Feb 9, 2016

...उस पार


ज्ञान देना (भाषणबाजी) बहुत मस्त काम है।

ज्ञान देने वाला खुद वैसा ही हो या नहीं इस बात से इसका कोई लेना देना नहीं. और फिर गूगल-फेसबुक-ट्विट्टर-विकिपीडिया के जमाने में जिसे देखिये वही घनघोर ज्ञान और संवेदना से लबालब भरा बैठा है. इतना कि उसे छलकाने के लिए मुद्दे-मौके कम पड़ जा रहे हैं ! भाषणबाजी से  याद आया कि जो लोग असल जिंदगी में चंद लोगों के साथ भी ढंग से न रह पाते उनसे अच्छा रिश्तों पर कोई नहीं बोलता ! घर में अँधेरा हो तो हो महफ़िल में चराग-ए-भाषण जरूर जलाते है. और ये तो खैर फैक्ट ही है कि लभ-गुरु बनने का सबसे ज्यादा पोटैन्श्यल होता है असफल प्रेमियों में।

पहले का पता नहीं पर आजकल ज्ञान देते-देते लोग लड़ने पर उतर आते हैं. ये कैसा अद्भुत ज्ञान? ! जैसे कोई कहे.... मैं बहुत अहिंसक हूँ और सामने  वाला  न माने तो उसकी गर्दन ही तोड़ दो - बोला था अहिंसक हूँ ! समझते ही नहीं हों लोग ! और एक लेवल के बाद दोनों ही पक्ष एक दूसरे को मुर्ख करार देते हैं! मुर्ख को उपदेश देना क्रोध को बढ़ाना है, मूरुख हृदयँ नहीं चेत , नेवर आर्ग्यु विथ स्टुपिड पीपल... वगैरह वगैरह कोट तो वैसे ही बरसाती मेंढक हैं इंटरनेट के.  वैसे आप विवाद का हिस्सा नहीं हैं तो कई बार मुश्किल होता है समझ पाना कौन बुद्धिमान वाला पक्ष है कौन मुर्ख वाला। लड़ते हुए देख लेने के बाद लगता है बुद्धिमता और मूर्खता अन्योन्याश्रित हो चली है। अगर आप एक पक्ष के साथ हैं तब तो मुर्ख ऑब्वियस्ली सामने वाला ही होगा।

खैर.. भाषणबाजी सुनकर अक्सर लगता है... कि भाषणबाजी अगर इस पार का काम है तो उसे जीना उस पार का। ज्ञान सुनाने वाले को समस्या हलवा लगती है और संसार बेवकूफ ! वहीँ सुनने वाले को लगता है - मेरी जगह होते तो इन्हें पता चलता ! सही भी है जब तक आप इस पार रहते हैं तब तक उस पार का सोच पाना कठिन सा होता है - एक अलग डाइमेन्शन में सोचने जैसा।

पर अक्सर लोग उस पार जाकर भी कुछ ज्यादा सीख नहीं पाते। छात्र जीवन में शिक्षकों को खडूस कहते रहे, शिक्षक बने तो छात्रों को नालायक करार दिया. उस पार गए तो इस पार का भूल गए - याद नहीं रहती खुद की अनुभव की हुई सारी बातें। डिस्टोर्टेड वर्जन याद रह जाता है। वैसे भी जो झेल चूका होता है उससे उम्मीद करना कि जो आप झेल रहे हैं वो बेहतर समझेगा तो आप भोले हैं - मैं ही नहीं कह रहा बड़े लोग भी ऐसा कह रहे हैं  - It’s Harder to Empathize with People If You’ve Been in Their Shoes

 - भाँति-भांति के लोग !

...भूमिका ख़त्म. बात पर आते हैं।

ज्ञान के नाम पर गर्दन तोड़ देने वाली चीज देखने को मिली पिछले दिनों। न्यू यॉर्क में एक प्रतियोगिता हुई जिसमें कई विश्वविद्यालयों के पढ़ने लिखने वाले छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। (यहाँ ध्यान दीजिएगा कि सारे छात्र पढ़ने लिखने वाले नहीं होते हैं - दंगा, धरना-प्रदर्शन, मार पीट, लफंगई  वगैरह वगैरह करने वाले भी छात्र होते हैं) न्यू यॉर्क ही नहीं छः-आठ घंटे दूर तक से छात्र छात्राएं आए थे...  (कभी कभी दूरी में वजन डालने के लिए उसे घंटे में भी नाप दिया जाता है)। छात्रों को एक 'केस' सोल्व करना था-एक कंपनी का केस।

अब छात्र माने बैचलर से पीएचडी तक। कुछ बिलकुल ही नवा-नवा कॉलेज में नामांकन कराये ... जिन्होंने कभी जेब खर्च के लिए भी नहीं सोचा होगा कि कहाँ से आ रहा है कहाँ जा रहा - उन्हें भी उसी केस के बारे में सोचना था। जिसके बारे में एमबीए, पीएचडी वाले भी सोच कर आए थे। पाँच-सात साल अनुभव वाले भी थे!  बोली भी अंग्रेजी होते हुए भी सबकी अलग (वैसे बहुमत - चाइनीज अंग्रेजी) । फिर ऐसे भी थे जो जबान से दनादन 'जार्गन' उगलते हैं - प्रति मिनट सौ-डेढ़ सौ की रफ्तार से - भले उसका केस से कोई लेना देना नहीं हो। वैसे मुझे लगता है दुनिया में मैं अकेला तो नहीं ही होऊंगा जिसे मीटिंग, कॉन्फ्रेंस  में काम के बात की जगह 'जार्गन' की दवनी होता सुनकर लगता है... छोड़िए फिर कभी :)

