Mar 29, 2007

Mark tully

I liked the books written by Mark Tully, I read No Full stops in India in December 2005. I got that book in Prof. Prakhya's office at IIM Bangalore with a thick layer of dust on that. I started reading while I was waiting for a meeting... I never wanted to put down the book after that.

A few weeks ago I started reading some books about India... I picked 4 books:

1. A passage to India by E M Forster
2. Freedom at night by Larry Collins,Dominique Lapierre
3. India in slow motion by Mark Tully
4. The Heart of India by Mark Tully

Well... all are very good books and I can't rank which one I liked most. I wrote about freedom at midnight. I also wanted to write something about A Passage to India but I don’t find myself good enough to write about a classic. I was unable to stop myself to write something about Mark Tully... I simply loved the way he writes about India. He does so because of his love for India. After reading No Full stops in India I found it hard to believe that it is written by a foreigner. I don't agree fully with him at many points but still I loved the books. No full stops in India and India in slow motion are good books, The heart of India is also worth reading.

Well the following lines by Mark Tully in introduction of The Heart of India depict his love for India....

“I soon realized that it was not going to be difficult to get involved in India. From the first day I arrived I was surrounded by friends... many are still good friends to this day. It's through them that I became involved in their country. Now, when I am asked why I'm staying on, I reply, 'Because of my friends'.

That, of course, is only part of the truth. I'm drawn to India by its beauty, particularly its natural beauty. Recently I was beside a campfire in the Great Himalayan National Park, watching the snow-covered mountains glitter in the sunset. A week later I was in Kerala, in the extreme south, sitting in my bathing trunks, looking out over the Arabian Sea as the sun slid like a great red dome below the horizon. There are the smells of India too, which invoke such nostalgia. There is the dry scent of early summer in Delhi as the blue jacarandas, the scarlet gulmohars and other trees come into flower, the sweet smell of the queen-of-the-night and the freshness of the first scent of pine trees in the foothills of the Himalayas after a long, hot and dusty drive across the plains. There are the folk songs and the classical music with raagas that start with such austerity and end in ecstasy. There are the great epics and the love poetry. There's the art of the Pradhan tribe in Central India which occupies the whole of one wall of my flat. There's the color of the festivals, the solemn dignity of the courtyards of the great mosques filled with line after line of worshippers bowing there heads in prayer and the colorful informality of the pujari performing the evening rites in a Hindu temple. There's the sound of priests singing the Sikh scriptures carrying across the water of the sacred tank in which the Golden Temple stands. There are the great monuments of India. I have never known anyone to be disappointed by the Taj Mahal or the forts of Rajasthan. There are fresh cooked parathas for breakfast in the open-air dhabas, or restaurants, along the Grand Trunk Road, and there's the delicacy of a vegetarian thali, or tray, in Gujarat.

All these keep me in India, but they are not the whole. It would need a poet to describe what India means to me, and I am not a poet. I can only say that I'm not alone among foreigners in believing there's nowhere like India, and no people like Indians. I am perhaps more unusual for a foreigner in that I have accepted as a part of India. ....

... There would have been no stories to tell if it hadn't been for the villagers who welcomed us into their homes, insisted on giving us food and, of course, tea and answered inquisitive questions. In many parts of the world I would have been told to mind my own business....”

More or less this is the image I carry in my mind for India… Now, what can I say about this man and his books about India! I can only wish to travel throughout India and interact with people like he did.

I am looking forward to read some more books by Mark tully along with some books of William Dalrymple.

Please note that these are my personal views and I am not reccomending these books to you, you will like these books only if you are interested in these kind of books.

~Abhishek Ojha~

Mar 28, 2007


ये कहानी मैंने एक प्रतियोगिता के लिए लिखी थी... प्रतियोगिता का परिणाम तो पता नहीं क्या होगा... वैसे बिना किसी पौराणिक घटना को आधार रखे बिना कहानी लिखने का ये मेरा पहला प्रयास था...
अब पढ़ता हूँ तो लगता है कि और अच्छा लिख सकता था, पर वही पुरानी आदत... एक बार जो लिख दिया फिर से पढ़ के बदल नहीं पाता... pdf अपलोड कर रहा हूँ क्योंकि ये कहानी shusha font में लिखनी पड़ गयी थी... आशा करता हूँ कुछ पाठकों को पसंद आएगी।

Link of the Story

~Abhishek Ojha~

Mar 22, 2007

काम, क्रोध, मद, लोभ...

