Showing posts with label Switzerland. Show all posts
Showing posts with label Switzerland. Show all posts

Sep 13, 2010

आखिरी मुलाकात

ज़्यूरिक लेक… गर्मियों की शाम… दूर दिखता आल्पस और पानी में तैरते सफ़ेद बत्तख. एक के हाथ में चॉकलेट और दूसरे के हाथ में बत्तखों को खिलाने का चारा. आते ही ये सामान आपस में एक्सचेंज हो जाता. लैब से दोनों साइकिलें उठा सीधा यहीं आते. जगह ही ऐसी है और फिर जहाँ उसके दिमाग का तापमान पूरे दिन पर्शियल डिफ़्रेंशियल इक्वेशनस में घुसे रहने से बढ़ जाता तो ऋचा कहती कि गले में मेढक फंस गया हो जैसी बोली सुन के मेरे तो कान पक जाते हैं. वैसे यहाँ भी घुमा फिरा के उनकी बातें उन इक्वेशनस में ही अटक जाती...

कई दिनों से ऋचा के शादी की बात चल रही है… इस मुद्दे पर भी आजकल दोनों खूब बाते करते. एक दूसरे को भरपूर चिढाते… zurich lake

‘सुन कल मैं इंडिया जा रही हूँ, टिकट नहीं कराया ना अभी तक तुने?’

‘जैसे मैं नहीं आऊंगा तो शादी ही नहीं करोगी !’

‘सच में नहीं करुँगी, तुझे क्या लगता है… अच्छा तू बता मैं ना आऊं तेरी शादी में तो?’

‘तू कैसे नहीं आएगी, बिना तेरे अप्रूव किये मेरी शादी होगी कैसे?’

‘तुने तो अप्रूव किया नहीं… तो मैं भी ना कर रही… अच्छा अपना पुराना आईडिया कैसा रहेगा? ये अटेंड करने का लफड़ा ही खतम कर देते हैं चल हम दोनों एक-दूसरे से ही शादी कर लेते हैं'

……

… इसके बाद दोनों चुप हो गए. ऐसा नहीं था कि ये बात पहली बार कह दी हो किसी ने… अक्सर ये बात दिन में चार दफा तो आ ही जाती. कोई भी कह देता. …‘कब कर रहे हो शादी?’. और दोनों हंस देते ‘हद है ! किसी को भरोसा ही नहीं होता हम दोस्त हैं !’.  पर चुप्पी पहली बार छाई थी दोनों के बीच में… किसी ने कुछ नहीं कहा… कुछ भी नहीं. थोड़ी देर बाद ऋचा ने कुछ कहा था शायद. उसे ठीक-ठीक याद नहीं. फिर दोनों साइकिलें उठा चले गए.

…नहीं गया वो और शायद ऋचा की शादी भी हो गयी हो… अब भी वो बैठता है लेक के किनारे, रोज शाम हाथ में एक किताब लिए हुए. अक्सर बोर होते हुए मोबाइल में ऋचा पर अंगूठा थम जाता है. कई बार हरे बटन पर जाकर रुक गया… उसे भी पता है कि ये नंबर अब तक नहीं चलता होगा. उसकी मानें तो आज तक उसे नहीं पता ऋचा की शादी हुई या नहीं. दोनों बेस्ट-फ्रेंड थे (हैं?).

--

~Abhishek Ojha~

(ऐंवे ही ठेल दी आज ये पढते-पढते पक गया तो बीच में. बड़े पैराडॉक्स हैं जिंदगी में. वही दीखता है पर वही नहीं होता.  एक उदहारण… मेरा फेसबुक स्टेटस: Abhishek Ojha is reading so much these days that he is not getting time to read what he wants to read.)

तस्वीर: ज़्यूरिक लेक, 04-जुलाई-2005.

Jun 25, 2009

हिंदी ही बेहतर है भाई !

यूँ तो ऐसी बातें मैं नहीं करता. क्योंकि (लगभग) सभी के लिए अपना देश और अपनी भाषा ही सबसे अच्छे होते हैं. और वो भाषा जिसमें आप बोलना सीखते हैं उसकी तो बात ही क्या है ! तो किसी एक को बेहतर कहना सही नहीं लगता. पर अपने साथ एक ऐसी घटना घटी कि... जब भी याद आती है लगता है 'हिंदी ही बेहतर है !'

