Aug 6, 2015

...मॉडर्न आर्ट

"जाकी रही भावना जैसी, मॉडर्न आर्ट तिन्ह देखी तैसी"

कला प्रेमी नाराज न हो। मज़ाक की बात नहीं है... मैं प्रभु से तुलना कर रहा हूँ। इसी बात से आप अनुमान लगा सकते हैं कि मेरे मन में कला के लिए कितनी इज्जत है। मैं अक्सर म्यूजियम भी जाता हूँ और 'मूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट (मोमा)' तो कई बार जा चूका हूँ। वो बात और है कि नॉर्मल अवस्था में जाता हूँ... जाना अच्छा लगता है। मेरे एक मित्र ने कहा था - "अबे,  मोमा बिना गाँजा मारे जाके करते क्या हो तुम ? हाई होकर जाओ तो वहाँ जो 'कुछ भी' रख दिया जाता है उसे देखकर  फंडे मारने में मजा आएगा। तब आर्ट एंजॉय करोगे"। मानता हूँ उस स्तर का कलाप्रेमी नहीं हूँ। पर मोमा जाकर ये अनुभूति जरूर हुई कि कला ब्रह्म की तरह साकार और निराकार दोनों है. मैं नादान अभी तक कला को साकार ही समझता रहा था।

कला प्रेमी होने के बावजूद मैं मोमा के लिए इस ट्वीट को आधुनिक कला की परिभाषा मानता हूँ। जैसे ऋषि-मुनि कण कण में भगवान देखते हैं वैसे ही मॉडर्न आर्ट प्रेमी... वैसे मुझे कला की समझ नहीं बस थोड़ी रुचि है और मोमा जैसी जगहों पर जो 'कुछ भी' रखा होता है उसमें से बहुत कुछ मुझे रोचक भी लगता है। कुछ बहुत रोचक भी। पिछले दिनों एक आर्ट ऑक्शन में भी जाने का मौका मिला। जिसका अनुभव कुछ ऐसा था  -


वैसे 'मोरोंस' नाम की ये पेंटिंग भी आप जितना अनुमान लगा रहे हैं उससे महंगी ही है। नहीं-नहीं मैं आपकी औकात नहीं नाप रहा, हो सकता है आप इसे और ज्यादा पैसे में खरीद लेते। वो तो मैं अपनी औकात से सोच रहा हूँ कि मेरे ब्लॉग का पाठक मेरे जैसा ही तो होगा कितना भी अनुमान लगाएगा तो भला कितना लगाएगा ! वो क्या है कि हम उस सोच के हैं - 'इतना महंगा पैंट है तो हम क्यों लेंगे जी?लूँगी ही क्या बुरी है ?' वैसे ऑक्शन में कला से ज्यादा मैं नीलामी करने वाले की बेचने की कला और प्रक्रिया पर मुग्ध हुआ। थोड़ी देर बाद वही मैं पेंटिंग्स की कीमत का ऐसे अनुमान लगाने लगा जैसे... बस में बिकने वाला 'सोना चाँदी से कम नहीं, भुलाने पर गम नहीं' ब्रांड वाला गहना जिसे महंगा लगता हो वो कार्टियर-टिफनी देख कर कीमत गेस कर दे।

आर्ट ऑक्शन में बेचने वाले कला की कीमत कुछ ऐसे बढ़ा देते हैं जैसे... बचपन में एक चाचा राशन की दुकान चलाते थे। वो कहते कि... "मैं चावल दिखाता हूँ तो कई लोग पुछते हैं कि थोड़ा और महीन नहीं है? ये साफ भी नहीं लग रहा? तो मैं अंदर जाके उसी बोरी में से फिर लाता हूँ और कहता हूँ ये देखीये बिल्कुल फाइन क्वालिटी का चावल आया है। और ज्यादा महंगा भी नहीं है बस पिछले वाले से पाँच रुपये ही ज्यादा है"। वैसे ही जिन बातों की मुझे कोई समझ नहीं मैं उन्हें भी समझने के भ्रम में कीमत सोचने लगा.… ये वाली इतने नहीं उतने हजार डॉलर की होनी चाहिए ! ऐसा भी नहीं कि मुझे कोई पेंटिग बहुत कमाल की लगी हो... जैसे कलाकार ने जान डाल दी है। अब कला के  बारे में  तो यही सुनते आये थे - जान डाल देना ! पर यहाँ तो कभीनिराकारमोंकारमूलं तुरीयं  तो कभी अष्टावक्र दिखने वाली कला में कलाकार क्या जान डालेगा... पहले डिसाइड तो हो कि उसने जो  बनाया है वो कोई प्राणी है या ऑटो या ऐटम बम!

