Jan 12, 2009

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी

इधर कुछ एकाध लोगों ने ईमेल/फ़ोन/टिपण्णी से पूछा कि मैं आजकल पोस्ट क्यों नहीं लिखता? (ओह ये भी बड़ा सुखद अहसास है, किसी को तो हमारी कमी महसूस हुई !)

फिर हमने भी सोचा की सवाल तो सही है ऐसा भी क्या कर रहा हूँ मैं? कुछ ख़ास उत्तर नहीं मिला बस अच्छा कारण सोचते-सोचते ध्यान आया कि आजकल ४ बजे सुबह सोता हूँ, और १०-१०:३० बजे उठ कर ऑफिस चला जाता हूँ. जिंदगी ख़राब कर ली है मैंने. पर धन्य हो कृष्ण भगवान् और धन्य हो गीता. एक बात तो साफ़ है कुछ नहीं तो संयमी तो बन ही गया हूँ. (खैर मुझे नहीं लगता इस पुस्तक के जितने मतलब निकाले गए हैं उतने किसी और पुस्तक के निकाले गए होंगे. जिसको जो इच्छा होती है एक श्लोक ढूंढ़ लेता है.)

यूँ तो डायरेक्टली एक पोस्ट ही ठेल देता लेकिन कल ऑफिस जाते समय पहली बार एक्सीडेंट बड़े करीब से देखा तो सोचा की अभी एक अनुपस्थिति के कारण पर ही लिख दिया जाय. गाड़ी के सामने एक भीमकाय ट्रक दिखा और अगले क्षण अपने ऊपर असंख्य कांच के टुकडे. कुछ समझ में नहीं आया, थोडी देर बाद एक बात तो साफ़ हो गई इस मिटटी के जीवन में कुछ सार नहीं है ! खैर आगे का प्रवचन आप आस्था चैनल पर सुन लीजियेगा. बाकी चीजों के साथ ये भी ख्याल आया की जिन लोगों को इंतज़ार है उनको तो बताता चलूँ की भाई बहुत दिनों तक पोस्ट ना आए तो कुछ भी हो सकता है, आख़िर हम ठहरे हाड-मांस के पुतले !

(लो इधर एक ब्लॉगर बंधू कह रहे हैं: 'पासवर्ड दे दो कुछ हो गया तो मैं एक पोस्ट लिख दूंगा, बहुत टिपण्णी आएगी... तुम्हारी आत्मा को शान्ति मिलेगी.'

'व्हाट? '

हे भगवान् ये ब्लॉगर कब टिपण्णी की माया से ऊपर उठेंगे? कहाँ मरने की बात हो रही है और इन्हें उस पर भी एक पोस्ट दिख रही है ! 'देख भाई तू अपने ही ब्लॉग पर सूचना दे देना, वैसे भी 'अब मैं नहीं रहा' लिखा देख लोग गरिया जायेंगे की टिपण्णी पाने के लिए लिखा है'

'अबे यार लेकिन उससे तो मेरे ब्लॉग पर टिपण्णी आ जायेगी. मैं तो बस चाहता था की तेरे ब्लॉग पर टिपण्णी आएगी तो तेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी.'

'ओह ! भगवान् ऐसे (ब्लॉगर) शुभचिंतकों से बचाए')

कल एक दोस्त को बताया की व्यस्त हूँ तो उन्होंने कहा की ये कोई बहाना ही नहीं है. (तुम्ही एक व्यस्त हों बाकी तो बैठे मक्खी मार रहे हैं !) मैंने निम्न कारण बताये... तो उन्होंने कहा:

'जा रे नालायक मैं होता तो इन सब पर एक-एक पोस्ट लिख मारता, और तू कह रहा है की ये न लिखने के कारण है '

खैर चलिए बेकार की पोस्ट लम्बी होगी तो आप 'बहुत सुंदर' लिखके के भाग जायेंगे अब संक्षेप में कुछ कारण ही बताता हूँ.

1. प्रमुख कारण: आजकल कुछ परीक्षाएं दी जा रही हैं. और साथ में निवेश बैंकिंग का जो हाल है, अगल-बगल से दनादन गोलियाँ गुजरती है. जिन्हें लगती है हम कहते है 'फायर' उसे अखबार वाले कहते हैं 'पिंक स्लिप'. पता नहीं क्या पिंक होता है उसमें ! अब मैट्रिक्स के नियो की तरह इधर-उधर होके कोई बच रहा हो, वो क्या पोस्ट लिखेगा. बुढे बुजुर्ग कह गए ‘बेटा सरकारी नौकरी सरकारी ही होती है'. तब तो पैसा और बोनस दिख रहा था ;-) अभी भी मौका है लेकिन ये मोह-माया… खैर फिर कभी !