अब अंग्रेजी तक तो हम लोग मैनेज कर लेते हैं. इसमें तो ‘लिखने कुछ और बोलने कुछ’ तक ही समस्या सीमित है. पर जब बात आती है अन्य भाषाओँ की तो बंटाधार हो जाता है. अब फ्रेंच ही ले लीजिये. लिखते कुछ हैं बोलते कुछ और सुनने वाले समझ कुछ और लेते हैं. बोलने वाले भी पता नहीं क्यों कंजूसी करते हैं, अरे बोलो न भाई मुक्त कंठ से इसमें कैसा परहेज ! [वैसे सुना है जर्मन भी अपने हिंदी जैसे ही होती है जो लिखो वही बोलो, पर सीख नहीं पाया तो कन्फर्म कह नहीं सकता. वैसे तो ऐसा स्टेटमेंट देने का अधिकार नहीं बनता जानता ही कितनी भाषाएँ हूँ :)]. खैर घटना सुनिए...

अब देखिये स्विट्जरलैंड में एक जगह है Rennes, अब लिखा है तो पढेंगे भी वही न? रेन्नेस. अब मैंने लोज़न (Laussanne) स्टेशन काउंटर पर पूछा कि मुझे रेन्नेस जाना है ट्रेन कब आएगी. तो बताने वाले को पता नहीं कैसे समझ में आ गया कि ये वेनिस (Venice) पूछ रहा है. लो भाई हो गया काम... बैठो ६ घंटे. क्या करता उसने तो यही बोला: 'द नेक्स्त त्रैन तू वेनिस विल दिपार्त ऐत त्वेन्ति आफ्त्र इलेवन फ्रॉम त्रैक तू' (The Next train to Venice will depart at twenty after eleven from track two) अब कहाँ 'ट' कहाँ 'द' और कहाँ 'ड' सब खिचडी.

हम तो हार मान के बैठ गए. समझ में नहीं आया कि ५ मिनट की दूरी है और छः घंटे तक कोई ट्रेन ही नहीं. तब तक एक ट्रेन दिख ही गयी, जिसे देखते ही शक हुआ कि ये तो जायेगी. हम कहाँ चुप बैठने वाले थे फिर धर लिया उसी महोदया को. अब आप परेशानी में हैं और अच्छे से काउंटर पे कोई प्यार से बताने वाली हो तो बार-बार पूछने में कुछ बुराई है क्या? एक बार फिर पूछा… और फिर मुझे समझ में नहीं आया कि वो रेन्नेस बोल रहा है या वेनिस और तो और इस बार और अड़ंगा.

'द नेक्स्त त्रैन तू वेनिस विल दिपार्त ऐत त्वेन्ति आफ्त्र इलेवन फ्रॉम त्रैक तू... दू यू हैव अ रिज़र्वेशन? यू नीद अ रिज़र्वेशन तू त्रवेल इन दैत त्रैन' (The next train to Venice will depart at twenty after eleven from track two... do you have a reservation? You need a reservation to travel in that train).

लो भाई १० मिनट के लिए रिज़र्वेशन. हमने कहा नहीं भाई हम तो ऐसे ही चले जायेंगे. हमारे पास तो टिकट भी नहीं बस ये पास है !

'नो सर, दिस पास इस नोत वैलिद फॉर वेनिस'. (No Sir, This pass is not valid for Venice). अब माथा ठनका मन तो किया कि हिंदी में मुस्कुराते हुए कुछ गालियों के साथ बोल दूं 'अरे मोहतरमा ! अभी पिछले सप्ताह ही तो हम गए हैं और कह रही हो कि नहीं जा सकते'. लेकिन लगा जरूर कुछ लोचा है. तब पेपर और पेन के सहारे लिख के दिया.

'आई वान्त तू गो तू दिस प्लेस'. तुरत बोल पड़ी: 'ओ ! यु वान्त तू गो तू रेनो'. लो यही बाकी था अब ! Rennes से Venice से रेनो. Renault को भी सुना है रेनो ही बोलते हैं. मैं सोच में पड़ गया कहीं ये Renault कार की बात तो नहीं कर रही ! रिज़र्वेशन तो पहले ही पूछ चुकी है.

