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Jun 19, 2021

मौसम नहीं, मन चाहिए!

[ट्विट्टर पर एक वायरल फोटो देख “where I need to study” मन में एक प्रश्न उठा कि ये सब भी लगता है पढ़ाई में? हमें तो लगता था पढ़ाई के लिए किताब चाहिए और मन चाहिए। पर मजा भी आया क्योंकि कई बातें याद आ गयी…]


बात उन दिनों की है जब ...हमारे अपार्टमेंट में इतने लोग आते-जाते रहते कि मेरे एक दोस्त कहते – “बाबा, इसे अब धर्मशाला घोषित कर दो”। 

किसी को न्यूयॉर्क घूमने आना होता तो, कोई अपने ऑफ़िस के काम से आता तो, कुछ कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को बिज़नेस ट्रिप पर रहने के घर/होटल की जगह पैसे ही दे देती कुछ वैसे लोग भी रह कर जाते। हम गाइड बन कर शहर भी घुमा देते। ये शिकायत की बात नहीं है। हमें बड़ा अच्छा लगता। मजे-मजे के दिन थे। 

वीकेंड पर तो अक्सर पाँच-छः लोग हो जाते। कोई आए ना आए एक मित्र जो उन दिनों एमबीए कर रहे थे वो हर वीकेंड ज़रूर आते। हम लोग शहर घूमते, खेलते, सिनेमा देखते। वो ईमानदारी से कहते - देखो यार मैं स्टूडेंट हूँ। तीन-चार और लड़कों के साथ एक बेसमेंट में रहता हूँ। यहाँ तुम लोग के साथ वीकेंड अच्छा बीत जाता है। वो उनके संघर्ष वाले दिन थे। अब तो कहाँ से कहाँ पहुँच गए। मैंने उन दिनों ये भी सीखा कि किसी को ये नहीं कहना चाहिए कि तुमने संघर्ष देखा ही क्या है। क्योंकि "भूखे पेट ही सो जाते हैं" ही नहीं “अक्सर पिज़्ज़ा खाकर ही सो जाते हैं” भी ग़रीबी होती है। भले साल का चालीस-पचास लाख (उन दिनों) का पढ़ाई में खर्चा हो फिर भी व्यक्ति अभाव में रह सकता है। महसूस तो कर ही सकता है। Poverty is just a state of mind जैसी कालजयी बात पहले ही कोई महान व्यक्ति कह गया है नहीं तो अभी इसी बात पर लिख देते। ख़ैर… 

उन दिनों हम लोग कभी-कभार खाना भी बना लेते। अक्सर बाहर खाते। अतिथियों में से कुछ खाना बनाने के विशेषज्ञ भी थे तो धीरे-धीरे रेड्डी की चटनी, शर्मा की कढ़ी जैसे व्यंजन आविष्कृत हो चुके थे। इससे हुआ ये कि कुछ-कुछ बर्तन और खाना बनाने के अन्य समान जमा होते गए। तो धीरे-धीरे हम भी बनाने लग गए। हमारे एमबीए कर रहे मित्र भी कभी कभार बनाते। हम मज़ाक़ में कहते - "भाई, तू पैसे बचाने के चक्कर में कुछ भी मत खिला दिया कर।" उनका राजमा हमने जगत प्रसिद्ध कर दिया था। जिसके बारे में कहा जाता कि उबला तो पूरा नहीं था ...पर पेट में जाकर जठराग्नि से भी तो कुछ पकना चाहिए। दो दिन तक उबलता रहा था पेट के अंदर। 

एक रविवार के दिन उन्होंने घोषणा की – “आज मैं दाल-चावल बनाऊँगा।” 

इससे बड़ी ख़ुशी की बात क्या होती! पर किचन में जिस गति से गए थे उससे भी तेज गति से लौट आए। 

हमने पूछा – “क्या हुआ? मुआयना कर आए अब राहत पैकेज घोषित करोगे क्या?” 

“टमाटर नहीं है।” गम्भीरता से बोले। 
“तो?” 
“तो क्या? टमाटर नहीं है तो दाल कैसे बनेगी?”
“क्यों? दाल ने मना कर दिया क्या बनने से?”
“अबे कैसी बात कर रहे हो? टमाटर नहीं है तो दाल बनेगी कैसे?”
“वही तो पूछ रहा हूँ? क्यों नहीं बनेगी?” 
“अबे दाल बनती नहीं है बिना टमाटर के।” 
“यार तुम बनाओ, दाल मना करेगी तो देख लेंगे। अगर दाल कह दे कि बिना टमाटर मैं नहीं बन रही। कर लो जो करना है! तो मुझे बताना, उसे मनाएँगे! केमिकलि इमपोसिबल तो है नहीं टमाटर के बिना दाल गलना?” 

हमारे बाकी दोस्त हँस रहे थे। हमने उन्हें उनकी भाषा में कहा – “जैसे तुम्हें आता है वैसे ही बनाओ। टमाटर डालने वाला स्टेप स्किप कर देना।” 

कुढ़ कर उन्होंने दाल बनायी। खाते समय बोले – “यार अच्छी बन गयी है। मुझे नहीं पता था बिना टमाटर के भी दाल बनती है।” 

ये झूठ बात नहीं है। ये बात पहले भी हमने बहुत लोगों को सुनाई है। 

वैसे ही एक हमारे बड़े अच्छे मित्र। एक दिन उन्हें फ़िटनेस का भूत सवार हुआ। पहले खूब रिसर्च किए (माने पीएचडी में एडमिशन नहीं ले लिए, रात भर बैठ कर यूटूब देखे)। उनका काम ऐसा था कि पूरे आमेरिका की यात्रा होती रहती, तो पहले तो इस बात पर रिसर्च किए कि जिम ऐसा होना चाहिए जिससे यात्रा करें तो भी समस्या नहीं आए। अब जिम लेकर यात्रा तो कर नहीं सकते! लेकिन ऐसे ही सोचने वालों की समस्याओं का हल करने से अमेरिकी (पूरी नहीं तो आधी तो पक्का) अर्थव्यवस्था चलती है। उन्होंने एक जिम ढूँढ निकाला जो पैसे ले लेता है इस बात की गारंटी के साथ कि अमेरिका में लगभग हर जगह उनकी शाखाएँ हैं। जिम वाले को हम से बेहतर पता है कि कितने दिन आएँगे ऐसे लोग! (जिम वालों को तो ऐसा करना चाहिए कि दिसम्बर-जनवरी में डिस्काउंट देकर न्यू ईयर रिज़ोल्यूशन वालों को मेंबरशिप बेच देनी चाहिए। उसके बाद बाकी साल के लिए उसी जगह में बीयर बार खोल देना चाहिए।) 


फ़िलहाल वो पहला काम ये किए कि साल भर का प्रीमियम मेंबरशिप ले लिए। जैसे कलाकार के लिए सरस्वती वंदना होती है, इनके ऐसे काम भुगतान से ही शुरू होते। उसके बाद गए अपने पैर का टेस्ट कराने ...कि दौड़ने के लिए उनके पैर की संरचना के हिसाब से अच्छा जूता कौन सा होगा। (धावक लोग इस बात को बड़ी गंभीरता से लेते हैं कि पैर के आकार के हिसाब से सही जूता होना अत्यंत आवश्यक है।) फिर धावक वाला ड्रेस ख़रीदे। गैजेट। गैजेट बांधने के लिए पट्टी। दौड़ते हुए गाना सुनने के लिए नया हेड फोन। चूसनी लगी पानी की नयी बोतल। दर्द होने पर मालिश के लिए बिजली से चलने वाली थुरनी (पता नहीं क्या कहते हैं उसे!)। सब ज़रूरी ही था। सामान बढ़ता गया। सब कुछ हमारे पते पर ही आता था। एक दिन सब खोले। सजा कर रखे। योजना बताए। हम हँसे तो पूछे कि क्या हुआ। मैंने कहा कुछ नहीं। मुझे लगा वो समझेंगे नहीं। 


मन तो हुआ था कि कहूँ - "कहानी पढ़े हो फ़ेडिप्पिडिस की? नंगे पैर ही दौड़ गया था। और आजतक उसके नाम पर मैराथन होता है।" (इस बिम्ब को गम्भीरता से ना लिया जाय क्योंकि हम देखने तो नहीं गए थे... लेकिन उस जमाने के ग्रीक लोग हर पेंटिंग और ३०० सिनेमा इत्यादि में लगभग नंगे और ख़ाली पैर ही तो दिखते हैं।) 

मेरे दिमाग़ में चल रहा था कि हमारे गाँव की कोई दादी के उमर की औरत होती तो वार्तालाप कैसा होता! स्वाभाविक प्रश्न होता कि दौड़ने के लिए इन सब की क्या ज़रूरत? (दउरे के बा त ई कुल्ही का होयी रे?) 

पर शायद वो सोच रहे हों कि - इन सबके बिना दौड़ूँगा कैसे? लोग भूल ही गए हैं कि दौड़ना पैर से होता है। किसी को दौड़ना हो तो समान की सूची देखता है। अपने पैर की ओर नहीं देखता। इच्छा शक्ति तो दूर की बात है।

मैंने सोचा कहूँ– “यार पैर मना कर देते क्या? थोड़े कम सामान भी होते तो दौड़ लेते। जैसा दाल बिना टमाटर के बनने से मना नहीं कर देती वैसे ही।” 

कहना नहीं होगा वो दो दिन से अधिक नहीं दौड़े। 

इसी प्रकार से फ़ोटोग्राफ़ी का शौक़ चढ़ा तो कैमरा ख़रीदे। किताब ले आए। फ़ोटोग्राफ़ी की पत्रिका और फ़ोटोशॉप का सब्सक्रीप्शन लिए। ऑनलाइन कोर्स। खुद कहते कि कॉलेज के बाद कभी कोई किताब नहीं पढ़े फिर भी अब ज़रूरी हो गया था – ध्यान रहे पढ़ना नहीं ख़रीदना। ट्राइपॉड, उसे लेवल करने के लिए उपकरण। फ़िल्टर (इन्स्टग्रैम वाला नहीं असली वाला)। अलग-अलग तरह के लेंस। 

न्यू यॉर्क में फोटो-विडीओ-टेलीस्कोप इत्यादि की एक बड़ी प्यारी दुकान है, वहाँ मैं अक्सर जाता – देखने कि क्या-क्या उपकरण होते हैं। वो गए तो उन्हें लगा पूरी दुकान ही ख़रीद लेनी चाहिए। मैंने ही उन्हें पहले सस्ते कैमरे से शुरू करने को कहा था कि पहले सीख तो लो। पर कुछ ही दिनों में उन्हें लग गया कि बिना महँगा कैमरा ख़रीदे पैशन नहीं जगेगा। पहला कैमरा औने-पौने दाम में बेचकर दुनिया का लगभग सबसे महँगा कैमरा ले आए। झूठ नहीं बोलूँगा, दौड़े तो दो-चार दिन भी नहीं थे पर दर्जन भर फोटो खींचे थे। ज़्यादातर न्यू यॉर्क ऑटो शो में कार के टायरों के। मैंने कहा - "भाई गाड़ी की भी खींच ले। इतनी अच्छी गाड़ियाँ हैं। केवल टायर की ही खींचोगे? हमारी भी खींच दो।"

तो बोले- “नहीं बे आर्टिस्टिक एंगल से खींचना होता है। कोर्स में बताया था, पहली क्लास में।” 

मुझे पता था आगे की क्लास वो किए भी नहीं होंगे। इस झाम ने लम्बे समय तक उनका पीछा नहीं छोड़ा। भारत गए तो इतना महँगा कैमरा देख कस्टम वाले ने लपेट लिया। पैंतीस हज़ार बिना रसीद “कैश” लेकर जाने दिया! पैशन ऐसा कि इन सबके बाद भी भी ससुर सोया ही रहा। 

उन्हें ऐसे दौरे पड़ते रहे। कुछ लोग हमें भी दोष दिए कि तुम्हारी संगति में लूटा जा रहा है लड़का। तुम्हीं ले जाते हो ऐसी जगहों पर। इसी प्रकार कुछ दिनों हम गोल्फ़ खेलने गए। हम वहीं किराए पर उपकरण वग़ैरह लेते, खेलने जैसा कुछ हरकत करते और उपकरण लौटा कर आ जाते। हमारे साथ वो भी चले गए एक दिन। बस फिर क्या था उन्हें लगा असली चीज तो ये है! उनका पैशन कुलाँचे भरने लगा। घर आते-आते पूरा गोल्फ़ किट ऑर्डर कर दिए। रेटिंग देखकर कि सबसे अच्छा लोग यही बता रहे हैं तो यही अच्छा होगा! और अब तो अक्सर खेलने जाना ही होगा तो किराए पर क्यों उपकरण लेना? 

कालांतर में वो किट भी उसी गति को प्राप्त हुआ जिस गति को पहले की चीजें हुई थी - धूल खाने की गति। 
उन दिनों
उन दिनों

ऐसे लोग मिलते रहते हैं। और तो और डायटिंग करनी है तो लोग खाना ऑर्डर करने बैठ जाते हैं! हेल्दी खाना - सैलड, सुगर फ़्री, किनुआ, चिया, हेम्प, ग्रीन टी। अरे डायटिंग करनी है तो होना तो ये चाहिए कि किनुआ-बेचुआ खाने के पहले भकोसना बंद करो। कम खाओ, उपवास कर लो। उसके लिए और अधिक खाना ख़रीदने की क्या ज़रूरत? विरोधाभास नहीं हो गया? चलना है तो पहले चलो फिर ख़रीद लेना फ़िटनेस वॉच भी किसी दिन। ऐसा थोड़े है कि बिना फ़िटनेस वॉच पहने एक दिन चल लोगे तो घाटा हो जाएगा! पर हैं लोग जो एक दिन ऐसी घड़ी नहीं पहनें तो सच में उन्हें दुःख हो जाता है!

“क्या हुआ?” 
“अबे यार। मत पूछो। आज बेकार में ही चल लिए, फ़िटनेस वॉच घर पर ही रह गयी। अब क्या ही फ़ायदा आज चलने का।” 

बात आप समझ ही गए होंगे। वैसे ये सब लिख-पढ़ कर कुछ बदलना तो है नहीं पर रमानाथ अवस्थी की कविता की एक सुंदर पंक्ति है - 

"कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए!"

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~Abhishek Ojha~

Dec 31, 2020

छपना ‘लेबंटी चाह’ का

मेरे ब्लॉग की सबसे चर्चित पोस्टें हैं - पटना वाली। लोकप्रिय भी*। इन्हीं में से एक पोस्ट लेबंटी चाह भी है। लेमन-टी से बना लेबंटी और चाय से बना चाह। इसी नाम से अब उपन्यास छप कर आ रहा है। 

    पटना डायरी से उपन्यास बनने तक की प्रक्रिया ‘इवोल्यूशनरी’ रही – क्रमिक विकास। ब्लॉग पर लिखना शुरू किया था तो हर तरह के पोस्ट लिखा, पर पटना डायरी के मामले में पोस्ट दर पोस्ट ‘सरवाइवल ओफ़ फिटेस्ट’ की तरह लिखने की एक शैली बनती गयी। इस दौरान निरंतर अच्छी प्रतिक्रियाएँ भी आती रही। ब्लॉग पर आयी टिप्पणियों के परे भी। ईमेल, फ़ोन इत्यादि से भी कई लोगों ने सम्पर्क किया। ऐसे लोग भी जो ना तो ब्लॉग लिखते-पढ़ते हैं ना सोशल मीडिया पर ही हैं। किसी अख़बार में कहीं कुछ छप गए से ढूँढते पहुँच गए तो किसी के बताए पढ़ लिए। 

    ब्लॉगिंग के अन्य कई मित्रों की तरह मैं भी कभी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा। इससे एक अच्छी बात ये हुई कि किसी विधा की परवाह किए बिना मुक्त रूप से लिखा। लिखने की शैली (यदि कोई होती है तो) अपनी खुद की ही रही/बनी। 

    मेरे ब्लॉग से परिचित लोग बातचीत होने पर पटना डायरी का ज़िक्र करना नहीं भूलते। पहली पोस्ट से ही। मुझे याद है ढाई महीने के पटना प्रवास के दिनों में गिरिजेश राव फ़ोन कर पूछते कि अगली पोस्ट कब आ रही है? पटना के लोग भी बड़ी आत्मीयता से टिप्पणी करते। धीरे-धीरे प्रतिक्रियाओं और सुझावों में एक बात नियमित रूप लेती गयी कि इसे छपना चाहिए। पुरानी पोस्टें अभी भी लोग पढ़ते रहते हैं, याद दिलाते रहते हैं। कहने वालों ने ये भी कहा कि वो पोस्ट का प्रिंट आउट निकाल कर पढ़ते-पढ़ाते हैं। कितना सच है वो नहीं पता पर जिन लोगों ने कहा वो झूठ बोलने वाले लोग नहीं हैं। शिव कुमार मिश्र, ज्ञानदत्त पांडेय, पूजा उपाध्याय, रवि रतलामी, अनुराग शर्मा, गिरिजेश राव, अनूप शुक्ल, रंजना सिंह… दर्जनों श्रद्धेय एवं भले लोगों की कुछेक टिप्पणियाँ/बातें तो याद रह गयी। सागर ने उन दिनों बड़ी प्रेरित करने वाली टिप्पणियाँ की थी। 

    एक बार देव झा मिले तो बोले - “वाह! पटना सीरीज क कितबिया कब बन रही है!” मुझे लगा कि ये तो पहले भी सुनी हुई बात लग रही है। तो उन्होंने बताया कि अरे ज्ञानदत्तजी ने टिप्पणी की थी आपके पोस्ट पर वही याद दिला रहा हूँ। लिख दीजिए।

