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May 28, 2011

मॉडल बनाम मॉडल

 

लोग भी गजब के स्वयं-विरोधाभासी व्यक्तव्य देते हैं. कई बार मुझे लगता है कि अगर लोगों से बातचीत करना भी गणित के सवालों की तरह होता तो चुपचाप सुनने की जगह एक 'उल्टा टी'* उनके चेहरों पर चिपका कर 'हेंस प्रूव्ड़' कह देता.

इस सप्ताह एक कॉन्फ्रेंस में जाना हुआ. सूट-टाई पहनकर भारी-भारी शब्द फेंकने (मौके की नजाकत देखते हुए फेंकना  बोलने-सुनने से बेहतर शब्द लग रहा  है) वाले लोग. ऐसे कॉन्फ्रेंस में गज़ब का खेल होता है. गंभीर मुद्रा बनाकर भारी-भारी शब्दों को यूं फेंकना होता है कि सामने वाला कुछ रोक ही ना पाये. जब तक कोई एक शब्द रोकने की कोशिश करे अगला फेंक दो. सामने वाला भी थोड़ी देर में डर कर  झुक लेता है: निकाल जाने दो ऊपर से. लेकिन उसके बाद अगर निद्रा देवी  के आशीर्वाद से जो बच गए वो गंभीर मुद्रा तो ऐसी बनाते हैं जैसे सब कुछ समझ रहे हों. मैं तो कहता हूँ कि ऐसे कॉन्फ्रेंसों में इस्तेमाल होने वाले शब्दों के वजन पर भी शोध किया जा सकता है. मुझे लगता है कि अगर इंसानी समझ के लिए शब्दों का औसत वजन 100 ग्राम  हो तो कम से कम औसतन 2 किलो के शब्द तो ऐसे कॉन्फ्रेंस में इस्तेमाल होते ही हैं. मजे की बात तो तब होती है जब लोग उनपर चर्चा भी करते हैं और आपको पता चलता है कि वो जो बोल रहे हैं उसका असली बात से कोई लेना देना ही नही. बिन समझे भी लोग गज़ब के आत्मविश्वास के साथ बोल लेते हैं.

एक सज्जन दो-चार एकाध क्विंटल वजन वाले समीकरण की स्लाइड दिखाने के बाद बोले "10-15 साल पहले क्या ये संभव था कि हम ऐसे तरीकों से चीजों को देख पाते ? हम खरतों को टाल तो नहीं सकते पर हमने उन्हें देखने का नया तरीका निकाला है। और इससे हमें आत्मविश्वास तो मिलेगा ही". अब अपना-अपना नजरिया है. वो होंगे वालस्ट्रीट के डॉन. मैंने तो अपने पड़ोसी से कहा कि क्या हरबार यही भविष्य देख लेने के 'आत्मविश्वास का भ्रम' नहीं डुबा देता है? हमारे कॉन्फ्रेंसीय पड़ोसी जेनेवा से कॉन्फ्रेंस अटेंड करने आये थे. फटाफट मेरी ये बात भी डायरी में लिख डाले. बड़े जोश में डायरी में लिख रहे थे. हमने तो सोचा कि फ्री में एक अच्छी सी डायरी और खूबसूरत कलम मिली है तो कुछ अच्छा उपयोग करेंगे क्यों वजनी समीकरण लिख के बर्बाद करें. वैसे मेरा तो मन ये भी हुआ कि अपने पड़ोसी से पूछ लूं  “ऐसे कांफेरेंस के लिए जब कोई कंपनी जेनेवा से न्यूयोर्क बिजनेस क्लास और फाइव स्टार का बजट निकाल रही है वो क्यों दिवालिया नहीं होगी?” लेकिन इडस्ट्री के मुलभुत सिद्धांतों पर सवाल नहीं उठा सकता Smile 2011-01-27-Traps

मुझे लगता है कि ‘सर्वज्ञ होने के भ्रम से उपजा आत्मविश्वास’ बहुत घातक होता है. जिसे भी लगता है कि मुझे सबकुछ आ गया… वो तो गया काम से. क्या सफल होने के बाद लुढकने वाले अक्सर इसी भ्रम के शिकार नहीं होते? यहाँ मुझे उन महाशय की कही गयी बात में ही विरोधाभास दिखा. फिर जब उन्होंने अपने नए मॉडल की बात की और दिखाया कि कैसे उनका मॉडल उन्ही के पुराने मॉडलों से कई गुना बेहतर है तो मेरा सर चकराया. लोग भी नए वाले से जुड़े सवाल ही पूछ रहे थे. मेरा तो मन हुआ पूछ लूं “मान लिया कि नया वाला बहुत अच्छा है पर ये बताओ कि अब तक क्या मॉडल के नाम पर कचरा बेचते थे?”

ये होता है अपने ही बात में विरोधाभास. अब कुछ लोगों को ज्ञानी होने का ही घमंड होता है. कुछ को संस्कारी होने का. ज्ञानी और संस्कारी के साथ घमंड का सम्बन्ध ! डेडली कॉम्बो नहीं है? वैसे ही है जैसे कोई कह रहा हो कि ‘साले मैं बहुत विनम्र इंसान हूँ, मान लो नहीं तो सर फोड दूँगा !’ सोचिये कोई कह रहा हो  ‘अबे हम तुम्हारे जैसे नहीं हैं. हम विद्वान हैं. चार संस्कृत के श्लोक ठोके और साथ में दो ग्रीक फिलोसोफर के भी ठोक दिए अब हमारी बात मान लो… नहीं तो अब तुम भी ठोक दिए जाओगे.’