2. इधर ऑफिस के चौथे मंजिल वाली एक लड़की बहुत दिनों बाद दिखी और वो भी सिंदूर लगाए हुए, अपना क्या है अपने लिए तो आम बात हो गई है लेकिन जब पता चला की मेरे जानने वाले कईयों पर बिजली ही गिर गई तो... !

3. इधर भारतीय से ज्यादा पाकिस्तानी न्यूज़ साईट पढने लगा हूँ (डॉन और जियो टीवी), पता नहीं कैसे आदत लगी लेकिन, पहले ही अच्छा था ! अब दिमाग कुछ मुद्दों में ही उलझा रह जाता है. इस बीच फितना नाम की एक छोटी फ़िल्म भी देख डाली और कुछ डॉक्युमेंट्री... बस इतना ही नहीं तो फतवा का डर है.

4. इधर अंतुले जैसे लोग कुछ जगहों और लोगों में हीरो बन गए, ये भी पता चला की पाकिस्तानी अखबारों से ज्यादा आगे भारतीय उर्दू अखबार ही हैं. चलो अच्छा है कि उर्दू नहीं आती और व्यथित होने का क्या फायदा? अपने अखबार और चैनल कहते हैं की मुंबई हमलों पर ज्यादा नहीं सोचना है. मनोवैज्ञानिक आजकल भुनाने के तरीके बता रहे हैं. भूल जाओ भाई ! हम भी भूल रहे हैं. पर इस बीच ये भी कारण रहा. शायद लिखता तो पोस्ट की जगह गालियाँ ! हमलों के बाद सब लोग फोकट का चिल्लाते रहे और चुनावों में जाति पर ही राजनीति होती रही...

5. इस बीच कुछ यात्रा भी हुई... गुजरात में सोमनाथ, द्वारका और आस-पास. सोमनाथ के लाईट और साउंड प्रोग्राम के बाद उसके इतिहास पर पुस्तके ढुन्ढी जा रही है आचार्य चतुरसेन के सोमनाथ के अलावा कोई पुस्तक आपको पता हो तो जरूर बताएं. हाँ भारतीय रेल, और स्पाईस जेट के साथ बड़े बुरे अनुभव रहे. भारतीय रेल ने फ्लाईट छुड़वाई और स्पाईस जेट वालों ने एक घंटे तक फ़ोन नहीं उठाया, उनके रिकोर्डेड आवाज को सुन के फ़ोन के पैसे गए वो अलग जब उठाया तो बताया कि 'सर आपने बड़ी देर से फ़ोन किया आपको एक फूटी कौडी भी हम वापस नहीं करेंगे’. अब देर का जिम्मेदार कौन?

6. इधर अमेज़न और एचएसबीसी ने भी चुना लगाया. अमेज़न ने बिना हमसे पूछे $७९ चार्ज कर दिया ये मानकर की हम उनकी कुछ मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठाना चाहते हैं ! लो भाई जब वापस किया तो क्रेडिट कार्ड वालों ने कहा की एक्सचेंज रेट बदल गया है और ५०० रुपये तो भरने ही पड़ेंगे. बड़े संयम से क्रेडिट-कार्ड इस्तेमाल करने का ढिंढोरा पिटते थे अब लो मजा. लेकिन हमने भी डिफौल्ट करने का निर्णय लिया है वो भी चुनौती देकर :-)

7. इधर भारतीय स्टेट बैंक के लाभ का इतिहास देखकर बड़ा दुःख हुआ. कैसे लाभ में जाते हैं ये? फोर्चून ५०० का डंका पीटते हैं. और उनका ग्राहकों पर अहसान… किसी तरह समय निकाल कर तीन बार चक्कर काटा वो भी उन्हें पैसे देने के लिए. अंत में हार मानकर एचडीऍफ़सी में २ मिनट में काम करके आया. ये संस्थायें जिस दिन डूबेंगी मुझे तो खुशी होगी. पता नहीं कब अक्ल आएगी इन्हें.

