कंपनी ने रखा है?" मैंने कहा हाँ तो दुबेजी ने कहा - "तब बढ़िया कंपनी है।"

उतरने पर दुबेजी ने कहा "सर आप उतना ही किराया दीजिये जितना देते हैं। बीच में गलत रास्ते का कम कर देते हैं"

मैंने कहा - "कोई बात नहीं। आपने जानबूझ कर गलत रास्ता नहीं लिया था। आपकी गाड़ी तो चली ही और मुझे पता भी नहीं कितना किराया होता है।"

दुबेजी ने 100 रुपये लौटाते हुए कहा - "आपको जल्दी थी फिर भी आपने चाय के लिए हमें समय दिया उसके लिए धन्यवाद और हम नाजायज पैसा नहीं लेते। आपसे मिलकर हमें बहुत अच्छा लगा।"

दिल्ली का एक ऑटो वाला... "पैसा क्या लेना यार मैं तो घर जा रहा था लिफ्ट समझ लो"  और मुंबई के दुबेजी... यूंही याद आ गए आज :)

--

~Abhishek Ojha~

Mar 14, 2013

स्पेशली मेड फॉर...

 

6-8 महीने पहले जोश में आकर नए जूते लिए गए - स्पेशली मेड फॉर रनिंग।

पहली बार पहना तो अच्छा सा लगा। लगा सच में दौड़ने-भागने के लिए ही बनाए गए हैं। बचपन में हमारे मुहल्ले के एक चाचा जब  नयी नवेली रिलीज हुई हीरो होंडा स्प्लेंडर पर पहली बार बैठे तो उन्होंने अपने बेटे से कहा था - "बेटा, ये वाली मोटरसाइकिल खरीद दे मेरे लिए। चलाकर ऐसा लगा मानो कम से कम पांच साल तो जवान हो ही गया मैं !" उतना तो नहीं पर वैसा ही कुछ फील हुआ। पर सर्दियों का मौसम और आलस... जूते पड़े ही रहे। कभी पहना भी तो कंक्रीट, कारपेट, ट्रेडमिल और लकड़ी के फर्श  के अलावा कहीं और रखे नहीं गए। कभी मिट्टी से संपर्क नहीं हो पाया उनका। वैसे भी न्यूयॉर्क में एक 'मिट्टी पर चलना' छोड़ दें तो सब कुछ बड़ी आसानी से मिलता है। जूतों का रंग रूप वैसे का वैसा चकाचक बना रहा !WP_20130309_002[1]

पिछले सप्ताहांत जब धुप निकली और एक मित्र भी मिल गए तो पार्क तक जाने का कार्यक्रम बन गया । रास्ता कंक्रीट का ही था। पर हुआ कुछ यूँ कि सैंडी देवी के प्रकोप से लकड़ी का एक पूल टूट गया था वो अब भी निर्माणाधीन ही है। अब हमें या तो बहुत लम्बा रास्ता लेना पड़ता या... मिट्टी, घास, पानी, कीचड़ और बर्फ वाला छोटा रास्ता। रास्ता क्या था... हमें ही बनाना था। हम कोई नवाब तो हैं नहीं तो हमने रौंद दिया।