खैर... मैं मानता हूँ कि जो मुझे समझ नहीं आता वो भी जरूर किसी और को आता होगा। जो मुझे रोचक लगता है वो किसी और को बकवास लगता होगा। कुछ बात होगी तभी तो ऐसी कला को इतने बड़े म्यूजियम में रखा जाता है और इतना महंगा बिकता है !  ऐसी ही बात पर मुझे किसी ने सलाह दी थी कि मुझे आर्ट अप्रेसिएशन का कोर्स करना चाहिए। पर मुझे लगा कोर्स करके अप्रेसिएट करना तो नहीं सिखाया जा सकता। मुझे तो नहीं. मुझे नहीं लगता किसी के कह देने से मैं कुछ अप्रेसिएट करने लग जाऊंगा ! मैं अक्सर कहता हूँ - अगर कोई अच्छा इंसान नहीं तो भले ही नोबल प्राइज़ जीत के बैठा हो मुझसे न होनी उसकी इज्जत ! तो मुझे नहीं लगता किसी के कहे या सिखाये से मुझे कुछ रोचक लग जाएगा।  इश्क़, कला, ईश्वर ये सब अनुभूति की चीजें हैं... संभवतः जिन्हे है और जिन्हें नहीं है एक दूसरे को बहुत ज्यादा समझ-समझा नहीं सकते। समझने का एक ही तरीका है - खुद अनुभव करना। खैर... बात इतनी सिरियस भी नहीं है। तो बैक टु मोमा -


जब मैं मोमा जाता हूँ तो  वहाँ रखे 'आर्ट' को देख अक्सर मन में सवाल उठता है कि 'ये है क्या'! पढ़ने के बाद कई बार कुछ रोचक लग जाता है पर कई बार ये भी लगता है कि क्या बकवास है। सबसे मजेदार अनुभव वहाँ होता है जहां कुछ लिखा ही नहीं होता। या पढ़ने से पहले जो देख कर समझ आता है वो पढ़ने के बाद कुछ और ही निकल जाता है।  या जब लगता है यूँही भारी-भारी बात लिख दी गयी है। मेरे लिए मोमा जाना यानि खुश होकर लौटना, आर्टमय होकर लौटना। थोड़ी देर तक हर चीज आर्ट ही आर्ट लगने लगती है। हर चीज को देख कर लगता है - "फिर तो ये भी आर्ट हुआ" !

खैर... फिलहाल आप ये बेनामी तस्वीर देखिये -



मैंने कुछ लोगों को दिखाया और पूछा - 'ये क्या है' ! बड़े रोचक जवाब मिले। जितने ज्यादा लोग देखेंगे यकीनन और रोचक जवाब मिलते जाएँगे। ये हैं कुछ जवाब  -

1 दीवार लग रही है
2 आयरन से कोई कपड़ा जल गया है
3 स्टीम आयरन
4 पानी की परछाई
5 मुझे तो ये कोई बैक्टीरिया या वाइरस लग रहा है, माइक्रोस्कोप के नीचे
6 समुद्र में क्रूज जा रहा हो वैसा लग रहा है !
7 कोई कीड़ा?
8 कुछ तो ऐसा लग रहा है जैसे कंक्रीट आयरन से जल गया हो... कंक्रीट के ऊपर आयरन से कपडा जलने के कांसेप्ट का प्रोजेक्शन है !
9 जबड़े का एक्स रे (सबसे अधिक लोगों ने कहा)
10 मगरमच्छ का मुंह लग रहा है। अब ये मत कहना कि मैथ का कोई थियोरम है !
11 कोई मछली?
12 लूक्स लाइक ए डेंटल इंप्रिंट
13 त्रिशूल !
14 रैंडम लग रहा है पर कुछ ज्यादा ही रैडम है !
15 हीटमैप?
16 फ्रैक्टल ? तुम भेजे हो तो मैथ ही होगा !
17 कुछ तो माइक्रोस्कोपिक है।
18 भुतहा लग रहा है। जैसे फोटो खींचते समय कैमरा हिल जाता है।
19 क्या है? बताओ। नहीं पता चल रहा। मैग्नेटिक फील्ड?
20 टॉर्च या लैंप के सामने रखे किसी पेपर जैसी चीज से दीवार पर रौशनी पड़ रही है। आकार-प्रकार से कली जैसा लग रहा है या दो कीड़े। लगभग पर्फेक्ट सिमेट्री है तो मुझे लग रहा है कि कागज को बीच से मोड़ा गया है।
21 साउंड वेव को पानी में डालकर उसका प्रोजेक्शन खींचे हो
22 पता नहीं चल रहा। पर ऐसा लगता है कि ये तस्वीर कहीं देखी है मैंने !