तब तक एक ट्रेन पर Rennes लिखा दिख गया और मैं भाग कर उस ट्रेन में बैठा जैसे किसी भूत से पीछा छुडाकर भागा हुआ इंसान ! ओह ! हिंदी इज बेस्त सॉरी बेस्ट.





श्यामसखा‘श्यामजी ने अपने संस्मरण जानकारी और चित्र सहित कुछ यूँ भेजे हैं: हम आज जेनेवा से ४५ किलोमीटर दूरी पर बसे फ़्रेंच कस्बे अन्सी की सैर पर आए हैं! यह कस्बा एक विस्तृत झील के किनारे पर बसा है और यह झील एक नहीं कई झीलों से मिलकर बनी है या कह सकते हैं कि एक ही झील को अलग अलग जगह कई नाम दे दिये गये हैं! कारण कई जगह इस झील का पाट संकरा हो जाता है और इस संकरे पाट के दोनो ओर के हिस्सों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है! कसबे की खासियत इसका ३०० साल पुराना बाजार है जो संकरी गलियों मे बसा है! बिल्कुल हमारे पुराने शहरों जैसा, बस इन लोगो ने अपने आर्किटेक्चर को बिल्कुल २००-३०० साल पुराना ही रहने दिया है वही ईंटो वाली दुकाने,यहां तक की बाजार की सड़कें भी कोबल स्टोन हमारी छोटी इंटो जैसे पत्थर की बनी हैं बाजार के दोनो तरफ़ झील से निकली एक नहर है! यह नहर पहले खेत सींचती थी ! अब सैलानियों हेतु इस पर होटल हैं कुछ व्यापारिक संस्थान भी हैं तथा कुछ रिहाइश भी!
आज जिस बात ने सबसे पहले ध्यान खेंचा वह था इस नहर पर बने एक छोटे पुल पर जाने वाले रास्ते पर लगे बोर्ड ने आप भी देखें चित्र.
फ़्रेंच भाषा में लिखा है -फ़्रेंच भाषा में अगर शब्द के अंत में व्यंजन आजाए तो वह मूक रहता है जैसे restorent को फ़्रांसिसी रेस्तरां बोलते हैं ज़ानि अन्तिम अक्षर टी t मूक रहता है अब आप चित्र को दोबारा देखें और पढें /यह बनेगा पिद आ त्रि और इसे हिन्दी में देखें पदयात्री ऐसे अनेक शब्द है जो लगता है संस्कृत भाषा से मिलते जुलते हैं और इनका अर्थ भी वही है!

धन्यवाद श्यामजी.


~Abhishek Ojha~

Sep 4, 2008

सब कुछ सापेक्ष है... (भाग १ )

मच्छर हत्या से मांसाहार समर्थन तक:

अगर आपको लगे की लम्बी पोस्ट है तो इस डब्बे में बंद लाइनों को छोड़कर सीधे उसके नीचे की लाइनों पर पहुच जाइए। उसके पहले तो बस ये यात्रा है जिससे इस पोस्ट की उत्पति हुई। समय और अवस्था के हिसाब से चीजों के मतलब बदलते रहते हैं ...

दृश्य १: (सी/१३३, हॉल २, आईआईटी कानपुर): मच्छर हत्या !

'आज ओझा ने मर्डर कर दिया !'
'किसका किया बे? इसकी औकात है?'
'मच्छर मारा होगा !'
'हाँ तुझे कैसा पता?'
'इससे ज्यादा ये क्या मारेगा ... '

कई बार ऐसा होता... मुर्गा, दारु के लिए कई बार चुनौती दी जाती. और हर बार मैं हार स्वीकार कर लेता...
'नहीं मारना चाहिए यार ये भी तो जीव है'

फिर लोग मच्छर मारने के फायदे गिनाते... मैं जीव हत्या का मामूली तर्क ही दे पाता. खैर धीरे-धीरे एक-दो सालों में इतना तो बदल ही गया की कोई बगल में कितना भी मुर्गा नोंच के खाता,मुझे दिक्कत होनी बंद हो गई.

दृश्य २: (शाकाहारी स्विस प्रोफेसर) : छूने में क्या समस्या हो सकती है?