    पूजा उपाध्याय तो नियमित रूप से पहले कहती रही कि लिखो फिर पूछती रही कि कितना लिखा? मैंने एक बार कह दिया था कि सरस्वती पूजा तक लिख दूँगा। साल बताया नहीं था तो उसके बाद कितने भी साल निकल गए हो वादा टूटा हुआ नहीं कहेंगे। रविजी ने भी एक से अधिक बार कहा कि इसे संकलित कर भेजिए किसी को छापने के लिए। मैंने शंका दिखायी की छापेगा कौन तो लोगों ने ये भी कहा कि तुम लिख दो हम छपवा देंगे। 

पर बात आयी-गयी होती रही। 

    अनूप जी पिछले साल न्यूयॉर्क आए तो मिले। उन्होंने फ़ोन पर किसी को परिचय दिया - “अभिषेक ओझा के साथ हूँ, वही जो फ़ंक्शन फाड़ देते हैं। जो पटना लिखते थे।” फिर उन्होंने कहा - “बड़ा मज़ेदार लिखते थे तुम, छपवाओ उसे।” मैंने कहा समय का बहुत अभाव है। कभी छुट्टी लेकर लिखूँगा। तो उन्होंने कहा कि ऐसे नहीं होता। छुट्टी लेकर तो नहीं हो पाएगा लिखना। उसी में लिख दो। पर समय का अभाव ऐसा था कि दिनचर्या में ऐसा कोई काम ही नहीं था जिसमें कटौती कर समय निकाला जाय। ऐसा भी कोई काम नहीं था जिससे ज़्यादा ज़रूरी काम किताब लिखना लगे। 

    इसका एक कारण ये भी था कि सुनता हूँ लिखने वाले पढ़ने वाले से अधिक हो गए हैं। और बहुत कुछ अपठनीय भी लिखा गया है। सुनी सुनाई इसलिए बात कह रहा हूँ क्योंकि मैंने हिंदी के नए लेखकों का कुछ पढ़ा नहीं - ना अच्छा ना बुरा। मैं महीने में औसतन डेढ़ से दो किताबें पढ़ता हूँ। लेकिन हिंदी में ब्लॉग के अतिरिक्त पिछले २०-२५ वर्षों में छपी किताबें मैंने लगभग नहीं पढ़ी। ब्लॉगिंग के दोस्त-मित्रों की दो-चार किताबों को छोड़ दें तो। अपठनीय के विपरीत हिंदी में मैंने जो पढ़ा वो इतना अच्छा पढ़ा है कि पढ़ते हुए हमेशा लगा कि इतना अच्छा नहीं लिख सकते तो लिखने का कोई मतलब नहीं। और इसलिए भी हम छपने के लिए नहीं लिखते रहे। बचपन में लेखकों के बारे में जानना बड़ा अच्छा लगता। अख़बार में छपने वालों से लेकर पाठ्यक्रम की पुस्तकों के लखकों तक। हर पुस्तक की भूमिका और लेखक के बारे में भी ज़रूर पढ़ता कि ये कौन लोग होते हैं जो किताबें लिखते हैं। अक्सर बड़ा ख़तरनाक टाइप का परिचय भी होता लेखकों का -“कट्टा थे, तमंचा थे, सम्प्रति तोप हैं”। सम्प्रति शब्द का मतलब ही लेखक परिचयों से पता चला था। पर छपने वालों के प्रति जो बचपन से सम्मान था वो भी धीरे-धीरे कम होता गया। बहुत दिनों से मैंने अपना एक ट्वीट पिन किया हुआ है - “पढ़े लिखे, अखबार में छपने वाले, किताब लिखने वाले, टीवी पर दिखने वाले... बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट वगैरह वगैरह बचपन में सही में लगता था तोपची लोग होते होंगे ! धन्य हो ट्वीटर की बारिश सारे रंगे सियार हुआँ-हुआँ करते दिखने लगे !” 

    एक बात ये भी थी कि किताब से अधिक ब्लॉग की अहमियत लगती। ये वो जान सकता है जिसने उस समय से ब्लॉग लिखना शुरू किया हो जब सोशल मीडिया ऐसा नहीं था। पढ़ना इतना त्वरित नहीं था। हिंदी के ब्लॉग लोग बड़ी आत्मीयता से पढ़ते और टिप्पणी करते। (स्माइली के साथ नाइस और अप्रतिम लेखन के लिए साधुवाद जैसी टिप्पणियाँ भी थी!)। अपने तरह के लोग मिले। बड़ी अच्छी दोस्तियाँ हुई। वैसे लोग किसी और तरीक़े से कहाँ ही मिले होते! गर्व सा होता है कि हम ऐसे लोगों को जानते हैं। कुछ लिखने के बाद यदि उसकी कुछ जमा पूँजी है तो तो वो है उस पर आने वाली प्रतिक्रियाएँ। ये जानना कि लोगों को वो अच्छा लगा। ये जानना कि पढ़ते हुए लोगों को लगा कि वो साथ चल रहे हैं। उनकी अपनी बात लिख दी हो जैसे किसी ने या कोई और भी ऐसे सोचता है। पढ़ कर किसी को किसी उलझन का हल मिल जाए। पात्रों के संवाद में अपनी बात झलक जाए। और ये सब पटना डायरी से भरपूर मिला। कई लोग हैं जिनसे बात कर मुझे आश्चर्य हुआ कि लोगों ने इतने अच्छे से पढ़ा है जितने अच्छे से मैंने लिखा नहीं! 

    पर स्वाभाविक है मुझे पटना डायरी पर आने वाली प्रतिक्रियाएँ हमेशा अच्छी लगी तो लिखना टलता तो रहा पर ये भी था कि कभी तो लिखना होगा ही। और ये भी स्पष्ट हो गया था कि पहली किताब होगी तो पटना डायरी की शैली में ही। और अभी भी लोगों को लगता है कि किताब का अपना ही जलवा है। इंटरनेट-ब्लॉग अपनी जगह है। तो लोग कहते रहे कि किताब छपवाओ।

    चार साल पहले एक सम्पादक से मिलना भी हुआ पर उसके बाद भी आलस में बात वहीं की वहीं रह गयी। संपदाकजी की सुझाई एक बात याद रह गयी उन्होंने कहा था कि तुमने लिखा बहुत अच्छा है पर ब्लॉग तो लोगों ने पढ़ लिया है। ऐसा ही उपन्यास के रूप में लिखो, डायरी के रूप में नहीं। विचार अच्छा था पर समय के अभाव और आलस में गुम सा हो गया। 

     ऐसे कामों के लिए मुझ जैसे व्यक्ति को धक्का (nudge) चाहिए होता है। एक बार नहीं निरंतर। इसका एक उदाहरण तो यही है कि जिन समाचार पत्रों ने लिखने के पैसे भी दिए, जिन्हें पढ़ते भी बहुत लोग हैं पर कह कर भूल गए कि हर सप्ताह लिख कर भेज दीजिए वहाँ दो-चार लेखों से आगे नहीं लिख पाया। पर जिन्होंने निरंतर कहा कि अगला आलेख भेजिए। "इस बार अभी तक नहीं भेजा" कह याद दिलाते रहे वहाँ लिखता रहा। कोई करवा ले तो हो जाता है। वो धक्का (nudge) मिलता भी रहा (भगवान ऐसे दोस्त सबको दें!) तो बस पिछले साल (२०२० नहीं १९ में ही) लिख दी गयी, अनूप जी के जाने के कुछ दिनों बाद। लिखना कठिन नहीं था क्योंकि बहुत दिनों से एक कहानी मन में चलने लगी थी। किरदार बन गए थे। तो किताब पूरी हो गयी। प्रकाशक को भेजते ही उम्मीद से जल्दी उसी रूप में स्वीकार भी हो गयी। पर किताब का कवर, डिज़ाइन, सम्पादन और इन सबके साथ कोरोना। लिखी लिखाई किताब का काम धीमी गति का समाचार हो गया। हमें लगा था किताब लिखना ही सबसे धीमा काम होता है पर छपना उससे कम धीमा नहीं निकला। ख़ैर हम अपना काम कर दिए थे और जब काम किसी और के पास अटका हो तो मज़ा ही होता है। दफ़्तरों में जैसे ही लोगों को पता चलता है कि किसी और टीम के पास काम अटका है तो वो एक दम से चौड़े हो जाते हैं! - हम कर ही क्या सकते हैं फलाने टीम के पास जाइए! डीपेड़ेंसी है उनके काम पर। तो हम भी लिखने के बाद मज़े में हो गए। 

पर अब किताब आ जाएगी। जनवरी अंत तक निर्धारित है। तो एकाध सप्ताह इधर तो नहीं पर शायद उधर हो जाए।

        जब आ जाए तो पढ़ा जाए। पढ़ाया जाय। और अच्छी लगे तो लोगों को बाताया जाय। गिफ़्टित किया जाय। कोई कहे कि बहुत दिनों से हिंदी में कुछ अच्छा नहीं पढ़ा हो तो जवाब के रूप में भी बताया जाय। और हमें ज़रूर बताया जाय कि कैसी लगी। छपने के पहले सम्पादक मंडली के अतिरिक्त पाँच लोगों ने किताब का ड्राफ़्ट पढ़ा। उन्होंने तो कुछ ज़्यादा ही अच्छा-अच्छा कह दिया। पर उस पर नहीं जाना चाहिए। हाँ एक बात तो है कि पढ़ने वालों की पृष्ठभूमि बड़ी अलग-अलग थी। हिंदी पढ़ने वालों से लेकर ऐसे जिन्होंने एक दशक या उससे भी बाद हिंदी पढ़ी। और सभी पढ़ने वालों की ‘मुझे सबसे ज़्यादा अच्छी बात ये लगी’ वाली बातें अलग-अलग थी। पात्र, संवाद और अध्याय भी सबको अलग-अलग पसंद आए। मुझे बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें बतायी गयी पर उन्हें बताने पर लगेगा कि किताब बेचने के लिए कह रहा हूँ। पर …मुश्किल है कि पढ़ते हुए किसी को ऐसा ना लगे कि वो किरदारों के साथ नहीं चल रहे हैं। या कहीं ना कहीं उन्हें पढ़ते हुए खुद की बात ना मिल जाए। है तो उपन्यास ही पर पढ़ने वालों को पढ़ते हुए व्यंग, रोमांटिक, नोस्टालज़िया, भाषा, समाज से लेकर गम्भीर बातें तक भी मिली। 

    ख़ैर कैसी किताब होगी ये तो आप पढ़ने वाले बताएँगे वो बताना या सोचना मेरा काम नहीं है। मेरा काम था लिखना। बेचने के लिए मेहनत करना तो मुझसे होने से रहा। तो पढ़ कर बताया जाय। ईमानदार प्रतिक्रिया/आलोचना/समीक्षा ज़रूरी है। क्योंकि एक लिखने के बाद अब और लिखने का प्रस्ताव और विचार दोनों है। 

    जिन टिप्पणियों/बातों ने लिखने को प्रेरित किया उन्हें भी यहाँ संकलित करना ऐसे हो जाएगा जैसे किताब बेचने के लिए लिख रहे हैं। पर हैं कम से कम दो दर्जन टिप्पणियाँ और ईमेल हैं जो इस वारदात के लिए क़सूरवार ठहरायी जा सकती हैं। उन्हें किताब के लिए जल्दी ही वेबपेज बनेगा तो वहाँ संकलित किया जाएगा।  

किताब राजपाल एंड संस से आएगी। 

    बाकी कवर, किताब ख़रीदने के पते-ठिकाने, लिंक वग़ैरह की जानकारी जैसे ही आएगी दी जाएगी। किताब आने के पहले सोशल मीडिया वग़ैरह पर जानकारी तो दिखेगी ही। मेरे पेज पर भी और अन्यत्र भी। तो उसे अनदेखा नहीं करना है। किसी और कि बात होती तो चल जाता यहाँ तो मामला अपने घर जैसा है। बात आप समझ ही रहे हैं :)

 नव वर्ष की शुभकामनाएँ। मंगलमय हो। 

 *चलते-चलते:वैसे एक प्रेमपत्र और एक कविता वाली (दोनों ही मैं लिखता नहीं गलती से कभी लिख दिया था) पोस्ट एकाकी रूप में सबसे अधिक पढ़ी गयी पोस्ट हैं। पर अपवादों के लिए कब नियम रुकें हैं।

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~Abhishek Ojha~

Dec 14, 2020

झाल कूटना

‘झाल’ अर्थात् झाँझ (झाल मुरी वाला झाल नहीं)। काँसे का बना हुआ ताल देने का वाद्य यंत्र जिसे मंजीरा भी कहते हैं। 

अब झाल वाद्य यंत्र है तो इसके साथ क्रिया होनी चाहिए बजाना अर्थात् ऐसे - झाल बजाना। वो होती भी है लेकिन झाल के लिए कूटना भी एक क्रिया होती है। हमने इसे कैसे जाना वो बता देते हैं। आशा है अर्थ भी स्पष्ट हो जाएगा। 

हमारे पड़ोस में एक सज्जन (ऐसा ही कहा जाने का चलन है तो इसे उनका कैरेक्टेर सर्टिफ़िकेट ना समझा जाय) रहते थे। वो ‘झाल-कूटने’ का वाक्य में बड़ा अद्भुत प्रयोग करते। एक उम्र तक हमें लगता रहा ये कोई मुहावरा होता है, हो सकता है होता भी हो हमें
ठीक-ठीक नहीं पता। उनके बच्चे नहीं पढ़ते या लड़ाई-झगड़ा करके आते तो वो कहते – “नालायक कहीं के, यही सब करो फिर झाल कूटना”। 

गुस्साते तो कहते – “जाओ झाल कूटो”। 

 इस वैधानिक चेतावनी का मतलब हम वही समझते रहे जो आप समझे। उनके बच्चों पर भी इसका वैधानिक चेतावनी सा ही असर होता। उन्हें घंटा फ़र्क़ नहीं पड़ता था। मतलब एक घंटे तक भी उन पर इस बात का कोई असर नहीं होता। पर झाल कूटने का अर्थ इतना भी सरल नहीं। एक दिन उन्होंने किसी व्यक्ति के झाल कूटने का वर्णन किया तो लगा कि इसका अर्थ इतना हल्के में भी नहीं लिया जा सकता। वो बोले – “फलाना आदमी क्या झाल कूटता है! ग़ज़ब। दिल से। बाकी लोग झाल बजाते हैं वो कूट देता है। समझिए कि जब धुन में होता है तो दुरमुस देता है। जब लय जमती है तो वो तो जैसे वहाँ होता ही नहीं है। अपना शरीर झँझोड़ के रख देता है। सिर, कंधे और हाथ एक्के फ़्रीक्वेंसी में झूमता है उसका। कैसे बताएँ – एकदम ग़ज़ब। आपको देखना चाहिए कभी। उस समय बग़ल में आग भी लग जाए तो वो ताल और लय छोड़ कर नहीं हिल सकता। उस समय उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि अग़ल-बग़ल क्या हो रहा है। जब ढोलक, मृदंग वग़ैरह का लय सुस्त होता है तब जाकर कहीं वो कूटना बंद करता है।” 

 किसी ने कहा – “अरे चिल्लम का ज़ोर रहा होगा”। 

 तो बुरा मान गए। बोले “चिल्लम से वो काम नहीं हो सकता भई, आप देखे नहीं हैं इसलिए ऐसा कह रहे हैं।” 

तब हमें ये भी लगा कि फिर झाल कूटने को ये इतना बुरा क्यों मानते हैं? बड़ी पावरफुल चीज लगती है। पर अक्सर उनकी नज़र में इसका अर्थ एक दम घास काटने वाले हिसाब जैसा ही होता। घास काटने को तो हम बचपन से ही इज्जत देते आए हैं जिसे हम पहले बता चुके हैं कि जबसे सुना कि घास भी काटो तो ऐसे कि गोल्फ़ कोर्स का ठीका मिले, तब से तो हमें लगा घास काटना भी नायाब काम है। फ़र्ज़ी बदनाम है। पर झाल कुटाई ठीक-ठीक समझ नहीं आ पायी। अर्थ अभी भी वही रहा – एकदम बेकार। निकम्मा। किसी काम का आदमी नहीं। (वैसे पिछले तीनों का अर्थ एक ही होता है लेकिन बात में वजन लाने के लिए लिखा।) 

 “तबाह कर के रख दिया है, संतान है कि दुश्मन! जाओ झाल कूटो तुम लोग।” कूटना हमेशा बजाने से बहुत ऊपर की चीज लगती। हमने स्वयं भी देखा एक दो बार किसी मंदिर में, तो किसी मंडली में झाल बजाने में रमें लोगों को पर उससे भी अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आया। क्लीयर भी नहीं हुआ कि ये बजाना है या कूटना।

 जब उनके बच्चे बड़े हुए तो एक ने बड़ी मेहनत की। उन्होंने भी मेहनत की कि बेटा गुमटी लगा देते हैं, टेम्पो चला लो। बेटा लेकिन बाप की बात का गाँठ बांध लिया था। कहता कि बाबूजी हम झाल नहीं कूटेंगे। अब जो भी मतलब होता हो। हमने पारिवारिक मुहावरा समझ लिया था। हमारे लिए सुनी-सुनाई बात थी। किसी व्याकरण की किताब में तो पढ़े नहीं थे। बस वाक्य में प्रयोग किया ही सुनते आए थे अर्थ पता नहीं था। उनके लड़के की सरकारी नौकरी की उमर निकलने लगी तो दसवीं की परीक्षा फिर से देकर उसने उमर का नया सर्टिफ़िकेट रोप दिया। उसे झाल जो नहीं कूटना था। नए उमर का पौधा भी कहाँ एक दिन में बड़ा होता – कम उमर करवा के फिर से दसवीं दिया। बारहवीं दिया। इस सबके बाद अंततः लड़के ने सरकारी परीक्षा निकाल ली। नए काग़ज़ों में उमर अभी भी लड़के की ही थी तो लड़का ही कहेंगे वैसे उसके बाल बच्चे भी अब स्कूल जाने लगे थे। ख़ैर मूल बात ये कि सरकारी नौकरी मिल गयी। 