एकाध क्विंटल के समीकरण और संस्कृत-ग्रीक की दार्शनिकता सर्वज्ञ होने का भ्रम पैदा करे उससे बेहतर तो अज्ञान बने रहकर और फूंक-फूंक कर कदम रखने में ही बुद्धिमता नहीं है? सुना है जहाँ घर-घर में लोगों को पता है कि भ्रूण हत्या क्या है उन्हीं जगहों पर लिंग अनुपात ठुका हुआ है?

वैसे ही पिछले वीकेंड एक ‘इन्टरनेट मित्र’ मिले. न्यूयोर्क में अपने एक सीनियर के यहाँ रुके हुए थे. मुझ मिले तो अपने सीनियर के बारे में उन्होंने बोलना चालु किया: ‘उसकी वाइफ *** $^$%^…, उसके यहाँ कोई आये तो उसे अच्छा नहीं लगता. &*(& है. ’ मैंने से कहा तो ज्यादा नहीं लेकिन सोचा जरूर कि वो भी अपनी कोई अच्छी इमेज तो नहीं छोड़ गए !

अब ऐसे ही २ टन मेकप और ४ गैलन परफ्यूम में नहाई हुई लड़की किसी और लड़की को दिखाकर कहे कि देखो उसने कितना मेकप किया है, तो ? मैं तो बस गारंटी ले सकता हूँ कि मैं ऐसी लड़की से मिला हूँ और अगर अतिशय परफ्यूम से फेफड़ों को कुछ होता तो मैं आज ये पोस्ट नहीं लिख रहा होता. (गनीमत है मेरे ब्लॉग की बातें उस तक नहीं पंहुचाती और वो तो नहीं ही पहुचेगी यहां तक).

कुछ ऐसे लोगों से मिलना भी हुआ है जिनका ऐश्वर्य और सम्पदा देख कर बड़े अटकलबाज भी उनकी संपत्ति का अंदाजा नहीं लगा सकते. और जब वे ही पूछ लेते हैं कि लोग भ्रष्ट क्यों होते हैं? ऐसा सवाल कि आप को डाउट हो जाए कि ‘भ्रष्ट माने? एक्सक्यूज मी? यू मीन करप्ट?’

जब कोई खर्राटे मार रहा हो और सहसा कहे कि मैं सो नहीं रहा तो फिर भी समझ में आता है. लेकिन अगर कोई आपसे बात करते-करते कहे कि वो पिछले तीन घंटों से नींद में है. तो डाउट तो हो ही जाएगा कि नींद से उसका मतलब क्या है !

कई लोग एक साथ रोते हैं कि तनख्वाह भी कम है और टैक्स भी ज्यादा भरना पड़ रहा है !  फेसबुक और ट्विट्टर पर लोग लिखते हैं कि वो ऑनलाइन नहीं आ पा रहे.

लोगों के खुद की बातों में ही गजब की विसंगति हैं. अरे जब  आपके एक-एक अणु-परमाणु ये साबित कर रहे हैं कि आप आरडीएक्स यानी 1,3,5-Trinitroperhydro-1,3,5-triazine हो तो आप क्यों कहने में लगे हुए हैं कि नहीं मैं फिटकरी यानी potassium aluminum sulfate dodecahydrate हूँ. आप ऐसा कहेंगे तो लोग आपको फिटकरी नहीं माने लेंगे. हाँ ये हो सकता है कि इश्किया फिल्म वाला सल्फेट जरूर मानने लगेंगे Smile

लो ! इस बीच ‘मॉडल बनाम मॉडल’ वाली बात तो रह ही गयी. उस कॉन्फ्रेंस के बाद मॉडल बेचने वाली टीम आई. और फिर एक नयी बात पता चली. वास्तव में मॉडल बेचने के लिए अच्छे मॉडल होने जरूरी हैं. भले वो बिकने वाले मॉडल हों या उन्हें बेचने वाली मॉडल Smile  ऐसा भी हो सकता है कि मीटिंग में आपसे कोई पूछ ना ले कि मॉडल भी देखोगे या मॉडल ही देखते रहोगे?  यहाँ एक मॉडल गणितीय/वित्तीय वाले हैं और दूसरे तो आप भली-भाँती जानते ही हैं. ऐसा ही यमक अलंकार का उदहारण मेरे फेसबुक पर भी इस रूप में है:

All you need is a good 'model' to sell a not so good 'model' Smile

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~Abhishek Ojha~

*’उल्टा टी’: विरोधाभास (कोंट्राडिक्शन) का गणितीय प्रतीक. contradiction_falsum

Apr 12, 2011

निगेटिव साइड

 

बात पिछले साल की है. एक कॉन्फ्रेंस में वालस्ट्रीट के कुछ कंपनियों के एक्जेक्यूटिव चर्चा कर रहे थे. उनमें से एक ने कहा: ‘हमने तो मिलियंस के टॉक्सिक एस्सेट्स अपने कर्मचारियों को बोनस में बाँट दिया. इसके कई फायदे हुए. एक तो कंपनी का कैश बचा, दूसरे टॉक्सिक एस्सेट्स बैलेंस शीट से कम हो गए और तीसरे हमने ये दिखाया कि बैकर्स की गलती थी तो अब वो ही भुगतें. जो उन्होंने जमा किया था वो उन्हीं को दे दिया.’