एक बहुत अच्छे प्रोफेसर दोस्त हैं (दोस्त ही कहना ज्यादा उचित है) वो 'लगभग शाकाहारी' बने थे जब तक मैं उनका मेहमान रहा... शायद बाद में भी वैसे ही रहने लगे हों. पर मैंने पूछना कभी उचित नहीं समझा. हाँ मछली को कभी-कभी शाकाहार का हिस्सा मानते.
एक दिन हम साथ खाना खा रहे थे, उनके प्लेट में मछली, मेरे में सब्जी... मेरा खाना निकालने के बाद उन्होंने उसी चमचे से मछली भी निकाल ली. अब उन्होंने मुझे दुबारा सब्जी देने की बात की तो मैंने मना कर दिया (वही... आज भूख नहीं है ! भूख लगी हो तो या कहना बड़ा कठिन काम होता है !). कारण ये था की उसी चमचे से निकाली हुई सब्जी शायद मैं न खा पाता. ये बात अलग है की मैंने उन्हें ये बात नहीं बताई... ऐसा नहीं की उन्हें मेरा शाकाहारी होना पसंद नहीं पर मुझे लगा की उनके लिए ये समझ पाना थोड़ा मुश्किल होगा की छूने से क्या समस्या आ सकती है ! बात भी सही है... जब तक दिमाग में कीडा न हो समस्या होनी भी नहीं चाहिए ।

दृश्य ३: (हाँगकाँग, एक किराना दूकान): पड़ गए बीमार !

साँप, बिच्छु, चमगादड़, गीदड़, केंकडा, चींटी, खटमल, जूं, मधुमक्खी, कुत्ता, बिल्ली, कछुवा, घड़ियाल... बस जो नहीं भी सोच सकते वो सब बिकता है! जिन्दा साँप पालीथीन में पकडो और तौल कर ले जाओ... अब क्या बचा? कुछ शुद्ध मांसाहारी दोस्त भी ये देख के २-४ दिन के लिए शाकाहारी हो गए !
और फिर ये डींग कि 'बगल में कोई कितना भी मुर्गा चबाये मुझे कोई दिक्कत नहीं' कि पोल खुली और हम बीमार हो गए. २-३ दिन तक दिमाग में ये भी नहीं आया कि ब्रेड नाम की भी कोई चीज़ होती है, होटल में ख़ुद खाना भी नहीं बना सकते. और फिर शाकाहारी रेस्टोरेंट में जाओ और पता चले की शाकाहारी भोजन के ऊपर थोडी मांस की ड्रेसिंग कर दी गई और आप बिना छुए बिल देकर आ जाओ... और साथ में १०-१५% टिप भी ! तो इन सबके बीच हम फलाहार करते रहे... वो भी बहुत कम... और बीमार हो गए !

दृश्य ४: (न्यूयार्क, एक किराना दूकान): खाओ भाई क्या दिक्कत है !

आज फिर एक दूकान में पानी में जिन्दा तैरते हुए बड़े-बड़े केंकड़े दिख गए, मस्ती में तैर रहे थे... उनको क्या पता की ऊपर कीमत टंकी हुई है. मुझे बस दुःख हुआ तो यही की फोटो नहीं ले पाया. पर बीमार और ये सब देख के... ना ! जैसे मुर्गा कोई चबाये और मुझे कोई दिक्कत नहीं वैसे ही अब ये देख के भी कुछ ना होना, वैसे भी क्या प्रोब्लम है.

पर हाँ चर्चा जरूर हो गई... मेरे मित्र ने बताया की चीन में ओलंपिक देखने बहुत लोग गए और उसी सिलसिले में किसी टीवी चैनल पे प्रोग्राम आ रहा था की १-२ किलोमीटर लम्बी 'जिन्दा और पके हुए कीडों-मकोडों' की लाइन से स्टाल लगी थी. इस पोस्ट पर उस चर्चा का बड़ा प्रभाव है।

