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Mar 30, 2021

हिन्दी


‘लेबंटी चाह’ के एक प्रोग्राम में एक प्रश्न उठा: मैंने ‘लेबंटी चाह’ हिन्दी में क्यों लिखा? अंग्रेज़ी क्यों नहीं? काम करते हो न्यू यॉर्क में, पढ़ाते हो मशीन लर्निंग और किताब हिन्दी में!

पौन घंटे के प्रोग्राम में मैं विस्तार से बता नहीं पाया। मन नहीं भरा अपने उत्तर से। कई बातें हैं और सारी बातें इसी बात पर ‘कंवर्ज’ होती हैं कि लिखना हिन्दी में ही हो पाएगा। जैसे एक और सवाल था कि क्या मैं अपनी किताब का अंग्रेज़ी में अनुवाद करवाना चाहूँगा? जिसका उत्तर मैंने दिया - नहीं। क्योंकि किताब की भाषा भी कथानक जितनी ही महत्त्वपूर्ण है और मुझे लगता है कि उसका ठीक-ठीक अनुवाद हो नहीं सकता।

...असली कारण तो वही है जो अनूप जी ने दैनिक जागरण में तब लिखा था जब मैंने पटना डायरी लिखना शुरू ही किया था। उन्होंने एक लाइन लिखी थी कि… “अभिषेक जस का तस लिख देते हैं। अभिषेक को पढ़ते हुए हजारीप्रसाद की बात याद आई - ‘यदि मैं बाणभट्ट की आत्मकथा भोजपुरी में लिखता तो यह उपन्यास अधिक प्रभावी होता!” लेबंटी चाह लिखते हुए मुझे हमेशा वैसा ही लगा। मेरा लिखा प्रभावी हो ना हो लेकिन यदि हुआ तो वो हिन्दी में लिखा ही हो सकता है। (इसका अर्थ ये मत निकाल लीजिएगा - एक किताब क्या लिख लिए अपने को हजारीप्रसाद ही समझने लगे। आजकल लोग कुछ भी अर्थ निकाल लेते हैं तो बताना पड़ता है। इसका अर्थ ये है कि जब आचार्य हजारीप्रसाद जैसे विद्वान अपनी मातृभाषा के लिए ऐसा कहें तो हम भला किस खेत की मूली हैं।)

लेकिन हिन्दी में रुचि कब और कैसे हुई, लिखने का कब सोचा इसका उत्तर इतना स्पष्ट है नहीं।

मुझे लगता है किसी भी विषय में रुचि बचपन और शिक्षकों पर बहुत निर्भर करती है। वो शिक्षक जिन्होंने गणित-विज्ञान को हिन्दी-संस्कृत पर कभी हावी नहीं होने दिया उनका इसमें बड़ा योगदान है। विशेषकर संस्कृत और गणित के शिक्षक। मुझे बहुत मानते। इतना कि मुझे लगता कुछ ग़लत कर दूँगा तो वो निराश हो जाएँगे। एक बार ऐसा हुआ कि संस्कृत के एक क्विज़ में स्त्री प्रत्यय के एक सवाल में ङीप्,- ङीष् में गलती हो गयी। मैं अगले दिन किताब लेकर गया कि यहाँ से पढ़ा था। गलती मेरी नहीं है। उस किताब के ष का पेट काटने वाला मिट कर प जैसा हो गया था। संस्कृत के शिक्षक की एक बात याद है जो पता नहीं उन्होंने कितनी गम्भीरता से कहा था (या ऐसे ही कह दिया था जैसे ब्लॉग पर आयी अधिकतर टिप्पणियाँ होती थी लेकिन मैंने गम्भीरता से लिया)। दसवीं के परिणामों के बाद उन्होंने कहा था - ‘बहुत अच्छे नम्बर ले आए तुम अभिषेक। लेकिन मुझे तो लगा था कि तुम्हारे संस्कृत में भी गणित जितने नम्बर आ सकते थे।’ (उस जमाने में हर विषय में सौ में निन्यानबे-सौ नहीं आते थे!)

वैसे ही गणित के शिक्षक। जैसा मैंने पिछली पोस्ट में भी कहा था कि मुझे कभी किताब लिखने का बहुत ज़्यादा मन नहीं था और लिखने के बाद भी संशय बहुत रहा कि पता नहीं लोगों को किताब कैसी लगे। पर कुछ पल आए जब लगा लिखना सफल रहा। उनमें से एक था जब स्कूल के गणित के शिक्षक का बड़ा प्यारा मैसेज आया। उसी लहजे में जैसे वो बोला करते - डायलॉग की तरह। शिक्षक गणित के लेकिन स्कूल में नाटक -भाषण वग़ैरह लिखने-लिखवाने में बड़ी रुचि लेते।

फिर हिन्दी उस उम्र से पढ़ा है जब का कुछ याद भी नहीं। खूब किताबें पढ़ी। अंग्रेज़ी में कथा-कहानी-संस्मरण लिखने का सोच भी कैसे सकते हैं! अंग्रेज़ी हमेशा लगी कि बस पढ़ने का एक विषय है। हिन्दी मैंने पढ़ना शुरू किया था घर की किताबें चाट जाने से। स्कूल की लाइब्रेरी से भी खूब पढ़ा। इन किताबों में सम्पूर्ण प्रेमचंद, शरतचंद्र, आचार्य चतुरसेन की सोमनाथ, कन्हैयालाल मुंशी की भगवान परशुराम, मनोहर श्याम जोशी की कुरु कुरु स्वाहा जैसी किताबें थी। स्कूल की लाइब्रेरी से गुलिवर की यात्राएं, 80 दिन में दुनिया की सैर, क़ैदी की करामात जैसे अनुवाद की हुई किताबें खूब पढ़ा। सैकड़ों नहीं भी तो पचास से अधिक तो आराम से। फिर बचपन में घर का माहौल ऐसा था कि रामचरितमानस जैसी किताब की चौपाइयाँ, कबीर-रहीम-घाघ, भूषण वग़ैरह बिना पढ़े ही पता होते। गीता प्रेस की किताबें, पुराण, और कल्याण बचपन से ही इस सिलेबस का हिस्सा रहे। रादूगो प्रकाशन वग़ैरह की रूसी किताबें राँची में खूब मिलती। राँची में एक बाज़ार में एक बूढ़े व्यक्ति पुरानी किताबें बेचते। ज़मीन पर बिछाकर। अनपढ़ थे। किताब की बाइंडिंग और वजन देख क़ीमत लगाते - क्या गणित, क्या विज्ञान और क्या साहित्य! उनसे कौड़ी के भाव ख़रीदी गयी उत्कृष्ट किताबें भी पढ़ी गयी।

और काम करने का ऐसा है कि आज भी जोड़-घटाव तो मैं तो ऐसे ही करता हूँ - पाँच-सात-बारह, बारह नवा इठोल से। पाँच दूनी दस, पाँच एकम पाँच। - आइ थिंक ईंट विल बी एराउंड ट्वेंटी वन, ट्वेंटी वन पोईँट सिक्स। सोचने की भाषा थोड़े न बदलती है कभी! जो कहते हैं कि बचपन की बोली भूल गए… वो ही जाने। ख़ैर…

ग्यारहवीं-बारहवीं के साल इरोडोव, रेस्निक, लोनी, पुली, और लकड़ी के वेज पर बॉल लुढ़केगी तो किधर कितना फ़ोर्स लगेगा जैसी बातों में निकल गए। हिन्दी सिलेबस में थी पर साल के शुरू में ही किताबें पढ़ कर रख दिया था। ये सोचकर कि जितनी हिन्दी पढ़ा है उतनी पर्याप्त होनी चाहिए। सम्मान भर के अंक के साथ पास होने के लिए। सिलेबस में जो भी गद्य-पद्य था आधा पहले से पढ़ा हुआ लगा। ग्यारहवीं-बारहवीं में हिन्दी की क्लास भी बहुत बड़ी होती। आर्ट्स-कॉमर्स-साइंस सभी के लिए हिन्दी कॉमन थी। सेंट ज़ेवियर्स राँची में ग्यारहवीं-बारहवीं में भी हिन्दी ‘प्रोफ़ेसर’ पढ़ाते। जो बीए के विद्यार्थियों को भी पढ़ाते। कुछ राँची विश्वविद्यालय के एमए के विद्यार्थियों को भी पढ़ाते। शिक्षक वहाँ अब भी वही हैं। सारे पीएचडी। कक्षाएँ अच्छी होती। पर जहां स्कूल के शिक्षक हर क्लास में चर्चा करते, यहाँ शिक्षक-विद्यार्थी में एकतरफ़ा संवाद था। मेरा नाता बस हाज़िरी लगाने और व्याख्यान सुनने तक ही था। पर अच्छा लगता। परीक्षा हुई तो पढ़ा तो था नहीं इसलिए अपने हिसाब से लिखा। पता नहीं कैसे प्रोफ़ेसर लोगों को पसंद आया। शायद पहली परीक्षा के बाद अंक भी सबसे अधिक दिए थे डॉक्टर भाटिया ने। दो सालों में एक परीक्षा के बाद शायद पहला और आख़िरी मौक़ा था जब मुझसे किसी हिन्दी के अध्यापक ने बात की थी। मुझे बुला कर कहा कि तुम्हारी उत्तर पुस्तिका सबसे अलग थी। 

मैंने कहा - ‘सर बिना पढ़े लिखा था। अपने मन से। शायद इसलिए।’ 

हिन्दी का अध्यापक अक्सर दुनिया देखा, दाल-रोटी का भाव समझने वाला व्यक्ति होता है। उन्होंने कहा था कि विज्ञान के विद्यार्थी हो। ऐसे ही बिना पढ़े हिन्दी की परीक्षा लिख देना अभी जहां ज़रूरत है वहाँ परिश्रम कर लो। हिन्दी के लेखक जो फ़्री में कुछ नहीं करेंगे और रॉयल्टी से ज़िंदगी चला लेंगे सोचते हैं ...उन्हें ऐसे शिक्षक नहीं मिले?

आईआईटी में हिन्दी से नाता रहा ट्रेन में पढ़ी जाने वाली किताबों से। वो भी तीसरे साल के बाद शुरू हुआ। कानपुर सेंट्रल प्लेटफ़ॉर्म नम्बर एक पर घुसते ही दाहिनी तरफ़ के व्हीलर्स से ख़रीदी गयी किताबें। चित्रलेखा, गुनाहों का देवता, वैशाली की नगरवधू इत्यादि - यूज़ूअल ससपेक्ट्स। अंतिम साल में आईआईटी के बुक क्लब से भी कुछ हिन्दी किताबें लाया पर वहाँ ढंग की हिन्दी किताबें होती नहीं थी (लाइब्रेरी में अच्छी किताबें थी पर वो हमेशा ही कोई कर्मचारी ले गया रहा होता )। ‘वैशाली की नगरवधू’ अकेली हिंदी की  किताब थी जिसे हॉस्टल में मेरे अतिरिक्त मेरी विंग में कुछ और लोगों ने भी पढ़ा। पर छुट्टियों में हिन्दी में साहित्य के अतिरिक्त भी हिन्दी की किताबें पढ़ा - घर पर पड़ी बीए, एमए की कई किताबें हिंदी में थी। इतिहास, राजनीतिशास्त्र - यूरोप का इतिहास, मध्यकालीन भारत का इतिहास, बीए अंग्रेज़ी की किताबें भी पढ़ी।

ब्लॉगिंग आईआईटी से निकलते-निकलते शुरू हुई। जिससे कई लोगों से सम्पर्क और दोस्ती हुई। कुछ ने अख़बारों में भी लिखवाया। ब्लॉगिंग तो ख़ैर सबसे बड़ा कारण बना हिन्दी में लिखने का। ओझा-उवाच लेबंटी चाह की माँ है - इधर से ही लेबंटी चाह का जन्म हुआ। तो उसकी बात क्या करना।

पर हिन्दी किताबें पढ़ने से भी एक के बाद एक कई रोचक बातें हुई। अंग्रेज़ी की किताबें मैंने हिन्दी से अधिक पढ़ा पर उन्हें पढ़ते हुए ऐसी बातें कभी नहीं हुई। (बस एक बार बलिया जाते हुए किसी ने ट्रेन में कहा था कि हल्ला मत करो लड़का अंग्रेज़ी पढ़ रहा है परीक्षा देने जा रहा होगा। और मैंने कहा था कि नहीं परीक्षा देने नहीं जा रहा ऐसे ही पढ़ रहा हूँ।)

पहली तो पुणे में। पुणे में एबीसी चौक है - अप्पा बलवंत चौक। वहाँ किताबों की दुकानें ही दुकानें हैं। २००८-०९ में अमेजन ऐसा था नहीं। किसी ने बताया था कि हिन्दी की किताबें वहीं मिलेंगी। वैसे हिन्दी की किताबें पुणे में मुश्किल से ही मिलती है। एक दो दुकानदारों ने तो साफ़ मना कर दिया। फिर …एक दुकान वाले ने मेरी किताबों की लिस्ट देख कुर्सी पर बैठाया। बड़े सम्मान से। पूछा चाय-ठंडा मँगा दूँ? मुझे ज़िंदगी में इसके अलावा कभी किसी दुकान वाले ने चाय-ठंडा ऑफ़र नहीं किया। ज्वेलर्स इत्यादि जैसे दुकान वाले, जो ये सब ऑफ़र करते हैं, वहाँ मैं कभी गया नहीं। बचपन में किराने की दुकान वाले ने कभी किसमिस-इलायची दिया हो और मैंने नहीं लिया हो के अलावा ऐसा पहली बार हुआ था।

पूछा - ‘पुणे यूनिवर्सिटी में एमए-पीएचडी कर रहे हो क्या? ऐसी किताबें ख़रीदने कभी कभार बस वही लोग आते हैं। कभी-कभी कोई ऐसा आता है ऐसी किताबें पढ़ने वाला।’

बड़ी इज्जत दी उन्होंने। जो किताबें उनके पास नहीं थी आस-पास से मँगा कर दी। अपना नम्बर दिया कि कोई भी किताब मँगा देंगे। पहली बार लगा हिन्दी पढ़ने और अच्छा पढ़ने पर विशेष भाव मिलता है! उन्होंने लिस्ट देख ययाति-मृत्युंजय पढ़ने की भी सलाह दी। दोनों मराठी की अनुवाद।

दुकान वाले का कहा मैंने सोचा एमए कर ही लें क्या! मज़ाक़-मज़ाक़ में नहीं गम्भीरता से। उन दिनों साथ के लोग एमबीए वग़ैरह पर ज़ोर मार रहे थे। एमबीए नहीं करने का मेरा निश्चय बहुत पहले से था। पीएचडी करने का मोहभंग पूरी तरह से तो कभी नहीं हुआ पर नौकरी में मन लगने से इतना तो हो चुका था कि (महेंद्र कपूर की आवाज़ में पढ़े) - उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा। पीएचडी के परे पढ़ने का विचार ऐसा बनने लगा था जैसे बेवड़ो की एक श्रेणी होती है - फ़्री का मिला तो पी लेंगे। अर्थात् ये कि जो भी पढ़ने के पैसे कम्पनी दे देगी वो पढ़ते रहेंगे। और जो सीखने का मन हुआ उसे पढ़ा लेंगे। इन सबके साथ हिन्दी की किताबें पढ़ना फिर से शुरू हो गया था - दिनकर, अज्ञेय, अमृत लाल नागर, भगवती चरण वर्मा, धर्मवीर भारती, राजकमल चौधरी, विनोदकुमार शुक्ल वग़ैरह वग़ैरह।

पुणे में ही एक दिन मैं इग्नू एमए हिन्दी में एक दिन एडमिशन लेने चला गया। उन्होंने बोला था हिन्दी में एडमिशन के लिए किसी भी विषय में डिग्री की फोटो कॉपी लगेगी। हिन्दी में एडमिशन के लिए कुछ विशेष आवश्यकता थी नहीं। पर डिग्री देखकर सकते में आ गए - ये आपकी डिग्री है? आपको हिन्दी में क्यों एडमिशन लेना है? भारत में कहीं भी लोग अपने काम से अधिक काम रखते हैं। ख़ैर उनको उत्सुकता बहुत ज़्यादा थी पर कुछ सवाल-जवाब के बाद उन्होंने एडमिशन दे दिया। मैंने एक साथ दोनों साल की किताबें माँग ली। किताबें उनके स्टोर में बस पहले साल की ही थी। स्टोर ही था। बड़ी बेरहमी से प्लास्टिक की रस्सी में बाँध कर सीलन वाले कमरे में पीली पड़ती किताबें रखी थी। किताबों का मानवाधिकार की तरह किताबाधिकार तो होता नहीं। उन्होंने कहा कि एक सप्ताह में फ़ोन कर आ जाऊँ दूसरे साल की किताबें भी मिल जाएँगी। एक दो बार फ़ोन करने तक दूसरे साल की किताबें नहीं आ पायी और तीसरे चौथे फ़ोन के पहले मैं अमेरिका आ गया। एमए पहले साल वाली किताबें सात समंदर पार मेरे पीछे-पीछे आ गयी। अब भी साथ हैं।