अपना क्या है... हम तो कैसे भी रह लेते हैं  ! बचपन में बरसात के बाद कभी खेत की मेढ़ों पर चलते तो काली मिट्टी पैरों में यूँ लिपटती थी की... खैर वो फिर कभी। फिलहाल हम बहुत खुश थे लेकिन जब जूतों की तरफ देखा... मेड फॉर रनिंग ! बनाए ही गए हैं इस दिन के लिए. सब कुछ झेलने के लिए - ढेर सारे रिसर्च के बाद। जैसे क्रमिक विकास के बाद हमारे और अन्य जानवरों के शरीर प्रकृति के अनुकूल होते हैं कुछ वैसे ही।  पर बेचारों के रंग रूप और हालत देख दया आई। कोई शिकायत नहीं ...'स्पेशली मेड' तो थे ही और ऐसा भी नहीं कि टूट गए या चलने में दिक्कत हुई हो। लेकिन ऐसा लगा कि दस दिन ऐसे पहन लो या गलती से कहीं अगर पहन कर गाँव के इलाके में चले जाओ तो बैरीकूल कहते - "इ सब जूता के बस का नहीं है यहाँ झेल पाना। इ सब उहें पहनियेगा" । जब से बने चकाचक शोरूम के एसी में पड़े रहे।  बिक जाने के बाद भी शान में कुछ कमी तो हुई नहीं। पहली बार जमीन पर पड़े थे... बिकने के पहले तो खैर जूते होते हुए भी हाथो हाथ ही लिए जाते थे! खुद को भी पता नहीं रहा होगा कि पैरों में रहने के लिए बनाए गए हैं! बेचारे जूतों की क्या गलती ! किस्मत ही ऐसी पायी ...मैंने अपने मित्र से कहा - "यार, मेरे जूतों को ऐसी जमीन पर चलने की आदत नहीं है। इनकी हालत देखी नहीं जा रही मुझसे"  Smile.  ...जूते अगर मेरी सोच सुन रहे होते और बोल सकते तो पक्का गरिया देते कि साले हम तो बने ही इसी के लिए हैं... कोई और जानवर  कहे तो समझ में आता है लेकिन तुम इंसान? ! दिमाग में ये जवाब आया तो वो खुद शांत हो गया । इंसानी दिमाग है... न बोलने वाले से भी बुलवा लेता है. और पता नहीं क्या क्या ऊटपटाँग सोचता रहता है ।Smile

इंसानी दिमाग... चला गया कुछ साल पहले जब हम पुणे में रहा करते थे। कभी कभार हम कुछ झोपड़ियों में बच्चों को पढ़ाने चले जाते और कभी कोंकण के ऐसे समुद्री तटों पर जहाँ उन दिनों केवल बीएसएनएल का नेटवर्क आता था - यानी हमारे मोबाइल नहीं चलते। हमारे साथ अक्सर ड्यूड-ड्यूडनी प्रजाति के भी लोग होते - उन जूतों की तरह ही स्पेशली मेड फॉर लिविंग ऑन अर्थ ! पर रनिंग-रनिंग ते सौ गुनी... का फर्क भी होता है न। कुछ जूते मोची के यहाँ सिल पड़े होते हैं... रफ। सुना है किसी जमाने में पहनने के पहले  सरसों तेल में डूबा के रखना होता था... ऐसे भी जूते होते थे। और 'स्पेशली मेड' तो खैर देखा ही है !

हमारे साथ वाले अक्सर कहते कि - इन झोपड़ियों और गाँवों में रहना कितना सुकून भरा होता है न। कितनी अच्छी किस्मत है इन लोगों की... सब कुछ प्राकृतिक ! पोल्यूशन नहीं ...सुकून की जिंदगी... कोई झंझंट नहीं... हेवेनली ! वॉव ! ...वगैरह वगैरह। मुझे सारी बातें तो याद नहीं पर आपके पास भी इंसानी दिमाग है... आप यहाँ कुछ 'वगैरह' खुद जोड़ सकते हैं. Smile
मैं और मेरे एक बनारसी दोस्त कुछ कहते तो नहीं पर आपस में हम बात जरूर करते कि एक बार ऐसे रहना हो तो इन्हें पता चले। हमें लगता कि उन्होने वास्तविकता देखी ही कहाँ है ! उन्हें तो उन जूतों की तरह पता भी नहीं होता कि ....खैर ... खेतों में लगी फसलें न पहचानने वालों का हम मजाक उड़ाते हुए कह देते कि अरे गेंहू तो फैक्ट्री में बनता है। आप माने न माने एक दिल्ली के लड़के ने मानने से इनकार कर दिया था कि गुड (गुड़) मिल में नहीं बनता ।

