Sep 30, 2011

लेबंटी चाह (पटना ६)

 

‘सर, लेबंटी चाह पीएंगे ?’ एक दिन सुबह सुबह फील्ड ट्रिप पर मुझसे किसीने पूछा.

‘वो क्या होता है?’ मैंने दिमाग पर जोर डालने के बाद पूछा.

‘सर लाल चाह - लेम्बू डाल के !’ उसने स्पष्ट किया.

‘अरे सर ऊ लेमन टी बोल रहा है. ब्लैक टी बिथ लेमन' – राजेशजी ने मुझे समझाया.

‘हाँ हाँ ले आइये… ये अंग्रेजी भी न’ - मैंने राजेशजी की तरफ देखते हुए कहा.

राजेशजी से मेरे पहली मुलाकात थी. गाडी में बजने वाले गाने पर वो अपनी अंगुलियों को कभी अपने जांघों पर और कभी सीट पर फिरा रहे थे. इस तरह संगीत में डूबे हुए मैंने किसी को पहले देखा हो ऐसा याद नहीं… आँखे बंद, सिर मंद-मंद एक छोटी गोलाई में घूमता हुआ और दाहिने हाथ की अंगुलियाँ संगीत के हर सुर का साथ देती हुई. गाना रुका तो उनकी तंद्रा भंग जरूर हुई पर फिर उसी मुद्रा में जाकर ‘पंछी बिछड गए मिलने से पहले’ गुनगुनाते हुए कहीं खो गए. इस गाने को गाते हुए असीम दर्द सा झलक रहा था उनके चेहरे पर. उनकी तन्मयता के कारण उनसे ज्यादा बात नहीं हो पा रही थी। सुषुप्तावस्था से कब वो संगीतप्रेमी वाली मुद्रा में आते और कब वापस सुषुप्त हो जाते ये समझ पाना थोडा कठिन हो रहा था. बीच में जब-जब इनोवा झटके लेती तब तब उनकी अंगुलियों और सिर में गति आ जाती।IMG-20110925-00457

‘लिया जाय’ - उनकी आवाज और लेबंटी चाह सामने देख मैंने प्लास्टिक के कप की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘बैगवा को सुता दीजिए न’ - उन्हें चाह लेने में थोड़ी परेशानी हुई तो उन्होंने मेरी गोद में 'खड़े' बैग की तरफ इशारा किया.

'जानते हैं?' - ये शब्द सुनकर मुझे आनंद की सी अनुभूति हुई। ऐसा लगा जैसे इनकी मुझे वर्षो से तलाश थी। स्कूल के दिनों में रेणु की एक कहानी में ठीक यही सवाल पढ़ा था जिसमें उन्होने अगली लाइन लिखी थी 'मैं कुछ भी नहीं समझ सका कि मैं क्या जानता हूँ और क्या नहीं !' ऊँ डीनो की पढ़ी वो लाइन अब भी याद है पहली बार अनुभूति हुई।

मैंने कहा 'नहीं बताइये'

'आप जब लेबंटी सुन के कन्फ़्यूजिया गए त हमको याद आया। अङ्ग्रेज़ी में बहुत बर्ड का मीनिंग हम लोग उलट दिये हैं। अब देखिये खाना खाने वाले जगह को हमलोग क्या बोलते हैं?'

'रेस्टोरेन्ट?'

'यहीं मार खा गया न इंडिया ! होटल कहते हैं। का समझे ?'

'होटल'

'हाँ। होट माने गरम, त गरमागरम खाना जहां मिलेगा उसको होटले ना कहेंगे? और जहां दु-चार दिन ठहरना हो उसे क्या कहते हैं?'

'आप ही बताइये !' मैंने कहा।

'रेस्टूरेंट ! अच्छा आपे बताइये रेस्ट माने का होता है ?'

'आराम करना?' - मुझे ये बताते हुए भी थोड़ा ड़र तो था ही पता नहीं वो इसका मतलब क्या बता देते !