यानि 'देखा-देखा लग रहा है' के लेवल पर ये तस्वीर पहुँच चुकी है। इस जवाब के बाद लगा मैंने मास्टरपीस बना दिया। जब पूछा था तब ये फोटो इस तरह फ्रेम में नहीं थी। ना ही मैंने कहा कि इसे आर्ट की नजरों से देख कर बताओ।


क्या दिख रहा है से याद आया… एक बार एक पहलवान, एक बनिया और एक पंडित एक जंगल से जा रहे थे। अब जंगल था तो चिड़िया तो बोलेगी ही ! तो एक चिड़िया अपनी धुन में कुछ बोल-गा रही थी। पंडित ने कहा - सुना तुम लोगो ने? चिड़िया कह रही है राम-लक्ष्मण-दशरथ।
पहलवान बोला - धेत पंडिज्जी ! आपको तो रामे राम दिखता है। वो कह रही है - दंड-बैठक-कसरत।
बनिया बोला - कैसे सुन रहे हो आपलोग ! साफ साफ कह रही है - प्याज-लहसुन-अदरख !
अब चिड़िया क्या कह रही थी ये तो चिड़िया जाने। हम चिड़िया तो हैं नहीं जो पता होगा। फिर से तुलसी बाबा साक्षी - खग जाने खग ही की भाषा !

किसी ने मुझसे मुझसे कहा - 'जो भी है ये पर... ह्यूमन ब्रेन इज सो वायरड़ टू मेक ऐंड सी पैटर्नस आउट ऑफ रैंडम नथिंग , ...बेस्ड ओन एक्सपेरिएन्सेस !' और मुझे लगा ये वायरिंग ही मॉडर्न आर्ट के आर्ट होने का कारण है। सब लोचा घूमा फिरा के ब्रेन की वायरिंग का ही है।

तो ये है क्या?
अब चिड़िया के बोलने की तरह ये जो भी हो... आप भी कुछ देख ही रहे होंगे इसमें। बताइये।

ये कला है?
कला का तो ऐसा है कि …कलाकार की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कलाकार काहे का?

'भेंड़े और भेंडिए' में परसाईजी ने एक सियार कवि के हुआं-हुआं करने पर लिखा है - पीले सियार को 'हुआं-हुआं' के सिवा कुछ और तो आता ही नहीं था। हुआं-हुआं चिल्ला दिया। शेष सियार भी हुआं-हुआं बोल पड़े। बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना कर दिया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला - "भई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं। पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? उनकी कविता में से शाश्वत के स्वर फूट रहे हैं।"

खैर कभी गलती से हम भी मशहूर हो गए तो... ममता दी की तरह कराएंगे हम भी नीलामी !

वैसे यहाँ तक पढ़ गये तो ये भी देखकर आइये - ..समीकरणरूपाय जगन्नाथाय ते नमः ! :)

~Abhishek Ojha~

Jun 23, 2015

हनीमून के भूगोल का सिलेबस (पटना २०)


‘का भईया, किससे बतिया रहे थे? लग रहा है कहीं जाने का प्लान बन रहा है?’ मेरे फ़ोन रखते ही बीरेंदर ने पूछा। वो बात और है कि यही बात किसी ने बीरेंदर से पूछा होता तो उसका जवाब होता - ‘जब सब सुनिए लिए हैं त फिर काहे ला पूछ रहे हैं?’
'हाँ कुछ दोस्तों के साथ सुंदरबन जाने का प्लान बन तो रहा था पर कुछ फाइनल नहीं हो पा रहा. एक ट्रेवल एजेंट से बात कर रहा था. वो कुछ ज्यादा ही महंगा बता रहा है. बोला सीजन नहीं है और कम आदमी हुए तो भी दस आदमी का पे करना पड़ेगा' मैंने कहा।
‘ई गजब हिसाब त पहिला बार सुन रहे हैं! हमको आइडिआ त नहीं है पर साथे का पढ़ा एक ठो लरका ट्रेभेल एजेंसी खोला है. कहिये त बात करें?.’ बैरीकूल के जान पहचान और जुगाड़ पहले भी काम आ चुके थे, तो मना करने का कोई कारण था नहीं.