दशानन रावण अपने पड़ाव के विश्रामकक्ष से गिरिराज हिमालय की शवेत चोटियों की रमणीय छटा निहार रहे थे। संध्या विदा ले रही थी और शिवेन्दु उन पवित्र शुभ्र चोटियों के उपर दैदिप्यमान हो चुके थे। लंकेश के प्रकोष्ठ से दृष्टिगोचर उस सरोवर में शिवेन्दु समेत सम्पूर्ण तारामंडल, पर्वत, वृक्ष, पुष्प, लता, विटप... अपने निष्कलंक प्रतिबिम्ब को हर्षित हो देख रहे थे। कमलो से विलासित उस सरोवर में कुमुद खुल गये थे ओर भ्रमर कमल के प्रेमपाश मे पूरी रात्रि के लिये बँध चुके थे। देवदार वृक्षों को पार कर चँहुओर से आनेवाले मंद-सुगंधित-शीतल-समीर के सानिध्य से दशानन अत्यंत पुलकित हो रहे थे।

वह महातेजस्वी ब्राह्मण, वेदज्ञ, प्रतापी, पराक्रमी, रुपवान तथा विद्वान था। नवग्रह उसकी पराधिनता स्वीकार कर चुके थे। बालि के किष्किन्धा और कैलास के अतिरिक्त, कोई राजा तो क्या इन्द्रलोक भी रावण-राज्य के अन्तर्गत आ गया था।

महर्षि वाल्मिकी के शब्दो मे्-
अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:। अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥

और फिर जैसा कि तुलसीदास ने कहा है- प्रभुता पाई काहि मद नाहीं। फलतः वह कई अवगुणों से भी परिपूर्ण था। यथा- यज्ञों का विलोप, देव-असुर-मनुष्य कन्याओं का हरण, धर्म का नाश इत्यादि।

उस सुरम्य प्राकृतिक पड़ाव में भी सदा की तरह सहस्त्रों हरण की हुई कन्यायें थी। जो रात्रि के प्रथम प्रहर के लिये श्रृंगार कर रही थी।

अचानक आत्मविभोर दशानन का ध्यान भंग हुआ। वो अपूर्व सौंदर्य... जिसे ब्रह्मा ने स्वयं गढ़ा होगा। क्या ब्रह्मा का मन पुनः एक बार विचलित नहीं हो गया होगा?* वो रूप-सौंदर्य जो उसके अतिरिक्त मात्र तीन युवतियों को प्राप्त था।**

'देवी आप कौन हैं? आपको पहले कभी नहीं देखा? लंकापति रावण के सम्राज्य में आपका स्वागत है!' लंकापति ने ये काँपती आवाज में कहा था।
'मेरा नाम रम्भा है। मैं एक अप्सरा हूँ। मेरा विवाह कुबेरपुत्र, नलकुबेर से निर्धारित हो चुका है।'

दशानन ने वह गौरवर्ण काया देखा। उस आकर्षण का वर्णन तो रसेश्वर कालिदास को भी कठिन प्रतित होता। वह अतुलनीय वक्ष-कटि-नितंब अनुपात कदापि ब्रह्मा ने सौंदर्य का अधिकतम मापदंड निर्धारित करने के लिये बनाया हो। ब्रह्मा की वह अंग-रचना सौंदर्य तथा आकर्षण का पंजीभूत प्रकटीकरण थी। वैदिक ऋचाओं के ज्ञाता रावण को वह तरुओं के पुष्पित यौवन के समान मादक काया विकल कर रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे युवती के रुप में स्वयं कामदेव, अपने सहचर वसंत तथा पत्नी रति के साथ वहाँ उपस्थित हो सारे वातावरण को सकाम कर रहे हों। उस अद्वितीय सुन्दरता को दिव्य आभूषण, पुष्पालंकरण और प्रकृति नई दिप्ति प्रदान कर सौंदर्य में वृद्धि कर रहे थे। ऐसे वातावरण में कालिदास जैसे कवि अभिज्ञानशाकुंतलम् लिख डालते हैं और वात्स्यायन जैसे कामसुत्र ! जीवधारी क्या, निर्जीवों में भी कामभावना जागृत हो जाय।