'तो रेंट देके जहां आराम करना हो उसको  कहेंगे?....' और वो मेरे बोलने का इंतज़ार करने लगे।

'रेस्टोरेन्ट' मैंने उनकी बात पूरी की।

'हाँ ! ये भासा का असली ज्ञान जो है न बहुत कम लोगों के पास होता है। जादेतर सब्द जो है सब आइसही न बना है... आछे एक ठो और... आपको मालूम है कि बिर्हनी किसको कहते हैं?'

'...'

'अरे एक ठो पीला रंग के कीरा होता है... काट लेता है तो बरी फनफनता है। मधुमक्खीये समझिए बस उ सब मधु जमा नहीं करता है। अब बिर्हनी से हो गया बीहनी आ बीहनी से बी आ हनी अलगा करके अङ्ग्रेज़ी में हो गया मधु आ ?...का समझे?....'

'मक्खी' मैंने उन्हें एक बार फिर पूरा किया।

'हाँ - यही सब है भासा के ज्ञान' - उन्होने सगर्व बताया।

ड्राइवर ने किसी चौराहे पर गाड़ी रोकी और फिर आगे का रास्ता पूछने के लिए हमने खिड़की का काँच नीचे किया । 'भैया, शकुंतला एन्क्लेव किधर होगा?' मैंने पूछा तो जवाब देने के लिए चार-पाँच लोग उत्सुकता से आगे आ गए।

'सकुन्तला एंक्लेभ...' एक ने सोचते हुए दुहराया। 'अरे सकुन्तला एंक्लाभ जानता है किधर है?' उसने सवाल आगे बढ़ाया।

'सकुन्तला का ? हूँऊँऊँ... उ जज के मेहरारू हैं का?' एक ने सोचते हुए पूछा।

'आरे जज-कलक्टर आ मेहरारू नहीं रे बुरबक ! आपाटमेंट है सकुन्तला एनकलेभ' - राजेशजी ने मामला संभाला।

'आपाटमेंट? त इधर कहाँ होगा... आप गलत आ गए आपको त किदवई नगर जाना परेगा। आपाटमेंट सब त उधरे है ' - एक ने बताया।

'रुकिए ना जी ई धोबिया के पाता होगा। अरे सुंदरवा... सुन इधर। सकुन्तला इंकलैब अपार्टमेंट जानता है कहाँ है?'

'सकुन्ताला इंकलाब? अइसा त नहीं है इधर' -सुंदरवा ने बताया।

इंक्लेभ, इंकलाभ, इंकलैब, इंकलाब इत्यादि होता देख राजेशजी थोड़े जोश में आ गए। 'साला गलत पता बताया है, देख लेंगे *&^% को...'

'अरे कोई गलत पता क्यों देगा?' मैंने पूछा।

'अरे आप को का बुझाएगा... जब-जब कुछ गरबर करता है तब तब ई मा*#^#* सब गलत रास्ता आ पता बताता है। रुकिए साले को फोन करते हैं।'
---
'देखे ! नहीं उठा रहा $%&$% का ! किसी के केरेक्टर का कीजिएगा साला अब उ आज गायबे रहेगा' पटना में पहली बार पूरे फ्लो में गाली सुनने को मिल रही थी ।

'अजीब हाल है !' - मैं कह भी क्या सकता था।

'अरे सर आप निश्चिंत रहिए, हम यही तो करते हैं... अभी देखिये न आधा घंटा में कईसे सब ठीक होता है। हमारा यही सब काम है... आप लोग से ई सब नहीं न हो पाएगा। हम तो अइसा-अइसा प्रोडक्ट पर काम किए हैं इस एरिया में कि आपको क्या बताएं। आ एक-से-एक %$#$^ सब को ठीक किए हैं...  जब $%^& (एक मोबाइल सर्विस) आया था त उसका नाम कुत्तो-बिलाई भी नहीं जानता था। सब हमहीं देखे। फील्ड का बहुते एक्सपीरिएन्स है हमको।