वैसे हमारे और उनमें कोई फर्क तो होता नहीं था... सब साथ जाते, एक जगहों पर रहते। बनाए गए तो वो भी हैं हमारी ही तरह कहीं भी रहने को... पर उन जूतों की तरह - "झेल न पायेंगे ! " वाली बात लगती। ऐसा नहीं कि मेरे जूते झेल नहीं पाएंगे पर ... उनका रंग रूप देखा नहीं जाता :)

हम दोनों अक्सर बात करते कि हम दोनों में से किसने ज्यादा देहाती जीवन देखा और जीया है। खैर हम तो सबकी तरह यही सोचते रहे कि बाकी क्या रह पायेंगे ऐसी जगहों पर और अपना क्या है... हम तो रह ही लेंगे। एक ऐसे ही दिन कोंकण में कहीं हम गाडी के अन्दर बैठे जा रहे थे। सड़क पर एक भैंस जा रही थी तो गाडी धीरे करनी पड़ी। ... भैंस ने सर झटका और मैंने फ्रंट सीट पर बैठे बैठे अपना सिर झटक कर किनारे कर लिया। कार का सीसा बंद था। मेरे बनारसी मित्र ने तुरत कहा - "ओझा ! यही गाँव में रहे हो? ! आज पता चल गया कितना रहे हो।" Smile

बाकी इसके बाद हमने डिफेंड किया ही होगा... आप समझ ही गए... इंसानी दिमाग आप भी रखते हैं !

हम अपने को लेकर बहुत कुछ सोचते हैं... दूसरों को लेकर भी। पर दूसरों की तो छोडिये अपने बारे में भी कहाँ पता होता है कि हम क्या हैं ! वैसे जो गरीबी, झोपड़ी, गाँव वगैरह को देख... हेवेंली और वॉव ! कहते है... मैं उन्हें अब भी 'स्पेशली मेड फॉर' की श्रेणी में ही रखता हूँ - वो झेल न पायेंगे :)

--

~Abhishek Ojha~

Feb 18, 2013

नए जमाने के विद्वान (पटना १६)

 

एक दिन शाम बीरेंदर ने कहा - "चलिये भईया आज थोड़ा घूम-टहल के आते हैं, चाय तो रोजे पीते हैं। आज गांधी मैदान साइड साइड चलते हैं। बिस्कोमान भवन के पास भी जूस वाला सब ठेला लगाता है।" हमें कोई ऐतराज तो होना नहीं था अभी थोड़ी दूर ही चले थे कि सदालाल सिंग दिखे। बैरी ने हमेशा की तरह उनकी चुटकी ली और मुझसे बोला - "एकरा बारे में तो आप जानिए रहे हैं। ई जिस कटेघरी का सायर है उसी कटेघरी का आजकल बिदवान-बिसेसज्ञ भी होता है।"

"फेसबूक-ब्लॉग पर लिखने वालो की बात तो नहीं कर रहे? " मैंने तुरत पूछा।

"आप धर लिए भईया। वईसे फेसबूक-ओसबूक तो सब भरल है अइसा आदमी से लेकिन ओइसा आदमी हर जगह है। अइसा अइसा बिदवान कि कुछ का कुछ, माने कुछ भी  बोल सकता है। फूल कन्फ़िडेंस में.... आ अपने हिसाब से उ गलत भी थोड़े होता है। "

"अपने हिसाब से माने?"

