कल एक करीबी मित्र का फ़ोन आया. हॉस्टल में हुई इस दोस्ती के मतलब ही अलग होते हैं... इसमें एक-दुसरे की हर एक बात पता होती है. उस समय वो यात्रा कर रहा था और अविलम्ब उसे एक ईमेल किसी को फॉरवर्ड करना था... ये सूचित करने के तुरंत बाद उसने अपना पासवर्ड एसेमेस किया।
यहाँ तक तो सबकुछ ठीक पर उनका पासवर्ड देखकर अचानक ही चेहरे पे मुस्कान आ गई। ये पासवर्ड स्पष्ट रूप से उस लड़की के नाम से बना था जिसे देखकर (देखकर ही क्यों उसके बारे में सुनकर भी) कभी हमारे मित्र का दिल धड़का करता था।
खैर उसके इश्क के किस्से फिर कभी... वो अक्सर कहा करता 'आज फिर से पहला प्यार हो गया !' पर ऐसा पासवर्ड रखा जाना ये तो दिखाता ही है कि उन सारे पहले प्यारों में ये थोड़ा ज्यादा पहला था . *
हाँ इसके साथ ही एक और बात साफ़ हुई... पहले जिस अधूरे प्यार की जगह किसी किताब में, किसी नोवेल में या फिर क्लास नोट्स के आखिरी पन्नों पर होती थी (दिल के किसी कोने में होने के अलावा) उसको एक नई जगह मिल गई है... और कमाल की सुरक्षित जगह है... पासवर्ड ! अभी-अभी एक और फायदा सूझा... पासवर्ड भुलाने की समस्या से मुक्ति ! कुछ भी भूल जाओ ये भूलना थोड़ा मुश्किल है... हाँ अगर आपको रोज एक नई शख्शियत से प्यार हो जाता हो तो थोड़ा मुश्किल है पर उसमें भी वरीयता तो होगी ही !
हर लम्हा तेरी याद दिल में और
तू निगाहों में होती थी,
कभी किताबों में तो
कभी उनमें भटकते-सूखते फूलों पर,
कभी हथेली पर भी तो लिखा करता था...
अब तेरे उस नाम का पासवर्ड बना रखा है !
कहीं आपने भी ऐसा पासवर्ड तो नहीं रखा है? अगर मजबूरी में किसी को बताना पड़ जाए तो आपको कोई समस्या तो नही? खैर जब आप अपना पासवर्ड ही किसी को बता सकते हैं तो उसे ये जानकारी देने में भी कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए.
* 'All animals are equal, but some animals are more equal than others.' इसी के तर्ज पर.
~Abhishek Ojha~
Oct 30, 2008
Oct 22, 2008
रोटी, दवा, दारु और चाँद !
दृश्य १:
एक ग्रामीण सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में एक बच्चा... हड्डी का ढांचा, शायद मांस उनके लिए नहीं होता. पता नहीं सो रहा है या बेहोश है. सरकारी ग्लूकोज की बोतल लगी हुई है... बाप बगल में बैठा है, देखने से तो नहीं लगता कि दो दिन से कुछ खाया होगा.
'आप इसे शाम को घर ले जाइए... ठीक हो जायेगा. मैं दवाई लिख देता हूँ. '
फिर कुछ सोच कर बोला 'आप फिलहाल इसे सुबह-शाम २-२ रोटी खिलाइए और फिर धीरे-धीरे बढ़ाना है २ से ३... ४ तक. '
'रोटी? डॉक्टर साहब कोई सस्ती दवा नहीं मिल सकती?'
भले अजीब लगे लेकिन शायद डॉक्टर को ये सुनने की आदत हो*, बोला 'दारु पीते हो?'
'हाँ साहब कभी-कभी !'
'उसी पैसे से रोटी नहीं खिला सकते?'
'रोज नहीं पीता साहब... जिस दिन पीता हूँ उस दिन तो रोटी के लिए भी बच जाता है...'
