आज इस पोस्ट में मेरे द्वारा बनाए गए कुछ व्यंजनों की झलकियाँ... खाना बनाना कब चालू किया और कब शौक बन गया ठीक-ठीक तो नहीं पता. हाँ इतना जरूर जानता हूँ कि किचन में
खुराफात करते रहना ही इसका मूल कारण रहा. और किचन में खुराफात करने का सबसे बड़ा कारण तो बस एक ही है... जब भी घर पर होता हूँ हमेशा माँ के साथ रहना. पर बस खुराफातों तक ही सीमित था ये सब, हाँ एक बात जरूर है हर तरह के व्यंजन पर हाथ तो आजमा ही चुका था. पर
असली अभ्यास तो मजबूरी में ही शुरू हुआ. ये कहना कि मैं मुल्ला-दो-प्याज़ा हूँ और खाना बनाना मेरे बचपन का शौक है... सही नहीं होगा, अरे वैसे भी सच्चाई तो ये है की मजबूरी में चालू करना पड़ गया. लेकिन ये बात भी है की चालू करने के बाद ये शौक में परिवर्तित तो हो ही गया है. ऐसी मजबूरी के शौक बन जाने के पीछे तो बस एक ही कारण हो सकता है...
मज़ा आना. शुरू में तो नहीं पर जब लोगों ने दिल खोल के बड़ाई की तो एक प्रतियोगिता में हिस्सा भी ले लिया और फिर किस्मत का खेल... जीत भी गया.

वैसे ये सारी बातें मुझे आज साफ-साफ दिख रही है कि ये सब हुआ कैसे... खुराफात वाली बात के बाद हुआ ये कि २००५ में
IIT में तीन साल पूरा करने के बाद गर्मी की छुट्टियों में इन्टर्नशिप के लिए
स्विटजरलैंड जाना पड़ा.
अब एक तो यूरोप का खाना और ऊपर से
मैं ठहरा शाकाहारी और वो भी विशुद्ध शब्द के साथ. जब भी कुछ खाने कि कोशिश करता तो 'एक तो करेला दूजा चढा नीम' वाली कहावत जरूर याद आती. कहाँ सोचा था
की स्विटजरलैंड की वादियों में आनंद मनाएंगे और वहाँ आलम ये था की रोज़ चाकलेट, बर्गर और जूस पर एक-एक दिन काटना मुश्किल हो रहा था. शुरुआत हुई लंच से, मेरे एक साथी का घर यूनिवर्सिटी के पास ही था और रोज़ दोपहर में २ घंटे के लिए उनके किचन का मालिक मैं बनने लगा. पहले ही दिन सफलता हाथ लगी, (अब वहाँ का खाना खा के जो मेरा हाल था तो कुछ भी बने सफलता ही कहेंगे !)
खाना बनाने में आई दिक्कतें भी मजेदार रही...
बेलन और चकली नहीं मिले तो २-३ कांच के ग्लास बेलन बनने में टूट गए, पर बाद में जब वाइन की बोतल ने जब बेलन का काम संभाल लिया तो ट्रे और डेकची भी उल्टा कर देने पर चकली का काम करने में पीछे नहीं हटे... इस प्रकार के उपकरणों से ५७ समोसे बनाने के बाद किसी युद्ध जीत लेने जितनी खुशी तो हुई ही थी. नीचे के समोसे वाली तस्वीरों में आप वो धन्य हुई वाइन की बोतल देख सकते हैं :-) धीरे-धीरे भारतीय दुकानों से मसाला वगैरह भी ले आया, और फिर बात भी फैलने लगी... लोग भारतीय खाना खाने के लिए आग्रह करने लगे, मुझे लगा की खाने के लिए ही कई लोग दोस्ती भी करने लगे :-) इस मुसीबत के लिए इंटरनेट भगवान् की शरण में गया और ऑफिस में मिला फ्री का फ़ोन... घर से भी डिस्कस कर लेता...
पार्टी भी सफल रही... ! (यहाँ भी ये कह सकते हैं कि कुछ भी बना के खिला दो उन्हें क्या पता...अच्छा बना या बुरा) :-) पर प्रसिद्धि मिलनी थी तो संयोगो का सिलसिला जारी रहा और मेरे भारतीय दोस्तों के यहाँ भी जाके खाना बनाने का सिलसिला चल उठा, हर वीकएंड पर मैं खाना बनाता फिर निकल जाते हम घूमने। ... बात ख़त्म !

पर जैसा की मैंने कहा...
संयोग !२००६ में फिर से ३ महीने के लिए स्विटजरलैंड जाना हुआ. २००५ में आखिरी के दो महीनों में मैं एक प्रोफेसर साब के घर रहा था और इस बार उन्होंने शर्त रखी थी कि मुझे उन्ही के घर रहना पड़ेगा... हाँ एक बात कहना चाहूँगा, इस शर्त का कारण मेरा खाना बनाना नहीं था... प्रोफेसर साब की चर्चा फिर कभी. इस पोस्ट में उतने अच्छे लोगो की चर्चा नहीं की जा सकती. हाँ तो इस बार फिर से सिलसिला चला और इस बार कुछ ज्यादा ही चला और प्रोत्साहन मिलने का आलम ये की
मुझसे ज्यादा मुझ पर भरोसा दूसरो को ही रहता, और शायद यही भरोसा था जिसने सर्टिफिकेट भी दिला दिया.
देखा आपने कैसे मजबूरी शौक में बदल जाती है.
और अब पुणे में भी कभी-कभी बनाना हो जाता है... और शौक जारी है. प्रोत्साहन भी जारी है. और अब इस बोरिंग पोस्ट के अंत में एक बात जो मैंने खाना बनाते-बनाते महसूस किया है:
खाना बनाने वाले को सबसे बड़ी खुशी मिलती है, जब कोई कह दे ... वाह क्या स्वाद है ! तू तो मस्त बनाता है... बस सारी थकान दूर, भूख भी दूर... ! अच्छा आईडिया भी दे दिया ना आपको, बस एक बड़ाई की जरुरत है !
आजतक का सबसे अच्छा कम्प्लिमेंट:
मेरे एक दोस्त ने कहा ... तू मेरी माँ की तरह खाना बनाता है... !अंत में कुछ डिस्क्लेमर: स्विटजरलैंड का खाना इतना बुरा भी नहीं होता, पर ठीक से जानकारी ना होने पर शुरुआत में थोडी दिक्कत होनी स्वाभाविक है। (जल्दी ही मैं एक श्रृंखला लिखने की सोच रहा हूँ अपनी स्विस यात्रा का, बस समयाभाव ही देर कराये देता है... !) दूसरी: भले ही मजबूरी में शुरू की लेकिन अब एक अच्छा शौक है और मुझे इस बात की खुशी है। तीसरी: बहुत जल्दी में बिना सोचे समझे किया गया पोस्ट है, असुद्धियों और गलतियों के लिए क्षमा.
और हाँ ये बताना मत भूलियेगा आपको कैसा लगा ? :-)
ये तस्वीरे शुरुआत के दिनों की हैं.









तसवीरें ऊपर से: एक झलक, आलू पराठा, पकोडे, मैं प्रो ब्राईट के साथ (उन्होंने मुझे खोज-खोज ले स्विस खाना खिलाया और मैंने उन्हें भारतीय), खाने में मग्न सहयोगी, खाने में मग्न एक दोस्त, समोसे, खीर, पूड़ी, फिर समोसे, पराठे चाय और अचार के साथ, पकोडे.