Jun 2, 2019

कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क


सामाजिक विज्ञान को विज्ञान की उपाधि जरूर किसी ऐसे व्यक्ति ने दी होगी जिसे लगा होगा कि विज्ञान को विज्ञान कहना डिस्क्रिमिनेशन हो चला है। विज्ञान और तार्किकता बूर्जुआ बन गए हैं। अतार्किकता को क्रांति कर देनी चाहिए! क्योंकि भाव तो अतार्किकता को भी मिलना चाहिए और फिर किसी ने लेख लिखा होगा - इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन के कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क के अंतर्गत ऐसे कहा जा सकता है कि अतर्किकता भी विज्ञान है।

इसका मतलब मत पूछियेगा क्योंकि मैं ठहरा गणित का आदमी जहाँ १+ १ दो और केवल दो होते हैं। १+१ की बात आ ही गयी है तो पहले एक जोक बाकी बाद बात में करेंगे। [बात प्रवचन जैसी लगने लगे तो बीच में जोक ठेलने की बड़ी महिमा बतायी गयी है.]

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एक साक्षात्कार में तीन लोग गए। पहला गणितज्ञ। उससे पूछा गया १+१ क्या होता है?
बोला २.
२? कुछ और नहीं हो सकता?
और कुछ? पगलेट हो क्या?

दूसरा आया.  उससे भी वही सवाल।
उसने बोला १.९० से २.१० के बीच कुछ भी हो सकता है।  आंकड़े में गड़बड़ी हुई हो तो १०% त्रुटि की संभावना लगती है।
सांख्यिकी पढ़ी थी उसने और इसका रौब झाड़ना जरूरी लगा उसे।

तीसरा. सामाजिक विज्ञानी. बुद्धिजीवी. उससे भी वही सवाल। गणित-तर्क १, २, जोड़-घटाव का उसे कुछ नहीं पता था।
उसने पहले उठ कर दरवाजा बंद किया. इधर उधर देखा. और धीरे से बोला - आपको कितना चाहिए? एक कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क बना के उतना साबित कर देंगे

जोक समाप्त.
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आजकल आंकड़ों के नाम पर कई बार अपनी बात कहने के लिए जो लोग करते हैं उसे विज्ञान में फर्जीवाड़ा कहा जाता है.

बात करनी थी कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क की। एक वर्ग है जो बिना (बहुधा अतार्किक) फ्रेमवर्क के नहीं सोच सकता। और अतार्किक फ्रेमवर्क की व्याकपता अनंत होती है। तार्किकता व्यक्ति में एक प्रकार से लाज-शर्म की उपज भी करता है।  तार्किक व्यक्ति को अतार्किक बात करते हुए शर्म आती है। एक बार गलत हो जाने पर अगली बार उसे बोलने से पहले और अधिक सोचना पड़ता है। अतार्किक के साथ इसका उल्टा होता है। जितनी बार गलत हुए अगली बार उतने ही अधिक विश्वास से गलत बोलते हैं।  जैसे हर चुनाव में उनका विशेषज्ञ अनुमान और असली परिणाम एक दूसरे को अपना वही दिखाते हैं जो ३६ में ३ और ६। लेकिन वो ठहरे विशेषज्ञ फिर झाड़ेंगे ही अपनी बात। उन्हें ये नहीं समझ आता कि फिर उठ खड़े हो चल पड़ने का ज्ञान पुनः पुनः वही पगलेटी करते रहने के लिए नहीं होता है :)

मैंने जीवन में कुल मिलाकर कुछ घंटे टीवी समाचार देखा होगा। उसमें भी आजकल सोशल मीडिया पर दिख जाने वाले क्लिप्स मिलाकर। आखिरी बार किसी चुनाव का लाइव परिणाम टीवी पर देखा था वो बिहार के चुनाव थे। और वो पहली और आखिरी बार था। जो अपने आप को और एक दूसरे को सबसे बड़े चुनावी विशेषज्ञ कहते हैं उन्हें लाइव देख रहा था। यादव-गुप्ता-रॉय  - एनडीटीवी पर। हुआ यूँ था कि उनके रुझानों की फीड गलत थी। विशेषज्ञ बोल रहे थे ..but you should realize that only industry Nitish developed in Bihar was brick kilns. He can not win elections again and again with that. थोड़ी देर में उन्हें पता लगा कि असल में नितीश कुमार चुनाव जीत रहे हैं तो...  बिना शर्म, पलक तक ना झपकी बोलने लगे  -Nitish is the man who built Bihar brick by brick. He is true people's leader. The results are a reflection of that. ऐसी मोती चमड़ी ! ये है विशेषज्ञों की असली विशेषज्ञता। वो जो भी बोल रहे हों, हो जो भी रहा हो - अपने ईंट भट्ठे के कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क  में झोंक देते हैं।  और आप अपनी सोच यदि इन विशेषज्ञों के कहे से बनाते हैं ! तो ... ये वही लोग हैं जो अंतिम समय तक नहीं जानते थे कि मंत्रिमंडल में किसे क्या मिलेगा। और पता चलने के पांच मिनट में लेख लिख देते हैं कि क्यों किसे कौन सा मंत्रालय मिला !


औद्योगिक संसार में आजकल बहुत कुछ आउटसोर्स किया जाता है इनमें से एक प्रमुख है - प्रेज़ेंटेशन या पिच बुक की डिजाइन। जिन्हें आउटसोर्स किया जाता है वो कंपनी कुछ रेडीमेड टेम्पलेट रखती हैं। एक पसंद नहीं आया तो दूसरा भेज देते हैं। कुछ सालों बाद जब लोग ऊब कर नया डिज़ाइन चाहते हैं और वापस नया डिज़ाइन मांगते हैं तो वो फिर से पिछला वाला भेज देते हैं। ये नहीं तो वो पसंद तो आयेगा ही। वैसे ही ये विशेषज्ञ टेम्पलेट रखते हैं। ये फिट बैठा तो ठीक नहीं तो दूसरा वाला। नया कुछ है नहीं इनके पास। युग बदल गया - चुनाव देखने का तरीका वही।  फॉर्मूले वही।  वोटर के लिए जाति-धर्म ख़त्म हो जाए पर इनके दिमाग में उसके अलावा कुछ है ही नहीं तो उसके बाहर कैसे सोच सकते हैं ! टेम्पलेट ही वही है दूकान भी एक ही टेम्पलेट बेच कर चलाना है।