लोगों ने कुछ नहीं बोला तो वो आगे बोल पड़े: ‘मुझे आश्चर्य हो रहा है कि बाकी बैंकों ने इसका अनुकरण क्यों नहीं किया? ये तो बहुत ही अच्छा उदहारण है. जिसे सभी बैंको को अपनाना चाहिए’. दोनों हाथ में लड्डू की सी बात थी, सभी ने समर्थन किया. थोड़ी देर बाद एक कैनेडियन बैंक के प्रतिनिधि ने कहा: ‘आपकी बात बिलकुल सही है. मुझे बाकी फर्म्स का तो नहीं पता पर मैं हमारी बात कहूँ तो हम ये करना पसंद करते लेकिन मजबूरी ये थी कि हमारे पास मिलियंस के टॉक्सिक एस्सेट्स थे ही नहीं !’. अब बात यहाँ से पलटी मार गयी. जब चोरी की ही नहीं तो अंतरात्मा को जगा के सरेंडर करें भी तो कैसे. और लोग हैं कि कहे जा रहे हैं सरेंडर कर दो !

बैंक्स वाले रिसेसन के बाद २०१० में मीटिंग कर रहे थे तो ये कैसे मान लेते कि कोई ऐसा भी हो सकता है जिसके पास टॉक्सिक एसेट ना हो. अब वैसे ही जैसे आजकल कोई ये कहाँ पूछता है कि पीते हो या नहीं. लोग तो सीधे ‘क्या लोगे’ ही पूछते हैं. वो ये कैसे मान लें कि नहीं पीने वाले लोग भी हो सकते है. खैर… पीना बुरी बात नहीं है. ये तो आपको पता ही होगा कि कलयुग में बीयर को दारु तथा पोकर को जुआ कहने से इंसान पाप का भागी होता है. हमारे दोस्त ऋषिकेश में गंगा किनारे गंगाजल और वोदका मिलकर पी आये हैं. उन्हें गजब का मजा आया. वोल्गा-गंगा की जगह वोदका-ठर्रा ज्यादा एफेक्टिव नहीं लगता है सुनने में? खैर… बहुत बात हो गई पोजिटिव साइड की.

अब बात नेगेटिव साइड की. कुछ दिनों से फेसबूकीय मजनूँ लोग ये वाला स्टेटस लगाए बैठे हैं: ‘The best relationship is one in which you feel free to show even your negative side and still have the hope that it will strengthen your relationship’. पता नहीं किसने लिखी है पर बात तो सही है पर जब मुझे सुबह सुबह ४ बजे फोन आया तो दिमाग खराब हो गया. कुछ ऐसे:

‘अबे, सुन मेरा कोई निगेटिव साइड बता?’

‘ऊँहूँ…. कहाँ इंटरव्यू है? बोल देना वही… कि मैं एक साथ कई प्रोजेक्ट करने लगता हूँ. वर्क-लाइफ बैलेंस ढंग से मैनेज नहीं कर पाता….’

‘अबे वो नहीं, इंटरव्यू नहीं है. मेरा कुछ रियल निगेटिव साइड बता.’

‘चल सोने दे, तीन घंटे पहले तो सोया था… क्या हो गया तुझे?'

‘अबे उसने पढ़ लिया है कहीं फेसबुक पर कि रिलेशनशिप मजबूत हो जाएगा, और उसने मुझे टाइम दिया है. आज रात को उसे बताना है कि मेरा नेगेटिव साइड क्या है’

‘क्या?? अबे सारी साइको तुझे ही मिलती हैं क्या? जा… बोल देना कि पहले वो बताए’

‘अरे नहीं भाई. पहले मुझे ही बताना है.’

‘बोल दे कि तू बेवकूफ है. उस जैसे के चक्कर में पड़ा हुआ है यही प्रूफ है. देख जॉब इंटरव्यू होता तो मैं कुछ बता देता. इसमें मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा. अब मुझे सोने दे. एक काम कर किसी दुश्मन से पूछ. काको से पूछ ले चार साल से तेरी बात नहीं हुई ना उससे. वो कुछ बता देगा’

‘अबे यार…’

‘ठीक है, मुझे कॉल कर के उसे पकड़ा देना मैं उसे समझा दूँगा. और टेंशन ना ले मुझपर सेंटी हो गयी तो मैं कटा दूँगा’

‘चुप कर. जा सो ही जा तू'

… और उसने फिर काको को फोन किया तो काको बोला : ‘तू बहुत बड़ा ह*मी है. तेरी मा.. (आगे तो आप समझ ही गए होंगे. बिलकुल वही बोला उसने जो आप बिन लिखे पढ़ गए Smile ).’ 

अब बेचारे ये बिन लिखे समझ में आ जाने वाली बातों को तो बता नहीं सकते अपनी निगेटिव साइड. ये भी कोई निगेटिव साइड हुआ? और बेचारे दारु, सुट्टे से दूर  ही रहते हैं. लड़की-वडकी का भी कुछ उस लेवल का चक्कर हो नहीं पाया. कुछ और निगेटिव साइड उन्हें क्या उनके जानने वालों को भी नहीं मिल पा रहा. बेचारे पढ़-लिख के आईएसआई मार्का वाले शरीफ ब्रांड के इंसान अब निगेटिव वाला साइड ढूंढ रहे हैं. और उनकी गर्लफ्रेंड मानने को तैयार नहीं कि वो इतने शरीफ हो सकते हैं. उसका तो कहना भी सही है कि बता दो थोडा रिश्ता और मजबूत कर लेते हैं. लेकिन बेचारे के पास केवल कैश और लिक्विड एसेट ही है तो टॉक्सिक एसेट कैसे दे बोनस में. बड़ी समस्या है ! वैसे ही जैसे कुछ लोग फुर्सत के पल ढूंढने में ही व्यस्त हो जाते हैं.  बिन बात ही…