अब देखिये इस मांसाहार के फायदे: भाई चीन ने तो जनसंख्या पर काबू कर ही लिया और जितने लोग हैं उतने में तो खाद्य समस्या नहीं आनी ! खाओ भाई कीडे-मकोडे... कुत्ते-बिल्ली । आप सोचिये अगर भारत में लोग मच्छर फ्राई खाने लगें तो समस्या ही ख़त्म. बीमारी भी ख़त्म और खाद्य समस्या कुछ तो कम होगी, क्यों? कुछ ज्यादा हो गया पर ऐसा तो नहीं है की संभाव्य नहीं ! अच्छा चलिए मच्छर को छोड़ दिया पर भी हजारों तरह के कीडे-मकोडे और जानवर हैं... साले ये चूहे ! इन्हें तो देखते ही खा लेना चाहिए. इनको खा लो तो खाद्य समस्या क्या चीज़ है, अनाज निर्यात करने पर भारत सरकार को सीजनल सेल ना लगानी पड़ जाय ! और कुत्ते? मुन्सिपलिटी की परेसानी तो बड़ी समस्या है, मेरे जैसे लोग भी ऑफिस से लेट आते हैं तो डरते हैं की कहीं दौड़ा दिया तो हम तो नहीं भाग पायेंगे ! सांप उनको तो नहीं खाना उन्हें दूध पिलाने के जैसा ही है भाई. मत खाओ... मरो !

और इधर आपको तो लग रहा है की हम खा ही रहे होंगे दबा के :-)

हाँ हमें भी ऐतराज हुआ इधर... यहाँ ढूंढ़ के शाकाहारी जगहों पर गए तो पता चला की कई जगह दूध या दूध से बना हुआ कुछ भी नहीं डालते. ये वेगन पता तो था पर कभी पाला नहीं पड़ा था इससे पहले, एकाएक मैं अपने मित्र से बोलने वाला था कि दूध में क्या प्रॉब्लम है यार ! फिर ख़ुद को ही मन में बोल के चुप रह गया... 'साले आज पता चला... दूध में क्या प्रॉब्लम है? तो फिर कुत्ते में ही क्या प्रॉब्लम है? कुत्ता तो छोड़ तुझे तो उस चमचे में ही प्रॉब्लम थी... जो जहाँ है उसको दूसरा बुरा लगता है... आज पता चला लोग क्यों खाते हैं? जैसे तुम्हारे लिए मांस वैसे ही किसी के लिए दूध ! वैसे ही किसी के लिए मुर्गा, किसी के लिए कुत्ता और किसी के लिए जूं, खटमल... भाई ये सीढ़ी में कौन आगे पीछे है ये तो सबके लिए अलग अलग. किसी को कुछ अच्छा लग सकता है किसी को कुछ !'

निष्कर्ष तो यही है... खाओ भाई खाओ ! सब खाओ !

आप भी खाइए... जो भी मिले दबा के ! खाद्य समस्या के साथ-साथ कई समस्याएं हल हो जायेंगी... बस अब अपनी राम कहानी इतनी गाई है तो अब ये भी बता दूँ की इस जन्म मुझसे से ये काम तो ना हो पायेगा... मैंने कहा था ना की दिमाग में कीडा हो तो थोडी दिक्कत होती है. सब कुछ सही लगते हुए भी देश का भला नहीं कर सकता... इतना जो लिखा है यही पढ़ लिया मेरे किसी मित्र ने तो कहेंगे कि 'बहुत हीरो बनता है अंडा ही छू के दिखा !'

अगर आपके दिमाग में ऐसा कीडा है फिर तो थोडी दिक्कत है. नहीं तो भाई दबा के खाना जरूर ! बहुत भला होगा देश का... वस्त्र समस्या के लिए तो किसी उपदेश कि जरुरत नहीं वो तो वैसे ही कुछ दिनों में हल हो जाने वाली है !

अब भाई इस पूरे लेख का मूल यही है कि बाबा आइन्स्टीन के नियमानुसार संसार में कुछ भी निरपेक्ष (Absolute) नहीं है सब सापेक्ष (Relative) है... इसकी चर्चा किसी और परिपेक्ष्य में अगले पोस्ट में करते हैं. पर ये तो मानना ही पड़ेगा कुछ भी निरपेक्ष नहीं सब कुछ तुलनात्मक है ! ये तुलना की सीढ़ी संसार की हर बात पर लागू होती है और इसका कोई अंत नहीं... ये तो कभी सोचना भी मत की आप इस सीढ़ी के किसी एक सीरे पर हो... क्योंकि वो तो सम्भव नहीं !

~Abhishek Ojha~


अब ये बताइए की आपका क्या ख्याल है इस वचन पर ! (प्रवचन, सुवचन, कुवचन, दुर्वचन कुछ भी हो सकता है सामने वाले पर निर्भर करता है ! आख़िर सब तुलनात्मक है. )

May 8, 2008

खाना बनाना: मज़बूरी से शौक तक !