 बचपन में एक जान पहचान के थे जिनके किराने की दुकान थी। किराने की दूकान यानी जिसमें जरुरत का सब कुछ मिल जाए। वो एक ही प्रकार का चावल रखते - कोई यदि कहता कि थोड़ा महीन दीजिये तो अंदर जाकर वही चावल दोनों मुट्ठी में लाकर दे देते। कोई कहता थोड़ा साफ़ दीजिये तो भी वही करते।  कोई कहता पुराना दिखाइए तो भी वही। और लोग दोनों मुट्ठियों के चावल देख एक वाले को चुनकर कहते हाँ ये वाला बढ़िया है। वो दो रुपया अधिक लगाकर वही चावल तौल देते। वैसे ही ये विशेषज्ञ हैं - चावल इनके पास एक ही है। आपको यदि ये समझ आ गया हो  तो समय है दुकान बदलने का। या जमाना पी२पी का है तो दुकानदार को दलाली ही क्यों देना। अपनी सोच इन्हें आउटसोर्स करने की जगह खुद सोच लीजिये ! जिसे ये विशेषज्ञ थिंकिंग, एनालिसिस वगैरह का नाम देते हैं उसे उन्होंने खुद आउटसोर्स कर रखा है अपने पूर्वाग्रहों को, उस कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क को जिसे वो संसार की धुरी समझते हैं। ऐसे लोग संसार में हर जगह बहुतायत में पाए जाते हैं। हो सकता है उन्हें स्वयं नहीं पता वो ऐसे होते हैं। संभवतः वो अपने को समझते तो कलिकाल सर्वज्ञ हैं ठीक वैसे ही जैसे भर्तृहरि परिभाषित मुर्ख !  

 - अर्थात एक अधूरे ज्ञान से भरा व्यक्ति जिसे ब्रम्हा भी नहीं समझा सकते। जो तर्क के प्रति अँधा है.पर जिसे घमंड भी है कि उससे बुद्धिमान कोई नहीं. आप चाहे तो मगरमच्छ के दांतों में फँसा मोती निकाल सकते हैं, समुद्र को भी पार कर सकते हैं,  गुस्सैल सर्प को भी फूलों की माला तरह अपने गले में पहन सकते हैं...  लेकिन इनको को प्रत्यक्ष सही बात समझाना असम्भव। संभव है रेत से भी तेल निकल जाये  या मृग मरीचिका से भी जल मिल जाए। खरगोशों के सींग उग आये; गुलाब की पंखुड़ी से हीरा काटना हलवा हो जाए लेकिन एक पूर्वाग्रही मुर्ख को सही बात का बोध? भ्रम और घमंड का कम्बाइंड इक्वेशन नॉविएर स्टोक्स से भी खतरनाक इक्वेशन होता है। उनकी बातें सुन आयरनी (irony) कपार खुजलाने लगती है कि...  अब कोई नया शब्द ढूंढ लो बे तुमलोग हमसे न हो पायेगा। मैं झूठ नहीं बोल रहा आप अंग्रेजी डिक्शनरी खोल कर रख दीजिये और इनके विचार दो घंटे बजाइये. irony शब्द मिट जाएगा डिक्शनरी से।

एक सत्य कथा बताता हूँ -  मनोहर कहानियों से थोड़ी कम रोचक होगी पर उतनी ही सत्य।
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...एक विश्वविद्यालय है दिल्ली में. वहां एक विद्यार्थी को कहा गया शोध करके आओ कि किसी अमुक योजना से जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ. साधारण प्रश्न है. एक विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के आंकड़े लेकर कुछ महीनों में आया. सुन्दर अध्ययन.

प्रोफ़ेसर साब लाल हो गए. कहा ये गलत है तुमने तो कुछ किया ही नहीं?
क्यों?
इसमें कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क कहाँ हैं? तुमने इस बात का अध्ययन तो किया ही नहीं कि सरकार किसकी थी ! न इसमें कास्ट फैक्टर है. ना रिलिजन.
सर, उसकी क्या जरुरत है? आर्थिक स्थिति तो है.
तुम्हे यही नहीं पता ! प्रोफ़ेसर साब ने असाइनमेंट फाड़ दिया।धमकी दी की फेल हो जाओगे।

फिर विद्यार्थी ने दो घंटे में फ़टाफ़ट लिखा कि इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन इन कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ कास्ट सिस्टम के कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क के हिसाब से इसका फायदा किसी को नहीं होगा। एक बार फायदा हो भी गया तो उसके बाद क्या? स्टैंडिंग ओबेशन ! तालियां बजायी प्रोफ़ेसर ने और कहा कि इसमें फेमिनिज्म और सोशिऑलोजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी भी लगाओ. सोशल स्ट्रैटिफिकेशन लगाओ। तुम्हे गोल्ड मैडल दिलाया जाएगा।

गाँव-गाँव घूमकर आंकडे  इकठ्ठा कर किया गया अध्ययन फाड़ कर फेंक दिया गया। पर दो घंटे का तथाकथित अध्ययन फ्रेमवर्क वाले विश्वविद्यालय में वो वैसे ही फिट हो गया जैसे बोल्ट और नट एक दूसरे में फिट हो जाते हैं । कालांतर में वो बालक तथाकथित सामाजिक वैज्ञानिक बना। हर मुद्दे पर राय देने वाला। और उसका होली-दिवाली होते चुनाव। उन दिनों उसकी व्यस्तता ऐसी होती कि एक टांग एक स्टूडियो में तो दूसरी दूसरे स्टूडियो में। हर बार उसकी बातें गलत होती पर उसे अपने लाल गुरु की बातें गाँठ बाँध ली थी। सबसे पहले मेरे घर का अंडे जैसा था आकार की तरह रट लिया था इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन ऐंड सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी  इन कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ कास्ट सिस्टम एंड... इसके आगे पीछे कुछ हो कैसे सकता है।  एक अटके हुए रिकॉर्ड की तरह यही बात दोहराते रहता। अंडे जैसा है संसार पर ही रुका रहा कभी बहार निकला ही नहीं। दुनिया बदल गयी पर उसे कुछ नहीं दीखता था। उसके अनुसार प्रत्यक्ष को प्रमाण नहीं चाहिए होता है। यदि कुछ चाहिए होता है तो वो है - कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क ।

