Oct 2, 2016

एथेंस (यूनान ४)


किसी नई जगह जाने पर सबसे पहले वो बातें ध्यान में आती हैं जो बाकी जगहों से थोड़ी अलग होती हैं. उन बातों से फ़टाफ़ट किसी देश के बारे में धारणा बनानी चाहिए या नहीं वो तो पता नहीं  पर...

चर्च, सुट्टा और राष्ट्रीय झंडा  ग्रीस में ये तीनों बाकी देशों (जितनी दुनिया हमने देखी है) की तुलना में ज्यादा दीखते हैं - हर जगह. और एक बात अलग लगी वो है रेस्टोरेंट में आप आराम से बैठे रहिये. किसी को जल्दी नहीं होती ...न आर्डर लेने की ना बिल लाने की. जब तक आप खुद बुला कर ना बोलें. बिल आता है... रोल करके, छोटे से शॉट ग्लास में, टोकरी में या ऐसे ही किसी चीज में. छोटी सी बात है पर अलग होती है तो ध्यान में आ जाती है. देश भी इंसानों की तरह होते हैं - संस्कार कह लीजिये या अदा ! एथेंस में एक और बात अजीब लगी वो ये कि देर रात बच्चे पार्क में खेलते मिल जाते। जब डिनर का टाइम होना चाहिए तब शाम की कॉफ़ी का टाइम होता। जब सब कुछ इतनी रात ख़त्म होता तो स्वाभाविक है सुबह सब कुछ देर से शुरू होता। मुझे किसी की बतायी एक जापानी मान्यता याद आयी..  जिसके अनुसार सूर्य से सृष्टि चलती है. जीवन चलता है. इसलिए सूर्य का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। हर सभ्यता में सूर्य की पूजा की जाती रही है.  और सूर्य की पूजा मंदिर में नहीं होती सूर्य के साथ अपने को एकाकार कर होती है... जिस सभ्यता में लोग सूर्योदय के बाद उठते हैं वो सूर्य का अपमान करते हैं. सूर्य को पैर नहीं दिखाना चहिये। एक जापानी वर्ग ऐसे लोगों के साथ व्यापार नहीं करते थे जो देर से सोकर उठते। मान्यता भले अंधविश्वास हो लेकिन कहने का मतलब ये कि - ग्रीस इस मामले में जापान नहीं है. वैसे कुछ दिन रह कर किसी देश के बारे में कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए। पर लोगों की तरह देश भी आलसी और देर से उठने वाले तो हो ही सकते हैं?

ग्रीक इतने सपाट जवाब देते हैं कि कई बार (कम से कम बाकी यूरोप के तहजीब की तुलना में) थोडा रुखा लग सकता है.  जैसे -

"कैन वी हैव ग्रीक कॉफ़ी?"

"ग्रीक कॉफ़ी?  इट्स नॉट गुड. इट्स फॉर ग्रीक पीपल. यू विल नॉट लाइक. ट्राई फ़िल्टर कॉफ़ी ऑर कैपेचीनो" मैंने सोचा भाई ये अजीब है. मुझे अच्छी नहीं लगेगी तो नहीं दोगे?  (फ़िल्टर कॉफ़ी से मद्रास ही दिमाग में आता है उसके अलावा यहीं सुना). वैसे बाद में लगा सही ही कहा था उसने. मुझे पसंद नहीं आई ग्रीक कॉफ़ी. जो है वो मुंह पर ही बोल देते हैं.

झंडे और सुट्टे का तो पता नहीं। पर चर्च का ऐसा है कि ईसाई धर्म का 'इस्टर्न (ग्रीक) ऑर्थोडॉक्सी' सम्प्रदाय ग्रीस का सवैधानिक धर्म है. (अगर आपको लगता है कि पूरा यूरोप संवैधानिकली धर्मनिरपेक्ष है तो ऐसा नहीं है). रोमन कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट और ईस्टर्न ओर्थोडोक्सी इसाई धर्म के तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं. ये विभाजन धार्मिक कम राजनितिक ज्यादा थे - रोमन, बीजान्टिन साम्राज्य और मार्टिन लूथर से बने. आगे बात करने पर ये पोस्ट इसाई धर्म के इतिहास की क्लास लगने लगेगी. वैसे घुमने का ये सबसे बड़ा फायदा होता है - क्रैश कोर्स हो जाता है इतिहास का. कुछ देखकर, कुछ सुनकर बाकी पढ़कर. मजेदार गाइड मिल जाए तो मिर्च मसाले के साथ. खैर हम अभी इतिहास के इस कोने में नहीं जा रहे.