किताबों (ज़्यादातर हिन्दी) के अमेरिका आने का ऐसा था कि कम्पनी कुछ भी समान ले आने का पैसा दे रही थी। तब हमारे पास सामान के नाम पर बस किताबें ही थी। कुछ और ख़रीद कर, कुछ दिल्ली से मँगा कर भी शिप कर दी गयी। बाद में जब ढाई महीनों के लिए पटना जाना हुआ तो उन्हीं दिनों एक किताब हाथ लग जाने से संस्कृत पढ़ना भी शुरू किया। चौखंबा की किताबें।

हिन्दी किताबों के मुझ तक पहुँचने के किस्से भी कम रोचक नहीं रहे। एक दो साल बाद एक और मित्र अपनी कम्पनी के पैसे पर भारत से आ रहे थे। उन्होंने पूछा कि कुछ चाहिए? (जैसे अमेरिका से कोई दोस्त भारत आए तो एक आईफ़ोन मंगाना होता है उसका उल्टा भी होता है!) तो हमने उन्हें भी एक लिस्ट थमा दी। उन्होंने वो लिस्ट अपने भ्राताश्री को बनारस भेज दिया। ये कहते हुए कि हमारे बहुत प्रिय मित्र ने मंगायी है, किताबें अमेरिका जानी हैं। उन्होंने मामले को इतनी गम्भीरता से लिया कि कुछ किताबें जो प्रिंट में नहीं थी वो भी ढूँढ कर आ गयी। भले लोग! मैं खुद इतनी मेहनत कभी नहीं करता। फिर बनारसी आदमी गम्भीरता से ले ले तो हिन्दी की किताबें भला कौन सी बड़ी बात है! धीरे-धीरे ये बात भी थोड़ी बहुत फैल गयी कि हिन्दी पढ़ता है। तो लोग पूछ लेते - पुस्तक मेला है कोई किताब लानी है तुम्हारे लिए? सोचूँ तो ऐसे लोगों की लिस्ट भी छोटी नहीं है जिन्होंने मुझे हिन्दी की किताबें दी। कई दोस्त-दोस्तनियों ने किताबें दी। निर्मल वर्मा, स्वदेश दीपक, सुरेन्द्र वर्मा की किताबों से ना केवल परिचय कराया पर किताबें भी न्यूयॉर्क तक पहुँचायी। अंग्रेज़ी की किताब पढ़ने से ये सब होता? पढ़ते तो रहे ऐसा कुछ नहीं हुआ।

और फिर इन किताबों के पढ़ते हुए भी कुछ कम रोचक किस्से नहीं हुए। अनगिनत।

उन दिनों मैं कुरुक्षेत्र पढ़ रहा था। हार्ड बाउंड। सुंदर किताब। मुंबई से अमेरिका आ रहा था। कम्पनी के पैसे पर बिज़नेस क्लास से। एक सज्जन पूरी फ़्लाइट हमें उत्सुकता से देखते रहे। बाद में मिलने आए। आप कहीं किसी सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं? लगता है आपको कहीं देखा है। मराठी किताब है? तीनों का उत्तर नहीं था। पर मुझे ऐसा कोई नहीं मिला जिसे हिन्दी पढ़ना ‘कूल’ या ‘स्पेशल’ नहीं लगा हो। कॉलेज के जिस भी मित्र को पता चला सबने ऐसा ही कहा भले खुद ना पढ़ें।

एक बार एक आंटी मिल गयी न्यूयॉर्क सबवे में। उन दिनों मेरे सर पर ‘झोंटा’ था - घुंघराले लम्बे बाल। और मैं पढ़ रहा था चौखंबा सीरिज़ की भर्तृहरि। वो मेरे स्टेशन पर ही उतर गयीं। बहुत देर तक बात की। जब उन्हें भरोसा हो गया कि मैं ‘हिप्पी’ नहीं हूँ, ना ही ‘योगा स्टूडीओ’ वाला - खूब-खूब आशीर्वाद देकर गयी। केवल किताब पढ़ने से।

कारनेगी मेलन विश्वविद्यालय के क्वांट फ़ाइनांस की कक्षाएँ न्यूयॉर्क में भी होती हैं। मुझे एक बार वहाँ जाने का मौक़ा मिला। इस विषय पर बात करने कि नौकरी वग़ैरह के लिए छात्रगण क्या करें। वहाँ हुई लम्बी बात चीत का मुझे कुछ याद नहीं। याद है तो एक दूसरी पीढ़ी के भारतीय मूल का लड़का। मुझसे पूछने आया कि मेरे हाथ में किताब कौन सी है! थे कालिदास। उसने कहा - “पर संस्कृत तो ‘डेड लेंगवेज’ है। मुझे तो लगता है कि पचास लोग भी नहीं पढ़ते होंगे संस्कृत।” मैंने बताया कि मैं अनुवाद के साथ पढ़ रहा हूँ पर पचास से अधिक तो अमेरिका में ही पढ़ने वाले होंगे। यहाँ के विश्वविद्यालयों में भी विभाग हैं।

फिर भी उसने पूछा - “एक फोटो खींच लूँ? माँ को दिखाऊँगा कि कोई संस्कृत भी पढ़ता है।” कौन सी अंग्रेज़ी की किताब इतनी कूल होती कि पाठक के साथ कोई सेल्फ़ी ले?

और फिर हिंदी लिखने में अजूबा जैसा क्या है? हिन्दी नहीं लिखेंगे तो क्या लिखेंगे? और हाँ ये हिन्दी की सेवा करने और झंडा लेकर चलने जैसी कोई बात नहीं है। नेचुरल है। कभी अपने काम या पढ़ाई वाले विषयों पर लिखना हुआ तो अंग्रेज़ी ही दिमाग़ में आएगी। पर ‘लेबंटी चाह’ जैसा कुछ लिखना हुआ तो हिन्दी छोड़ कभी दूसरी भाषा दिमाग़ में आ ही नहीं सकती। स्वाभाविक है। स्वयंसिद्ध टाइप।

एक और बात… मैं लाइव म्यूज़िक की जगहों पर खूब गया हूँ जहां अधिकतर अंग्रेज़ी गाने बजते हैं। जैज़-वैज़ जैसी जगहें। एक बार अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ “जैज़ बाई द बे” गया था। अंग्रेज़ी गाने बजते रहे। सब लोग सुनते रहे। कोई कभी किसी गाने पर गुनगुना भी देता। चेहरे पर ग़म ख़ुशी जैसा कुछ ख़ास नहीं आता। पर अंत में जब वहाँ किशोर कुमार के गाने बजे। जिसे उन्होंने अपने तरीक़े से बजाया - रीमिक्स जैसा। तब पहली बार ऐसा हुआ कि सब गुनगुनाने लगे। टेबल बजाने लगे। वैसा किसी भी अंग्रेज़ी गाने के साथ नहीं हुआ। ऐसा नहीं था कि मेरे साथ के लोग अंग्रेज़ी गाने नहीं सुनते थे या उन्हें समझ नहीं आते। पर किसी अंग्रेज़ी गाने पर टेबल बजाने लगें हो ऐसा भी नहीं हुआ। किशोर कुमार सुनते ही सब अपने रंग में आ गए। हिन्दी लिखने का वैसा ही है। रीमिक्स भी हो तो अपने लिए किसी भी दिन अंग्रेज़ी से ज़्यादा प्रभावी होगी।

इस पर अनगिनत बातें लिखी जा सकती है - सब कंवर्ज होंगी हिन्दी पर ही! अब जैसे यही एक बात है कि इतनी बड़ी पोस्ट हो गयी - अंग्रेज़ी में लिखने पर घंटे भर में इतने फ़्लो में तो नहीं ही हो पाता! :)

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~Abhishek Ojha~

Dec 14, 2020

झाल कूटना

‘झाल’ अर्थात् झाँझ (झाल मुरी वाला झाल नहीं)। काँसे का बना हुआ ताल देने का वाद्य यंत्र जिसे मंजीरा भी कहते हैं। 

अब झाल वाद्य यंत्र है तो इसके साथ क्रिया होनी चाहिए बजाना अर्थात् ऐसे - झाल बजाना। वो होती भी है लेकिन झाल के लिए कूटना भी एक क्रिया होती है। हमने इसे कैसे जाना वो बता देते हैं। आशा है अर्थ भी स्पष्ट हो जाएगा। 

हमारे पड़ोस में एक सज्जन (ऐसा ही कहा जाने का चलन है तो इसे उनका कैरेक्टेर सर्टिफ़िकेट ना समझा जाय) रहते थे। वो ‘झाल-कूटने’ का वाक्य में बड़ा अद्भुत प्रयोग करते। एक उम्र तक हमें लगता रहा ये कोई मुहावरा होता है, हो सकता है होता भी हो हमें
ठीक-ठीक नहीं पता। उनके बच्चे नहीं पढ़ते या लड़ाई-झगड़ा करके आते तो वो कहते – “नालायक कहीं के, यही सब करो फिर झाल कूटना”। 

गुस्साते तो कहते – “जाओ झाल कूटो”। 

 इस वैधानिक चेतावनी का मतलब हम वही समझते रहे जो आप समझे। उनके बच्चों पर भी इसका वैधानिक चेतावनी सा ही असर होता। उन्हें घंटा फ़र्क़ नहीं पड़ता था। मतलब एक घंटे तक भी उन पर इस बात का कोई असर नहीं होता। पर झाल कूटने का अर्थ इतना भी सरल नहीं। एक दिन उन्होंने किसी व्यक्ति के झाल कूटने का वर्णन किया तो लगा कि इसका अर्थ इतना हल्के में भी नहीं लिया जा सकता। वो बोले – “फलाना आदमी क्या झाल कूटता है! ग़ज़ब। दिल से। बाकी लोग झाल बजाते हैं वो कूट देता है। समझिए कि जब धुन में होता है तो दुरमुस देता है। जब लय जमती है तो वो तो जैसे वहाँ होता ही नहीं है। अपना शरीर झँझोड़ के रख देता है। सिर, कंधे और हाथ एक्के फ़्रीक्वेंसी में झूमता है उसका। कैसे बताएँ – एकदम ग़ज़ब। आपको देखना चाहिए कभी। उस समय बग़ल में आग भी लग जाए तो वो ताल और लय छोड़ कर नहीं हिल सकता। उस समय उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि अग़ल-बग़ल क्या हो रहा है। जब ढोलक, मृदंग वग़ैरह का लय सुस्त होता है तब जाकर कहीं वो कूटना बंद करता है।” 

 किसी ने कहा – “अरे चिल्लम का ज़ोर रहा होगा”। 

 तो बुरा मान गए। बोले “चिल्लम से वो काम नहीं हो सकता भई, आप देखे नहीं हैं इसलिए ऐसा कह रहे हैं।” 

तब हमें ये भी लगा कि फिर झाल कूटने को ये इतना बुरा क्यों मानते हैं? बड़ी पावरफुल चीज लगती है। पर अक्सर उनकी नज़र में इसका अर्थ एक दम घास काटने वाले हिसाब जैसा ही होता। घास काटने को तो हम बचपन से ही इज्जत देते आए हैं जिसे हम पहले बता चुके हैं कि जबसे सुना कि घास भी काटो तो ऐसे कि गोल्फ़ कोर्स का ठीका मिले, तब से तो हमें लगा घास काटना भी नायाब काम है। फ़र्ज़ी बदनाम है। पर झाल कुटाई ठीक-ठीक समझ नहीं आ पायी। अर्थ अभी भी वही रहा – एकदम बेकार। निकम्मा। किसी काम का आदमी नहीं। (वैसे पिछले तीनों का अर्थ एक ही होता है लेकिन बात में वजन लाने के लिए लिखा।) 

 “तबाह कर के रख दिया है, संतान है कि दुश्मन! जाओ झाल कूटो तुम लोग।” कूटना हमेशा बजाने से बहुत ऊपर की चीज लगती। हमने स्वयं भी देखा एक दो बार किसी मंदिर में, तो किसी मंडली में झाल बजाने में रमें लोगों को पर उससे भी अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आया। क्लीयर भी नहीं हुआ कि ये बजाना है या कूटना।

 जब उनके बच्चे बड़े हुए तो एक ने बड़ी मेहनत की। उन्होंने भी मेहनत की कि बेटा गुमटी लगा देते हैं, टेम्पो चला लो। बेटा लेकिन बाप की बात का गाँठ बांध लिया था। कहता कि बाबूजी हम झाल नहीं कूटेंगे। अब जो भी मतलब होता हो। हमने पारिवारिक मुहावरा समझ लिया था। हमारे लिए सुनी-सुनाई बात थी। किसी व्याकरण की किताब में तो पढ़े नहीं थे। बस वाक्य में प्रयोग किया ही सुनते आए थे अर्थ पता नहीं था। उनके लड़के की सरकारी नौकरी की उमर निकलने लगी तो दसवीं की परीक्षा फिर से देकर उसने उमर का नया सर्टिफ़िकेट रोप दिया। उसे झाल जो नहीं कूटना था। नए उमर का पौधा भी कहाँ एक दिन में बड़ा होता – कम उमर करवा के फिर से दसवीं दिया। बारहवीं दिया। इस सबके बाद अंततः लड़के ने सरकारी परीक्षा निकाल ली। नए काग़ज़ों में उमर अभी भी लड़के की ही थी तो लड़का ही कहेंगे वैसे उसके बाल बच्चे भी अब स्कूल जाने लगे थे। ख़ैर मूल बात ये कि सरकारी नौकरी मिल गयी। 

 स्वाभाविक है बेटे की नौकरी से वो बड़े प्रसन्न हुए। साक्षात भगवान के दर्शन जैसी बात थी। मुहल्ले के चौराहे पर खड़े होकर (दरअसल तिराहा था पर आपको कौन सा उसका दाखिल-ख़ारिज कराना है।) दोनों हाथ ऊपर कर आशीर्वाद देते हुए बोले – “जाओ बेटा अब तो सरकारी नौकरी हो गयी। तुम बहुत मेहनत किए। तार दिए हमको। अब क्या? मन करे काम करो, नहीं मन करे तो झाल कूटो।” 

 मामला और अटक गया। अब तक का समझा सब गोल हो गया! हमारा दिमाग़ चकरा गया। ये क्या माजरा है! लगा ये तो बड़ा व्यापक मुहावरा है। आशीर्वाद भी झाल कूटो, गाली भी झाल कूटो! जब यही था तो ज़िंदगी भर बच्चों को गलियाते किस बात का रहे? बात समझ नहीं आयी। समय अपनी गति से चलता रहा (वो थोड़े ना झाल कूटेगा!)। हमें ज़िंदगी कहीं का कहीं ले गयी। लेकिन संयोग से कुछ सालों बाद एक बार उनसे सामना हुआ। हमने अच्छा मौक़ा देख विनम्रता से पूछ ही लिया - “चाचा आप झाल कूटने का बड़ा सुंदर उपयोग करते हैं। ज़रा उस पर प्रकाश डालिए। हम दर्जन भर देश गए लेकिन ऐसी व्यापक बात किसी से नहीं सुनी।”

बहुत खुश हुए। बहुत ही। तीसरी बार भी लिख दे रहा हूँ उन्हें इतनी ख़ुशी हुई कि उन्हें थोड़ी देर तक समझ नहीं आया कि इतनी ख़ुशी फूट के आ रही है कि उसका करें क्या। जैसी किसी कवि की कविता कोई सुनने को तैयार ना हो और कोई आकर ऐसा कहे कि कवि से बेहतर वो समझ गया हो। आराम से चौड़े होकर बताए। लेकिन उमर हो गयी थी उनकी। उतनी की उस उमर में इंसान बातें अक्सर मिश्रित कर देता है। बोले- “देखो बेटा हम ज़िंदगी भर सरकारी नौकरी किए। उदाहरण तो बहुत है हमारी ही ज़िंदगी में। लेकिन हम बता दें तुमको कि हम रात के शिफ़्ट में फ़ैक्ट्री कम्बल लेकर जाते थे। क्योंकि दिन भर घर का काम करते।” 