~Abhishek Ojha~

Feb 12, 2009

चड्ढी-साड़ी आर्बिट्राज ट्रेडिंग स्ट्रेटजी

भयानक मंदी का समय है जहाँ बाजार का कोई भरोसा नहीं है, सालों से फायदा दे रही जमी-जमाई जितनी भी ट्रेडिंग स्ट्रेटजी (Trading strategy) थी उनका सारा गणित असफल हुआ जा रहा है. आजकल जहाँ बड़े बैंकों के स्टार ट्रेडरों के लिफाफे में बोनस की जगह गुलाबी रसीद (Pink slip) निकल आती है. ऐसे में अगर कोई रिस्क फ्री स्ट्रेटजी मिल जाए तो वो 'अंधे की आँख' ना सही 'बुढापे की लाठी' तो जरूर साबित होगी. अब मार्केट किस कदर डूबा है ये तो आप जानते ही है. ये भी कोई बताने की बात है! फिर भी बात निकली है तो मामले की गंभीरता आप इस गोता लगा चुके इस सेंसेक्स के ग्राफ में देख ही लीजिये !

ऐसे में तारणहार बनकर सामने आई है मुथालिक की 'श्रीराम सेना'. अब इसके बारे में बताने की क्या जरुरत है, भले ही आप मार्केट की उठा-पटक से एकदम ही अनभिज्ञ हों इस पब-विरोधी गैंग की उठा-पटक तो जानते ही होंगे. ये आजकल वैलेंटाइन के दिन मुफ्त शादी कराने के साथ एक और स्पेशल ऑफर दे रहे हैं. 'पिंक चड्ढी भेजो और बदले में साड़ी पाओ'. अब पिंक चड्ढी को साड़ी में बदलने के साथ-साथ पिंक स्लिप को बोनस में बदलने का ये सुनहरा अवसर ही तो है ! और उनके लिए भी जो कुछ लाभ बनाना चाहते हैं.

यूँ तो हम रिस्क-मैनेजमेंट का काम करते हैं पर इस सिलसिले में कई ट्रेडिंग स्ट्रेटजी भी देखने को मिलती है. इतने बड़े-बड़े फोर्मुले और गणित लगाकर स्ट्रेटजी लिखी जाती है और ऐसे मार्केट में परिणाम? ... छोडिये, वैसे भी अत्यन्त गोपनीय रखना होता है ! खैर उन्हीं में से कुछ की अनालिसिस और चार्ट-वार्ट देखते हुए हमारे सहकर्मी अजित के दिमाग में ये रिस्क्लेस आर्बिट्राज मौका (Riskless Arbitrage Opportunity) सूझा. यहाँ तो भारी-भारी कम्प्यूटर और गणित लगाने पर भी आधे-एक सेंट (चवन्नी-अठन्नी) का आर्बिट्राज नहीं मिल पाता हैं और यहाँ चड्ढी के बदले साड़ी ! यानी लाभ ही लाभ !

तो फिर देर किस बात की... फटाफट गुलाबी चड्ढी भेज डालिए और बदले में साड़ी लीजिये... जीतनी मिले उनमें से कुछ इस्तेमाल कीजिये कुछ बेच दीजिये. ट्रेडिंग स्ट्रेटजी का एक राज होता है 'गुप्त रखना'. अगर सबको पता चल जाय और सभी यही ट्रेड लगाकर बैठ जाएँ तब तो हो चुका फायदा. अभी शिव भइया मिलने आए थे तो उन्होंने भी बताया 'अगर एक आदमी आकर बताये की घी बेचकर उसने कुछ पैसे बनाए हैं और ये सुनकर सभी लोग घी बेचने ही निकल पड़ें तो क्या होगा? ' तो इसे भी गुप्त ही रखना है. आप तो हमारे अपने आदमी हैं इसलिए आपको बताये दे रहा हूँ. बिना किसी और को बताये फटाफट ट्रेड लगाइए नहीं तो फिर वही होगा जो आर्बिट्राज वाले मामले में अक्सर होता है. वैसे भी परफेक्ट मार्केट में धीरे-धीरे ये मौका ख़त्म हो ही जाता है. धीरे-धीरे चड्ढी की डिमांड बढेगी और फिर कीमत भी और इसी तरह साड़ी की कीमत घटने लगेगी जब तक की दोनों कीमतें बराबर ना हो जाए. इस्तेमाल की हुई चड्ढी के बदले भी नई साड़ी मिलने वाली है तो साड़ी की रीसेल भी चड्ढी की रीसेल से ज्यादा होगी. डिमांड-सप्लाई के साथ ये सारे फैक्टर बाद में चड्ढी महँगी कर देंगे तो फिर किस बात का फायदा होगा! वैसे हमारी अनालिसिस कीमतों को कुछ यूँ प्रेडिक्ट करती है.

तो क्या जबतक कीमतों में अन्तर रहेगा (लगभग मई २०१०) तब तक कोई रिस्क नहीं है? क्या ये ट्रेड पूरी तरह रिस्क-फ्री है?
अजी क्या कभी कुछ रिस्क-फ्री हुआ है ! अगर रिस्क-फ्री होने लगा तो हम क्या मैनेज करेंगे ?

अब एक समस्या ये है की ये ट्रेड एक्सचेंज में तो होगा नहीं मतलब ये ओटीसी (over-the-counter) प्रोडक्ट है तो मुकर जाने का खतरा (Default Risk) तो है ही ! अपनी बात से मुकरने में श्रीराम सेना का क्या जाता है. ऐतिहासिक विश्लेषण (हिस्टोरिकल अनालिसिस) और हमारे मोडल्स की बैक टेस्टिंग ये बताती है की ये रिस्क बहुत ज्यादा है. और इस मामले में रिकवरी रेट भी लगभग शून्य होगा. तो?