 स्वाभाविक है बेटे की नौकरी से वो बड़े प्रसन्न हुए। साक्षात भगवान के दर्शन जैसी बात थी। मुहल्ले के चौराहे पर खड़े होकर (दरअसल तिराहा था पर आपको कौन सा उसका दाखिल-ख़ारिज कराना है।) दोनों हाथ ऊपर कर आशीर्वाद देते हुए बोले – “जाओ बेटा अब तो सरकारी नौकरी हो गयी। तुम बहुत मेहनत किए। तार दिए हमको। अब क्या? मन करे काम करो, नहीं मन करे तो झाल कूटो।” 

 मामला और अटक गया। अब तक का समझा सब गोल हो गया! हमारा दिमाग़ चकरा गया। ये क्या माजरा है! लगा ये तो बड़ा व्यापक मुहावरा है। आशीर्वाद भी झाल कूटो, गाली भी झाल कूटो! जब यही था तो ज़िंदगी भर बच्चों को गलियाते किस बात का रहे? बात समझ नहीं आयी। समय अपनी गति से चलता रहा (वो थोड़े ना झाल कूटेगा!)। हमें ज़िंदगी कहीं का कहीं ले गयी। लेकिन संयोग से कुछ सालों बाद एक बार उनसे सामना हुआ। हमने अच्छा मौक़ा देख विनम्रता से पूछ ही लिया - “चाचा आप झाल कूटने का बड़ा सुंदर उपयोग करते हैं। ज़रा उस पर प्रकाश डालिए। हम दर्जन भर देश गए लेकिन ऐसी व्यापक बात किसी से नहीं सुनी।”

बहुत खुश हुए। बहुत ही। तीसरी बार भी लिख दे रहा हूँ उन्हें इतनी ख़ुशी हुई कि उन्हें थोड़ी देर तक समझ नहीं आया कि इतनी ख़ुशी फूट के आ रही है कि उसका करें क्या। जैसी किसी कवि की कविता कोई सुनने को तैयार ना हो और कोई आकर ऐसा कहे कि कवि से बेहतर वो समझ गया हो। आराम से चौड़े होकर बताए। लेकिन उमर हो गयी थी उनकी। उतनी की उस उमर में इंसान बातें अक्सर मिश्रित कर देता है। बोले- “देखो बेटा हम ज़िंदगी भर सरकारी नौकरी किए। उदाहरण तो बहुत है हमारी ही ज़िंदगी में। लेकिन हम बता दें तुमको कि हम रात के शिफ़्ट में फ़ैक्ट्री कम्बल लेकर जाते थे। क्योंकि दिन भर घर का काम करते।” 

 हमें कर्मठता और कम्बल का सम्बन्ध समझ नहीं आया, इसमें झाल कुटाई का ज़िक्र भी कहीं नहीं था। पर हमारे पूछने के पहले ही वो बोले - “हम शिफ़्ट में आठ घंटा कम्बल तान के सोते थे। फ़ाउंड्री से लेकर हेभी मशीन सब विभाग था वहाँ। बग़ल में भट्ठी भी थी तो हर कुछ दिन पर मशीन का एक आध नट खोल के उसीमें स्वाहा कर देते। मशीन बंद रहती तो हम कैसे काम करते? मशीन को भी आराम हम को भी आराम। निर्भेद सोते। और उसी से हम ये भी सीखे कि नींद का शोर से कोई लेना देना नहीं। जो आदमी नहीं सो पाता है शोर उसके दिमाग़ में होता है। बाहर का शोर होता तो हम कभी फ़ैक्ट्री में सो पाते? अरे जैसे चलती ट्रेन में हड़-हड़-गड़-गड़ में आदमी सो ही जाता है। है कि नहीं? वही घर में बोलता है कि शोर से नींद नहीं आयी।” 

“कभी कोई दिक़्क़त”

“दिक़्क़त? सरकारी नौकरी थी। कोई झाल थोड़े कूट रहे थे? प्रमोशन भी टाईम से हुआ। एक बार हमसे हमारे बॉस, बड़े साहब, बोले कि आपको फलाने विभाग में डाल रहे हैं वहाँ काम ठप पड़ा है। आपको जाकर चालू करना है।” 

हम बोले – “ठप पड़ा है? तो हमको क्यों भेज रहे हैं सर? आपको नहीं पता कि हमारा स्पेसलाइज़ेशन ठप कराने में हैं। चालू कराना है तो किसी और को भेजिए? और देखो बेटा, नहीं हुआ हमारा तबादला। कोई क्या उखाड़ लेगा। सरकारी नौकरी के लिए आदमी ऐसे ही थोड़े ना जान देता है। और अब समझे तुम ? हम क्यों बोले अपने लड़के को कि काम करने का मन हो तब तो भाई कोई क्या कर सकता है, नहीं तो झाल कूटो! काम ही करना होता तो बताओ बेटा उससे अधिक पैसा किस नौकरी में नहीं मिलता है? जितना साल मेरा बेटा गँवा दिया उतने में कहाँ पहुँचा होता। मेहनत करके आदमी कहाँ से कहाँ जाता है। उतनी ही योग्यता और कर्मठता पर भला कौन आदमी सरकारी नौकरी में उतना सफल होगा जितना मेहनत करके किसी और क्षेत्र में? लेकिन सरकारी नौकरी का इतना चार्म क्यों है? हम ऊपर-नीचे की आमदनी की बात नहीं कर रहे हैं। वो छोड़ के तुम्हीं बताओ कहाँ जीवन भर का ऐसा गारंटी मिलेगा झाल कूटने वाले आदमी के लिए।” 
 
“पर ज़माना बदल रहा है अब वही बात नहीं रही। और मेहनत तो सरकारी नौकरी में भी लोग करते हैं।” 
 
“तुम लोग ख़ुशक़िस्मत हो बेटा, जिसे कभी सरकारी दफ़्तर में किसी काम से जाना नहीं पड़ा। तुम लोग इधर-उधर निकल गए। तुम्हारी बात से पता चलता है कि तुम्हें इस विषय में कुछ नहीं पता। बस विज्ञापन और फ़ेसबुक-ओसबूक देख के तुम्हें लगता है कुछ बदल गया है। देखो बेटा, आग लग के भस्म हो जाए और तुम सरकारी ऑफ़िस में एक आदमी को नहीं ढूँढ पाओगे कि पानी डालना किसकी ज़िम्मेवारी थी। किसी की नहीं होती। आजतक एक इंसान की ग़ैर-ज़िम्मेदार होने के लिए या परफ़ोर्मेंस ख़राब होने लिए सरकारी नौकरी नहीं गयी। गयी भी तो कोर्ट से जीत के वापस ले लेगा। बस एक बार मिल जाए। जर-जोरू-ज़मीन किसी का ऐसा गारंटी नहीं जैसा सरकारी नौकरी का।”

“फिर चल कैसे रहा है? ऐसा थोड़े होता है कि कोई काम ही नहीं करता।”

“चल कैसे रहा है मतलब? भगवान को मानते हो? दुनिया कैसे चल रही है? वैसे ही।”

“अरे लेकिन…”

“लेकिन क्या? एक साथ कई निकम्मे बैठा दो तो एक सिस्टम बन जाता है और लगता है काम हो रहा है और… समझोगे नहीं पर काम होता भी है। और एकाध अपवाद तो हर जगह मिल ही जाएँगे। तुम्हें क्या लगता है प्राइवेट में झाल कूटने वाले लोग नहीं होते? कहीं कम कहीं ज़्यादा हर जगह होते हैं।”

“लेकिन झाल कूटने का मतलब?”

“अरे हम क्या बता रहे थे कि एक बार हम कम्बल ओढ़ के सो रहे थे…” 

थोड़ी देर में बात ऐसी घूम गयी कि हमें लगा जैसे एफ़ेम के पहले के जमाने के रेडियो ने शॉर्ट वेव में किसी और फ़्रेकवेंसी का स्टेशन पकड़ लिया हो और रसियन में कुछ बजने लगा हो। सच कहूँ तो मुझे अभी भी पूरी तरह झाल कूटने का मतलब समझ आया नहीं। पर कई बार कुछ देख मेरे मन में ज़रूर आया कि शायद यही मतलब रहा होगा उनका। 

 मेरे एक मित्र हैं ग्रीस के। उनकी बातें सुन लगता है ग्रीस यूरोप का बिहार है। अरे बिहार से मेरा मतलब वो नहीं है कि इधर मगध-पाटलिपुत्र-चाणक्य-बुद्ध और उधर सुकरात-प्लेटो-अरस्तु-एथेंस वग़ैरह वग़ैरह इधर भी स्वर्णिम उधर भी स्वर्णिम। मेरा मतलब वही था जो आपको पहली बार पढ़ते ही लगा। वो बताते हैं कि उनके पिता बचपन में उन्हें धमकाते कि पढ़ो नहीं तो कंस्ट्रक्शन में काम करना। उन्होंने बताया कि पिता ये भी बताए होते कि किस देश के कंस्ट्रक्शन में काम करना पड़ेगा तो थोड़ा अच्छा होता। अमेरिका में करना होता तो अच्छा ही होता। वो ये बता रहे थे तो मेरे कान में बजा – "पढ़ो नहीं तो झाल कूटना। ये वाला ज़्यादा व्यापक है।"

 वो बताते हैं ग्रीस में सरकारी नौकरी का पागलपन। बाकी यूरोप में ऐसा नहीं है। उनसे बात कर मुझे पहली बार लगा कि जिस देश में सरकारी नौकरी का चार्म जितना अधिक हो वहाँ झाल कुटाई उतनी अधिक है – निकम्मापन भी उसी हिसाब से है। किसी देश में भ्रष्टाचार, विकास, एफ़िसीएंसी-फ़लाना-ढिमाका ...किसी भी इंडेक्स से अच्छा माप ये होगा कि किस देश में लोग सरकारी नौकरी के लिए कितने पागल हैं। किसी देश में बच्चे सपना देखते हैं कि बड़े होकर कम्पनी खोलेंगे, फ़िज़िक्स में नोबेल जीतेंगे और किसी देश में ये कि बड़े होकर किसी सरकारी दफ़्तर में लाल बत्ती लगा क्लर्क का काम करेंगे। 

...और तब मुझे लगा झाल कूटना कहने से उनका मतलब क्या होता रहा होगा। 

मुहावरा हो ना हो उसकी व्यापकता मन में बढ़ती गयी। और जब मैं सुनता हूँ किसी योग्य सरकारी कर्मचारी को ये कहते कि उन्हें अन्य क्षेत्र में काम कर रहे उनके दोस्तों की तुलना में बहुत कम पैसा मिलता है, तो दिमाग़ में प्रश्न उठता है कि फिर क्या मजबूरी है? पहले नहीं पता था क्या मिलेगा? अभी ही छोड़कर कुछ और कर लें। लेकिन आनंद फ़िल्म के ईसा भाई सूरतवाला की तरह वास्तविकता तो ये हैं कि जब राजेश खन्ना आनंद के किरदार में कहते हैं - मैंने तो छोड़ दी!तो ईसा भई कहते हैं - "छुटती कहाँ है ये काफ़िर मुँह से लगी हुई।" तो समझ में आता है कि झाल कूटना से उनका शायद ऐसा कुछ मतलब रहा होगा। 

 एक बार एयर इंडिया से मैंने यात्रा की थी। कुछ साल पहले। मुंबई में रात को समय से बैठ गए। जहाज़ को आधी रात के लगभग उड़ना था। फ़ोन बंद करवा दिया गया। कुर्सी की पेटी भी बँधवा दी गयी। घोषणा के अनुसार जहाज़ उड़ान के लिए तैयार थी। जब लगा कि कुछ ज़्यादा ही देर से उड़ान के लिए तैयार है, हिल-डुल तो रही नहीं। फिर तैयार किसलिए करवा दिए बिना बात मेकअप ख़राब हो रहा होगा? तो बताया कि रनवे ख़ाली नहीं है। लोग बैठे रहे, हम भी बैठे रहे। लोग मान लेते हैं कि कह रहे हैं तो सही ही कह रहे होंगे, अब कोई कुर्ता (जींस-टी-शर्ट वग़ैरह भी सोच लजिए नहीं तो डिसक्रिमिनेशन का केस बन सकता है) फाड़ के थोड़े ना चिल्लाने लगता है ऐसी बात पर? सुबह पाँच बजे के लगभग बोले कि इस विमान में तकनीकी ख़राबी है। किसी ने पूछा नहीं कि रनवे बिजी होना और तकनीकी ख़राबी एक ही परिवार से हैं या आज संयोग से एक साथ मिल गए? अब जिस चीज़ का कोई उत्तर नहीं हो उसे तकनीकी कहा जाता है ऐसा तो चलन है ही - तकनीकी ख़राबी भी व्यापक है। बताया गया कि आपलोग दूसरे विमान से जाएँगे। सब लोग दूसरे में चले गए। सब लोग में हम भी थे। इसी सब में सुबह आठ बज गए और हम रनवे तक नहीं पहुँच पाए। हमने हमें एयर पोर्ट लेने आने वाले को फ़ोन किया कि अभी तक मुंबई में ही हैं - इधर कार्यक्रमात थोड़ा राडा हो गेला आहे। बताइए मुंबई की सुबह और हम कुर्सी की पेटी बांधकर बैठे थे! ना वड़ा पाव, ना पोहा, ना कटिंग। मुंबई में इसके अलावा ऐसी मनहूस सुबह हमने नहीं बितायी। (साला जतरा ख़राब था ये हम सोचे नहीं थे अब ध्यान आ रहा है! जतरा समझते हैं ना आप लोग?)

 पौ फटने के बाद ही जहाज़ उड़ पायी। घोषणा हुई कि सारा खाना इस जहाज़ में लोड नहीं हो पाया तो एक बार ही भोजन मिलेगा। हमारी भोजन की आवश्यकता बहुत नहीं होती तो हमने इसके लिए भी कुछ नहीं किया। कुछ लोगों की काँय-कूँय ज़रूर सुनाई दी पर कोई क्रांति नहीं हुई। 

असली मज़ा तब आया जब लगभग निर्धारित समय के दस घंटे बाद हम अपने समान के लिए खड़े थे। एक आदमी एक लिस्ट लेकर आया और बोला कि लगभग आधे लोगों का समान नहीं आया है। उसने कहा कि इस लिस्ट में अपना नाम देख लीजिए। बिना माइक पर घोषणा हुए भी बात जंगल के आग की तरह फैल गयी। उन्होंने कहा कि अगर आपका नाम इसमें है तो वहाँ जाकर फ़ॉर्म भर दीजिए आपका सामान नहीं आया है। अब हमारा नाम ऐसे किसी लिस्ट में कैसे नहीं रहेगा? जहां योग्यता से नहीं रहे वहाँ भी अलफाबेटिकल से टॉप पोजिशन कौन छीन सकता है (फ़ैशन के दौर में ये गारंटी भी नहीं रही, डबल ए से नाम लिखने वाले खेल ख़राब कर दे रहे हैं)। पर हमने सबसे पहले गोरों की शक्ल देखी, अपना क्या हम तो फिर भी समझते हैं! एक गोरे ने सू-सू करने की धमकी दी (दो बार गलती से लिखा गया एक बार ही पढ़ा जाय)। उसे विश्वास नहीं हुआ कि जब लिस्ट है, पहले से पता था तो इतनी लम्बी फ़्लाइट में बताए क्यों नहीं? सात समंदर पार करने में एक बार इन्हें ये बताने का नहीं सूझा?! उसे भी किसी ने बताया कि वहाँ काउंटर पर फ़ॉर्म भरना है। मुझे पता था वहाँ भी लाइन लगेगी तो मैं पहले से ही वहाँ था। मेरे लाइन में मेरे पीछे खड़े होकर उसने मन भर गालियाँ दी। (एक मन में चालीस किलो होता है अगर कोई शंका हो तो)। मुझे नहीं एयर इंडिया को।

 मैंने फ़ॉर्म भरते हुए काउंटर पर बैठी लड़की से पूछा कि ऐसे कैसे हो जाता है? और मेरा सामान कब तक आएगा। उसने बोला सर आप इस नम्बर पर फ़ोन करके पूछ लीजिएगा हमें कोई जानकारी नहीं है।

 हमने अपने पीछे के लोगों का मूड देखकर छोड़ दिया। मन में तपोबल जैसा जो भी होता हो उसे पूरा बटोर कर शाप देते हुए कि तुम्हारी खड़ूसियत का बदला मेरे बाद आने वाले तुमसे ज़रूर लें। भला आदमी इसके अलावा और कर भी क्या सकता है। 

 कई दिन तक मैं फ़ोन करता रहा। उस नम्बर पर नहीं। इंटर्नेट से ढूँढे नम्बर पर। क्योंकि उस नम्बर पर कभी किसी ने फ़ोन नहीं उठाया। कॉल सेंटर पर ये दबाएँ, वो दबाएँ होने के बाद कभी-कभार बात हो जाती तो मुझे इतना समझ आ गया कि उधर बैठा प्राणी उसी वेबसाइट को देखकर मुझे स्टेटस बता रहा है जहां मैं भी देख लेता हूँ। मैंने एक दिन सुकून से पूछा कि भई तुम्हें हिंदी आती है? वो बोला हाँ। मैंने कहा फ़ोन मत रखना और कट जाए तो मुझे फ़ोन करना। बड़ी ज़रूरी बात है। अपनी भाषा में आराम से की जाएगी बात। अंग्रेज़ी में गाली भी दो तो वजन नहीं आता। 

मैंने आराम से सारी कहानी सुनाई और पूछा कि ये बताओ किससे बात करूँ? कौन ज़िम्मेवार है? कौन है जो कुछ कर सकता है उसी से बात की जाएगी? वो बोला सर मैं समझ गया। आप क्लेम कर दीजिए। आपके समान का पैसा भी मिल जाएगा। देरी के लिए भी आपको पैसे मिलेंगे। मैंने कहा भई वो मेरे क्रेडिट कार्ड वाले ने भी कहा कि वो पैसे दे देंगे पर उन्होंने कहा कि एक फ़ॉर्म पर एयर इंडिया से किसी का साइन चाहिए तो मैंने कह दिया कि फिर रहने दो नहीं चाहिए पैसे। तुम इतना सुनने के बाद भी मुझे बता रहे हो कि पैसे मिल जाएँगे? समान ही भिजवा दो पैसे रहने दो। 