धीरे धीरे उसे लगने लगा था संसार ही चलता है उसके कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क से। उसके बिना उसके कुछ नहीं चल सकता - सूरज,  चाँद किसी की औकात नहीं। कौन सा गुरुत्वाकर्षण बे ? संसार चलता है  इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन  ऐंड सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी  एंड... बंगके बंगाली फिरंग के फिरंगावाली दिल्ली के दिलवाली सब फ्रेमवर्क से चलत हैं.*

दुनिया अपनी गति और नियमों से चलती रही।  वो अपने हिसाब से समाज की संरचना और भविष्य बताता रहा । हर बार वो गलत होता लेकिन बन गया था विशेषज्ञ तो वो कैसे गलत हो सकता था? उसकी बात गलत होती तो पहले उसे सही करने के लिए प्रोपेगंडा करने लगा।  फिर बौखलाहट में दूसरों की  बातों में गलती  ढूंढता। यदि फ्रेमवर्क सही नहीं है तो उसे सही कराने के लिए किसी हद तक जायेंगे ! ऐसा हो कैसे सकता ही कि वो गलत हो। सबको उसमें फिट होना पड़ेगा।

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चुनावों में उसके कही पार्टी की हार हुई तो बोला -

ईवीएम हैक कर लिए?
किसी ने पुछा - हैकिंग क्या होती है? मालूम है?

बोला - हाँ, जब आप गलत हो और गलती नहीं माननी हो तो उसे हैकिंग कहते हैं। अरे मान लो ऑनलाइन गाली-वाली दे दिया किसी को और बाद में माफ़ी मांगने की नौबत आ जाए तो कहना होता है कि अकाउंट हैक हो गया। तो वैसे ही अब ईवीएम ही हैक हुआ होगा। वोट गलत थे।

अच्छा।

उसके बाद वो लग गया अपने फ्रेमवर्क को सही करने के लिए प्रोपैगैंडा में... पर वो फिर फेल हो गया तो बोला - साला सब अम्बानी अडानी का पैसा से चुनाव जीत गया सब। इसलिए मेरा फार्मूला नहीं चला. ब्लडी कैपिटलिज्म.

एक हारने वाली पार्टी वाला बोला - अबे हममें ऐसा क्या नहीं है जो अम्बानी अडानी को उसमें दीखता है? हमने तो और खुला हाथ दिया था हम तो हारे ही नहीं होते कभी !

विशेषज्ञ बोला - अबे चुप करो।  विशेषज्ञ तुम हो या मैं? तुम साले गंवार। जीत तो पाए नहीं मेरे फॉर्मूले से भी।  तुम्हे तो मर जाना चाहिए।  हमारी बात गलत नहीं है।  मीडिया ने जीताया है.

लेकिन उस हिसाब से तो तुम्हे जीतना चाहिए. वो वाली कोशिश तो तुमने की थी?

ये सुनते हुए उसके दिमाग में बत्ती जली - "अबे साला तो मामला ये है. जनता ही *तिया है।"

उसने घोषित कर दिया जनता को समझ ही नहीं है. ये प्रणाली ही खराब है. यशवंत सिन्हा की पेटेंटेड लाइन थी - कोई भी *तिया मुख्यमंत्री बन जाता है. उसी को उसने चोरी कर कहा - कोई भी *तिया वोट डाल देता है। तो क्या होगा। किसी को समझ ही नहीं है।

पर तुम्हारे हिसाब से तो सभी इक्वल हैं?

हैं नहीं। होंगे। हम करेंगे। सब इक्वल हो कैसे सकते हैं बिना क्रांति के? इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन  ऐंड सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी  एंड...

तो अभी क्या है?

अभी हम ज्यादे इक्वल हैं !

ये तो फिर चोरी की तुमने ये तो जॉर्ज ऑरवेल ने तुम्हारी जमात के लिए कहा था।  पर ठीक है जो तुमने खुद ही कहा।

वो बड़बड़ाते रहा - हम गलत कैसे  हो सकते हैं. हम जानते हैं कि किसको किसे वोट देना चाहिए। यदि किसी ने नहीं दिया तो *तिया वो हुआ या मैं? समझ ही नहीं किसी को। उन सालों की तो गर्दन पकड़ के मैं... सारे संसार को कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क में फिट होना है. पगलेट फिट ही नहीं हो रहे ! इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन  ऐंड सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी  एंड...

दुनिया अपने हिसाब से चलती रही।


* गुरु गोविंद सिंह जी महाराज का लिखा भजन दिल्ली में गुरुद्वारा बंगला साहिब में सुना था - बंगके बंगाली फिरंग के फिरंगावाली दिल्ली के दिलवाली तेरी आज्ञा में चलत हैं.
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~Abhishek Ojha~



May 27, 2019

कंठस्थ


पिछले दिनों उड़ीसा में तूफ़ान आने के बाद हिंदी की ख़बरों में भी 'मिलियन' शब्द कई बार दिखा। आजकल सोशल मीडिया में फ़ालोअर, व्यू इत्यादि की गणना भी मिलियन में ही होती हैं। ये एक छोटा उदहारण है कि पिछले कुछ सालों में भाषा कैसे बदली है।[वैसे ये भी हो सकता है कि हिंदी मीडिया वालों को मिलियन से लाख में बदलना ही नहीं आया हो और कौन रिक्स ले सोच कर वैसे ही टीप दिया हो अंग्रेजी खबरों से] मुझे कॉलेज के दिनों में मिलियन, बिलियन असहज लगता। सुनते ही दिमाग़ में गणना चलती - कितने लाख? कितने शून्य?  दिन भर मिलियन, बिलियन करने वाले व्यवसाय में आने के बाद भी धीरे-धीरे ही तीन अंकों के बाद अल्पविराम लगाने वाली ये पद्धति सहज लगने लगी।

हमने गिनती-पहाड़ा पढ़ा था एक साँस में -

एक इकाई, दो इकाई, तीन इकाई, चार इकाई, पाँच इकाई, छः इकाई, सात इकाई, आठ इकाई, नौ इकाई, दहाई में दस ! 

इकाई-दहाई-सैकड़ा-हजार-दस हजार-लाख-दस लाख-करोड़-दस करोड़-अरब-दस अरब-खरब-दस खरब-नील-दस नील-पद्म-दस पद्म-शंख-दस शंख-महाशंख! कंठस्थ.