...आता है सब कोट पहिर के होटल में टरेनिंग देने आ दिन भर इस्ट्रेटजी समझाता है। अइसा अक-बक बोलता है कि माथा पगला जाता है। अब इसमें लगाए ससुर कौंची का इस्ट्रेटजी लगाएगा? उ त हमलोग हैं कि अपने हिसाब से काम कर लेते हैं। आपको एक ठो बात बाताते हैं जो भी लेपटोप लेके अङ्ग्रेज़ी में भाषणबाजी किया... बुझ जाइए कि उ एक्को काम का बात नहीं बोल रहा ! हमको तो जाना पड़ता है, महाराजा होटलवा में टरेनिंग होता है। खाना-पीना भी होता है त हम तो उसके लिए ही चले जाते हैं। हमारे टरेनिंग में कभी आइये एकदम काम का बात बताते हैं हम... ' - भरपूर जोश और गर्व में राजेशजी ने बताया।

शकुंतला ढूँढने में मदद करने वाली भीड़ तब तक चली गयी थी। और राजेशजी अपने सूत्रों और तरीकों से काम पर लग गए। मुझे खुशी हुई कि साथ में मेरा लैपटॉप नहीं था... और इसी बात पर एक लेबंटी चाह पीने का मन हो आया।

सोच रहा हूँ किसी दिन राजेशजी का ट्रेनिंग सेसन अटेण्ड कर लूँ !

~Abhishek Ojha~

*तस्वीर: रेल और सड़क मार्ग का बंटवारा करती दीवार पर गोइंठा आर्ट !

Sep 27, 2011

सबका कारण एक है !

 

ओढ़निया ब्लॉगिंग – बहुत दिनों बाद मजा सा आया इस पोस्ट को पढ़कर। सतीशजी के ब्लॉग पर मैं बहुत कम टिपियाता हूँ बस फीड में पढ़ लेता हूँ लेकिन इस पोस्ट पर दो टिप्पणी लूटा आया। याद आया कानपुर में जब फिल्म देखने जाते तो आइटम टाइप के गाने पर कुछ लोग कहते - फेंक 10 रुपए इस गाने पर ! Smile

विवादों के हिसाब मेरे सिलेबस में नहीं आते तो हम उनसे दूर ही रहते हैं। कभी-कभी बदबू दिखी भी तो अपने ऊपर ही परफ्यूम छिड़ककर आगे बढ़ लेते हैं। गंदगी से उलझने में कुछ फायदा नहीं दिखता। बचपन में ही सीखा दिया गया था कि कुछ प्राणी ऐसे होते हैं जिन्हें ‘ना ढेला मारना चाहिए ना प्रणाम ही करना चाहिए’। वैसे तो ये कहावत किसी अशुभ (और शायद शुभ भी) मानी जाने वाली चिड़िया* को लेकर कही जाती है लेकिन ये इन्सानों पर भी बखूबी लागू है। दोस्ती-दुश्मनी दोनों से समान दूरी में ही भलाई !  (वैसे किसी को पता है क्या उस चिड़िया को क्या कहते हैं? सफ़ेद काले रंग की गौरैया के साइज़ की होती है।)

मुझे कभी-कभी विवादों में समझ में नहीं आता कि क्या सही है. कौन पक्ष गलत है और कौन सही. और कभी-कभी प्रत्यक्ष ही एक पक्ष गलत दिखता है. लेकिन हमें क्या पड़ी है ! एक आम भारतीय नागरिक हूँ जो हर बात पर आँख मुँदना जानता है।

कई बार सीधे-सीधे गलत दिखाई देने पर भी जब हमें जो दिखाई देता है कारण हमेशा वही नहीं होता जो हमारे पूर्वाग्रह कहते हैं... थोड़ा तो सोचना चाहिए क्या गलत है क्या सही ! क्या हम किसी बात का बस इसलिए समर्थन कर देंगे कि हम किसी ‘फलानेवाद’ के समर्थक - फलानेवादी हैं?

