Sep 17, 2015

चाइनीज शॉट (यूनान -१)


'डोंत वरी, यू कैंत क्लिक अ बैद शॉत हियर। ऑल सीनिक ग्रीक पोस्तकार्द्स कम फ्रॉम दिस प्लेस' - मैंनफ्रेड ने मुसकुराते हुए कहा. मैनफ्रेड से मेरी मुलाक़ात वहीँ थोड़ी देर पहले हुई थी। पर्यटकों, सेल्फ़ी-स्टिक्स और सैकड़ों ट्राईपॉड़ों  से खचाखच भरी जगह पर. जहाँ अनजान लोग एक दूसरे को देखते हुए अक्सर मुस्कुरा देते हैं ताकि ऑक्वर्ड न लगे.

सनसेट पॉइंट - भीड़ सूर्यास्त का इंतज़ार कर रही थी. लोग कहते हैं सूर्यास्त देखने के लिए दुनिया के सबसे अच्छे जगहों में से वो एक है. आबादी 14-15 हजार पर वहाँ  हर साल कई लाख पर्यटक आते हैं। दिन अभी काफी  बचा था पर भीड़ अभी से ही अच्छी हो चली थी. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आये लोग. सबकी अपनी भाषा और अपनी-अपनी अंग्रेजी

वहां आते हुए रास्ते में मुझसे एक चीनी लड़की ने बड़ी हड़बड़ी में पुछा - 'वेयर इज सनसेट? आर यू गोइंग फॉर सनसेट?' सनसेट को तो पश्चिम में ही होना चाहिए। कायदे से मुझे कहना चाहिए था - 'कीप लुकिंग ऐट वेस्ट' पर मैंने बताया - 'कीप वाकिंग स्ट्रेट एंड इन अबाउट एट टू टेन मिनट्स यू विल रीच सनसेट'.

खैर… सनसेट पॉइंट पर मैनफ्रेड की वेशभूषा देख मुझे ह्वेनसांग की याद आई. बचपन में इतिहास की किताब में बनी उनकी फोटो। पीठ पर बैगपैक और सर पर तवा लिए.



स्कूल के दिनों में कभी समझ नहीं आया कि ह्वेनसांग के सिर पर वो तवा दरअसल छतरी थी.

ऐसी जगहों पर मैं भी ट्राईपॉड और लेंस फिल्टर लेकर जाता हूँ.  पर यहाँ न तो ट्राइपॉड था न फिल्टर। मैं सोच रहा था कि सनसेट की तो क्या ही अच्छी फोटो आएगी ! खैर दुनिया का कोई  भी कोना हो बोली के इतर भी एक भाषा होती है जो सभी समझते हैं. उसी भाषा से ये बात समझ आधुनिक ह्वेनसांग, मैनफ्रेड ने मुझसे कहा - 'डोंत वरी, यू कैंत क्लिक अ बैद शॉत हियर।' 

इस के बाद मैनफ्रेड से थोड़ी बात चीत हुई. मैं शायद ही कभी आगे बढ़ कर खुद किसी से बात करता हूँ पर अगर कोई करने लगे तो अच्छा लगता है. मैनफ़्रेड आराम से यात्रा करने वाले यात्री हैं और अक्सर ग्रीस आते हैं. वो कहीं भी जाते हैं तो कम से कम १५ दिन रुकते हैं. स्थानीय लोगों के बीच रहते हैं उनसे मिलते जुलते हैं. आराम से घूमते हैं. उन्होंने कहा - "आई डोंट वांत तू तेक अनदर वैकेशन तू रिकवर आफ्टर माय वैकेशन। आई कीप इत रिलैक्स्ड।" उन्हें व्यू पॉइंट्स कवर करने और फोटो खींचने की जल्दी नहीं होती। तीसरी बार वो वहाँ आए थे. मैंने उनसे पूछा - "क्या-क्या है यहाँ देखने लायक?" उन्होंने एक भी व्यू पॉइंट और शॉपिंग की जगह या रेस्टोरेंट नहीं बताया। उनके अनुभव अलग थे. बातें अलग थी। गाँवों के नाम बताये उन्होने. वाइनरी बतायी। खेत देख के आओ. लोगों से मिलो। टूरिस्ट्स, रेस्टोरेंट्स, क्रुजेज? -दिस इस नो ग्रीस ! 

पहला सवाल जो मेरे दिमाग में आया वो ये कि - कोई  घूमने क्यों जाता है ?

मुझे याद आया उसी दिन सुबह होटल में बैठे एक दंपत्ति से मेरी बात हुई थी. उन्होंने मुझसे कहा - 'एक सप्ताह थोड़ा ज्यादा ही है यहाँ के लिए. दो दिनबहुत है.' उन्होंने ही मुझे दिखाया था एक सनसेट की फोटो और कहा था  'यू मस्ट सी सनसेट हियर, इट्स मेस्मेराईज़िंग '. उनके फोटो का कैप्शन था - 'हेवेन ऑन अर्थ'. मुझे लगा 'हेवेन ऑन अर्थ' के लिए दो दिन बहुत कैसे हो सकते है? हेवेन से भी बोर?

'आर दे रियली लुकिंग ऐट हेवेन?' मैनफ्रेड ने कहा. मैंने सोचा - बात तो सही है. हो गया घूमना-फिरना, खींच ली फोटो, शेयर  कर दी. चलो अब घर ! लाइक्स से अभिभूत होने के जमाने में किसे पड़ी है अनुभव की?

वैसे कई लोगों के साथ वैसा भी हो जाता है कि... एक थीं कोई. वो गयी तीर्थ करने। जाने से पहले उनके आचार  के मर्तबानों को धूप दिखाना था, जो वो पड़ोसी के यहाँ छोड़ गयी। पर उनके मन में यही हुट-हूटी रही कि... आचार खराब तो नहीं हो जाएँगे? कहते हैं जब वो द्वारका पहुंची तो लोग उन्हें द्वारिकाधीश दिखाते रह गए। पर उन्हें हर तरफ सिर्फ अचार के मर्तबान ही दिखते रहे। वैसे ही अब पर्यटकों को सिर्फ लाइक्स और कमेंट्स दिखते हैं - द्वारिकाधीश दिखें न दिखें। कैप्शन होना चाहिए - फीलिंग स्पिरिचुयल ऐट...