 इसके बाद उस भले आदमी ने मेरी आँखें खोल दी। बोला सर आपकी परेशानी मैं समझ रहा हूँ पर मेरा काम यहाँ लिखे लिखाए उत्तर पढ़ के सुनाना है। और ये बताना है कि एयर इंडिया आपकी सेवा में है। आपका सामान सुरक्षित आप तक पहुँचना हमारा काम है - ये बताना मेरा काम है पहुँचाना नहीं। आप समझ ही गए मैं किस वेबसाइट से देखकर बताता हूँ। इससे अधिक मेरे हाथ में कुछ है नहीं। आप फिर फ़ोन करेंगे मैं फिर वही पढ़कर सुना दूँगा। और ज़िम्मेवारी तो सर किसी की नहीं है। मैं आपको किसका नम्बर दूँ? एक आदमी होता तो मैं नम्बर नहीं भी देता तो बता देता कि किसकी गलती है। कोई ज़िम्मेवार है ही नहीं तो मैं किससे बात करने को कहूँ। और कोई कुछ नहीं कर सकता। रोज होता है ये। और एयर इंडिया की मुंबई नूअर्क फ़्लाइट में तो हर दूसरे दिन क्योंकि उसमें इतना समान आता ही नहीं। वो एयर क्राफ़्ट ही नहीं है इतनी दूरी तक उड़ाए जाने वाला। अक्सर आधा समान इधर ही रह जाता है। बाद में कार्गो से जाता है। आप न्यूज़ सर्च कर लीजिए मिल जाएगा। अब आप ही बताइए कौन ज़िम्मेवार है? और कौन करा सकता है आपका काम? हम तो बस पढ़ के बता देते हैं आपको। न्यूज़ पढ़ने वाले की तरह कई बार ये भी नहीं पता होता कि हम क्या पढ़ रहे हैं। मैंने कहा - "यार चलो कोई बात नहीं तुम झाल कूटो। एयर इंडिया चुनने के लिए आपका धन्यवाद वाली लाइन आज मत बोलना।"

(पोस्ट लम्बा ना हो जाए पर घटना इतनी छोटी नहीं थी। मैंने ये उदाहरण यूनिवर्सिटी के मास्टर्स की क्लास के स्टूडेंट्स को सुनाया था जब किसी ने पूछा था कि आन्साम्बल लर्निंग में कई वीक लर्नर को मिला देने से स्ट्रॉंग लर्नर कैसे बन सकता है! मैंने सोचा उदाहरण सटीक है वो भूलेंगे नहीं। ख़ैर बात कहीं और निकल जाएगी।)

अंततः मेरा सामान आया दस दिन बाद। और तब मुझे थोड़ा और समझ आया कि सरकारी काम में झाल कूटना क्या होता है। मैं सोशल मीडिया पर देखता हूँ तुरत जवाब आता है कि हम आपकी समस्या देख रहे हैं। हमसे भी एयर इंडिया ने पीएनआर और टैग नम्बर माँगा था ट्विट्टर पर। जैसे सामान लेकर घर के बाहर ही खड़े हैं। हमें डीएम कीजिए, कभी ये भी कह देते हैं कि आपकी समस्या हल हो गयी है - हमें जानकारी भी नहीं होती। उनका बस इतना काम होता है कि ट्विट्टर पर तुरत जवाब दे देना है। और उसके बाद कम्बल तान के सो जाते हैं। मशीन का नट खोलकर भट्ठी में डालकर। तो थोड़ा समझ आता है कि वो झाल कूटना शायद इसे कहते थे। 

 मुझे सरकारी दफ़्तरों से अधिक पाला नहीं पड़ा। गिने चुने बार। पासपोर्ट, पैन, ड्राइविंग लायसेंस जैसे काम के अलावा कभी चक्कर नहीं लगाया मैंने किसी सरकारी दफ़्तर का। एक सुख का पैमाना ये भी हो सकता है कि जितना कम इस चक्कर में पड़ना पड़े। लेकिन जब भी कभी थोड़ा बहुत काम पड़ा – थोड़ा सा समझ आया कि चाचा क्या कहते थे जब कहते थे कि झाल कूटो। वैसे ये तो नहीं कह सकता कि पूरा समझ आया। आपको समझ आया हो तो बताइएगा। अब वो रहे नहीं कि उनसे और क्लीयर किया जाय।* 

* और लिखा तो झाल कूटने वाले मिल के मुझे कूट देंगे :)

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~Abhishek Ojha~

Apr 13, 2020

सुर्रियल पटना (पटना २३)


कल बीरेंदर को फ़ोन किए।

फ़ोन उठाते ही बोला – ‘बीरेंदर स्पीकिंग।’

मैंने पूछा कि ‘हैं? ये अंग्रेज़ी कब से बोलने लगे तुम? सब ठीक?’

‘आरे नहीं भैया। सोचे कि थोड़ा स्टाइल मारे। चलिए इसी बहाने कुछ और बात करेंगे। जो फ़ोन करता है आजकल एक्के बात पूछता है। उ ऐसा है कि हमलोग के साथ का एक ठो लड़का पढ़ता था। हमसे एक साल आगे था। हमलोग अभी पर्हिए रहे थे तब तक उसका बैंगलोर में नौकरी लग गया था। उसको एक दिन फ़ोन किए त ऐसही बोला अंग्रेज़ी में। त हम बोले – साला! ई का हो गया है रे तुमको? छौ महीना हुआ नहीं आ तुम स्पीकिंग सीख लिया? ज़िंदगी भर रैपीडेक्स का किताब पढ़ के पार्डन बोलना नहीं सीख पाया था। हमहीं पर प्रैक्टिस कर रहा है का रे? कि सही में भुला गया भासा-ओसा?’ 

...उसके बाद से उसका जो ना हमलोग हाल किए थे आजतक हमलोग से अंग्रेज़ी नहीं बोल सकता है उ कभी। उसका नामे हमलोग रख दिए पार्डन प्रसाद। त वही करके देखे की आपको कैसा लगता है।


लेकिन जैसा कि आजकल हाल चाल पूछना औपचारिकता वग़ैरह कोरोना के बारे में पूछना ही हो गया है। ऐसा हो गया है कि कोई भी कोरोना की बात किए बिना दो मिनट भी बात नहीं कर सकता, तो हम भी कुछ और बात कितनी देर करते?

मैंने भी पूछ लिया कि ‘और क्या हाल हैं? सुना है कि लोग एक दम बोर हो गए हैं लॉकडाउन में? संभल के रहना।’

‘तबियत ठीक है भैया। आ बोर होने का हमसे मत पूछिए। जो हो रहा है वो रहे। बोर होना भी कोई समस्या है? माने हद है। यहाँ इतनी बड़ी समस्या है और लोगों को बोरियत की पड़ी है। बड़ा बोरियान पीढ़ी है हमलोग का। काम ना धाना त बैठ के बोर होईबे करेगा आदमी। बड़ा पृभिलेज्ड़ हो गया है सब।


‘अरे लेकिन लोगों को घर में रहना पड़ रहा है, घर बर्तन का काम भी करना पड़ रहा है।’

‘तो कोई एहसान कर रहा है किसी पर? बताइए आदमी को एतना ना रजेसी हो गया है कि अपना काम करने पर भी रोना रो रहा है। माने कैसा आदमी है महाराज कि अपना काम भी नहीं हो पा रहा है सब से? हिहाँ आदमी दूसरे का काम कर दे रहा है और कैसा है सब जो अपना काम भी नहीं कर पा रहा है? आ बोर हो रहा है तो रामायण-महाभारत सब का व्यवस्था होईए गया है। आ लॉकडाउन माने ऐसा थोड़े है कि हाथ गोर तोड़ के बैठ जाना है। जो काम है करे तो कैसे बोर होगा महाराज? हमसे पूछे दस ठो काम बता दें करने को। माने एक ठो कथा में सुने थे कि एक आदमी ऐसा ना आराम किया था बचपन से कि उसके पैर का तलवा में रोंवा उग गया था वैसहि आदमी हो गया है अब। अरे यदि आपके पास काम है, नौकरी नहीं गया है और स्वस्थ ठीक है तब तो रोने वाले को थपड़िया देना चाहिए। उसके लिए तो बढ़िया टाइम हुआ न? स्वास्थ्य भी ठीक है और घर पर भी रहना है। जिसका काम का नुक़सान हो रहा है उसका तो समझ आता है लेकिन फ़ालतू बोर होने वाला का तो हसीन दुःख है।‘

‘बात तो तुम्हारी ठीक है लेकिन बहुत लोग ऊब जा रहे हैं घर में रहते रहते। आदत नहीं है।‘

‘अरे तो जिसको बुद्धि नहीं है उसका क्या कीजिएगा। जो व्यस्त रहता है उसके लिए आपे बताइए ज़िंदगी में ऐसा समय फिर आएगा अपना परिवार के साथ बीताने के लिए? उहे तो एक ठो अच्छा बात है इस लॉकडाउन का। लेकिन अजीबे लोग हैं। भाग दौड़ था तो उससे दिक्कत था कुछ दिन के लिए ठप है तो भी दिक्कत है। लोग पूछ रहे हैं कि लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद क्या करोगे? लिस्ट बना रहे हैं कि क्या करेंगे! हम बोले कि जो करते हैं वही करेंगे। अभी भी जो करना है वो कर रहे है। माने लोगों का ऐसा है कि देखिए जब लॉकडाउन नहीं था तब जो करना था नहीं किए, अब बैठ के सोच रहे हैं कि जब ख़त्म होगा तब क्या करेंगे, जब ख़त्म हो जाएगा तब ये सोचेंगे कि लॉकडाउन में इतना समय था तो बहुत कुछ कर सकते थे लेकिन कुछो नहीं किए। हम ना पहले सोच-बटोर के काम रखते थे ना अब रख रहे हैं। जो है कर रहे हैं। जैसे देखिए एतना ना रईस दुःख हो गया है लोगों का कि यहाँ लोग मर रहे हैं। लोगों का नौकरी जा रहा है। आ लोग कह रहे हैं कि भकेसन पर नहीं जा पाए। माने ऐसा ना लग रहा है कि जैसे लोगों का जे है से कि एक गोड़ हमेशा भेकेसने में रहता था आ जब से लॉकडाउन हो गया है एके गोड़ पर खड़ा हैं। भकेसन ना हुआ साँस लेना हो गया। जो आदमी सिवान से आगे नहीं गया ज़िंदगी में उ भी कह रहा है कि प्लान था यूरोप का। अबे रूक जाओ कुछ दिन फिर देखेंगे कि तुम रोने का कौन सा नया बहाना लाओगे। ये तो ख़त्म होगा ही।’

‘और बताओ पटना के क्या हाल हैं?’

‘अरे एकदम ठप हो गया है समझिए कि खटर-पटर-हो-हल्ला सब बंद हो गया है। एतना ना शांत कि सुड़ियल जैसा फ़ील आ जाता है बाहर निकलने पर।’

‘सड़ियल?’

‘आरे भैया, अपना र और ड़ का हिसाब थोड़ा टाइट है। माने अंग्रेज़ी वाला। क्या तो बोलते हैं उसको सरीयल कि सुरियल, सुर्रियल जो भी बोलते हैं वैसा हो गया है। उ मतलब था हमारा। सड़ेगा काहे। घबराने का कोई बात नहीं है। दु चार गो पगलेट तो हिहाँ रहबे करेगा। उतना जाहिलियत के अलावा सब ठीक है। फ़ोन वोन आ रहा है ख़ूब लोगों का आजकल। माने वट्सऐप होने से लोग फ़ोन पर बात करना थोड़ा कम कर दिए थे। अब बैठे बैठे दिमाग़ खौरा रहा है त फ़ोन घुमा दे रहे हैं लोग। आ ऐसा समय में तो आदमी बहुत कुछ सीख सकता है लेकिन आदमी सीखता थोड़े हैं। देखिए अब इसी में खैनी-बीड़ी वाला छटपटाइल रहता है। एक दु दिन बिना उसके काम चल जाएगा तो ई नहीं की उसी का आदत डाल लें। घर का कामे कर रहा है तो उसी में मन लगा के थोड़ा सीख ले। काम थोड़े कोई बुरा होता है। हम तो हर काम करते हैं। जब एतना दिन में सादगी से रहने सीख सकता है। प्रेम से रहने सीख सकता है। खान-पान-रहन-सहन लेकिन कोई सीखेगा थोड़े कुछ। बस ज्ञान ठेलवा लीजिए सब से। जैसे हम भी ठेलिए रहे हैं।’

‘हाँ वो तो है। पर देखो ठीक हो जाए तो अच्छा है। लोग तो क्या ही सीखेंगे।’

‘अरे ठीक तो होईबे करेगा भैया, उ का है कि हम लोग का पीढ़ी कुछ देखबे नहीं किया है। पहिले कैसा कैसा न महामारी होता था। अब आदमी को सालों से लगने लगा था कि जीत लिए हैं सब बेमारी-हेमारी सब के भी त इसलिए तनी ढेर लग भी रहा है। पहिले महामारी में गाँव का गाँव साफ़ हो जाता था। हम लोग का पीढ़ी देखा ही नहीं है कुछ। घबराने का बात नहीं है ओतना। लोगों में संयम भी नहीं है। बोल दीजिए की हाथ गोर तोर के बैठ दिन भर त आदमी पगला जाएगा। सबके पिछवाड़े में चक्र हो गया है, कोई स्थिर नहीं बैठ सकता है। आ उहे दिन भर काम करने को दे दीजिए त बैठने का बहाना खोजने लगेगा। टिकटोक में दिन भर निकाल देगा लेकिन फ़ायदे के लिए बैठने को कहिए त भकुआ जा रहा है पाँचे मिनट में।

‘चलो बढ़िया है स्वस्थ रहो और व्यस्त रहो तो ये तो सबसे अच्छा है’

‘अरे भैया, यहाँ तो व्यस्त रहिए जाएँगे। मनोरंजन का कमी नहीं है। बंदी में भी मुरी फूटौव्वल हो गया है कल।

‘मुरी फूटौव्वल कहाँ हो गया? पुलिस से?’

‘पुलिसवन सब तो बड़ा मज़ेदार कहानी सुनाता है आजकल लेकिन है बगले में एक ठो परिवार। कल लाठा-लाठी, फैटा-फैटी हुआ है जम के। गण सब जमा हो गया है। भाग-भाग के आ गया है सब कलकत्ता-बम्बई-सूरत से। उ का है कि दूर रहने से प्रेम बना रहता है अब सब एक साथ जमा हो गया है तो लड़बे करेगा। भायरस से मरे ना मरे ऐसे ही दु-चार ठो मर जाएगा। वैसे ठीक है मनसायन रहता है थोड़ा। छत पर खड़ा होके देखे बड़ी देर तक। अब झगड़ा छोड़ाने कौन जाए इसमें।

‘अरे ऐसे में तो ख़तरा हो जाएगा?’

‘नहीं भैया ख़तरा नहीं होगा। अमेरिका थोड़े है कि ड़ाईभोर्स रेट बढ़ जाएगा। अरे चार ठो बर्तन रहेगा त आवाज़ ऐबे करेगा। सब दूर दूर रहने लग गया है तो थोड़ा कम हो गया है नहीं तो ई सब तो सोभा है समाज का।

‘तुम भी क्या कह रहे हो। मार पीट कैसे शोभा हो सकती है?’

‘अरे भैया आप देखेंगे ओहिमें कपार फट जाता है आ उहे भाई लेके हॉस्पिटलो जाता है। आ तनी पैसा हो जाए तो दू-चार गो केसो नहीं होगा परिवार में? कोर्ट कचहरी तो शोभा है धन का। और आजकल पड़ोस में गण सब जमा हुआ है तो थोड़ा लड़ उड़ लेता है त उ लोग का मन भी हल्का रहता है। हमलोग का मनोरंजन। बरी मार-मारा है एक दूसरे को कल।’

‘अबे यार, इसमें कैसे मज़ा आ जाता है तुमको। और बाक़ी लोग सब ठीक हैं?’