आज इस पोस्ट में मेरे द्वारा बनाए गए कुछ व्यंजनों की झलकियाँ... खाना बनाना कब चालू किया और कब शौक बन गया ठीक-ठीक तो नहीं पता. हाँ इतना जरूर जानता हूँ कि किचन में खुराफात करते रहना ही इसका मूल कारण रहा. और किचन में खुराफात करने का सबसे बड़ा कारण तो बस एक ही है... जब भी घर पर होता हूँ हमेशा माँ के साथ रहना. पर बस खुराफातों तक ही सीमित था ये सब, हाँ एक बात जरूर है हर तरह के व्यंजन पर हाथ तो आजमा ही चुका था. पर असली अभ्यास तो मजबूरी में ही शुरू हुआ. ये कहना कि मैं मुल्ला-दो-प्याज़ा हूँ और खाना बनाना मेरे बचपन का शौक है... सही नहीं होगा, अरे वैसे भी सच्चाई तो ये है की मजबूरी में चालू करना पड़ गया. लेकिन ये बात भी है की चालू करने के बाद ये शौक में परिवर्तित तो हो ही गया है. ऐसी मजबूरी के शौक बन जाने के पीछे तो बस एक ही कारण हो सकता है... मज़ा आना. शुरू में तो नहीं पर जब लोगों ने दिल खोल के बड़ाई की तो एक प्रतियोगिता में हिस्सा भी ले लिया और फिर किस्मत का खेल... जीत भी गया.

वैसे ये सारी बातें मुझे आज साफ-साफ दिख रही है कि ये सब हुआ कैसे... खुराफात वाली बात के बाद हुआ ये कि २००५ में IIT में तीन साल पूरा करने के बाद गर्मी की छुट्टियों में इन्टर्नशिप के लिए स्विटजरलैंड जाना पड़ा.

अब एक तो यूरोप का खाना और ऊपर से मैं ठहरा शाकाहारी और वो भी विशुद्ध शब्द के साथ. जब भी कुछ खाने कि कोशिश करता तो 'एक तो करेला दूजा चढा नीम' वाली कहावत जरूर याद आती. कहाँ सोचा था की स्विटजरलैंड की वादियों में आनंद मनाएंगे और वहाँ आलम ये था की रोज़ चाकलेट, बर्गर और जूस पर एक-एक दिन काटना मुश्किल हो रहा था. शुरुआत हुई लंच से, मेरे एक साथी का घर यूनिवर्सिटी के पास ही था और रोज़ दोपहर में २ घंटे के लिए उनके किचन का मालिक मैं बनने लगा. पहले ही दिन सफलता हाथ लगी, (अब वहाँ का खाना खा के जो मेरा हाल था तो कुछ भी बने सफलता ही कहेंगे !)

खाना बनाने में आई दिक्कतें भी मजेदार रही... बेलन और चकली नहीं मिले तो - कांच के ग्लास बेलन बनने में टूट गए, पर बाद में जब वाइन की बोतल ने जब बेलन का काम संभाल लिया तो ट्रे और डेकची भी उल्टा कर देने पर चकली का काम करने में पीछे नहीं हटे... इस प्रकार के उपकरणों से ५७ समोसे बनाने के बाद किसी युद्ध जीत लेने जितनी खुशी तो हुई ही थी. नीचे के समोसे वाली तस्वीरों में आप वो धन्य हुई वाइन की बोतल देख सकते हैं :-) धीरे-धीरे भारतीय दुकानों से मसाला वगैरह भी ले आया, और फिर बात भी फैलने लगी... लोग भारतीय खाना खाने के लिए आग्रह करने लगे, मुझे लगा की खाने के लिए ही कई लोग दोस्ती भी करने लगे :-) इस मुसीबत के लिए इंटरनेट भगवान् की शरण में गया और ऑफिस में मिला फ्री का फ़ोन... घर से भी डिस्कस कर लेता... पार्टी भी सफल रही... ! (यहाँ भी ये कह सकते हैं कि कुछ भी बना के खिला दो उन्हें क्या पता...अच्छा बना या बुरा) :-) पर प्रसिद्धि मिलनी थी तो संयोगो का सिलसिला जारी रहा और मेरे भारतीय दोस्तों के यहाँ भी जाके खाना बनाने का सिलसिला चल उठा, हर वीकएंड पर मैं खाना बनाता फिर निकल जाते हम घूमने। ... बात ख़त्म !