ट्रेवेल एजेंसी एक पुराने ऑफिस बिल्डिंग के बेसमेंट में थी. जहां से हम अंदर गए वहाँ ढेर सारी बाइकें बेतरतीब तरीके से पार्क की गयी थी। बिल्डिंग को थामे खम्भे पर पान के पीक की परतें और पास जमा किया गया कचरा। बैरीकूल को लगा कि मुझे थोड़ा अजीब लग रहा होगा कि ये कैसी जगह पर 'ट्रेभेल एजेंसी' है ! उसने कहा – ‘थोड़ा जादे गंदगी है, का कीजिएगा कुकुर ही नहीं यहाँ आदमी भी खंभा देख के उसी का इस्तेमाल करते हैं। आछे भैया, कभी आपके दिमाग में आया है कि ये खंभा भी कभी तो एक दम फरेस... चूना-पालिस मारके एकदम चकाचक रहा होगा। अइसा कौन आदमी होगा जो पहली बार मुंह उठा के थूका होगा? माने अभी तो गंदा है तो लग रहा है कि जगहे है थूकने का. लेकिन जब चमक रहा होगा त एक दम सर्र से कोई थूक के लाल कर दिया होगा... माने उसको मजा आया होगा का? चमचमाती दीवार देख थूकने वाला जीव मचल जाता होगा थूकने के लिए कि उसको बुरा लगता होगा थूक कर?‘

'यार तुम भी क्या सोचने को कह रहे हो? मुझे कैसे पता होगा' मैंने हँसते हुए कहा।

एक छोटे से चाय की दूकान के बगल से सीढ़ियां नीचे गयी थी. चाय की दुकान के नाम पर एक कोयले का चूल्हा, एक लकड़ी की आलमारी जिसमें प्लास्टिक के तीनं-चार डब्बे रखे थे। चूल्हे को हवा देने के लिए एक टेबल फैन। एक प्लास्टिक की बड़ी बाल्टी जो शायद ट्रक के मोबिल का डब्बा था जिसकी छपाई उतर गयी थी। गिलास धोने से आस पास का फर्श गीला हो गया था। चाय के कप और कुल्हड़ फेंकने के लिए भी एक डब्बा रखा था लेकिन कप-कुल्हड़ उस डब्बे से ज्यादा बाहर फर्श पर बिखरे थे। हमें उसी रास्ते जाना था. बैरी कूल ने बताया था कि – “चाय की पसंद अपनी-अपनी होती है। कोई जादे शक्कर वाला चासनी जैसा पसंद करता है, त कोई जादे दुध वाला रबड़ी जैसा... आ जैसे-जैसे ‘बड़े आदमी' बनते जाते हैं – ‘ब्लैक टी' की तरफ बढते जाते हैं. चीनी और दूध दोनों की मात्रा कम करते जाते हैं. ज्यादा बड़े लोग बिना शक्कर बस ब्लैक ही ‘परेफर’ करते हैं. वैसे ही कप का भी है... कोई शीशा वाला गिलास, कोई कुल्हड़.  आ प्लास्टिक वाला त माने नरक है। आजकल वैसे 'हाई क्लास' फैसन में फिर कुल्हड़ आ रहा है. 'हाई क्लास' माने  'आई लभ कुल्हड वाली चाय' वाला क्लास। जैसे आदमी साल में एक बार चार जामुन- एक करेला खाके  सोचता है अब डायबिटीज नहीं होगा, बहुते फायदा करता है. वैसे ही साल में एक दो बार कार से उतर कुल्हड़ में पी के पर्यावरण से लेकर सेहत सब…।'

ट्रेवेल एजेंसी के अंदर शीशे का एक केबिन था जैसे पुराने पीसीओ होते थे. दीवारों पर कोनों से उखड़ते, टेप से फिर चिपका दिये गए, धुल की एक हलकी परत ओढ़े, स्विट्ज़रलैंड, एफ़िल टावर, सिडनी और स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी जैसे पोस्टर लगे थे. आईएटीए का एक सेर्टिफिकेशन, हज की कुछ तस्वीरें, एक पीला हो चूका सफ़ेद कम्प्यूटर, एक बड़ा सा चाइनीज मोबाइल, एक रजिस्टर जिन पर अनगिनत बार घिस घिस कर कलम चलाने का प्रयास किया गया था, जिसके उपर एक 'लिखी-फेंको' वाली कलम रखी थी और पानी की एक बोतल।

बीरेंदर ने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा - ‘का हो चिंटूपुत्र-मांझा, कटाई कैसी चल रही है आजकल? बकरे आ रहे हैं कि नहीं? सुने रोजे बक़रईद मन रहा है?’
‘आओ आओ बीरेंदर दीखबे नहीं करते हो आजकल।’ ट्रैवल एजेंट ने सर उठाते हुए कहा।
‘का निहार रहे थे बे एतना ध्यान से कम्प्यूटर में? हमको त डाउट हो गया तुम ट्रेभेल एजेंसी खोले हो कि साइबर कैफे? आ सुने हैं आजकल भीजा-ऊजा भी लगवाने लगे हो? एक ठो हमरा भी लगवा दो कि खाली फोटवे देखते रहेंगे हम?’
‘तुमको भिजा थोरे लगेगा बीरेंदर, तुम्हरा तो ओबामा किहाँ से सीधे लेटेरे आएगा।‘
‘...बैठा जाय, खारा काहें हैं? चाय पीयेंगे? की ठंढा मांगा दें?’ ट्रेवेल एजेंट ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। मैं चुपचाप चीजों को घूरते हुए ऐसे खड़ा था जैसे एडमिशन के लिए किसी बच्चे को स्कूल लाया गया हो.
‘काम मंदे चल रहा है बीरेंदर. का बताएं’
‘मंदा चल रहा है आ हीरो हौंडा उरा रहे हो?… हमेशा रोइतहि रहेगा. ई बता सुंदरबन का का हिसाब चल रहा है चार से पाँच आदमी के जाना है’