लंकेश का मन उत्छ्रिङ्खल क्रीड़ा करने लगा। 'देखि लीजो आंखें ये खुली ही रह जायगी।'
मन में उठती हुई तरंगों को रोकते हुए लंकेश ने कहा-'हे रम्भा! तुम इन्द्रलोक की अप्सरा हो, और मेरे पुत्र ने इन्द्रलोक पर विजय पायी है। अब तुम हमारे अधीन हो। तुम हमारी आज्ञा के बिना नहीं जा सकती।'
'हे दशानन! मैं नलकुबेर को अपना पति मान चुकी हूँ और इसप्रकार आपकी पुत्रवधू हुई' सुन्दरी ने सहमते हुए कहा।
'अप्सरायें किसी की पत्नी, वधू या पुत्रवधू नहीं होती। अप्सरायें राजसभा की नर्तकियाँ होती हैं और आज तुम हमारी नृत्यशाला की शोभा बनोगी' रावण ने आदेश की मुद्रा में कहा।
'हे लंकेश! ये अनर्थ ना करें। नलकुबेर मेरी प्रतीक्ष में होंगे। मैने रात्रि के प्रथम प्रहर के बाद उन्हें मिलने का वचन दे रक्खा है।'
'रे मुर्ख अप्सरा! तु लंकापति रावण का अपमान कर रही है।' रावण का मन उस भ्रमर की भाँति हो उठा जिसने नया खिला हुआ परागयुक्त पुष्प देख लिया हो। महाबली रावण ने उस सौंदर्य को अपने बाहुपाश में जकड़ना चाहा। बिलखती हुई उस युवती ने अत्यंत संघर्ष के बाद उस महाबली के बाहुपाश मे आत्मसमर्पण कर दिया।

हाय रे! अबला...। हिमालय-मेना के आँगन में ये अत्याचार! हे शिव! तुमने इस कामदेव को अनंग रुप में क्यों जीवित किया? आज फिर मर्यादा भूल ही गया।

प्रकृति ने जैसे उस मसले हुए पुष्प के साथ रुदन प्रारंभ कर दिया हो। वह रावण जिसके रुदन से ब्रह्मांड आंदोलित हो गया था, इस करुण रुदन का उस पर क्या असर होता! उन्मत्त हो वह अपने विश्रामकक्ष मे वापस चला गया।

उजड़ी हूई वाटिका की तरह रम्भा एक प्रहर देर से नलकुबेर के पास पहुँची। उसके श्रृंगार के केतकी के पुष्प कुम्हला गये थे। उसने रोते हुए सारा वृतांत कह सुनाया...। नलकुबेर गुस्से से जलने लगे। अपने तातश्री के किये पर वह लज्जा और क्षोभ से भर गये। उन्होंने अपनी दोनो भुजायें उपर की और कहा -'हे महापापी रावण! मैं तुझे शाप देता हूँ... अगर तुने पुनः कभी किसी औरत के साथ बलात् करने की कोशिश कि तो तेरे सिर फट जायेंगे।'***

रावण के विश्राम कक्ष में हाहाकार मच गया। नृत्यशाला की हर नर्तकी और हरण की हूई हर एक युवती अब अपनी इच्छा से रावण का विरोध कर सकती थी।

धन्य हो नलकुबेर !

सत्य ही है- 'काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।'

और श्रीमद्‌भगवद्‌गीता की ये पंक्तियाँ :

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२- ६२॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥२- ६३॥

विषयों का चिन्तन करनेवाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है, कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से अत्यंत मूढ़भाव (सम्मोह) उत्पन्न हो जाता है, सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है, स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्घि का नाश हो जाता है, बुद्घि का नाश होने पर मनुष्य का नाश हो जाता है।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥१६- २१॥

काम, क्रोध तथा लोभ - ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनोंको त्याग देना चाहिये।

*ब्रह्मा का मन संध्या को बनाने के बाद, उसकी सुंदरता देखकर विचलित हो गया था।

**उर्वशी, मेनका, रम्भा तथा तिलोत्तमा ये चार इन्द्रलोक की सर्वश्रेष्ठ अप्सरायें थी।

***ऐसा माना जाता है कि इस शाप की वजह से ही रावण ने सीताजी के साथ कभी बलपूर्वक व्यवहार नहीं किया।

~Abhishek Ojha~

Mar 21, 2007

चला था मैं...

चला था मैं
पाँच साल पूर्व-
एक अनजान पथ पर,
सोचा न था-
होगा क्या?