पिछले दिनों मैं एक कार्यक्रम में भारतीय दूतावास गया था। वहाँ मेरे आगे बैठी लड़की पूरे समय फोन में यही ढूंढती रही कि टैग  कैसे हो दूतावास! फिर वो ट्वीटर पर गयी तो उसे दूतावास का हैंडल नहीं मिला। क्या लिखना है वो तो पहले से लिख चुकी थी। कुछ देखने और सुनने की जरूरत थी नहीं। बीच में लोग ताली बजाते तो वो भी  बजा देती। शायद कर  पाते हों लोग इतनी मल्टी टास्किंग  हमसे तो न हो पाता। [हां, ये ऑब्जर्व जरूर कर रहा था :)]

खैर... मुझे याद आया जब पिछले साल मैं और मेरे एक दोस्त कोलोराडो प्लेटो के कैन्यन्स और रेगिस्तान में दो सप्ताह घूमते रहे थे. लोग पूछते हैं इतने दिन तुमने किया क्या? है क्या इतना देखने लायक? और हम सोचते रहते हैं - फिर जाएँगे कभी ! हम किसी एक जगह पर जितनी देर बैठते उतनी देर में पर्यटक बस लोगों को पूरा नेशनल पार्क दिखा लाती ! लोग व्यू पॉइंट्स पर उतरते भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी जैसी अलग-अलग मुद्राएं बनाते - खीचिक-खीचिक कर आठ दस फोटो खींचते और चले जाते. मै उन्हेंचाइनीज शॉट कहता हूँ। सूर्यास्त देखने की जगह सूरज खाते हुए लील्यो ताहि मधुर फल जानी* पोज और एफिल टावर  चुटकी में भर लेने में ही लोग लगे रह जाते हैं। मुझे नहीं लगता वो देखते भी हैं कि क्या है वहाँ. सब कुछ तो है इन्टरनेट पर क्यों देखें या पढ़ें वहां रूककर? देखने के लिए थोड़े न गए हैं ! मुझे नहीं लगता उनके अनुभव कैप्शन और स्टेटस सोचने से बहुत अधिक होते होंगे। वो आँख भर नहीं कैमरा भर देखते हैं। मुझसे भी किसी ने मेरे एक ट्रिप की फोटो देख कहा था - "क्या देखूँ इसमें? वालपेपर लग रही हैं सारी पिक्स ! तुम तो हो नहीं इसमें।"

सूर्यास्त हुआ. खूबसूरत था. इतना कि उसके कुछ दिनों बाद मैंने किसी से कहा  - "पिछले कुछ दिनों से मैं सनसेट रेजिस्ट नहीं कर पा रहा. मुझे ओबसेशन सा हो गया है." … सूर्यास्त देखने के लिए खड़ी समुद्री नावों और जहाजों ने भोपूं बजाया। लोग सेल्फ़ी और तस्वीरें लेने में व्यस्त रहे. जल्दी-जल्दी।  कहीं 'गोल्डेन मूमेंट' चला न जाये। मुझे पता है उनके स्टेटस और कैप्शन जरूर सिरीन रहे होंगे भले वहां हांव-हांव मची थी.

लोग बहुत खुश दिखे। अच्छी तस्वीरें आई. मैनफ्रेड ने सही कहा था इतनी खूबसूरत जगह है कि ख़राब फोटो नहीं आ सकती।  फिर मैंने किसी को कहते सुना - 'इट्स ओवररेटेड ! सन, सी, माउंटेंस व्हॉट इज सो वंडरफुल अबाउट ईट? इट इज सो क्राउडेड!' बात सच थी. सूरज रोज उगता है रोज अस्त होता है. समुद्र, पहाड़ -  है थोड़ा खूबसूरत पर ऐसा भी क्या है जो इतना हो-हल्ला? जैसे बादशाह के अद्भुत कपड़े के लिए सभी वाह-वाह कर रहे हों और किसी ने  कह दिया हो कि - नंगा है !

भीड़ आई थी धीरे-धीरे पर छँटी बड़ी तेजी से. अभी ठीक से सूर्य अस्त भी नहीं हुआ था कि अधिकतर लोग निकल लिए. बैठने की जगह भी खाली होने लगी। जब सब जाने लगे - मैनफ्रेड बैठ लिए. हम भी बैठ गए. सोचा थोड़ी देर में जाएँगे जब रास्ते खाली हो जाएंगे। मैनफ्रेड ने कहा… 'वेत, अनतिल मिडनाईट। इफ यू रियली वांत तू फील समथींग वंदरफूल '.  उन्होंने तस्वीर नहीं खींची। उन्होंने बताया कि बहुत अच्छी तस्वीरें ली हैं उन्होंने उस जगह की। पर आज वो सिर्फ देखने आये थे. हम कुछ गिने-चुने लोग देर तक बैठे रहे। मुझे याद आया रात के दो बजे आर्चेस नेशनल  पार्क में डेलिकेट आर्च के पास सिर्फ छह लोग बैठे रहे थे - धुप्प अंधेरी रात, मिल्की वे, डेलिकेट आर्च. फिर रात को सिर पर फ्लैश लाइट लगाए नीचे उतरना.... वो अब तक के सबसे अच्छे अनुभवों में से एक है।

लाखों पर्यटकों के लिए एक-दो दिन किसी भी जगह के लिएबहुत होता है - हेवेन्ली कैप्शन और तस्वीरों के लिए. फेसबूक पर कमेन्ट का रिप्लाई होता है - 'इट वाज अ ड्रीम वकेशन ! सैड दैट इट एंडेड टू सून :(' और मन में होता है - दो दिन ही काफी थे। एक सप्ताह बेकार गए! कहीं और भी चले गए होते इतने दिन में। मुझे मैनफ्रेड की बात जमी। मैं दो शाम और गया वहाँ। देर रात तक बैठा रहा।