बहुत मेहनत की थी सबने... लेकिन प्रेजेंट करने वाला जैसा भी हो 'जज' (अक्सर) होता है - बेशर्म - भाषणबाज -  ज्ञान झाड़ने वाला- गर्दन तोड़ने वाला अहिंसक। सवाल पूछने से पहले ये भी नहीं सोचता कि... जिसे क, ख, ग ढंग से नहीं पता हो उससे उपनिषद एक्सप्लेन करने को कहना - मतलब क्यों? ! ... जज का एक काम शायद सामने वाले को बेइज्जत करना भी होता है! वो प्रजेंट करने वाले से प्यार से बात नहीं कर सकता।

मुझे उस पार ...यानी जज वाले साइड बैठना था. मेरे बगल में बैठे एक सज्जन बार बार - "व्हाट द [अगला शब्द आप समझ ही गए होंगे]" - और बार बार टीम्स के किये कराये को "[बैल का गोबर]" करार दे रहे थे। खैर इट्स कूल टु टॉक लाइक दैट दीज डेज। मैं उस पार बैठने वाला नवा-नवा मैं क्या ही बोलता ज्यादा कुछ.  सोचा पूछ लूँ - "आपको उस उम्र में पता था कि जो पढ़ रहे हो वो इंडस्ट्री में इस्तेमाल नहीं होता?" फिर ये सोच रहने दिया कि हो सकता है वो अभिमन्यु रहे होगे !

हमारा दिल पिघल रहा था.. हम उस पार होके भी नहीं थे. हम सोच रहे थे किस किताब की लाइन उठा के लाये हैं... जो बोल रहे हैं वैसा क्यों बोल रहे हैं? कहाँ से सीखा होगा? हंसी नहीं आई मुझे कॉपी-पेस्टीय अनभिज्ञता पर - जहाँ हो सकता था ज्ञान से प्रभावित जरूर हुआ। पता तो वैसे भी चल ही जाता है जो रट के बोल रहे होते हैं ...जिनका मतलब भी नहीं पता उन्हें ! पर मैं ये सोच रहा था कितनी मेहनत की है एक एक शब्द पर...  कितना तैयार होकर आए हैं... बाहर गया तो देखा... लड़के-लडकियां रट रहे थे टहलते हुए। आखिरी मिनट तक।  स्लाइड देख कर न बोलना पड़े... सूट, जूते, घड़ी, बाल... सब एक दम चकाचक। एक बाल इधर की जगह उधर नहीं... जैसे चमको छाप डिटर्जेंट के एजेंट हों ! कब स्माइल करना है, कैसे अभिवादन करना है. कब तक किसे बोलना है. हमें अपने दिन याद आ रहे थे - प्लेसमेंट सीजन के पहले दो चार लोगों को छोड़ दें तो सूट और जूते क्या बेल्ट भी उधार का होता था - "अबे जल्दी जाओ तैयार होके... आधे घंटे में इंटरव्यू है"। खबर हॉस्टल में आती तो लोग अभियान शुरू करते कपड़े ढूंढने का..."..."अबे जल्दी जाओ, इसी के ऊपर पहन लो !"। कितनी बार सब कुछ आते हुए भी नहीं बोल पाना...

मैं ये भी सोचता रहा कि किसका बैकग्राउंड क्या होगा। उनसे पूछ भी लिया   - सही ही सोचा हर बार। फाइनन्स, मैथ, कम्प्युटर साइंस, एकोनोमिक्स, मार्केटिंग... फर्क दिखता है कौन क्या पढ़ा है। कौन कैसे तर्क देता है. किसने कितनी मेहनत की है वो भी दिखता है। हमेशा एक दो टीम ही बहुत अच्छी होती है... वो ऐसे ही दिख जाता है। पर एक बात मुझसे देखी नहीं जा रही थी  - जजों द्वारा तौहीन ! - [बैल का गोबर]

एक दो ग्रुप से सवाल पूछे जाने के बाद लड़के-लड़कियों की शक्ल देखने लायक हो गयी ! घोर हताशा... जैसे एक पल में सारी मेहनत चली गयी हो ! दिल टूटता हुआ दिखता है चेहरे पर। उम्मीद का टूट जाना. बोलने से पहले काँपती है आवाज। गया सब कुछ... करुणा टाइप का हो जाता है।  ...उनका गला सुखने लगा हो जैसे... और मेरे बगल में बैठे सज्जन ने भकोसी हुई कुकी को कॉफी से गले के नीचे उतारते हुए कह दिया  - [बैल का गोबर] - राम राम !

मैं सोच रहा था क्या चल रहा होगा उनके दिमाग में वैसे सवाल पर जो उन्हें ढंग से समझ भी नहीं आया?