अब सोचना भी उसी प्रणाली में होगा! सोचना भला कभी दूसरी भाषा में हो सकता है? मैं ऐसे लोगों को हमेशा शक की दृष्टि से देखता हूँ जो कहते हैं कि वो अपने बचपन में बोली गयी भाषा भूल गए। थोड़ी-थोड़ी याद है।  कैसे भूल सकता है कोई ?! पर हैं ऐसे लोग जो कहते हैं। ख़ैर ! जोड़ घटाव हम आज भी गिनती-पहाड़ा से ही करते हैं। उंगुलियों के इस्तेमाल से। पहाड़े की बात हो तो पंद्रह का पहाड़ा कंठस्थ होने की कतार में सबसे पहले आता है। दो एकम दो, दुदुनी के चार से भी पहले - पंद्रह दूनी तीस तियाँ पैंतालीस चौका साठ पाँचे पचहत्तर छक्का नब्बे सात पिचोत्तर आठे बीसा नौ पैंतीसा. झमक झमक्का डेढ़ सौ।

फिर अंकों के लिखने का अभ्यास ऐसे होता था - 'लिखो  तो!पांच अरब बीस करोड़ पैतीस हजार दो सौ एकासी.'  रैंडम बड़े बड़े अंक लिखते। स्लेट भर जाने भर के अंक और शाबाशी पाते. एकासी से याद आया नौ के पहाड़े में रटते-रटते - नानावा एकासी, नाना गइले फाँसी। छोडाव ऐ नाती ! 

ये लय में कंठस्थ करने के दिन थे। कंठस्थ यानि विशुद्ध रट्टा - मतलब पता हो ना हो एक साँस और लय में फिट। बिना सोचे समझे। आजीवन। एक बार रटा गया तो देर सवेर समझ में आ ही जाएगा।

गिनती का पहला प्रैक्टिकल एप्पलिकेशन था अनाज तौलने वालों को देखना। फ़्लो में। सुंदर। वो बोरे का बोरा तौलते - रामह जी रामह, दुई जी दुई। या रामह जी रामह, दुई राम दुई - रामनाम का संपुट ज़रूर होता।

ऐसी कितनी बातें याद है। बिन पढ़े। केवल सुनकर। जो कभी पढ़नी नहीं पड़ी वो भी। पाठ्यक्रम के बाहर के  श्लोक। चौपाई। दोहा। कहावतें। मानस की अनेकों चौपाइयां जो किसी पाठ्यक्रम में नहीं थी। और दैनिक पूजा में सुने श्लोक -

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी विलो लवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके किशोर चन्द्र शेखरे 
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चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि। 
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कंदर्प अगणित अमित छबि, नव नील नीरज सुन्दरम्। पटपीत मानहुं तड़ित रूचि-शुची, नौमि जनक सुतावरम्
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मजेदार ये है कि कंठस्थ हो गया बिना शब्दों का पता हुए. वैसे ही याद हुआ जैसे सुना. उसी धुन में. गलत उच्चारण सुना तो गलत ही याद रहा. कुछ ज्यादा अच्छे लगते वो जल्दी याद होते। शायद वो जिनके उच्चारण में ज्यादा उतार चढ़ाव होता - कारण सिर्फ उच्चारण ही था।  अर्थ तो क्या ये भी नहीं पता होता कि ये है क्या !  बहुत कुछ ऐसा भी है जिसका अभी भी पूरी तरह नहीं पता - नाचै गोविन्द फनिंद के ऊपर तत्थक-तत्थक-न्हैया। पता नहीं पूरी कविता क्या थी या किसने लिखा.

कितनी कविताएं जो पाठ्यक्रम में नहीं थी... या पुस्तक देखने के पहले से ही याद होता। अंताक्षरी के लिए। किताब में देखकर लगता ... अरे ये तो मुझे याद है !

रण बीच चौकड़ी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था। 
राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था। 
गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था। 
वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था। 
जो तनिक हवा से बाग हिली, लेकर सवार उड़ जाता था।

और ये सब पूछने वाले बड़े-बूढ़े लोग भी मजेदार होते - प्रेडिक्टेबल - "कई नवा एक सौ बासठ?"

"अब एक बुझौव्व्ल बताओ। अजा सहेली ता रिपु ता जननी भरतार ताके सुत के मीत को बारम्बार प्रणाम".

पहली बार नहीं आया ये हो सकता था, उसके बाद ऐसा कैसे होता कि पता न हो। तेज होने के यही टेस्ट होते थे तो गहराई में जाकर हम उत्तर भी निकालने का प्रयास करते। कहीं चौपाई सुनी तो प्रसंग और स्रोत का पता लगाया जाता। लोग सिखाते भी अच्छी चीजें थे। लघुत्तम, महत्तम बाद में सीखना पहले समहर करना सिख लो. लघुत्तम, महत्तम अपने आप समझ में आ जाएगा। और ये पहली चीज थी जो ऐसे समझ आयी कि उसके बाद सीखने की जरुरत ही नहीं पड़ी। भिन्न देखते ही अंक खुलते चले जाते। गणित में मजा आने लगा। वैसे ही चक्रवाल विधि सीखा दिया था किसी ने... वर्षों बाद पता चला कि ये भास्कर के बीजगणित में वर्णित प्रसिद्द विधि है !

और एक तो ये राम को आम इतना प्रिय था कि वो आम ही खाते रहता... और हमें वो अंग्रेजी में अनुवाद करके बताना होता -

'राम आम खाता है'.
'राम आम खा रहा है'.
'राम आम खा रहा था'
'राम आम खा चूका है.'
'यद्यपि राम ने आम खाया फिर भी उसे भूख लगी थी'  वगैरह, वगैरह.

ये सब अंग्रेजी में बता दिया तो सिद्ध हो गया चलो लड़का बहुत तेज है !   शाबाश !

एक दो बार के बाद समझ आ गया था कि अब अगला सवाल ये होने वाला है - 'राम के आम खाने के पहले रेल गाडी जा चुकी थी'. (इसका जवाब ये क्यों नहीं कि - अब आमे खाये में नशा रही उनकर त गाड़ी छुटबे करी!).