मोजा फटा होने का मतलब आप हम क्या समझते हैं? यही न कि मोजा पुराना होगा। हम ये सोचते हैं कभी कि पहनने वाले के नाखून बढ़े हुए भी हो सकते हैं ! लेकिन हमें जो देखना है वही देखते है। उसी तरह कई बार जहां जरूरत नहीं वहाँ भी दिमाग लगा लेते हैं। और दिमाग लगाकर भी वही देख लेते हैं जो हमें देखना होता है। मोजा पुराना है या नाखून बढ़ा ये तो उसे पहनने वाला ही जानता है लेकिन देखने वाले को उससे क्या मतलब तो अपने हिसाब से ही लगा लेता है ! फटे मोजे से आगे बढ़ते हैं अच्छा उदाहरण नहीं लग रहा Smile एक भोजपुरी में कहावत है अक्षरशः याद तो नहीं लेकिन मतलब होता है - "कोई भूखा भी लड़खड़ा रहा हो और लोग कहते हैं कि दारू पीए हुए है"।

चाइल्ड लेबर गलत है उन्हें बंद करवा दो. हम भी सपोर्ट करते हैं. मैं एक रिपोर्ट पढता हूँ एक देश में सरकार चाइल्ड लेबर बंद कराने की उपलब्धियां गिनाती है और अगले कुछ ही दिनों में चाइल्ड-प्रोस्टीच्युशन बढ़ जाता है. पटना में एसी बसों की नयी फ्लीट आती है और रिक्शे–ऑटो वाले धीरे-धीरे ही सही परेशान दिखते हैं. अनजाने में एसी कारों की बंद खिड़कीयाँ भिखारियों की आमदनी कम कर देती है – और उन्हें समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हो क्या रहा है। ‘लोग बदल गए – पहले अच्छे थे !’ उन्हें एसी खिड़की के बारे में मालूम हो भी तो कैसे ?!  अंधाधुंध डेवेलपमेंट का सपोर्टर और चाइल्ड लेबर का विरोधी दोनों ही मैं हूँ। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि बिन सोचे...

समहाउ मूड ऑफ था कल – विकट विचार दिमाग में आये. ...मूड को ऑन करने के लिए बाहर निकाल 15 मिनट टहल कर आया। एक चाय पीया और कुछ लोगों की बात सुना। मूड ठीक सा हो गया। कुछ उसी तरह जैसे बदबू हुई तो परफ्यूम छिडकर दिया वो भी ब्रांडेड टाइप – अजारो !

फ्रेंड ऑफ फ्रेंड सर्कल में हर तरह का अपराध करने वालों को आपमें से कौन नहीं जानता?! मैं तो जानता हूँ। लेकिन हम आँखें बंद लेते हैं. नहीं है साहस सच सुनने का. पोलिटिकली करेक्ट बने रहना है. मुझे नहीं याद मेरा किसी से झगड़ा हुआ हो। कुछ भी देख-सुन कर ‘नहीं सभी ऐसे नहीं होते हैं, अब ऐसे लोगों का क्या किया जा सकता है, आप उधर ध्यान ही क्यों देते हैं’ जैसी क्लासिक टैग लाइन से मैं बड़े से बड़े सच को इग्नोर करता रहता हूँ. मैं नहीं कहने जाता कि ये गलत हो रहा है. पुलिस वाला रिक्शे वाले से पाँच-पाँच रुपये वसूलता है. मैं पुलिस वाले से कुछ नहीं कहता। मैं कह सकता हूँ – लेकिन मुझे क्या पड़ी है ?! मैं कभी-कभी रिक्शे वाले को पाँच रुपये अधिक दे देता हूँ - गंदगी पर परफ्यूम छिड़कने की आदत हो चली है !

