Jun 1, 2013

भांति भांति के … !

 
(आगे अभद्र भाषा हो सकती है...)

दृश्य १: न्यू यॉर्क में एक इनवेस्टमेंट बैंक का ऑफिस - मैं खुशी से नाचते हुए से एक इंसान को देखता हूँ। वो मुझसे कह रहे हैं कि १० साल पहले खोयी हुई उनकी घड़ी वापस मिल गयी। कुछ पल पहले ही स्विट्ज़रलैंड से घड़ी कंपनी के खोया-पाया विभाग ने उन्हें कॉल कार बताया था कि उनकी घड़ी रिपेयर के लिए आई है। कंपनी वालो के रिकॉर्ड में घड़ी चोरी हुई दर्ज कर दी गयी थी तो उनके पास आते ही पता चल गया - अनबिलीवेबल ! पर जैसे ही मुझे पता चलता है कि वो दस साल पहले बीस हजार डॉलर की घड़ी थी। मैं बस ये सोचने लगता हूँ कि दस साल पहले - बीस हजार डॉलर की घड़ी !  ("तब और अब इनकी सैलरी कितनी होगी !" आप कुछ और सोचते तो पता नहीं, मैंने तो यही सोचा था)

दृश्य २: पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक खचाखच भरी हुई बस में गर्मी से लोग परेशान से हैं... कुछ औरतें सीटों के बीच की जगह में बैठ गयी हैं। बस चलने में हो रही देरी पर कुछ नौजवान धाराप्रवाह में शरीर के कुछ विशेष अंगो का प्रयोग कर कुछ कुछ कह रहे हैं। – "&^*% हमार हौ हौ कईले बाड़े... अब सवारी आइये जायी त हमारा $%^& पर बैठइहें। आव हेईजा बईठा हम चलाव तानी" (ढीला-ढाला अनुवाद: पता नहीं क्या हौ हौ चिल्ला रहा है अब ये। और सवारी आ ही गयी तो अब क्या मेरे <शरीर का एक विशेष अंग> पर बैठाएगा। आके बैठ जा इधर मैं चलाता हूँ।) मैं एक फोन करने के लिए अपना फोन निकलता हूँ तो मेरे बगल में बैठे अधेड़ पुरुष बहुत गौर से मेरे फोन और मुझे देखने लगते हैं। फोन रखने के बाद वो मुझसे पूछते हैं कि फोन कंपनी का है या चाइना मोबाइल है? मैं कहता हूँ कि कंपनी का ही है तो... "तब त बड़ी महंगा होई, ना? " मैं बस हुंकार में उत्तर दे देता हूँ... "काताना के होई? चार हज़ार?"। मैं सोच में पड़ जाता हूँ क्या जवाब दूँ? चार गुना से भी कम कर कहता हूँ - नहीं उससे थोड़ा महंगा है नौ हज़ार का। मैं उनके चहरे पर आश्चर्य देखता हूँ - "बताव त? काइसन जुग आ गइल बा... नवो हज़ार के मोबाईल मिलता नूँ !" (बताओ तो, कैसा युग आ गया है... नौ हज़ार के मोबाईल भी होते हैं न !)

दृश्य ३: मुंबई: अब तक यही फोन रखे हो?  मुझे लगा... फलां वाला मॉडल...

दृश्य ४: मुंबई: पहले दिन ऑफिस जाने के होटल की कार का बिल रू १२४९ + टैक्स। दूसरे दिन कूल कैब – रू ३००। तीसरे दिन ऑटो - रू ५०। दूरी वही...

दृश्य ५: कानपुर: जाड़े की सुबह लगभग ५ बजे। रिक्शे वाले ने कहा एक सवारी ८ रुपया दो सवारी ५-५ रुपया। मेरे सामने ही एक व्यक्ति ये कहते हुए चले गए - "४ रुपया लगता है। ले चलोगे तो बोलो नहीं तो मैं पैदल ही चला जाऊंगा"। और वो एक रुपये के लिए पैदल चले गए। 
--
This part is intentionally left blank. (कभी समझ नहीं आया कि कुछ किताबों में ऐसे लिखे कुछ खाली पन्ने क्यों होते हैं ! पर आज लिखते हुए कुछ बातें ना लिख ऐसे ही खाली छोड़ देने का मन कर रहा है।)
--
दृश्य ६: "तू मुंबई आ रहा है? मैं उस वीक आईटीसी मराठा में रहूँगा.... पर वहाँ से तो बहुत दूर है तेरा होटल। एक काम कर अपने दिल्ली-मुंबई के फ्लाइट डिटेल्स भेज दे... सेम फ्लाइट में मैं भी चलूँगा वो बैटर रहेगा !" वक़्त और दूरी का हिसाब और कीमत... इस स्टेटमेंट में कई बातें दिखती हैं...