 हमें कर्मठता और कम्बल का सम्बन्ध समझ नहीं आया, इसमें झाल कुटाई का ज़िक्र भी कहीं नहीं था। पर हमारे पूछने के पहले ही वो बोले - “हम शिफ़्ट में आठ घंटा कम्बल तान के सोते थे। फ़ाउंड्री से लेकर हेभी मशीन सब विभाग था वहाँ। बग़ल में भट्ठी भी थी तो हर कुछ दिन पर मशीन का एक आध नट खोल के उसीमें स्वाहा कर देते। मशीन बंद रहती तो हम कैसे काम करते? मशीन को भी आराम हम को भी आराम। निर्भेद सोते। और उसी से हम ये भी सीखे कि नींद का शोर से कोई लेना देना नहीं। जो आदमी नहीं सो पाता है शोर उसके दिमाग़ में होता है। बाहर का शोर होता तो हम कभी फ़ैक्ट्री में सो पाते? अरे जैसे चलती ट्रेन में हड़-हड़-गड़-गड़ में आदमी सो ही जाता है। है कि नहीं? वही घर में बोलता है कि शोर से नींद नहीं आयी।” 

“कभी कोई दिक़्क़त”

“दिक़्क़त? सरकारी नौकरी थी। कोई झाल थोड़े कूट रहे थे? प्रमोशन भी टाईम से हुआ। एक बार हमसे हमारे बॉस, बड़े साहब, बोले कि आपको फलाने विभाग में डाल रहे हैं वहाँ काम ठप पड़ा है। आपको जाकर चालू करना है।” 

हम बोले – “ठप पड़ा है? तो हमको क्यों भेज रहे हैं सर? आपको नहीं पता कि हमारा स्पेसलाइज़ेशन ठप कराने में हैं। चालू कराना है तो किसी और को भेजिए? और देखो बेटा, नहीं हुआ हमारा तबादला। कोई क्या उखाड़ लेगा। सरकारी नौकरी के लिए आदमी ऐसे ही थोड़े ना जान देता है। और अब समझे तुम ? हम क्यों बोले अपने लड़के को कि काम करने का मन हो तब तो भाई कोई क्या कर सकता है, नहीं तो झाल कूटो! काम ही करना होता तो बताओ बेटा उससे अधिक पैसा किस नौकरी में नहीं मिलता है? जितना साल मेरा बेटा गँवा दिया उतने में कहाँ पहुँचा होता। मेहनत करके आदमी कहाँ से कहाँ जाता है। उतनी ही योग्यता और कर्मठता पर भला कौन आदमी सरकारी नौकरी में उतना सफल होगा जितना मेहनत करके किसी और क्षेत्र में? लेकिन सरकारी नौकरी का इतना चार्म क्यों है? हम ऊपर-नीचे की आमदनी की बात नहीं कर रहे हैं। वो छोड़ के तुम्हीं बताओ कहाँ जीवन भर का ऐसा गारंटी मिलेगा झाल कूटने वाले आदमी के लिए।” 
 
“पर ज़माना बदल रहा है अब वही बात नहीं रही। और मेहनत तो सरकारी नौकरी में भी लोग करते हैं।” 
 
“तुम लोग ख़ुशक़िस्मत हो बेटा, जिसे कभी सरकारी दफ़्तर में किसी काम से जाना नहीं पड़ा। तुम लोग इधर-उधर निकल गए। तुम्हारी बात से पता चलता है कि तुम्हें इस विषय में कुछ नहीं पता। बस विज्ञापन और फ़ेसबुक-ओसबूक देख के तुम्हें लगता है कुछ बदल गया है। देखो बेटा, आग लग के भस्म हो जाए और तुम सरकारी ऑफ़िस में एक आदमी को नहीं ढूँढ पाओगे कि पानी डालना किसकी ज़िम्मेवारी थी। किसी की नहीं होती। आजतक एक इंसान की ग़ैर-ज़िम्मेदार होने के लिए या परफ़ोर्मेंस ख़राब होने लिए सरकारी नौकरी नहीं गयी। गयी भी तो कोर्ट से जीत के वापस ले लेगा। बस एक बार मिल जाए। जर-जोरू-ज़मीन किसी का ऐसा गारंटी नहीं जैसा सरकारी नौकरी का।”

“फिर चल कैसे रहा है? ऐसा थोड़े होता है कि कोई काम ही नहीं करता।”

“चल कैसे रहा है मतलब? भगवान को मानते हो? दुनिया कैसे चल रही है? वैसे ही।”

“अरे लेकिन…”

“लेकिन क्या? एक साथ कई निकम्मे बैठा दो तो एक सिस्टम बन जाता है और लगता है काम हो रहा है और… समझोगे नहीं पर काम होता भी है। और एकाध अपवाद तो हर जगह मिल ही जाएँगे। तुम्हें क्या लगता है प्राइवेट में झाल कूटने वाले लोग नहीं होते? कहीं कम कहीं ज़्यादा हर जगह होते हैं।”

“लेकिन झाल कूटने का मतलब?”

“अरे हम क्या बता रहे थे कि एक बार हम कम्बल ओढ़ के सो रहे थे…” 

थोड़ी देर में बात ऐसी घूम गयी कि हमें लगा जैसे एफ़ेम के पहले के जमाने के रेडियो ने शॉर्ट वेव में किसी और फ़्रेकवेंसी का स्टेशन पकड़ लिया हो और रसियन में कुछ बजने लगा हो। सच कहूँ तो मुझे अभी भी पूरी तरह झाल कूटने का मतलब समझ आया नहीं। पर कई बार कुछ देख मेरे मन में ज़रूर आया कि शायद यही मतलब रहा होगा उनका। 

 मेरे एक मित्र हैं ग्रीस के। उनकी बातें सुन लगता है ग्रीस यूरोप का बिहार है। अरे बिहार से मेरा मतलब वो नहीं है कि इधर मगध-पाटलिपुत्र-चाणक्य-बुद्ध और उधर सुकरात-प्लेटो-अरस्तु-एथेंस वग़ैरह वग़ैरह इधर भी स्वर्णिम उधर भी स्वर्णिम। मेरा मतलब वही था जो आपको पहली बार पढ़ते ही लगा। वो बताते हैं कि उनके पिता बचपन में उन्हें धमकाते कि पढ़ो नहीं तो कंस्ट्रक्शन में काम करना। उन्होंने बताया कि पिता ये भी बताए होते कि किस देश के कंस्ट्रक्शन में काम करना पड़ेगा तो थोड़ा अच्छा होता। अमेरिका में करना होता तो अच्छा ही होता। वो ये बता रहे थे तो मेरे कान में बजा – "पढ़ो नहीं तो झाल कूटना। ये वाला ज़्यादा व्यापक है।"

 वो बताते हैं ग्रीस में सरकारी नौकरी का पागलपन। बाकी यूरोप में ऐसा नहीं है। उनसे बात कर मुझे पहली बार लगा कि जिस देश में सरकारी नौकरी का चार्म जितना अधिक हो वहाँ झाल कुटाई उतनी अधिक है – निकम्मापन भी उसी हिसाब से है। किसी देश में भ्रष्टाचार, विकास, एफ़िसीएंसी-फ़लाना-ढिमाका ...किसी भी इंडेक्स से अच्छा माप ये होगा कि किस देश में लोग सरकारी नौकरी के लिए कितने पागल हैं। किसी देश में बच्चे सपना देखते हैं कि बड़े होकर कम्पनी खोलेंगे, फ़िज़िक्स में नोबेल जीतेंगे और किसी देश में ये कि बड़े होकर किसी सरकारी दफ़्तर में लाल बत्ती लगा क्लर्क का काम करेंगे। 

...और तब मुझे लगा झाल कूटना कहने से उनका मतलब क्या होता रहा होगा। 

मुहावरा हो ना हो उसकी व्यापकता मन में बढ़ती गयी। और जब मैं सुनता हूँ किसी योग्य सरकारी कर्मचारी को ये कहते कि उन्हें अन्य क्षेत्र में काम कर रहे उनके दोस्तों की तुलना में बहुत कम पैसा मिलता है, तो दिमाग़ में प्रश्न उठता है कि फिर क्या मजबूरी है? पहले नहीं पता था क्या मिलेगा? अभी ही छोड़कर कुछ और कर लें। लेकिन आनंद फ़िल्म के ईसा भाई सूरतवाला की तरह वास्तविकता तो ये हैं कि जब राजेश खन्ना आनंद के किरदार में कहते हैं - मैंने तो छोड़ दी!तो ईसा भई कहते हैं - "छुटती कहाँ है ये काफ़िर मुँह से लगी हुई।" तो समझ में आता है कि झाल कूटना से उनका शायद ऐसा कुछ मतलब रहा होगा। 

 एक बार एयर इंडिया से मैंने यात्रा की थी। कुछ साल पहले। मुंबई में रात को समय से बैठ गए। जहाज़ को आधी रात के लगभग उड़ना था। फ़ोन बंद करवा दिया गया। कुर्सी की पेटी भी बँधवा दी गयी। घोषणा के अनुसार जहाज़ उड़ान के लिए तैयार थी। जब लगा कि कुछ ज़्यादा ही देर से उड़ान के लिए तैयार है, हिल-डुल तो रही नहीं। फिर तैयार किसलिए करवा दिए बिना बात मेकअप ख़राब हो रहा होगा? तो बताया कि रनवे ख़ाली नहीं है। लोग बैठे रहे, हम भी बैठे रहे। लोग मान लेते हैं कि कह रहे हैं तो सही ही कह रहे होंगे, अब कोई कुर्ता (जींस-टी-शर्ट वग़ैरह भी सोच लजिए नहीं तो डिसक्रिमिनेशन का केस बन सकता है) फाड़ के थोड़े ना चिल्लाने लगता है ऐसी बात पर? सुबह पाँच बजे के लगभग बोले कि इस विमान में तकनीकी ख़राबी है। किसी ने पूछा नहीं कि रनवे बिजी होना और तकनीकी ख़राबी एक ही परिवार से हैं या आज संयोग से एक साथ मिल गए? अब जिस चीज़ का कोई उत्तर नहीं हो उसे तकनीकी कहा जाता है ऐसा तो चलन है ही - तकनीकी ख़राबी भी व्यापक है। बताया गया कि आपलोग दूसरे विमान से जाएँगे। सब लोग दूसरे में चले गए। सब लोग में हम भी थे। इसी सब में सुबह आठ बज गए और हम रनवे तक नहीं पहुँच पाए। हमने हमें एयर पोर्ट लेने आने वाले को फ़ोन किया कि अभी तक मुंबई में ही हैं - इधर कार्यक्रमात थोड़ा राडा हो गेला आहे। बताइए मुंबई की सुबह और हम कुर्सी की पेटी बांधकर बैठे थे! ना वड़ा पाव, ना पोहा, ना कटिंग। मुंबई में इसके अलावा ऐसी मनहूस सुबह हमने नहीं बितायी। (साला जतरा ख़राब था ये हम सोचे नहीं थे अब ध्यान आ रहा है! जतरा समझते हैं ना आप लोग?)

 पौ फटने के बाद ही जहाज़ उड़ पायी। घोषणा हुई कि सारा खाना इस जहाज़ में लोड नहीं हो पाया तो एक बार ही भोजन मिलेगा। हमारी भोजन की आवश्यकता बहुत नहीं होती तो हमने इसके लिए भी कुछ नहीं किया। कुछ लोगों की काँय-कूँय ज़रूर सुनाई दी पर कोई क्रांति नहीं हुई। 

असली मज़ा तब आया जब लगभग निर्धारित समय के दस घंटे बाद हम अपने समान के लिए खड़े थे। एक आदमी एक लिस्ट लेकर आया और बोला कि लगभग आधे लोगों का समान नहीं आया है। उसने कहा कि इस लिस्ट में अपना नाम देख लीजिए। बिना माइक पर घोषणा हुए भी बात जंगल के आग की तरह फैल गयी। उन्होंने कहा कि अगर आपका नाम इसमें है तो वहाँ जाकर फ़ॉर्म भर दीजिए आपका सामान नहीं आया है। अब हमारा नाम ऐसे किसी लिस्ट में कैसे नहीं रहेगा? जहां योग्यता से नहीं रहे वहाँ भी अलफाबेटिकल से टॉप पोजिशन कौन छीन सकता है (फ़ैशन के दौर में ये गारंटी भी नहीं रही, डबल ए से नाम लिखने वाले खेल ख़राब कर दे रहे हैं)। पर हमने सबसे पहले गोरों की शक्ल देखी, अपना क्या हम तो फिर भी समझते हैं! एक गोरे ने सू-सू करने की धमकी दी (दो बार गलती से लिखा गया एक बार ही पढ़ा जाय)। उसे विश्वास नहीं हुआ कि जब लिस्ट है, पहले से पता था तो इतनी लम्बी फ़्लाइट में बताए क्यों नहीं? सात समंदर पार करने में एक बार इन्हें ये बताने का नहीं सूझा?! उसे भी किसी ने बताया कि वहाँ काउंटर पर फ़ॉर्म भरना है। मुझे पता था वहाँ भी लाइन लगेगी तो मैं पहले से ही वहाँ था। मेरे लाइन में मेरे पीछे खड़े होकर उसने मन भर गालियाँ दी। (एक मन में चालीस किलो होता है अगर कोई शंका हो तो)। मुझे नहीं एयर इंडिया को।

 मैंने फ़ॉर्म भरते हुए काउंटर पर बैठी लड़की से पूछा कि ऐसे कैसे हो जाता है? और मेरा सामान कब तक आएगा। उसने बोला सर आप इस नम्बर पर फ़ोन करके पूछ लीजिएगा हमें कोई जानकारी नहीं है।

 हमने अपने पीछे के लोगों का मूड देखकर छोड़ दिया। मन में तपोबल जैसा जो भी होता हो उसे पूरा बटोर कर शाप देते हुए कि तुम्हारी खड़ूसियत का बदला मेरे बाद आने वाले तुमसे ज़रूर लें। भला आदमी इसके अलावा और कर भी क्या सकता है। 

 कई दिन तक मैं फ़ोन करता रहा। उस नम्बर पर नहीं। इंटर्नेट से ढूँढे नम्बर पर। क्योंकि उस नम्बर पर कभी किसी ने फ़ोन नहीं उठाया। कॉल सेंटर पर ये दबाएँ, वो दबाएँ होने के बाद कभी-कभार बात हो जाती तो मुझे इतना समझ आ गया कि उधर बैठा प्राणी उसी वेबसाइट को देखकर मुझे स्टेटस बता रहा है जहां मैं भी देख लेता हूँ। मैंने एक दिन सुकून से पूछा कि भई तुम्हें हिंदी आती है? वो बोला हाँ। मैंने कहा फ़ोन मत रखना और कट जाए तो मुझे फ़ोन करना। बड़ी ज़रूरी बात है। अपनी भाषा में आराम से की जाएगी बात। अंग्रेज़ी में गाली भी दो तो वजन नहीं आता। 

मैंने आराम से सारी कहानी सुनाई और पूछा कि ये बताओ किससे बात करूँ? कौन ज़िम्मेवार है? कौन है जो कुछ कर सकता है उसी से बात की जाएगी? वो बोला सर मैं समझ गया। आप क्लेम कर दीजिए। आपके समान का पैसा भी मिल जाएगा। देरी के लिए भी आपको पैसे मिलेंगे। मैंने कहा भई वो मेरे क्रेडिट कार्ड वाले ने भी कहा कि वो पैसे दे देंगे पर उन्होंने कहा कि एक फ़ॉर्म पर एयर इंडिया से किसी का साइन चाहिए तो मैंने कह दिया कि फिर रहने दो नहीं चाहिए पैसे। तुम इतना सुनने के बाद भी मुझे बता रहे हो कि पैसे मिल जाएँगे? समान ही भिजवा दो पैसे रहने दो। 

