Showing posts with label Pune. Show all posts
Showing posts with label Pune. Show all posts

Mar 14, 2013

स्पेशली मेड फॉर...

 

6-8 महीने पहले जोश में आकर नए जूते लिए गए - स्पेशली मेड फॉर रनिंग।

पहली बार पहना तो अच्छा सा लगा। लगा सच में दौड़ने-भागने के लिए ही बनाए गए हैं। बचपन में हमारे मुहल्ले के एक चाचा जब  नयी नवेली रिलीज हुई हीरो होंडा स्प्लेंडर पर पहली बार बैठे तो उन्होंने अपने बेटे से कहा था - "बेटा, ये वाली मोटरसाइकिल खरीद दे मेरे लिए। चलाकर ऐसा लगा मानो कम से कम पांच साल तो जवान हो ही गया मैं !" उतना तो नहीं पर वैसा ही कुछ फील हुआ। पर सर्दियों का मौसम और आलस... जूते पड़े ही रहे। कभी पहना भी तो कंक्रीट, कारपेट, ट्रेडमिल और लकड़ी के फर्श  के अलावा कहीं और रखे नहीं गए। कभी मिट्टी से संपर्क नहीं हो पाया उनका। वैसे भी न्यूयॉर्क में एक 'मिट्टी पर चलना' छोड़ दें तो सब कुछ बड़ी आसानी से मिलता है। जूतों का रंग रूप वैसे का वैसा चकाचक बना रहा !WP_20130309_002[1]

पिछले सप्ताहांत जब धुप निकली और एक मित्र भी मिल गए तो पार्क तक जाने का कार्यक्रम बन गया । रास्ता कंक्रीट का ही था। पर हुआ कुछ यूँ कि सैंडी देवी के प्रकोप से लकड़ी का एक पूल टूट गया था वो अब भी निर्माणाधीन ही है। अब हमें या तो बहुत लम्बा रास्ता लेना पड़ता या... मिट्टी, घास, पानी, कीचड़ और बर्फ वाला छोटा रास्ता। रास्ता क्या था... हमें ही बनाना था। हम कोई नवाब तो हैं नहीं तो हमने रौंद दिया।

अपना क्या है... हम तो कैसे भी रह लेते हैं  ! बचपन में बरसात के बाद कभी खेत की मेढ़ों पर चलते तो काली मिट्टी पैरों में यूँ लिपटती थी की... खैर वो फिर कभी। फिलहाल हम बहुत खुश थे लेकिन जब जूतों की तरफ देखा... मेड फॉर रनिंग ! बनाए ही गए हैं इस दिन के लिए. सब कुछ झेलने के लिए - ढेर सारे रिसर्च के बाद। जैसे क्रमिक विकास के बाद हमारे और अन्य जानवरों के शरीर प्रकृति के अनुकूल होते हैं कुछ वैसे ही।  पर बेचारों के रंग रूप और हालत देख दया आई। कोई शिकायत नहीं ...'स्पेशली मेड' तो थे ही और ऐसा भी नहीं कि टूट गए या चलने में दिक्कत हुई हो। लेकिन ऐसा लगा कि दस दिन ऐसे पहन लो या गलती से कहीं अगर पहन कर गाँव के इलाके में चले जाओ तो बैरीकूल कहते - "इ सब जूता के बस का नहीं है यहाँ झेल पाना। इ सब उहें पहनियेगा" । जब से बने चकाचक शोरूम के एसी में पड़े रहे।  बिक जाने के बाद भी शान में कुछ कमी तो हुई नहीं। पहली बार जमीन पर पड़े थे... बिकने के पहले तो खैर जूते होते हुए भी हाथो हाथ ही लिए जाते थे! खुद को भी पता नहीं रहा होगा कि पैरों में रहने के लिए बनाए गए हैं! बेचारे जूतों की क्या गलती ! किस्मत ही ऐसी पायी ...मैंने अपने मित्र से कहा - "यार, मेरे जूतों को ऐसी जमीन पर चलने की आदत नहीं है। इनकी हालत देखी नहीं जा रही मुझसे"  Smile.  ...जूते अगर मेरी सोच सुन रहे होते और बोल सकते तो पक्का गरिया देते कि साले हम तो बने ही इसी के लिए हैं... कोई और जानवर  कहे तो समझ में आता है लेकिन तुम इंसान? ! दिमाग में ये जवाब आया तो वो खुद शांत हो गया । इंसानी दिमाग है... न बोलने वाले से भी बुलवा लेता है. और पता नहीं क्या क्या ऊटपटाँग सोचता रहता है ।Smile