एथेंस ऐतिहासिक जगह है. वैसे इतिहास में जिस स्वर्णिम काल के लिए एथेंस का इतना नाम है वो बहुत कम समय के लिए था. सौ साल से भी कम. ऐसे समझ लीजिये कि एथेंस सौ साल से भी कम पाटलीपुत्र  रहा बाकी समय पटना. वैसे निष्पक्ष विश्व इतिहास पढ़ें तो पता चलेगा कि एथेंस-स्पार्टा का इतिहास और उससे प्रेरित ३०० फिल्म वगैरह वगैरह में वर्णित गौरव बहुत हद तक पश्चिमी इतिहासकारों का पक्षपात है. हर पैमाने पर इससे अच्छी, सभ्य और विकसित सभ्यताएं संसार में अन्यत्र रही. उस काल में भी और उससे पहले भी. पर इतिहास ऐसे लिखा गया कि... जैसे - बारबेरियन का मतलब था वो कोई भी जो रोमन या ग्रीक भाषा न बोलता हो. वास्तव में भले वो हजार गुना सभ्य रहा हो - कहते हैं कि बारबेरियन शब्द बना ही ऐसे कि... जिनकी भाषा सुनकर समझ में न आये. सुनने में  - बार्ब-बार्ब-बार्ब लगे वो हो गया बारबेरियन - असभ्य. उसी तरह ग्रीक-रोमन गौरव काल की अच्छाई वालीं बातें बढ़ा चढ़ा कर लिखी गयीं. उस समय की सैकड़ों कुरीतियों को नजरअंदाज करते हुए. इतिहास लिखने (और पढने) का तरीका आने वाले समय का बहुत कुछ निर्धारित करता है ! ... वैसे हम भी पश्चिमी इतिहासकारों का लिखा इतिहास ही पढ़ते हैं. खैर हम अभी इतिहास के इस कोने में भी नहीं जा रहे.

इतिहास जानने से बहुत कुछ सीखने को मिलता है. जो जगह आज जैसी है वैसी क्यों है. वहां के लोग, उनकी सोच और उनकी मान्याताएं। जगहों के चरित्र उनके इतिहास से बनते हैं. क्यों जगहों के हजारों सालों के इतिहास में 'वो भी क्या ज़माना था' वाले कुछेक साल ही बस हर जगह देखने को मिलते हैं. बाकी जगहों की कोई चर्चा ही नहीं मिलती। अगर ज्यादा नहीं सोचना है तो किसी शहर में बिकने वाला सूवनिर किस काल से आता है देखकर समझ लीजिये वो उस शहर का गौरवशाली काल था - एथेंस में एक्रोपोलिस, रोम में कोलोसियम, फ्लोरेंस में डेविड, वेनिस में मास्क, न्यू यॉर्क में एम्पायर स्टेट और लिबर्टी।

एथेंस और डेल्फी के खंडहर की बात करने से पहले  बात करते हैं एक कम प्रसिद्द जगह की. एथेंस में सुकरात की जेल के नाम से जानी जाने वाली एक लगभग अज्ञात सी जगह है. एक पहाड़ी पर गुफा जैसी. विश्वप्रसिद्ध एक्रोपोलिस से थोड़ी ही दूर. पेंड़ों के बीच - उपेक्षित. स्वाभाविक उत्सुकता थी उस जगह पर जाने की. थोड़ी मुश्किल से ढूंढते ढूंढते मिली. वहां जाकर पता चला कि - ये स्थानीय लोगों की बस एक मान्यता है कि सुकरात को यहाँ स्थित एक जेल में रखा गया होगा. पर ऐतिहासिक प्रमाण कुछ नहीं है... जितना है वो उल्टा ये है कि ये जगह सुकरात की जेल नहीं रही होगी. भूले भटके कुछ लोग पंहुच जाते हैं. हम ये सोचते लौट आये कि.... यहाँ ऐसी कोई बात नहीं लिखी होती तो हम थोडा ज्यादा सोचते और खुश होते। इस बोर्ड को यहाँ से हटा देना चाहिए. सुकरात ने ही कहा था - “The only true wisdom is in knowing you know nothing.”. खैर इस जगह से एक्रोपोलिस का अच्छा व्यू दीखता है.