- क्या होगा इसका सही उत्तर? सुना हुआ तो लग रहा है... जैसे दिमाग के सारे न्यूरॉन एक साथ चमक गए हों... - ओह ! तो ये बोलना था? आसान था यार पर समझ ही नहीं आया। ...क्या पूछ रहा था यार वो मैंने तो कभी सुना ही नहीं था... फिर से सवाल रिपीट करने को बोला तो जो थोड़ा बहुत समझ आया था वो भी हवा हो गया. विनिंग टीम को देखा तुमने? अबे यार इतने सीनियर लोग आएंगे तो क्या ही होगा। लेकिन क्या ही प्रेजेंटेशन था यार उनका - फ्लॉलेस! हमने तो कुछ किया ही नहीं। मुझे तो अब सोच के ही शर्म आ रही है, हम क्या ही बोल रहे थे ...हम कहीं नहीं टिकते। अबे यार पर उस खडूस जज को कुछ नहीं आता ! पता नहीं किसने बना दिया उसे जज।  कितना समझाया मैंने उसे... उसे समझ ही नहीं आया कि हमने किया क्या है। पता नहीं क्या पूछ रहा था। उस बात का  इस केस से क्या लेना देना ?- पकड़ के बैठ गया एक ही बात। इतना कुछ किया था किसी ने कुछ सुना ही नहीं, सब बेकार हो गया! हड़बड़ी में जो एक कोट रट के गया था वो तो बोल ही नहीं पाया। छोड़ यार अब... ...वैसे हमारा तो उनसे अच्छा ही था... मेहनत तो की ही थी हमने. बस लटके झटके अच्छे थे उस टीम के  हमने कितना काम किया था।  उन्होने तो कुछ किया भी नहीं और जीत गए.

हमेशा अंत में बात यहीं रुकती है... एक टीम का प्रेजेंटेशन अच्छा था और एक का काम अच्छा था। और एक टीम हमेशा होती है जो अच्छी होकर भी नहीं जीतती।... मेरा दिल और वोट हमेशा उनको जाता है। ये अनुभव हुआ कई बार... पहले भी और इस  बार भी.

खैर... बात जब दूसरे पार की हो तो थोड़ा मुश्किल भी होता है समझना... जैसे मान लीजिये पढ़ाने वाला निश्चय कर ले कि मैं किसी को फेल नहीं करूंगा और ये कि... जिसे मन हो वो पढे नहीं तो क्लास आने की जरूरत नहीं है। पढ़ाने वाले को लगेगा कि इतना रोचक है, मैं इतना अच्छा समझाता हूँ... कैसे नहीं पढ़ेगा कोई ? और स्टूडेंट को लगे... अबे एक दम गाय है प्रोफेसर... एक दम कूल। इस कोर्स में कोई टेंशन नहीं... दूसरा वाट लगा देगा उसीका पढ़ते हैं !

पटना में राजेसजी से हुआ वार्तालाप याद आया - मैंने कहा था- ‘जूनियर इम्प्लोयी से बड़े बुरे तरीके से बात करते हैं वो. प्यार से बात करने से सब काम हो जाता है लेकिन….’
‘अरे नहीं सर ऊ त ठीके है. बिना उसके इहाँ काम चले वाला है? इहाँ नहीं चलेगा आपका परेम-मोहबत. आप नहीं समझेंगे यहाँ का मनेजमेंट… यहाँ परेम देखाइयेगा त जूनियर एम्प्लाई आपका बेटीओ लेके भाग जाएगा’।...एक ये पहलू भी है जो अनुभवी लोग बताते हैं, मैं सहमत होऊं या नहीं!

 ...खैर अंत में हुआ यूं कि उस पार  बैठे हुए भी मेरी इस पार वालों से खूब दोस्ती हुई. भाषणबाजी ही कहेंगे पर मैंने जो टीम रोने-रोने सी हो गयी थी और वो एक टीम जो अच्छी होकर भी नहीं जीतती। उनसे बहुत देर बात की... अच्छा अनुभव रहा. बहुत कुछ सीखने को मिलता है खासकर उस पार बैठने पर जब आपको हार जीत की फ़िक्र नहीं होती !

और सबसे अंत में हुआ यूँ कि... किसी ने एक फोटो शेयर की कैप्शन था - 'विनिग टीम विथ जजेस'... उसमें एक चेहरा हमारा भी था. हमें विनर होने के बधाई के कुल छःमेसेज आये । हम विनर तो थे नहीं ...उस पार वाले हो चुकने के बाद यही सोच खुश हो लिए कि... शायद हमारी त्वचा से हमारी उम्र का पता ही नहीं चलता होगा ! :)

~Abhishek Ojha~


Dec 8, 2015

... 'ओक्सिटोसिन' क़हत टैटू मोरा


बात शुरू हुई एक रस-आयनिक टैटू वाले ट्वीट से - 

Oxytocin Tattoo
इस पर पोस्ट लिखने की बात हुई तो याद आया - चित्र देखकर कहानी लेखन जैसा कुछ होता तो था हिन्दी-व्याकरण की किताबों में। हर व्याकरण की किताब में एक तस्वीर जरूर दी ही होती थी। सारस और लोमड़ी. तस्वीर देखते ही कहानी समझ आ जाती कि दोनों ने एक दूसरे  को कहा होगा - "कभी खाने पर आओ हमारे घर"... आगे की कहानी तो आप समझ ही गए होंगे। हमारी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है ! दस बटा दस पाने वाले विद्यार्थी को भी तस्वीर दे दीजिये कहानी लिखने को तो वो उसमें भेड़िया, लोमड़ी, सारस ही तो ढूंढेगा? हमने भी बहुत गौर से देखा लेकिन इसमें ऐसा कुछ दिखा नहीं। मोबाइल उल्टा करके देखना पड़ा तब थोड़ा बहुत समझ आया कि ये चित्र है क्या ! 