इंसानी दिमाग... चला गया कुछ साल पहले जब हम पुणे में रहा करते थे। कभी कभार हम कुछ झोपड़ियों में बच्चों को पढ़ाने चले जाते और कभी कोंकण के ऐसे समुद्री तटों पर जहाँ उन दिनों केवल बीएसएनएल का नेटवर्क आता था - यानी हमारे मोबाइल नहीं चलते। हमारे साथ अक्सर ड्यूड-ड्यूडनी प्रजाति के भी लोग होते - उन जूतों की तरह ही स्पेशली मेड फॉर लिविंग ऑन अर्थ ! पर रनिंग-रनिंग ते सौ गुनी... का फर्क भी होता है न। कुछ जूते मोची के यहाँ सिल पड़े होते हैं... रफ। सुना है किसी जमाने में पहनने के पहले  सरसों तेल में डूबा के रखना होता था... ऐसे भी जूते होते थे। और 'स्पेशली मेड' तो खैर देखा ही है !

हमारे साथ वाले अक्सर कहते कि - इन झोपड़ियों और गाँवों में रहना कितना सुकून भरा होता है न। कितनी अच्छी किस्मत है इन लोगों की... सब कुछ प्राकृतिक ! पोल्यूशन नहीं ...सुकून की जिंदगी... कोई झंझंट नहीं... हेवेनली ! वॉव ! ...वगैरह वगैरह। मुझे सारी बातें तो याद नहीं पर आपके पास भी इंसानी दिमाग है... आप यहाँ कुछ 'वगैरह' खुद जोड़ सकते हैं. Smile
मैं और मेरे एक बनारसी दोस्त कुछ कहते तो नहीं पर आपस में हम बात जरूर करते कि एक बार ऐसे रहना हो तो इन्हें पता चले। हमें लगता कि उन्होने वास्तविकता देखी ही कहाँ है ! उन्हें तो उन जूतों की तरह पता भी नहीं होता कि ....खैर ... खेतों में लगी फसलें न पहचानने वालों का हम मजाक उड़ाते हुए कह देते कि अरे गेंहू तो फैक्ट्री में बनता है। आप माने न माने एक दिल्ली के लड़के ने मानने से इनकार कर दिया था कि गुड (गुड़) मिल में नहीं बनता ।

वैसे हमारे और उनमें कोई फर्क तो होता नहीं था... सब साथ जाते, एक जगहों पर रहते। बनाए गए तो वो भी हैं हमारी ही तरह कहीं भी रहने को... पर उन जूतों की तरह - "झेल न पायेंगे ! " वाली बात लगती। ऐसा नहीं कि मेरे जूते झेल नहीं पाएंगे पर ... उनका रंग रूप देखा नहीं जाता :)

हम दोनों अक्सर बात करते कि हम दोनों में से किसने ज्यादा देहाती जीवन देखा और जीया है। खैर हम तो सबकी तरह यही सोचते रहे कि बाकी क्या रह पायेंगे ऐसी जगहों पर और अपना क्या है... हम तो रह ही लेंगे। एक ऐसे ही दिन कोंकण में कहीं हम गाडी के अन्दर बैठे जा रहे थे। सड़क पर एक भैंस जा रही थी तो गाडी धीरे करनी पड़ी। ... भैंस ने सर झटका और मैंने फ्रंट सीट पर बैठे बैठे अपना सिर झटक कर किनारे कर लिया। कार का सीसा बंद था। मेरे बनारसी मित्र ने तुरत कहा - "ओझा ! यही गाँव में रहे हो? ! आज पता चल गया कितना रहे हो।" Smile

बाकी इसके बाद हमने डिफेंड किया ही होगा... आप समझ ही गए... इंसानी दिमाग आप भी रखते हैं !