मुझसे जब कोई पूछता है कैसी जगह है? कितने दिन के लिए जाना चाहिए? मुझे नहीं समझ आता मैं क्या जवाब दूँ।
वापस आने पर किसी ने पूछा - विल यू गो अगेन ?! देख तो लिया ! अगर सिर्फ जगहें 'कवर' करना लक्ष्य हो तो फिर क्यों दुबारा जाऊंगा? अगर अनुभव करना हो तो बिलकुल। फिर से... बार-बार. डिपेंड  करता है - 'चाइनीज शॉट' या 'मैनफ्रेडीय'।

मुझे लगता है कि लोग कहीं इसलिए जाने लगे हैं क्योंकि... फैंटेसी है। एल्बम बनाना है। शेयर करना है। इंटरनेट का पर्यटन पर प्रभाव विषय पर रिसर्च करने की जरुरत नहीं है. फिर लोग अपने यात्रा के असली अनुभव बताने से डरते हैं। कहीं लोग ये न समझे कि... उस बादशाह के कपड़े की तरह जो दरअसल नंगा था ! कितने लोगों के निगेटिव यात्रा अनुभव (या विस्तृत?) आपने फेसबुक पर पढ़ा है?

सबका यात्रा करने का अपना तरीका होता है- अपने कारण। सबकी अलग-अलग पसंद होती हैं। पर लाइक्स/कमेंट्स के जमाने में अनुभव के लिए कौन यात्रा करता है? यात्री बढ़े हैं - यात्रा से अनुभवी होने वाले घटे हैं - ह्वेनसांग नहीं होते अब। ट्वीट/फेसबुक के त्वरित जमाने में किसे फुर्सत है विस्तार से लिखने की और किसे फुर्सत है आपका लिखा पढ़ने की?

मुझसे अक्सर लोग पूछते हैं इज इट वर्थ टू विजिट न्यू यॉर्क फॉर वन वीकेंड? 

मुझे नहीं पता क्या जवाब दूँ मैं। मैं इस शहर में घंटों पैदल चला हूँ... मीलों। मुझे सच में नहीं पतावर्थ क्या है ! शायद मुझे सारे प्रसिद्द जगहों से ज्यादा अच्छा सेंट्रल पार्क में एक पानी बेचने वाले से बात करना लगा ! मैंने पिछले पांच साल में दर्जनों दोस्तों को न्यूयॉर्क का वीकेंड ट्रिप कराया है. अन ऑफिसियल गाइड ! ऐसी जगहें हैं जहाँ पर बार-बार सिर्फ इसलिए गया क्योंकि किसी को घुमाना होता है. नहीं तो दुबारा तो कभी नहीं जाता।एक दिन भी काफी है - सालों भी कम है। घूमते रहो तो हर बार कुछ नया दिखता है। जैसे मेरी माँ ने हजारो बार मानस पढ़ा है, हर बार उन्हे लगता है कुछ नया मिला ! मैनफ़्रेडिय घूमना वैसे ही है। चाइनीज शॉट है - मानस का पाठ हुआ प्रसाद लेने के समय पहुंचे, जय-जय किया, निकल लिए.

मैं कह देता हूँ - डीपेंड्स।
लोग कहते हैं - न्यू यॉर्क के बारे में तो बहुत सुना है। और कह रहे हो डीपेंड्स ?

मैनफ़्रेडिय घूमना हो तो - "पैदल घुमो - सड़कों पर। स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी, म्यूजियम्स, स्टोर्स, ब्रूकलिन ब्रिज और एम्पायर स्टेट ही न्यू यॉर्क नहीं है.".

.... या है शायद... इतना कह सकता हूँ कि समय लगता है इस शहर से प्यार होने में। पर ऐडपटेबल शहर है। शायद वो सबसे जरूरी है किसी जगह  के लिए - कुछ समय रहो तो हर अगला दिन पिछले से बेहतर लगे. सबके लिए कुछ  न कुछ है इस शहर में।  कई लोग आते हैं जिन्हें पहले भीड़-भाड़, चमक धमक, मौसम, भाग-दौड़, लोग पसंद नहीं आते। पर धीरे-धीरे मैंने देखा है उन्हें अच्छा लगने लगता है। क्योंकि उनके लायक जो है शहर का वो हिस्सा उन्हें दिख जाता है. सबकुछ है इस शहर में. पर वो शायद मैनफ़्रेडीय नजरिया है। मैनफ्रेड जगहों के बारे में लिख सकते हैं। यात्राओं से सीख सकते हैं। अनुभव बटोर सकते हैं. पर जिन्हें चाइनीज शॉट के लिए घूमना हो - उनके लिए दो दिन बहुत है और न्यूयॉर्क तो उनके लिए पर्फेक्ट है !

मुझे खुशी है मैं मैनफ्रेड से मिला।

अज्ञेय याद आए -

मैंने आँख भर देखा। (सिर्फ कैमरा भर नहीं !)
दिया मन को दिलासा-पुन: आऊँगा।
(भले ही बरस-दिन-अनगिन युगों के बाद!)
क्षितिज ने पलक-सी खोली,
तमक कर दामिनी बोली-
'अरे यायावर! रहेगा याद?'

और ये रही बिन फिल्टर ट्राइपॉड बिना शॉट…


~Abhishek Ojha~

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यूनान डायरी... पटना की तुलना में बहुत कम दिन रहना हुआ यूनान में। पर लिखने का मन है 8-10 पोस्ट। जो मैंने देखा। भाषा, लोग, जगहें, खँडहर, माइथोलॉजी, भूत, वर्तमान...