 इसके बाद उस भले आदमी ने मेरी आँखें खोल दी। बोला सर आपकी परेशानी मैं समझ रहा हूँ पर मेरा काम यहाँ लिखे लिखाए उत्तर पढ़ के सुनाना है। और ये बताना है कि एयर इंडिया आपकी सेवा में है। आपका सामान सुरक्षित आप तक पहुँचना हमारा काम है - ये बताना मेरा काम है पहुँचाना नहीं। आप समझ ही गए मैं किस वेबसाइट से देखकर बताता हूँ। इससे अधिक मेरे हाथ में कुछ है नहीं। आप फिर फ़ोन करेंगे मैं फिर वही पढ़कर सुना दूँगा। और ज़िम्मेवारी तो सर किसी की नहीं है। मैं आपको किसका नम्बर दूँ? एक आदमी होता तो मैं नम्बर नहीं भी देता तो बता देता कि किसकी गलती है। कोई ज़िम्मेवार है ही नहीं तो मैं किससे बात करने को कहूँ। और कोई कुछ नहीं कर सकता। रोज होता है ये। और एयर इंडिया की मुंबई नूअर्क फ़्लाइट में तो हर दूसरे दिन क्योंकि उसमें इतना समान आता ही नहीं। वो एयर क्राफ़्ट ही नहीं है इतनी दूरी तक उड़ाए जाने वाला। अक्सर आधा समान इधर ही रह जाता है। बाद में कार्गो से जाता है। आप न्यूज़ सर्च कर लीजिए मिल जाएगा। अब आप ही बताइए कौन ज़िम्मेवार है? और कौन करा सकता है आपका काम? हम तो बस पढ़ के बता देते हैं आपको। न्यूज़ पढ़ने वाले की तरह कई बार ये भी नहीं पता होता कि हम क्या पढ़ रहे हैं। मैंने कहा - "यार चलो कोई बात नहीं तुम झाल कूटो। एयर इंडिया चुनने के लिए आपका धन्यवाद वाली लाइन आज मत बोलना।"

(पोस्ट लम्बा ना हो जाए पर घटना इतनी छोटी नहीं थी। मैंने ये उदाहरण यूनिवर्सिटी के मास्टर्स की क्लास के स्टूडेंट्स को सुनाया था जब किसी ने पूछा था कि आन्साम्बल लर्निंग में कई वीक लर्नर को मिला देने से स्ट्रॉंग लर्नर कैसे बन सकता है! मैंने सोचा उदाहरण सटीक है वो भूलेंगे नहीं। ख़ैर बात कहीं और निकल जाएगी।)

अंततः मेरा सामान आया दस दिन बाद। और तब मुझे थोड़ा और समझ आया कि सरकारी काम में झाल कूटना क्या होता है। मैं सोशल मीडिया पर देखता हूँ तुरत जवाब आता है कि हम आपकी समस्या देख रहे हैं। हमसे भी एयर इंडिया ने पीएनआर और टैग नम्बर माँगा था ट्विट्टर पर। जैसे सामान लेकर घर के बाहर ही खड़े हैं। हमें डीएम कीजिए, कभी ये भी कह देते हैं कि आपकी समस्या हल हो गयी है - हमें जानकारी भी नहीं होती। उनका बस इतना काम होता है कि ट्विट्टर पर तुरत जवाब दे देना है। और उसके बाद कम्बल तान के सो जाते हैं। मशीन का नट खोलकर भट्ठी में डालकर। तो थोड़ा समझ आता है कि वो झाल कूटना शायद इसे कहते थे। 

 मुझे सरकारी दफ़्तरों से अधिक पाला नहीं पड़ा। गिने चुने बार। पासपोर्ट, पैन, ड्राइविंग लायसेंस जैसे काम के अलावा कभी चक्कर नहीं लगाया मैंने किसी सरकारी दफ़्तर का। एक सुख का पैमाना ये भी हो सकता है कि जितना कम इस चक्कर में पड़ना पड़े। लेकिन जब भी कभी थोड़ा बहुत काम पड़ा – थोड़ा सा समझ आया कि चाचा क्या कहते थे जब कहते थे कि झाल कूटो। वैसे ये तो नहीं कह सकता कि पूरा समझ आया। आपको समझ आया हो तो बताइएगा। अब वो रहे नहीं कि उनसे और क्लीयर किया जाय।* 

* और लिखा तो झाल कूटने वाले मिल के मुझे कूट देंगे :)

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~Abhishek Ojha~

Apr 13, 2020

सुर्रियल पटना (पटना २३)


कल बीरेंदर को फ़ोन किए।

फ़ोन उठाते ही बोला – ‘बीरेंदर स्पीकिंग।’

मैंने पूछा कि ‘हैं? ये अंग्रेज़ी कब से बोलने लगे तुम? सब ठीक?’

‘आरे नहीं भैया। सोचे कि थोड़ा स्टाइल मारे। चलिए इसी बहाने कुछ और बात करेंगे। जो फ़ोन करता है आजकल एक्के बात पूछता है। उ ऐसा है कि हमलोग के साथ का एक ठो लड़का पढ़ता था। हमसे एक साल आगे था। हमलोग अभी पर्हिए रहे थे तब तक उसका बैंगलोर में नौकरी लग गया था। उसको एक दिन फ़ोन किए त ऐसही बोला अंग्रेज़ी में। त हम बोले – साला! ई का हो गया है रे तुमको? छौ महीना हुआ नहीं आ तुम स्पीकिंग सीख लिया? ज़िंदगी भर रैपीडेक्स का किताब पढ़ के पार्डन बोलना नहीं सीख पाया था। हमहीं पर प्रैक्टिस कर रहा है का रे? कि सही में भुला गया भासा-ओसा?’ 

...उसके बाद से उसका जो ना हमलोग हाल किए थे आजतक हमलोग से अंग्रेज़ी नहीं बोल सकता है उ कभी। उसका नामे हमलोग रख दिए पार्डन प्रसाद। त वही करके देखे की आपको कैसा लगता है।’


लेकिन जैसा कि आजकल हाल चाल पूछना औपचारिकता वग़ैरह कोरोना के बारे में पूछना ही हो गया है। ऐसा हो गया है कि कोई भी कोरोना की बात किए बिना दो मिनट भी बात नहीं कर सकता, तो हम भी कुछ और बात कितनी देर करते?

मैंने भी पूछ लिया कि ‘और क्या हाल हैं? सुना है कि लोग एक दम बोर हो गए हैं लॉकडाउन में? संभल के रहना।’

‘तबियत ठीक है भैया। आ बोर होने का हमसे मत पूछिए। जो हो रहा है वो रहे। बोर होना भी कोई समस्या है? माने हद है। यहाँ इतनी बड़ी समस्या है और लोगों को बोरियत की पड़ी है। बड़ा बोरियान पीढ़ी है हमलोग का। काम ना धाना त बैठ के बोर होईबे करेगा आदमी। बड़ा पृभिलेज्ड़ हो गया है सब।’


‘अरे लेकिन लोगों को घर में रहना पड़ रहा है, घर बर्तन का काम भी करना पड़ रहा है।’

‘तो कोई एहसान कर रहा है किसी पर? बताइए आदमी को एतना ना रजेसी हो गया है कि अपना काम करने पर भी रोना रो रहा है। माने कैसा आदमी है महाराज कि अपना काम भी नहीं हो पा रहा है सब से? हिहाँ आदमी दूसरे का काम कर दे रहा है और कैसा है सब जो अपना काम भी नहीं कर पा रहा है? आ बोर हो रहा है तो रामायण-महाभारत सब का व्यवस्था होईए गया है। आ लॉकडाउन माने ऐसा थोड़े है कि हाथ गोर तोड़ के बैठ जाना है। जो काम है करे तो कैसे बोर होगा महाराज? हमसे पूछे दस ठो काम बता दें करने को। माने एक ठो कथा में सुने थे कि एक आदमी ऐसा ना आराम किया था बचपन से कि उसके पैर का तलवा में रोंवा उग गया था वैसहि आदमी हो गया है अब। अरे यदि आपके पास काम है, नौकरी नहीं गया है और स्वस्थ ठीक है तब तो रोने वाले को थपड़िया देना चाहिए। उसके लिए तो बढ़िया टाइम हुआ न? स्वास्थ्य भी ठीक है और घर पर भी रहना है। जिसका काम का नुक़सान हो रहा है उसका तो समझ आता है लेकिन फ़ालतू बोर होने वाला का तो हसीन दुःख है।‘

‘बात तो तुम्हारी ठीक है लेकिन बहुत लोग ऊब जा रहे हैं घर में रहते रहते। आदत नहीं है।‘

‘अरे तो जिसको बुद्धि नहीं है उसका क्या कीजिएगा। जो व्यस्त रहता है उसके लिए आपे बताइए ज़िंदगी में ऐसा समय फिर आएगा अपना परिवार के साथ बीताने के लिए? उहे तो एक ठो अच्छा बात है इस लॉकडाउन का। लेकिन अजीबे लोग हैं। भाग दौड़ था तो उससे दिक्कत था कुछ दिन के लिए ठप है तो भी दिक्कत है। लोग पूछ रहे हैं कि लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद क्या करोगे? लिस्ट बना रहे हैं कि क्या करेंगे! हम बोले कि जो करते हैं वही करेंगे। अभी भी जो करना है वो कर रहे है। माने लोगों का ऐसा है कि देखिए जब लॉकडाउन नहीं था तब जो करना था नहीं किए, अब बैठ के सोच रहे हैं कि जब ख़त्म होगा तब क्या करेंगे, जब ख़त्म हो जाएगा तब ये सोचेंगे कि लॉकडाउन में इतना समय था तो बहुत कुछ कर सकते थे लेकिन कुछो नहीं किए। हम ना पहले सोच-बटोर के काम रखते थे ना अब रख रहे हैं। जो है कर रहे हैं। जैसे देखिए एतना ना रईस दुःख हो गया है लोगों का कि यहाँ लोग मर रहे हैं। लोगों का नौकरी जा रहा है। आ लोग कह रहे हैं कि भकेसन पर नहीं जा पाए। माने ऐसा ना लग रहा है कि जैसे लोगों का जे है से कि एक गोड़ हमेशा भेकेसने में रहता था आ जब से लॉकडाउन हो गया है एके गोड़ पर खड़ा हैं। भकेसन ना हुआ साँस लेना हो गया। जो आदमी सिवान से आगे नहीं गया ज़िंदगी में उ भी कह रहा है कि प्लान था यूरोप का। अबे रूक जाओ कुछ दिन फिर देखेंगे कि तुम रोने का कौन सा नया बहाना लाओगे। ये तो ख़त्म होगा ही।’

‘और बताओ पटना के क्या हाल हैं?’

‘अरे एकदम ठप हो गया है समझिए कि खटर-पटर-हो-हल्ला सब बंद हो गया है। एतना ना शांत कि सुड़ियल जैसा फ़ील आ जाता है बाहर निकलने पर।’

‘सड़ियल?’

‘आरे भैया, अपना र और ड़ का हिसाब थोड़ा टाइट है। माने अंग्रेज़ी वाला। क्या तो बोलते हैं उसको सरीयल कि सुरियल, सुर्रियल जो भी बोलते हैं वैसा हो गया है। उ मतलब था हमारा। सड़ेगा काहे। घबराने का कोई बात नहीं है। दु चार गो पगलेट तो हिहाँ रहबे करेगा। उतना जाहिलियत के अलावा सब ठीक है। फ़ोन वोन आ रहा है ख़ूब लोगों का आजकल। माने वट्सऐप होने से लोग फ़ोन पर बात करना थोड़ा कम कर दिए थे। अब बैठे बैठे दिमाग़ खौरा रहा है त फ़ोन घुमा दे रहे हैं लोग। आ ऐसा समय में तो आदमी बहुत कुछ सीख सकता है लेकिन आदमी सीखता थोड़े हैं। देखिए अब इसी में खैनी-बीड़ी वाला छटपटाइल रहता है। एक दु दिन बिना उसके काम चल जाएगा तो ई नहीं की उसी का आदत डाल लें। घर का कामे कर रहा है तो उसी में मन लगा के थोड़ा सीख ले। काम थोड़े कोई बुरा होता है। हम तो हर काम करते हैं। जब एतना दिन में सादगी से रहने सीख सकता है। प्रेम से रहने सीख सकता है। खान-पान-रहन-सहन… लेकिन कोई सीखेगा थोड़े कुछ। बस ज्ञान ठेलवा लीजिए सब से। जैसे हम भी ठेलिए रहे हैं।’

‘हाँ वो तो है। पर देखो ठीक हो जाए तो अच्छा है। लोग तो क्या ही सीखेंगे।’

‘अरे ठीक तो होईबे करेगा भैया, उ का है कि हम लोग का पीढ़ी कुछ देखबे नहीं किया है। पहिले कैसा कैसा न महामारी होता था। अब आदमी को सालों से लगने लगा था कि जीत लिए हैं सब बेमारी-हेमारी सब के भी त इसलिए तनी ढेर लग भी रहा है। पहिले महामारी में गाँव का गाँव साफ़ हो जाता था। हम लोग का पीढ़ी देखा ही नहीं है कुछ। घबराने का बात नहीं है ओतना। लोगों में संयम भी नहीं है। बोल दीजिए की हाथ गोर तोर के बैठ दिन भर त आदमी पगला जाएगा। सबके पिछवाड़े में चक्र हो गया है, कोई स्थिर नहीं बैठ सकता है। आ उहे दिन भर काम करने को दे दीजिए त बैठने का बहाना खोजने लगेगा। टिकटोक में दिन भर निकाल देगा लेकिन फ़ायदे के लिए बैठने को कहिए त भकुआ जा रहा है पाँचे मिनट में।’

‘चलो बढ़िया है स्वस्थ रहो और व्यस्त रहो तो ये तो सबसे अच्छा है’

‘अरे भैया, यहाँ तो व्यस्त रहिए जाएँगे। मनोरंजन का कमी नहीं है। बंदी में भी मुरी फूटौव्वल हो गया है कल।’

‘मुरी फूटौव्वल कहाँ हो गया? पुलिस से?’

‘पुलिसवन सब तो बड़ा मज़ेदार कहानी सुनाता है आजकल लेकिन है बगले में एक ठो परिवार। कल लाठा-लाठी, फैटा-फैटी हुआ है जम के। गण सब जमा हो गया है। भाग-भाग के आ गया है सब कलकत्ता-बम्बई-सूरत से। उ का है कि दूर रहने से प्रेम बना रहता है अब सब एक साथ जमा हो गया है तो लड़बे करेगा। भायरस से मरे ना मरे ऐसे ही दु-चार ठो मर जाएगा। वैसे ठीक है मनसायन रहता है थोड़ा। छत पर खड़ा होके देखे बड़ी देर तक। अब झगड़ा छोड़ाने कौन जाए इसमें।’

‘अरे ऐसे में तो ख़तरा हो जाएगा?’

‘नहीं भैया ख़तरा नहीं होगा। अमेरिका थोड़े है कि ड़ाईभोर्स रेट बढ़ जाएगा। अरे चार ठो बर्तन रहेगा त आवाज़ ऐबे करेगा। सब दूर दूर रहने लग गया है तो थोड़ा कम हो गया है नहीं तो ई सब तो सोभा है समाज का।’

‘तुम भी क्या कह रहे हो। मार पीट कैसे शोभा हो सकती है?’

‘अरे भैया आप देखेंगे ओहिमें कपार फट जाता है आ उहे भाई लेके हॉस्पिटलो जाता है। आ तनी पैसा हो जाए तो दू-चार गो केसो नहीं होगा परिवार में? कोर्ट कचहरी तो शोभा है धन का। और आजकल पड़ोस में गण सब जमा हुआ है तो थोड़ा लड़ उड़ लेता है त उ लोग का मन भी हल्का रहता है। हमलोग का मनोरंजन। बरी मार-मारा है एक दूसरे को कल।’

‘अबे यार, इसमें कैसे मज़ा आ जाता है तुमको। और बाक़ी लोग सब ठीक हैं?’