वो चीजें भी सुन कर याद हुई जो हमारे बचपन में समाप्त हो गयी थी -

मन-सेर-छटाक।
रत्ती-माशा-तोला।
रुपया-आना-पैसा-पाई।

यदि किसी बड़े-बूढ़े ने भी कभी पढ़ा हो और हमने सुन लिया किसी चर्चा में तो भी याद हो गया। इन प्रणालियों के बारे में बस इतना ही सुना। एक से दूसरे में परिवर्तित करना रटा नहीं तो आज तक पता भी नहीं। श्रुति परम्परा मज़ेदार थी। पिरीआडिक टेबल तो मुझे लगता है सबने ही ऐसे रटा होता है - हली नाक रब कस फर ! बीमज कासर बारा...

पढ़ाने वाले लोग भी मजेदार थे। गणित के एक शिक्षक थे - ठेठ । उन्होंने जैसे कहा था - बहिष्कोण सुदूर अन्तः कोणों के योग के बराबर होता है। सुदूर माने ? - सटलका से दूर ! 

अब इसके बाद जीवन भर कोई कुछ भी भूल जाए सुदूर का अर्थ कैसे भूल सकता है?  - and now you can't un-listen this - सुदूर माने - सटलका से दूर !

एक दो बातें हो तो लिखी जाएँ... ऐसी कितनी बातें हैं।  त्रिकोणमिति में उन्होंने पहले क्लास में लिखा - 'पंडित भोले प्रसाद बोले हरे हरे'.  इसका कभी इस्तेमाल नहीं करना पड़ा पर देखिये याद अब भी है !

संस्कृत में तो कितनी बातें याद रही. यण संधि - इकोऽयणचि - इई का य उऊ का व ऋ का र तथा लृ का ल हो जाता है। अयादि संधि - एचोऽयवायाव: ये बोलते समय मास्टर साब लटपटा जाते। लगता उनके मुंह में रसगुल्ला अटक गया और अब घुल रहा है। और याद भी वैसे ही है। संधि-विच्छेद से नाता इसलिए भी रहा कि हमारे शिक्षक हर अध्याय के शुरू में ही पहला काम यही कराते - एक एक शब्द का विच्छेद, जहाँ भी संभव हो।  बोलते हर शब्द के संधि को पहचान उसका विच्छेद कर दो फिर विभक्ति। बस ८०% अर्थ समझ में आ जाएगा।  बाकी जो बचा वो प्रत्यय-उपसर्ग इत्यादि से समझ आ जाएगा। संधि दीखते ही विच्छेद करा देते ! पढ़ते समय भी बोलते कि विच्छेद करके पढ़ो। हम उन्हेंएंटी-संधि व्यक्तित्व वाले कहते और अब लगता है इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता था संस्कृत पढ़ाने का।

याद तो शम्भू के बाप भी हैं। हिंदी में एक अध्याय था 'सफर से वापसी' जिसके लेखक थे अजित कुमार। हमसे दो साल सीनियर थे - शम्भू कुमार जो अजित कुमार के पुत्र थे। लेखक अजित कुमार और शम्भू के बाप अजित कुमार दो विभिन्न लोग थे। लेकिन किसी शरारती लड़के ने स्कूल में सफर से वापसी के लेखक का नाम बता दिया -  'शम्भू के बाप'. और ये प्रसिद्द हो गया। अब भले ये भूल जाएँ की तोड़ती पत्थर के लेखक निराला थे लेकिन सफर से वापसी - शम्भू के बाप  भला भूल सकते हैं?

भूगोल के शिक्षक ग्लोब पर हाथ फिराते - स्वीडन-फिनलैंड-इंग्लैंड-आइसलैंड... संभवतः अपने जमाने के रटे क्रम में हाथ फिराते दुनिया पर। लगता रैप कर रहे हैं।

वैसे कंठस्थ करने और कंठस्थ रह जाने में संस्कृत ही एक नंबर रही -

शैले शैले न माणिक्यं. मौक्तिकं न गजे गजे. साधवे ना ही सर्वत्रं चन्दनं न वने वने।
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अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् | परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। वगैरह वगैरह.

और सबसे अधिक मजा आता निबंध में ये सब ठेलते हुए. कहीं से अपने हाई स्कूल के दिनों के परीक्षा में लिखे निबंध पढ़ने को मिल जाते तो खुदा कसम मजा आ जाता. (खुदा कसम वाला प्रसंग इस पोस्ट में है).

संस्कृत कुछ ऐसे ही पसंद बन गयी थी । गणित-भौतिकी-संस्कृत के बाद ही कुछ था। मुझे लगता है इसका सबसे बड़ा कारण थे शिक्षक और उनका प्रोत्साहन। एक अच्छे शिक्षक पर बहुत कुछ निर्भर करता है। किसी विषय में रूचि पैदा करने में। नीरस लगने वाला विषय कोई अच्छा शिक्षक पढ़ा दे तो वही रुचिकर हो जाए। और शिक्षक ऐसे भी जो किसी विषय में कितनी भी रुचि हो तो उसे ही बेकार बना दे।

तृतीया विभक्ति येनांग विकार: पढ़ाते हुए संस्कृत के शिक्षक एक दिव्यांग शिक्षक का उदाहरण देते। वो भी अक्सर जोर जोर से बोलकर उनको सुनाते हुए - 'स: पादेन खंज:' (स: की जगह उदाहरण में वो उन शिक्षक का नाम लिखा देते) ऐसा करना अत्यंत असंवेदनशील था। पर स्वाभाविक है उनका मजे लेकर लिखवाना वैसे के वैसे ही याद है।

किसी ने कहा - 'सर ऐसे नहीं बोलना चाहिए आपको. फलाने सर को बुरा लगता होगा'

तो उन्होंने कहा था - 'अरे वो मित्र हैं हमारे। बुरा क्या लगेगा.' उसके तुरत बाद ही ठहाके लगाते हुए बोले - 'वैसे हैं भी तो वो पुरे अष्टावक्र ! पादेन खंज: तो सम्मान ही हुआ।'

बताइये !