पटना और यूनान - सहस्त्राब्दियों पुराने खंडहरों को देख कर लगा यहाँ पाटलिपुत्र से आए आचार्यों ने जरूर कभी मंत्रोचर किया होगा। खैर... बाकी अगली पोस्ट्स में।

बाई दी वे - यूनान को हिन्दी में ग्रीस कहते हैं :)

*लिल्यो ताही मधुर फल जानूँ पोज- शिव भैया ने बहुत पहले एक पोस्ट में ये बात लिखी थी। वो इतनी पसंद आई थी कि लोगों को सूरज लीलते हुए देख वही याद आता है :)

Aug 6, 2015

...मॉडर्न आर्ट

"जाकी रही भावना जैसी, मॉडर्न आर्ट तिन्ह देखी तैसी"

कला प्रेमी नाराज न हो। मज़ाक की बात नहीं है... मैं प्रभु से तुलना कर रहा हूँ। इसी बात से आप अनुमान लगा सकते हैं कि मेरे मन में कला के लिए कितनी इज्जत है। मैं अक्सर म्यूजियम भी जाता हूँ और 'मूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट (मोमा)' तो कई बार जा चूका हूँ। वो बात और है कि नॉर्मल अवस्था में जाता हूँ... जाना अच्छा लगता है। मेरे एक मित्र ने कहा था - "अबे,  मोमा बिना गाँजा मारे जाके करते क्या हो तुम ? हाई होकर जाओ तो वहाँ जो 'कुछ भी' रख दिया जाता है उसे देखकर  फंडे मारने में मजा आएगा। तब आर्ट एंजॉय करोगे"। मानता हूँ उस स्तर का कलाप्रेमी नहीं हूँ। पर मोमा जाकर ये अनुभूति जरूर हुई कि कला ब्रह्म की तरह साकार और निराकार दोनों है. मैं नादान अभी तक कला को साकार ही समझता रहा था।

कला प्रेमी होने के बावजूद मैं मोमा के लिए इस ट्वीट को आधुनिक कला की परिभाषा मानता हूँ। जैसे ऋषि-मुनि कण कण में भगवान देखते हैं वैसे ही मॉडर्न आर्ट प्रेमी... वैसे मुझे कला की समझ नहीं बस थोड़ी रुचि है और मोमा जैसी जगहों पर जो 'कुछ भी' रखा होता है उसमें से बहुत कुछ मुझे रोचक भी लगता है। कुछ बहुत रोचक भी। पिछले दिनों एक आर्ट ऑक्शन में भी जाने का मौका मिला। जिसका अनुभव कुछ ऐसा था  -


वैसे 'मोरोंस' नाम की ये पेंटिंग भी आप जितना अनुमान लगा रहे हैं उससे महंगी ही है। नहीं-नहीं मैं आपकी औकात नहीं नाप रहा, हो सकता है आप इसे और ज्यादा पैसे में खरीद लेते। वो तो मैं अपनी औकात से सोच रहा हूँ कि मेरे ब्लॉग का पाठक मेरे जैसा ही तो होगा कितना भी अनुमान लगाएगा तो भला कितना लगाएगा ! वो क्या है कि हम उस सोच के हैं - 'इतना महंगा पैंट है तो हम क्यों लेंगे जी?लूँगी ही क्या बुरी है ?' वैसे ऑक्शन में कला से ज्यादा मैं नीलामी करने वाले की बेचने की कला और प्रक्रिया पर मुग्ध हुआ। थोड़ी देर बाद वही मैं पेंटिंग्स की कीमत का ऐसे अनुमान लगाने लगा जैसे... बस में बिकने वाला 'सोना चाँदी से कम नहीं, भुलाने पर गम नहीं' ब्रांड वाला गहना जिसे महंगा लगता हो वो कार्टियर-टिफनी देख कर कीमत गेस कर दे।

आर्ट ऑक्शन में बेचने वाले कला की कीमत कुछ ऐसे बढ़ा देते हैं जैसे... बचपन में एक चाचा राशन की दुकान चलाते थे। वो कहते कि... "मैं चावल दिखाता हूँ तो कई लोग पुछते हैं कि थोड़ा और महीन नहीं है? ये साफ भी नहीं लग रहा? तो मैं अंदर जाके उसी बोरी में से फिर लाता हूँ और कहता हूँ ये देखीये बिल्कुल फाइन क्वालिटी का चावल आया है। और ज्यादा महंगा भी नहीं है बस पिछले वाले से पाँच रुपये ही ज्यादा है"। वैसे ही जिन बातों की मुझे कोई समझ नहीं मैं उन्हें भी समझने के भ्रम में कीमत सोचने लगा.… ये वाली इतने नहीं उतने हजार डॉलर की होनी चाहिए ! ऐसा भी नहीं कि मुझे कोई पेंटिग बहुत कमाल की लगी हो... जैसे कलाकार ने जान डाल दी है। अब कला के  बारे में  तो यही सुनते आये थे - जान डाल देना ! पर यहाँ तो कभीनिराकारमोंकारमूलं तुरीयं  तो कभी अष्टावक्र दिखने वाली कला में कलाकार क्या जान डालेगा... पहले डिसाइड तो हो कि उसने जो  बनाया है वो कोई प्राणी है या ऑटो या ऐटम बम!

खैर... मैं मानता हूँ कि जो मुझे समझ नहीं आता वो भी जरूर किसी और को आता होगा। जो मुझे रोचक लगता है वो किसी और को बकवास लगता होगा। कुछ बात होगी तभी तो ऐसी कला को इतने बड़े म्यूजियम में रखा जाता है और इतना महंगा बिकता है !  ऐसी ही बात पर मुझे किसी ने सलाह दी थी कि मुझे आर्ट अप्रेसिएशन का कोर्स करना चाहिए। पर मुझे लगा कोर्स करके अप्रेसिएट करना तो नहीं सिखाया जा सकता। मुझे तो नहीं. मुझे नहीं लगता किसी के कह देने से मैं कुछ अप्रेसिएट करने लग जाऊंगा ! मैं अक्सर कहता हूँ - अगर कोई अच्छा इंसान नहीं तो भले ही नोबल प्राइज़ जीत के बैठा हो मुझसे न होनी उसकी इज्जत ! तो मुझे नहीं लगता किसी के कहे या सिखाये से मुझे कुछ रोचक लग जाएगा।  इश्क़, कला, ईश्वर ये सब अनुभूति की चीजें हैं... संभवतः जिन्हे है और जिन्हें नहीं है एक दूसरे को बहुत ज्यादा समझ-समझा नहीं सकते। समझने का एक ही तरीका है - खुद अनुभव करना। खैर... बात इतनी सिरियस भी नहीं है। तो बैक टु मोमा -


जब मैं मोमा जाता हूँ तो  वहाँ रखे 'आर्ट' को देख अक्सर मन में सवाल उठता है कि 'ये है क्या'! पढ़ने के बाद कई बार कुछ रोचक लग जाता है पर कई बार ये भी लगता है कि क्या बकवास है। सबसे मजेदार अनुभव वहाँ होता है जहां कुछ लिखा ही नहीं होता। या पढ़ने से पहले जो देख कर समझ आता है वो पढ़ने के बाद कुछ और ही निकल जाता है।  या जब लगता है यूँही भारी-भारी बात लिख दी गयी है। मेरे लिए मोमा जाना यानि खुश होकर लौटना, आर्टमय होकर लौटना। थोड़ी देर तक हर चीज आर्ट ही आर्ट लगने लगती है। हर चीज को देख कर लगता है - "फिर तो ये भी आर्ट हुआ" !