‘अरे बैइठिये ना पहिले। बात करे परतौ, हमलोग उधर भेजते नहीं है जादे। कउन जा रहा है?’ पटना की अपनी एक अलग ही भाषा है। हिन्दी-भोजपुरी-मगही-मैथिली कई भाषाओं का सम्मिश्रण। बोलते-बोलते अक्सर लोग एक से दूसरे पर ‘स्विच’ भी कर जाते हैं।
‘भैया को जाना है’  बीरेंदर ने मेरी तरफ इशारा किया. ‘आ बात कौंची करे परतौ रे? हमको तू पैंतरा सिखाएगा? माने तू अपना मलाई खायेगा और जिससे बात करेगा उ बचलका घी खायेगा? काम मंदा चल रहा है तो हमी को लूट के राजा हो जाएगा, नहीं?’
‘बीरेंदर यार, तुम्हें कहना पड़ेगा? उधर का आइडिया ही नहीं है तो का करें... एक तो तुम्हें सब सच बता रहे हैं’
‘अच्छा करो बात’

ट्रेवेल एजेंट अपना मोबाइल उठा कर बात करने चला गया।

‘इसके लिए भी हमको लगता है कि मिस्सडे काल मारेगा। एक नंबर के लीचर है। ...जानते हैं भैया, मांझवा का असली नाम सतप्रकास आ इसके पिताजी का नाम चिंटू. आप कभी सुने हैं कि पिताजी के नाम चिंटू आ बेटा के नाम सतप्रकास ? मतलब अइसा लगता है की उल्टा रखा गया नाम. बचपन में कोई पूछता होगा कि बेटा  तुम्हारा नाम क्या है तो बोलता होगा - सत्य प्रकाश। और तुम्हारे पिताजी का - श्री चिंटू ! दू चार ठो और श्री भी लगा दे तो चिंटू कभी भारी हो सकता है? पूछने वाला कन्फरम करने लगे - चिंटू बेटा फिर से बताओ? तो मंझवा बोलता होगा नहीं नहीं मेरा नाम चिंटू नहीं वो तो पिताजी...’

‘पूरा नाम सत्य प्रकाश मांझी?’ मैंने हँसते हुए पूछा।

‘आरे नहीं। मांझा तो इसका नाम स्कूल में धरा गया। वो ऐसे कि ई काटने में उस्ताद है. माने एकदम वल्ड चैम्पियन मांझा. धड़ से काट देता है एक दम. आ आज भी देखिये एतना न महीन कटाई की गाहक के बुझाएगा ही नहीं’ बात स्कूल के दिनों की चली और तब तक मंझवा वापस आए।

‘लिया जाय’ पोटेंशियल कस्टमर के लिए चाय मंगाई गयी थी. और फोन पर बात कर मंझवा ने बताया कि ‘बरी महंगा बता रहा है. ओतना पैसा देके काहे जाएंगे आप. कुछो नहीं है सुंदड़बन में’

ये पहला मौका नहीं था जब पटना में किसी ने मेरे खर्च की चिंता की थी। अक्सर जब रास्ता पूछता कि कितनी दूर होगा तो एक से पूछो तो चार उत्सुक लोग बताने आगे बढ़ आते। जैसे मिठाई बंट रही हो। जब पूछता कि रिक्शा या ऑटो मिल जाएगा? तो अक्सर जवाब होता  - ‘अरे काहे रेक्सा करेंगे, टहलते टहलते निकल जाइए एगारह नंबर का गारी से। हिहें पर तो है.’  तीन किलोमीटर तक के तो पैसे बचवा ही देते लोग। ये उत्सुकता और बेवजह की शुभचिंतकी हमेशा सुखद लगती।