‘हाँ ठीके है। सबका धीरे-धीरे सेट हो रहा है। सदालाल सिंगवा आया था कल। बरी रोया कि मन ऊबिया गया है घर में बैठे बैठे। हम उसको बोले कि तुम तो साला बरी शायरी करता था कि वक़्त ठहर जाए। लम्हा जम जाए। त अब करो रोमांस! ठहर तो गया है? अब काहे बिलबिला रहे हो? त पिनक के भाग गया। जो जेतना शायरी ठेलता है आ इंस्टा पर लभ ओफ़ लाइफ़ में  लभलभा रहा है उसका भीतर से ओतने मुरी फूट्टअव्वल है।’


‘सदालाल सिंह को तुम कभी छोड़ते नहीं हो।’

‘आ नहीं भैया, उ का है कि जिसको काम है उसको हमेशा काम रहता है। जिसको नहीं रहता है उसको कभी नहीं रहता है। जिसको रोना है उ बहाना ढूँढ लेता है रोने का। आ जिनको काम नहीं है बैठ के तेरह-बाइस, लंदर-फंदर बतियाना है उसका त पेट फूलबे करेगा लॉकडाउन में। आ लोगों को अभी भी नहीं समझ आ रहा है कि दंगा के लिए कर्फ़्यू नहीं लगा है दूर-दूर रहने के लिए लगा है। मौक़ा मिलते ही गले मिलने के लिए नहीं। त खुदे भगाते उसको नहीं भागता तो।’

‘और पटना में वन्य प्राणी नहीं दिख रहे? तुम्हारे घर से अब तो हनुमान मंदिर दिख जाता होगा।’

‘अरे भैया उ सब थोड़ा ढेर देखने लगे हैं लोग। माने कहने वाला कल को ये भी कह देगा कि पटना में जिराफ़ दिख गया। हम नहीं कहेंगे। माने पहिले भी जानवर सब दिखता था। अब भी दिखता है। पहिले दिखता था त कोई पूछता नहीं था अब दिखता है त विडीओ बनाता है। बंदी से थोड़ा प्रदूषण तो कम हुआ ही है लेकिन लोग भी तनी ढेर देख रहे हैं। और बाक़ी तो सब बढ़िया है। आपलोग भायरस को का कह रहे हैं? यहाँ तो लोग कह रहे हैं कि जैसे औरत सब भतार का नाम नहीं लेती है उसी तरह भायरसो का नाम नहीं लेना है। ये नहीं कहना है कि उ कहाँ से आया है। त हम कहे ठीक है कह दो कि झूमरी तिलैया से फ़रमाइस में आ गया है। नाराज़ हो जाएगा भायरस तो ...ऐजी तनिए सुनिए उ जो नया वाला भायरसजी आए हैं उन्हीं का बात कर रहे हैं, कहो। ख़ैर, ग़लत-सलत सूचना देने वाला भी बढ़ गया है अब पता नहीं ऐसा करने में लोगों को क्या मज़ा आता है। इलाज तो हर आदमी लेकर घूम रहा है। आँकड़ा, ग्राफ़, रीसर्च सब लोग के उँगलिए पर है। माने सबके हाथ में फ़ोन है आ दुनिया जहान का फ़ालतू टाइम। त का करेगा आदमी? वही कर रहा है। अब बताइए कल एक ठो मैसेज भेजा कि कपार छिलवा के कोका-कोला से नहा लेने पर भायरस मर जाता है। असली भायरस तो इसे सब है। इन सबको भी थूरने का व्यवस्था हो जाए तो ठीक रहता।’

पटना सीरीज 

~Abhishek Ojha~

Jun 2, 2019

कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क


सामाजिक विज्ञान को विज्ञान की उपाधि जरूर किसी ऐसे व्यक्ति ने दी होगी जिसे लगा होगा कि विज्ञान को विज्ञान कहना डिस्क्रिमिनेशन हो चला है। विज्ञान और तार्किकता बूर्जुआ बन गए हैं। अतार्किकता को क्रांति कर देनी चाहिए! क्योंकि भाव तो अतार्किकता को भी मिलना चाहिए और फिर किसी ने लेख लिखा होगा - इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन के कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क के अंतर्गत ऐसे कहा जा सकता है कि अतर्किकता भी विज्ञान है।

इसका मतलब मत पूछियेगा क्योंकि मैं ठहरा गणित का आदमी जहाँ १+ १ दो और केवल दो होते हैं। १+१ की बात आ ही गयी है तो पहले एक जोक बाकी बाद बात में करेंगे। [बात प्रवचन जैसी लगने लगे तो बीच में जोक ठेलने की बड़ी महिमा बतायी गयी है.]

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एक साक्षात्कार में तीन लोग गए। पहला गणितज्ञ। उससे पूछा गया १+१ क्या होता है?
बोला २.
२? कुछ और नहीं हो सकता?
और कुछ? पगलेट हो क्या?

दूसरा आया.  उससे भी वही सवाल।
उसने बोला १.९० से २.१० के बीच कुछ भी हो सकता है।  आंकड़े में गड़बड़ी हुई हो तो १०% त्रुटि की संभावना लगती है।
सांख्यिकी पढ़ी थी उसने और इसका रौब झाड़ना जरूरी लगा उसे।

तीसरा. सामाजिक विज्ञानी. बुद्धिजीवी. उससे भी वही सवाल। गणित-तर्क १, २, जोड़-घटाव का उसे कुछ नहीं पता था।
उसने पहले उठ कर दरवाजा बंद किया. इधर उधर देखा. और धीरे से बोला - आपको कितना चाहिए? एक कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क बना के उतना साबित कर देंगे।

जोक समाप्त.
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आजकल आंकड़ों के नाम पर कई बार अपनी बात कहने के लिए जो लोग करते हैं उसे विज्ञान में फर्जीवाड़ा कहा जाता है.

बात करनी थी कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क की। एक वर्ग है जो बिना (बहुधा अतार्किक) फ्रेमवर्क के नहीं सोच सकता। और अतार्किक फ्रेमवर्क की व्याकपता अनंत होती है। तार्किकता व्यक्ति में एक प्रकार से लाज-शर्म की उपज भी करता है।  तार्किक व्यक्ति को अतार्किक बात करते हुए शर्म आती है। एक बार गलत हो जाने पर अगली बार उसे बोलने से पहले और अधिक सोचना पड़ता है। अतार्किक के साथ इसका उल्टा होता है। जितनी बार गलत हुए अगली बार उतने ही अधिक विश्वास से गलत बोलते हैं।  जैसे हर चुनाव में उनका विशेषज्ञ अनुमान और असली परिणाम एक दूसरे को अपना वही दिखाते हैं जो ३६ में ३ और ६। लेकिन वो ठहरे विशेषज्ञ फिर झाड़ेंगे ही अपनी बात। उन्हें ये नहीं समझ आता कि फिर उठ खड़े हो चल पड़ने का ज्ञान पुनः पुनः वही पगलेटी करते रहने के लिए नहीं होता है :)

मैंने जीवन में कुल मिलाकर कुछ घंटे टीवी समाचार देखा होगा। उसमें भी आजकल सोशल मीडिया पर दिख जाने वाले क्लिप्स मिलाकर। आखिरी बार किसी चुनाव का लाइव परिणाम टीवी पर देखा था वो बिहार के चुनाव थे। और वो पहली और आखिरी बार था। जो अपने आप को और एक दूसरे को सबसे बड़े चुनावी विशेषज्ञ कहते हैं उन्हें लाइव देख रहा था। यादव-गुप्ता-रॉय  - एनडीटीवी पर। हुआ यूँ था कि उनके रुझानों की फीड गलत थी। विशेषज्ञ बोल रहे थे ..but you should realize that only industry Nitish developed in Bihar was brick kilns. He can not win elections again and again with that. थोड़ी देर में उन्हें पता लगा कि असल में नितीश कुमार चुनाव जीत रहे हैं तो...  बिना शर्म, पलक तक ना झपकी बोलने लगे  -Nitish is the man who built Bihar brick by brick. He is true people's leader. The results are a reflection of that. ऐसी मोती चमड़ी ! ये है विशेषज्ञों की असली विशेषज्ञता। वो जो भी बोल रहे हों, हो जो भी रहा हो - अपने ईंट भट्ठे के कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क  में झोंक देते हैं।  और आप अपनी सोच यदि इन विशेषज्ञों के कहे से बनाते हैं ! तो ... ये वही लोग हैं जो अंतिम समय तक नहीं जानते थे कि मंत्रिमंडल में किसे क्या मिलेगा। और पता चलने के पांच मिनट में लेख लिख देते हैं कि क्यों किसे कौन सा मंत्रालय मिला !


औद्योगिक संसार में आजकल बहुत कुछ आउटसोर्स किया जाता है इनमें से एक प्रमुख है - प्रेज़ेंटेशन या पिच बुक की डिजाइन। जिन्हें आउटसोर्स किया जाता है वो कंपनी कुछ रेडीमेड टेम्पलेट रखती हैं। एक पसंद नहीं आया तो दूसरा भेज देते हैं। कुछ सालों बाद जब लोग ऊब कर नया डिज़ाइन चाहते हैं और वापस नया डिज़ाइन मांगते हैं तो वो फिर से पिछला वाला भेज देते हैं। ये नहीं तो वो पसंद तो आयेगा ही। वैसे ही ये विशेषज्ञ टेम्पलेट रखते हैं। ये फिट बैठा तो ठीक नहीं तो दूसरा वाला। नया कुछ है नहीं इनके पास। युग बदल गया - चुनाव देखने का तरीका वही।  फॉर्मूले वही।  वोटर के लिए जाति-धर्म ख़त्म हो जाए पर इनके दिमाग में उसके अलावा कुछ है ही नहीं तो उसके बाहर कैसे सोच सकते हैं ! टेम्पलेट ही वही है दूकान भी एक ही टेम्पलेट बेच कर चलाना है।

 बचपन में एक जान पहचान के थे जिनके किराने की दुकान थी। किराने की दूकान यानी जिसमें जरुरत का सब कुछ मिल जाए। वो एक ही प्रकार का चावल रखते - कोई यदि कहता कि थोड़ा महीन दीजिये तो अंदर जाकर वही चावल दोनों मुट्ठी में लाकर दे देते। कोई कहता थोड़ा साफ़ दीजिये तो भी वही करते।  कोई कहता पुराना दिखाइए तो भी वही। और लोग दोनों मुट्ठियों के चावल देख एक वाले को चुनकर कहते हाँ ये वाला बढ़िया है। वो दो रुपया अधिक लगाकर वही चावल तौल देते। वैसे ही ये विशेषज्ञ हैं - चावल इनके पास एक ही है। आपको यदि ये समझ आ गया हो  तो समय है दुकान बदलने का। या जमाना पी२पी का है तो दुकानदार को दलाली ही क्यों देना। अपनी सोच इन्हें आउटसोर्स करने की जगह खुद सोच लीजिये ! जिसे ये विशेषज्ञ थिंकिंग, एनालिसिस वगैरह का नाम देते हैं उसे उन्होंने खुद आउटसोर्स कर रखा है अपने पूर्वाग्रहों को, उस कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क को जिसे वो संसार की धुरी समझते हैं। ऐसे लोग संसार में हर जगह बहुतायत में पाए जाते हैं। हो सकता है उन्हें स्वयं नहीं पता वो ऐसे होते हैं। संभवतः वो अपने को समझते तो कलिकाल सर्वज्ञ हैं ठीक वैसे ही जैसे भर्तृहरि परिभाषित मुर्ख !  

 - अर्थात एक अधूरे ज्ञान से भरा व्यक्ति जिसे ब्रम्हा भी नहीं समझा सकते। जो तर्क के प्रति अँधा है.पर जिसे घमंड भी है कि उससे बुद्धिमान कोई नहीं. आप चाहे तो मगरमच्छ के दांतों में फँसा मोती निकाल सकते हैं, समुद्र को भी पार कर सकते हैं,  गुस्सैल सर्प को भी फूलों की माला तरह अपने गले में पहन सकते हैं...  लेकिन इनको को प्रत्यक्ष सही बात समझाना असम्भव। संभव है रेत से भी तेल निकल जाये  या मृग मरीचिका से भी जल मिल जाए। खरगोशों के सींग उग आये; गुलाब की पंखुड़ी से हीरा काटना हलवा हो जाए लेकिन एक पूर्वाग्रही मुर्ख को सही बात का बोध? भ्रम और घमंड का कम्बाइंड इक्वेशन नॉविएर स्टोक्स से भी खतरनाक इक्वेशन होता है। उनकी बातें सुन आयरनी (irony) कपार खुजलाने लगती है कि...  अब कोई नया शब्द ढूंढ लो बे तुमलोग हमसे न हो पायेगा। मैं झूठ नहीं बोल रहा आप अंग्रेजी डिक्शनरी खोल कर रख दीजिये और इनके विचार दो घंटे बजाइये. irony शब्द मिट जाएगा डिक्शनरी से।

एक सत्य कथा बताता हूँ -  मनोहर कहानियों से थोड़ी कम रोचक होगी पर उतनी ही सत्य।
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...एक विश्वविद्यालय है दिल्ली में. वहां एक विद्यार्थी को कहा गया शोध करके आओ कि किसी अमुक योजना से जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ. साधारण प्रश्न है. एक विद्यार्थी विभिन्न प्रकार के आंकड़े लेकर कुछ महीनों में आया. सुन्दर अध्ययन.

प्रोफ़ेसर साब लाल हो गए. कहा ये गलत है तुमने तो कुछ किया ही नहीं?
क्यों?
इसमें कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क कहाँ हैं? तुमने इस बात का अध्ययन तो किया ही नहीं कि सरकार किसकी थी ! न इसमें कास्ट फैक्टर है. ना रिलिजन.
सर, उसकी क्या जरुरत है? आर्थिक स्थिति तो है.
तुम्हे यही नहीं पता ! प्रोफ़ेसर साब ने असाइनमेंट फाड़ दिया।धमकी दी की फेल हो जाओगे।

फिर विद्यार्थी ने दो घंटे में फ़टाफ़ट लिखा कि इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन इन कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ कास्ट सिस्टम के कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क के हिसाब से इसका फायदा किसी को नहीं होगा। एक बार फायदा हो भी गया तो उसके बाद क्या? स्टैंडिंग ओबेशन ! तालियां बजायी प्रोफ़ेसर ने और कहा कि इसमें फेमिनिज्म और सोशिऑलोजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी भी लगाओ. सोशल स्ट्रैटिफिकेशन लगाओ। तुम्हे गोल्ड मैडल दिलाया जाएगा।

गाँव-गाँव घूमकर आंकडे  इकठ्ठा कर किया गया अध्ययन फाड़ कर फेंक दिया गया। पर दो घंटे का तथाकथित अध्ययन फ्रेमवर्क वाले विश्वविद्यालय में वो वैसे ही फिट हो गया जैसे बोल्ट और नट एक दूसरे में फिट हो जाते हैं । कालांतर में वो बालक तथाकथित सामाजिक वैज्ञानिक बना। हर मुद्दे पर राय देने वाला। और उसका होली-दिवाली होते चुनाव। उन दिनों उसकी व्यस्तता ऐसी होती कि एक टांग एक स्टूडियो में तो दूसरी दूसरे स्टूडियो में। हर बार उसकी बातें गलत होती पर उसे अपने लाल गुरु की बातें गाँठ बाँध ली थी। सबसे पहले मेरे घर का अंडे जैसा था आकार की तरह रट लिया था इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन ऐंड सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी  इन कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ कास्ट सिस्टम एंड... इसके आगे पीछे कुछ हो कैसे सकता है।  एक अटके हुए रिकॉर्ड की तरह यही बात दोहराते रहता। अंडे जैसा है संसार पर ही रुका रहा कभी बहार निकला ही नहीं। दुनिया बदल गयी पर उसे कुछ नहीं दीखता था। उसके अनुसार प्रत्यक्ष को प्रमाण नहीं चाहिए होता है। यदि कुछ चाहिए होता है तो वो है - कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क ।

धीरे धीरे उसे लगने लगा था संसार ही चलता है उसके कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क से। उसके बिना उसके कुछ नहीं चल सकता - सूरज,  चाँद किसी की औकात नहीं। कौन सा गुरुत्वाकर्षण बे ? संसार चलता है  इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन  ऐंड सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी  एंड... बंगके बंगाली फिरंग के फिरंगावाली दिल्ली के दिलवाली सब फ्रेमवर्क से चलत हैं.*

दुनिया अपनी गति और नियमों से चलती रही।  वो अपने हिसाब से समाज की संरचना और भविष्य बताता रहा । हर बार वो गलत होता लेकिन बन गया था विशेषज्ञ तो वो कैसे गलत हो सकता था? उसकी बात गलत होती तो पहले उसे सही करने के लिए प्रोपेगंडा करने लगा।  फिर बौखलाहट में दूसरों की  बातों में गलती  ढूंढता। यदि फ्रेमवर्क सही नहीं है तो उसे सही कराने के लिए किसी हद तक जायेंगे ! ऐसा हो कैसे सकता ही कि वो गलत हो। सबको उसमें फिट होना पड़ेगा।

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चुनावों में उसके कही पार्टी की हार हुई तो बोला -

ईवीएम हैक कर लिए?
किसी ने पुछा - हैकिंग क्या होती है? मालूम है?