मेरे जैसे लोग इसी बात से खुश हैं कि भगवान ने मुझे ऐसी जगह नहीं भेजा जहां उन्हें भ्रष्ट होना पड़ता। समाज देख अपने आप पर भी भरोसा नहीं रहा। मेरी माँ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पढ़ रहीं हैं मुझसे अधिक तेजी से और अच्छे से विवेचन कर पढ़ती हैं. अगर मेरे जैसा पढ़ने का मौका उन्हें मिला होता तो... खैर... उनके प्रश्न मेरे कुछ सिद्धांतों को हिला कर रख देते हैं. मैं उन्हें कुछ समझा नहीं पाता। बाहर जाकर फिर 15 मिनट टहल आता हूँ !

कोई किसी तरह दलदल में फंस जाय तो मैं उसे सब कुछ भूल आगे बढ्ने की सलाह दे देता हूँ। भले ही उसे घसीट ले जाया गया हो - मैं पूछ लेता हूँ ‘आप उधर गए ही क्यों?’।  गंदगी पड़ी रहने दीजिये परयुम छिड़कना सीखिये - अपने ऊपर, गाड़ी में, घर में, ऑफिस में...

हमें कहीं भी विवाद दिखता है – तो हम अक्सर निकल लेते हैं। कभी सही-गलत मन में सोच लेते हैं – लेकिन किसी एक का साथ देने में ड़र लगता है। कहीं उलझ ना जाएँ। हमारी बहुत इज्जत है – हम सिविलाइजड लोग हैं। या फिर शायद ये मेरा भ्रम है। लेकिन मैं तो अक्सर गंदगी पर परफ्यूम छिड़क आँख बंद कर निकल लेता हूँ।

ये तो एक तरह के लोग हुए। इसके अलावा हर मामले में कुछ लोग इस तरफ हो जाते हैं कुछ उस तरफ। लेकिन कुछ कहीं नहीं होते और हर जगह भी होते हैं। कुछ को खुद नहीं मालूम होता कि मैं इस तरफ क्यों हूँ... और भी कई क्लास है लोगों के। बिन देखे सुने कुछ लोगों की हुआं-हुआं करने की आदत होती है। वैसे लोगों पर परसाई जी याद आ रहे हैं:

“हर भेड़िये के आसपास दो – चार सियार रहते ही हैं। जब भेड़िया अपना शिकार खा लेता है, तब ये सियार हड्डियों में लगे माँस को कुतरकर खाते हैं, और हड्डियाँ चूसते रहते हैं। ये भेड़िये के आसपास दुम हिलाते चलते हैं, उसकी सेवा करते हैं और मौके-बेमौके “हुआं-हुआं ” चिल्लाकर उसकी जय बोलते हैं।” – परसाई जी के मामले में तो हड्डी इन्सेंटिव हुआ करता था। मुझे तो ऐसे लोग भी दिखते हैं जो बिन हड्डी के भी हुआं-हुआं करते हैं। पता नहीं किस चीज की आस होती है। परसाई जी आगे लिखते है:

“पीले सियार को हुआं-हुआं के सिवा कुछ और तो आता नहीं था। हुआं-हुआं चिल्ला दिया। शेष सियार भी `हुआं-हुआं’ बोल पड़े। बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना कर दिया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला, “भई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं। पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? उनकी कविता में से शाश्वत के स्वर फूट रहे हैं।”

बिन हड्डी के हुआं-हुआं करने और हुआं-हुआं को शाश्वत स्वर समझने वाले कितने हैं आपके आस-पास? आस-पास नहीं तो टिप्पणी बक्से में तो आते होंगे?

जो भी हो एक बात है इस मार्केट की उठा-पटक में किसी भी इनवेस्टमेंट पर गारंटीड़ रिटर्न और कहीं मिले न मिले हिन्दी ब्लॉगिंग में जरूर है ! हुआं-हुआं फॉर्मेट ही सही।

मेरे कहने से कुछ बदल नहीं जाएगा। मैंने पहले भी एक बार कहा था कि एक ब्लोगर के विचार बस टिप्पणी बटोर सकते हैं Smile हाँ मेरा गुस्सा थोड़ा जरूर कम हो जाएगा और मैं फिर चुपचाप आँख बंदकर निकल लूँगा। ब्लॉग पर गुस्सा लिख देना भी परफ्यूम छिड़क लेने जैसा ही नहीं है?