पर जैसा की मैंने कहा... संयोग !

२००६ में फिर से ३ महीने के लिए स्विटजरलैंड जाना हुआ. २००५ में आखिरी के दो महीनों में मैं एक प्रोफेसर साब के घर रहा था और इस बार उन्होंने शर्त रखी थी कि मुझे उन्ही के घर रहना पड़ेगा... हाँ एक बात कहना चाहूँगा, इस शर्त का कारण मेरा खाना बनाना नहीं था... प्रोफेसर साब की चर्चा फिर कभी. इस पोस्ट में उतने अच्छे लोगो की चर्चा नहीं की जा सकती. हाँ तो इस बार फिर से सिलसिला चला और इस बार कुछ ज्यादा ही चला और प्रोत्साहन मिलने का आलम ये की मुझसे ज्यादा मुझ पर भरोसा दूसरो को ही रहता, और शायद यही भरोसा था जिसने सर्टिफिकेट भी दिला दिया. देखा आपने कैसे मजबूरी शौक में बदल जाती है.

और अब पुणे में भी कभी-कभी बनाना हो जाता है... और शौक जारी है. प्रोत्साहन भी जारी है. और अब इस बोरिंग पोस्ट के अंत में एक बात जो मैंने खाना बनाते-बनाते महसूस किया है: खाना बनाने वाले को सबसे बड़ी खुशी मिलती है, जब कोई कह दे ... वाह क्या स्वाद है ! तू तो मस्त बनाता है... बस सारी थकान दूर, भूख भी दूर... ! अच्छा आईडिया भी दे दिया ना आपको, बस एक बड़ाई की जरुरत है !

आजतक का सबसे अच्छा कम्प्लिमेंट: मेरे एक दोस्त ने कहा ... तू मेरी माँ की तरह खाना बनाता है... !

अंत में कुछ डिस्क्लेमर: स्विटजरलैंड का खाना इतना बुरा भी नहीं होता, पर ठीक से जानकारी ना होने पर शुरुआत में थोडी दिक्कत होनी स्वाभाविक है। (जल्दी ही मैं एक श्रृंखला लिखने की सोच रहा हूँ अपनी स्विस यात्रा का, बस समयाभाव ही देर कराये देता है... !) दूसरी: भले ही मजबूरी में शुरू की लेकिन अब एक अच्छा शौक है और मुझे इस बात की खुशी है। तीसरी: बहुत जल्दी में बिना सोचे समझे किया गया पोस्ट है, असुद्धियों और गलतियों के लिए क्षमा.

और हाँ ये बताना मत भूलियेगा आपको कैसा लगा ? :-)

ये तस्वीरे शुरुआत के दिनों की हैं.

















तसवीरें ऊपर से: एक झलक, आलू पराठा, पकोडे, मैं प्रो ब्राईट के साथ (उन्होंने मुझे खोज-खोज ले स्विस खाना खिलाया और मैंने उन्हें भारतीय), खाने में मग्न सहयोगी, खाने में मग्न एक दोस्त, समोसे, खीर, पूड़ी, फिर समोसे, पराठे चाय और अचार के साथ, पकोडे.

Jan 21, 2008

वो लोग ही कुछ और होते हैं ... (भाग II)

कुछ बातें, कुछ लोग, कुछ घटनाएं, कुछ यादें... ऐसी होती हैं जो हमेशा के लिए याद रह जाती हैं..... मैंने पहले एक ऐसी ही याद का वर्णन किया था... इस बार यह एक आदमी है - साधारण इंसान... साधारण काम... पर शायद इतना साधारण जो हम असाधारण लोग नहीं करते हैं। बात बर्ष २००५ की है... मैं अपने गर्मी की छुट्टियों में इन्टर्नशिप के लिए स्विटजरलैंड गया हुआ था । मैं एक प्रोफेसर के घर पर रुका हुआ था... प्रोफेसर साहब की बात फिर कभी.