‘हाँ ठीके है। सबका धीरे-धीरे सेट हो रहा है। सदालाल सिंगवा आया था कल। बरी रोया कि मन ऊबिया गया है घर में बैठे बैठे। हम उसको बोले कि तुम तो साला बरी शायरी करता था कि वक़्त ठहर जाए। लम्हा जम जाए। त अब करो रोमांस! ठहर तो गया है? अब काहे बिलबिला रहे हो? त पिनक के भाग गया। जो जेतना शायरी ठेलता है आ इंस्टा पर लभ ओफ़ लाइफ़ में  लभलभा रहा है उसका भीतर से ओतने मुरी फूट्टअव्वल है।


‘सदालाल सिंह को तुम कभी छोड़ते नहीं हो।’

‘आ नहीं भैया, उ का है कि जिसको काम है उसको हमेशा काम रहता है। जिसको नहीं रहता है उसको कभी नहीं रहता है। जिसको रोना है उ बहाना ढूँढ लेता है रोने का। आ जिनको काम नहीं है बैठ के तेरह-बाइस, लंदर-फंदर बतियाना है उसका त पेट फूलबे करेगा लॉकडाउन में। आ लोगों को अभी भी नहीं समझ आ रहा है कि दंगा के लिए कर्फ़्यू नहीं लगा है दूर-दूर रहने के लिए लगा है। मौक़ा मिलते ही गले मिलने के लिए नहीं। त खुदे भगाते उसको नहीं भागता तो।

‘और पटना में वन्य प्राणी नहीं दिख रहे? तुम्हारे घर से अब तो हनुमान मंदिर दिख जाता होगा।’

‘अरे भैया उ सब थोड़ा ढेर देखने लगे हैं लोग। माने कहने वाला कल को ये भी कह देगा कि पटना में जिराफ़ दिख गया। हम नहीं कहेंगे। माने पहिले भी जानवर सब दिखता था। अब भी दिखता है। पहिले दिखता था त कोई पूछता नहीं था अब दिखता है त विडीओ बनाता है। बंदी से थोड़ा प्रदूषण तो कम हुआ ही है लेकिन लोग भी तनी ढेर देख रहे हैं। और बाक़ी तो सब बढ़िया है। आपलोग भायरस को का कह रहे हैं? यहाँ तो लोग कह रहे हैं कि जैसे औरत सब भतार का नाम नहीं लेती है उसी तरह भायरसो का नाम नहीं लेना है। ये नहीं कहना है कि उ कहाँ से आया है। त हम कहे ठीक है कह दो कि झूमरी तिलैया से फ़रमाइस में आ गया है। नाराज़ हो जाएगा भायरस तो ...ऐजी तनिए सुनिए उ जो नया वाला भायरसजी आए हैं उन्हीं का बात कर रहे हैं, कहो। ख़ैर, ग़लत-सलत सूचना देने वाला भी बढ़ गया है अब पता नहीं ऐसा करने में लोगों को क्या मज़ा आता है। इलाज तो हर आदमी लेकर घूम रहा है। आँकड़ा, ग्राफ़, रीसर्च सब लोग के उँगलिए पर है। माने सबके हाथ में फ़ोन है आ दुनिया जहान का फ़ालतू टाइम। त का करेगा आदमी? वही कर रहा है। अब बताइए कल एक ठो मैसेज भेजा कि कपार छिलवा के कोका-कोला से नहा लेने पर भायरस मर जाता है। असली भायरस तो इसे सब है। इन सबको भी थूरने का व्यवस्था हो जाए तो ठीक रहता।’

पटना सीरीज 

~Abhishek Ojha~

May 27, 2019

कंठस्थ


पिछले दिनों उड़ीसा में तूफ़ान आने के बाद हिंदी की ख़बरों में भी 'मिलियन' शब्द कई बार दिखा। आजकल सोशल मीडिया में फ़ालोअर, व्यू इत्यादि की गणना भी मिलियन में ही होती हैं। ये एक छोटा उदहारण है कि पिछले कुछ सालों में भाषा कैसे बदली है।[वैसे ये भी हो सकता है कि हिंदी मीडिया वालों को मिलियन से लाख में बदलना ही नहीं आया हो और कौन रिक्स ले सोच कर वैसे ही टीप दिया हो अंग्रेजी खबरों से] मुझे कॉलेज के दिनों में मिलियन, बिलियन असहज लगता। सुनते ही दिमाग़ में गणना चलती - कितने लाख? कितने शून्य?  दिन भर मिलियन, बिलियन करने वाले व्यवसाय में आने के बाद भी धीरे-धीरे ही तीन अंकों के बाद अल्पविराम लगाने वाली ये पद्धति सहज लगने लगी।

हमने गिनती-पहाड़ा पढ़ा था एक साँस में -

एक इकाई, दो इकाई, तीन इकाई, चार इकाई, पाँच इकाई, छः इकाई, सात इकाई, आठ इकाई, नौ इकाई, दहाई में दस ! 

इकाई-दहाई-सैकड़ा-हजार-दस हजार-लाख-दस लाख-करोड़-दस करोड़-अरब-दस अरब-खरब-दस खरब-नील-दस नील-पद्म-दस पद्म-शंख-दस शंख-महाशंख! कंठस्थ.

अब सोचना भी उसी प्रणाली में होगा! सोचना भला कभी दूसरी भाषा में हो सकता है? मैं ऐसे लोगों को हमेशा शक की दृष्टि से देखता हूँ जो कहते हैं कि वो अपने बचपन में बोली गयी भाषा भूल गए। थोड़ी-थोड़ी याद है।  कैसे भूल सकता है कोई ?! पर हैं ऐसे लोग जो कहते हैं। ख़ैर ! जोड़ घटाव हम आज भी गिनती-पहाड़ा से ही करते हैं। उंगुलियों के इस्तेमाल से। पहाड़े की बात हो तो पंद्रह का पहाड़ा कंठस्थ होने की कतार में सबसे पहले आता है। दो एकम दो, दुदुनी के चार से भी पहले - पंद्रह दूनी तीस तियाँ पैंतालीस चौका साठ पाँचे पचहत्तर छक्का नब्बे सात पिचोत्तर आठे बीसा नौ पैंतीसा. झमक झमक्का डेढ़ सौ।

फिर अंकों के लिखने का अभ्यास ऐसे होता था - 'लिखो  तो!पांच अरब बीस करोड़ पैतीस हजार दो सौ एकासी.'  रैंडम बड़े बड़े अंक लिखते। स्लेट भर जाने भर के अंक और शाबाशी पाते. एकासी से याद आया नौ के पहाड़े में रटते-रटते - नानावा एकासी, नाना गइले फाँसी। छोडाव ऐ नाती ! 

ये लय में कंठस्थ करने के दिन थे। कंठस्थ यानि विशुद्ध रट्टा - मतलब पता हो ना हो एक साँस और लय में फिट। बिना सोचे समझे। आजीवन। एक बार रटा गया तो देर सवेर समझ में आ ही जाएगा।

गिनती का पहला प्रैक्टिकल एप्पलिकेशन था अनाज तौलने वालों को देखना। फ़्लो में। सुंदर। वो बोरे का बोरा तौलते - रामह जी रामह, दुई जी दुई। या रामह जी रामह, दुई राम दुई - रामनाम का संपुट ज़रूर होता।

ऐसी कितनी बातें याद है। बिन पढ़े। केवल सुनकर। जो कभी पढ़नी नहीं पड़ी वो भी। पाठ्यक्रम के बाहर के  श्लोक। चौपाई। दोहा। कहावतें। मानस की अनेकों चौपाइयां जो किसी पाठ्यक्रम में नहीं थी। और दैनिक पूजा में सुने श्लोक -

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी विलो लवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके किशोर चन्द्र शेखरे 
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चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि। 
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कंदर्प अगणित अमित छबि, नव नील नीरज सुन्दरम्। पटपीत मानहुं तड़ित रूचि-शुची, नौमि जनक सुतावरम्
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मजेदार ये है कि कंठस्थ हो गया बिना शब्दों का पता हुए. वैसे ही याद हुआ जैसे सुना. उसी धुन में. गलत उच्चारण सुना तो गलत ही याद रहा. कुछ ज्यादा अच्छे लगते वो जल्दी याद होते। शायद वो जिनके उच्चारण में ज्यादा उतार चढ़ाव होता - कारण सिर्फ उच्चारण ही था।  अर्थ तो क्या ये भी नहीं पता होता कि ये है क्या !  बहुत कुछ ऐसा भी है जिसका अभी भी पूरी तरह नहीं पता - नाचै गोविन्द फनिंद के ऊपर तत्थक-तत्थक-न्हैया। पता नहीं पूरी कविता क्या थी या किसने लिखा.

कितनी कविताएं जो पाठ्यक्रम में नहीं थी... या पुस्तक देखने के पहले से ही याद होता। अंताक्षरी के लिए। किताब में देखकर लगता ... अरे ये तो मुझे याद है !

रण बीच चौकड़ी भर-भर कर, चेतक बन गया निराला था। 
राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था। 
गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था। 
वह दौड़ रहा अरि-मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था। 
जो तनिक हवा से बाग हिली, लेकर सवार उड़ जाता था।

और ये सब पूछने वाले बड़े-बूढ़े लोग भी मजेदार होते - प्रेडिक्टेबल - "कई नवा एक सौ बासठ?"

"अब एक बुझौव्व्ल बताओ। अजा सहेली ता रिपु ता जननी भरतार ताके सुत के मीत को बारम्बार प्रणाम".

पहली बार नहीं आया ये हो सकता था, उसके बाद ऐसा कैसे होता कि पता न हो। तेज होने के यही टेस्ट होते थे तो गहराई में जाकर हम उत्तर भी निकालने का प्रयास करते। कहीं चौपाई सुनी तो प्रसंग और स्रोत का पता लगाया जाता। लोग सिखाते भी अच्छी चीजें थे। लघुत्तम, महत्तम बाद में सीखना पहले समहर करना सिख लो. लघुत्तम, महत्तम अपने आप समझ में आ जाएगा। और ये पहली चीज थी जो ऐसे समझ आयी कि उसके बाद सीखने की जरुरत ही नहीं पड़ी। भिन्न देखते ही अंक खुलते चले जाते। गणित में मजा आने लगा। वैसे ही चक्रवाल विधि सीखा दिया था किसी ने... वर्षों बाद पता चला कि ये भास्कर के बीजगणित में वर्णित प्रसिद्द विधि है !

और एक तो ये राम को आम इतना प्रिय था कि वो आम ही खाते रहता... और हमें वो अंग्रेजी में अनुवाद करके बताना होता -

'राम आम खाता है'.
'राम आम खा रहा है'.
'राम आम खा रहा था'
'राम आम खा चूका है.'
'यद्यपि राम ने आम खाया फिर भी उसे भूख लगी थी'  वगैरह, वगैरह.

ये सब अंग्रेजी में बता दिया तो सिद्ध हो गया चलो लड़का बहुत तेज है !   शाबाश !

एक दो बार के बाद समझ आ गया था कि अब अगला सवाल ये होने वाला है - 'राम के आम खाने के पहले रेल गाडी जा चुकी थी'. (इसका जवाब ये क्यों नहीं कि - अब आमे खाये में नशा रही उनकर त गाड़ी छुटबे करी!).

वो चीजें भी सुन कर याद हुई जो हमारे बचपन में समाप्त हो गयी थी -

मन-सेर-छटाक।
रत्ती-माशा-तोला।
रुपया-आना-पैसा-पाई।

यदि किसी बड़े-बूढ़े ने भी कभी पढ़ा हो और हमने सुन लिया किसी चर्चा में तो भी याद हो गया। इन प्रणालियों के बारे में बस इतना ही सुना। एक से दूसरे में परिवर्तित करना रटा नहीं तो आज तक पता भी नहीं। श्रुति परम्परा मज़ेदार थी। पिरीआडिक टेबल तो मुझे लगता है सबने ही ऐसे रटा होता है - हली नाक रब कस फर ! बीमज कासर बारा...

पढ़ाने वाले लोग भी मजेदार थे। गणित के एक शिक्षक थे - ठेठ । उन्होंने जैसे कहा था - बहिष्कोण सुदूर अन्तः कोणों के योग के बराबर होता है। सुदूर माने ? - सटलका से दूर ! 

अब इसके बाद जीवन भर कोई कुछ भी भूल जाए सुदूर का अर्थ कैसे भूल सकता है?  - and now you can't un-listen this - सुदूर माने - सटलका से दूर !

एक दो बातें हो तो लिखी जाएँ... ऐसी कितनी बातें हैं।  त्रिकोणमिति में उन्होंने पहले क्लास में लिखा - 'पंडित भोले प्रसाद बोले हरे हरे'.  इसका कभी इस्तेमाल नहीं करना पड़ा पर देखिये याद अब भी है !

संस्कृत में तो कितनी बातें याद रही. यण संधि - इकोऽयणचि - इई का य उऊ का व ऋ का र तथा लृ का ल हो जाता है। अयादि संधि - एचोऽयवायाव: ये बोलते समय मास्टर साब लटपटा जाते। लगता उनके मुंह में रसगुल्ला अटक गया और अब घुल रहा है। और याद भी वैसे ही है। संधि-विच्छेद से नाता इसलिए भी रहा कि हमारे शिक्षक हर अध्याय के शुरू में ही पहला काम यही कराते - एक एक शब्द का विच्छेद, जहाँ भी संभव हो।  बोलते हर शब्द के संधि को पहचान उसका विच्छेद कर दो फिर विभक्ति। बस ८०% अर्थ समझ में आ जाएगा।  बाकी जो बचा वो प्रत्यय-उपसर्ग इत्यादि से समझ आ जाएगा। संधि दीखते ही विच्छेद करा देते ! पढ़ते समय भी बोलते कि विच्छेद करके पढ़ो। हम उन्हेंएंटी-संधि व्यक्तित्व वाले कहते और अब लगता है इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता था संस्कृत पढ़ाने का।

याद तो शम्भू के बाप भी हैं। हिंदी में एक अध्याय था 'सफर से वापसी' जिसके लेखक थे अजित कुमार। हमसे दो साल सीनियर थे - शम्भू कुमार जो अजित कुमार के पुत्र थे। लेखक अजित कुमार और शम्भू के बाप अजित कुमार दो विभिन्न लोग थे। लेकिन किसी शरारती लड़के ने स्कूल में सफर से वापसी के लेखक का नाम बता दिया -  'शम्भू के बाप'. और ये प्रसिद्द हो गया। अब भले ये भूल जाएँ की तोड़ती पत्थर के लेखक निराला थे लेकिन सफर से वापसी - शम्भू के बाप  भला भूल सकते हैं?

भूगोल के शिक्षक ग्लोब पर हाथ फिराते - स्वीडन-फिनलैंड-इंग्लैंड-आइसलैंड... संभवतः अपने जमाने के रटे क्रम में हाथ फिराते दुनिया पर। लगता रैप कर रहे हैं।

वैसे कंठस्थ करने और कंठस्थ रह जाने में संस्कृत ही एक नंबर रही -

शैले शैले न माणिक्यं. मौक्तिकं न गजे गजे. साधवे ना ही सर्वत्रं चन्दनं न वने वने।
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अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् | परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। वगैरह वगैरह.

और सबसे अधिक मजा आता निबंध में ये सब ठेलते हुए. कहीं से अपने हाई स्कूल के दिनों के परीक्षा में लिखे निबंध पढ़ने को मिल जाते तो खुदा कसम मजा आ जाता. (खुदा कसम वाला प्रसंग इस पोस्ट में है).

संस्कृत कुछ ऐसे ही पसंद बन गयी थी । गणित-भौतिकी-संस्कृत के बाद ही कुछ था। मुझे लगता है इसका सबसे बड़ा कारण थे शिक्षक और उनका प्रोत्साहन। एक अच्छे शिक्षक पर बहुत कुछ निर्भर करता है। किसी विषय में रूचि पैदा करने में। नीरस लगने वाला विषय कोई अच्छा शिक्षक पढ़ा दे तो वही रुचिकर हो जाए। और शिक्षक ऐसे भी जो किसी विषय में कितनी भी रुचि हो तो उसे ही बेकार बना दे।

तृतीया विभक्ति येनांग विकार: पढ़ाते हुए संस्कृत के शिक्षक एक दिव्यांग शिक्षक का उदाहरण देते। वो भी अक्सर जोर जोर से बोलकर उनको सुनाते हुए - 'स: पादेन खंज:' (स: की जगह उदाहरण में वो उन शिक्षक का नाम लिखा देते) ऐसा करना अत्यंत असंवेदनशील था। पर स्वाभाविक है उनका मजे लेकर लिखवाना वैसे के वैसे ही याद है।

किसी ने कहा - 'सर ऐसे नहीं बोलना चाहिए आपको. फलाने सर को बुरा लगता होगा'

तो उन्होंने कहा था - 'अरे वो मित्र हैं हमारे। बुरा क्या लगेगा.' उसके तुरत बाद ही ठहाके लगाते हुए बोले - 'वैसे हैं भी तो वो पुरे अष्टावक्र ! पादेन खंज: तो सम्मान ही हुआ।'

बताइये !

 वे भी दिन थे. लगता है हमने मजे-मजे में पढाई कर ली ! कैसे लोग रोना रोते हैं पढाई का :)

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~Abhishek Ojha~

Aug 28, 2018

किस्सा-ए-बागवानी

[सत्य घटनाओं पर आधारित. इस पोस्ट के सभी पात्र और घटनाए लगभग वास्तविक हैं. यदि किसी भी व्यक्ति से इसकी समानता होती है तो ये और कुछ भी हो संयोग तो नहीं ही है. वैसे हमें कौन सा फर्क पड़ता है ! 😊]


कुछ दिनों पहले हमसे किसी ने कहा – ‘थोड़ा गार्डनिंग पर ज्ञान दो. तुम तो कितना कुछ लगाते हो. लकी हो, तुम्हारे हाथ से पौधे लग जाते हैं’.

पहले तो सवाल ही गलत था अपार्टमेंट में रहने वाला व्यक्ति क्या जाने गार्डेन का हाल ! फिर भी हमने बहुत कोशिश की कि अपने को और अपने हाथ को श्रेय दे ही लूं. पर हो नहीं पाया क्योंकि... इस बात को समझने के लिए...

पहले एक कथा -
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 बात बहुत पहले की है. जब लोग पैदल यात्रा किया करते थे. सड़कों के किनारे छायादार और फलदार वृक्ष हुआ करते थे जिनकी छाँव में पानी पीने की व्यवस्था होती थी. एक सज्जन यात्रा पर निकले... सुदूर किसी देश में कहीं एक दिन उन्हें एक फुलवारी दिखी। फल-फूलों के भार से झुके पेंड़-पौधे जिनपर भौरें मड़रा रहे थे... वगैरह वगैरह. माने भीषण मनोरम - इतनी मनोरम की यात्री ठहर गया. फुलवारी की सुन्दरता का अनुमान आप इस बात से लगाइए कि न तो उस जमाने में फेसबुक था. न इन्स्टाग्राम .न स्नैपचैट (ट्विट्टर भी नहीं !) फिर भी यात्री ठहर गया !

फुलवारी का मालिक दिखा तो यात्री ने मंत्रमुग्ध होने वाला एक्सप्रेशन देते हुए कहा – ‘भाई ! क्या अद्भुत बगिया है आपकी। मैं कितने ही नगर-राज्य-महाजनपद-देश घूम आया पर ऐसी खुबसूरत बगिया मैंने नहीं देखी !’

लहलहाती फुलवारी के मालिक अति प्रसन्न हुए और गर्व से बोले – ‘भाई, आखिर क्यों नहीं होगी ! इतनी मेहनत करता हूँ. खून-पसीना एक कर रखा है. ऊपर से... देखिये उन्नत किस्म के बीज और सिंचाई और.. ये और वो... जिंदगी लगा रखी है इसमें. ऐसे ही नहीं हो गयी!’.