हम अपने को लेकर बहुत कुछ सोचते हैं... दूसरों को लेकर भी। पर दूसरों की तो छोडिये अपने बारे में भी कहाँ पता होता है कि हम क्या हैं ! वैसे जो गरीबी, झोपड़ी, गाँव वगैरह को देख... हेवेंली और वॉव ! कहते है... मैं उन्हें अब भी 'स्पेशली मेड फॉर' की श्रेणी में ही रखता हूँ - वो झेल न पायेंगे :)

--

~Abhishek Ojha~

Oct 24, 2010

दास्तान-ए-'चौपट वीकेंड'

‘सोच रहा हूँ मेरे बारे में अगर कोई कुछ पूछे तो उसे तेरे पास फॉरवर्ड कर दूंगा. तुझे तो सब कुछ पता ही है मेरे बारे में.’

‘क्या पता है?’coffeeday

‘हम्म... सब कुछ तो नहीं, पर तू मेरी नॉन-बायस्ड कंसिस्टेंट एस्टिमेटर टाइप्स है.'

'क्या? इसमें भी मैं तुम्हारे लिए... ऊँह ! बड़े आए. रहने दो नहीं चाहिए तुम्हारा कम्प्लीमेंट. पता नहीं कम्प्लीमेंट दे रहे हो या गाली. कुछ भी बोलते हो'

'छोड़ो तुम्हें समझ में नहीं आएगा... उस लड़की को देखो परेशान लग रही है. बिजनेस स्टैट्स की बूक लेकर बैठी है. पढ़ा के आऊँ उसे? ये सड़ी सी किताब है... कुछ नहीं होता है इसमें. और इसके सिलेबस में जो होगा वो तो...'

'हाँ तुमने तो बचपन में ही पढ़ लिया होगा... पर ये बताओ हम… नहीं तुम यहाँ उसे पढ़ाने आए हो?

'पढ़ाने तो नहीं आया पर अगर पढ़ाने से किसी की मुसीबत कम हो जाय तो इसमें बुराई क्या है?'

'चुप रहो तुम. और अगर पढ़ने वाली लड़की हो तो ज्यादा ही अच्छा है, नहीं?'

'पढ़ने वाला कोई भी हो बस उसे थोड़ा समझ में आना चाहिए, तुम्हें तो समझ में आता नहीं कुछ.'

'इक्सक्यूज मी? मैं भी पढ़ी-लिखी हूँ. '

'अच्छा? टॉपर तो नहीं थी?'

(...मुस्कुराते हुए) 'एक्चुअल्ली एक पेपर में थी.'

'टीचर को तुमसे प्यार तो नहीं हो गया था?'

'गिरिईईजेश !'

... एक अलग ही मुद्रा, आँखों में एक अलग सा भाव और ध्वनि तरंगों के खास आरोह-अवरोह पर वो चार अक्षर का नाम बोलकर जब अगले कुछ सेकेंड तक उसी मुद्रा में एकटक देखते हुए मौन रहती तो फिर पिछली बात वहीं रुक जाती. ‘थोड़ा ज्यादा हो गया’ या ‘तुम्हें हो क्या गया है?’ कहने का उसका ये अपना तरीका था. और गिरिजेश, जिसे कभी किसी ने इस नाम से पुकारा ही नहीं था, के कानों को ये बहुत ही सुखद लगता. अपना नाम कभी-कभार सुनने की आदत, कहने का तरीका, बड़ी-बड़ी आँखे या उसके चेहरे के भाव इनमें से कौन ज्यादा प्रभावी था उसे नहीं पता. लेकिन नोक-झोंक की ये सीमा उसे बहुत पसंद थी.

'ठीक है मान लिया, लेकिन किसी को अपने कॉलेज का नाम मत बताना. और अगर कभी गलती से बता भी दिया तो ये मत बता देना कि तुम टॉपर थी. एड्मिशन नहीं कराएंगे लोग वहाँ. वैसे तुम्हारे कॉलेज का नाम क्या था?'

'था नहीं है, बुद्धू. एआईपीकेसीटीइ.'

'पूरा?'

'हा हा... नहीं बताती. पूरा नाम चार सेठों के नाम पर है. लेकिन तुम मेरे कॉलेज को कुछ नहीं बोलोगे.'