 वे भी दिन थे. लगता है हमने मजे-मजे में पढाई कर ली ! कैसे लोग रोना रोते हैं पढाई का :)

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~Abhishek Ojha~

Aug 28, 2018

किस्सा-ए-बागवानी

[सत्य घटनाओं पर आधारित. इस पोस्ट के सभी पात्र और घटनाए लगभग वास्तविक हैं. यदि किसी भी व्यक्ति से इसकी समानता होती है तो ये और कुछ भी हो संयोग तो नहीं ही है. वैसे हमें कौन सा फर्क पड़ता है ! 😊]


कुछ दिनों पहले हमसे किसी ने कहा – ‘थोड़ा गार्डनिंग पर ज्ञान दो. तुम तो कितना कुछ लगाते हो. लकी हो, तुम्हारे हाथ से पौधे लग जाते हैं’.

पहले तो सवाल ही गलत था अपार्टमेंट में रहने वाला व्यक्ति क्या जाने गार्डेन का हाल ! फिर भी हमने बहुत कोशिश की कि अपने को और अपने हाथ को श्रेय दे ही लूं. पर हो नहीं पाया क्योंकि... इस बात को समझने के लिए...

पहले एक कथा -
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 बात बहुत पहले की है. जब लोग पैदल यात्रा किया करते थे. सड़कों के किनारे छायादार और फलदार वृक्ष हुआ करते थे जिनकी छाँव में पानी पीने की व्यवस्था होती थी. एक सज्जन यात्रा पर निकले... सुदूर किसी देश में कहीं एक दिन उन्हें एक फुलवारी दिखी। फल-फूलों के भार से झुके पेंड़-पौधे जिनपर भौरें मड़रा रहे थे... वगैरह वगैरह. माने भीषण मनोरम - इतनी मनोरम की यात्री ठहर गया. फुलवारी की सुन्दरता का अनुमान आप इस बात से लगाइए कि न तो उस जमाने में फेसबुक था. न इन्स्टाग्राम .न स्नैपचैट (ट्विट्टर भी नहीं !) फिर भी यात्री ठहर गया !

फुलवारी का मालिक दिखा तो यात्री ने मंत्रमुग्ध होने वाला एक्सप्रेशन देते हुए कहा – ‘भाई ! क्या अद्भुत बगिया है आपकी। मैं कितने ही नगर-राज्य-महाजनपद-देश घूम आया पर ऐसी खुबसूरत बगिया मैंने नहीं देखी !’

लहलहाती फुलवारी के मालिक अति प्रसन्न हुए और गर्व से बोले – ‘भाई, आखिर क्यों नहीं होगी ! इतनी मेहनत करता हूँ. खून-पसीना एक कर रखा है. ऊपर से... देखिये उन्नत किस्म के बीज और सिंचाई और.. ये और वो... जिंदगी लगा रखी है इसमें. ऐसे ही नहीं हो गयी!’.

वो इतना बोल गए जितने में बागवानी का मैनुअल छप जाता. विद्वानों की इसमें एक राय है कि मीडिया का युग होता तो वो जरूर पैनल एक्सपर्ट बने होते. चुनावी एक्सपर्ट तो बन ही गए होते जो परिणाम आने के बाद तुरत ही उसका कारण बता देते हैं ! (पत्रकार भी हो सकते थे पर संभवतः उतने भी हांकने वाले नहीं थे... पत्रकारिता के लिए तो धान के खेत में खड़े होकर उसे गेंहू कह देना भी विशिष्ट ओवरक्वालिफिकेशन होता है.) खैर ... कुछ महीने या हो सकता है वर्ष बाद... (अब समय तो लगता था पैदल आने-जाने में) वही सज्जन यात्री वापस आ रहे थे (अब देखिये प्रूफ तो नहीं है कि सज्जन ही थे लेकिन ऐसा ही कहने का चलन है). इस बार उन्होंने देखा कि बगिया उजाड़ पड़ी है. उन्हें बड़ी निराशा हुई. अब सेल्फी वगैरह का युग तो था नहीं लेकिन बगिया की खूबसूरती देखकर हो सकता है यात्री के दिमाग में आया हो कि आते समय एक चित्र ही बना लूँगा ! या उस जमाने में हो सकता है लोग सच में खूबसूरती आँखों से देखते हों और आनंदित होते हों. जो भी कारण रहा हो उन्हें लगभग बंजर पड़ी जमीन और सूखे पौधे देख बड़ी निराशा हुई. संयोग से बगिया के मालिक फिर दिख गए.

यात्री ने इस बार दुःख प्रकट करते हुए पूछा – ‘भाई, हुआ क्या? मतलब कैसे? आप तो इतनी मेहनत ?’

एक जमाने में लम्बी लम्बी हांकने वाले बगिया के मालिक बोले – ‘भाई, क्या बताएं अब. सब भगवान की लीला है. जैसी प्रभु की इच्छा.’

 कथा समाप्त.
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अरे रुकिए अभी आगे और पढना है. केवल कथा समाप्त हुई है बात नहीं.

तो ... कथा से शिक्षा वगैरह जो मिली वो तो आप समझ ही गए होंगे. उसे बताने का पांच नंबर तो मिलना नहीं जो सोदाहरण लिखा जाय और शिक्षा भी थोड़ी गहरी सी है जितना सोचेंगे उतनी खुलेगी. तो हम क्या लिखें अपनी समझ ! पर ऐसा है कि... बचपन में कहानियाँ लाखों में नहीं तो हजारों में तो सुनी ही... लेकिन उनमें से कुछ ऐसी रहीं जिनका उदाहरण जिंदगी में हर मोड़ पर मिला. ये कहानी भी वैसी ही कहानियों में से एक है. छोटी, गंभीर और सटीक.

 अब फ़ास्ट फॉरवर्ड करके आ जाते हैं वर्तमान में. अपनी बात. लोग कहते हैं कि हमारा अपार्टमेंट ‘बोटैनिकल गार्डन’ लगता है. लोगों को अजूबा इसलिए लगता है कि पचास तल्ले की बिल्डिंग के कबूतर खाने जैसे अपार्टमेंट में - कैसे इतने पौधे ! देशी-विदेशी जो भी आते हैं वो पूछते जरूर हैं पौधों के बारे में. लेकिन अब ये कथा तो बचपन से ही वायर्ड हैं दिमाग में तो हम क्या बोलेंगे.. मुस्कुरा भर देते हैं. कुछ हांकने से पहले ही कथा दिमाग में कौंध जाती है. वैसे हम करेंगे भी क्या. गमले, मिट्टी, बीज सब कुछ तो मिलता है बस हम इतना करते हैं कि लगा देते हैं. और सर्दियों में जब हिमपात का मौसम होता है. सूर्य दक्षिणायन होते हैं जब कुछ नहीं उगने का समय होता है तब मिट्टी में कोई भी बीज दबा देते हैं. कुछ दिनों में हरा-भरा निकल आता है – आलू, चना, सरसों, मुंग, उड़द. उसमें भी फूल लगता है. खुबसूरत भी दीखता है. और जब मौसम हो तब तो बीज मिलते ही हैं बाजार में.