एक्रोपोलिस  - देख कर लगता है. क्या अद्भुत मंदिर रहा होगा ! वास्तुकला, इतिहास, इंजीनियरिंग. देखने के पहले हम काल्पनिक मॉडल देख आये थे म्यूजियम में - आलिशान. पर वहां जाते हुए अब कहीं से मंदिर जाने वाली अनुभूति नहीं आती. अब सिर्फ खंडहर है. कितना कुछ बदल देता है वक़्त. हमें कभी महसूस नहीं हो सकता जैसा यहाँ आने वालों को कभी हुआ करता होगा. ना उन दिनों किसी ने सोचा होगा कि कभी एक दिन ऐसी हालत होगी उस आलिशान मंदिर की. अब मंदिर वाली भावना की जगह ये ध्यान आता है कि बनाया कैसे होगा. बिना विकसित गणित-कंप्यूटर के सिविल इंजिनियर काम कैसे करते होंगे? वगैरह वगैरह. और ये कि कैसे एक सभ्यता ने दूसरे का बेरहमी से विनाश किया। वैसे कुछ चीजों को पुनर्जीवित करने के प्रयास अच्छे लगे. जैसे एक थियेटर हैं जिसे फिर से इस हालत में लाया गया है जहाँ अब भी वहां कलाकार परफॉर्म करते हैं.

एथेंस - एथेना देवी के नाम पर बना शहर है. उल्लू प्रतीक-विजय-ज्ञान-बुद्धि की देवी यानि सरस्वती-लक्ष्मी-काली जैसी देवी। अनगिनत समानताएं।

एथेंस का ज्ञात इतिहास सिर्फ २५०० सालों में बिखरा है. अगर एक पैराग्राफ में नाप लेना हो तो कुछ यूँ होगा -