"अब देखिये। हमारा गाँव का एक ठो लरका दिल्ली गया था काम करने। लौट के आ रहा था त उ सुना होगा किसी को इलाहाबाद स्टेसन पर बतियाते कि वहाँ से गया जाने का कोई डायरेक्ट गारी है। त हुआ का कि एक दिन गाँव में कोई बात कर रहा था गाया जाने का त उ बोलता है कि - इलाहाबाद चले जाओ वहाँ से सीधा सुपर फास्ट मिलेगा गया का। अब उ त सहीये कह रहा है। आ गाँव वाले को भी लगा कि लरका दिल्ली रह के आया है उसको त सुपर फास्ट भी पता है त सहिए कह रहा होगा ! हो गया सदालाल सिंग ब्रांड बिदबान ! आ उसी में जिसको पता है कि पटना से गया जाना है तो... समझ गए न आप ? साला उ इलाहाबाद का करने जाएगा ?"

"हा हा हा , यार तुम इतना सॉलिड एक्जाम्पल देते हो कि अब क्या कहें..."

"आरे नहीं भईया हसने का बात नहीं है। सच्ची बात है। कसम से ! बना के नहीं बोल रहे हैं। आजकल नया जमाना का अइसा अइसा बिदवान हो गया है। जानते हैं पहिले हम टीबी बड़ा ध्यान से देखते थे लेकिन धीरे धीरे हमको बुझाया कि जो जेतना जादे टीबी पर दिखता है ओतने बड़ा सादलाल सिंग ब्रांड बिसेसज्ञ होता है। देखिये हम जादा पर्हे लिखे नहीं है लेकिन जब उ सब अर्थबवस्था आ ग्लोबल बारमिंग जैसा सब्द बोलता है न त हमको एकदम कीलियरे दिखता है कि उसको कुछों नहीं आता है। हम गारंटी से बोल सकते हैं कि उ सब से जादे तो सदालाल सिंगवा को सायरी आता है। आ टीवी का तो का कहें...  हिंहे खरा हो के  सब जो रोज बोलता है 'पटना ब्यूरो'... हम नहीं जानते हैं उ सब को... साला अइसा अइसा भी है कि मजबूरी में बिसेसज्ञ बन गया है सब... और कुछ करने लायक हइए नहीं था... "

"मजबूरी में विद्वान और विशेषज्ञ बन जाना तो अल्टिमेट है बीरेंदर ! गज़ब है। "

"अल्टिमेट नहीं भईया, अब हम त आप जानबे करते हैं कि केतना मजा लेते हैं।  एक दिन मेरा मुहल्ला में सब कोई टीबी पर पैनल डिस्कसन देख के बतिया रहा था क्राइम पर। अर्थसास्त्र, राजनीति, साहित्य ये, वो, सिनेमा कुछों कारन दे रहा था। हम एकदम सिरियस होके बोल दिये कि कल एक ठो इन्टरनेट पर आर्टिकल पढे हैं कि ग्लोबल बारमिंग सबसे बरा कारन है क्राइम का... आ मजा का बात देखिये किसी को नहीं लगा कि हम मज़ाक कर रहे हैं। सबको लगा कि बीरेंदरवा सही में पढ़ा होगा इंटरनेट पर। आधे को इंटरनेट नहीं पता था बाकी सब को ग्लोबल वरर्मिंग। आ शुरू में एक दू ठो को मज़ाक लगा पर बाद में सब सीरियसली सुनने लगा ! जाम के समझाये भी हैं हम। आ सही भी है जो उ सब टीबीया पर बोलता है उससे हम कम सच थोरी बोले थे? त जो टीबी पर आता है उसब को त सब सीरियसली लेगा ही। उ बात अलग है कि कोई समझदार हमको सुना होता त या त हमको थपरिया देता नहीं  त अपना मूरी पटक के मरिए गया होता।"

"हा हा यार कह तो बिलकुल सही रहे हो पर कुछ सही में विशेषज्ञ भी तो होते ही हैं।"

"हाँ लेकिन आपको एक और मजेदार बात बताते हैं उसमें से बहुत सारा जो है उसको लगता है कि उ सच में बिदवान है। अब धीरे धीरे बिदवान का माने ही यही हो रहा है। जब छोटे थे तो सक्तिमान देख के हम लोग उंगुली घूमा के लगता था उड़िए जाएँगे हावा में उहे हाल ई विदबान सब का भी  है। हवा में उंगुली घूमा के अपना आप को सक्तिमान बुझता है।"