खैर... फिलहाल आप ये बेनामी तस्वीर देखिये -



मैंने कुछ लोगों को दिखाया और पूछा - 'ये क्या है' ! बड़े रोचक जवाब मिले। जितने ज्यादा लोग देखेंगे यकीनन और रोचक जवाब मिलते जाएँगे। ये हैं कुछ जवाब  -

1 दीवार लग रही है
2 आयरन से कोई कपड़ा जल गया है
3 स्टीम आयरन
4 पानी की परछाई
5 मुझे तो ये कोई बैक्टीरिया या वाइरस लग रहा है, माइक्रोस्कोप के नीचे
6 समुद्र में क्रूज जा रहा हो वैसा लग रहा है !
7 कोई कीड़ा?
8 कुछ तो ऐसा लग रहा है जैसे कंक्रीट आयरन से जल गया हो... कंक्रीट के ऊपर आयरन से कपडा जलने के कांसेप्ट का प्रोजेक्शन है !
9 जबड़े का एक्स रे (सबसे अधिक लोगों ने कहा)
10 मगरमच्छ का मुंह लग रहा है। अब ये मत कहना कि मैथ का कोई थियोरम है !
11 कोई मछली?
12 लूक्स लाइक ए डेंटल इंप्रिंट
13 त्रिशूल !
14 रैंडम लग रहा है पर कुछ ज्यादा ही रैडम है !
15 हीटमैप?
16 फ्रैक्टल ? तुम भेजे हो तो मैथ ही होगा !
17 कुछ तो माइक्रोस्कोपिक है।
18 भुतहा लग रहा है। जैसे फोटो खींचते समय कैमरा हिल जाता है।
19 क्या है? बताओ। नहीं पता चल रहा। मैग्नेटिक फील्ड?
20 टॉर्च या लैंप के सामने रखे किसी पेपर जैसी चीज से दीवार पर रौशनी पड़ रही है। आकार-प्रकार से कली जैसा लग रहा है या दो कीड़े। लगभग पर्फेक्ट सिमेट्री है तो मुझे लग रहा है कि कागज को बीच से मोड़ा गया है।
21 साउंड वेव को पानी में डालकर उसका प्रोजेक्शन खींचे हो
22 पता नहीं चल रहा। पर ऐसा लगता है कि ये तस्वीर कहीं देखी है मैंने !

यानि 'देखा-देखा लग रहा है' के लेवल पर ये तस्वीर पहुँच चुकी है। इस जवाब के बाद लगा मैंने मास्टरपीस बना दिया। जब पूछा था तब ये फोटो इस तरह फ्रेम में नहीं थी। ना ही मैंने कहा कि इसे आर्ट की नजरों से देख कर बताओ।


क्या दिख रहा है से याद आया… एक बार एक पहलवान, एक बनिया और एक पंडित एक जंगल से जा रहे थे। अब जंगल था तो चिड़िया तो बोलेगी ही ! तो एक चिड़िया अपनी धुन में कुछ बोल-गा रही थी। पंडित ने कहा - सुना तुम लोगो ने? चिड़िया कह रही है राम-लक्ष्मण-दशरथ।
पहलवान बोला - धेत पंडिज्जी ! आपको तो रामे राम दिखता है। वो कह रही है - दंड-बैठक-कसरत।
बनिया बोला - कैसे सुन रहे हो आपलोग ! साफ साफ कह रही है - प्याज-लहसुन-अदरख !
अब चिड़िया क्या कह रही थी ये तो चिड़िया जाने। हम चिड़िया तो हैं नहीं जो पता होगा। फिर से तुलसी बाबा साक्षी - खग जाने खग ही की भाषा !

किसी ने मुझसे मुझसे कहा - 'जो भी है ये पर... ह्यूमन ब्रेन इज सो वायरड़ टू मेक ऐंड सी पैटर्नस आउट ऑफ रैंडम नथिंग , ...बेस्ड ओन एक्सपेरिएन्सेस !' और मुझे लगा ये वायरिंग ही मॉडर्न आर्ट के आर्ट होने का कारण है। सब लोचा घूमा फिरा के ब्रेन की वायरिंग का ही है।

तो ये है क्या?
अब चिड़िया के बोलने की तरह ये जो भी हो... आप भी कुछ देख ही रहे होंगे इसमें। बताइये।

ये कला है?
कला का तो ऐसा है कि …कलाकार की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कलाकार काहे का?

'भेंड़े और भेंडिए' में परसाईजी ने एक सियार कवि के हुआं-हुआं करने पर लिखा है - पीले सियार को 'हुआं-हुआं' के सिवा कुछ और तो आता ही नहीं था। हुआं-हुआं चिल्ला दिया। शेष सियार भी हुआं-हुआं बोल पड़े। बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना कर दिया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला - "भई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं। पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? उनकी कविता में से शाश्वत के स्वर फूट रहे हैं।"

खैर कभी गलती से हम भी मशहूर हो गए तो... ममता दी की तरह कराएंगे हम भी नीलामी !