बोला - हाँ, जब आप गलत हो और गलती नहीं माननी हो तो उसे हैकिंग कहते हैं। अरे मान लो ऑनलाइन गाली-वाली दे दिया किसी को और बाद में माफ़ी मांगने की नौबत आ जाए तो कहना होता है कि अकाउंट हैक हो गया। तो वैसे ही अब ईवीएम ही हैक हुआ होगा। वोट गलत थे।

अच्छा।

उसके बाद वो लग गया अपने फ्रेमवर्क को सही करने के लिए प्रोपैगैंडा में... पर वो फिर फेल हो गया तो बोला - साला सब अम्बानी अडानी का पैसा से चुनाव जीत गया सब। इसलिए मेरा फार्मूला नहीं चला. ब्लडी कैपिटलिज्म.

एक हारने वाली पार्टी वाला बोला - अबे हममें ऐसा क्या नहीं है जो अम्बानी अडानी को उसमें दीखता है? हमने तो और खुला हाथ दिया था हम तो हारे ही नहीं होते कभी !

विशेषज्ञ बोला - अबे चुप करो।  विशेषज्ञ तुम हो या मैं? तुम साले गंवार। जीत तो पाए नहीं मेरे फॉर्मूले से भी।  तुम्हे तो मर जाना चाहिए।  हमारी बात गलत नहीं है।  मीडिया ने जीताया है.

लेकिन उस हिसाब से तो तुम्हे जीतना चाहिए. वो वाली कोशिश तो तुमने की थी?

ये सुनते हुए उसके दिमाग में बत्ती जली - "अबे साला तो मामला ये है. जनता ही *तिया है।"

उसने घोषित कर दिया जनता को समझ ही नहीं है. ये प्रणाली ही खराब है. यशवंत सिन्हा की पेटेंटेड लाइन थी - कोई भी *तिया मुख्यमंत्री बन जाता है. उसी को उसने चोरी कर कहा - कोई भी *तिया वोट डाल देता है। तो क्या होगा। किसी को समझ ही नहीं है।

पर तुम्हारे हिसाब से तो सभी इक्वल हैं?

हैं नहीं। होंगे। हम करेंगे। सब इक्वल हो कैसे सकते हैं बिना क्रांति के? इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन  ऐंड सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी  एंड...

तो अभी क्या है?

अभी हम ज्यादे इक्वल हैं !

ये तो फिर चोरी की तुमने ये तो जॉर्ज ऑरवेल ने तुम्हारी जमात के लिए कहा था।  पर ठीक है जो तुमने खुद ही कहा।

वो बड़बड़ाते रहा - हम गलत कैसे  हो सकते हैं. हम जानते हैं कि किसको किसे वोट देना चाहिए। यदि किसी ने नहीं दिया तो *तिया वो हुआ या मैं? समझ ही नहीं किसी को। उन सालों की तो गर्दन पकड़ के मैं... सारे संसार को कॉन्सेप्चुअल फ्रेमवर्क में फिट होना है. पगलेट फिट ही नहीं हो रहे ! इंटेरसेक्सनालिटी ऑफ़ मार्क्सिस्ट सोशल एंड पॉलिटिकल डिस्क्रिमिनेशन  ऐंड सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ़ पॉवर्टी  एंड...

दुनिया अपने हिसाब से चलती रही।


* गुरु गोविंद सिंह जी महाराज का लिखा भजन दिल्ली में गुरुद्वारा बंगला साहिब में सुना था - बंगके बंगाली फिरंग के फिरंगावाली दिल्ली के दिलवाली तेरी आज्ञा में चलत हैं.
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~Abhishek Ojha~



Aug 28, 2018

किस्सा-ए-बागवानी

[सत्य घटनाओं पर आधारित. इस पोस्ट के सभी पात्र और घटनाए लगभग वास्तविक हैं. यदि किसी भी व्यक्ति से इसकी समानता होती है तो ये और कुछ भी हो संयोग तो नहीं ही है. वैसे हमें कौन सा फर्क पड़ता है ! 😊]


कुछ दिनों पहले हमसे किसी ने कहा – ‘थोड़ा गार्डनिंग पर ज्ञान दो. तुम तो कितना कुछ लगाते हो. लकी हो, तुम्हारे हाथ से पौधे लग जाते हैं’.

पहले तो सवाल ही गलत था अपार्टमेंट में रहने वाला व्यक्ति क्या जाने गार्डेन का हाल ! फिर भी हमने बहुत कोशिश की कि अपने को और अपने हाथ को श्रेय दे ही लूं. पर हो नहीं पाया क्योंकि... इस बात को समझने के लिए...

पहले एक कथा -
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 बात बहुत पहले की है. जब लोग पैदल यात्रा किया करते थे. सड़कों के किनारे छायादार और फलदार वृक्ष हुआ करते थे जिनकी छाँव में पानी पीने की व्यवस्था होती थी. एक सज्जन यात्रा पर निकले... सुदूर किसी देश में कहीं एक दिन उन्हें एक फुलवारी दिखी। फल-फूलों के भार से झुके पेंड़-पौधे जिनपर भौरें मड़रा रहे थे... वगैरह वगैरह. माने भीषण मनोरम - इतनी मनोरम की यात्री ठहर गया. फुलवारी की सुन्दरता का अनुमान आप इस बात से लगाइए कि न तो उस जमाने में फेसबुक था. न इन्स्टाग्राम .न स्नैपचैट (ट्विट्टर भी नहीं !) फिर भी यात्री ठहर गया !

फुलवारी का मालिक दिखा तो यात्री ने मंत्रमुग्ध होने वाला एक्सप्रेशन देते हुए कहा – ‘भाई ! क्या अद्भुत बगिया है आपकी। मैं कितने ही नगर-राज्य-महाजनपद-देश घूम आया पर ऐसी खुबसूरत बगिया मैंने नहीं देखी !’

लहलहाती फुलवारी के मालिक अति प्रसन्न हुए और गर्व से बोले – ‘भाई, आखिर क्यों नहीं होगी ! इतनी मेहनत करता हूँ. खून-पसीना एक कर रखा है. ऊपर से... देखिये उन्नत किस्म के बीज और सिंचाई और.. ये और वो... जिंदगी लगा रखी है इसमें. ऐसे ही नहीं हो गयी!’.

वो इतना बोल गए जितने में बागवानी का मैनुअल छप जाता. विद्वानों की इसमें एक राय है कि मीडिया का युग होता तो वो जरूर पैनल एक्सपर्ट बने होते. चुनावी एक्सपर्ट तो बन ही गए होते जो परिणाम आने के बाद तुरत ही उसका कारण बता देते हैं ! (पत्रकार भी हो सकते थे पर संभवतः उतने भी हांकने वाले नहीं थे... पत्रकारिता के लिए तो धान के खेत में खड़े होकर उसे गेंहू कह देना भी विशिष्ट ओवरक्वालिफिकेशन होता है.) खैर ... कुछ महीने या हो सकता है वर्ष बाद... (अब समय तो लगता था पैदल आने-जाने में) वही सज्जन यात्री वापस आ रहे थे (अब देखिये प्रूफ तो नहीं है कि सज्जन ही थे लेकिन ऐसा ही कहने का चलन है). इस बार उन्होंने देखा कि बगिया उजाड़ पड़ी है. उन्हें बड़ी निराशा हुई. अब सेल्फी वगैरह का युग तो था नहीं लेकिन बगिया की खूबसूरती देखकर हो सकता है यात्री के दिमाग में आया हो कि आते समय एक चित्र ही बना लूँगा ! या उस जमाने में हो सकता है लोग सच में खूबसूरती आँखों से देखते हों और आनंदित होते हों. जो भी कारण रहा हो उन्हें लगभग बंजर पड़ी जमीन और सूखे पौधे देख बड़ी निराशा हुई. संयोग से बगिया के मालिक फिर दिख गए.

यात्री ने इस बार दुःख प्रकट करते हुए पूछा – ‘भाई, हुआ क्या? मतलब कैसे? आप तो इतनी मेहनत ?’

एक जमाने में लम्बी लम्बी हांकने वाले बगिया के मालिक बोले – ‘भाई, क्या बताएं अब. सब भगवान की लीला है. जैसी प्रभु की इच्छा.’

 कथा समाप्त.
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अरे रुकिए अभी आगे और पढना है. केवल कथा समाप्त हुई है बात नहीं.

तो ... कथा से शिक्षा वगैरह जो मिली वो तो आप समझ ही गए होंगे. उसे बताने का पांच नंबर तो मिलना नहीं जो सोदाहरण लिखा जाय और शिक्षा भी थोड़ी गहरी सी है जितना सोचेंगे उतनी खुलेगी. तो हम क्या लिखें अपनी समझ ! पर ऐसा है कि... बचपन में कहानियाँ लाखों में नहीं तो हजारों में तो सुनी ही... लेकिन उनमें से कुछ ऐसी रहीं जिनका उदाहरण जिंदगी में हर मोड़ पर मिला. ये कहानी भी वैसी ही कहानियों में से एक है. छोटी, गंभीर और सटीक.

 अब फ़ास्ट फॉरवर्ड करके आ जाते हैं वर्तमान में. अपनी बात. लोग कहते हैं कि हमारा अपार्टमेंट ‘बोटैनिकल गार्डन’ लगता है. लोगों को अजूबा इसलिए लगता है कि पचास तल्ले की बिल्डिंग के कबूतर खाने जैसे अपार्टमेंट में - कैसे इतने पौधे ! देशी-विदेशी जो भी आते हैं वो पूछते जरूर हैं पौधों के बारे में. लेकिन अब ये कथा तो बचपन से ही वायर्ड हैं दिमाग में तो हम क्या बोलेंगे.. मुस्कुरा भर देते हैं. कुछ हांकने से पहले ही कथा दिमाग में कौंध जाती है. वैसे हम करेंगे भी क्या. गमले, मिट्टी, बीज सब कुछ तो मिलता है बस हम इतना करते हैं कि लगा देते हैं. और सर्दियों में जब हिमपात का मौसम होता है. सूर्य दक्षिणायन होते हैं जब कुछ नहीं उगने का समय होता है तब मिट्टी में कोई भी बीज दबा देते हैं. कुछ दिनों में हरा-भरा निकल आता है – आलू, चना, सरसों, मुंग, उड़द. उसमें भी फूल लगता है. खुबसूरत भी दीखता है. और जब मौसम हो तब तो बीज मिलते ही हैं बाजार में.

पर लोग तो लोग - एक मित्र पहले तो दुखी हुए कि उन्होंने बहुत कोशिश की पर लगता ही नहीं. - कैसे लगाते हो? हमारे तो दिमाग के बैकग्राउंड में कथा ! तो हम माहौल में स्माइली बना देने के सिवा क्या कहते. पर कुछ देर के बाद वो पलटी मार कर खुद ही ज्ञान देने लगे - ‘अभिषेक एक गड़बड़ है. ये दो पौधों को तो तू प्रून कर दे. छंटाई करने से और फनफना के बढ़ेंगे.' दो में से एक तुलसी. हम अपने पौधों के पत्तों को कभी हाथ नहीं लगाते और वो काट-पीट के धर दिए. ‘अभिषेक, तू बेकार मोह कर रहा है ऐसे ही बढ़ते हैं! देखना.’ हम तिलमिला कर रह गए लेकिन थोडा तो समझ में आ गया कि उनके पौधे क्यों नहीं लगते ! लहलहाती फुलवारी वाले जब एक्सपर्टई करने लगे तब ‘भगवान की लीला’ हो ही जाती है और यहाँ तो बिना कुछ लगाये भी ..एक तो एक्सपर्ट ऊपर से बिन मोह दया - पौधे कहाँ से लगेंगे !

 हमारा पौधे लगाने का सिलसिला शुरू हुआ था तुलसी लगाने के प्रयास से. उसके पहले लगे लगाए रेडीमेड गमले ही लाते थे. कृष्ण-तुलसी के बीज ऑनलाइन मिल गए तो गमले और मिट्टी सुपर मार्केट में. उसके बाद तो एक से दो होते हुए दर्जन भर गमले हो गये. मन बढ़ा तो और भी पौधे लगाते गए... एक दक्षिण भारतीय मित्र से ओमवल्ली (कर्पुरावल्ली) का डंठल मिला और फिर... बैम्बू, मनी प्लांट, गेंदे के फूल, सूरजमुखी, आलू, टमाटर, पुदीना... हमारे अपार्टमेंट में फर्श से लेकर छत तक खिड़की है और वो भी दक्षिण-पूर्व दिशा में जिससे सर्दियों में दिन भर धूप रहती है. जो इस देश के लिए ग्लास-हाउस की तरह काम कर देती है और पौधे लहलहा उठते हैं – बाकी आगे कहने को तो बहुत मन हो रहा है लेकिन – कथा !. वैसे कभी-कभी गड़बड़ भी हो जाती है. जैसे - टमाटर ! हमने बचपन में जो देखा था वो टमाटर का पौधा छोटा ही होता है. लगाने के बाद पता चला कहने को चेरी टोमेटो लेकिन हो गया आठ फीट का. धागे और टेप से खिड़की के शीशे पर किसी तरह उसे सहारा मिल पाया !


 एक अन्य मित्र हमारे घर आ चुके थे और उन्होंने अपने एक अन्य मित्र को हमारे पौधों के बारे में बताया. और बात मित्र से मित्र तक जाते जाते थोड़ी तो बदलती है ही. ये मित्र के मित्र एक बार मिले तो कहने लगे (फेक अमेरिकी एक्सेंट में पढियेगा) – ‘आई हर्ड आप तो सब्जी एंड आल भी उगा लेते हैं अपने अपार्टमेंट में ! आपको तो खरीदना भी नहीं पड़ता होगा. कैसे लग जाता है यार.. मैं तो... कितने प्लांट्स लेकर आया. दे जस्ट डाई ! मैं तो मिनरल वाटर डालता था एंड यू नो प्लांट फ़ूड  वो भी खरीद के लाया. आप बताओ कुछ.’

 ...हम तो सही में कुछ नहीं करते हैं तो क्या बताते. लेकिन हमें पहले तो ये लगा कि इसके तो एक्सेंट सुन कर ही पौधे मर जाते होंगे ! दूसरी ये कि जिसे लगता है कि गमले में उगा कर खाने लायक हो जाएगा उसको कैसे समझाया जाय. हमें समझ ये नहीं आया कि ये लड़का चार साल से अमेरिका आया है और इतना एक्सेंट !वो भी हाथ मुंह टेढ़ा कर कर के ! देखिये हम जजमेंटल तो नहीं हैं लेकिन अब ऐसा भी नहीं हैं कि राजस्थान में पला बढ़ा व्यक्ति इतने एक्सेंट में अंग्रेजी बोलने लगे. बहुत से राजस्थानी दोस्त हैं अपने भी. और हम ठहरे फैन उन बनारसी के जो बीस साल से रह रहे हैं अमेरिका में. उनकी बीवी रसियन. (८०% फैनता तो यहीं हो जाती है वो ठेठ बनारसी और उनकी पत्नी .. खैर !) और आज भी जब वीजा को भ पर जोर लगाकर भीजा कहते है तो लगता है दुनिया में इंसानियत अभी ख़त्म नहीं हुई. वो चार महीने की गर्मी में लौकी नेनुआ उगा लेते हैं - उगा ही लेंगे ! खैर मिलने को  तो ऐसे लोगों से भी मिल चुका हूँ जो कह देते हैं कि वो भूल ही गए अपनी भाषा ! मुझे अभी तक ये बात समझ नहीं आई कि कोई अपनी भाषा कैसे भूल सकता है !

 खैर... इसी बात पर एक और प्रसंग –

ये उन दिनों की बात है जब खलिहान में कटी फसल पर बैलों से रौंदवाकर दवनी होती थी. एक व्यक्ति दो साल के बाद कलकत्ता से लौटकर अपने गाँव आया था. खलिहान पहुंचा तो मसूर की दवनी चल रही थी. एक तरफ अनाज ओसाकर रखा हुआ था. उसने स्टाइल (अर्थात उस जमाने का कलकत्ता रिटर्न एक्सेंट) में पूछा – ‘इत्ते इत्ते दाना क्या है?’

खलिहान में सन्नाटा पसर गया. बैल तक ठहर गए ! ऐसी विचित्र बात ही हुई थी. दो साल कलकत्ता में रह कर आया व्यक्ति मसूर भूल गया ! खलिहान में ही गाँव के एक चटकवाह (तेज तर्रार) बुजुर्ग भी बैठे थे – अनुभवी. छाया में बाल सफ़ेद किये हुए (मतलब वही कि बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये थे). उन्हें ये वाला भूत भगाना बखूबी आता था. बैठे-बैठे दो नौजवानों को उन्होंने इशारा किया. दोनों नौजवान लठ्ठ लेकर टूट पड़े. जब दो चार लट्ठ सही से पड़ गए तब कुटाया हुआ व्यक्ति चिल्लाया – ‘अरे मसूर है मसूर. याद आ गया.’ !