...बैकग्राउंड पर से ध्यान हटा गौर से देखा तो ये संरचना कुछ तो देखी-देखी सी लगी. ख्याल आया कि ओक्सिटोसिन तो नहीं ? गूगल किया तो ख्याल 'अटेस्ट' हो गया। ओक्सिटोसिन माने प्यार-मोहब्बत का रसायन- लव हार्मोन। अब अनुमान तो यही लगाया जा सकता है कि ये टैटू, ये मुद्रा... 'ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा' टाइप्स प्यार से ही जुड़ा होगा. किसी ने कह दिया होगा - यही है असली केमिकल लोचा तो गोदवा ली होंगी अपनी काया पर ! (टैटू से टैटूवाना क्रिया बने न बने हिन्दी में गोदवाना/गुदवाना ही कहते हैं) या फिर हो सकता है बुद्ध के चार सत्य की तरह अनुभूति हो गयी हो मोहतरमा को - 
इस दुनिया में प्यार ही प्यार है। प्यार का कारण ओक्सिटोसिन है। प्यार को पाया जा सकता है। और फिर प्यार प्राप्ति के अष्टांग मार्ग में एक टैटू गोदवा लेना होता होगा या अभय मुद्रा, धर्मचक्र मुद्रा इत्यादि की तरह प्यार प्राप्ति के बाद की टैटू-मुद्रा होगी ये.

अब हम और सोच भी क्या सकते हैं? हमसे कोई पूछे तो। ...टैटू बनवाने में दर्द भी, पैसा भी और ऊपर से परमानेंट... वो भी एक केमिकल का फॉर्मूला ! हम एक और सवाल पूछ बैठेंगे - मतलब... क्यों? कोई मज़बूरी थी?... मान लीजिये कल को पता चला कि हाइड्रोक्साइड गलत जगह पर लग गया हो, कल को ये भी हो सकता है प्यार पर से भरोसा ही उठ जाये, बेहतर केमिकल का आविष्कार हो जाये तब? दाहिने भुजा टैटू बनाए के बाद अहिरावण की भुजा उखाड़े स्टाइल में कुछ करना पड़ जाएगा. (अगर टैटू भुजा पर हो तो नहीं तो जो भी अप्रोप्रिएट हो)। वैसे भी साइंस का क्या भरोसा ! रिलिजन तो है नहीं... किसी ने कह दिया तो वो शाश्वत सत्य हो गया।  विज्ञान की तो खूबसूरती ही इसीमें है कि सवाल उठाओ! आइंस्टीन को भी गलत कर दिए तो कोई फतवा थोड़े जारी करेगा. उलटे और वाह-वाही होगी। कल का सही आज तक गलत नहीं हुआ तो कल गलत नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं। गलत नहीं भी होगा तो बेहतर सत्य आते रहेंगे ! खैर... इतना सोचने वाले टैटू नहीं बनवाते होंगे।

प्यार की बात आती है तो मुझे तुलसी बाबा कि ये बात जरूर याद आती है। बड़ी रोमांटिक लाइन है - 

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥

तुलसी बाबा संत आदमी थे। वैसे हमेशा से संत नहीं थे. मैंने तूफ़ान से लड़ते आशिकों को भी तुलसीदास कहे जाते सुना है। नदी पार करने वाली उम्र में होते तो शायद कुछ और कहे भी होते... लेकिन ये बातें उन्होने आत्मज्ञान और प्रभु दर्शन हो जाने के बाद कही। प्रेम का सार, प्रीति-रस इतने में ही है - विशुद्ध बात। पर टैटू से पता चलता है वो ओक्सिटोसिन नामक प्रेम-रस तक सीमित प्रेम की बात है ! लव-केमिकल यानि प्रीति-रस का नाम पता चला टैटू बनवा लिया - प्रीति रसु एतनेहि माहीं. 

खैर... हमने भी ट्वीट का जवाब ट्वीट से दे दिया  - "तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। ओक्सिटोसिन कहत टैटू मोरा।" ट्वीटर पर अक्सर 140 अक्षर में ही बात वहीँ की वहीँ निपट जाती है। पर जवाब के बाद भी पोस्ट की बात बाकी रह गयी। और आप तो जानते ही हैं कि उधार-बाकी ओक्सिटोसिन का एंटीडोट है... (प्रेम उधार की कैंची है का अनुवाद !)

अब बात निकली तो बता दें कि हम भी टैटू एक्सपर्ट रह चुके हैं। मेरे एक मित्र को टैटू टैटूवाना था - दाहिनी भुजा पर गर्लफ्रेंड का नाम - तमिल में। बिना गर्लफ्रेंड को बताये। तमिल उन्हें खुद आती नहीं थी। समस्या ये थी कि गूगल इनपुट टूल्स पर ज्यादा भरोसा किया नहीं जा सकता। पता चला कुछ और ही गोदवा लिए ! "गोदनाधारी अपने गोदना के लिए खुद ज़िम्मेवार है" टाइप डिस्क्लेमर ना भी हो तो गोदनाहार को तो आप जो देंगे वो तो वही बना देगा। ...रिस्क लेना भारी काम है। जैसे इसी गोदना में... मान लीजिये एक दो हाइड्रोक्साइड गलत जगह पर लग गए और पता चला ओक्सिटोसिन की जगह कोर्टिसोल की तरह काम करने लगा ! केमिस्ट से प्यार होगा तो वो तो पकड़ लेगा कि फार्मूला ही गलत है.