वैसे यहाँ तक पढ़ गये तो ये भी देखकर आइये - ..समीकरणरूपाय जगन्नाथाय ते नमः ! :)

~Abhishek Ojha~

Jun 23, 2015

हनीमून के भूगोल का सिलेबस (पटना २०)


‘का भईया, किससे बतिया रहे थे? लग रहा है कहीं जाने का प्लान बन रहा है?’ मेरे फ़ोन रखते ही बीरेंदर ने पूछा। वो बात और है कि यही बात किसी ने बीरेंदर से पूछा होता तो उसका जवाब होता - ‘जब सब सुनिए लिए हैं त फिर काहे ला पूछ रहे हैं?’
'हाँ कुछ दोस्तों के साथ सुंदरबन जाने का प्लान बन तो रहा था पर कुछ फाइनल नहीं हो पा रहा. एक ट्रेवल एजेंट से बात कर रहा था. वो कुछ ज्यादा ही महंगा बता रहा है. बोला सीजन नहीं है और कम आदमी हुए तो भी दस आदमी का पे करना पड़ेगा' मैंने कहा।
‘ई गजब हिसाब त पहिला बार सुन रहे हैं! हमको आइडिआ त नहीं है पर साथे का पढ़ा एक ठो लरका ट्रेभेल एजेंसी खोला है. कहिये त बात करें?.’ बैरीकूल के जान पहचान और जुगाड़ पहले भी काम आ चुके थे, तो मना करने का कोई कारण था नहीं.

ट्रेवेल एजेंसी एक पुराने ऑफिस बिल्डिंग के बेसमेंट में थी. जहां से हम अंदर गए वहाँ ढेर सारी बाइकें बेतरतीब तरीके से पार्क की गयी थी। बिल्डिंग को थामे खम्भे पर पान के पीक की परतें और पास जमा किया गया कचरा। बैरीकूल को लगा कि मुझे थोड़ा अजीब लग रहा होगा कि ये कैसी जगह पर 'ट्रेभेल एजेंसी' है ! उसने कहा – ‘थोड़ा जादे गंदगी है, का कीजिएगा कुकुर ही नहीं यहाँ आदमी भी खंभा देख के उसी का इस्तेमाल करते हैं। आछे भैया, कभी आपके दिमाग में आया है कि ये खंभा भी कभी तो एक दम फरेस... चूना-पालिस मारके एकदम चकाचक रहा होगा। अइसा कौन आदमी होगा जो पहली बार मुंह उठा के थूका होगा? माने अभी तो गंदा है तो लग रहा है कि जगहे है थूकने का. लेकिन जब चमक रहा होगा त एक दम सर्र से कोई थूक के लाल कर दिया होगा... माने उसको मजा आया होगा का? चमचमाती दीवार देख थूकने वाला जीव मचल जाता होगा थूकने के लिए कि उसको बुरा लगता होगा थूक कर?‘

'यार तुम भी क्या सोचने को कह रहे हो? मुझे कैसे पता होगा' मैंने हँसते हुए कहा।

एक छोटे से चाय की दूकान के बगल से सीढ़ियां नीचे गयी थी. चाय की दुकान के नाम पर एक कोयले का चूल्हा, एक लकड़ी की आलमारी जिसमें प्लास्टिक के तीनं-चार डब्बे रखे थे। चूल्हे को हवा देने के लिए एक टेबल फैन। एक प्लास्टिक की बड़ी बाल्टी जो शायद ट्रक के मोबिल का डब्बा था जिसकी छपाई उतर गयी थी। गिलास धोने से आस पास का फर्श गीला हो गया था। चाय के कप और कुल्हड़ फेंकने के लिए भी एक डब्बा रखा था लेकिन कप-कुल्हड़ उस डब्बे से ज्यादा बाहर फर्श पर बिखरे थे। हमें उसी रास्ते जाना था. बैरी कूल ने बताया था कि – “चाय की पसंद अपनी-अपनी होती है। कोई जादे शक्कर वाला चासनी जैसा पसंद करता है, त कोई जादे दुध वाला रबड़ी जैसा... आ जैसे-जैसे ‘बड़े आदमी' बनते जाते हैं – ‘ब्लैक टी' की तरफ बढते जाते हैं. चीनी और दूध दोनों की मात्रा कम करते जाते हैं. ज्यादा बड़े लोग बिना शक्कर बस ब्लैक ही ‘परेफर’ करते हैं. वैसे ही कप का भी है... कोई शीशा वाला गिलास, कोई कुल्हड़.  आ प्लास्टिक वाला त माने नरक है। आजकल वैसे 'हाई क्लास' फैसन में फिर कुल्हड़ आ रहा है. 'हाई क्लास' माने  'आई लभ कुल्हड वाली चाय' वाला क्लास। जैसे आदमी साल में एक बार चार जामुन- एक करेला खाके  सोचता है अब डायबिटीज नहीं होगा, बहुते फायदा करता है. वैसे ही साल में एक दो बार कार से उतर कुल्हड़ में पी के पर्यावरण से लेकर सेहत सब…।'

ट्रेवेल एजेंसी के अंदर शीशे का एक केबिन था जैसे पुराने पीसीओ होते थे. दीवारों पर कोनों से उखड़ते, टेप से फिर चिपका दिये गए, धुल की एक हलकी परत ओढ़े, स्विट्ज़रलैंड, एफ़िल टावर, सिडनी और स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी जैसे पोस्टर लगे थे. आईएटीए का एक सेर्टिफिकेशन, हज की कुछ तस्वीरें, एक पीला हो चूका सफ़ेद कम्प्यूटर, एक बड़ा सा चाइनीज मोबाइल, एक रजिस्टर जिन पर अनगिनत बार घिस घिस कर कलम चलाने का प्रयास किया गया था, जिसके उपर एक 'लिखी-फेंको' वाली कलम रखी थी और पानी की एक बोतल।