"यार इस मामले पर तो तुमसे लंबी बात हो सकती है" मैंने कहा।

इसी बीच बीरेंदर को जानने वाले कोई ठीकेदार मिले। तीन चार लोगों के साथ वो रिवोल्विंग रेस्टोरेन्ट डिनर करने जा रहे थे। बीरेंदर ने कहा "बरी माल कमाए हो, चलो हम भी आते हैं थोरी देर में" ।  थोड़ी देर उनसे बीरेंदर ने बात की तो बात बदल गयी। और पता नहीं कहाँ से बातें "वाद" पर आ गयी। बहुत सी बातें हुई। उन लोगों पर जो हर बात में अपना 'वाद' ही देखते हैं। सामने वाला चाहे जो कहे। सारे तर्क और सिद्धांतों का नाम देते हुए, जिनका उनकी कही गयी बातों से कोई लेना देना तक नहीं होता। बैरी ने बताया  कि 'विद्वान' और 'वादी' होना भी एक प्रोफेशन हो चला है –फैशन और स्टाइल।

इन्हीं संदर्भों में एक उदाहरण उसने दिया था - "भईया, हमारे साथ एक ठो लरका पर्हता था। उ बस एक मगरमच्छ पर निबंध रट लिया था आ कुछो आ जाए परिछा में उहे लिख के आता था। एक बार आ गया महात्मा गांधी पर लिखने को । हम खुश हुए कि साला इस बार देखते हैं का लिखता है । बाहर आए त उ बोला कि साले इसमें क्या है ! गांधीजी सुबह नदी किनारे घूमने जाते थे तो नदी में उनको मगरमच्छ दिखबे करेगा ! आ फिर लिख आया उ मगरमच्छ पर... ओइसही है आजकल का जादेतर बिदवान-बिसेसज्ञ आ वादी सब"।

फिर हम थोड़ी देर के लिए रिवोल्विंग रेस्टोरेन्ट भी गए। वहाँ किसी को फोन पर जोश में चिल्लाते हुए सुना था - "कब तक आओगे बे तुम लोग, बरी मजा आ रहा है, जल्दी पहुँचो हम लोग गोलघर क्रॉस कर रहे हैं"।

मेरी मुस्कुराहट देख बीरेंदर ने समझाया कि वो झूठ नहीं बोल रहे हैं जब आए होंगे दूसरी तरफ होंगे अब घूम कर इधर आ गए हैं तो उन्हें गोलघर और गंगा किनारे का व्यू दिख रहा है उन्हें Smile वो सच में गोलघर क्रॉस कर रहे थे !

(पटना सीरीज)

--

~Abhishek Ojha~

Jan 1, 2013

…there was no one left to speak for me.

 

सच कहूँ तो इस मुद्दे पर मैंने कहीं कुछ नहीं लिखा, कोई पसंद नहीं, कोई टिप्पणी भी नहीं। इससे जुड़ी खबरें भी ठीक से नहीं पढ़ पाया। लोगों ने मुझसे कुछ कहना भी चाहा तो मैंने मना कर दिया । एक तो मुझे हर किसी की बात में लगा कि वो बस इस मुद्दे पर भी कुछ कह कर पसंद और टिप्पणी ही गिन रहे हैं। सारी बहस बेकार लगी। मीडिया के टीआरपी बटोरने जैसी। बहुत कम लोगों की बातों में ईमानदारी और सच्ची चिंता दिखी। कुछ भी कहा लोगों ने... या तो मुझे इतनी समझ नहीं या लोग सच में हर बात पर कुछ भी कह 'हीरो' बनना चाहते हैं । मुझे हर बात से चिढ़ होती गयी... मुझे अपने से भी चिढ़ हुई। इस बात से भी चिढ़ हुई कि मुझे किसी और के कुछ कहने से भी क्यूँ चिढ़ हो रही है - मैं तो वो भी नहीं कर रहा ! लोगों की मेहनत और प्रयास देख भी... खासकर मुझे फेसबूक पर लोगों का लिखना... । मुझे पता है सब वैसे नहीं... पर... जो लगा वो लगा !