दोस्त-दोस्त के काम आने वाले सिद्धान्त के तहत हमने अपने एक तमिल सीनियर को ईमेल किया। हमारे सीनियर तब हार्वर्ड में थे। बहुत बड़े फिजिस्ट हैं। पर मामला भी गंभीर ही था। गंभीर न भी हो तो अब किसी दोस्त को कल को नोबल प्राइज़ भी मिल जाये तो ऐसा थोड़े न होगा कि पीएनआर कन्फर्म हुआ या नहीं जानने के लिए उसको फोन नहीं करेंगे? (वो बात अलग है कि अब फोन में इन्टरनेट हो गया पर अपने जमाने का डायलॉग मार दिया तो आप दोस्ती के वसूल का मर्म समझ ही गए होंगे)। मेरे सीनियर ने भी इस बात को उम्मीद से कहीं ज्यादा गंभीरता से लेते हुए विस्तृत जवाब भेजा। निष्कर्ष ये था कि वो उत्तर भारतीय नाम तमिल में शुद्ध तरीके से लिखा ही नहीं जा सकता! तमिल भाषा की अपनी सीमाएं हैं। (तभी पता लगा कि त को थ क्यों लिखा रहता है कई तमिल नामो में)। खैर उनके सुझाव के हिसाब से जो सबसे सटीक हो सकता था वो हमारे मित्र ने अपने हाथ पर गुदवा लिया ! गलत नाम गुद जाने के अलावा एक रिस्क ये भी था... जो तनु वेड्स मनु में कंगना ने राजा अवस्थी के नाम का टैटू करा ले लिया था! उसमें उन्होंने हल भी बताया था - सरनेम का टैटू है उसी नाम का  कोई और ढूंढ लुंगी। उनके इस डर से ये बात भी सीखने को मिली थी कि आधुनिक इश्क़ में चीजें 'वैरिएबल' होनी चाहिए - परमानेंट कभी नहीं। लभ लेटर हो या टैटू... पुनः इस्तेमाल होने वाले होने चाहिए। रिसाइकल होने वाले। ओरगेनिक - ग्रीन टाइप्स। - मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।

खैर... ओक्सिटोसिन को वैज्ञानिक प्रेम-मुहब्बत के लफड़े वाला केमिकल मानते हैं। यही वो केमिकल है जिससे उल्फ़त वाला लोचा होता है। माँ के 'माँ' जैसी होने के पीछे भी लोग-बाग इसका होना ही कारण बता देते हैं। और भी कई चीजें - भरोसा वगैरह। दरअसल भोले लोग बहल जाते हैं। इतना आसान होता तो... दो चार सुई घोंप देते(-लेते) इश्क़ कम पड़ने लगता तो. नहीं? दरअसल बस इतना भर है कि किसी न्यूज चैनल वाले को बता दीजिये तो 'गॉड पार्टिकल' की तरह इस पर भी आलंकारिक भाषा में प्रोग्राम कर देंगे - वैज्ञानिकों के ढूंढा लोचा-ए-उल्फ़त का केमिकल। और वो देख बायोलॉजिस्ट-केमिस्ट वैसे ही सर पीट लेंगे जैसे गॉड पार्टिकल पर प्रोग्राम देख फिजिसिस्ट ! इस बात पर कैसी कैसी हेडलाइन बनाएँगे न्यूज बेचने वाले वो आप यहाँ एक ब्रेक लेकर सोच-सोच मुस्कुरा लीजिये। 

ब्रेक के बाद -

ऐसे ही एड्रेनालीन, डोपामिन जैसे कई केमिकल लोग बताते हैं ख़ुशी वगैरह के लिए। पर खुशी, प्रेम... जैसी जटिल चीजों को एक केमिकल में सिमटा देना वैसे ही हो जाएगा जैसे भोले लोग खुशी का फॉर्मूला दे देते हैं - माइनस और माइनस मिला के प्लस बन जाता है। बिल्कुल सही बात है ! पर यहाँ कर्ल-डाइवरजेंस-इंटेग्रेशन-स्टोकास्टिक-अगैरह-वगैरह भी लगा दीजिये तो संभव है कभी खुश हो जाने का फॉर्मूला लिख पाना?

पर जिसने टैटू कराया उससे कह दीजिये कि ये प्यार का फॉर्मूला नहीं है तो बिगड़ ही जाएगा ! भोले लोग हैं...  साइंस, फिलोसोफी, गायक, भगवान, शंख, चक्र, गदा, क्रॉस, चिड़िया, फूल, पत्ती, जो पसंद आये छपवा लेते हैं. किसी ने भेजा था मुझे एक मैथ वाला टैटू...

Math Tattoo 
मैंने कहा - खूबसूरत है ! पर ध्यान भटक जा रहा है। गणित ऐसे तो नहीं पढ़ा जा सकता। और जगह भी कम पड़ गयी है। जगह कम होता देख फ़र्मैट का मार्जिन याद आ गया। एक महान गणितज्ञ हुए फ़र्मैट, वो लिखते लिखते लिख गए थे एक धांसू प्रमेय। और उसके बाद लिख गए - "मेरे पास इस प्रमेय का प्रूफ भी है पर उसे लिखने के लिए ये मार्जिन बहुत कम है"। जो प्रमेय लिख के गए वो गणित का सबसे कठिन सवाल बन गया. सदियों बाद हल भी हुआ तो ७०० पन्नों का हल छपा. गणित के लिए मार्जिन होना बहुत जरूरी है. बड़ी महिमा गायी है गणित के विद्वानो ने. फ़र्मैट साहब के पास थोड़ा और मार्जिन होता तो गणित का इतिहास शायद आज कुछ और होता ! और इस टैटू में... कालिदास के शब्दों में जिसे "मध्‍ये क्षामा" कहेंगे वहां तो... ना हो पायेगा. 