अरे ऐसे समय के लिए ही तो क्रेडिट डेरिवेटिव (Credit Derivative) बनाए गए हैं. अगर श्रीराम और मुथालिक मुकर भी जाएँ तो आपके पैसे मिल जायेंगे ! बस हर हप्ते/महीने आपको इस सुरक्षा के लिए कुछ रकम सुरक्षा प्रदान करने वाले (Credit Protection Seller) को देनी पड़ेगी और अगर श्रीराम सेना मुकर जाती है तो आपको साड़ी या उसके कीमत के बराबर पैसा मिल जायेगा. ठीक वैसे ही जैसे बीमा कराने पर होता है. एक साधारण कोंट्रैक्ट कुछ इस तरह काम करेगा:

लीजिये अब तो हर तरह का ट्रेड हो सकता है इस पर. हेजिंग (hedging) और स्पेकुलेशन (Speculation) भी सम्भव है. आप भी अपनी आवश्यकता अनुसार ट्रेड लगाइए ! (इससे जुड़े बाकी बिजनेस आईडिया फिर कभी)

~Abhishek Ojha~

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ये हमारे रिसर्च का प्रारंभिक आईडिया और सारांश भर है. अगर काम्प्लेक्स मोडल्स के साथ टेस्ट की हुई स्ट्रेटजी और पूरी केस स्टडी चाहिए तो आप मुझसे संपर्क कर सकते है. 'An Investor's Guide to The Chaddhi-Sadi Trading Strategy and Risk Analysis - by Abhishek Ojha & Ajit Burad.

कीमत:
व्यक्तिगत निवेशक (Individual Investor): $100.00
संस्था/व्यवसायिक निवेशक (Institutional/Corporate Investor): $500.00
(सारे मेजर क्रेडिट कार्ड स्वीकार किए जायेंगे)

*This post is subject to non-understandable risk ! Please don't read carefully before commenting.
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Riskless Arbitrage: A risk-free transaction consisting of purchasing an asset at lower price and simultaneously selling that at a higher price.

Aug 23, 2008

पन्द्रह पंचे पचहत्तर, छक्का नब्बे... !

निवेश बैंकिंग और अंको का मस्त नाता है, आप चाहें न चाहें अंको से पाला पड़ता ही रहता है. तो हुआ यूँ के मैं एक स्प्रेडशीट खोले बैठा अंको को देख रहा था और कुछ ऐसा बोला:

'पन्द्रह छक्का नब्बे, सात पिचोत्तर... उम्म्म... कुछ एक मिलियन होना चाहिए'

अब क्या करें?... अपनी आदत है बीच-बीच में बोल देना... जो करता हूँ, कभी-कभी बीच में बोल भी देता हूँ. मुझे क्या पता था की लोग इतनी फुर्सत में होते हैं और एक-एक शब्द सुनते रहते हैं... मेरे बगल में जो सज्जन थे उन्हें बड़ा मजा आया ... उन्होंने पूछा:
'व्हाट यू जस्ट सेड?'
'नथिंग, आई वाज़ जस्ट लूकिंग ऐट दिस पोर्टफोलियो एंड सम नंबर्स असोसिएटेड विथ दिस !'

लेकिन इतनी आसानी से मान जाते तो पूछते ही क्यों? इतना तो वो भी समझ ही गए थे कि मैं क्या बोला था... लेकिन वो मेरे मुंह से सुनना चाहते थे... तो मुझे कौन सी शर्म आ जायेगी ! मैंने भी बोल दिया की कुछ नंबर जोड़-घटा रहा था और अपनी थोडी बचपन से आदत है... जोड़-घटाव करता हूँ तो उन्हें गुनगुना भी लेता हूँ ! ये गुनगुना लेने वाली बात उन्हें कुछ हजम नहीं हुई और उनके चेहरे के भाव से ऐसा लगा की अपच कुछ ज्यादा ही हो गया है... उनके सवाल का संतुष्ट हल उन्हें नहीं मिला, या फिर उन्हें जो मेरे मुंह से सुनना था वो नहीं मिला, या फिर गुनगुनाने वाली बात थोडी भारी हो गई !

मैंने सोचा की अपनी तरफ़ से थोडी दवा-दारु कर दी जाय मैंने कहा देखिये मैं जो गुनगुना रहा था आपको सुनाये देता हूँ: 'पन्द्रह दुनी तीस तियां पैंतालिस चौका साठ पांचे पचहत्तर छक्का नब्बे सात पिचोत्तर आठे बिस्सा नौ पैन्तिसा झमक-झमक्का डेढ़ सौ !'