सतप्रकास ने कहा – ‘भैया, एतना पैसा में त हम आपको ग्रुप टूर पर दुबई भेज देंगे, आ दुबई का फोटो जब आप फेसबुक पर डालेंगे त सोचिये केतना लाइक आएगा। आपका फ्रेंडलिस्ट में गर्दा उर जाएगा. एक बार आइडिया दीजिये अपना दोस्त सब के भी। सुंदड़बन में कुछो नहीं है‘
‘जाना तो सुंदरबन ही है नहीं तो कोई जरूरी भी नहीं है कि कहीं जाना ही है। खैर कोई बात नहीं... ’ मैंने कहा।
‘माने भैया को सुंदरबन जाना है त तू दुबई भेजने लगा? तुम्हरा काटने का आदत नहिये गया... ई साला चहवो तीता बना दिया है’ बीरेंदर ने मुंह बनाते हुए चाय का ग्लास रख दिया।
‘देखिये भइया हमलोग के भी त मार्केट के हिसाब से चलना पड़ता है। लोग जो पसंद करेंगे हमलोग वही भेजेंगे। मेरे पास पहली बार कोई आया है सुंदड़बन के लिए। डिमांडे नहीं है’
‘बात सही है। लेकिन अब फेसबुक पर फोटो डालने के लिए घूमने नहीं नू जाएँगे? कह रहे हैं सुंदरबन आ तू भेज रहा है दुबई। डाक्टर के हियाँ सर दर्द दिखाने आए त उ बताने लगा कि लिबरे चेक करा लीजिये फ़ेल मार गया होगा। तू चार बाई चार का डिब्बा में अकेले बईठ के फेसबूक टूर पैकेज बना रहा था क्या जब हम लोग आए?’

‘अरे उ बात नहीं है। आ भैया दुबई काहे नहीं जाएंगे? माने आपे बताइये कोई देखबों नहीं करता है अब दार्जिलिंग, शिमला, ऊटी का फोटो। कम से कम अंडमान-केरल हो तो कुछ लाइक आ भी जाय। ओतने पैसे में दुबई-बैंकॉक नहीं जाएगा कोई? उहे जमाना नहीं है बीरेंदर कि सिमला-मनाली से आगे दिमागे न जाये? अब लोग आते हैं भेनिस, संटोरिनी आ सेसेल्स के लिए... ई सब जगह अब फैसन में आ गया है। हनीमून के भूगोल का सिलेबस जो है उ सिमला-ऊटी-कस्मीर से आगे बर्ह गया है। आ अडवेंचर के लिए जाना है त लद्दाख जाइए।’

‘कौंची बोला रे? मालूम भी है तुमको नक्सा में कहाँ है ई सब? कि इसको भी झाड़खण्डे में दिखा देता है? आ अपना अनुभव के लिए जाना है कि दिखाने के लिए? तुम ससुर पाहिले एक थो इनक्रेडिबल इंडिया का फोटो लगाओ हीहां फिर बाद में संतोरियाना. देस का नक्सा  देखना आया नहीं आ यूरेसिआ के मैप पढ़ाने लगा हमको। जलडमरूमध्य बुझाया नहीं कभी आ भूगोल फेसबुकमध्ये बुझने चले हैं’

सत्यप्रकाश कुछ बोला नहीं हंसने लगा।

‘अरे भाई हमें हनीमून पर नहीं जाना है ना ही फेसबुक पर फोटो डालनी है. खैर कोई बात नहीं  मार्केट का डिमांड-सप्लाई बताने के लिए धन्यवाद। दुबई जाना हुआ तो जरूर बताएँगे आपको’ - मैंने कहा.

बीरेंदर ने आगे कहा – ‘छोड़िये! हम पहिलही बोले कि हम लोग पैंतरा में पड़ने नहीं आए हैं। लेकिन तू अइसा अइसा जगह का नाम बताया आज। हनीमून के भूगोल में परकाण्ड पीएचडीये दिला दें का तुमको? नालंदा भी फिर खुलिए गया है। एक ठो बर्हिया चाहो नहीं पिलाया आ भूगोल पढ़ाने बईठ गया। तुम्हारा सब भूगोल का कच्छा में हम भी साथे थे... सब देखे हैं…’  हम चलने लगे तो बात भूगोल की कक्षा की ओर चली गयी…

‘जानते हैं भैया, भूगोल में हमलोग के हर परीच्छा में भारत का मानचित्र बनाने आता था। माने उ सवाल फिक्से समझिए। आ आधे से जादा लरका दु रुपया का सिक्का लेके जाता था आ नहीं त नक्सा वाला कोम्पस बोक्स। तबो सब अखण्डे भारत बना के आता था। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश आ साथ में पाकिस्तानो भारते में दिखा देता था। नक्सा के बाद उसमें जगह दिखाना होता था…  मंझावा के त था कि जो भी दिखाना हो सब झारखण्डे में दिखा आता था। माने सवाल में आधा त खनिजे उत्पादन का जगह दिखाने आता था। त इ अइसा झारखंड फैन कि बंबईओ दिखाने आए त झारखण्डे में। एतने इसको पता था भूगोल। आ अब देखिये केतना भारी-भारी जगह का नाम ले रहा है! एक्को नाम नहीं सुना होगा जब पर्हता था… अभियो से पर्ह लो बे अपने देस में झारखण्ड के अलावे भी बहुत जगह है’