कुछ फलानेवादी टाइप के लोग होते हैं जो हर बात का एक ही कारण बताते हैं। वैसे ही जैसे आजकल ग्लोबल वार्मिंग का भी बहुत फैशन है। इस वाद के लोग गर्मी हुई तो ग्लोबल वार्मिंग, बारिश हुई तो भी और ठंड हो गयी तब भी - सबका मालिक एक टाइप सबका कारण ग्लोबल वार्मिंग । कल पटना में मुझे एक ऑटो वाले ने बताया ‘अच्छा हुआ बारिश हो गयी अब भूकंप नहीं आएगा’। मैंने पूछा वो कैसे? तो बताया: ‘अरे आपको नहीं पता? ये सब गर्मी से होता है।’ झील सुख गयी तो, भर गयी तो भी। वो तो फिर भी ठीक है शायद किसी तरह जुड़े हुए भी हों ग्लोबल वार्मिंग से। अब हम भूगोल के विद्यार्थी तो थे नहीं इसलिए इस पर कमेन्ट नहीं करना चाहिए लेकिन कल एक लड़का-लड़की साथ भाग गए और कोई कह रहा था “क्या जमाना आ गया है ! ग्लोबल वार्मिंग से ये सब थोड़ा ज्यादा ही बढ़ गया है पहले कम होता था”। अब ये कैसे रिलेटेड है मेरी समझ के बाहर था !

हर बात का ना तो कारण ही एक होता है ना समाधान ही एक ! अगर हर समस्या का कारण ग्लोबल वार्मिंग और समाधान अनुलोम-विलोम हो जाये तो दुनिया बड़ी आसान हो जाती। नहीं? किसी ने मुझे बताया था कि अनुलोम-विलोम करने से उसे गर्लफ्रेंड मिल गयी ! होता भी होगा – न भी हो तो अनुलोमविलोमवादी तो कहेंगे ही।

मैं खुश हूँ कि मैं गिने हुए दर्जन भर ब्लॉग पढ़ता हूँ। और उन दर्जन में से कइयों को ये पता भी नहीं है कि मैं उन्हें पढ़ता हूँ। मैं *$%^वादी ब्लोगरी से दूर हूँ (*$%^ की जगह आपको जो मर्जी आए भर लें !)। अगर दिखे भी तो आँख बंद करने की आदत जो है। गंदगी सफाई अभियान वाले लगे रहे – फैलाने वाले भी लगे रहें।

सतीशजी के ओढ़निया पर कहीं हुई चर्चा को देख मन भटका तो मन को कीबोर्ड से जोड़ दिया। पटनहिया पोस्ट इस ब्रेक के बाद जारी रहेगी Smile

आज सुबह ऑटो में इतनी सुंदरियाँ बगल में बैठी थी। मैं फोटो खींचने लगा तो ऑटो वाले ने कहा - ‘मोबैल में रखके का माजा आएगा। उ भी फोटो से फोटो खेञ्च रहे हैं - त बर्हिया नहीं नू आएगा। कहिए तो दिला दें बरा वाला पोस्टर। लगा लीजियेगा देवाल प’।

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~Abhishek Ojha~

*पोस्टोपरांत अपडेट: अभी पता चला कि ये चिड़िया खड़िच या खड़िलीच के नाम से जानी जाती है। साइबेरियन माइग्रेटरी बर्ड है और इसे देखना शुभ माना जाता है। लेकिन किसी खास दिशा/कोण में बैठे तो अशुभ ! अंतिम अपडेट : यह पक्षी खंजन (wagtail) है.

Sep 22, 2011

खतरनाक मस्त ! (पटना ५)

 

जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से एक बार फिर निकालना हुआ और इस बार एक 'आइये भैया ! ऑटो होगा?' का जवाब मैंने 'हाँ' से दिया.