लीजिये लिखते लिखते एक किताब में मिले मॉडलस-ऑन-मॉडलस वाला आलंकारिक गोदना भी याद आ गया - मॉडल मॉडल ते सौ गुनी मादकता अधिकाय- 

Models on Models 
कुछ लोग संस्कृत के मंत्र ही गुदवा लेते हैं। श्लोक के उच्चारण का महत्त्व तो पढ़ा है। गुदवाने का भी कुछ तो फायदा होता ही होगा। नहीं तो कम से कम संस्कृत तो पढ़ ही लेते होंगे थोड़ा बहुत। जैसे केटी पेरी का टैटू देखा तो लगा ये सबसे अच्छा तरीका हो सकता है लोट लकार, प्रथम पुरुष का उदाहरण पढ़ाने के लिए। खट से याद हो जाएगा ! 
और कुछ लोग - अजंता एलोरा के भित्ति चित्र  की तरह पूरा शरीर ही चलता फिरता कला का संग्रहालय बनवा लेते हैं! खैर हमसे किसी ने एक बार पूछा था धार्मिक कुछ बताओ टैटू करवाने को तो हमने कहा था कीर्तिमुख बनवा लो ! 

...टैटू का अच्छा मार्केट है. एक टैटू सलाहकार की दुकान खोली जा सकती है. बढ़िया चलेगा।

अभी ही देखिये बात निकली तो तमिल भाषा की सीमा से लेकर, प्रेम, ओक्सिटोसिन, किर्ति मुख, फ़र्मैट... कितना कुछ है जी जो अभी चर्चा में आ गया। प्रेम और टैटू का तो खैर गहरा संबंध है। 
वैसे... गोदना की डिजाइन के साथ साथ अंग चयन की भी बड़ी महिमा बताई है टैटू-विद्वानो ने :)

(टैटू पर बहुत अच्छा पढ़ना हो तो यहाँ पढ़िये)

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~Abhishek Ojha~ 

Oct 16, 2015

अहिम्सा (यूनान २)


नयी जगहों पर जाते हुए मन में कहीं न कहीं चलता रहता है कि वहाँ खाने को पता नहीं क्या मिलेगा ! वैसे समय के साथ ये समस्या लगभग खत्म हो गयी है। मेरे एक दोस्त कहते हैं - 'ये ऐसा वेजिटेरियन है कि कुछ भी खा सकता है'। उनके कहने का मतलब मांस-मछली-अंडा के अलावा मैं कुछ भी लगभग निर्विकार भाव से खा लेता हूँ। जैसे सुना है कि सुट्टेबाज अजनबियों में अक्सर माचिस-सुट्टे को लेकर बातचीज शुरू हो जाती है... (होती होगी !) वैसे ही मेरा शाक-पात-भक्षी होना एक मुलाक़ात का कारण बना था, ग्रीस में, आइरिन से - 

वैसे ये सुखद था कि ग्रीस में मुझे खाने-पीने की कोई दिक्कत नहीं हुई। शायद ये भी कारण रहा हो कि मैं जिन जगहों पर गया वो सारे विश्वप्रसिद्ध पर्यटक स्थल हैं । या एक कारण ये भी हो कि खाने में आधा किलो टमाटर, चीज के साथ सामने रख दिया जाना भी मुझे अच्छा ही लगा। टमाटर-चीज-शिमला मिर्च-बैंगन-दही-फल-ब्रेड-चावल-पास्ता... अब देखिये लिखना शुरू किया था तो लगा बस टमाटर और चीज ही तो खाने को मिलता था। पर लिस्ट लंबी होती गयी। कहने का मतलब ये कि दही-टमाटर-चीज की प्रमुखता रही पर दिक्कत वाली कोई बात नहीं थी। सैलेड के अलावा जेमिस्टा, केफेटेडेस, लंदर, फंदर जो भी नाम रहे हों व्यंजनों के एकाध बार छोड़ दें तो जीभ को भी कुछ खास शिकायत नहीं रही। मुझे लगता है कहीं न कहीं खान पान पर यूरोप के अलावा ओट्टोमान साम्राज्य और मध्य पूर्व की  मिश्रित सभ्यताओं का असर इस ना-शिकायती का कारण रहा होगा। कहने का मतलब ये कि जीभ के गुलाम लोगों के लिए भी ग्रीस अच्छी जगह है। 

खैर… खाने के चक्कर में आइरिन की बात अधूरी ना रह जाए. आइरीन से मुलाक़ात हुई थी एक खूबसूरत रेस्तरां में। मेरे अपने शाकभक्षी होने की बात वेटर को समझा चुकने के तुरत बाद पीछे से आवाज आई - 'हाउ लॉन्ग हैव यू बीन अ वेजिटेरियन?' मैंने मुड़कर देखा तो आइरिन मुस्कुराती नजर आई। 

मैंने कहा - 'हाय ! आई वाज रेजड ऐज़ ए वेजिटेरियन सो... बेसिकली माई एंटायर लाइफ' 
'वॉव ! यू नेवर ईवन ट्राइड? आई वाज अ वेजेटेरियन फॉर फ़्यू यीयर्स। बट देन... इट्स टफ।' 

मैंने जवाब में मुस्कुरा दिया। शायद कोई बहुत छोटा उत्तर नहीं था मेरे पास जो एक अजनबी को दिया जा सके। पर जब आइरिन ने खुद ही अगले सवाल के रूप में जवाब देते हुए कहा - 'बिकॉज़ ऑफ अहिम्सा ?' तो बात आगे निकल गयी। इससे पहले मुझे याद नहीं कभी मैंने एक शब्द का उत्तर दिया हो अपने शाकाहारी होने के सवाल का। 'अहिम्सा' सुनकर बहुत सुखद अहसास हुआ.

बात आगे बढ़ी तो आइरिन ने बताया कि 'योगा ऐंड इन्दु फिलॉसोफी' में उसे रुचि है। कुछ क्लासेज भी की है उसने। दे इवन सर्व अ योगिक वेजिटेरिअन मील ओन वीकेण्ड्स.