  अपने ऐसा होने पर मुझे  जॉन वॉन न्यूमैन का कहा याद आता रहा। एटम बम के आविष्कार के दिनों में उन्होने रिचर्ड फेयनमन से कहा था - You don't have to be responsible for the world that you're in. वैसे शायद निराशा और चिढ़ बस इस एक खबर से नहीं...  हर एक बात से... और मुझे लगा कि ऐसी हर दिशा से आने वाली निराशा से इंसान सामाजिक रूप से गैर जिम्मेदार भी बन सकता है।

दरअसल ऐसी खबरें और बातें पढ़ते हुए कुछ चेहरे दिमाग में आते हैं... उनके जिन्हें आप बहुत प्यार करते हैं। उन बच्चियों, लड़कियों और महिलाओं के... जिन्होने सिर्फ हमें नहीं हमारी रूह पर असर डाला होता है. एक पुरुष होकर मैं जो हूँ - उनसे हूँ।  एक आम इंसान कहीं न कहीं स्वार्थी होता ही है उसे सबसे पहले बस अपने लोगों की याद आती है। पुणे में जब जर्मन बेकरी बम धमाके के बाद लोगों के फोन आए तो मुझे समझ नहीं आया था कि मुझे अच्छा लगना चाहिए या बुरा... खैर... वैसी खबर पढ़ते हुए ऐसे चेहरे याद आते हैं जो उस अनजान चेहरे की जगह हो सकते थे ... और फिर आप सुन्न हो जाते हैं... आगे की खबर पढ़ पाने की हिम्मत मुझमें तो नहीं बचती।

बहुत सी बातें है... फिर लग रहा है क्या फायदा बकबक का। आप भी सब जानते हैं। पता नहीं कितने कारण और कितने समाधान चर्चा में रहे इस घटना के बाद और कब तक रहेंगे।  कल न्यू यॉर्क टाइम्स में एक आर्टिकल में ये लाइने पढ़ी -

In India’s conservative society, male sexual aggression is portrayed in unexpected ways. In Bollywood films, kissing on screen is still rare and nudity forbidden. But the rape scene has been a staple of movies for decades. And depictions of harassment often have an innocent woman resisting nobly, but eventually succumbing to the male hero. One commonly used term for sexual harassment is “eve-teasing,” which critics say implies the act is gentle and harmless.

और ऑफिस में किसी ने एक आर्टिकल भेज मेरा व्यू मांगा।

आप भी मेरी तरह सुन्न हैं तो पढ़िये ये लाइनें -

First they came for the communists,
and I didn't speak out because I wasn't a communist.

Then they came for the socialists,
and I didn't speak out because I wasn't a socialist.

Then they came for the trade unionists,
and I didn't speak out because I wasn't a trade unionist.

Then they came for the jews,
and I didn't speak out because I wasn't a Jew.

Then they came for the catholics,
and I didn't speak out because I wasn't a catholic.

Then they came for me,
and there was no one left to speak for me.

Fast Track Court

गिरिजेशजी ने कहा था कि 01 जनवरी को इस पर कुछ लिखूँ। इस पर इतना कुछ लिखा जा सकता है कि... कुछ लिख नहीं पाऊँगा। उन्होने भागीरथ प्रयत्न किया है आप अगर ये पढ़ रहे हैं तो उन्हें कृपया जरूर पढ़ें। इस पोस्ट को लिखने का मकसद सफल होगा - बलात्कार के विरुद्ध फास्ट ट्रैक न्यायपीठों हेतु जनहित याचिका

--

~Abhishek Ojha~