अनजान देश - पहले दिन ऑफिस जाने के लिए मैंने बस और ट्रेन के टाइम टेबल का प्रिंट आउट लिया और निकल पड़ा ... ।  बस में बैठा तो देखा कि लोग बस में आते और एक कागज निकाल कर एक छोटी सी मशीन में ड़ाल देते ... एक हलकी सी खीच-खीच की आवाज़ आती... फिर लोग जाकर अपनी जगह पर बैठ जाते। मैं भी एक खाली सीट देखकर बैठ गया ... मुझसे किसी ने कुछ पूछा नहीं ना  ही मुझे कोई ऐसा आदमी दिखा जिसे पैसे दिए जाएँ। मैं थोडी देर वैसे ही बैठा रहा फिर सामने की सीट पर बैठे एक आदमी से पूछा:

-Excuse me, can you please tell me how to pay!

--You can pay to the driver, but only when bus stops... You cant pay while he is driving... are you new here?

-Yes, this is my first day here.

-- oh, okay. so where are You from?

- India, I am here for just three months, an intern at university.

-- That's terrific ! I am from UK. I have been to India for work couple of times - Ahmadabad and Delhi. Swiss is a pretty country, isn't it? Do You know that You will have to catch a train after this bus to reach the university?

- Yeah, I have schedule with me.

-- okay, where are you staying? why are you staying so far?

- Actually, I am staying with my guide at his home.

-- Okay. No problem. come with me, you can pay to the driver. Take a monthly pass. You must have observed people with passes... that machine is to validate the tickets.

......

बातें होती रही, मेरे पास केवल १०० फ्रैंक के नोट थे और बस का किराया ३.२०. पैसे उन्होने ही दिए. रेलवे स्टेशन आया... मैंने उन्हें थैंक यू बोला और ट्रेन के लिए टिकट काउंटर पर पंहुचा.  पता चला कि वो मेरे पीछे-पीछे काउंटर तक आ गए (वैसे ज़माना ऐसा है कि ऐसे शुभचिंतकों से डर भी लगने लगे)... मुझे जर्मन नहीं आती थी और काउंटर वाले को अंग्रेजी नहीं ।  उन्होने अनुवादक का काम किया और टिकट के अलावा और भी अनेकों जानकारी दे दी... कौन सा पास मेरे लिए अच्छा रहेगा, कौन सा सस्ता पड़ेगा, कौन-कौन सी घूमने की जगहें है, कौन से सुपर मार्केट में भारतीय खाना मिलेगा और कहाँ पर भारतीय दुकाने हैं... इत्यादी इत्यादी... फिर उन्होने मेरे प्रोफेसर का नंबर लिया और चले गए। आपको यहाँ ये भी बता दूं कि मेरे चक्कर में उनकी ट्रेन छुट गयी... और वो अगली ट्रेन से ही जा पाए। नंबर लेने का मतलब मुझे तब समझ आया जब मुझे कई भारतीय लोगो के फ़ोन आये... कब कहाँ क्रिकेट मैच है और कहाँ पर कौन से भारतीय सम्मेलन हो रहे हैं... सारी जानकारी मिल जाती थी ।

खैर अगले दिन फिर उनसे बस में ही मुलाकात हो गयी, एक ही दिन में मैंने पास भी ले लिया था, मैंने उन्हें फिर से थैंक यू कहा, और उनके पैसे वापस देने लगा। उन्होने इंकार कर दिया और जो बात कही उसी के चलते मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ... ।

अगर तुम मुझे वापस ही करना चाहते हो तो उनकी मदद करना जो तुम्हारी तरह अंजान जगहों पे जाते हैं ऐसे मौक़े बहुत मिलेंगे तुम्हे

अगले साल गर्मियों में मैं फिर से इंटर्नशिप करने गया ... वही बस... और फिर से एक दिन मुलाक़ात हो गयी... बहुत सारी बातें हुई... जिसका एक हिस्सा ये भी था....

-Hi, do You remember me, I am doing my second internship at same place and I am staying again with my professor...

-- oh Hi, good to see You again, BTW where is Your professor's house? come some time with him on dinner at my home... we will talk....

फिर पता चला कि उन्होने खुद मेरे प्रोफेसर से बात की और हम उनके घर भी गए, खाना भी खाया.... और बहुत सारी रोचक बातें भी हुई.... मेरी तरफ से मेरे प्रोफेसर ने भी उनको धन्यवाद दिया ... उस साधारण आदमी का नाम है... Steven Mike, शायद फिर कभी मुलाकात हो जाये. ।

~Abhishek Ojha~