एथेंस २५०० साल पहले एक साधारण महाजनपद (शहर-राज्य) था. जिसे ईपू ५००-४८० में फारसी बादशाह ने ध्वस्त किया. पर उसके बाद फारस के खिलाफ युद्ध में एथेंस कई ग्रीक महाजनपदों का नेता बना.  ईपू ४५०-४०० का काल - स्वर्णिम काल. फारसियों पर विजय के बाद एक्रोपोलिस बना. वहां एथेना देवी की विशाल मूर्ति बनी. हम जो भी पढ़ते हैं वो अधिकतर इसी काल से आता है. कला-थियेटर-वास्तु-सुकरात-प्लेटो-एक्रोपोलिस-पार्थेनन-गणित-दर्शन-वगैरह. उसके बाद ईपू ३३८ में सिकंदर ने जीता. ईपू १४६ में रोमन साम्राज्य ने. पर जीतकर वो यहाँ की संस्कृति से प्रभावित ही हुए, उसे अपनाया और बाकी दुनिया में फैलाया भी. रोमन साम्राट कॉन्सटेंटाइन ने जब ईसाई धर्म को मान्यता दी और खुद भी धर्म परिवर्तन कर लिया। उसके बाद पेगन के नाम पर उस समय तक के सारे मंदिर या तो चर्च बन गए या तोड़ ताड़ दिए गए. पार्थेनन चर्च बन गया. सारे पेगन प्रतीक मिटा दिए गए. उधर रोमन साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हुआ और इधर एथेंस पर 'बारबेरियन' हमले. एथेंस ४७६ ई के बाद एक हजार साल तक बीजान्टिन साम्राज्य के अधीन रहा (इसी काल में इस्टर्न ऑर्थोडॉक्सी यहाँ हमेशा के लिए जम गयी). बीजान्टिन यानी पूर्वी रोमन साम्राज्य जिसकी राजधानी थी कुस्तुन्तुनिया (आज का इस्ताम्बुल). १४५३ में जब कुस्तुन्तुनिया का पतन हुआ तब अगले ४०० सालों के लिए एथेंस तुर्कों (ओटोमन साम्राज्य) के अधीन रहा. कुस्तुन्तुनिया का पतन (बीजान्टिन के लिए) कहिये या कुस्तुन्तुनिया विजय (ओटोमन के लिए). ...स्कूल में कुछ चीजें ऐसी थी जिन्हें पढ़ कर या सुनकर बहुत मजा आया. जैसे पंद्रह का पहाडा ! आपने पढ़ा है तभी जान सकते हैं क्या स्पेशल होता है उसके बारे में - पंद्रह दूनी तीस तियान पैतालिस... वैसे ही था 'कुस्तुन्तुनिया का पतन'. नौवी के इतिहास में था. Fall of Constantinople पढ़ के भी क्या पढ़े होते ! 'कुस्तुन्तुनिया का पतन' सुन कर लगता था कुछ भारी भरकम बढ़िया सी चीज पढ़ रहे हैं ! खैर... तो यही था मोटा-मोटी एथेंस का इतिहास. एक्रोपोलिस पर एक के बाद दूसरी सभ्यता ने अपना कब्ज़ा किया. पार्थेनन पैगन मंदिर से मिटाकर चर्च, चर्च मिटाकर मस्जिद, उसे मिटाकर संग्रहालय और यूनेस्को हेरिटेज बना. वहां की सबसे अच्छी मूर्तियाँ और पत्थर कोहिनूर गति को प्राप्त हुए. यानी अब ब्रिटिश म्यूजियम लन्दन में पड़े हुए हैं. ग्रीक जिसपर अपना हक़ और वापस लाने की बात करते रहते हैं. [ब्रेक्जिट नहीं हुआ होता तो कुछ उम्मीद भी होती :)]. १८२१ में ग्रीक में आजादी आन्दोलन/क्रांति हुआ.. वैसे इस आजादी के बाद लोकतंत्र नहीं आया. लम्बे समय तक राजशाही रही. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नाज़ी कब्ज़ा... फिर मार्शल प्लान.  (मुझे नहीं पता बाकी लोगों को कितना अच्छा या पकाऊ लगा होगा ये पढ़ना. तो एक पैराग्राफ में बात ख़त्म.)


अब एथेंस का केंद्र है सिंतागमा स्क्वायर. जो एक साथ ग्रीस का संसद, धरना के लिए जंतर मंतर और अमर जवान तीनो है. नो डिसृस्पेक्ट पर वहां जैसे ड्रेस में गार्ड खड़े होते हैं - फैंसी ड्रेस लगता है (अगर मैं नौटंकी कहने से अपने को रोकूँ तो). वैसे वो बहुत ही अच्छी मद्धम चाल और भाव भंगिमा में अपनी जगहें बदलते हैं. माने बहुत ही अच्छा. एक और जानकारी - उनके ड्रेस में ४०० चुन्नट होते हैं. तुर्कों के हर एक साल की गुलामी के लिए एक चुन्नट.

डेल्फी... खुबसूरत जगह पर है. पहाड़ों में बसा. अच्छी चढ़ाई होती है. ऐसा लगा जैसे ओरेकल (पुजारन कह लीजिये) ने जान बुझ कर बनाया होगा ऐसी जगह कि कठिन चढ़ाई कर वही आ सकें जिन्हें सच में श्रद्धा/उत्सुकता हो. फिर वहां खड़े खड़े एक बार को जरूर ये ख़याल आता है कि कैसे घोड़े पर या पैदल थके-हाँफते एथेंस, स्पार्टा, ओलंपिया वगैरह से लोग पहाड़-घाटियां पार करते आते होंगे अपना भविष्य जानने. बहुत मुश्किल होता होगा तब आना.