बीरेंदर ने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा - ‘का हो चिंटूपुत्र-मांझा, कटाई कैसी चल रही है आजकल? बकरे आ रहे हैं कि नहीं? सुने रोजे बक़रईद मन रहा है?’
‘आओ आओ बीरेंदर दीखबे नहीं करते हो आजकल।’ ट्रैवल एजेंट ने सर उठाते हुए कहा।
‘का निहार रहे थे बे एतना ध्यान से कम्प्यूटर में? हमको त डाउट हो गया तुम ट्रेभेल एजेंसी खोले हो कि साइबर कैफे? आ सुने हैं आजकल भीजा-ऊजा भी लगवाने लगे हो? एक ठो हमरा भी लगवा दो कि खाली फोटवे देखते रहेंगे हम?’
‘तुमको भिजा थोरे लगेगा बीरेंदर, तुम्हरा तो ओबामा किहाँ से सीधे लेटेरे आएगा।‘
‘...बैठा जाय, खारा काहें हैं? चाय पीयेंगे? की ठंढा मांगा दें?’ ट्रेवेल एजेंट ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। मैं चुपचाप चीजों को घूरते हुए ऐसे खड़ा था जैसे एडमिशन के लिए किसी बच्चे को स्कूल लाया गया हो.
‘काम मंदे चल रहा है बीरेंदर. का बताएं’
‘मंदा चल रहा है आ हीरो हौंडा उरा रहे हो?… हमेशा रोइतहि रहेगा. ई बता सुंदरबन का का हिसाब चल रहा है चार से पाँच आदमी के जाना है’

‘अरे बैइठिये ना पहिले। बात करे परतौ, हमलोग उधर भेजते नहीं है जादे। कउन जा रहा है?’ पटना की अपनी एक अलग ही भाषा है। हिन्दी-भोजपुरी-मगही-मैथिली कई भाषाओं का सम्मिश्रण। बोलते-बोलते अक्सर लोग एक से दूसरे पर ‘स्विच’ भी कर जाते हैं।
‘भैया को जाना है’  बीरेंदर ने मेरी तरफ इशारा किया. ‘आ बात कौंची करे परतौ रे? हमको तू पैंतरा सिखाएगा? माने तू अपना मलाई खायेगा और जिससे बात करेगा उ बचलका घी खायेगा? काम मंदा चल रहा है तो हमी को लूट के राजा हो जाएगा, नहीं?’
‘बीरेंदर यार, तुम्हें कहना पड़ेगा? उधर का आइडिया ही नहीं है तो का करें... एक तो तुम्हें सब सच बता रहे हैं’
‘अच्छा करो बात’

ट्रेवेल एजेंट अपना मोबाइल उठा कर बात करने चला गया।

‘इसके लिए भी हमको लगता है कि मिस्सडे काल मारेगा। एक नंबर के लीचर है। ...जानते हैं भैया, मांझवा का असली नाम सतप्रकास आ इसके पिताजी का नाम चिंटू. आप कभी सुने हैं कि पिताजी के नाम चिंटू आ बेटा के नाम सतप्रकास ? मतलब अइसा लगता है की उल्टा रखा गया नाम. बचपन में कोई पूछता होगा कि बेटा  तुम्हारा नाम क्या है तो बोलता होगा - सत्य प्रकाश। और तुम्हारे पिताजी का - श्री चिंटू ! दू चार ठो और श्री भी लगा दे तो चिंटू कभी भारी हो सकता है? पूछने वाला कन्फरम करने लगे - चिंटू बेटा फिर से बताओ? तो मंझवा बोलता होगा नहीं नहीं मेरा नाम चिंटू नहीं वो तो पिताजी...’

‘पूरा नाम सत्य प्रकाश मांझी?’ मैंने हँसते हुए पूछा।

‘आरे नहीं। मांझा तो इसका नाम स्कूल में धरा गया। वो ऐसे कि ई काटने में उस्ताद है. माने एकदम वल्ड चैम्पियन मांझा. धड़ से काट देता है एक दम. आ आज भी देखिये एतना न महीन कटाई की गाहक के बुझाएगा ही नहीं’ बात स्कूल के दिनों की चली और तब तक मंझवा वापस आए।

‘लिया जाय’ पोटेंशियल कस्टमर के लिए चाय मंगाई गयी थी. और फोन पर बात कर मंझवा ने बताया कि ‘बरी महंगा बता रहा है. ओतना पैसा देके काहे जाएंगे आप. कुछो नहीं है सुंदड़बन में’

ये पहला मौका नहीं था जब पटना में किसी ने मेरे खर्च की चिंता की थी। अक्सर जब रास्ता पूछता कि कितनी दूर होगा तो एक से पूछो तो चार उत्सुक लोग बताने आगे बढ़ आते। जैसे मिठाई बंट रही हो। जब पूछता कि रिक्शा या ऑटो मिल जाएगा? तो अक्सर जवाब होता  - ‘अरे काहे रेक्सा करेंगे, टहलते टहलते निकल जाइए एगारह नंबर का गारी से। हिहें पर तो है.’  तीन किलोमीटर तक के तो पैसे बचवा ही देते लोग। ये उत्सुकता और बेवजह की शुभचिंतकी हमेशा सुखद लगती।

सतप्रकास ने कहा – ‘भैया, एतना पैसा में त हम आपको ग्रुप टूर पर दुबई भेज देंगे, आ दुबई का फोटो जब आप फेसबुक पर डालेंगे त सोचिये केतना लाइक आएगा। आपका फ्रेंडलिस्ट में गर्दा उर जाएगा. एक बार आइडिया दीजिये अपना दोस्त सब के भी। सुंदड़बन में कुछो नहीं है‘
‘जाना तो सुंदरबन ही है नहीं तो कोई जरूरी भी नहीं है कि कहीं जाना ही है। खैर कोई बात नहीं... ’ मैंने कहा।
‘माने भैया को सुंदरबन जाना है त तू दुबई भेजने लगा? तुम्हरा काटने का आदत नहिये गया... ई साला चहवो तीता बना दिया है’ बीरेंदर ने मुंह बनाते हुए चाय का ग्लास रख दिया।
‘देखिये भइया हमलोग के भी त मार्केट के हिसाब से चलना पड़ता है। लोग जो पसंद करेंगे हमलोग वही भेजेंगे। मेरे पास पहली बार कोई आया है सुंदड़बन के लिए। डिमांडे नहीं है’
‘बात सही है। लेकिन अब फेसबुक पर फोटो डालने के लिए घूमने नहीं नू जाएँगे? कह रहे हैं सुंदरबन आ तू भेज रहा है दुबई। डाक्टर के हियाँ सर दर्द दिखाने आए त उ बताने लगा कि लिबरे चेक करा लीजिये फ़ेल मार गया होगा। तू चार बाई चार का डिब्बा में अकेले बईठ के फेसबूक टूर पैकेज बना रहा था क्या जब हम लोग आए?’