'सर वी आर क्लोजिंग टु क्लीन, यू विल हैव टू मुव आउटसाइड. ' सुबह 3 बजे के लगभग रात भर खुलने वाले उस कॉफी शॉप में एक लड़का आकर टोकता. इसका मतलब ये होता कि अब बाहर बैठो और फिर कुछ ऑर्डर करो. सुबह के तीन बज रहे होते लेकिन अगल बगल के कॉलेज के लड़के-लड़कियों से खचाखच भरी होती जगह.

'ओके, वन अज़टेक प्लीज. '

'एनिथिंग फॉर यू मैंम?'

'नहीं इन्हें कुछ नहीं चाहिए... '

'नहीं नहीं, मुझे भी चाहिए... हम्म... अ वाटर बॉटल प्लीज.'

....

'चाइए.  वो भी पानी... जो मैं बोलूं बस उसका उल्टा करना होता है तुम्हें. पता है तुम्हें कितना पोल्यूशन. ...छोड़ो लैक्चर देने का मेरा वैसे ही मूड नहीं है.'

'सारे संसार का ठेका मैंने नहीं ले रखा है, तुम हो ना लेने के लिए'

'खैर... तुम्हें सोना नहीं है? तुम्हें तो कोई काम होता नहीं है. और तुम्हारे चक्कर में पूरी रात... मेरा पूरा वीकेंड चौपट हो जाता है.'

... फिर वही मुद्रा... वही बड़ी-बड़ी आँखे... निशब्द... एकटक. ओह !

'मुझे नींद आ रही है. चलो छोड़ दो मुझे... नहीं रहने दो. मैं खुद ही जा रही हूँ. कोई भी लिफ्ट दे देगा. नहीं जाना तुम्हारी सड़ी बाइक से. '

'ठीक है जाओ, बाय.'

'गिरिईईजेश !'

और वो फिर चुप हो जाता. हल्की मुस्कान... पर चुप.

'...तुम्हारी गलती नहीं है मैं ही पागल हूँ, आई ही क्यों मैं? मिलेगी कोई तुम्हें... तुम्हारे जैसी ही पागल. बाल देखे हैं अपने एक दिन कैंची लाकर काट दूँगी. कैसे तो लगते हो... लंबे बालों में. ' ये बोलते-बोलते उसका मुँह हल्का टेढ़ा होता और बात अंत तक आते-आते थोड़ी बनावटी लगने लगती.

'हाँ गलती तो तुम्हारी है ही... मैंने कब कहा मेरी गलती है. क्यों आई? किसी के साथ भी ऐसे...?'

'गिरिईईजेश !'.... (...पाँच सेकेंड...) 'क्या कहा तुमने अभी? और किसके साथ देखा है तुमने मुझे?'

'ओ ओ ओ. सॉरी. रोना मत प्लीज. बैठो कॉफी आने दो. थोड़ी देर में चलते हैं. मुझे भी कुछ काम है कल जल्दी उठना है.'

'हाँ जो मर्जी आए बोल दो. और समझाने में तो तुम आम को अमरूद भी साबित कर दो. अपने आपको महात्मा तो समझते ही हो.'

'थैंक यू.'

'गिरिईईजेश !'

यहाँ पर आवृत्ति थोड़ी बदलती. थोड़ी तेज. इसका मतलब होता अब सही में जाना चाहिए.

...

'वो देखो कितनी अच्छी है. '

'ऊँह, एक टन मेकअप... अरे मैं तो तुम्हारी जैसी हो रही हूँ... ऐसा तुम्ही बोलते हो न. एक टन मेकअप !'

'इसमें मुँह टेढ़ा करने वाली कौन सी बात है? उसकी मर्जी मेकअप करे ना करे. मुझे अच्छी लगी मैंने कह दिया. और तुम तो जैसे मेकअप करती ही नहीं हो !'

'जी नहीं... नहीं करती मैं. और कभी करती भी हूँ तो बहुत कम. और ऐसा क्या अच्छा है उसमें? थोड़े और कम कपड़े पहन लेती तो तुम्हें और अच्छी लग जाती...'

'बता दूँ क्या अच्छा है? बाद में कुछ मत बोलना?'

गिरिईईजेश !

….

और इस तरह एक वीकेंड चौपट हो जाता. कभी-कभी उनके कुछ वीकेंड उन वीकेण्ड्स की याद में चौपट हो जाते हैं !