कुछ पथिक मिले,
कुछ साथ चले,
कुछ देर चले,
सुख-दुःख सब बाँट चले।

ना दिन रहा, ना रात रही,
हर समय मनोहर शाम रही।
स्नेह मिला, मुस्कान मिली,
बहार मिले, यादे मिली।
यहाँ बात बनी,
वहाँ नही बनी।
पर रुक जायें, इतना वक्त कहाँ
पथिको ने था रोका वक्त वहाँ।

चौराहे आये-
सब बिछड़ गये,
कुछ भुल गये,
अब यादे हैं, बस यादे हैं।

अरे! चला तो था मै !
कुछ ही पल पूर्व-
उस छोटे पथ पर,
पता न था-
है स्नेह क्या !

~Abhishek Ojha~

Mar 19, 2007

Freedom at Midnight (by Larry Collins,Dominique Lapierre)

As a book it’s excellent... a great way of story telling. It’s more like a novel then a historical book. The book is very interesting and it’s difficult to put down... once you start reading it.

Broadly, the book starts with Louis Mountbatten’s appointment as a viceroy of India and ends with assassination of Mahatma Gandhi. It is always said that this book is not written by an Indian neither by a British and hence it is a true and impartial depiction of incidents. Well… The book is based on many interviews and mainly with Mountbatten. It can be observed easily that the views/incidents mentioned in book are not totally impartial and are highly influenced by Mountbatten(s).

The depiction of Gandhi in book is just excellent. I liked those chapters… I think the book has one of the best descriptions of Gandhi and his ideologies. The depiction of Gandhi’s personality is amazing and it seems that Movie Gandhi (one of my all time favorites) is inspired by this book.

Gandhi was Gandhi… undoubtedly one of the greatest men born… but the chapters about Mountbatten are something which doesn’t seem to be true at many places. He was a good friend of Nehru and he became first governor general of independent India but being credited for every good thing is something unbelievable. Whenever something went wrong author put the responsibility on Nehru-Patel but Mountbatten was just perfect, he only did good things, always took right decisions, had enormous power in his hands… Unbelievable!!

The Jinnah as an evil… well I don’t know much about him (except wikipedia and some small writings about him). So, I can’t say it’s true or exaggerated. But (I read somewhere)… If we look back at the history of India and Pakistan… it seems that the depiction of Jinnah and Nehru is more or less true.

The chapter on Maharajas is very entertaining and interesting… well they were there and thats why there was British Raj. The portrayal of Raj is also justifiable.

I think that the author should have mentioned something more about common Indian people. At the end a reader will feel that Indian people are filled with hatred and killing… that’s again a misleading for a person who is unknown of India/Indians and reads this book. Also, author should have mentioned somewhere about the other Indian leaders/freedom fighters their views and influence on Indian people (like Subhash Chandra Bose etc). One more point… below a photograph the book introduces Savarkar as ‘a homosexual Hindu fanatic’ but in book its nowhere mentioned. This was the first time I heard of Savarkar being a Homosexual and without proof I don’t believe this fact.

The riots and partition are something which is greatly explained in the book. The horrifying picture of Hindu-Muslim riots in Lahore/Calcutta and other places is just perfectly portrayed. I believe, No one can explain the tragedies of partition better than that.

Last but not the least… the short stories and interesting footnotes are just great… I will again say… great writing style... worth reading.

~Abhishek Ojha~

Mar 16, 2007

लप्पू झन्ना - एक संस्मरण...

भारतीय रेल का समय से आ जाना... एक यात्री के लिये इससे सुखद और क्या हो सकता है? भोंपू से आवाज आई... 'यात्रीगण कृपया ध्यान दें! ट्रेन नम्बर २५०६, नार्थ-इस्ट एक्स्प्रेस जो नई दिल्ली से चलकर गुवाहाटी को जायेगी, अपने निर्धारित समय १२ बजकर ५० मिनट से ३० मिनट देरी से प्लेटफार्म नम्बर ४ पर आने की सम्भावना है। यात्रियों को हुई असुविधा के लिये खेद है।' इस मात्र ३० मिनट देर होने की सम्भावना से यात्रियों में हर्ष की लहर दौड़ गयी...।
अरे वाह! आज तो सही समय पर चल रही है ! हम कल १२ बजे तक पहुँच जायेंगे। मेरे मित्र की ये आशावादी प्रवृति और ८:१५ की जगह १२ बजे पहुँचने की सम्भावना होने पर भी खुशी... वाह रे, भारतीय रेल!