लिखते लिखते लगता है बहुत इतिहास लिखा गया... डेल्फी में अपोलो का मंदिर था. और साथ में उन दिनों पूजे जाने वाले कई देवताओं के मंदिर. एक थियेटर और खेलों का एक प्रसिद्द स्टेडियम. (ओलंपिक की तरह यहाँ पिथियन  गेम्स होते थे). रोमन जमाने में एक रोमन अगोरा। पर इस जगह को सबसे अधिक प्रसिद्धि दिलाई ओरेकल और अपोलो  के मंदिर ने. ओरेकल यहाँ की पुजारन होती थी. मंदिर प्रांगण में एक जगह धुंआ जैसा कुछ निकलता जहाँ बैठकर वो भविष्यवाणी करती. माने साधारण भाषा में कहें तो गांजा जैसे कुछ फूंक के बता देते रहे होंगे। एक समय ऐसा था कि कोई भी राजा बिना ओरेकल से सलाह लिए बिना फैसला नहीं करता था. क्या और कैसे इस पर बहुत कहानियाँ और थियरिस  हैं.

पुराने जमाने में ग्रीक ये भी मानते थे कि डेल्फी दुनिया का केंद्र है. इसीलिए वहां पर अपोलो का मंदिर बना. कहते हैं कि दुनिया का केंद्र पता करने के लिए जीयस ने दुनिया के दो छोरों से दो बाज उडाये. एक ही समय पर, विपरीत दिशा में, एक ही गति से. [अपने युग का विज्ञान !] दोनों बाज जहाँ मिले वहां से जीयस ने एक पत्थर फेंका. वो पत्थर जहाँ गिरा वही हुआ संसार का केंद्र और वहां बना अपोलो का मंदिर !

खैर... पोस्ट अपनी लम्बाई को प्राप्त हुई. लिखने के पहले लगता है क्या लिखें... लिखना शुरू करो तो जो बात लिखनी थी उसके पहले ही पोस्ट पूरी हो जाती है. ना ना करते इतना इतिहास ही लिख गए. अपोलो के मंदिर के स्थान पर जो वर्णन लिखा हुआ है उसमें लंबी सी कहानी के अंत में ये भी लिखा हुआ है कि पत्थरो पर सात ऋषियों के ज्ञान का सार लिखा हुआ था - γνῶθι σεαυτὸν - "know thyself". और μηδὲν ἄγαν- 'Nothing in excess'. बात तो सुनी हुई लगी. सप्तर्षि  एक ही रहे होंगे?


एक बात कुलबुला रही थी दिमाग में. ग्रीस में हमें लोग समझाते कि वॉलेट सामने की जेब में रखना. मैं अभी कहीं और गया था वहां भी लोगों ने यही कहा. मैं सोच रहा था पश्चिम के पॉकेटमार बिलकुल ही पगलेट होते हैं क्या? सलाह देने वाले सबको पता है सिर्फ उन्हें नहीं पता कि आजकल लोग वॉलेट कहाँ रखते है? गया-मुगलसराय जाके ट्रेनिंग लेनी चाहिए उन्हें !

लोगों से की गयी बातों वाली पोस्ट ज्यादा रोचक होती है. इतिहास सुनाने की चीज है तभी अगर कोई सुनने वाला हो. लिखते हुए बार बार लगता है कौन पढ़ेगा? ! पोस्ट लिखने में न्याय नहीं हो पाता। सुनाने में पता होता है सुनने वाला कितने चाव से सुन रहा है... सुनाने में फिर वही चाव आ जाता है.

और... आप जो करते हैं वो नहीं कर रहे होते तो क्या करते के जवाब में बहुत कुछ आता है दिमाग में. उन्हीं में से एक 'टूर गाइड' बनना भी बहुत दिलचस्प लगता है. पर फतेहपुर-सिकरी, आगरा में शेर सुनाने वाले टूर गाइड याद आते हैं तो लगता है हममें ना तो वो हुनर है न वो करना चाहते ! आपने झेला है तो आप जानते हैं :)

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~Abhishek Ojha~


8 comments:

  1. मजेदार वर्णन. सदा की तरह.
    वैसे, आजकल आप धरती के किस टुकड़े पर भ्रमण (या कर्म) कर रहे हैं?

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    1. धन्यवाद रविजी. 🙏

      पहले तो आपको धन्यवाद देना है. आप और पूजा उपाध्याय जैसे लोग नहीं होते तो ये ब्लॉग कब का बंद हो चूका होता.