प्रसंग समाप्त.

 मन तो हमें भी वही हुआ लेकिन... हम ऐसी हिंसा के बस सैद्द्धान्तिक समर्थक है. इस विषय में मेरे पास लालू की सुपुत्री मिसा भारती वाली डिग्री है... प्रैक्टिकल का कोई अनुभव नहीं - फेल पास तो तब होते जब कभी कोशिश किये होते. अब हम क्या बताते इस मित्र के मित्र को, सोचें कि इसको इसीकी भाषा में समझाना ठीक रहेगा तो हमने कहा – ‘तुम्हारे प्लांट्स ओबेसिटी से मर रहे हैं. वो ठहरे.. जंगल में रहने वाले जीव. वाइल्ड. यु नो. उन्हें मिनरल वाटर और प्लांट फ़ूड खिलाओगे तो फिट कैसे रहेंगे’.

 उन्हें ये बात तुरत समझ आ गई. पर ‘जीव’ वो सुन नहीं पाए. पौधे जीव हैं. जीवन - पूरा जीवन चक्र होता है पौधों का. अगर कुछ दिन पानी न दीजिये तो देखिये वो कैसे जीने के लिए छटपटा कर परिवर्तत होते हैं. जीजिविषा से भरपूर ! सूर्य की तरफ झुके... और यदि टमाटर के पौधे को कुछ दिन पानी नहीं मिला तो फटाफट फल लग कर पक जाता है. धीरे धीरे होने वाली प्रक्रिया त्वरित हो जाती है क्योंकि उन्हें लगता है कि अब जीवन समाप्त होने वाला है अपने गुणसूत्र संचित करते चलें – वनस्पति शास्त्र ! यदि पौधे सूखने लगें तो थोडा तो सोचो कि क्या कारण हो सकता है. पानी ज्यादा है तो कम डालो. अगर जडें ज्यादा हो गयी हो तो बड़े गमले में ट्रांसफर कर दो. मत्स्यावतार की तरह बढाते जाओ गमलों का आकार.

पर यदि आप ऐसे व्यक्ति है जो खुद कुछ ठीक करने के पहले कस्टमर केयर को फ़ोन करते हैं तो आपसे पौधे क्या ही लगेंगे. हम उस वर्ग के जो यहाँ टूलबॉक्स खरीद के ले आये और निराशा होती है कि इस देश में कुछ खराब होने जैसा है ही नहीं जिसे खोल खाल के थोडा कसा जाता! कहानी का असर नहीं होता तो कह देते कि बावन बीघा में पुदीना उगता है हमारे घर ये गमलों में उगाना कौन सी बड़ी बात है लेकिन हम ऐसा कभी नहीं कहेंगे. 😊


 पौधे जीव हैं. और जीव के प्रति ...पौधों को जीव समझिये बस लग जायेंगे. और हाँ फर्जी एक्सपर्टई से बचिए.

 किसी ने कह दिया ‘ये तो बात करता है अपने पौधों से.. प्यार से रखता है.’ कथा दिमाग में आई और मैंने तुरत रोका बस-बस. यदि आपको शौक है तो लगाइए. हाथ अच्छा-बुरा नहीं होता.. पौधों में जीजिविषा होती है. वो खुद लगते हैं. (नहीं लगे तो ऊपर वाली कथा का पांच बार जाप कीजिये.)

 हमारे घर के पास ही एक सप्ताहांत किसी ने मुफ्त में ढेर सारी किताबें रखी थी (होते हैं भले लोग) उनमें से एक उठाकर ले आया. पूरी किताब में जीने की कला जैसी कुछ बात थी. पर हाय रे फर्स्ट वर्ल्ड. उसमें जो बातें लिखी थी... ऐसी थी - एक दिन गाना गाओ, एक दिन दूर तक पैदल चलो, एक दिन एकांत में जाकर चिल्लाओ, पौधे लगाओ, किसी मशीन को खोलो और उसे वापस कस दो, मिटटी खोदो और उसमें लेट जाओ, पेंटिंग बनाओ... माने कुल मिला के उसमें ये था कि आदमी इतना न सुकून की जिंदगी जीने लगा है कि जीना ही छोड़ दिया है. लेकिन पढ़ते हुए ये भी लगा कि ये सब तो वैसे ही होता है रोज जिंदगी में.. और जो ऐसा नहीं है या जिसे ये सब भी सिखाना पड़ रहा है... वो यदि ये सब करने भी लगे तो वो पगलेट जैसा ही तो दिखेगा. उसे इन बातों में जो आनंद आता है वो करने से भी न मिले शायद. किताब ‘पीड़ित रे अति सुख से !’ लोगों के लिए थी. उन्हें ये याद दिलाने के लिए कि जिंदगी ऐसी ही होती है ...जैसी होती है.  बस वैसे मत बन जाइये.

 जीवन अपना रास्ता खोज लेता है... वही जीवन, वही जीजिविषा - जो आपमें है ! वही पौधों में भी होती है... या कोई भी काम कीजिये. मन से कीजिये. लहलहाएंगे पौधों की तरह ही. आपको आनंद आएगा हर उस काम में. लेकिन कथा जरूर ध्यान में रखियेगा नहीं तो...

और  अंत में कुछ तस्वीरें. ये कैसे लगे मत पूछियेगा.  वैसे उत्तर तो आपको पता ही है – प्रभु की इच्छा !

हरी ॐ तत्सत ! 😊





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~Abhishek Ojha~

Aug 11, 2018

मेंटल (पटना २२)


चाय की दुकान पर आना जाना होने से धीरे-धीरे दो चार अजनबी लोग भी चेहरे से जानने लगे थे और उन्हीं में से एक सज्जन ने एक दिन हमें निमंत्रण दे दिया - 'आप भी आईयेगा'। यूँ तो मैं जानने वालों के यहाँ भी निमंत्रण पर नहीं जाता पर जिन लोगों के साथ ‘ज्वाइंट निमंत्रण’ मिला था वो खीँच कर ले गए. जॉइंट निमंत्रण जैसे स्विस जर्मन में अनजान लोग मिलें तो उन्हें ‘ग्रुएत्सी’ कहकर अभिवादन करते हैं और एक से ज्यादा हों तो सामूहिक ‘ग्रुएत्सी मितेनांत’ कह देते हैं. वैसे ही ‘निमंत्रण मितेनांत’ जैसा कुछ था ये. तो ‘मितेनांत’ लोगों के साथ मैं भी चला गया। अवसर था बड्डे पार्टी-कम-सत्यनारायण कथा. और आप समझ ही गए होंगे कि साथ जाने वाले चार लोगों में एक बीरेंदर उर्फ़ बैरीकूल भी था।

 हम पहुंचे पौ बंद होने के समय (पौ फटने के विपरीत वाले समय) - गोधुली का समय। मेरी उम्मीद से कहीं ज्यादा लोग आए थे. महानगर का टैग होने के बाद भी है तो पटना ही. बच्चो को डिस्काउंट न करें तो कुल पचास से अधिक प्राणी तो होंगे ही. फूल-झालर भी लगा था. हम जहाँ खड़े थे वहां थोड़ी देर पहले ही पानी छिड़का गया था जिससे धुल की सोंधी गंध अभी भी उठ रही थी और बच्चे उछल कूद कर रहे थे.  कुल मिलाकर व्यवस्था टंच थी. ऐसे अवसर पर मुझ जैसे लगभग असामाजिक व्यक्ति की थोड़ी देर इधर उधर मुस्कुराने के बाद 'अब क्या करें' की अवस्था हो जाती है. पर ‘मितेनांत’ समूह के दो चार लोग थे तो माहौल इस स्तर पर नहीं जा पाया। इसी बीच किसी को कहते सुना कि जेनेरेटर किये तो थे पर आया नहीं और लाइन का क्या भरोसा? रहा तो रहियो जाएगा और गया तो कोई भरोसा नहीं ! सिलेन्डर में गैस तो है लेकिन ‘मेंटल’ नहीं है। किसी को भेज कर ‘मेंटल’ मंगा लेने की बात हुई। किसी ने अपनी मोटर साइकिल ऑफर की और एक लड़का लपक के तैयार हो गया। ‘मेंटल’ माने वही पंचलाईट में लगने वाली जाली जो जल कर गोल हो जाने के बाद दुधिया रौशनी करती थी. किरोसिन वाले पंचलैट की जगह अब एलपीजी से चलने वाले गैस पर मेंटल बाँधा जाता है. किरोसीन वाला पंचलाईट जलाना एक कला थी पिन, पम्प से हवा भरना और फूंक फूंक कर रौशनी लाना (पंचलाईट रेणुजी की प्रसिद्ध कहानी है आपने नहीं पढ़ी तो ‘पिलिच’ यहीं से क्लिक-टर्न लेकर पढ़ आइये! वही जिसमें गोधन मुनरी को देखकर सलम-सलम वाला सलीमा का गीत गाता था.)


हड़बड़ी में जा रहे उस लड़के को बीरेंदर ने बुलाया - 'अबे, इधर आ। किधर? इतना जोश में? सिंघासन खाली करो वाला पोज में?'

'अरे भईया. सब कामे अइसा कर देता है। रुकिए लेके आने दीजिये त बतियाते हैं लाइन कट गया त अंधेरा हो जाएगा। मेंटल लाने जा रहे हैं' - बाइक की चाबी हाथ में थी इसलिए ज्यादा उत्सुक था या सच में उसे चिंता थी ये समझना थोड़ा मुश्किल था। उम्र से १४-१५ साल, हाई-स्कूल का विद्यार्थी रहा होगा. पर बाइक चलाने की कोई उम्र-लायसेंस वगैरह तो होती नहीं. उसके नाटकीय भाव से ज़िम्मेदारी जरूर ऐसे टपक रही थी जैसे एक्सट्रा चीज – फ़ालतू। एक हाथ से कपार खुजाते और दुसरे में चाभी फंसाए... मुद्रा उसके उम्र से कहीं ज्यादा गंभीर थी। ( ‘एक्स्ट्रा चीज’ से एक और बात याद आई – बीरेंदर बोला था – ‘अरे महाराज पिज्जा के पागलपन का क्या कहियेगा. मोटा लिट्टा सेंक के उसके ऊपर पियाज छिड़क देता है – लिट्टा भी अधपका आ उसके ऊपर का पियाज भी. आ आदमी सब पांच सौ – हजार रुपया देके लूट लूट के खाता है?! आ जिसको अच्छा नहीं लगता है वो भी बोले कैसे? गंवार घोषित होने का रिक्स है तो सब यही बोलता है कि मजा आ गया! माने अब क्या कहियेगा रोटला के ऊपर रबड़ जैसा चीज और आधा भूंजा पियाज ! ऊपर से अच्छा नहीं लगे तब भी आदमी पैसा देकर भी अच्छा कहता है.’)

'मेंटल? मेंटल तो हमरे पास ही है एक ठो। केतना चाहिए?' बीरेंदर ने पूछा। 'आ स्टाइल थोड़ा कम कर। कुल वजन मात्र एक पौवा के हिसाब से ढेर भारी लग रहा है तोर सीरियसनेस'

'आप भी न भईया, दीजिये न है त... हमको कौन सा सौक है जाने का' लड़के ने झिझकते हुए कहा।

'एक मिनट रुक बुलाते हैं, इधरे त थी अभी।'

'का भैया आप भी ! ई मज़ाक का टाइम है?'

'अरे मेंटले न चाहिए था तुमको? दिलाते हैं।'

वो लड़का झिड़क कर निकल गया। ये 'मेंटल' तब समझ आया जब बीरेंदर ने अपनी दोस्त का परिचय कराया - 'भईया मिलिये हमारी दोस्त से - मेंटल !'

“जानते हैं भैया हुआ क्या? हम भगवान से मांगे थे मानसिक शांति। आ उ का हुआ कि अङ्ग्रेज़ी-हिन्दी का चक्कर में थोड़ा गरबरा गया। हमारा उच्चारन भी तो वही है तो भगवानजी हमको ‘मेंटल पीस’ का जगह एक ठो 'मेंटल पीस' दे दिये।"

 मेंटल बोली - 'मारेंगे न रे तुमको चोट्टा। हम केतनों त चोट्टा से ठीके है।'

'चलो ठीक है लेकिन ये ठेप्पी-ड्रेस काहे पहनी हो तुम?’ बीरेंदर ने मेंटल से पूछा. मेंटल का ड्रेस दोनों कंधो पर गोल कटा हुआ था.

‘ठेप्पी?’ मैंने और मेंटल दोनों ने एक साथ बीरेंदर को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.

‘अरे ठेप्पी माने... नहीं समझे? कहाँ से सब अंग्रेज हो गया है मेरा दोस्त सब भी. ठेप्पी माने - सैम्पल. कभी तरबूज खरीदे हैं कि नहीं? माने ऐसे घुर रहे है जैसे लैटिन-उयटिन का कोई शब्द बोल दिए हम. तरबूज बेचने वाला सब ठेप्पी मार के एक ठो छोटा सा पीस निकाल के दिखाता है. वैसा ही लग रहा है कि दरजी यहाँ काट के ठेप्पी निकाल दिया है. माने पूरे कटा हुआ होता तो बात अलग था. पूरा होता तब भी. ये बीच में ठेप्पी मारा हुआ ही तो है. ये आईडिया हम बता रहे हैं वहीँ से आया है दरजी को.’

‘तुमको फैशन का समझ तो है नहीं. तो तुम चुप्पे रहो. दरजी से कौन सिलवाता है कपडा आजकल’ मेंटल ने बुरा नहीं मानते हुए कहा.

‘अरे वही फैसन डिजाइनर भी दर्जिये तो हुआ. और अब हमको फैसन का समझ कहाँ से होगा... हमारे लिए तो फैसन ये था कि होली, दिवाली पर सारा भाई बैंड पार्टी लगते थे. एक्के थान में से काट के सबका शर्ट सिलाता था. हमको फैसन से वही याद आता है. और नया सिलाता भी था होलीये-दिवाली पर. एक्के दिन एक्के साथ सब भाई पहन एके शर्ट पहन लेते. क्या बताएं बाहर निकलने में भी सरम आता था’ बीरेंदर ने अपने बचपन के फैशन में शर्मिंदा होने की बात की और बात घुमा फिरा के पार्टी पर आ गयी.

मैंने कहा – ‘बहुत लोग आये हैं बड्डे के हिसाब से.’

‘हाँ तो आयेंगे ही. लड़के का जन्मदिन है. अन्तिमा नाम की बहन के बाद वाले भाई का’ बीरेंदर बोला और मेंटल थोड़ी गंभीर हुई.
‘मतलब?’
‘मतलब ये कि... शो स्टोपर.’
‘अब तो कौन ही फर्क कर्ता है लड़का-लड़की में’
‘लड़का-लड़की में फर्क नहीं करता है मत कहिये. डायलोग मारने में फर्क नहीं करता है कहिये. यहाँ सब डैलोगे मारते हैं कि हम अपनी बेटियों को बेटों की तरह ही रखे हैं लेकिन कभी बेटियों से बात कीजिये तो पता चलेगा. पर भईया उसीमें लड़ के, डूब के करने वाली जुझारू लडकियां हैं तो.. मेंटले को देखिये. हमेशा से तेज ! कोलम्बिया गयी थी अभी. हमको तो नक्सा में भी नहीं मालूम था कि कौन देस है !’

‘बस-बस और कुछ बोला न रे चोट्टा तो यही मारेंगे.’ मेंटल बोली.

‘देखिये भईया वो क्या है कि मेंटल दिमाग की तेज. भर-भर के इसको नंबर आता था. आ हमलोग का क्या है कि जेतना मेहनत कर सकते थे किये. जरुरत भर का आ जाता था.’