कानपुर सेंट्रल की इस उद्घोषिका के मधुर खेद के साथ हमने अपनी बहुप्रतिक्षित उत्तर-पूर्व भारत की यात्रा आरंभ की...। हमारे सामने वाले सीट पर जो महाशय थे, उनकी पान-सुर्ति-रंजित बतीसी सुशोभित मुस्कान कोई कैसे भूल सकता है। उनकी निराली वेष-भुषा और हाव-भाव का वर्णन तो सरस्वती और शेषनाग के लिये भी आसान नहीं होगा...। वो रंगे हुए नाखुन..., वो ५ सितारों से जड़ा हुआ और सुनहरे अक्षरों में NYC अंकित किया हुआ लाल रंग का स्वेटर..., वो Nike लिखी हुई जुराबें, वो अपनी जँघाओं पर तानसेन की तरह अँगुलियों का फिराना...। मेरे मित्र की पैनी निगाहों के निरीक्षण में ये सारे अद्वितीय श्रृंगार और उनकी सारी क्रियाँए आ गयी। अगले ही पल मुझ तक प्रेषित हुई... और हमनें एकमत से कहा... - लप्पू झन्ना।
(सब लोग गंभीर मुद्रा में थे... मैंने हँसना उचित नहीं समझा, वर्ना लोग सोचते... इसके कील-काँटे ढ़ीले हो रहे हैं।)

'आपलोग कानपुर में रहते हैं...?'
'आपलोग कहाँ उतरेंगे?'
'न्यु-जलपाईगुड़ी... आप?'
'बस... आपसे एक स्टेशन पहले...!'
ये उत्तर मुझे कुछ अज़ीब सा लगा... अरे 'आपसे एक स्टेशन पहले' का कुछ नाम भी तो होगा। मेरे दिमाग में (n-1)th stage strategy जैसा कोई सिद्धांत, उस पान-सुर्ति-रंजित बतीसी के साथ-साथ चक्कर काटने लगा...। अग़र ट्रेन से किसी का सामान लेकर उतरना हो... तो 'आपसे एक पहले वाला स्टेशन' ही सर्वोत्तम विकल्प होगा...। वाह रे ! मानव मस्तिष्क...।

'भारतीय रेल लाखो लोगो को रोजगार देता है' और इसका सबसे बड़ा प्रमाण- द्वितीय श्रेणी।
चाय... चाय... गरम़ चाय...।
'ऐ चायवाले! एक चाय देना... कैसी चाय है?... पैसा चाय पीने के बाद ही मिलेगा, ...अच्छी हुई तभी दूँगा!' (फिर मेरा दिमाग का कीड़ा कुलबुलाया... क्या कोई ऐसी दशा में भुगतान करेगा...?)
'भाईसाहब, पैसे दे दो।'
'अरे अभी तो मै पी रहा हूँ... और तुम्हारी चाय भी अच्छी नहीं है!'
चाय वाला झल्लाया 'भाईसाहब और भी लोगों से पैसा लेना है, एक आप ही नहीं हो।'
'अच्छा किनने हुए?'
'४ कैसे? ३ होते हैं!' समस्या का समाधान कुछ इस प्रकार हुआ कि झन्ना महाशय के पास से १० रुपये का नोट निकला... और चाय वाले ने कुछ हिसाब लगाया... 'आप इनसे ६ रुपये ले लेना...।'
झन्ना महाशय के तर्क-वितर्क को दर किनार कर चुटकी लेते हुए बोला 'अरे! एक ही रुपया तो ज्यादा लिया है आपसे...आप जैसे लोगो के लिये...!' ...झन्ना महाशय की छाती गर्व से चौड़ी हो गयी।