'ऐंड वॉट अबाउट आयुर्वेड़ा?' उसने पूछा।

मैंने आइरिन को बताया कि मुझे आयुर्वेद  की कोई ख़ास जानकारी नहीं। उसने पूछा 'व्हाइ? आई लव आयुर्वेड़ा ! यू हैव बीन टू केराला? व्हेयर आर यू फ़्रोम इन इंडिया?' बात अहिंसा से आयुर्वेड़ा पर आई तो मुझे समझ में आ गया कि इस लड़की को पर्यटक स्थलों पर भारतीय देखकर 'नामास्ते'  और बिना रुके-थमे एक सांस में 'केसहेंयाप' कहने वालों से कहीं ज्यादा पता है। (एथेंस में एक गाइड ने हाथ जोड़ 'केसहेंयाप' कहा तो मुझे थोड़ी देर तक समझ नहीं आया कि वो क्या कह रहा है। फिर उसने पूछा यू नो हिन्दी? तब समझ में आया कि वो 'कैसे हैं आप' कह रहा था।)

मैंने आइरिन को अपने तरीके से समझाया कि मुझे आयुर्वेद की जानकारी इसलिए भी नहीं क्योंकि मुझे  उसकी कभी जरूरत नहीं पड़ी। वैसे तो मैं बहुत उत्सुक इंसान हूँ पर दुनिया में कई चीजें ऐसी हैं जिनका मैं अनुभव करना नहीं चाहता। चिकित्सा भी वैसी ही एक चीज है - वो चाहे आयुर्वेद हो या कुछ और। जैसे मान लो मेरे पास कुछ दवाइयाँ पड़ी हैं। मेरे हिसाब से उनका सबसे अच्छा उपयोग होगा कि वो पड़ी-पड़ी खराब हो जाएँ !  सबसे अच्छा उपयोग कि वो उपयोग में आए ही न । अब जैसे मेरे मेडिकल इन्स्युरेंस का सबसे अच्छा पैसा वसूल यही तो होगा कि वो बिन इस्तेमाल हुए मेरी जगह बीमा कंपनी का ही फायदा करा दे? मैं नहीं चाहता कि वो बेकार जा रहे पैसे वसूल करने की कभी नौबत आए। 

आइरिन को मेरी बात अच्छी लगी। उसने पूछा 'बट व्हाट अबाउट योगा ऐंड आयुर्वेड़ा ऐज़ वे ऑफ लिविंग?'

मैंने आइरिन को समझाया कि बहुत तो नहीं पर हां जिस तरह मैं पला बढ़ा कुछ वे ऑफ लिविंग की बातें  'बाई डिफ़ाल्ट' ही पता होती जाती हैं - अनकोंसियसली... नॉट एक्सपर्ट बट यू नो वॉट आई मीन। मैंने सोचा कि अब घर की बात क्या बताई जाये उसे पर सच्चाई तो ये है कि हमारे देश में हर दूसरा इंसान ही वैद्य होता है। 

थोड़ी इधर उधर की बात हुई तो आइरिन ने पूछा - 'यू डोंट ड्रिंक ऐज़ वेल? यू डोंट नो माई फ्रेंड वॉट यू आर मिसिंग'।

फिर आइरिन ने मुस्कुराते हुए मुझे एक टंगा हुआ बोर्ड दिखाया जिस पर लिखा था “A man who drinks only water has a secret to hide. - Charles Baudelaire" 

मैंने कहा - आई डोंट नो, इफ आई कैन कीप माई सिकरेट्स आफ्टर अ ड्रिंक ऑर नॉट... बट ऐज़ यू सेड़ आई डोंट नो वॉट आई एम मिसिंग ! और जब मुझे पता ही नहीं कि मैं क्या मिस कर रहा हूँ क्या नही तो फिर उस चीज की कमी कैसे हो महसूस हो सकती है? कभी किया होता तब तो अच्छा, बुरा या फिर मैं क्या मिस कर रहा हूँ ये पता चलता ? मैंने आइरिन को समझाया कि 'आई डोंट नो वॉट आई एम मिसिंग' भी एक उत्तर है कि मुझे क्यों कभी ट्राई करने की जरूरत नहीं पड़ी। गुड टिल आई डोंट नो. 

"बट देन हाउ विल यू एवर नो हाऊ ईट फील्स लाइक? दिस वे यू कैन नेवर फील फ़्यू थिंग्स। "

मेबी आई डोंट नीड़ टू ! आई नेवर फेल्ट दैट आई शुड। शायद मुझे कभी इनकंप्लीट लगा नहीं क्योंकि 'आई डोंट नो वॉट आई एम मिसिंग'। मैंने आगे कहा कि कैसे ये आइरिन के लिए समझना कठिन हो सकता है. जिसकी कभी आँखें रही ही नहीं वो कैसे सोच सकता है कि जो देख पाते हैं वो क्या देखते होंगे? अच्छा, बुरा या मिस करने का सवाल ही नहीं उठता। बात वैसी ही है कुछ. मैंने उसे समझाया कि जब मैं अपने उन दोस्तों के साथ जाता हूँ जो  - प्याज, लहसुन, दूध तक नहीं खाते ! मुझे तुरत लगता है कि ये खाते क्या हैं फिर? इन्हें तो पता ही नहीं स्वाद क्या होता है? ये जिंदा कैसे रहते हैं? मैं भी वैसा ही हूँ तुम्हारे लिए. पर कहीं न कहीं जो नहीं जानते कि वो क्या मिस कर रहे हैं उनके लिए आसान है वैसे ही बने रहना। पर एक बार कुछ जीवन का हिस्सा बन जाये फिर उसे छोडते हुए आपको पता होता है कि क्या जा रहा है जिंदगी से क्या नहीं। बीलीव मी, इट्स गुड समटाइम्स नॉट टू नो वॉट वी आर मिसिंग ऑर नॉट मिसिंग। 