दृश्य ७: ऐसे दोस्तों के साथ हूँ जो साबित कर देते हैं कि साथ पढे सभी दोस्तों में सबसे खराब वित्तीय हालत उसकी है जो.... भारत सरकार में क्लास वन ईमानदार ऑफिसर है। अपने अपने पैमाने हैं - कौन राजा कौन फकीर !

दृश्य ८: वाराणसी जंक्शन: एक पिता पुत्र का वार्तालाप सुन रहा हूँ, जो रात को इसलिए आ गए थे क्योंकि सुबह जल्दी काम था। रात स्टेशन पर बिताई, खाने के लिए सत्तू घर से लेकर आए थे और अब काम निपटा कर वापस जाने वाली पैसेंजर का इंतज़ार कर रहे थे। पुत्र एक कोल्डड्रिंक की प्लास्टिक वाली बोतल ले आया था तो पिता ने उससे कहा - जा दुकानदार से दो प्लास्टिक के ग्लास मांग कर ले आ। बेटा वापस आया - "नहीं दे रहा, पैसे मांग रहा है - दो रुपये"। बाप ने झिड़क कर  - "जा मांग के ले आ... चालीस रुपया लिया है दो ग्लास भी नहीं देगा।" बेटा जाना नहीं चाहता... बाप को लगता है कि ये किसी काम का नहीं ... एक हम थे ! फिलहाल मुझे याद आ रहा था... कुछ दिनों पहले ही मेरे साथ किसी ने कहा था - "पैसे ले लो लेकिन कोल्ड ड्रिंक सोडा नहीं चाहिए... बस ग्लास दे देना"।

दृश्य ९: मेरे एक दोस्त अंततः उस रैस्टौरेंट में डिनर कर ही आए.... दारू नहीं पीते तो बस दो लोगों के खाने का टिप और टैक्स मिलाकर ४८० डॉलर। मैंने कहा मैं तो कभी नहीं जा पाऊंगा... कोई और पे ना करे तो... हाँ, अगर कोई 'वैसी' कंपनी हो <एक कंपनी विशेष की खास मॉडलस और कुछ होलीवूड की हीरोइन के नाम> तो सोचा जा सकता है जीवन में एक बार। ... उन्होने बताया फिर ये जगह 'चीप' हो जाएगी !

.... खैर... रोने धोने की बात नहीं है। हमारे एक बहुत सीनियर कलीग कहते हैं [वो अङ्ग्रेज़ी में कहते हैं :) तो आप वैसे सोचिएगा जैसे टीवी ब्रांड्स वाले डबिंग करके दिखाते हैं]- एक जमाना था जब मेरे अकाउंट में तेरह डॉलर थे, मेरी एक सप्ताह की बेटी थी और उतने में मुझे पूरे सप्ताह का खर्चा निकालना था। तब मुझे अपने अकाउंट में बैलेंस चेक करने की हिम्मत नहीं होती थी। बैलेंस मैं अब फिर नहीं चेक करता पर.. दोनों में बहुत अंतर है! ] - वो ये भी कहते हैं कि - "मुझे इस देश ने मौका दिया दान नहीं ! दान दिया होता तो शायद मैं किसी काम का नहीं बचता।" बाई द वे... ये वही घड़ी वाले भाई साहब हैं !