'तो उस दिन पीने के बजाय बचा के नहीं रख सकते?'
वो चुप हो गया और उसी के साथ वहां बैठे लोगों का दया-भाव जाता रहा...
दृश्य २:
उसी गाँव का एक छत, रात के १० बजे. शायद इतनी हसीन चाँदनी रात पहले नहीं देखी... शरद ऋतू, चाँद और तारे. क्या ऐसी भी रात होती है? लगा जैसे चाँद को तो भूल ही गया था ! सालों बात सप्तर्षि और फिर ध्रुव देखा... एक बारगी लगा... काश ये बिजली नहीं होती और रोज ऐसी ही रात होती... चाँद ना बढ़ता न घटता बस ऐसा ही रहता, वक़्त थम जाए जैसी बात. (शायद बहुत दिनों के बाद ऐसी रात देखकर कल्पना शक्ति जाती रही कि इससे अच्छी भी रात होती होगी और असल में तो ऐसा रोज ही होता है !)
_ _
दारु सुनते ही फेर लिया जो मुंह,
कभी सोचा क्यों पीता हूँ ?
मेरे लिए रोटी का टुकडा चाँद जैसा होता है !
पर तुम्हारे चाँद की तरह नहीं,
ये असली चाँद है !
बिजली से नहीं चलता...
और घटता-बढ़ता भी है !
_ _
*उस समाज में लोग कुछ भी करते हैं, अगले दिन अखबार में पढ़ा... लोगों ने उस डॉक्टर की पिटाई कर दी. आरोप: 'उसने एक साँप काटे हुए आदमी का इलाज ढंग से नहीं किया जिससे उसकी मृत्यु हो गई'. लोगों की हालात का वैसे ही नहीं पता जैसे उस गरीब के पीने का कारण। हाँ वो डॉक्टर अगर कर सकता तो जरूर इलाज करता। बहुत फर्क है इंडिया और भारत में... दोनों के सोच में भी. वैसे सोच को पैदा करने में हालात का बहुत बड़ा हाथ होता है.
~Abhishek Ojha~
एक ग्रामीण सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में एक बच्चा... हड्डी का ढांचा, शायद मांस उनके लिए नहीं होता. पता नहीं सो रहा है या बेहोश है. सरकारी ग्लूकोज की बोतल लगी हुई है... बाप बगल में बैठा है, देखने से तो नहीं लगता कि दो दिन से कुछ खाया होगा.
'आप इसे शाम को घर ले जाइए... ठीक हो जायेगा. मैं दवाई लिख देता हूँ. '
फिर कुछ सोच कर बोला 'आप फिलहाल इसे सुबह-शाम २-२ रोटी खिलाइए और फिर धीरे-धीरे बढ़ाना है २ से ३... ४ तक. '
'रोटी? डॉक्टर साहब कोई सस्ती दवा नहीं मिल सकती?'
भले अजीब लगे लेकिन शायद डॉक्टर को ये सुनने की आदत हो*, बोला 'दारु पीते हो?'
'हाँ साहब कभी-कभी !'
'उसी पैसे से रोटी नहीं खिला सकते?'
'रोज नहीं पीता साहब... जिस दिन पीता हूँ उस दिन तो रोटी के लिए भी बच जाता है...'
'तो उस दिन पीने के बजाय बचा के नहीं रख सकते?'
वो चुप हो गया और उसी के साथ वहां बैठे लोगों का दया-भाव जाता रहा...
दृश्य २:
उसी गाँव का एक छत, रात के १० बजे. शायद इतनी हसीन चाँदनी रात पहले नहीं देखी... शरद ऋतू, चाँद और तारे. क्या ऐसी भी रात होती है? लगा जैसे चाँद को तो भूल ही गया था ! सालों बात सप्तर्षि और फिर ध्रुव देखा... एक बारगी लगा... काश ये बिजली नहीं होती और रोज ऐसी ही रात होती... चाँद ना बढ़ता न घटता बस ऐसा ही रहता, वक़्त थम जाए जैसी बात. (शायद बहुत दिनों के बाद ऐसी रात देखकर कल्पना शक्ति जाती रही कि इससे अच्छी भी रात होती होगी और असल में तो ऐसा रोज ही होता है !)