‘अरे उ बात नहीं है। आ भैया दुबई काहे नहीं जाएंगे? माने आपे बताइये कोई देखबों नहीं करता है अब दार्जिलिंग, शिमला, ऊटी का फोटो। कम से कम अंडमान-केरल हो तो कुछ लाइक आ भी जाय। ओतने पैसे में दुबई-बैंकॉक नहीं जाएगा कोई? उहे जमाना नहीं है बीरेंदर कि सिमला-मनाली से आगे दिमागे न जाये? अब लोग आते हैं भेनिस, संटोरिनी आ सेसेल्स के लिए... ई सब जगह अब फैसन में आ गया है। हनीमून के भूगोल का सिलेबस जो है उ सिमला-ऊटी-कस्मीर से आगे बर्ह गया है। आ अडवेंचर के लिए जाना है त लद्दाख जाइए।’

‘कौंची बोला रे? मालूम भी है तुमको नक्सा में कहाँ है ई सब? कि इसको भी झाड़खण्डे में दिखा देता है? आ अपना अनुभव के लिए जाना है कि दिखाने के लिए? तुम ससुर पाहिले एक थो इनक्रेडिबल इंडिया का फोटो लगाओ हीहां फिर बाद में संतोरियाना. देस का नक्सा  देखना आया नहीं आ यूरेसिआ के मैप पढ़ाने लगा हमको। जलडमरूमध्य बुझाया नहीं कभी आ भूगोल फेसबुकमध्ये बुझने चले हैं’

सत्यप्रकाश कुछ बोला नहीं हंसने लगा।

‘अरे भाई हमें हनीमून पर नहीं जाना है ना ही फेसबुक पर फोटो डालनी है. खैर कोई बात नहीं  मार्केट का डिमांड-सप्लाई बताने के लिए धन्यवाद। दुबई जाना हुआ तो जरूर बताएँगे आपको’ - मैंने कहा.

बीरेंदर ने आगे कहा – ‘छोड़िये! हम पहिलही बोले कि हम लोग पैंतरा में पड़ने नहीं आए हैं। लेकिन तू अइसा अइसा जगह का नाम बताया आज। हनीमून के भूगोल में परकाण्ड पीएचडीये दिला दें का तुमको? नालंदा भी फिर खुलिए गया है। एक ठो बर्हिया चाहो नहीं पिलाया आ भूगोल पढ़ाने बईठ गया। तुम्हारा सब भूगोल का कच्छा में हम भी साथे थे... सब देखे हैं…’  हम चलने लगे तो बात भूगोल की कक्षा की ओर चली गयी…

‘जानते हैं भैया, भूगोल में हमलोग के हर परीच्छा में भारत का मानचित्र बनाने आता था। माने उ सवाल फिक्से समझिए। आ आधे से जादा लरका दु रुपया का सिक्का लेके जाता था आ नहीं त नक्सा वाला कोम्पस बोक्स। तबो सब अखण्डे भारत बना के आता था। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश आ साथ में पाकिस्तानो भारते में दिखा देता था। नक्सा के बाद उसमें जगह दिखाना होता था…  मंझावा के त था कि जो भी दिखाना हो सब झारखण्डे में दिखा आता था। माने सवाल में आधा त खनिजे उत्पादन का जगह दिखाने आता था। त इ अइसा झारखंड फैन कि बंबईओ दिखाने आए त झारखण्डे में। एतने इसको पता था भूगोल। आ अब देखिये केतना भारी-भारी जगह का नाम ले रहा है! एक्को नाम नहीं सुना होगा जब पर्हता था… अभियो से पर्ह लो बे अपने देस में झारखण्ड के अलावे भी बहुत जगह है’

‘केचाईन मत करो बीरेंदर। झाड़खंड वाला हम नहीं थे उ राजेसवा करता था।’

‘अबे जाओ ! चपटु सर बोले नहीं बोले थे तुमको कि जब नकसवे सही नहीं है तो “दिखाये तो सहिये हैं सर” का कर रहा है? जब नकसवे सही नहीं बना है त जगह कौंची का ठीके दिखाया हैं? आ महाद्वीप के महाद्विप लिख देगा त महा हाथी हो जाएगा भी तुम्ही को बोले थे। अब भले तुम पीएचडी कर लिए हो हनीमून भूगोल में’

‘कौन कौन बात याद रखते हो बीरेंदर तुम भी !’ - मंझवा ने कहा.

इसके बाद एएन कॉलेज में हुई मार पीट की बात चली... वो फिर कभी :)

‘वहाँ से चले तो बीरेंदर ने बताया... अब सब कुछ फेसबुके से डिसाइड होता है। माने देखिये... वैसे जानते हैं भैया उ पुरुवा है न जिससे मिलाये थे उस दिन। उ छोर दिया फेसबुक। हम पूछे त बोला... “जानते हो नसा हो गया था। ओहि में लगे रहिते थे। एक दिन गुस्साके डिलीट कर दिये। जानते हो मेरे बाबूजी पहले खूब चाय पीते थे... उस जमाने से जब चाय पहिले पहिल फैसन में आया था। एक दिन छोर दिये... उसके बाद जहां भी जाते हैं। सब कहता है - ई चाय नहीं पीते हैं... त पेरा (पेड़ा) मांगा देता है। अब पेरा  मिलने लगा त उनको मन भी होता चाय पीने का त नहीं पीते... आ उनका चाय छूटिए गया। उहे हुआ फेसबुक छोरने पर... एतना न फैसन में हो गया है कि अब न रहो फेसबुक पर त लोग कहता है कि कैसे नहीं हो? माने अइसा है जैसे.. कौनो असंभव वाला कम कर दिये. हमको स्पेसल लगता है। फेसबूक पर तो सब है ही त जे है से कि जो नहीं है उहे न स्पेसल हुआ’  :)

(पटना सीरीज)

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~Abhishek Ojha~