वो इतना बोल गए जितने में बागवानी का मैनुअल छप जाता. विद्वानों की इसमें एक राय है कि मीडिया का युग होता तो वो जरूर पैनल एक्सपर्ट बने होते. चुनावी एक्सपर्ट तो बन ही गए होते जो परिणाम आने के बाद तुरत ही उसका कारण बता देते हैं ! (पत्रकार भी हो सकते थे पर संभवतः उतने भी हांकने वाले नहीं थे... पत्रकारिता के लिए तो धान के खेत में खड़े होकर उसे गेंहू कह देना भी विशिष्ट ओवरक्वालिफिकेशन होता है.) खैर ... कुछ महीने या हो सकता है वर्ष बाद... (अब समय तो लगता था पैदल आने-जाने में) वही सज्जन यात्री वापस आ रहे थे (अब देखिये प्रूफ तो नहीं है कि सज्जन ही थे लेकिन ऐसा ही कहने का चलन है). इस बार उन्होंने देखा कि बगिया उजाड़ पड़ी है. उन्हें बड़ी निराशा हुई. अब सेल्फी वगैरह का युग तो था नहीं लेकिन बगिया की खूबसूरती देखकर हो सकता है यात्री के दिमाग में आया हो कि आते समय एक चित्र ही बना लूँगा ! या उस जमाने में हो सकता है लोग सच में खूबसूरती आँखों से देखते हों और आनंदित होते हों. जो भी कारण रहा हो उन्हें लगभग बंजर पड़ी जमीन और सूखे पौधे देख बड़ी निराशा हुई. संयोग से बगिया के मालिक फिर दिख गए.

यात्री ने इस बार दुःख प्रकट करते हुए पूछा – ‘भाई, हुआ क्या? मतलब कैसे? आप तो इतनी मेहनत ?’

एक जमाने में लम्बी लम्बी हांकने वाले बगिया के मालिक बोले – ‘भाई, क्या बताएं अब. सब भगवान की लीला है. जैसी प्रभु की इच्छा.’

 कथा समाप्त.
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अरे रुकिए अभी आगे और पढना है. केवल कथा समाप्त हुई है बात नहीं.

तो ... कथा से शिक्षा वगैरह जो मिली वो तो आप समझ ही गए होंगे. उसे बताने का पांच नंबर तो मिलना नहीं जो सोदाहरण लिखा जाय और शिक्षा भी थोड़ी गहरी सी है जितना सोचेंगे उतनी खुलेगी. तो हम क्या लिखें अपनी समझ ! पर ऐसा है कि... बचपन में कहानियाँ लाखों में नहीं तो हजारों में तो सुनी ही... लेकिन उनमें से कुछ ऐसी रहीं जिनका उदाहरण जिंदगी में हर मोड़ पर मिला. ये कहानी भी वैसी ही कहानियों में से एक है. छोटी, गंभीर और सटीक.

 अब फ़ास्ट फॉरवर्ड करके आ जाते हैं वर्तमान में. अपनी बात. लोग कहते हैं कि हमारा अपार्टमेंट ‘बोटैनिकल गार्डन’ लगता है. लोगों को अजूबा इसलिए लगता है कि पचास तल्ले की बिल्डिंग के कबूतर खाने जैसे अपार्टमेंट में - कैसे इतने पौधे ! देशी-विदेशी जो भी आते हैं वो पूछते जरूर हैं पौधों के बारे में. लेकिन अब ये कथा तो बचपन से ही वायर्ड हैं दिमाग में तो हम क्या बोलेंगे.. मुस्कुरा भर देते हैं. कुछ हांकने से पहले ही कथा दिमाग में कौंध जाती है. वैसे हम करेंगे भी क्या. गमले, मिट्टी, बीज सब कुछ तो मिलता है बस हम इतना करते हैं कि लगा देते हैं. और सर्दियों में जब हिमपात का मौसम होता है. सूर्य दक्षिणायन होते हैं जब कुछ नहीं उगने का समय होता है तब मिट्टी में कोई भी बीज दबा देते हैं. कुछ दिनों में हरा-भरा निकल आता है – आलू, चना, सरसों, मुंग, उड़द. उसमें भी फूल लगता है. खुबसूरत भी दीखता है. और जब मौसम हो तब तो बीज मिलते ही हैं बाजार में.

पर लोग तो लोग - एक मित्र पहले तो दुखी हुए कि उन्होंने बहुत कोशिश की पर लगता ही नहीं. - कैसे लगाते हो? हमारे तो दिमाग के बैकग्राउंड में कथा ! तो हम माहौल में स्माइली बना देने के सिवा क्या कहते. पर कुछ देर के बाद वो पलटी मार कर खुद ही ज्ञान देने लगे - ‘अभिषेक एक गड़बड़ है. ये दो पौधों को तो तू प्रून कर दे. छंटाई करने से और फनफना के बढ़ेंगे.' दो में से एक तुलसी. हम अपने पौधों के पत्तों को कभी हाथ नहीं लगाते और वो काट-पीट के धर दिए. ‘अभिषेक, तू बेकार मोह कर रहा है ऐसे ही बढ़ते हैं! देखना.’ हम तिलमिला कर रह गए लेकिन थोडा तो समझ में आ गया कि उनके पौधे क्यों नहीं लगते ! लहलहाती फुलवारी वाले जब एक्सपर्टई करने लगे तब ‘भगवान की लीला’ हो ही जाती है और यहाँ तो बिना कुछ लगाये भी ..एक तो एक्सपर्ट ऊपर से बिन मोह दया - पौधे कहाँ से लगेंगे !

 हमारा पौधे लगाने का सिलसिला शुरू हुआ था तुलसी लगाने के प्रयास से. उसके पहले लगे लगाए रेडीमेड गमले ही लाते थे. कृष्ण-तुलसी के बीज ऑनलाइन मिल गए तो गमले और मिट्टी सुपर मार्केट में. उसके बाद तो एक से दो होते हुए दर्जन भर गमले हो गये. मन बढ़ा तो और भी पौधे लगाते गए... एक दक्षिण भारतीय मित्र से ओमवल्ली (कर्पुरावल्ली) का डंठल मिला और फिर... बैम्बू, मनी प्लांट, गेंदे के फूल, सूरजमुखी, आलू, टमाटर, पुदीना... हमारे अपार्टमेंट में फर्श से लेकर छत तक खिड़की है और वो भी दक्षिण-पूर्व दिशा में जिससे सर्दियों में दिन भर धूप रहती है. जो इस देश के लिए ग्लास-हाउस की तरह काम कर देती है और पौधे लहलहा उठते हैं – बाकी आगे कहने को तो बहुत मन हो रहा है लेकिन – कथा !. वैसे कभी-कभी गड़बड़ भी हो जाती है. जैसे - टमाटर ! हमने बचपन में जो देखा था वो टमाटर का पौधा छोटा ही होता है. लगाने के बाद पता चला कहने को चेरी टोमेटो लेकिन हो गया आठ फीट का. धागे और टेप से खिड़की के शीशे पर किसी तरह उसे सहारा मिल पाया !


 एक अन्य मित्र हमारे घर आ चुके थे और उन्होंने अपने एक अन्य मित्र को हमारे पौधों के बारे में बताया. और बात मित्र से मित्र तक जाते जाते थोड़ी तो बदलती है ही. ये मित्र के मित्र एक बार मिले तो कहने लगे (फेक अमेरिकी एक्सेंट में पढियेगा) – ‘आई हर्ड आप तो सब्जी एंड आल भी उगा लेते हैं अपने अपार्टमेंट में ! आपको तो खरीदना भी नहीं पड़ता होगा. कैसे लग जाता है यार.. मैं तो... कितने प्लांट्स लेकर आया. दे जस्ट डाई ! मैं तो मिनरल वाटर डालता था एंड यू नो प्लांट फ़ूड  वो भी खरीद के लाया. आप बताओ कुछ.’

 ...हम तो सही में कुछ नहीं करते हैं तो क्या बताते. लेकिन हमें पहले तो ये लगा कि इसके तो एक्सेंट सुन कर ही पौधे मर जाते होंगे ! दूसरी ये कि जिसे लगता है कि गमले में उगा कर खाने लायक हो जाएगा उसको कैसे समझाया जाय. हमें समझ ये नहीं आया कि ये लड़का चार साल से अमेरिका आया है और इतना एक्सेंट !वो भी हाथ मुंह टेढ़ा कर कर के ! देखिये हम जजमेंटल तो नहीं हैं लेकिन अब ऐसा भी नहीं हैं कि राजस्थान में पला बढ़ा व्यक्ति इतने एक्सेंट में अंग्रेजी बोलने लगे. बहुत से राजस्थानी दोस्त हैं अपने भी. और हम ठहरे फैन उन बनारसी के जो बीस साल से रह रहे हैं अमेरिका में. उनकी बीवी रसियन. (८०% फैनता तो यहीं हो जाती है वो ठेठ बनारसी और उनकी पत्नी .. खैर !) और आज भी जब वीजा को भ पर जोर लगाकर भीजा कहते है तो लगता है दुनिया में इंसानियत अभी ख़त्म नहीं हुई. वो चार महीने की गर्मी में लौकी नेनुआ उगा लेते हैं - उगा ही लेंगे ! खैर मिलने को  तो ऐसे लोगों से भी मिल चुका हूँ जो कह देते हैं कि वो भूल ही गए अपनी भाषा ! मुझे अभी तक ये बात समझ नहीं आई कि कोई अपनी भाषा कैसे भूल सकता है !

 खैर... इसी बात पर एक और प्रसंग –

ये उन दिनों की बात है जब खलिहान में कटी फसल पर बैलों से रौंदवाकर दवनी होती थी. एक व्यक्ति दो साल के बाद कलकत्ता से लौटकर अपने गाँव आया था. खलिहान पहुंचा तो मसूर की दवनी चल रही थी. एक तरफ अनाज ओसाकर रखा हुआ था. उसने स्टाइल (अर्थात उस जमाने का कलकत्ता रिटर्न एक्सेंट) में पूछा – ‘इत्ते इत्ते दाना क्या है?’

खलिहान में सन्नाटा पसर गया. बैल तक ठहर गए ! ऐसी विचित्र बात ही हुई थी. दो साल कलकत्ता में रह कर आया व्यक्ति मसूर भूल गया ! खलिहान में ही गाँव के एक चटकवाह (तेज तर्रार) बुजुर्ग भी बैठे थे – अनुभवी. छाया में बाल सफ़ेद किये हुए (मतलब वही कि बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये थे). उन्हें ये वाला भूत भगाना बखूबी आता था. बैठे-बैठे दो नौजवानों को उन्होंने इशारा किया. दोनों नौजवान लठ्ठ लेकर टूट पड़े. जब दो चार लट्ठ सही से पड़ गए तब कुटाया हुआ व्यक्ति चिल्लाया – ‘अरे मसूर है मसूर. याद आ गया.’ !

प्रसंग समाप्त.

 मन तो हमें भी वही हुआ लेकिन... हम ऐसी हिंसा के बस सैद्द्धान्तिक समर्थक है. इस विषय में मेरे पास लालू की सुपुत्री मिसा भारती वाली डिग्री है... प्रैक्टिकल का कोई अनुभव नहीं - फेल पास तो तब होते जब कभी कोशिश किये होते. अब हम क्या बताते इस मित्र के मित्र को, सोचें कि इसको इसीकी भाषा में समझाना ठीक रहेगा तो हमने कहा – ‘तुम्हारे प्लांट्स ओबेसिटी से मर रहे हैं. वो ठहरे.. जंगल में रहने वाले जीव. वाइल्ड. यु नो. उन्हें मिनरल वाटर और प्लांट फ़ूड खिलाओगे तो फिट कैसे रहेंगे’.

 उन्हें ये बात तुरत समझ आ गई. पर ‘जीव’ वो सुन नहीं पाए. पौधे जीव हैं. जीवन - पूरा जीवन चक्र होता है पौधों का. अगर कुछ दिन पानी न दीजिये तो देखिये वो कैसे जीने के लिए छटपटा कर परिवर्तत होते हैं. जीजिविषा से भरपूर ! सूर्य की तरफ झुके... और यदि टमाटर के पौधे को कुछ दिन पानी नहीं मिला तो फटाफट फल लग कर पक जाता है. धीरे धीरे होने वाली प्रक्रिया त्वरित हो जाती है क्योंकि उन्हें लगता है कि अब जीवन समाप्त होने वाला है अपने गुणसूत्र संचित करते चलें – वनस्पति शास्त्र ! यदि पौधे सूखने लगें तो थोडा तो सोचो कि क्या कारण हो सकता है. पानी ज्यादा है तो कम डालो. अगर जडें ज्यादा हो गयी हो तो बड़े गमले में ट्रांसफर कर दो. मत्स्यावतार की तरह बढाते जाओ गमलों का आकार.

पर यदि आप ऐसे व्यक्ति है जो खुद कुछ ठीक करने के पहले कस्टमर केयर को फ़ोन करते हैं तो आपसे पौधे क्या ही लगेंगे. हम उस वर्ग के जो यहाँ टूलबॉक्स खरीद के ले आये और निराशा होती है कि इस देश में कुछ खराब होने जैसा है ही नहीं जिसे खोल खाल के थोडा कसा जाता! कहानी का असर नहीं होता तो कह देते कि बावन बीघा में पुदीना उगता है हमारे घर ये गमलों में उगाना कौन सी बड़ी बात है लेकिन हम ऐसा कभी नहीं कहेंगे. 😊


 पौधे जीव हैं. और जीव के प्रति ...पौधों को जीव समझिये बस लग जायेंगे. और हाँ फर्जी एक्सपर्टई से बचिए.

 किसी ने कह दिया ‘ये तो बात करता है अपने पौधों से.. प्यार से रखता है.’ कथा दिमाग में आई और मैंने तुरत रोका बस-बस. यदि आपको शौक है तो लगाइए. हाथ अच्छा-बुरा नहीं होता.. पौधों में जीजिविषा होती है. वो खुद लगते हैं. (नहीं लगे तो ऊपर वाली कथा का पांच बार जाप कीजिये.)

 हमारे घर के पास ही एक सप्ताहांत किसी ने मुफ्त में ढेर सारी किताबें रखी थी (होते हैं भले लोग) उनमें से एक उठाकर ले आया. पूरी किताब में जीने की कला जैसी कुछ बात थी. पर हाय रे फर्स्ट वर्ल्ड. उसमें जो बातें लिखी थी... ऐसी थी - एक दिन गाना गाओ, एक दिन दूर तक पैदल चलो, एक दिन एकांत में जाकर चिल्लाओ, पौधे लगाओ, किसी मशीन को खोलो और उसे वापस कस दो, मिटटी खोदो और उसमें लेट जाओ, पेंटिंग बनाओ... माने कुल मिला के उसमें ये था कि आदमी इतना न सुकून की जिंदगी जीने लगा है कि जीना ही छोड़ दिया है. लेकिन पढ़ते हुए ये भी लगा कि ये सब तो वैसे ही होता है रोज जिंदगी में.. और जो ऐसा नहीं है या जिसे ये सब भी सिखाना पड़ रहा है... वो यदि ये सब करने भी लगे तो वो पगलेट जैसा ही तो दिखेगा. उसे इन बातों में जो आनंद आता है वो करने से भी न मिले शायद. किताब ‘पीड़ित रे अति सुख से !’ लोगों के लिए थी. उन्हें ये याद दिलाने के लिए कि जिंदगी ऐसी ही होती है ...जैसी होती है.  बस वैसे मत बन जाइये.

 जीवन अपना रास्ता खोज लेता है... वही जीवन, वही जीजिविषा - जो आपमें है ! वही पौधों में भी होती है... या कोई भी काम कीजिये. मन से कीजिये. लहलहाएंगे पौधों की तरह ही. आपको आनंद आएगा हर उस काम में. लेकिन कथा जरूर ध्यान में रखियेगा नहीं तो...

और  अंत में कुछ तस्वीरें. ये कैसे लगे मत पूछियेगा.  वैसे उत्तर तो आपको पता ही है – प्रभु की इच्छा !

हरी ॐ तत्सत ! 😊





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~Abhishek Ojha~

Aug 11, 2018

मेंटल (पटना २२)


चाय की दुकान पर आना जाना होने से धीरे-धीरे दो चार अजनबी लोग भी चेहरे से जानने लगे थे और उन्हीं में से एक सज्जन ने एक दिन हमें निमंत्रण दे दिया - 'आप भी आईयेगा'। यूँ तो मैं जानने वालों के यहाँ भी निमंत्रण पर नहीं जाता पर जिन लोगों के साथ ‘ज्वाइंट निमंत्रण’ मिला था वो खीँच कर ले गए. जॉइंट निमंत्रण जैसे स्विस जर्मन में अनजान लोग मिलें तो उन्हें ‘ग्रुएत्सी’ कहकर अभिवादन करते हैं और एक से ज्यादा हों तो सामूहिक ‘ग्रुएत्सी मितेनांत’ कह देते हैं. वैसे ही ‘निमंत्रण मितेनांत’ जैसा कुछ था ये. तो ‘मितेनांत’ लोगों के साथ मैं भी चला गया। अवसर था बड्डे पार्टी-कम-सत्यनारायण कथा. और आप समझ ही गए होंगे कि साथ जाने वाले चार लोगों में एक बीरेंदर उर्फ़ बैरीकूल भी था।

 हम पहुंचे पौ बंद होने के समय (पौ फटने के विपरीत वाले समय) - गोधुली का समय। मेरी उम्मीद से कहीं ज्यादा लोग आए थे. महानगर का टैग होने के बाद भी है तो पटना ही. बच्चो को डिस्काउंट न करें तो कुल पचास से अधिक प्राणी तो होंगे ही. फूल-झालर भी लगा था. हम जहाँ खड़े थे वहां थोड़ी देर पहले ही पानी छिड़का गया था जिससे धुल की सोंधी गंध अभी भी उठ रही थी और बच्चे उछल कूद कर रहे थे.  कुल मिलाकर व्यवस्था टंच थी. ऐसे अवसर पर मुझ जैसे लगभग असामाजिक व्यक्ति की थोड़ी देर इधर उधर मुस्कुराने के बाद 'अब क्या करें' की अवस्था हो जाती है. पर ‘मितेनांत’ समूह के दो चार लोग थे तो माहौल इस स्तर पर नहीं जा पाया। इसी बीच किसी को कहते सुना कि जेनेरेटर किये तो थे पर आया नहीं और लाइन का क्या भरोसा? रहा तो रहियो जाएगा और गया तो कोई भरोसा नहीं ! सिलेन्डर में गैस तो है लेकिन ‘मेंटल’ नहीं है। किसी को भेज कर ‘मेंटल’ मंगा लेने की बात हुई। किसी ने अपनी मोटर साइकिल ऑफर की और एक लड़का लपक के तैयार हो गया। ‘मेंटल’ माने वही पंचलाईट में लगने वाली जाली जो जल कर गोल हो जाने के बाद दुधिया रौशनी करती थी. किरोसिन वाले पंचलैट की जगह अब एलपीजी से चलने वाले गैस पर मेंटल बाँधा जाता है. किरोसीन वाला पंचलाईट जलाना एक कला थी पिन, पम्प से हवा भरना और फूंक फूंक कर रौशनी लाना (पंचलाईट रेणुजी की प्रसिद्ध कहानी है आपने नहीं पढ़ी तो ‘पिलिच’ यहीं से क्लिक-टर्न लेकर पढ़ आइये! वही जिसमें गोधन मुनरी को देखकर सलम-सलम वाला सलीमा का गीत गाता था.)