'भैया, जो सही किराया हो आप बता दो, कुछ ऐसा मत बोल देना कि मुझे मना करना पड़े.' - मैंने ऑटो में बैठने के पहले कहा.

'अब सर जब आप हमीं पर छोर दिए त आपसे नाजायज थोरे लेंगे. बइठीये. कहाँ चलियेगा' -  बाएं हाथ से ऑटो चालु करने वाला डंडा नीचे से उपर खींच दाहिने हाथ से ऑटो को हुर्र-हुर्र कराते ऑटोवाले ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा.

'आपका ऑटो तो बिल्कुल चकाचक है.' मैंने हाथ जोड़ स्वागत करती ऐश्वर्या, दाहिनी तरफ कैटरीना, बायीं तरफ करीना और सामने शायरी के साथ मादक मुद्राओं में अदा बिखेरती बॉलीवुड अभिनेत्रियों की तस्वीरों को देख कर कहा.

'हे हे हे...हाँ सर, अब दिन भर एही में रहते हैं त लगवा लिए हैं. मन लगा रहता है... आ सवारी को भी त आछा लगबे करता है.'  ऑटो बढाते हुए उसने कहा.

'हाँ वो तो है. कल भूकंप आया था इधर? कुछ नुकसान तो नहीं हुआ?'

'हाँ सर. ...लेकिन बहुते मामूली था. कुछो हुआ नहीं है. खाली राजा बाजार में एक ठो बिल्डिंगिए हइसे लप गया है' - ऑटो वाले ने बायां हाथ ऊपर उठा कर तिरछा करते हुए बताया. 'आ हमको तो एकदम साफा बुझाया कि पलट जाएंगे. अइसा लगा... कि पाटारा प खारा हैं आ उ जो है सो हइसे-हइसे लप-लप कर रहा है.' हवा में हथेली लपलपाते हुए उसने समझाया.

'सर, आगे सवारी बइठा लें? पीछे आप अकेलहीं रहिएगा आ हमको बस एक ठो पचस टकिया दे दीजियेगा. मान लीजिए दू सवारी पांच-पांचो रुपया देगा त हमको कुछ एक्स्टारा कमाई हो जाएगा. अब आप हमरे प छोर दिए हैं त आपसे का कहें… नहीं त एयरपोर्ट से थोरा जादे लेते हैं हमलोग.'

'हाँ हाँ, बैठा लीजिए'

इस अप्रूवल के बाद दो लड़के आगे की सीट पर बैठा लिए गए. दोनों संभवतः बीए-बीएससी प्रथम या द्वितीय वर्ष के छात्र थे. उनके आने के बाद हमारी बातचीत बंद हो गयी. और उनकी चालु...

'अबे प्रियांकावा को देखा? दिल्ली जाके एकदम भयंकर हो गयी है - बिल्कुल मस्त'

'तू कहाँ देख लिया ?'

'भाई का बड्डे मनाने आई है. साला एतना खतरनाक हो गयी है कि मत पूछ.' खतरनाक और भयंकर का अद्भुत उपयोग किया लडके ने. कौन अलंकार होता है जी ये सब? फिलहाल मुझे उनके बातों में रूचि आने लगी. IMG-20110916-00403

'अबे एक बात है जो भी बाहर जाती है. मस्त हो जाती है. वैसे आजकल तो सभे चली जाती है. सब बेकार वाली ही इधर रह जाती है. इहाँ कम कोचिंग है?... बेटा ! एक बात जान लो एतना कोचिंग हिन्दुस्तान के किसी सहर में नहीं है... लेकिन दिल्ली-कोटा का जो फईसन है न...'