‘केचाईन मत करो बीरेंदर। झाड़खंड वाला हम नहीं थे उ राजेसवा करता था।’

‘अबे जाओ ! चपटु सर बोले नहीं बोले थे तुमको कि जब नकसवे सही नहीं है तो “दिखाये तो सहिये हैं सर” का कर रहा है? जब नकसवे सही नहीं बना है त जगह कौंची का ठीके दिखाया हैं? आ महाद्वीप के महाद्विप लिख देगा त महा हाथी हो जाएगा भी तुम्ही को बोले थे। अब भले तुम पीएचडी कर लिए हो हनीमून भूगोल में’

‘कौन कौन बात याद रखते हो बीरेंदर तुम भी !’ - मंझवा ने कहा.

इसके बाद एएन कॉलेज में हुई मार पीट की बात चली... वो फिर कभी :)

‘वहाँ से चले तो बीरेंदर ने बताया... अब सब कुछ फेसबुके से डिसाइड होता है। माने देखिये... वैसे जानते हैं भैया उ पुरुवा है न जिससे मिलाये थे उस दिन। उ छोर दिया फेसबुक। हम पूछे त बोला... “जानते हो नसा हो गया था। ओहि में लगे रहिते थे। एक दिन गुस्साके डिलीट कर दिये। जानते हो मेरे बाबूजी पहले खूब चाय पीते थे... उस जमाने से जब चाय पहिले पहिल फैसन में आया था। एक दिन छोर दिये... उसके बाद जहां भी जाते हैं। सब कहता है - ई चाय नहीं पीते हैं... त पेरा (पेड़ा) मांगा देता है। अब पेरा  मिलने लगा त उनको मन भी होता चाय पीने का त नहीं पीते... आ उनका चाय छूटिए गया। उहे हुआ फेसबुक छोरने पर... एतना न फैसन में हो गया है कि अब न रहो फेसबुक पर त लोग कहता है कि कैसे नहीं हो? माने अइसा है जैसे.. कौनो असंभव वाला कम कर दिये. हमको स्पेसल लगता है। फेसबूक पर तो सब है ही त जे है से कि जो नहीं है उहे न स्पेसल हुआ’  :)

(पटना सीरीज)

-- 
~Abhishek Ojha~

May 14, 2015

ना(समझ) - II


खलल दिमाग का और (ना)समझ - 1 से आगे -


सबसे ज्यादा प्रेम

लेकिन 'सबसे ज्यादा प्रेम' तो किसी एक से ही हो सकता है न?
नहीं... प्रेम अनंतता है और अनंत कई होते हैं।
सच में?
हाँ ! न सिर्फ कई अनंत होते हैं पर कई तरह के भी होते हैं।
ओह !

मुझे नहीं समझ प्रेम  की तुलना कैसे करते हैं।
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सफल रिश्ता

एक समझदार व्यक्ति ने कहा -
आजीवन झेला
घुटते रहे
पर एक 'सफल' रिश्ता निभाया.

मुझे नहीं समझ आजीवन घुटन सफल कैसे कहा जा सकता है !
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राधा-कृष्ण

कृष्ण की कितनी पटरानियों के नाम जानते हो?
बच्चे ने तपाक से उत्तर दिया - एक तो राधा !
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा - नहीं !
ऐसे कैसे?

मुझे नहीं समझ - बस ऐसा ही है !
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ऑनलाइन

सोचते रहते हैं वो -
कितने बजे पोस्ट करने पर
किस एंगल से फोटो लेने पर
कितने दिनों बाद पुरानी फोटो पर कॉमेंट करने पर
किसे टैग करने पर
कितने लाइक - कितने कमेन्ट.

बना रखी है जिंदगी
हसीन ऑनलाइन - फटेहाल ऑफलाइन

मुझे नहीं समझ जिंदगी जीना ज्यादा जरूरी है या दिखाना  !
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सैलरी

एक ने कहा -
नहीं यार, बहुत कम है।
अब उनकी बात न करो जो भर पेट खाना भी नहीं खाते,
आज के जमाने में पचास हजार में मुश्किल है !

दूसरे ने कहा  -
महीने का पचास हजार !?
बहुत कम लोगों को मिल पाता होगा। नहीं?

ऐसे वार्तालाप के बाद -

मुझे नहीं समझ किसी से उसकी पगार* पूछने की जरूरत ही क्या है !

*इंक्लुडिंग-उपरवार :)
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ज्ञान

अपना सारा अनुभव निचोड़ एक ने कहा -
प्रेम और 'रुख लखि आयसु अनुसरेहू' है - दांपत्य जीवन !