चलते-चलते ... वो जो बस में भाई साहब मिले थे  उन्होने दो बातें बताई थी मुझे एक तो ये कि आजकल स्कूल और ईंट भटठे की खेती बहुत हो रही है उत्तर परदेश में। पहले धनी लोग बड़े किसान होते थे अब वो यही दो काम करते हैं। और स्कूल का तो ऐसा है कि घर से दूर और फीस ज्यादा हो तो वो स्कूल उतना ही अच्छा लगता है। तो लड़के आजकल जिले के एक छोर से दूसरे छोर पर पढ़ने जाते हैं - इधर वाले उधर और उधर वाले इधर। लेकिन पढ़ाई सब स्कूल में एक्के है।

और दूसरी बात ये कि... लड़के स्कूल में आजकल टाई तो लगाते हैं लेकिन जब थोड़े बड़े हो जाते हैं तो ऊपर से गमछा भी लेते हैं... और वैसे इसमें कोई हर्जा भी नहीं है  :)

PS: सच बातें हैं... बस 'मैं' की जगह कोई और हो सकता है कुछ दृश्यों में :)
--
~Abhishek Ojha~

May 22, 2013

हम दुबेजी बोल रहे हैं !

 

"हैलो सर ! हम मेरु कैब से दुबेजी बोल रहे हैं" जिस सम्मान और गर्व के साथ दुबेजी ने अपना नाम लिया मन किया कहूँ - "दुबे जी प्रणाम !"

नाटे कद के काली-सफ़ेद दाढ़ी और लंबे बाल वाले दुबेजी  "हरी ॐ" और "शिव-शिव" करते हुए 12.30 की जगह एक बजे पहुँचे।

"बताइये न मीटर ऑन करना भी भूल गया ! घोडा घास की दोस्ती हो गयी ये तो" थोड़ी देर बाद दुबेजी ने मीटर ऑन करते हुए कहा।

"कुछ बोल नहीं पायी आज ये... इसका ताम-झाम थोड़ा गड़बड़ हो गया है नहीं तो बड़ा बढ़िया बेलकम करती है। अपना मेरु कंपनी का बड़ाई करती है अच्छे से।" - दुबेजी ने मीटर की ओर इशारा किया।  "कल इसको ठीक कराना पड़ेगा। हैंग हो गया है... पैसा जोड़ देगी लेकिन रसीद नहीं निकलेगा। लेकिन आपको चाहिए तो आप कस्टमर केयर पर फोन कर दीजिएगा ईमेल में आ जा जाता है आजकल। आपको कोई असुविधा नहीं हो तो पहले ही बता दिया हमने"।

"कोई बात नहीं चलिये"

"इतनी रात को आप क्यूँ चले? कोई रास्ता पूछने के लिए भी नहीं मिल रहा था मुझे। 12 के पहले निकल लेते तो नाईट चार्ज भी बच जाता आपका। किस रास्ते से ले चलें ?"

"रास्ता आप देख लीजिये। मुझे आइडिया नहीं है... जिधर से कम समय लगे ले चलिये। नाईट चार्ज का क्या करें... आने का प्लान तो जल्दी ही था लेकिन लेट हो गया। बात करते करते पता ही नहीं चला"

"हो जाता है..." उसके बाद दुबेजी भजन गाने लगे... "मेरा आपकी दया से... "

"आप अपनी गाड़ी में बाजा लगवा लीजिये" मैंने कहा।

"बाजा के लिए कंपनी का मनाही है। पहले बाजा होता था। लेकिन बहुत कस्टमर कम्पलेन करने लगा कि एक्सिडेंट हो जाता है। सही बात भी है कुछ ड्राइवर जोश वाला होता है... खासकर बीस से तीस एज का नौजवान का जो है गरम खून होता है। उसमें भी कोई वैसा सवारी लड़की जनाना हो तो... अच्छा फैसला है कंपनी का"

जौनपुर के दुबेजी मेरु के पहले मुंबई में पीली-काली पद्मिनी टैक्सी चलाते थे। उन्होने गाड़ी रोक चाय का निमंत्रण दिया और  हम चाय पीने चले गए। वहाँ कुछ लोग बात कर रहे थे कट्टरपंथी लोगों की तो दुबेजी ने कहा - "देखिये ऐसा है कि नशा ऐसा कि... जैसे इश्क़ में सिनेमा दिखाओ चाहे भजन एक ही बात दिखता है वैसे ही कट्टरपंथी को भी बस अपना बात ही दिखता है। और बेवकूफ ऐसा कि सब्जी लेने भी जाये और मोल भाव में कहे कि 10 रुपये नहीं आठ रुपये। और सब्जीवाला अगर कह दे कि नहीं साहब 5 रुपये में ले जाओ तो भी वो कहेगा कि नहीं मुझे आठ रुपये में ही चाहिए !"