हड़बड़ी में जा रहे उस लड़के को बीरेंदर ने बुलाया - 'अबे, इधर आ। किधर? इतना जोश में? सिंघासन खाली करो वाला पोज में?'

'अरे भईया. सब कामे अइसा कर देता है। रुकिए लेके आने दीजिये त बतियाते हैं लाइन कट गया त अंधेरा हो जाएगा। मेंटल लाने जा रहे हैं' - बाइक की चाबी हाथ में थी इसलिए ज्यादा उत्सुक था या सच में उसे चिंता थी ये समझना थोड़ा मुश्किल था। उम्र से १४-१५ साल, हाई-स्कूल का विद्यार्थी रहा होगा. पर बाइक चलाने की कोई उम्र-लायसेंस वगैरह तो होती नहीं. उसके नाटकीय भाव से ज़िम्मेदारी जरूर ऐसे टपक रही थी जैसे एक्सट्रा चीज – फ़ालतू। एक हाथ से कपार खुजाते और दुसरे में चाभी फंसाए... मुद्रा उसके उम्र से कहीं ज्यादा गंभीर थी। ( ‘एक्स्ट्रा चीज’ से एक और बात याद आई – बीरेंदर बोला था – ‘अरे महाराज पिज्जा के पागलपन का क्या कहियेगा. मोटा लिट्टा सेंक के उसके ऊपर पियाज छिड़क देता है – लिट्टा भी अधपका आ उसके ऊपर का पियाज भी. आ आदमी सब पांच सौ – हजार रुपया देके लूट लूट के खाता है?! आ जिसको अच्छा नहीं लगता है वो भी बोले कैसे? गंवार घोषित होने का रिक्स है तो सब यही बोलता है कि मजा आ गया! माने अब क्या कहियेगा रोटला के ऊपर रबड़ जैसा चीज और आधा भूंजा पियाज ! ऊपर से अच्छा नहीं लगे तब भी आदमी पैसा देकर भी अच्छा कहता है.’)

'मेंटल? मेंटल तो हमरे पास ही है एक ठो। केतना चाहिए?' बीरेंदर ने पूछा। 'आ स्टाइल थोड़ा कम कर। कुल वजन मात्र एक पौवा के हिसाब से ढेर भारी लग रहा है तोर सीरियसनेस'

'आप भी न भईया, दीजिये न है त... हमको कौन सा सौक है जाने का' लड़के ने झिझकते हुए कहा।

'एक मिनट रुक बुलाते हैं, इधरे त थी अभी।'

'का भैया आप भी ! ई मज़ाक का टाइम है?'

'अरे मेंटले न चाहिए था तुमको? दिलाते हैं।'

वो लड़का झिड़क कर निकल गया। ये 'मेंटल' तब समझ आया जब बीरेंदर ने अपनी दोस्त का परिचय कराया - 'भईया मिलिये हमारी दोस्त से - मेंटल !'

“जानते हैं भैया हुआ क्या? हम भगवान से मांगे थे मानसिक शांति। आ उ का हुआ कि अङ्ग्रेज़ी-हिन्दी का चक्कर में थोड़ा गरबरा गया। हमारा उच्चारन भी तो वही है तो भगवानजी हमको ‘मेंटल पीस’ का जगह एक ठो 'मेंटल पीस' दे दिये।"

 मेंटल बोली - 'मारेंगे न रे तुमको चोट्टा। हम केतनों त चोट्टा से ठीके है।'

'चलो ठीक है लेकिन ये ठेप्पी-ड्रेस काहे पहनी हो तुम?’ बीरेंदर ने मेंटल से पूछा. मेंटल का ड्रेस दोनों कंधो पर गोल कटा हुआ था.

‘ठेप्पी?’ मैंने और मेंटल दोनों ने एक साथ बीरेंदर को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.

‘अरे ठेप्पी माने... नहीं समझे? कहाँ से सब अंग्रेज हो गया है मेरा दोस्त सब भी. ठेप्पी माने - सैम्पल. कभी तरबूज खरीदे हैं कि नहीं? माने ऐसे घुर रहे है जैसे लैटिन-उयटिन का कोई शब्द बोल दिए हम. तरबूज बेचने वाला सब ठेप्पी मार के एक ठो छोटा सा पीस निकाल के दिखाता है. वैसा ही लग रहा है कि दरजी यहाँ काट के ठेप्पी निकाल दिया है. माने पूरे कटा हुआ होता तो बात अलग था. पूरा होता तब भी. ये बीच में ठेप्पी मारा हुआ ही तो है. ये आईडिया हम बता रहे हैं वहीँ से आया है दरजी को.’

‘तुमको फैशन का समझ तो है नहीं. तो तुम चुप्पे रहो. दरजी से कौन सिलवाता है कपडा आजकल’ मेंटल ने बुरा नहीं मानते हुए कहा.

‘अरे वही फैसन डिजाइनर भी दर्जिये तो हुआ. और अब हमको फैसन का समझ कहाँ से होगा... हमारे लिए तो फैसन ये था कि होली, दिवाली पर सारा भाई बैंड पार्टी लगते थे. एक्के थान में से काट के सबका शर्ट सिलाता था. हमको फैसन से वही याद आता है. और नया सिलाता भी था होलीये-दिवाली पर. एक्के दिन एक्के साथ सब भाई पहन एके शर्ट पहन लेते. क्या बताएं बाहर निकलने में भी सरम आता था’ बीरेंदर ने अपने बचपन के फैशन में शर्मिंदा होने की बात की और बात घुमा फिरा के पार्टी पर आ गयी.

मैंने कहा – ‘बहुत लोग आये हैं बड्डे के हिसाब से.’

‘हाँ तो आयेंगे ही. लड़के का जन्मदिन है. अन्तिमा नाम की बहन के बाद वाले भाई का’ बीरेंदर बोला और मेंटल थोड़ी गंभीर हुई.
‘मतलब?’
‘मतलब ये कि... शो स्टोपर.’
‘अब तो कौन ही फर्क कर्ता है लड़का-लड़की में’
‘लड़का-लड़की में फर्क नहीं करता है मत कहिये. डायलोग मारने में फर्क नहीं करता है कहिये. यहाँ सब डैलोगे मारते हैं कि हम अपनी बेटियों को बेटों की तरह ही रखे हैं लेकिन कभी बेटियों से बात कीजिये तो पता चलेगा. पर भईया उसीमें लड़ के, डूब के करने वाली जुझारू लडकियां हैं तो.. मेंटले को देखिये. हमेशा से तेज ! कोलम्बिया गयी थी अभी. हमको तो नक्सा में भी नहीं मालूम था कि कौन देस है !’

‘बस-बस और कुछ बोला न रे चोट्टा तो यही मारेंगे.’ मेंटल बोली.

‘देखिये भईया वो क्या है कि मेंटल दिमाग की तेज. भर-भर के इसको नंबर आता था. आ हमलोग का क्या है कि जेतना मेहनत कर सकते थे किये. जरुरत भर का आ जाता था.’

‘ये गलत बात है तुम खुद का मेहनत करते थे और उसके लिए दिमाग ही तेज था. अरे उसने भी मेहनत किया होगा. और नंबर से सब कुछ थोड़े होता है’

‘आप धर लिए हमको. नहीं... सही बात है.  पर नंबर से कुछ नहीं होता है ये हम कहेंगे तो सोभा नहीं देगा काहेकी हमको उतना नंबर कभी आया नहीं. मेंटल कह सकती है काहे कि उ लायी है तो वो कहे. मेहनत तो बहुत की ही. और आजकल जो एक नया फैसन चला है कि ‘स्क्रू योर मार्क्स’. माने सब खोज खोज के एक्जाम्पल देता है कि फलाने अनपढ़ थे आड्राप आउट थे और आज तीरंदाज हैं... अबे तो एक तीरंदाज हैं तो एक लाख ड्राप आउट पंचर भी तो साटता है? अरे तुमको नहीं पढना है कोई बात नहीं लेकिन पढाई को ही खराब नहीं कहना चहिये. और सब साला जेतना लफुआ सब है... उ जूस वाले मिसिर चाचा बताते हैं कि फेल होने के बाद उ सबेरे से ही दिन भर पता लगाने निकल जाते थे कि और कौन कौन फेल हुआ है. वही आजकल इन्टरनेट पर होने लगा है सब ड्राप आउट का फोटो ढूंढ के सब कोट लगाता है कि स्क्रू योर मार्क्स. अरे भाई जो मेहनत करके ला रहा है उसकी बेइज्जती तो मत करो. नंबर नहीं आया तो नंबरे को बुरा कह दो ? हम ये काम कम से कम नहीं करते हैं भईया. इ सब साला आतंकवादी जमात हो गया है आजकल नंबर नहीं आया तो पूरा दुनिए को दोष दे देगा खाली अपने को छोड़कर कि खुद पढाई नहीं किया. खैर... सही भी है आंकड़ा भी तो बनना चाहिए. ये नहीं गया अभी मेंटल लाने उ आंकड़े परसाद है. ५ प्रतिशत का सिलेक्शन होता है त ९०% आंकड़ा बनने के लिए भी तो कोई चाहिए न. आंकड़ा परसाद लोगों का भी महत्तव कम नहीं है'


'तुम्हे स्क्रू योर मार्क्स वाले से दिक्कत है कि मेंटल का बड़ाई कर रहे हो’ मैंने पूछा.

‘अरे भईया, आप भी न. हम तो स्क्रू शब्द का मतलब भी स्क्रू-पिलास-नट-बोल्ट ही समझते थे तो ये सब मन्त्र बोलते भी क्या! थप्पडिया और दिए जाते थे बात बिना बात. स्क्रू से याद आया एक बार सुने थे एक चाचा को बोलते हुए कि गुप्ताजी के लड़का अंग्रेजी मीडियम में पढता है उसके पास जो जेस्चर है ! क्या अंग्रेजी बोलता है गुड मार्निंग, गुड इवनिंग करता है.. हम सुने त अपने लंगोटिया यार सब का मंडली में अलगे दिन बोले कि बेट्टा कहीं से जुगाड़ लगाओ जेस्चर का. जब तक जेस्चर नहीं मिलेगा ऐसे ही थुराते रहेंगे हम लोग. हमको पता लगा है कि गुप्तवा के पास है जेस्चर. बहुत दिन तक फेरा में रहे कि कहीं से जेस्चर मिल जाए. किस दुकान में मिलता है पकड़ नहीं पाए ! हमको इतना त अंग्रेजी आता था. हम क्या स्क्रू, फक और शिट वाला मंतर पढ़ते. वैसे अच्छा था थप्पडियाए गए तभी त सीखे कि जो हर बात में दुसरे को ही गलत घोषित कर दे उ आदमी एक दम फर्जी उससे दुई लट्ठा का दूरी बना के चलना चाहिए !’

‘अरे चलिए शंख बज रहा है चलते हैं नहीं तो सब कहेगा कि खाली खाने आये थे. परसाद बटेंगा अब. केक उक भी कटाएगा लगता है. हमलोग का तो ऐसा था कि पूड़ी-खीर और सीजन में पड़ता है जन्म दिन त आम मिलता था बड्डे पर.’

‘केक के बिना बड्डे कैसे होता है?’ मेंटल ने पूछा.

‘देखिये अब यहीं मार खा गया न पटना. माने केक नहीं काटेंगे तो बड्डे क्या कहेगा कि हम नहीं होंगे?  कैसे होता है मतलब क्या ! हो जाता है बस. नहीं होता तो हम आज तक एक्के बरस के होते? माने गजब है अब कैसे समझायें कि कैसे हो जाएगा बड्डे बिना केक के’ बीरंदर ने कहा. ‘किसी वैज्ञानिक से पूछना पड़ेगा.’

‘बस बस हो गया’ मैंने बीच बचाव किया. प्लेट में परसाद मिला और साथ में छोटे से प्लास्टिक के कप में चरणामृत.

‘संतृप्त घोल बना दिया है’ बीरेंदर ने बोला.

‘अब इसमें कौन सा खुराफात सुझा तुमको? जब देखो बकर-बकर. चैन नहीं रहता है तुमको नहीं? जीभ में चक्कर है तुम्हारा हम बता रहे हैं’ मेंटल ने कहा.

‘अरे माने इतना न मीठा है. हमलोग हिंदी में केमेस्ट्री पढ़े थे त उसमें मिश्रण वाला अध्याय में एक ठो होता था कुछ संतृप्त घोल. माने पानी में इतना चीनी हो जाए कि उसके बाद और घुलने का जगह नहीं बचे. तो ये ‘चनैमृत’ वही वाला चीज है – संतृप्त घोल.’

 चरणामृत प्लास्टिक के कम में मिला था तो उसके लिए भी बीरेंदर बोल उठा – ‘इ बढ़िया हिसाब है हाथ नहीं धोना पड़ेगा. हम जो पूजा देखे हैं उसका तो पूरा बजटवे कप का खर्चा भर का होता है’

थोड़ी देर बाद हमने निर्णय लिया कि अब शकल तो दिखा ही दी है... अब वहां से निकल लिया जाय और बिस्कोमान भवन पहुँच के डोसा दबाया जाय.

जब चलने लगे तो बीरेंदर बोला – ऐ मेंटल, तुम्हारा ड्रेस तो ठेप्पी से प्रेरित था. वो देखो उ जो पहनी है उ बला ड्रेस बनाने के लिए मच्छरदानी से प्रेरित हुआ होगा फैसन डिजाइनर.’

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~Abhishek Ojha~

Nov 4, 2017

सीट नं ६३


बनारस से बलिया जितना पास है जाने के पहले उतना ही ज्यादा सोचना पड़ता है  - व्युत्क्रमानुपात में. इतनी कम दुरी है कि यात्रा तो सड़क से ही करनी चाहिए। ..पर सड़क से की गयी यात्राओं का इतिहास कुछ ऐसा विकट घनघोर रहा होगा कि कोई उसकी बात भी नहीं करता - जाना तो दूर की बात है. और रेल यात्रा का तो ऐसा है कि आपको भी पता ही होगा - सिंगल लाइन,  टाइमिंग , क्रॉसिंग नहीं होनी चाहिए. चेन पूलिंग। यानि बनारस से बलिया जाने वाले प्रॉब्लम की बॉउंड्री कंडीशंस ही इतनी है कि फीजिबल सोल्यूशन बहुत कम हो जाता हैं. (ऑप्टिमाईज़ेशन  की भाषा में उपमा लिखना कितना तो सरल है). जिस दिन अमेरिका से दिल्ली तक आने के लिए जितना सोचना पड़ता है उससे कम या उतना बनारस से बलिया जाने के लिए सोचना पड़े उस दिन मैं तो पूर्वी उत्तर प्रदेश को विकसित घोषित कर दूंगा. भूमिका ख़त्म.

भूमिकोपरांत ब्लॉग के पाठक को मालूम हो कि पिछले दिनों हमें बनारस से बलिया जाना था. शुभचिंतकों से पता चला कि एक नयी-नवेली-बहुत-अच्छी ट्रेन चली है. सुबह सुबह मिल जाए तो तीन घंटा में बलिया लगा देती है. शोध करने के बाद बचे एक ही विकल्प में से उसे ही चुन लिया गया। उसके बाद अनुभवी लोगों की सीख - 'बनारस से बलिया के लिए रिजर्वेशन कौन कराता है? - बौराह' को न मानते हुए (या मानते हुए भी हो सकता है - बौराह वाला पार्ट) हम वो भी करा लिए.

ट्रेन उस दिन एकदम से राइट टाइम थी सो आधे घंटे की देरी से प्लेटफ़ॉर्म पर आ गयी. असुविधा से होने वाले खेद की नौबत भी नहीं आयी। आती तो हमारी पहले से योजना थी बाहर चाय पीने जाकर उसे सुविधा बनाने की। एक बार बनारस में कुल्हड़ में चाय पीए थे वो 'मोमेंट' दोहरा आते। ख़ैर... हम अंदर गए तो कोच में घमासान मचा था. एक लड़का सीट नंबर ६३ पर पहले से सो रहा था. एक सज्जन बोल रहे थे कि उनका रिजर्वेशन है लेकिन लग रहा है कि बैठने को जगह भी नहीं मिलेगी. एक अन्य सज्जन पर्ची पर नीले रंग की स्याही (स्याही को स्याही मत समझना, रिफ़िल वाली - बॉल पॉइंट पेन से  लिखे थे) से एक के नीचे एक पाँच लिखे नंबर (जैसे बनिए के दूकान से सामान लाने के लिए लिस्ट लिखी गयी हो) देखकर बोल रहे थे - 'पांड़ेजी बैठिये न हटा के. तिरसठ, चौसठ, इक्यावन, बावन और पचपन अपना बर्थ है'. पर्ची लहराते हुए पांडे जी के मित्र युद्ध स्तर पर सीटों पर क़ब्ज़ा कर रहे थे।

हम सोच में पड़े थे कि ६३ नम्बर सीट तो ईमेल, एसेमेस वग़ैरह के हिसाब से रेलवे ने हमको भी ऐलॉट किया है  तभी एक नौजवान आया और सीट पर लेटे हुए लड़के से बोला - 'हम  नीचे गए थे पानी पीने तो आप लेट गए ? हमारा रिजर्वेशन है। उठिए'.