दूसरे ने कहा  -
धैर्य की परीक्षा !
सिर्फ झेलना और सहना है - दांपत्य जीवन।

मुझे नहीं समझ व्यक्तिगत अनुभवों को लोग शाश्वत ज्ञान कैसे मान लेते हैं  !
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बहुमूल्य-अनमोल

दिखाओ जरा हमें भी कैसी होती है इतनी महंगी कलम।
उत्सुक संतोषी जीव ने अपने सरकंडे की कलम- मिट्टी के दवात को याद करते हुए कहा -
ई सोना चानी ना नु लिखी? इहों त क-ख-वे-ग-घ-S लिखी?' *

सात समंदर पार  -
सरकंडे की कलम देख
'वॉव ! क्लासिक ! कैसे लिखते हैं इससे?'
मैंने उनके आँखों में उत्सुक-इर्श्योल्लास देखा
जो खरीद सकते हैं कोई भी कलम !

मुझे नहीं पता किसी चीज की कीमत कैसे निर्धारित करते हैं !

*ये सोना चाँदी तो  नहीं लिखेगी न? ये भी तो क-ख-ग-घ ही लिखेगी।









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प्रेम ज्ञानी

असाधारण प्रेमी -
गढ़ते रहते हैं प्यार की परिभाषा
देते हैं प्रेम पर सुंदर व्याख्यान
ग़ालिब-फैज कंठस्थ !
उन्हें पता है क्या होता है प्रेम
कैसे करते हैं रोमांस
क्या देना होता है गिफ्ट
कैसा होता हैं - रोमांटिक माहौल ।

पर वेनिस के माहौल में बैठे भी अक्सर एक दूसरे से सीधे मुंह बात नही कर पाते।

साधारण प्रेमी -
अज्ञानी
उन्हें नहीं पता प्रेम की परिभाषा
ना याद कोई प्रेम की तारीख
प्यार-रोमांस शब्द से भी अंजान।
नहीं कहते कभी - आई लव यु.

पर उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी परिभाषा है प्रेम की - टोल्स्टोय के तीन सन्यासियों की तरह।

मुझे नहीं पता प्रेम-ज्ञानी कैसे होते हैं !
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वक़्त की  गति

वक़्त का 'पता ही नहीं चलता'
और 'बीत ही नहीं रहा'
के बीच जूझते लोगों को देख -

मुझे नहीं समझ वक़्त को किस गति से चलना चाहिए।
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संस्कार

उन्होने कहा -
हमारे तो संस्कार ही ऐसे रहे कि... पूरी आजादी।
दारू तो घर वालों के साथ भी, गाली-गलौज से भी कभी परहेज नहीं रहा ।

दूसरे ने कहा - हमारी तो आज भी हिम्मत नहीं कि...

मुझे नहीं समझ संस्कार के पहले 'कु' या 'सु' कब लगाते हैं।
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मूर्ख

आज तक
किसी मूर्ख को अपनी मूर्खता महसूस होते नहीं देखा।
शायद मैं भी किसी को वैसे ही मूर्ख लगता होऊंगा?

मुझे नहीं समझ फिर कैसे किसी को मूर्ख कह दूँ।
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उदाहरण 

उन्होने कहा -
तुम इसकी तरह नहीं,
उसकी तरह नहीं।
शर्मा जी के बेटे की तरह नहीं !*

मैंने सोचा - नए आविष्कारों और विचारकों के उदाहरण पहले से कैसे हो सकते हैं !

मुझे नहीं समझ लोग किसी में किसी और को क्यों देखना चाहते हैं !

*शर्मा जी का लौंडा
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समझ

चंद अनुभव और
हम समझ लेते हैं - "ऐसा ही होता है"
उस कुत्ते की तरह -
गाड़ी की छाँव में जिसे लगा वही गाड़ी चला रहा है।

जब हम नहीं जानते थे कि गुरुत्वाकर्षण कारण है
तब भी चीजें उसी तरीके से गिरती थी !
हम भूल जाते हैं
कि चीजों के गिरने ने हमारी समझ को जन्म दिया.
हमारी समझ उनके गिरने का कारण नहीं !

समझ ध्वस्त होती रहेगी - नए आइंस्टीनियन-ऋषि आते रहेंगे.

मुझे नहीं समझ अपनी समझ से दुनिया न चले तो खीज क्यों होती है !
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पुनश्च:

ब्लॉगिंग में और अन्यत्र भी डीस्कलेमर की बड़ी महिमा है इसलिए कहे दे रहा हूँ - "ना-तजुरबाकारी से वाइज़ की ये बाते हैं, उस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है !"

और "वादे वादे जायते तत्त्वबोध:" - रंभा-शुक संवाद 

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~Abhishek Ojha~