चाय पर ही उन्हें पता चला कि मैं बैंक में काम करता हूँ। तो उन्होने पूछा कि - "केशियर हैं कि कलर्क?"

मैंने बताया कि कुछ इनवेस्टमेंट से जुड़ा काम होता है। पहले उन्हें थोड़ी सहानुभूति हुई कि "प्राइवेट" नौकरी है पर फिर उन्होने मामला संभाला - "सर हम बताएं? इनवेस्टमेंट तो बस समय, जगह और भाग्य का खेल है... मेरे हिसाब से सही समय पर सही जगह प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट कर दीजिये भाग्य चल गया तो... इससे अच्छा कुछ नहीं है। बाकी आप लोग अब जो करते हों।" उन्होने एक लाइन में मेरी नौकरी का कच्चा चिट्ठा खोल दिया और असहमति का सवाल ही नहीं था !

"वैसे एक बात बताएं सर? एक नंबर पर जो है वो बैंक का ही नौकरी होता है। वो क्या है कि... पैसा मिले न मिले दिन भर रहना तो पैसे के बीच में ही होता है। अब कोई नौकरी तो पैसे के लिए ही करता है न? संतोष हो जाता है पैसा देख देख के। और दो नंबर पर जो है वो है मास्टर। कोई कितना भी बड़ा जज-कलक्टर बन जाये अपने शिक्षक के सामने तो सर झुकाएगा ही। है कि नहीं?  और तीन नंबर पर जो है...  तीन नंबर... देखिये न... जबान से ही उतर गया... तीन नंबर ? क्या था?..." अंत तक तीन नंबर जबान पर आ ही नहीं पाया दुबेजी के।

इस बीच दुबे जी ने कहा - "जा! देखिये न ध्यान ही नहीं रहा और रास्ता लग रहा है गलत ले लिया मैंने" दुबेजी ने गाड़ी वापस ले ली और हम वापस चाय की दुकान पर आ गए। "ऑटो वाले को पता होगा रुकिए पूछते हैं"। उन्होने कहा तो मैं सोच रहा था कि रास्ता तो टैक्सी वाले को भी पता होना चाहिए पर कुछ कहा नहीं... मीटर देखा और मन ही मन सोचा कि दुबेजी ने कम से कम सौ रुपये मीटर तो बढ़ा ही दिया रास्ते के चक्कर में।

"एलएनटी तो यही है देखिये न आपका होटल यहीं कहीं होगा। गया कहाँ?" इस बार रास्ता सही था और होटल वहीं था जहां उसे होना चाहिए। "यहाँ आपके कंपनी ने रखा है?" मैंने कहा हाँ तो दुबेजी ने कहा - "तब बढ़िया कंपनी है।"

उतरने पर दुबेजी ने कहा "सर आप उतना ही किराया दीजिये जितना देते हैं। बीच में गलत रास्ते का कम कर देते हैं"

मैंने कहा - "कोई बात नहीं। आपने जानबूझ कर गलत रास्ता नहीं लिया था। आपकी गाड़ी तो चली ही और मुझे पता भी नहीं कितना किराया होता है।"

दुबेजी ने 100 रुपये लौटाते हुए कहा - "आपको जल्दी थी फिर भी आपने चाय के लिए हमें समय दिया उसके लिए धन्यवाद और हम नाजायज पैसा नहीं लेते। आपसे मिलकर हमें बहुत अच्छा लगा।"

दिल्ली का एक ऑटो वाला... "पैसा क्या लेना यार मैं तो घर जा रहा था लिफ्ट समझ लो"  और मुंबई के दुबेजी... यूंही याद आ गए आज :)

--

~Abhishek Ojha~

Mar 14, 2013

स्पेशली मेड फॉर...