8. हमारे घर पर काम करने वाली बाई महीने में ८ दिन आती है, और उसमें से ४ दिन:

'भइया आपके फोन से एक मिस्ड कॉल कर लूँ'

'हाँ कर लीजिये'

उसके बाद एक घंटे... ! अफेयर चलाने के लिए मेरा ही फोन मिला एक शादी-सुदा भारतीय नारी को. और धोबी पहले इनवेस्टमेंट बैंको की तरह कपड़े इधर से उधर करता था... लेकिन अब गायब भी करने लगा है.

लो भाई ये सुरसा की तरह पोस्ट लम्बी हुई ही जा रही है. अगर आप यहाँ तक पढ़ रहे हैं (वैसे क्यों पढेंगे बकवास !) तो धन्यवाद. ऐसे और भी कारण है, मेरे दोस्त का कहना है की ये बहाने अपने आप में एक-एक पोस्ट होने चाहिए.

अंततः बताता चलूँ की ज्यादा संयमी हो जाने के कारण तबियत थोडी ढीली है और आज डॉक्टर के पास जाना है कल मकर संक्रांति (खिचडी) है... आप सब को शुभकामनायें !

मराठी में: 'तिल गुड घ्या आणी गोड़ गोड़ बोला'

~Abhishek Ojha~

Dec 14, 2008

माँ का दूध

एक ज़माना था जब सोते-जागते कंपनी खोलने का भूत सर पर सवार रहता, और हर बात में बिजनेस आईडिया के अलावा कुछ दिखता ही नहीं था. हमारे एक मित्र इसमें बड़ा सक्रिय रहते... उनके आईडिया बड़े कमाल के होते, उसमें सफलता मिलती या नहीं ये तो बिजनेस स्टार्ट करने पर पता चलता पर आईडिया मजेदार जरूर होते ! आजकल ये मित्र रोयल डच शेल में तेली हैं। और नीदरलैंड से सिंगापुर तक तेल के कारोबार में हाथ बटाते हैं. अब कहने को तो इस तेल की कंपनी में शोध वैज्ञानिक है लेकिन अब हमारी भाषा में तेल बनाने/बेचने वाले को तेली ही तो कहते हैं... अब मैं तो इन्हें यही कहता हूँ !

एक समस्या ये होती कि इनके नए विचार अक्सर ऐसे होते जिन पर सदियों पहले से कंपनियाँ चल रही होती. अब क्या करें बेचारे दिमाग के किसी कोने से ढूंढ़ के लाते और दो मिनट में हम उस पर खड़ी बड़ी-बड़ी कंपनियां गिना देते... दो मिनट में रात के डिनर से सुबह के बाथरूम तक के सोचे गए उनके सारे 'इनोवेटिव' बिजनेस आईडियाओं पे पानी फिर जाता. खैर एक दिन उछलते-कूदते आए बिल्कुल आर्कीमिडिज के 'यूरेका' वाले क्षण की तरह...

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'अबे यार मस्त आईडिया आया है... दूध की कंपनी खोलते हैं ...'

'क्या यार इसी पे इतना उछल रहे थे... जा अमूल की साईट खोल के देख।'

'अबे नहीं भाई पुरा आईडिया सुन तो लो'
'देखो हम बच्चों के लिए दूध बनायेंगे... पाउडर और लिक्विड दोनों'

'ओके... तो?'

'प्रोडक्ट का नाम रखेंगे... "माँ का दूध"'

'व्हाट?'

'अबे देख डॉक्टर सलाह देते हैं... 'बच्चे को माँ का दूध पिलाइए', वो तो छोड़ जितने डब्बे वाले दूध आते हैं उन पर लिखा होता है 'माँ का दूध शिशु के लिए सर्वोत्तम है' तो हमारे ब्रांड को एडवटाइज करने की भी जरुरत नहीं है' सारे कंपटीटर ख़ुद ही हमारे प्रोडक्ट का इनडायरेक्टली प्रचार करेंगे !'

'हा हा ! जियो मेरे लाल क्या आईडिया है ! चलो इसी मेगाबक्स* में प्रेजेंट कर देते हैं। सारे वेंचर कैपिटलिस्ट लाइन लगा देंगे पैसे देने के लिए...'

'वही तो ... '

'भाग साले... कुछ तो ढंग का सोच लिया करो कभी, वैसे मदर डेयरी है तो तेरा कंपटीटर'

'अबे यार, क्या तुलना कर रहे हो, कभी सुना है 'मदर का दूध पिया हो तो...''