‘ये गलत बात है तुम खुद का मेहनत करते थे और उसके लिए दिमाग ही तेज था. अरे उसने भी मेहनत किया होगा. और नंबर से सब कुछ थोड़े होता है’

‘आप धर लिए हमको. नहीं... सही बात है.  पर नंबर से कुछ नहीं होता है ये हम कहेंगे तो सोभा नहीं देगा काहेकी हमको उतना नंबर कभी आया नहीं. मेंटल कह सकती है काहे कि उ लायी है तो वो कहे. मेहनत तो बहुत की ही. और आजकल जो एक नया फैसन चला है कि ‘स्क्रू योर मार्क्स’. माने सब खोज खोज के एक्जाम्पल देता है कि फलाने अनपढ़ थे आड्राप आउट थे और आज तीरंदाज हैं... अबे तो एक तीरंदाज हैं तो एक लाख ड्राप आउट पंचर भी तो साटता है? अरे तुमको नहीं पढना है कोई बात नहीं लेकिन पढाई को ही खराब नहीं कहना चहिये. और सब साला जेतना लफुआ सब है... उ जूस वाले मिसिर चाचा बताते हैं कि फेल होने के बाद उ सबेरे से ही दिन भर पता लगाने निकल जाते थे कि और कौन कौन फेल हुआ है. वही आजकल इन्टरनेट पर होने लगा है सब ड्राप आउट का फोटो ढूंढ के सब कोट लगाता है कि स्क्रू योर मार्क्स. अरे भाई जो मेहनत करके ला रहा है उसकी बेइज्जती तो मत करो. नंबर नहीं आया तो नंबरे को बुरा कह दो ? हम ये काम कम से कम नहीं करते हैं भईया. इ सब साला आतंकवादी जमात हो गया है आजकल नंबर नहीं आया तो पूरा दुनिए को दोष दे देगा खाली अपने को छोड़कर कि खुद पढाई नहीं किया. खैर... सही भी है आंकड़ा भी तो बनना चाहिए. ये नहीं गया अभी मेंटल लाने उ आंकड़े परसाद है. ५ प्रतिशत का सिलेक्शन होता है त ९०% आंकड़ा बनने के लिए भी तो कोई चाहिए न. आंकड़ा परसाद लोगों का भी महत्तव कम नहीं है'


'तुम्हे स्क्रू योर मार्क्स वाले से दिक्कत है कि मेंटल का बड़ाई कर रहे हो’ मैंने पूछा.

‘अरे भईया, आप भी न. हम तो स्क्रू शब्द का मतलब भी स्क्रू-पिलास-नट-बोल्ट ही समझते थे तो ये सब मन्त्र बोलते भी क्या! थप्पडिया और दिए जाते थे बात बिना बात. स्क्रू से याद आया एक बार सुने थे एक चाचा को बोलते हुए कि गुप्ताजी के लड़का अंग्रेजी मीडियम में पढता है उसके पास जो जेस्चर है ! क्या अंग्रेजी बोलता है गुड मार्निंग, गुड इवनिंग करता है.. हम सुने त अपने लंगोटिया यार सब का मंडली में अलगे दिन बोले कि बेट्टा कहीं से जुगाड़ लगाओ जेस्चर का. जब तक जेस्चर नहीं मिलेगा ऐसे ही थुराते रहेंगे हम लोग. हमको पता लगा है कि गुप्तवा के पास है जेस्चर. बहुत दिन तक फेरा में रहे कि कहीं से जेस्चर मिल जाए. किस दुकान में मिलता है पकड़ नहीं पाए ! हमको इतना त अंग्रेजी आता था. हम क्या स्क्रू, फक और शिट वाला मंतर पढ़ते. वैसे अच्छा था थप्पडियाए गए तभी त सीखे कि जो हर बात में दुसरे को ही गलत घोषित कर दे उ आदमी एक दम फर्जी उससे दुई लट्ठा का दूरी बना के चलना चाहिए !’

‘अरे चलिए शंख बज रहा है चलते हैं नहीं तो सब कहेगा कि खाली खाने आये थे. परसाद बटेंगा अब. केक उक भी कटाएगा लगता है. हमलोग का तो ऐसा था कि पूड़ी-खीर और सीजन में पड़ता है जन्म दिन त आम मिलता था बड्डे पर.’

‘केक के बिना बड्डे कैसे होता है?’ मेंटल ने पूछा.

‘देखिये अब यहीं मार खा गया न पटना. माने केक नहीं काटेंगे तो बड्डे क्या कहेगा कि हम नहीं होंगे?  कैसे होता है मतलब क्या ! हो जाता है बस. नहीं होता तो हम आज तक एक्के बरस के होते? माने गजब है अब कैसे समझायें कि कैसे हो जाएगा बड्डे बिना केक के’ बीरंदर ने कहा. ‘किसी वैज्ञानिक से पूछना पड़ेगा.’

‘बस बस हो गया’ मैंने बीच बचाव किया. प्लेट में परसाद मिला और साथ में छोटे से प्लास्टिक के कप में चरणामृत.

‘संतृप्त घोल बना दिया है’ बीरेंदर ने बोला.

‘अब इसमें कौन सा खुराफात सुझा तुमको? जब देखो बकर-बकर. चैन नहीं रहता है तुमको नहीं? जीभ में चक्कर है तुम्हारा हम बता रहे हैं’ मेंटल ने कहा.

‘अरे माने इतना न मीठा है. हमलोग हिंदी में केमेस्ट्री पढ़े थे त उसमें मिश्रण वाला अध्याय में एक ठो होता था कुछ संतृप्त घोल. माने पानी में इतना चीनी हो जाए कि उसके बाद और घुलने का जगह नहीं बचे. तो ये ‘चनैमृत’ वही वाला चीज है – संतृप्त घोल.’

 चरणामृत प्लास्टिक के कम में मिला था तो उसके लिए भी बीरेंदर बोल उठा – ‘इ बढ़िया हिसाब है हाथ नहीं धोना पड़ेगा. हम जो पूजा देखे हैं उसका तो पूरा बजटवे कप का खर्चा भर का होता है’

थोड़ी देर बाद हमने निर्णय लिया कि अब शकल तो दिखा ही दी है... अब वहां से निकल लिया जाय और बिस्कोमान भवन पहुँच के डोसा दबाया जाय.

जब चलने लगे तो बीरेंदर बोला – ऐ मेंटल, तुम्हारा ड्रेस तो ठेप्पी से प्रेरित था. वो देखो उ जो पहनी है उ बला ड्रेस बनाने के लिए मच्छरदानी से प्रेरित हुआ होगा फैसन डिजाइनर.’

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~Abhishek Ojha~

Apr 26, 2017

लिखावट


कुछ दिनों पहले एक मीटिंग में किसी को फाउंटेन पेन से लिखते देखा। हरे रंग की स्याही। घुमावदार लिखावट - कैलीग्राफी जैसी । मुझे ठीक ठीक याद नहीं इससे पहले मैंने ऐसी लिखावट कब देखा था। बहुत अच्छा सा लगा। कई पुरानी बातें याद आयी। सालों पुरानी। खूबसूरत बातें।

सेंट जेवियर्स कॉलेज राँची  - ग्यारहवीं कक्षा। केमिस्ट्री के एक प्रोफ़ेसर मोल कॉन्सेप्ट पढ़ाते थे। उनसे जुडी दो बातें याद हैं - उनकी बंधी हुई चुटिया और लिखावट। ब्लैक बोर्ड पर जब वो लिखते तो उनके हाथों में एक थिरक  होती. 'Avogadro' लिखते तो 'g' के दो गोले बिना चॉक उठाये लिखने के बाद उसके ऊपर की फुनगी बनाने के लिए वो चॉक उठाकर एक झटके से हाथ घुमाते. उनका चॉक ऐसे चलता किअक्षरों के वक्र मोटे-पतले-लचकते हुए ब्लैकबोर्ड पर सौंदर्य बना देते।

रसायन  उनसे कितना सीखा वो याद नहीं पर हम उनके बारे में दो बातें बोलते और दोनों में उनकी लिखावट का जिक्र आता - 'ये किसी जमाने में महारानी विक्टोरिया का शाही फरमान लिखते थे गलती से केमिस्ट्री पढाने लगे'. और दूसरी ये कि लिखते समय उनके हाथ और उनके चुटिया के हार्मोनिक मोशन की फ्रीक्वेंसी सामान होती है. किसी स्प्रिंग से जुड़े की तरह दोनों एक लय में घूमते.

मुझे नहीं याद मैंने उससे अच्छी अंग्रेजी की लिखावट कभी देखा हो वो भी ब्लैक बोर्ड पर  - लाइव ! उनका लिखा हुआ मिटते देख ऐसे लगता जैसे किसी ने खूबसूरत रेत मंडल बनाकर मिटा दिया हो (यहाँ रूककर रेत मंडल के बारे में पढ़ लीजिये। कभी मौका मिले तो उसका बनना बिगड़ना जरूर देखिये और महसूस कीजिये - संसार चक्र।) हमें ऐसी लिखावट अच्छी तो बहुत लगती पर ये उम्र हमने अंको, समीकरणों और ढलान पर गेंद लुढ़कने की गति को समझने जैसी बातों में गुजार दी। ये शब्दों से साथ छूटने की उम्र थी. लिखावट की जगह घसीट कर कम से कम लिखने और ज्यादा से ज्यादा समझने के दिन थे. कागज पर अक्षर की जगह तीर, गोलाई और रेखा चित्रों की खिंचाई होती। कर्व अक्षरों की जगह इक्वेशनों के बनने लगे. हिंदी और अंग्रेजी की कक्षायें सिर्फ जरुरत की हाजिरी भर के लिए गए. ...हमारी लिखावट बुरी नहीं तो कैलीग्राफी जैसी भी नहीं हो पायी.

कलम से याद आया। हमारी पीढ़ी ने घोर परिवर्तन देखा है। पीढ़ी का पता नहीं पर मैंने देखा है। गाँव के स्कूल में जहाँ मैंने पढ़ना-लिखना सीखा। गुरुकुल के जमाने और उसमें कुछ ख़ास अंतर नहीं आ पाया था। लकड़ी की पटरी (तख्ती) और खड़िया  पर मैंने लिखना सीखा - स्लेट और चॉक-पेन्सिल नहीं ढेले सी खड़िया और पटरी। पटरी को शीशे की दवात की पेंदी से घिस कर चमकाना फिर खड़िया का घोल कर धागे से लाइनें बना कर उस पर सरकंडे की कलम से लिखा है मैंने। (घर पर पड़े किसी जमाने के मिट्टी  के दवात भी देखे हैं लेकिन वो कभी इस्तेमाल नहीं किया) लिख लेने के बाद मिटा कर फिर से लिखने को तैयार हो  जाती पटरी। रेत मंडल  की तरह - नो अटैचमेंट्स। लिखने के बाद वाह वाही मिली और बात वहीँ ख़त्म - मिटा कर आगे बढ़ो. सहेज कर रखने का हिसाब नहीं था. इन्वायरमेंट फ्रेंडली ! एक पटरी पीढ़ियों चलती। पटरी और दवात का भी योगदान कम नहीं होता पढ़ाई में -  'फलाने की पटरी है मत लिखो इस पर. दिमाग के भोथर थे पाँचवी पास भी नहीं कर पाए. अपना लिखा खुदे नहीं पढ़ पाते हैं'.

पटरी पर लाइन बनाने के लिए एक धागे को खड़िया के घोल में डूबा कर पटरी के दोनों छोरों पर रख खींच कर छोड़ा जाता. छींटे से लाइन बनती। यज्ञ वेदी पर लाइन बन रही हो जैसे. ज्यादा घोल हो तो लाइन मोटी और भद्दी हो जाती. कम हो जाती तो लाइन दिखती ही नहीं. कम-ज्यादा के संतुलन का अनुमान वहीँ से लगने लगता. लिखने के बाद बचे हिस्से में डिजाइन भी बना देते। शब्द लिखने के लिए सीधी लाइने और गिनती लिखने के लिए ग्रिड. पटरी नहीं कैनवस !

पटरी चमकाना एक झंझट होता। हरे पत्ते लगाकर घिसना। उसी में तेज लड़के पुरानी बैटरी से निकले कालिख को कपडे में लपेट कर पटरी को काला करने का जुगाड़ बनाते. और स्कूल में खड़िया और छोटी मोटी खेलने की चीजों के बदले पटरी काली कर देते. उसी उम्र से व्यापर-धंधे की समझ होती कुछ बच्चों में।

स्याही से परिचय हुआ पुड़िआ घोल कर स्याही बनाने से. हर कपडे की जेब में स्याही लगती। स्कूल ले जाने वाले थैले में भी स्याही लगती। कलम सरकंडे से बनती, तेज धार वाले चाकू से छील कर कैलीग्राफी के निब जैसी। निब  काटना कला था अच्छा नहीं कटा तो बेकार - भोथर. कलम को दवात में डूबा-डूबा कर लिखा जाता । ज्यादा स्याही आ गयी तो फिर भोथर अक्षर. हमने ऐसे लिखना सीखा। - ऑर्गेनिक तरीके से. खड़िया, पटरी, स्लेट, पेन्सिल (स्लेट पर लिखने वाली). फिर रुलदार और चार लाइन वाली कॉपी. लिखने और छपाई के मिलाकर चार तरीके से अंग्रेजी के अक्षर लिखने सीखा था हमने. फाउंटेन पेन  बहुत बाद में हाथ लगी। इन दिनों फाउंटेन पेन के साथ होल्डर और निब से भी कुछ दिन लिखा.  निब भी हिंदी के लिए अलग, अंग्रेजी के लिए अलग. कक्षा छः में ताँबे के जी मार्का पिन को होल्डर में लगाना और लिखना सीखना शुरू ही किया था कि एक झटके से दूसरी दुनिया में ट्रांसपोर्ट हो गया. - टाट से बेंच. हरे रंग के शीशे के बोर्ड ! पढ़ाने वाले सर और हम एक पीढ़ी फाँदकर बॉल पॉइंट पेन पर आ गए. जैसे बचपन में तेज होने पर मास्टर साहब क्लास फँदा देते थे।

फाउंटेन पेन से लिखना शुरू होते ही बंद हो गया. शौक होकर रह गया. उन दिनों फाउंटेन पेन आते जिनमें रबर की ट्यूब होती जिसे पिचकारी की तरह दबा कर दवात में निब डुबोकर स्याही भरी जाती. सालों बाद मुझे किसी ने इतनी महँगी पेन दी जितने में पूरे मोहल्ले की दो चार साल की स्टेशनरी आ गयी होती। वो मैंने वैसे ही सहेज कर रखा है. फिर किसी ने पंख लगा हुआ होल्डर और खूबसूरत दवात भी दिया. इतना खूबसूरत की मुझे खोलने की हिम्मत नहीं हुई. सजा कर रखा हुआ है वैसे ही एक खूबसूरत डायरी के साथ - अटैचमेंट !

मेरी पीढ़ी ही नहीं मुझसे पहले की पीढ़ी के भी कई लोगों ने संभवतः ऐसे नहीं पढ़ा होगा. कई चीजें थी जो अब लुप्त हो गयी. स्याही की पुड़िया, सोखता कागज, स्याही से रंगे कपडे-चेहरे-थैले (फाउंटेन पेन की स्याही को सर में पोंछते रहते और हाथ जब जुल्फों से होते हुए चेहरे पर भी चल जाता...  तो चेहरा रंगीन हो जाता !), गर्म पानी से फाउंटेन पेन की सफाई. अब तो स्याही न्यूज में सिर्फ तभी आती है जब किसी के चेहरे पर पोती जाती है !

कई ऐसे अद्भुत 'बेकार' काम हैं जिसके लिए लोग कई बार पूछ लेते हैं ये कहाँ से सीखा - गांठे बनाना। जूट से रस्सी बनाना। कैसे बताया जाय कहाँ से कहाँ और कब क्या सीखा.


लिखावट एक प्राचीन और मरती हुई कला है.  ये वो कला है जिसके आर्टिस्ट और आप में सिर्फ इतना फर्क होता है कि वो आर्ट बना देते हैं और आप देख कर सोचते तो हैं कि ये तो मैं भी बना सकता हूँ पर आप कभी बनाते नहीं।

आपको लिखना आता है तो लिखिए. कभी कभार ही सही. कोशिश कीजिये आप निराश नहीं होंगे. मैंने अपने फाउंटेन पेन में स्याही कार्टरेज भरा. 'कैंट टॉक व्हाट्सऐप ओनली' के जमाने में लिखना क्या बोलना भी हमारे ही जीवनकाल में खत्म हो जाये  तो अतिश्योक्ति नहीं होगी ! जैसे चिट्ठियां ख़त्म हो गयी... चिट्ठियों से याद आया. कुछ लोगों की लिखावट गोल-मोती जैसी इतनी अच्छी होती जैसे लिखा नहीं पेंटिंग की हो. - लिखते नहीं छाप देते थे लोग! वैसे अक्षरों का फॉण्ट बनाना चाहिये. ये फॉण्ट हम जिसमें टाइप कर रहे हैं ये भी कोई फॉण्ट है !

...लेकिन हम भी देखिये टाइप करके कह रहे हैं कि - लिखना चाहिए :)

~Abhishek Ojha~