      और भी कुछ लोग हैं जो नियमित पढ़ते हैं. पर पूजा ने ठेल ठेल के लिखवाया और आपने हमेशा पढ़ा.

      जमाने में फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम और पता नहीं क्या क्या वैसे ही आ गए जैसे इस पोस्ट का पार्थेनन मंदिर से चर्च, चर्च से मस्जिद और फिर संग्रहालय बन गया.

      कई लोग कोहिनूर गति को प्राप्त होने की तरह किताब छपवा कर ब्लॉग्गिंग छोड़ दिए.

      ये ब्लॉग भी वैसे ही खँडहर हो गया होता. आप से ही जिन्दा है !

      ब्लॉगवाणी, चिटठाजगत, चर्चा - आये गए. हम अच्छा बुरा जैसा भी लिखते रहे हो... आप जैसे दो चार लोगों से आजतक जिन्दा है तख्ती के जमाने वाली परंपरा.

      धन्यवाद रहेगा हमेशा की तरह.

      कर्म कई सालों से न्यू यॉर्क में कर रहे हैं. भ्रमण ही भ्रम करा देता है कि कहाँ गए :)

      हाल फिलहाल में एक बार ग्रीस एक बार इटली गए थे. लौट के बुद्धू कर्म पर आ गए हैं. और पोस्ट झेलने को तैयार रहिएगा. :)

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    2. देखो, तुम्हें लिखने सिर्फ़ अपने स्वार्थ से बोलते हैं। तुम्हारा लिखा पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। कहने में थोड़ी सी मेहनत ही तो लगती है बस। हींग लगे ना फिटकिरी, रंग चोखा आए :) :)

      असल मेहनत तो तुम करते हो। ख़ास तौर से मुश्किल विषयों पर तो और भी ज़्यादा। विज्ञान, इतिहास, गणित...इन पर अच्छा से लिखा कुछ ऐसा जो आम लोगों को भी समझ आए, सिर्फ़ विशेषज्ञों को नहीं। ब्लॉग पोस्ट हमेशा दिलचस्प होता है। एक ही चीज़ कई ऐंगल से दिखती है।

      और हाँ, तुम्हारा वो गणितीय प्रेमपत्र तो वाक़ई लेजेंडरी है। वो क्या कहते हैं, कालजयी। देखो इतना वक़्त हो गया अभी भी मैं कोई नए पढ़ने लिखने वाले शख़्स से मिलती हूँ तो उसे एक बार तुम्हारे ब्लॉग पर ज़रूर भेज देती हूँ। पटना सीरीज़ शुरू करो फिर से।

      इंतज़ार है।

      और हाँ। शुक्रिया। ये बड़प्पन है तुम्हारा और कुछ नहीं। हम तो क्या ही बोलते हैं और क्या ही लिखाता है हमारे बोलने से।

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  2. जरूर.
    मेरी आपसे इल्तिजा है, आप अपना लेखन कभी बंद न करें. जो लेखनी आपको मिली है - किस्सागोई की जो शैली आपकी है, वो बिरलों को मिलती है.
    मैं तो आपकी लेखनी का सबसे बड़ा फैन हूँ.
    आपके गणितीय प्रेमपत्र को मैंने कितने ही हिंदी सेमिनारों, वर्कशॉप में उदाहरणार्थ बताया है और वाहवाही पाई है :)
    आपने पटना सीरीज लिखी थी. उसे उपन्यास सा विस्तार देकर पेंगुइन आदि में भेजें. बड़ी ही मजेदार सीरीज थी वो.
    सादर,
    रवि

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  3. आप को पढना हमेशा अच्छा लगता है ।आप लिखते रहें।

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  4. आप का लिखा हमेशा मंत्रमुग्ध कर देता है। गणितीय आयाम को भोजपूरी टच देकर क्या गजब करते हैं। अनिर्वचनीय है।

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  5. आप का लिखा हमेशा मंत्रमुग्ध कर देता है। गणितीय आयाम को भोजपूरी टच देकर क्या गजब करते हैं। अनिर्वचनीय है।

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