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दारु सुनते ही फेर लिया जो मुंह,
कभी सोचा क्यों पीता हूँ ?
मेरे लिए रोटी का टुकडा चाँद जैसा होता है !
पर तुम्हारे चाँद की तरह नहीं,
ये असली चाँद है !
बिजली से नहीं चलता...
और घटता-बढ़ता भी है !
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*उस समाज में लोग कुछ भी करते हैं, अगले दिन अखबार में पढ़ा... लोगों ने उस डॉक्टर की पिटाई कर दी. आरोप: 'उसने एक साँप काटे हुए आदमी का इलाज ढंग से नहीं किया जिससे उसकी मृत्यु हो गई'. लोगों की हालात का वैसे ही नहीं पता जैसे उस गरीब के पीने का कारण। हाँ वो डॉक्टर अगर कर सकता तो जरूर इलाज करता। बहुत फर्क है इंडिया और भारत में... दोनों के सोच में भी. वैसे सोच को पैदा करने में हालात का बहुत बड़ा हाथ होता है.
~Abhishek Ojha~
Oct 14, 2008
यूँ ही... कुछ भी !
1.वो बारिश:
पत्तों से छन कर जो बूंदें
तुम्हारे गालों पर टपक पड़ी थी
आज तक मुझे भिगो रही हैं !
2.खोज:
तुम ढूंढ़ती रही...
बड़ी महफिलों में जो प्यार
वो आजकल सड़कों पर रहता है!
3.गरीबी:
मेरे कदम जो लड़खडाए भूख से,
- पी के आया है साला.
तुम जो लुढ़के नशे में,
- यारों की महफ़िल थी !
4.पलकें:
उनकी याद में जो खुली रह जाती हैं पलकें,
वो कहते हैं के खुली आंख सोने की आदत है !
5.मोबाइल:
वो मुफ्त के मिले मिनट जाया करते रहे -
हम समझ बैठे की उन्हें हमसे मुहब्बत है !
6.बॉयफ्रेंड:
उन्हें चाहिए था बाईक और ड्राईवर,
हम मुफ्त में मजनूं बने रहे !
--
यूँही २ मिनट में लिखा गया बकवास है, मुझे ख़ुद अच्छा नहीं लगा आपको क्या लगेगा, इसलिए पहले ही क्षमा मांग लेता हूँ ! पर बकवास लिखने के लिए ही तो ब्लॉग है...
पत्तों से छन कर जो बूंदें
तुम्हारे गालों पर टपक पड़ी थी
आज तक मुझे भिगो रही हैं !
2.खोज:
तुम ढूंढ़ती रही...
बड़ी महफिलों में जो प्यार
वो आजकल सड़कों पर रहता है!
3.गरीबी:
मेरे कदम जो लड़खडाए भूख से,
- पी के आया है साला.
तुम जो लुढ़के नशे में,
- यारों की महफ़िल थी !
4.पलकें:
उनकी याद में जो खुली रह जाती हैं पलकें,
वो कहते हैं के खुली आंख सोने की आदत है !
5.मोबाइल:
वो मुफ्त के मिले मिनट जाया करते रहे -
हम समझ बैठे की उन्हें हमसे मुहब्बत है !
6.बॉयफ्रेंड:
उन्हें चाहिए था बाईक और ड्राईवर,
हम मुफ्त में मजनूं बने रहे !
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यूँही २ मिनट में लिखा गया बकवास है, मुझे ख़ुद अच्छा नहीं लगा आपको क्या लगेगा, इसलिए पहले ही क्षमा मांग लेता हूँ ! पर बकवास लिखने के लिए ही तो ब्लॉग है...
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