और मुड़ के फिर अपने डब्बे (कम्प्यूटर को डब्बा कहने की भी आदत है !) की तरफ़ देखने लगा... ऐसे काम करने के बाद सामने वाले का चेहरा देखने में जो मजा आता है वो शायद आप नहीं समझ सकते... वो आश्चर्य मिश्रित हँसी... हँसी मिश्रित उत्सुकता देखने लायक थी, इधर-उधर भी देख रहे थे की किसी और ने सुन तो नहीं लिया... कमाल है ! बोल में रहा हूँ और टेंशन उन्हें हो रही है... इतनी चिंता क्यों मोल लेते हैं लोग? पर इस गुनगुनाने का कमाल देखिये पास ही आके बैठ गए!
बोले: 'ये क्या था?'
मन तो किया की बोलूँ ये तुलसीदास की एक चौपाई है जिसमें कुम्भकर्ण बन्दर-भालुओं की गिनती करता है मजा तो बहुत आता लेकिन पीटने का डर हो तो चुप रह जाने में ही भलाई है !
'देखिये इसे पहाडा कहते हैं, आप जिसे टेबल कहते हैं ना, वही टू वन जा टू वाला, मेरी मुलाकात उससे थोडी देर से हुई उससे पहले से मैं इस दोहे चौपाई वाले को जानता हूँ और अब इस जन्म तो साथ नहीं छूटना इससे !'
वो मुझसे उम्र में बड़े हैं उन्हें लगा की क्यों बच्चे को परेशान करना बोले:
'पढ़ा तो मैंने भी पहाडा ही था लेकिन ऐसे नहीं, ये थोड़ा मस्त है और वैसे भी अब याद कहाँ है... बच्चों को रटाते-रटाते हम भी टेबल वाले हो गए हैं' वैसे ये भूल जाने वाली बात मुझे कुछ जमी नहीं... और इस भूल जाने वाली बात से ही याद आई हमारे दूर के रिश्ते की एक आंटीजी... आज से ३-४ साल पहले वो घर आई तो हिन्दी में बात कर रहीं थी... और उन्होंने कहा कि भोजपुरी तो वो भूल ही गई हैं, बच्चो के साथ रहते रहते अब बोल ही नहीं पाती! मैं उस समय कुछ ज्यादा ही छोटा था खैर उन्हें कुछ बोल तो अभी भी नहीं पाता बड़े रिश्तेदारों के सामने ना बोलने की आदत है अच्छी या बुरी पता नहीं ! बस बोलता ही नहीं :-)

हाँ तो ये बात मेरी समझ में नहीं आती की वो पहली बोली जो बचपन में बोलना सीखा हो, कोई कैसे भूल सकता है? पहाडा तो चलता है... वैसे ये भी थोड़ा कठिन ही लगता है कि पहाडा पढ़ा हो बचपन में और उसकी जगह टेबल ले ले ! भूलना तक तो समझ में आता है पर उसको टेबल से विस्थापित करने वाली बात थोडी मुश्किल लगती है, वैसे पढाते-पढाते सम्भव है...
पर बोली? नई सीख लो चाहे जीतनी... पर पहली बोली भूल जाओ... मेरे गले नहीं उतरती ! कोई ऐसा बोल रहा है तो कोरा झूठ नहीं तो और क्या कहेंगे? क्या आपके साथ ऐसा हो सकता है की आप बचपन से २०-२५ सा तक रोज़ जो बोली बोल रहे हों, उसके लिए बाकी जिंदगी में कभी ऐसा मौका आ जाय कि आपको वो बोलना ही ना आए?

पर ठीक है भोजपुरी वाले हिन्दी और हिन्दी वाले अंग्रेजी बोलने में अपनी बड़प्पन तो मानते ही हैं !

हाँ तो बात थी मस्त पहाडे की... अपनी तो सच्चाई है भाई जितना पढ़ा, जितने प्रोजेक्ट किए दिमाग में जब भी अंक चलते हैं तो भले ऐसे जितना ट्वेंटी-फोर्टी झाड़ता रहूँ अन्दर 'पंद्रह दूनी तीस तियां' ही फिट हो गया है... अब आप बड़ाई मानें या बुराई... पुराना प्रोग्राम है ! पर अब क्या करें, हम तो आए ही दुनिया में ३०-४० साल बाद... साला एक बात नई पीढी से नहीं मिलती :(

हाँ तो ऐसा लगा की अंकलजी को चिडियाघर का कोई प्राणी मिल गया है... बोले की बस एक बार और सुना दो !
अरे हद है ! अब बच्चा तो हूँ नहीं... तब की बात और थी.
वैसे ये काम बचपन में तो खूब किया... तेज होने की यही परिभाषा थी... चलो बेटा बताओ तो 'कितना नवें १०८?' हम तुरत बोलते १२ ... उसके बाद थोड़ा भारी १८-१९ पर.
पर भारी हल्का सब हो जाने के बाद अंत में यहीं आता था... 'अरे पन्द्रह का बड़ा अच्छा सुनाता है ये... आपने सुना है की नहीं?, बेटा एक बार १५ का पहाडा सुना दो' और हम राग भैरवी में तान छेड़ देते... 'पन्द्रह दुनी तीस तियां...'
और फिर 'वाह ! कितना तेज लड़का है !'
यही करके जिंदगी भर तेज कहाना होता तो कितनी आसान होती जिंदगी...

अब फिर से यही आग्रह आ गया तो क्या करता... एक बार फिर सुना दिया:
'पन्द्रह दुनी तीस तियां पैंतालिस चौका साठ पांचे पचहत्तर छक्का नब्बे सात पिचोत्तर आठे बिस्सा नौ पैन्तिसा झमक-झमक्का डेढ़ सौ !' अब सुनाया भी लय में...