'देख एडवटाइज वाला आईडिया तो दुरुस्त है ही... उसके अलावा ६०-७०-८० के दशक की किसी भी हिन्दी फ़िल्म का क्लिप दिखा दो... "माँ का दूध पिया है तो..." और फिर दिखाएँगे 'आ गया माँ का दूध !' डब्बा से निकाल के दूध पिया और फिर साले विलियंस का सफाया ! बिजनेस का तो बाद में सोचना पहले ये बता क्रिएटिव एडवटाइजमेंट का अवार्ड मिलेगा की नहीं?'

'अबे क्यों गन्दगी फ़ेंक रहा है भाग यहाँ से' (ये एक टिपिकल लाइन होती थी होस्टल में)

'अरे यार मैं मजाक नहीं कर रहा सीरियसली सोच, अबे यार तू रिपोर्ट बना दे फिर प्रेजेंट करते हैं... कम से कम मजा बहुत आएगा। बड़े-बड़े लोग आते हैं सुनने'

'तुम्हें लगता है की एक राउंड भी आगे जा पाओगे?'

'साले मैं इस आईडिया पे फाइनल जीत सकता हूँ ! लेकिन अकेले नहीं कर सकता, भाई मेरे करते हैं न इसपे काम...'
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खैर काफ़ी चर्चा के बाद ये आईडिया ड्राप हो गया पर था. पर था तो सच में 'इनोवेटिव'...
अब इस पर तो काम नहीं हो पाया (ओह ! ऐसे कितने ही इनोवेटिव आईडिया बरबाद हो गए) मैंने सोचा चलो हम नहीं कोई और सही... आईडिया है, और हम भारतीय ! मुफ्त का आईडिया/सलाह दूसरों को बांटना हमारा पहला-दूसरा नहीं तो तीसरा-चौथा धर्म तो होता ही है.
अब किसी ने इस आईडिया पर कंपनी खोल दी और हमें नाम का भी क्रेडिट दे दिया तो घाटा क्या है !

चलो क्रेडिट ना भी दे तो कोई बात नहीं :-)

*मेगाबक्स आईआईटी कानपुर का वार्षिक बिजनेस और एंतार्प्रेनार्शिप समारोह है.

~Abhishek Ojha~

Dec 8, 2008

एक सेंट बोरिसीय का जन्म-दिन !

(एक मिनी पोस्ट)

'हेल्लो !'
'हेल्लो ! हैप्पी बर्थडे.'
'थैंक्स.'
'ये बताओ पार्टी कहाँ है?'
'कैसी पार्टी बे? तुम तो कभी देते नहीं हो? अपना जन्म-दिन तक तो बताया नहीं तुमने !'
'अब बता भी दूँ तो भरोसा तो करोगे नहीं !'
'मतलब? इसमें भरोसा ना करने वाली  कौन सी बात है? '
'अरे भाई सुन तो। मैंने अपनी माँ से अपना जन्म-दिन पूछा तो उसने बताया कि उसे तारीख तो याद नहीं ! इतना बताया कि  "उस दिन बारिश बहुत हुई थी और उसी दिन रामखेलावन की भैंस को पाड़ा हुआ था। और बुधन की गैया उसी दिन कुँआ में गिर गई थी बड़ी मुश्किल से उस बरसात में निकल पायी थी।" अब तुम्ही बताओ मेरी माँ ही जब इतना बता पायी तो अब क्या मैं रामखेलावन और बुधन से जाकर पाड़े के जन्म और गाय के गिरने का दिन पूछूँ? हाँ टाइम के बारे में माँ ने बताया कि उसी समय तीन बजियवा पसिंजर गई थी, अब भारतीय रेल का समय तो तुम जानते ही हो ! '
'साले बकर मत करो ! ... पार्टी जब मर्जी हो आ जाओ लेकिन एक दिन तो साल का अपना भी फिक्स कर ही लो बे अब... कम से कम वही जो सर्टिफिकेट में लिखा है।'
'किसी भी दिन कैसे माना ले बे? अच्छा रुको इस बार गाँव गया तो एक बार फिर रामखेलावन से पता करता हूँ, शायद याद आ जाय !'

और इस तरह उन्होंने एक और एकतरफा पार्टी ले ली !

इस सेंट बोरिसीय के स्कूल के बारे में तो आप जान ही चुके हैं, बड़े निराले अंदाज का इंसान है !

~Abhishek Ojha~

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आजकल मार्केट की उथल-पुथल, नौकरी और पढ़ाई के बीच इस मिनी-माइक्रो-नैनो से बड़ी पोस्ट सम्भव नहीं लगती.