लड़का लेटे लेटे बोला - 'हम जौनपुर से सोते हुए आ रहे हैं और आपका रिजर्वेशन है? कम झूठ बोला कीजिए महाराज'
मुझे  देखकर पैर मोड़ते हुए बोला - 'बैठ जाइए। सबके पास चालुए टिकट है'. या तो लड़के को लगा कि एक यही है जिसने अभी तक सीट पर दावा नहीं ठोका। या समझ आ गया होगा कि ज़रूर इसी के पास टिकट है। मिला लेने में ही फ़ायदा है - अनुभव भी तो कोई चीज़ होती है!

ऐसा नहीं है कि हमने ये सब कभी देखा नहीं है। पर ये पर्ची वाला नया कॉन्सेप्ट था। बिलकुल नया।

हम एहसान में मिली जगह पर बैठ गए. जो पानी लेने उतरे थे वो भी खिसका के बैठ लिए। पर्ची वाले सज्जन को अभी भी एक सीट कम पड़ रही थी। उनका फ़रमान था 'हमारा सीट है कम से कम बैठने तो दीजिए'.
लड़के ने बोला - 'आपका सीट  कैसे हो गया? टिकट दिखाइए हम हट जाएंगे.'
'टिकट हम आपको क्यों दिखाएं ? टीटी आएगा तो दिखाएँगे'.
'टीटी आएगा और बोलेगा तो हम भी हट जाएंगे ! टीटीये लिख के दिया है क्या आपको सीट नम्बर? या ख़ुद ही लिख लिए हैं? पर्ची पर लिख लेने से सीट आपका हो जाएगा?' पर्ची की महिमा से वो अपने मित्र पांडेजी को सपरिवार तो बैठा चुके थे लेकिन इस तर्क पर अंतिम सीट उन्होंने छोड़ दिया। उन्हें लगा होगा कि कट लेने में ही भलाई है। 'क्या मुँह लगा जाय' वाला लूक देकर वो कट लिए। फ़िलहाल हम भी अपने सीट पर बैठ ही गए थे। जौनपुर से लेटकर आ रहा लड़का भी उठकर बैठ गया और जो पानी लेने उतरे थे उनका भी सीट पर दूसरी तरफ़ क़ब्ज़ा हो ही गया था। क़ब्ज़े के अवैध होने की बात नहीं थी क्योंकि जब हमने अंततः दिखाया कि टिकट हमारे पास है तो बात ये हो गयी कि दिन का रिज़र्वेशन होता ही नहीं है ! लेकिन मत ये भी था कि भाई जिसने नासमझी में दिन का रिज़र्वेशन करा लिया है तो उसको बैठने को तो मिलना चाहिए ...और वो हमें मिल ही गया था। तो सब कुछ जैसा होना चाहिए वैसा ही हो गया था। आगे कुछ कहने सुनने को बचा नहीं।


इन सबके परे हमें एक चीज़ बहुत अच्छी लगी। इस रूट (की सभी लाइनें व्यस्त होने वाली बात नहीं है बिना पूरी बात पढ़े कंक्लूड मत कीजिए) पर मैं उस उम्र से चल रहा हूँ जब इस इलाक़े में बहुत अभाव था। ग़रीबी थी। घनघोर। (अभी भी है पर... ) तब लोग झोले-बोरे में समान लेकर चलते। कपड़े इतने झकाझक साफ़ नहीं पहनते। अब सबके हाथ में स्मार्ट फ़ोन और सबके पास बैग। खिड़की से बाहर देखने पर साइकिल की जगह मोटरसाइकिलें। जीवन स्तर में  परिवर्तन के लिए किसी इंडेक्स को देखने की ज़रूरत नहीं होती। (इसे राजनीति से जोड़कर मत पढ़िए, व्यक्तिगत अनुभव है। और वो इलाक़ा वैसे ही धीमी गति का है। फ़टाक से कुछ भी कंक्लूड मत कीजिए)। वैसे इलाक़े का तो ये भी है कि स्वच्छ भारत में सरकार ने जब शौचालय बनवा के दिया तो लोगों ने अपने घरों के सामने स्ट्रेटजिक लोकेशन पर बनवाया ताकि उसमें गोईंठा वग़ैरह रखा जा सके!

खैर... हमारे पास बात करने की कमी तो होती नहीं है तो बातों बातों में पता चला युसुफ़पुर (ज़िला ग़ाज़ीपुर) आ रहा है. कहने का मतलब कि ट्रेन युसुफपुर पहुँच रही थी युसुफपुर तो जहाँ है वहीँ रहेगा. आये तो टीटी साहब... बहुत कम सीटें थी जिनपर वैध टिकट वाले लोग थे तो अपने हिसाब से स्ट्रेटजिक लोकेशन देखकर बैठ गए वो भी सीट  नंबर ६३ पर ...एडजस्ट कर-करा के.

'टिकट बनवाएंगे कि किराया देंगे?' उद्घोषणा के साथ. किसी से टिकट मांगने की जरुरत नहीं समझी उन्होंने. उनका तो ये सब रोज का था. केवल कहने को नहीं ...सच में रोज का. चोरी अकेले की हो तो चोरी होती होगी - सामूहिक थी तो मामला ध्वनिमत से ही पारित होना था. जैसा अक्सर होता है यहाँ भी चोरी चोरी नहीं मज़बूरी थी. पर्ची वाले सज्जन ने कहा - 'देखिये अब जनरल में जाना तो संभव ही नहीं था ऊपर से परिवार साथ है तो कुछ कर नहीं सकते थे.'

'सही बात है. उसकी तो गुंजाइस ही नहीं है. चलिए कुछ दे दीजिये।'  टीटी  ने सहमत होते हुए कहा। मुझे लगा ये कुछ दे दीजिये क्या होता है? एकदम लूजूर-पुजूर टीटी। ये भी नया ही था थोड़ा. ऐसे थोड़े कोई मांगता है - माने श्रद्धा से कुछ दे दीजिये ! खैर.. रेल मंत्रालय ने अटेंडेंट को तो 'नो टिप प्लीज'  की वर्दी पहना दी पहले टीटी को ही पहना देते ! जौनपुर से आ रहा होनहार लड़का अपना बैग ठीक करते हुए खड़ा हुआ - 'हमारा तो स्टेशन आ गया... बाकी आप लोग तो पढ़े लिखे लोग हैं. समझदार हैं. देख लीजिये. कुछ न कुछ हिसाब बैठ ही जाएगा.'

'पढ़े लिखे होने' की ऐसे याद दिला गया जैसे चिंतामग्न बानरों से जामवंत के रोल में कह रहा हो- 'स्टेशन अयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार' और निकल लिया।

इसी बीच किसी के फ़ोन पर 'कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया' बजा तो कन्फर्म हुआ गाड़ी  सही रूट पर ही है। श्रद्धानुसार बिना किसी झंझट कुछ कुछ लोगों ने टीटीजी को चढ़ावा दिया। ट्रेन रुकी - युसुफ़पुर।

चाय-गरम चाय वाले से मैंने पूछा तो बोला - 'दस रुपए'। खुदा क़सम एक बात झूठ नहीं लिख रहे हैं ...दस रुपया सुनकर हमें लगा महँगाई बहुत बढ़ गयी है (खुदा क़सम का ऐसा है कि एक दोस्त बचपन में झट से 'खुदा क़सम' बोल देता। एक दिन अकेले में राज की बात बताया कि बहुत सोच समझ के उसने फ़ाइनलाइज किया था कि झूठ बोलने में विद्या क़सम खाने का रिस्क नहीं ले सकते, माँ क़सम का भी नहीं। भगवान क़सम में भी रिस्क तो है ही। खुदा कसम में कोई रिस्क नहीं। विभागे अलग है ! गणित विभाग के विद्यार्थी को इतिहास विभाग के शिक्षक से क्या रिस्क।) दस रुपया? युसुफ़पुर में? हमने चाय नहीं पी। जीवन स्तर-वस्त्र सब तो ठीक है लेकिन युसुफ़पुर में दस रुपए की चाय? वैसे युसुफ़पुर अगर कोई इंसान होता तो लड़ पड़ता - क्यों भाई ? हमारे यहाँ की चाय दस रूपये की क्यों नहीं हो सकती ! डिस्क्रिमिनेशन का इल्जाम लग जाता सो अलग ! खैर... चाय के तो हम वैसे भी बहुत शौक़ीन नहीं पर कुछ बातें समझ सी आ गयी। ...कि कैसे जब सुना था किसी को कहते हुए कि 'चार आना पौवा, पेट भरौवा’ जलेबी मिला करती थी। बात याद रह गयी थी बात का मर्म थोड़ा सा ही सही ..समझ अब आया। या कि कैसे कोई सब्ज़ी लेकर आता और उनके बूढ़े पिताजी पूछते कि सब्ज़ी कितने की मिली तो २० रुपए किलो के लिए भी कहते 'बाबूजी २ रुपए किलो’. या फिर अभी हाल में पढ़ा ये ट्वीट। दो रुपए तक की चाय तो हमने भी इस रूट पर बिकते देखा है।

हरे भरे खेतों के बीच से गुज़रते हुए एक जगह रेलवे लाइन के समांतर एक कतार में खड़े कई ट्रक दिखे। ड्राइवर-खलासी खाना बनाने की तैयारी कर रहे थे। आटा गुँथते, सब्ज़ी काटते, एक अरसे बाद किसी को स्टोव (जिसे एक उम्र तक हम 'स्टोप' सुना करते) में हवा भरते देखा! एक ट्रक पर पूनम, सोनी, अजय समेत पाँच नाम लिखे थे। लगा जैसे 'ट्रान्स्पोर्ट कम्पनी' (जैसा हर ट्रक पर लिखा हुआ था - यादव ट्रान्सपोर्ट कम्पनी वग़ैरह) के सीईओ को एक ही ट्रक पर पाँच नाम किसी मजबूरी में ज़बरन घुसाने पड़ गए थे। एक ट्रक पर तुलसी बाबा की चौपाई लिखी थी - 'चलत बिमान कोलाहल होई, जय रघुबीर कहई सबु कोई'। ड्राइवर के बैठने की जगह पायलट लिखने से बहुत ऊँचे स्तर की चीज़ थी ये। कुछ चीज़ें देखकर बिना किसी कारण ही अच्छा लगता है। चलती ट्रेन से ये एक झलक भी वैसा ही था। तुलसी बाबा की उड़ते हुए विमान में कोलाहल होने की दृष्टि भी और उसका ट्रक पर लिखा होना दोनों - स्वीट, क्यूट जैसा.


वैसे तो हमें थोड़ा और आगे तक जाना था लेकिन बलिया स्टेशन आया तो हम उतर गए। एक्सप्रेस ट्रेन छोटे स्टेशनों पर रूकती नहीं और ऊपर से रविवार का दिन। ..नहीं तो 'पढ़ने वाले लड़के' ट्रेन रोक ही देते। इस इलाक़े में पढ़ने वाले लड़के आज भी गुणी होते हैं - 'बलिया ज़िला घर बा त कौन बात के डर बा’ परम्परा के वाहक । चेन, वैक्यूम वग़ैरह खींच-काट के ट्रेन रोकने में सिद्धहस्त। (वैक्यूम कैसे कट जाता है पता नहीं  - बस सुना है) लेकिन ऐसा नहीं होता तो छपरा तक चले जाने का ‘रिक्स’ था तो ‘हम तो कहेंगे कि चलिए बीच में कहीं ना कहीं तो ज़रूर रुकेगी’ के आश्वासन के बाद भी हम उतर गए।

 स्टेशन से बाहर निकलते ही एक लड़का आया - 'भैया, गाड़ी होगा?'

हमने बात करने में रूचि दिखाई तो दो और आ गए। मैंने मन में जोड़ घटाव किया और बताया कि किलोमीटर के हिसाब से पैसे कुछ ज़्यादा हैं। मैं भोजपुरी में बात कर रहा था लड़का हिंदी में !

'हाँ भैया, ओला उबर सब किलोमीटर का हिसाब कर दिया है शहर में लेकिन यहाँ हमलोग को पोसाता नहीं है'। गाड़ी की बात छोड़कर मैंने पहले एक गम्भीर सवाल पूछ लिया - 'ए भाई, बलियो में हिंदी बोलाए लागी त भोजपुरिया कहाँ बोलायी?' लड़का झेंप गया पर बात हिंदी में ही करता रहा। इसी बीच एक दूसरा राज़ी हो गया चलिए हम ले चलेंगे। कॉम्पटिशन का फ़ायदा ! ये दुनिया में हर जगह काम कर जाता है। मोर्गन स्टैन्ली और गोल्ड्मन सैक्स के इग्ज़ेक्युटिव्ज़ से मीटिंग में कह दीजिए कि ' योर रेट ईज़ नॉट कम्पेटिटिव। कंपटिटर्स आर गिविंग अस बेटर रेट' या ज़िला बलिया के गाड़ी वाले हों। मामला कम्पेटिटिव रेट की बात हो जाने पर अपने आप सही रेट पर कन्वर्ज कर जाता है। सामने वाला का टोन  ही बदल जाता है. जय हो कम्पटीशन देवता।  थोड़ी दूर खड़ा एक और गाड़ी वाला हमारी बात सुन रहा था। फ़ाइनल होने के बाद वो आया और बोला कि 'भैया हमारी वाली एसी गाड़ी है लेकिन उसमें थोड़ा ज़्यादा लगेगा'। मैंने उसे बताया मैं भीआइपी तो हूँ नहीं, बात नहीं बनती तो बस से जाने का प्लान था। तो बोला - 'भैया, भीआइपी के कौनो बात नइखे। एसिया में तनी ख़र्चा ढेर लागेला'। हमें उसकी ईमानदार बात पसंद आयी। गाड़ी यानी एम्बेसडर। अभी भी हिंद मोटर में काम किए लोगों के नाती-पोतों को नोस्टालज़ियाने का काम बख़ूबी कर रही हैं खंडहर हो चुकी अंबेसडर कारें।

निर्माणाधीन सड़क अपना नाम सार्थक कर रही थी। सड़क के दोनों तरफ़ हर चीज पर धूल की इतनी गहरी परत थी कि - चढ़ै न दूजो रंग. क्या पेड़, पत्ते और क्या दूकान-घर. घुटन के स्तर की धूल। पर पैड़ल रिक्शा की जगह बैटरी रिक्शा देखना उम्मीद से ज्यादा सुखद था. और ये धूल-धक्कड, पीं-पाँ से भरा 'बलिया शहर' (शहर ही कहते हैं लोग! इस बात पर पटना की याद आयी जब बैरीकूल ने कहा था - भैया, जैसे न्यू यॉर्क को एनवायीसी कहते हैं वैसे ही पटना को भी पटना सिटी कहते हैं।) ५ मिनट में निकल गया तब हवा भी मन को चकाचक करने वाली मिली और हरे भरे खेत भी। बीच बीच में इलाक़े का फलता फूलता उद्योग - प्राइवेट स्कूल और ईंट भट्ठे। यहाँ फिर एक बार लगा जैसे भी हुआ हो बदलाव तो हुआ है। जींस पहने, स्कूटी चलाते लड़कियाँ भी दिखी।

लेकिन असली मन वाली बात हुई जब गाना बजा। और जो मुस्कान मेरे चेहरे पर आयी वो खुदा क़सम झूठ नहीं बोल रहे हैं (फिर से !) वैसी मुस्कान पहली बार इश्क़ में बौराए इंसान के चेहरे पर भी नहीं आती। जब हम पढ़ने वाले लड़के (गुणी नहीं थे, ट्रेन व्रेन का चेन नहीं खींचे है) हुआ करते थे उन दिनों टेम्पो, विक्रम, बस वग़ैरह में एक ख़ास क़िस्म के गाने बजते। और उन दिनों दिमाग़ में मेमोरी भी बहुत होती अंट-शंट बातें याद रखने की ...तो हमें कुछ ऐसे धाँसू गानों की प्ले लिस्ट याद हो गयी थी (गाड़ियों में सुन सुन के घर में वो कैसेट नहीं थे)। ए-साइड में किस गाने के बाद कौन गाना बजेगा, बी-साइड में कौन सा। टी-सिरीज़ के गिने चुने तो लोकप्रिय कैसेट थे इस धाँसू श्रेणी के। यूँ तो कैसेट से और बाद में सीडी से भी बजने वाले गानों की आवाज़, सुर और गति का एक अलग ही स्तर होता - टेम्पो के बाजे में जो मोटर जैसा कुछ होता वो कुछ ज्यादा ही गति से चलते । जिसने वो सुना है वही ये वाली बात समझ सकता है! बिन अनुभव किए वो बात नहीं समझ आनी। तो हम आगे लिखने की कोशिश भी नहीं करने जा रहे। पेन ड्राइव से बज रहे गानों को सुन के लगा ... बदलते ज़माने में कुछ तो है जो बचा हुआ है। - वही प्लेलिस्ट. हमारी ना छुप सकने वाली मुस्कान पर लड़के ने गाने का वोल्यूम बढ़ा दिया और उसके बाद अगला गाना मुहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ में जो न गूंजा -

 .... मितवाआSS भुउउउउल न जाना मुझSकोओओ...।


~Abhishek Ojha~