अब आया मजेदार सवाल: 'बेटा बाकी सब तो ठीक लेकिन ये झमक-झमक्का क्या है?'
अब क्या बताऊँ इसका जवाब तो मैं भी बहुत दिनों से ढूंढ़ रहा हूँ... इस पहाडे के बाकी संस्करणों में शायद ये शब्द होता भी नहीं है... अब ये दुर्लभ संस्करण लेकर घूम रहा हूँ तो कुछ तो कारण देना ही पड़ेगा... मैंने कहा की ये बस लय बनाने के लिए है, और इसका कोई गणितीय मतलब नहीं है. कुछ ऐसा हुआ होगा की छमक-छमक पायल बज रही होगी किसी की और किसी कवि ह्रदय मास्टर ने छमक-छमक्का जोड़ दिया और फिर बिगड़ के झमक-झमक्का हो गया होगा ! (मैंने उनसे कहा की इसकी व्युत्पति के बारे में ज्यादा जानना हो तो एक हमारे शब्दों के ज्ञानी अग्रज हैं उनसे संपर्क कर लीजिये, अब क्या करूँ इससे ज्यादा सोच पाता तो क्या यही अंक गुनगुनाता?)

प्रसन्न होके चल दिए... 'बहुत अच्छे बेटा!' शायद उन्हें भरोसा हो गया की ऐसा पहाडा पढ़ा हुआ आदमी जोड़-घटाव गुनगुना भी सकता है! अब तो बस डर है की किसी दिन उनके यहाँ चला गया तो... बच्चों के सामने ना गाना पड़ जाय ! और कहीं किसी मीटिंग में ना बोल दें की ओझा बाबू १५ का पहाडा बहुत अच्छा गाते हैं... आप हिन्दी वाले तो फिर भी मेरी मजबूरी पर हंस सकते हैं... किसी फिरंगी के सामने उन्होंने बोल दिया तो उसके तो गले ना उतरनी !



इस बीच दो बड़े लोगों से बात हुई जिन्हें आप सब जानते हैं... न तो उनका परिचय देने की जरुरत है ना उनके विनम्रता की. कई बातों के लिए मैं अक्सर लिखता हूँ की लिख नहीं सकता... या फिर कह नहीं सकता... तो बस उसी तर्ज पे... कह नहीं सकता कितनी खुशी हुई... कितना अच्छा लगा. बस फोन पे बात हुई तो औटोग्राफ नहीं ले पाया... आशीर्वाद ही मिल पाया है, और उस पर तो अपना अधिकार है. माँगने की भी जरुरत नहीं. बिना मांगे ये मिला और ढेर सारा स्नेह... विनम्रता और स्नेह शायद आप समझ गए: समीरजी और लावण्याजी. बस अब तो नंबर मिल गया है... इसी आशीर्वाद, स्नेह और विनम्रता की दुहाई देकर परेशान करता रहूँगा :-)


~Abhishek Ojha~

Jun 4, 2008

इनवेस्टमेंट बैंकिंग... 'F' शब्द... खोया-खोया चाँद और एक खूबसूरत सुबह !

इनवेस्टमेंट बैंकिंग बदनाम है बहुत ज्यादा वर्क लोड के लिए... इनवेस्टमेंट बैंकिंग से जुड़ी किताबों ने और बदनाम कर रखा है. नौकरी चालू करने के बाद ये बात बहुत ज्यादा महसूस नहीं हुई... शायद पहले से ही धारणा बनी हुई थी या फिर पहले से ही ऐसा जीवन जीने की आदत हो गई थी. फिलहाल पिछले शुक्रवार की रात २:१५ (या फिर शनिवार सुबह कह लें) पर मोबाइल बजा तो नंबर दिखा: ००*** . तुरत माथा ठनका कि अरे ऐसे नंबर से तो ऑफिस वाले फ़ोन पर कॉल आता है.... कोई न्यूयार्क से अपने ब्लैकबेरी से कॉल कर रहा था... इस समय पर? वैसे उस समय भी मैं जाग रहा था और 'Development with dignity: A case for full employment' पुस्तक पढ़ रहा था. खैर फोन उठाया तो शक सही निकला... उधर मेरी एक अनालिसिस खोली गई थी जिसमें था $४ करोड़ का घाटा. घाटे का कारण किसी को मिला नहीं तो मुझे याद करने का शुभ काम किया गया. मैंने घर से काम करने का एक्सेस नहीं लिया है. ऑफिस का काम वहां से निकलते ही भूल जाने में विश्वास रखता हूँ. घर पर बस थोड़ा-बहुत पढ़ लेता हूँ, जिसका इस्तेमाल अगले दिन होना होता है. पर काम .... ना !

खैर अब मैं देख तो सकता नहीं था की समस्या क्या है. तो थोडी देर में ये फैसला लिया गया कि १ घंटे में मैं ऑफिस चला जाऊँ. जिनका फोन था वो हमारे बड़े वाले बॉस है... बड़े साहब MIT से PhD हैं, अब वो १६-१८ घंटे तक काम कर जाते हैं... ऐसे लोगों को मना भी नहीं कर सकते. जो ख़ुद इतनी लग्न से काम करता हो और इंसान भी अच्छा हो... इतना तो साफ है की मामला बहुत गंभीर था. थोडी खुशी भी हो रही थी की चलो हमारी भी इम्पोर्टेंस है (वैसे इसको कहते हैं पोजिटिव थिंकिंग... रात को २:३० बजे ऑफिस जाना पड़े और सोचो की हमारी इम्पोर्टेंस है)