'हाँ पढाई इहाँ बुरा थोरे है, एक से एक टीचर है'

'अबे हम उ वाला फईसन नहीं कह रहे हैं... असली वाला भी त फईसन है. इहाँ त वीमेंस कोलेजवा में वइसा कपरवे नहीं पहनने देगा. आ घर में रहेगी त का पहिनेगी. घर वाला भी नहीं पहनने देता है. दिल्ली-कोटा में सब ओइसही पहनता है. सलवार सुट भी पहनेगा त दूसरे तरह का '

'हाँ बे, यहाँ तप एक-दू ठो बची है थोडा ठीक... लेकिन साला उ सब भी पढ़ने वाला सब को ही भाव देती है. हम तो साला दुए दिन में सोच लिए कि बाप का पैसा बरबाद नहीं करेंगे... कोचिंग छोर दिए.'

'अबे हमको तो फीरी-बॉडी डायग्राम में आज तक इहे नहीं नहीं बुझाया कि कब किधर तीर लगाना है. जिस दिन सिनाहावा बताया कि साइकिल का कौन पहिया में किधर फ्रिक्सन लगेगा तभिये हमको बुझा गया कि आगे पढ़ के बस पैसा बर्बादे है. लाइन मारने के लिए बाप का पैसा नहीं बर्बाद कर सकते बॉस... अपने बाप के पास एतना पैसा नहीं है'

'साले दिमाग में से बॉडी आ फ्रिक्सनवा निकालोगे तब न बुझायेगा'

'हे हे हे'

'अबे इ देख क्लियर कंसेप्ट वाला भी टेम्पू पर प्रचार लगवा दिया.' - बगल से जाते ऑटो के पीछे एक कोचिंग का ऐड देखकर एक ने कहा.

'साला इ तो सही में एकदम कंसेप्टवे क्लियर कर देता है. एकदम जड़ से पूरा माइंडवे क्लियर कर देता है. अइसा क्लियर कि कुछो बचबे नहीं करेगा फिर समझने को... हा हा हा'

'सब कोचिंग वाला साला हरामी होता है. एक ठो माल लइकी का फोटो जरूर लगाता है. जेतना प्राइभेट कोलेज वाला है, मीडिया-सीडिया, एमबीए, जावा, बीटेक, सीटेक सबमें एक माल का फोटो... '

'सेकपुरा मोरवा के आगे एक ठो एतना मस्त इलियाना का फोटो लगाया है... उ तो साला गजबे कर दिया है.'

'इलियानावा वही न... साउथ वाली?'

'हाँ, उ भी भयंकर मस्त है. हिंदी में उ भी एक दिन जरूर आएगी.'

'उधर देख.. इसको त हम एक दिन फोन करके पूछेंगे कि इ लरकी कौन है तुम्हारा पोस्टर में?. उसका नंबर जुगाड़ता हूँ'... सामने एक मीडिया कोर्स के प्रचार में लगे बड़े होर्डिंग की तरफ इशारा करते हुए एक ने कहा.

'हाँ इ तो लोकले लग रही है कोई. लेकिन बताएगा नहीं.'

'अबे बताएगा कइसे नहीं. साला कुछ करते हैं. चन्दनवा के भैया हैं न उनका जान पहचान है इस इन्स्टिच्युट में'

तब तक मैं अपने ठिकाने पर पहुँच चूका था....

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Recently Updated--

~Abhishek Ojha~

- राजाबाजार की वो 'लपी' हुई बिल्डिंग अभी पटना का सबसे बड़ा आकर्षण हैं. गोलघर से ज्यादा भीड़ लगती है वहाँ.

- दीवार: रंगाई के बाद की चमचमाती दीवार पर फिर लाल परतें चढनी शुरू हो गयी हैं. कुल चमचमाते दिन: ८-१० रहे होंगे. बस पहली बार का संकोच होता है. एक बार किसी ने परत चढा थी फिर क्या ! अब तो आते जाते कोई भी...

- शायरी (ऑटो से):

१. दुल्हन वही तो पिया मन भाये, गाडी वही जो मंजिल तक पहुँचाये.
२. ऐ सनम तू जन्नत की हूर है, कमी यही है कि तू मुझसे दूर है.
३. ड्राईवरी में हम दुनिया के नज़ारे करते हैं, हम नहीं चाहते लेकिन वो इशारे करते हैं.

- पटना: बस कुछ दिन और !

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