पर लोग तो लोग - एक मित्र पहले तो दुखी हुए कि उन्होंने बहुत कोशिश की पर लगता ही नहीं. - कैसे लगाते हो? हमारे तो दिमाग के बैकग्राउंड में कथा ! तो हम माहौल में स्माइली बना देने के सिवा क्या कहते. पर कुछ देर के बाद वो पलटी मार कर खुद ही ज्ञान देने लगे - ‘अभिषेक एक गड़बड़ है. ये दो पौधों को तो तू प्रून कर दे. छंटाई करने से और फनफना के बढ़ेंगे.' दो में से एक तुलसी. हम अपने पौधों के पत्तों को कभी हाथ नहीं लगाते और वो काट-पीट के धर दिए. ‘अभिषेक, तू बेकार मोह कर रहा है ऐसे ही बढ़ते हैं! देखना.’ हम तिलमिला कर रह गए लेकिन थोडा तो समझ में आ गया कि उनके पौधे क्यों नहीं लगते ! लहलहाती फुलवारी वाले जब एक्सपर्टई करने लगे तब ‘भगवान की लीला’ हो ही जाती है और यहाँ तो बिना कुछ लगाये भी ..एक तो एक्सपर्ट ऊपर से बिन मोह दया - पौधे कहाँ से लगेंगे !

 हमारा पौधे लगाने का सिलसिला शुरू हुआ था तुलसी लगाने के प्रयास से. उसके पहले लगे लगाए रेडीमेड गमले ही लाते थे. कृष्ण-तुलसी के बीज ऑनलाइन मिल गए तो गमले और मिट्टी सुपर मार्केट में. उसके बाद तो एक से दो होते हुए दर्जन भर गमले हो गये. मन बढ़ा तो और भी पौधे लगाते गए... एक दक्षिण भारतीय मित्र से ओमवल्ली (कर्पुरावल्ली) का डंठल मिला और फिर... बैम्बू, मनी प्लांट, गेंदे के फूल, सूरजमुखी, आलू, टमाटर, पुदीना... हमारे अपार्टमेंट में फर्श से लेकर छत तक खिड़की है और वो भी दक्षिण-पूर्व दिशा में जिससे सर्दियों में दिन भर धूप रहती है. जो इस देश के लिए ग्लास-हाउस की तरह काम कर देती है और पौधे लहलहा उठते हैं – बाकी आगे कहने को तो बहुत मन हो रहा है लेकिन – कथा !. वैसे कभी-कभी गड़बड़ भी हो जाती है. जैसे - टमाटर ! हमने बचपन में जो देखा था वो टमाटर का पौधा छोटा ही होता है. लगाने के बाद पता चला कहने को चेरी टोमेटो लेकिन हो गया आठ फीट का. धागे और टेप से खिड़की के शीशे पर किसी तरह उसे सहारा मिल पाया !


 एक अन्य मित्र हमारे घर आ चुके थे और उन्होंने अपने एक अन्य मित्र को हमारे पौधों के बारे में बताया. और बात मित्र से मित्र तक जाते जाते थोड़ी तो बदलती है ही. ये मित्र के मित्र एक बार मिले तो कहने लगे (फेक अमेरिकी एक्सेंट में पढियेगा) – ‘आई हर्ड आप तो सब्जी एंड आल भी उगा लेते हैं अपने अपार्टमेंट में ! आपको तो खरीदना भी नहीं पड़ता होगा. कैसे लग जाता है यार.. मैं तो... कितने प्लांट्स लेकर आया. दे जस्ट डाई ! मैं तो मिनरल वाटर डालता था एंड यू नो प्लांट फ़ूड  वो भी खरीद के लाया. आप बताओ कुछ.’

 ...हम तो सही में कुछ नहीं करते हैं तो क्या बताते. लेकिन हमें पहले तो ये लगा कि इसके तो एक्सेंट सुन कर ही पौधे मर जाते होंगे ! दूसरी ये कि जिसे लगता है कि गमले में उगा कर खाने लायक हो जाएगा उसको कैसे समझाया जाय. हमें समझ ये नहीं आया कि ये लड़का चार साल से अमेरिका आया है और इतना एक्सेंट !वो भी हाथ मुंह टेढ़ा कर कर के ! देखिये हम जजमेंटल तो नहीं हैं लेकिन अब ऐसा भी नहीं हैं कि राजस्थान में पला बढ़ा व्यक्ति इतने एक्सेंट में अंग्रेजी बोलने लगे. बहुत से राजस्थानी दोस्त हैं अपने भी. और हम ठहरे फैन उन बनारसी के जो बीस साल से रह रहे हैं अमेरिका में. उनकी बीवी रसियन. (८०% फैनता तो यहीं हो जाती है वो ठेठ बनारसी और उनकी पत्नी .. खैर !) और आज भी जब वीजा को भ पर जोर लगाकर भीजा कहते है तो लगता है दुनिया में इंसानियत अभी ख़त्म नहीं हुई. वो चार महीने की गर्मी में लौकी नेनुआ उगा लेते हैं - उगा ही लेंगे ! खैर मिलने को  तो ऐसे लोगों से भी मिल चुका हूँ जो कह देते हैं कि वो भूल ही गए अपनी भाषा ! मुझे अभी तक ये बात समझ नहीं आई कि कोई अपनी भाषा कैसे भूल सकता है !

 खैर... इसी बात पर एक और प्रसंग –

ये उन दिनों की बात है जब खलिहान में कटी फसल पर बैलों से रौंदवाकर दवनी होती थी. एक व्यक्ति दो साल के बाद कलकत्ता से लौटकर अपने गाँव आया था. खलिहान पहुंचा तो मसूर की दवनी चल रही थी. एक तरफ अनाज ओसाकर रखा हुआ था. उसने स्टाइल (अर्थात उस जमाने का कलकत्ता रिटर्न एक्सेंट) में पूछा – ‘इत्ते इत्ते दाना क्या है?’