रास्ते में एक बार ऊपर की तरफ़ देखा तो साफ आसमान, चाँद और हजारों तारे... मुझे याद आया... कि आसमान ऐसा भी होता है (ऑफिस, ऊपर देखो तो स्ट्रीट लाईट और फिर रात को फ्लैट में बंद... व्यस्त जीवन हो जाए तो कितनी जल्दी खूबसूरत चीजें भी दिमाग से निकल जाती हैं). पूरे रास्ते... खोया-खोया चाँद, खुला आसमान... गुनगुनाते रहा. जींस, टी-शर्ट और सैंडल पहने ऑफिस पहुच गया था. उस समय हमारे ऑफिस में तो कोई नहीं था पर हमारा ऑफिस विप्रो कॉम्प्लेक्स में है तो कॉल सेंटर के कई लोग इधर-उधर भटक रहे थे. हमारे फ्लोर पर जो एकाध लोग थे उनका घुरना देख कर मैं सोच में पड़ गया कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है! मैंने मन में सोचा.... 'Its fu**ing friday night dude! what you want me to wear... a suite?' (कई बातें हैं जो हिन्दी में उतनी सहजता से नहीं कही जा सकती खासकर फूहड़ बातें) और हाँ यहाँ आपको बता दूँ कि इनवेस्टमेंट बैंकिंग में जो अपने को जितना होशियार समझता है वो उतना ही ज्यादा 'F शब्द' इस्तेमाल करता है. इस इंडस्ट्री में आने के बाद ही पता चला कि F शब्द इतना व्यापक है और इतने क्रिएटिव इस्तेमाल होते है इसके.

अचानक मुझे ध्यान आया कि मैंने LEHMAN BROTHERS की टी-शर्ट पहन रखी है (IIT से निकलने के बाद कुछ सालों तक कई सारी कंपनियों के टी-शर्ट की कोई कमी नहीं होती). LEHMAN BROTHERS की टी-शर्ट पहन के CREDIT-SUISSE के ऑफिस में... भारत-पाकिस्तान में से किसी एक देश के आर्मी का ड्रेस पहन के दुसरे की सीमा में चले जाना कहूँगा तो थोड़ा ज्यादा हो जायेगा... पर अगर लिखते समय ऐसी बात दिमाग में आ रही है तो आप समझ सकते हैं की मामला संगीन है, वैसे रात थी तो कोई बात नहीं. खैर $४ करोड़ वाला मामला थोडी देर में निपट गया... आपको यहाँ बताता चलूँ की इनवेस्टमेंट बैंक में होते हुए जब तक आप पैसा बना रहे हैं आप सही है... जिस दिन घाटा हुआ... उसी दिन ये साबित हो जाता है की आप अब तक ग़लत कर रहे थे !

५ बजे सुबह ऑफिस से निकला तो एक साथी का फोन आया की पंचगनी के लिए आधे घंटे में निकलना है... मैंने कहा... मैं अभी ऑफिस से वापस आ रहा हूँ ...थोडी देर लग सकती है... 'what the Fu** were you doing in office on a friday night?' खैर दो बातें तो साफ है बिना 'F' शब्द के बोलना कुछ इनवेस्टमेंट बैंक में काम करने वालों को बेमानी लगता है... और शुक्रवार की रात बहुत मायने रखती है. खैर रात के खोये-खोये चाँद की तरह सुबह भी बहुत खूबसूरत निकली... इससे पहले अच्छी सुबह शायद ये मिली थी. पर क्या करें सुबह उठाना तो ५-६ सालों से भूल गया हूँ... कितनी खूबसूरत चीजें खोता जा रहा हूँ... :(

फिलहाल पंचगनी की ये तस्वीर... बाकी तस्वीरें, यात्रा वृतांत और इनवेस्टमेंट बैंकिंग की बाकी बातें फिर कभी


~Abhishek Ojha~

Jan 24, 2008

७.१ डालर का अभी तक का सबसे बड़ा फ्रौड़... ।

बहुत दिनों से सोच रहा था कि इनवेस्टमेंट बैंकिंग के बारे में लिखूंगा... अपना ६ महीने का अनुभव... और इस इंडस्ट्री के बारे में मेरा थोडा-बहुत ज्ञान... । पर आज कुछ ऐसा पढ़ लिया... कि लिखना ही पड़ा। इनवेस्टमेंट बैंकिंग का मेरा पसंदीदा हिस्सा... फ्रोड़ !! इतने नियम, इतनी पाबंदियाँ... फिर भी ऐसे-ऐसे कारनामे कि बड़ी-बड़ी कंपनियाँ सड़क पर आ जाएँ... ट्रेडरों ने कितनी कंपनियाँ डूबा दी... खैर बाकी कहानियाँ फुरसत में लिखी जायेंगी... पहले आज कि कहानी....

फ़्रांस के बैंक Societe Generale को ७.१ अरब डालर का नुकसान हुआ है... केवल एक आदमी के कारण. आप ये ख़बर यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं... है ना बड़ी ख़बर... पर मजे कि बात ये हैं कि इनवेस्टमेंट बैंकिंग से जुड़े हुए लोगो को ये कुछ ज्यादा अजीब नहीं लगा... जैसा कि लीमैन के चेयरमैन ने कहा ... 'मैं स्तम्भित नहीं हूँ, आजकल मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगता... ' ।

अभी तक निक लिसन के कारनामे मुझे सबसे ज्यादा पसंद थे.... जिन्होंने अकेले ही बियरिंगस बैंक को दिवालिया कर दिया था... अब लगता है कि ये कहानी उसको पीछे छोड़ देगी। ऐसी बहुत सी कहानियाँ हैं और मैंने बहुत कुछ सोच रखा है, इनवेस्टमेंट बैंकिंग की जिंदगी के बारे में लिखने के लिए... पर समय का अभाव.... आज ऐसी खबर मिल गयी तो शुरुआत करनी पड़ गयी... ।
हिन्दी में ये खबर आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
वैसे २० सबसे बडे ट्रेडिंग फ्रौड़ के बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं।


~Abhishek Ojha~