~Abhishek Ojha~

मैं कहूँ कि सब कोरी कल्पना है तो आप मानोगे? मत मानो :)

Jul 12, 2010

सी-थ्रीफाइव पोटाचियो घूघूरियानों (भाग 2)

पिछली पोस्ट को लिखे इतने दिन हो गए कि मैं खुद ही भूल गया कौन सी रेसिपी सोची थी भाग दो के लिए. दिल्ली में कुछ ५-६०० रुपये का गन्ने का जूस याद तो है लेकिन उसका धांसू वाला नाम याद नहीं आ रहा. अब जब नाम ही याद नहीं तो फिर गन्ना गन्ना हो जायेगा और भंटा भंटा...  फिर काहे का आकर्षण. बिन नाम सब सून... !

खैर अब भाग एक था तो भाग दो भी लिखना ही पड़ेगा. आजकल तो फ्लॉप मूवी हो तो भी सिकवेल बनने लगे हैं मेरी पोस्ट पर तो फिर भी कुछ टिपण्णी आई थी. खैर बात थी नाम की. अब नाम में तो सब कुछ रखा ही है लेकिन कई चीजें ऐसी है जो बकायदा काम करती हैं उन्हें किसी नाम की जरूरत नहीं होती. अब जुगाड़ से चलने वाली हर चीज का नाम तो होता नहीं है. लेकिन जितना काम उनसे होता है उतना नाम वाले क्या कर पायेंगे !  आज अपने कुछ बेनामी तंत्रों से आपका परिचय करा देता हूँ.

हुआ यूँ कि हमारे गैस का रेगुलेटर खराब हो गया. अब पिछली बार गैस ख़त्म हुई थी तो08052010471 पोटाचियो घूघूरियानों का आविष्कार हुआ था. इस बार सिर्फ दूध गरम करने के लिए नया रेगुलेटर तो हम लाने से रहे तो थोड़ा इधर-उधर करने पर पता चला कि रेगुलेटर तो दबा के रखने से काम कर रहा है. अब कितनी देर हाथ से दबा के रखा जाय... अपने फ़्लैट पर कोई ऐसी वजन वाली छोटी वस्तु है नहीं जो रेगुलेटर के ऊपर आ सके. दिमाग की बत्ती  जली और हमने दो बर्तनों में पानी भरकर ये तंत्र तैयार किया जो २ महीने चला. इसका नामकरण नहीं हो पाया !

ऐसे ही एक बार किचन के बेसिन का पाइप फट गया. पता चला सोसाइटी में शिकायत 08052010472 लिखवानी पड़ेगी और ठीक तो शनिवार को ही हो पाता. वो भी पूरे दिन घर पर उपस्थित रहना पड़ता. ठीक करने वाला शनिवार को कभी भी आ सकता था और अगर हम घर पर नहीं रहे तो वो वापस चला जाता. अव्वल तो ये घर पर उपस्थित रहने वाला 'नेसेसरी बट नॉट साफिसिएंट कंडीशन' हमें कुछ पसंद नहीं आया. दूसरे शनिवार तक कैसे काम चलता? फ्लैट पर गिने-चुने सामान... एक प्लास्टिक की बोतल मिली और फिर काट कर बिन पेंदी की बोतल से जो अस्थायी व्यवस्था हुई वो एक साल से बिना किसी शिकायत के चल रही है.

अब लिखते-लिखते सोचता हूँ तो दिखता है कि गीजर का पाइप भी तो दो साल से टूटा 13052010476 हुआ है और वैसे ही चल रहा है ! बिना किसी समस्या के. ये अजीबो-गरीब सिस्टम भी बड़ा मस्त काम करता है. भारी-भरकम नलके से धीर-धीरे पानी आता था, जब से ये पाइप टूटा तब से सीधा इसी से धारा प्रवाहित होती है. ठीक करा के धीरे-धीरे टाइम खराब करने से अच्छा है फटाफट स्नान. वैसे भी रोज भागते-भागते ऑफिस पहुचने वाले ही एक-एक मिनट का मूल्य समझ सकते हैं !