 

6-8 महीने पहले जोश में आकर नए जूते लिए गए - स्पेशली मेड फॉर रनिंग।

पहली बार पहना तो अच्छा सा लगा। लगा सच में दौड़ने-भागने के लिए ही बनाए गए हैं। बचपन में हमारे मुहल्ले के एक चाचा जब  नयी नवेली रिलीज हुई हीरो होंडा स्प्लेंडर पर पहली बार बैठे तो उन्होंने अपने बेटे से कहा था - "बेटा, ये वाली मोटरसाइकिल खरीद दे मेरे लिए। चलाकर ऐसा लगा मानो कम से कम पांच साल तो जवान हो ही गया मैं !" उतना तो नहीं पर वैसा ही कुछ फील हुआ। पर सर्दियों का मौसम और आलस... जूते पड़े ही रहे। कभी पहना भी तो कंक्रीट, कारपेट, ट्रेडमिल और लकड़ी के फर्श  के अलावा कहीं और रखे नहीं गए। कभी मिट्टी से संपर्क नहीं हो पाया उनका। वैसे भी न्यूयॉर्क में एक 'मिट्टी पर चलना' छोड़ दें तो सब कुछ बड़ी आसानी से मिलता है। जूतों का रंग रूप वैसे का वैसा चकाचक बना रहा !WP_20130309_002[1]

पिछले सप्ताहांत जब धुप निकली और एक मित्र भी मिल गए तो पार्क तक जाने का कार्यक्रम बन गया । रास्ता कंक्रीट का ही था। पर हुआ कुछ यूँ कि सैंडी देवी के प्रकोप से लकड़ी का एक पूल टूट गया था वो अब भी निर्माणाधीन ही है। अब हमें या तो बहुत लम्बा रास्ता लेना पड़ता या... मिट्टी, घास, पानी, कीचड़ और बर्फ वाला छोटा रास्ता। रास्ता क्या था... हमें ही बनाना था। हम कोई नवाब तो हैं नहीं तो हमने रौंद दिया।

अपना क्या है... हम तो कैसे भी रह लेते हैं  ! बचपन में बरसात के बाद कभी खेत की मेढ़ों पर चलते तो काली मिट्टी पैरों में यूँ लिपटती थी की... खैर वो फिर कभी। फिलहाल हम बहुत खुश थे लेकिन जब जूतों की तरफ देखा... मेड फॉर रनिंग ! बनाए ही गए हैं इस दिन के लिए. सब कुछ झेलने के लिए - ढेर सारे रिसर्च के बाद। जैसे क्रमिक विकास के बाद हमारे और अन्य जानवरों के शरीर प्रकृति के अनुकूल होते हैं कुछ वैसे ही।  पर बेचारों के रंग रूप और हालत देख दया आई। कोई शिकायत नहीं ...'स्पेशली मेड' तो थे ही और ऐसा भी नहीं कि टूट गए या चलने में दिक्कत हुई हो। लेकिन ऐसा लगा कि दस दिन ऐसे पहन लो या गलती से कहीं अगर पहन कर गाँव के इलाके में चले जाओ तो बैरीकूल कहते - "इ सब जूता के बस का नहीं है यहाँ झेल पाना। इ सब उहें पहनियेगा" । जब से बने चकाचक शोरूम के एसी में पड़े रहे।  बिक जाने के बाद भी शान में कुछ कमी तो हुई नहीं। पहली बार जमीन पर पड़े थे... बिकने के पहले तो खैर जूते होते हुए भी हाथो हाथ ही लिए जाते थे! खुद को भी पता नहीं रहा होगा कि पैरों में रहने के लिए बनाए गए हैं! बेचारे जूतों की क्या गलती ! किस्मत ही ऐसी पायी ...मैंने अपने मित्र से कहा - "यार, मेरे जूतों को ऐसी जमीन पर चलने की आदत नहीं है। इनकी हालत देखी नहीं जा रही मुझसे"  Smile.  ...जूते अगर मेरी सोच सुन रहे होते और बोल सकते तो पक्का गरिया देते कि साले हम तो बने ही इसी के लिए हैं... कोई और जानवर  कहे तो समझ में आता है लेकिन तुम इंसान? ! दिमाग में ये जवाब आया तो वो खुद शांत हो गया । इंसानी दिमाग है... न बोलने वाले से भी बुलवा लेता है. और पता नहीं क्या क्या ऊटपटाँग सोचता रहता है ।Smile