ऐसा लगा जैसे आइरिन को फिर मेरी बात पसंद आई। 

उसने बताया कि वो कुछ साल तक वेजिटेरियन रह चुकी है। इंडिया से लौटने के बाद। - आई हैव बीन टू इंडिया - केराला, रिचिकेश, वारानासी ऐंड माडुराई।

मुझे बहुत खुशी हुई। अब पता चला कि उसे इतना कैसे पता है.  आइरिन ने आगे बताया... वो पहली बार भारत गयी आयुर्वेद के लिए। दुबारा ब्रेकअप होने के बाद 'योगा कैपिटल रिचिकेश'। जब उसके सारे दोस्तों की शादी होने लगी और वो अकेली, टूटी, अवसाद में डूबी, सब कुछ खो जाने के बाद. उन दिनों उसे किसी ने उसे ऋषिकेश जाने की सलाह दी। तब वो बत्तीस साल की थी.

"इट वाज सो डेंजरस बट आई टूक अ डीप इन गैन्गीज।" उसके बाद उसी यात्रा पर वो अपने होने वाले पति से मिली मदुरै में ! किसी फिल्मी कहानी की तरह मैं आइरिन की बातें मंत्रमुग्ध सुनता रहा। ही इज फ्रॉम रोमानिया। लाइफ हैज बीन काइंड आफ्टर दैट. आइरीन ने मुझे अपनी बेटी की फोटो भी दिखाई - ईट वाज हर सेकंड बर्थडे लास्ट मंथ. 
उसके पति नौकरी ढूंढ रहे हैं। क्राइसिस में आसान नहीं है, ऊपर से कैपिटल कंट्रोल। ... बट आई हैव सीन सो मच दैट... आई डोंट वांट टू डू एनिथिंग स्टुपिड अगेन। 

मैंने सतही सा घिसा पीटा दिलासा दिया - डोंट वरी... सब ठीक हो जाएगा.

'विल यू गो अगेन टु इंडिया?' मैंने पूछा
'आई डोंट नो ! लाइफ हैज़ बीन सो अनप्रेडिकटेबल सो फार। आई वांट टू... मेबी वंस माई डाटर ग्रोज अप' 

आइरिन ने मुझसे पूछा - 'यू? विल यू कम अगेन टू ग्रीस?'  हाउ डू यू लइक इट?'

'वंडरफुल सो फार. अबाउट कमिंग अगेन... आई डोंट नो. प्रॉबब्ली नॉट बट देन… हु नोस ! फ्यू इयर्स बैक आई वुड हैव नेवर इमेजिनड आई विल एवर कम टु ग्रीस!' 

"यू लूक वेरी काम ऐंड फिल्ड। लेट मी गेस समथींग, यू हैव नेवर बीन इन लव? ऐंड यू हैव नेवर बीन विथ समवन रियली स्टुपिड?" 

"वॉट मेक्स यू थिंक दैट?"

'लव बिकौज…अटैचमेन्ट्स माई फ्रेंड ! दे रूईन एव्रिथिंग -अ मेजर पार्ट ऑफ़ यू. ऐंड… यू हैव नो आइडिया अबाउट फूलिश ऐंड ओब्स्टिनेट पीपल माई फ्रेंड !'

मैंने बस मुस्कुरा दिया... एक शब्द का उत्तर सुझा नहीं और फिर बात लम्बी हो जाती ! 

...
दुनिया के हर कोने में लोगों की कहानी एक जैसी ही होती है। बस कहने और सुनने वाले होने चाहिए। …खोना, पाना, गलतियाँ, संघर्ष, प्यार, सुख, दुःख, जीना सीखना... आइरिन की कई बातें ऐसी लगी जैसे पहले भी कई लोगों के मुंह से सुनी हो। वैसे लोगों के दुःख की बातें भी होती हैं जिन्हें देखकर हमें लगता है - 'इन्हें भला क्या दुख होगा !' प्यार मुहब्बत किसी को इतना कैसे तोड़ सकता है. लगता है जिन्हें कोई दुःख नहीं अचानक वही सबसे अधिक दुखी दिख जाते हैं ! अधुरे...  

आइरिन से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा। बहादुर ! किसी ने कह दिया तो भारत तक चली जाने वाली -गंगा में डुबकी लगा आने वाली. रोमानियन को मदुरै में पा लेने वाली. कई बार मैं लोगों के दुःख सुन अक्सर अपने अंदर खुद से कह देता हूँ  - जिसके पास होता है वही रोता है - 'हसीन दुःख' - पर आइरीन से मिल लगा वो मेरी नासमझी है !  

खैर… मुस्कुरा के बात ख़त्म करते हैं नहीं तो बात  फिर लम्बी  हो जायेगी :)

मेरे पास आइरिन का कोई संपर्क नहीं, न उसके पास मेरा। अच्छी मुलाकातों को 'इट वाज अ प्लेजर मीटिंग यू' पर ही खत्म हो जानी चाहिए।  - …अटैचमेन्ट्स माई फ्रेंड ! 


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~Abhishek Ojha~ 

किसी अपने ने कहा - इतनी जगहें गए... ग्रीस ही क्यों? उसी यात्रा पर और भी जगहें थी?
पता नहीं ! वैसे ही जैसे पुणे, बैंगलोर, मुंबई, दिल्ली… ये सब भी तो गया. कई बार… और पटना? एक बार ! :)