अगल-बगल देखता हूँ तो हर वस्तु जिसका जो उपयोग होना चाहिए उससे कहीं अधिक 08052010473 और अच्छा उपयोग किसी और काम में हो रहा है. कुछ अनुपयोगी वस्तुओं को भी काम पर लगा दिया गया है. पर्दा कैसे टंगा है से लेकर कुर्सी, टेबल, एक्सटैन्शन कॉर्ड सबका कुछ और भी (ही) उपयोग हो रहा है. ये कॉफी मग में पड़ा बेलन मिक्सी और सिलबट्टे से अच्छा काम करते हैं. अदरख, इलायची, धनिया, मिर्च सबको बेरहमी से कुचल दिया जाता हैं इसमें. और ये वाइन की बोतल से रोटी बेलने का आइडिया तब आया था जब बेलन के अभाव में चार शीशे के ग्लास रोटी बेलने के प्रयास में तोड़ दिये गए थे. और जब आइडिया आ गया तो क्या रोटी, क्या समोसा सब बेल डाला गया.

अब ये सब तो ठीक... ऐसा ही जुगाड़ तंत्र अपने काम में भी चलता है. गनीमत है अपनी नौकरी में बस काम से मतलब होता है. कैसे हो रहा है इससे किसी को मतलब नहीं है. एक दिन मेरे बॉस बड़े खुश हुए तो कहा डोक्यूमेंट कर दो ये काम कैसे हो रहा है... अब तिकड़म और जुगाड़ का डोक्यूमेंटेशन और नामकरण होने लगा तब तो... खैर बिना नामकरण और डोक्यूमेंटेशन के ही सब कुछ चल रहा है. ठीक वैसे ही जैसे इन तस्वीरों में सब कुछ सही सलामत चल रहा है. ऐसे तंत्र हर जगह चल जाते हैं हर क्षेत्र में ! आप जहाँ भी जिस क्षेत्र में भी काम करते हों... ऐसे तिकड़म लगाया कीजिये कभी कुछ नहीं रुकेगा.

अब आपका मन हो इनमें से किसी यंत्र को 'पोटाचियो घूघूरियानों' टाइप धांसू नाम देने का तो दे दीजिये.

~Abhishek Ojha~

--

ये जिस फ़्लैट की तस्वीरें हैं वो अब छूट चुका... पुणे भी... फिलहाल अनिश्चित काल के लिए न्यूयॉर्क में हूँ. अनिश्चितकाल क्यों? ये अगली पोस्ट का विषय होगा.

May 18, 2010

सी-थ्रीफाइव पोटाचियो घूघूरियानों (भाग 1)

हेडनोट: शीर्षक एक खुराफात जनित अद्द्भुत फ्यूजन रेसिपी का प्रस्तावित नाम है.

कुछ दिनों पहले अपने बॉस के बॉस के साथ एक पाँच सितारा भोज में जब उनके खास अनुरोध पर तैयार किया गया एक विकराल सा नाम धारण किए हुए व्यंजन जब चार बैरे लेकर आए तो हमें लगा कुछ तो बात होगी इसमें. एक सूट बूट वाले सज्जन ने 2 मिनट तक समझाया भी उस अद्भुत व्यंजन के बारे में. मुझे तो यकीन हो चला कि पंचतंत्र वाले भारुंड पक्षी की तरह का कोई अमृत-फल है इसमें. अब शाकाहारी इंसान दैवीय फल और घास फूस की ही तो कल्पना कर सकता है... चीता की तो नहिए करेगा? खैर... जब हमनेभंटा चखा तो ससुर भंटा निकला. अरे वही जिसे आजकल लोग एग प्लांट कहते हैं. आप जो भी कहते हों हमें तो भंटा नाम ही पसंद है. घर लौकर बताया... 'आज ल मेरीडियन से भंटा खाके आया हूँ कितने का मत पूछना'. पहली प्रतिक्रिया... 'तुम साले गंवार ही रहोगे ! अपरिसिएट करना सीखो'

फिर एक दिन टोसकाना में कुछ इटालियन रैसिपि मिली किसी जेट विमान के नाम की तरह. नाम में क्या रखा है टाइप्स सोच के एक बार फिर नाम भूल गया. पर जब स्वाद भी याद करने लायक नहीं मिला तो लगा... 'जो भी कुछ रखा है नाम में ही है... बाकी जो थोड़ा बहुत रखा है वो कीमत में'. अगर नहीं रखा होता तो फिर क्यों सबने निपट आलू टमाटर को बढ़िया आइटम कह दिया?... खैर हमने भी सहमति में सर हिला ही दिया. वैसे पुणे में शनिवार की रात... हमारी उम्र के अधिकतर लोगों के पैसे तो क्राउड़ ही वसूल करा देती है. खैर... इस पर फिर कभी.