इंसानी दिमाग... चला गया कुछ साल पहले जब हम पुणे में रहा करते थे। कभी कभार हम कुछ झोपड़ियों में बच्चों को पढ़ाने चले जाते और कभी कोंकण के ऐसे समुद्री तटों पर जहाँ उन दिनों केवल बीएसएनएल का नेटवर्क आता था - यानी हमारे मोबाइल नहीं चलते। हमारे साथ अक्सर ड्यूड-ड्यूडनी प्रजाति के भी लोग होते - उन जूतों की तरह ही स्पेशली मेड फॉर लिविंग ऑन अर्थ ! पर रनिंग-रनिंग ते सौ गुनी... का फर्क भी होता है न। कुछ जूते मोची के यहाँ सिल पड़े होते हैं... रफ। सुना है किसी जमाने में पहनने के पहले  सरसों तेल में डूबा के रखना होता था... ऐसे भी जूते होते थे। और 'स्पेशली मेड' तो खैर देखा ही है !

हमारे साथ वाले अक्सर कहते कि - इन झोपड़ियों और गाँवों में रहना कितना सुकून भरा होता है न। कितनी अच्छी किस्मत है इन लोगों की... सब कुछ प्राकृतिक ! पोल्यूशन नहीं ...सुकून की जिंदगी... कोई झंझंट नहीं... हेवेनली ! वॉव ! ...वगैरह वगैरह। मुझे सारी बातें तो याद नहीं पर आपके पास भी इंसानी दिमाग है... आप यहाँ कुछ 'वगैरह' खुद जोड़ सकते हैं. Smile
मैं और मेरे एक बनारसी दोस्त कुछ कहते तो नहीं पर आपस में हम बात जरूर करते कि एक बार ऐसे रहना हो तो इन्हें पता चले। हमें लगता कि उन्होने वास्तविकता देखी ही कहाँ है ! उन्हें तो उन जूतों की तरह पता भी नहीं होता कि ....खैर ... खेतों में लगी फसलें न पहचानने वालों का हम मजाक उड़ाते हुए कह देते कि अरे गेंहू तो फैक्ट्री में बनता है। आप माने न माने एक दिल्ली के लड़के ने मानने से इनकार कर दिया था कि गुड (गुड़) मिल में नहीं बनता ।

वैसे हमारे और उनमें कोई फर्क तो होता नहीं था... सब साथ जाते, एक जगहों पर रहते। बनाए गए तो वो भी हैं हमारी ही तरह कहीं भी रहने को... पर उन जूतों की तरह - "झेल न पायेंगे ! " वाली बात लगती। ऐसा नहीं कि मेरे जूते झेल नहीं पाएंगे पर ... उनका रंग रूप देखा नहीं जाता :)

हम दोनों अक्सर बात करते कि हम दोनों में से किसने ज्यादा देहाती जीवन देखा और जीया है। खैर हम तो सबकी तरह यही सोचते रहे कि बाकी क्या रह पायेंगे ऐसी जगहों पर और अपना क्या है... हम तो रह ही लेंगे। एक ऐसे ही दिन कोंकण में कहीं हम गाडी के अन्दर बैठे जा रहे थे। सड़क पर एक भैंस जा रही थी तो गाडी धीरे करनी पड़ी। ... भैंस ने सर झटका और मैंने फ्रंट सीट पर बैठे बैठे अपना सिर झटक कर किनारे कर लिया। कार का सीसा बंद था। मेरे बनारसी मित्र ने तुरत कहा - "ओझा ! यही गाँव में रहे हो? ! आज पता चल गया कितना रहे हो।" Smile

बाकी इसके बाद हमने डिफेंड किया ही होगा... आप समझ ही गए... इंसानी दिमाग आप भी रखते हैं !

हम अपने को लेकर बहुत कुछ सोचते हैं... दूसरों को लेकर भी। पर दूसरों की तो छोडिये अपने बारे में भी कहाँ पता होता है कि हम क्या हैं ! वैसे जो गरीबी, झोपड़ी, गाँव वगैरह को देख... हेवेंली और वॉव ! कहते है... मैं उन्हें अब भी 'स्पेशली मेड फॉर' की श्रेणी में ही रखता हूँ - वो झेल न पायेंगे :)

--

~Abhishek Ojha~