खलिहान में सन्नाटा पसर गया. बैल तक ठहर गए ! ऐसी विचित्र बात ही हुई थी. दो साल कलकत्ता में रह कर आया व्यक्ति मसूर भूल गया ! खलिहान में ही गाँव के एक चटकवाह (तेज तर्रार) बुजुर्ग भी बैठे थे – अनुभवी. छाया में बाल सफ़ेद किये हुए (मतलब वही कि बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये थे). उन्हें ये वाला भूत भगाना बखूबी आता था. बैठे-बैठे दो नौजवानों को उन्होंने इशारा किया. दोनों नौजवान लठ्ठ लेकर टूट पड़े. जब दो चार लट्ठ सही से पड़ गए तब कुटाया हुआ व्यक्ति चिल्लाया – ‘अरे मसूर है मसूर. याद आ गया.’ !

प्रसंग समाप्त.

 मन तो हमें भी वही हुआ लेकिन... हम ऐसी हिंसा के बस सैद्द्धान्तिक समर्थक है. इस विषय में मेरे पास लालू की सुपुत्री मिसा भारती वाली डिग्री है... प्रैक्टिकल का कोई अनुभव नहीं - फेल पास तो तब होते जब कभी कोशिश किये होते. अब हम क्या बताते इस मित्र के मित्र को, सोचें कि इसको इसीकी भाषा में समझाना ठीक रहेगा तो हमने कहा – ‘तुम्हारे प्लांट्स ओबेसिटी से मर रहे हैं. वो ठहरे.. जंगल में रहने वाले जीव. वाइल्ड. यु नो. उन्हें मिनरल वाटर और प्लांट फ़ूड खिलाओगे तो फिट कैसे रहेंगे’.

 उन्हें ये बात तुरत समझ आ गई. पर ‘जीव’ वो सुन नहीं पाए. पौधे जीव हैं. जीवन - पूरा जीवन चक्र होता है पौधों का. अगर कुछ दिन पानी न दीजिये तो देखिये वो कैसे जीने के लिए छटपटा कर परिवर्तत होते हैं. जीजिविषा से भरपूर ! सूर्य की तरफ झुके... और यदि टमाटर के पौधे को कुछ दिन पानी नहीं मिला तो फटाफट फल लग कर पक जाता है. धीरे धीरे होने वाली प्रक्रिया त्वरित हो जाती है क्योंकि उन्हें लगता है कि अब जीवन समाप्त होने वाला है अपने गुणसूत्र संचित करते चलें – वनस्पति शास्त्र ! यदि पौधे सूखने लगें तो थोडा तो सोचो कि क्या कारण हो सकता है. पानी ज्यादा है तो कम डालो. अगर जडें ज्यादा हो गयी हो तो बड़े गमले में ट्रांसफर कर दो. मत्स्यावतार की तरह बढाते जाओ गमलों का आकार.

पर यदि आप ऐसे व्यक्ति है जो खुद कुछ ठीक करने के पहले कस्टमर केयर को फ़ोन करते हैं तो आपसे पौधे क्या ही लगेंगे. हम उस वर्ग के जो यहाँ टूलबॉक्स खरीद के ले आये और निराशा होती है कि इस देश में कुछ खराब होने जैसा है ही नहीं जिसे खोल खाल के थोडा कसा जाता! कहानी का असर नहीं होता तो कह देते कि बावन बीघा में पुदीना उगता है हमारे घर ये गमलों में उगाना कौन सी बड़ी बात है लेकिन हम ऐसा कभी नहीं कहेंगे. 😊


 पौधे जीव हैं. और जीव के प्रति ...पौधों को जीव समझिये बस लग जायेंगे. और हाँ फर्जी एक्सपर्टई से बचिए.

 किसी ने कह दिया ‘ये तो बात करता है अपने पौधों से.. प्यार से रखता है.’ कथा दिमाग में आई और मैंने तुरत रोका बस-बस. यदि आपको शौक है तो लगाइए. हाथ अच्छा-बुरा नहीं होता.. पौधों में जीजिविषा होती है. वो खुद लगते हैं. (नहीं लगे तो ऊपर वाली कथा का पांच बार जाप कीजिये.)

 हमारे घर के पास ही एक सप्ताहांत किसी ने मुफ्त में ढेर सारी किताबें रखी थी (होते हैं भले लोग) उनमें से एक उठाकर ले आया. पूरी किताब में जीने की कला जैसी कुछ बात थी. पर हाय रे फर्स्ट वर्ल्ड. उसमें जो बातें लिखी थी... ऐसी थी - एक दिन गाना गाओ, एक दिन दूर तक पैदल चलो, एक दिन एकांत में जाकर चिल्लाओ, पौधे लगाओ, किसी मशीन को खोलो और उसे वापस कस दो, मिटटी खोदो और उसमें लेट जाओ, पेंटिंग बनाओ... माने कुल मिला के उसमें ये था कि आदमी इतना न सुकून की जिंदगी जीने लगा है कि जीना ही छोड़ दिया है. लेकिन पढ़ते हुए ये भी लगा कि ये सब तो वैसे ही होता है रोज जिंदगी में.. और जो ऐसा नहीं है या जिसे ये सब भी सिखाना पड़ रहा है... वो यदि ये सब करने भी लगे तो वो पगलेट जैसा ही तो दिखेगा. उसे इन बातों में जो आनंद आता है वो करने से भी न मिले शायद. किताब ‘पीड़ित रे अति सुख से !’ लोगों के लिए थी. उन्हें ये याद दिलाने के लिए कि जिंदगी ऐसी ही होती है ...जैसी होती है.  बस वैसे मत बन जाइये.

 जीवन अपना रास्ता खोज लेता है... वही जीवन, वही जीजिविषा - जो आपमें है ! वही पौधों में भी होती है... या कोई भी काम कीजिये. मन से कीजिये. लहलहाएंगे पौधों की तरह ही. आपको आनंद आएगा हर उस काम में. लेकिन कथा जरूर ध्यान में रखियेगा नहीं तो...

और  अंत में कुछ तस्वीरें. ये कैसे लगे मत पूछियेगा.  वैसे उत्तर तो आपको पता ही है – प्रभु की इच्छा !

हरी ॐ तत्सत ! 😊





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~Abhishek Ojha~