कुछ दिनों बाद हमारा गैस ख़त्म... अरे भाई गैस रखा है यही क्या कम है? 'सप्ताह के दो दिन अगर बढ़िया मुहूर्त और मन रहा तो कुछ बना लिया' वाले मामले में बैकअप सिलिंडर रखने का सवाल ही नहीं उठता है. अधपकी दाल फेंक दी गयी [अब अरहर की ही थी लेकिन क्या कर सकते थे? :) वैसे सुना है इस अक्षय तृतीया के दिन सोने को अरहर की दाल की खरीदारी ने तेजी से रिपलेस किया है. सच है क्या?]. उबला आलू और हरा मटर जीरा संग थोड़ी देर भुना गया था. उसे वैसे ही छोड़ बाहर खाने चले गए. अब आधी रात को एक अतिथि-कम-मित्र आ गए अब इस ग्लोबल जमाने में देर-सवेर टाइप की कोई चीज तो होती नहीं. रात को दो ही जगहें बचती हैं जहाँ खाने को कुछ मिल सकता है. एक स्टेशन और दूसरी एक जगह है जहाँ थोड़े ज्यादा ही शरीफ लोग जाते हैं. तो फिर? काली मिर्च और नमक छिड़ककर हमने परोस दिया. (यहाँ छिड़कना कुछ सभ्य शब्द नहीं लग रहा... वैसे किया यही था पर स्टाइल में कहूँ तो उसे आवश्यकतानुसार काली मिर्च, नमक, अदरख और धनिया से सजाकर गरमागरम परोसा था... सॉरी गैस नहीं थी तो आखिरी वाली बात गलत है, पर इतना तो चलता ही है. जैसे कल गोवा-तवा-भिंडी-फ्राई ऑर्डर किया तो उसमें भिंडी मिली ही नहीं !).

'ये क्या है बे?'

'अरे वो आज एक इटालियन रैस्टौरेंट गया था तो वहीं से पैक करा लाया'

'बढ़िया आइटम है... क्या नाम था?'

'सी-थ्रीफाइव पोटाचियो घूघूरियानों'... और एक बार फिर लगा नाम में ही सब कुछ रखा है. इस बार मेरा मन किया बोल दूँ... 'साले गंवार ही रहोगे'. पर यहाँ तो मामला उल्टा था. खैर... हर शुक्रवार को हम अपने ऑफिस वालों के साथ बाहर खाने जाते हैं और धीरे-धीरे कितना महंगा महंगा होता है ये समझ ख़त्म हो रही है. और अब शायद अपना गंवारपन इस बात से चला गया है कि 'ये इतना महंगा क्यों है'. पर अब भंटा को भंटा नहीं तो क्या आम कहेंगे ? :)

नसीम तालेब कहते हैं: 'You will be civilized the day you can spend time doing nothing, learning nothing, & improving nothing, without feeling slightest guilt.' और मैं श्री गिरिजेश राव के ब्लॉग पर बड़ो की बात एक बार फिर पढ़ के आता हूँ.

फूटनोट: मेरे फ्लैट का नंबर है 'सी-तीन. पाँच सौ दो' लेकिन स्टाइल में 'सी-थ्री फाइव-ओ-टू' कहना पड़ता है. बाकी आलू और हरे मटर को पोटैटो और घूघूरी तो आपने डिकोड कर ही लिया होगा. 

--

'…अच्छा तो तुम्हें ये भी आता है? एक कुशल गृहणी के सारे गुण है तुममें :)'

'तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि ये काम सिर्फ लड़कियों को ही करना चाहिए? '

'सॉरी आई डिड्न्ट नो दैट यू आर ए फ़ेमिनिस्ट... '

'अरे सुनो तो... '

'नहीं रहने दो... ' ये एक नयी बात और देखने को मिली.

--

(जारी...)

~Abhishek Ojha~