कुछ देर बाद... पान-सिगरेट की दुकान आ गयी। फिर स्मरण हो आया कि सार्वजनिक स्थलों पे धुम्रपान निषेध है...। फिर सोचा कि हमारे देश में हर काम प्राथमिकता के आधार पर होता है... और भारतीय रेल... लाखो लोगो का रोजगार... ज्यादा महत्तवपूर्ण विकल्प है।
'एक पान लगाओ, कितने की दे रहे हो?'
'ये ४ के हैं, और इधर वाले ३ के...' काफी निरीक्षण के बाद झन्ना महोदय एक ३ वाला पत्ता निकालते हुए बोले 'ये लगाओ'
'...अरे तुम तो मसाला ड़ाल ही नहीं रहे हो!' पानवाले की टोकरी से एक पुड़िया उठाते हुए बोले 'ये क्या दिखाने के लिये रक्खा है? ये भी ड़ालो।'
'भाईसाहब इसके ३ रुपये केवल इसके लगते हैं।'
'कमाल करते हो तुमलोग भी... हमारे घर पे तो मुफ़्त का मिलता है!' ये मुफ़्त में मिलना...। पानवाला भी रोबदार व्यक्ति था 'लेना है?... तो लो... बेकार का झिक-झिक मत करो।' अंततः सुपारी के दो टुकड़ों पे समझौता हुआ।

मुग़लसराय आते-आते ट्रेन चीन-निर्मित समाग्रियों की चलती-फिरती दुकान में परिवर्तित हो गयी। हमारे झन्ना महाशय ने कितनी दुकानें रोकी और कितना समय व्यतीत किया...सब स्मरण करना आसान नहीं है। बात आयी अँगूरों की तो झन्ना महाशय के तोल-मोल की क्षमता से मैं दंग रह गया। देखो भाई तुम्हारे अँगूर गोल हैं, मीठे तो लम्बे वाले होते हैं। (लम्बे ही चाहिये, तो गन्ना ले आओ... क्यों बेचारे का सिर खा रहे हो) ऐसे अनगिनत तर्क देने के बाद करीब ४०% बट्टे पर उन्होंने २ किलो अँगूर खरीदे। सब कुछ सकुशल कैसे निपट जाता, झन्ना महोदय ने अचानक जोर से आवाज लगायी 'इधर सुनो! ये २ किलो हैं? मुझे तो कम लग रहे हैं।' मोल में जो बात बनी थी, तोल में आकर अटक गयी...। फल विक्रेता भी इस सौदे को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था... अपनी सारी विद्यायें लगाकर उसने अपनी जान छुड़ाई।

विनम्रता जैसे गुण धारण करने वाले पुरुष भारतीय जनसंख्या के उच्चतम घनत्व वाली जगहों पर भी आसानी से पहचान लिये जाते हैं। रसोईयान का भोजन वितरक भी एक ऐसा ही व्यक्ति था।
'३५ रुपये में तो ५ किलो चावल मिल जाता है, ये इतना कम लाये हो! और पनीर का कोई व्यंजन तो है ही नहीं...' लप्पू झन्ना ने आश्चर्यचकित भाव से कहा। भोजन वितरक ने बड़ी ही सहजता से कहा 'साहब हम क्या कर सकते हैं, ये सब तो हमारे मालिक फैसला करते हैं। हम तो साहब जितना कहा जाय उतना ही करते हैं।'
'अच्छा अपने मालिक से कहो कि ऐसा नहीं होता है' (मैं सोच में पड़ गया कि कहीं किसी ट्रेन में ५ किलो चावल तो नही मिलता है)... एक लम्बा व्याख्यान फिर... 'चलो मान लिया तुम्हारी गलती नहीं है, पर अब इतना कम खिलाया है... तो एक पान खिलाओ ! अभी वापस जाना तो एक पान ले आना।' ... वाह रे लप्पू...।

भोजन के साथ प्लास्टिक का एक जल से भरा हुआ बंद गिलास भी मिला था। झन्ना महाशय की नज़रें उस पर काफी देर तक टिकी रही, और वो काफी संतुष्ट लगे। ... इसे तो घर ले जायेंगे... पहली बार वो संतुष्ट दिख रहे थे।

हाय रे दुर्भाग्य ! मैं अन्यत्र व्यस्त हो गया... फिर नींद... झन्ना महाशय कब तक जगे, और मैंने क्या कुछ खोया.. कह नहीं सकता। जब आँख खुली तो वो ट्रेन से उतर रहे थे। मैं प्रसन्न था कि (n-1)th stage strategy गलत साबित हुई...।

मैने कहा 'आपका गिलास' और उन्होंने मुस्कुराते हुए (वो मुस्कान जो अब चिर-परिचित लगने लगी थी) अपने गिलास और पान-सुर्ति-रंजित बतीसी के साथ... हमसे विदा लिया... आगे की यात्रा... फिर कभी... । ~Abhishek Ojha~