Dec 26, 2011

टाइम, स्पेस और एक प्री-स्क्रिप्टेड शो

 

दृश्य 1: विक्रम संवत 2028, 1971 ईस्वी,  अक्षांश 26.xx देशांतर: 82.xx:

शुक्ल पक्ष की चांदनी रात के दूसरे पहर किसान पिता ने नवजात के जन्म-समय को चिन्हित करने के लिए जमीन पर एक खूंटी ठोंक दी. उज्जवल चांदनी में नीम के पेंड की छाय आँगन के बीचो-बीच से एक विभाजन रेखा बना रही थी. रात को जाने वाली ट्रेन ठीक उसी समय गुजरी थी… इस प्रकार ये समय स्टेशन मास्टर के रजिस्टर में भी दर्ज हुआ. पडोस के चंद्रभान से मांग कर लायी गयी घडी ८.५७ बजे बंद हो गयी थी… उसी समय गाँव के भोथन की भैंस ने पाड़े को भी जन्म दिया...

...रात भर... एक सरकारी सांढ... निर्विघ्न खेत चरता रहा। उसी रात पूर्वी पाकिस्तान में एक नए राष्ट्र के उदय की नींव पड़ रही थी...

पंडित ने खूंटी के निर्देशांको से जन्म-समय निर्धारित कर लाल स्याही से लिखना चालू किया... 'शतपद होढ़ा चक्रानुमतेन...' आपके लड़के के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव है। पिता को मिश्रित शगुन दिख रहे थे। थोड़े चिंतित हुए तो पंडित ने कहा - 'बड़ी घाटियाँ पर्वतों के साथ ही होती हैं, मैदान नहीं है इसकी जिंदगी...'। नाम - विजय। 

दृश्य 2: विक्रम संवत 2029, 1972 ईस्वी, अक्षांश 19.xx देशांतर:72.xx:

वैज्ञानिक पिता के घर पुत्री हुई। 'बर्थ सर्टिफिकेट' पर टाइपराइटर ने अंकित किया 10.47 पीएम। मुंबई से लंदन जाने वाले विमान के उड़ने की तेज आवाज हॉस्पिटल के गलियारों में सुनाई दी थी। अगले दिन बधाई संदेश आए और फूलों के बुके। उस समय भी पुत्री जन्म पर 'शोक-नहीं' करने वाले लोग थे। नाम – ऋचा।

...भारत पाकिस्तान शिमला समझौते पर हस्ताक्षर की तैयारी में थे।

दृश्य 3:विक्रम संवत: 2064, 2007 ईस्वी, अक्षांश: 26.xx  देशांतर:80.xx:

कैंपस प्लेसमेंट का पहला दिन... विजय रात के 11 बजे एक छात्रों के समूह को समझा रहे थे कि उनकी कंपनी क्यों अच्छी है। एक घंटे बाद ऋचा भी एक अलग समूह को। तब दोनों के नाम के आगे डायरेक्टर लगता था।  बस सात छात्र ऐसे थे जिन्होने दोनों को सुना। एक प्रभावशाली लेकिन घिसा हुआ दूसरी स्मूद... इंप्रेसिव। एक उसी कॉलेज का सीनियर, गालियों में खुल कर बात करने वाला.... दूसरी ऑक्सफोर्ड ग्रेजुएट। 'सालों ऐश करोगे' और 'यू काँट बी ए फिल्मस्टार ऑर अ फुटबॉलर नाऊ… बट यू स्टिल कैन मेक मनी लाइक दे डू…' ...दोनों के झूठ बोलने का अपना तरीका था और दोनों अपनी छाप छोड़ गए।  

दृश्य 4: विक्रम संवत:2067, 2010 ईस्वी, अक्षांश: 40.xx देशांतर:-73.xx:

ऋचा, विजय और उन दोनों को सुनने वाला एक छात्र - अमृत... एक इयरएंड पार्टी। तीनों अलग-अलग कंपनियों और दुनिया के विभिन्न कोनों में भटकने के बाद... अब एक ही जगह काम करते हैं। ऋचा की पहले वाली कंपनी 2008 में डूब गयी... विजय का ग्रुप 2009 में। अमृत ने उस तीसरी कंपनी में नौकरी की थी जिसमें वो आज सभी हैं। चर्चा चली... तो विजय ने कहा:

'तुम दोनों को नहीं लगता... ये सब कुछ बस इसीलिए हुआ कि हम आज यहाँ बैठ के ये बातें करें? मुझे तो ये भी लगता है कि मेरे पिता ने जो खूंटी गाड़ी थी उसका भी असर है... जो भी मैं आज हूँ ! जो घड़ी बंद हुई थी - उसका भी। और ये जो बड़ी-बड़ी कंपनियाँ डूब गयी... लड़ाइयाँ हुई... सब कहीं न कहीं इसलिए हुई कि उन्हें मेरे जीवन पर असर डालना था... यहीं वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में 47वें फ़्लोर पर मेरा ऑफिस था कभी ! सोचना कभी.. दुनिया बहुत छोटी है... एक मिस्टीरियस रियालिटि शो है... जिसका सबकुछ प्री-स्क्रिप्टेड है... ये मेरे हाथ में गिलास... और मैं इसे छोड़ रहा हूँ...ये सब कुछ। बस हमें वो स्क्रिप्ट नहीं पता... हमें रोल मिला है... जो रोल मिला बस ऐसी एक्टिंग करो कि... साला जो करना है उसमें डूब जाओ... स्क्रिप्ट लिखने वाला तुमसे बस यही चाहता है... एक जमाना था जब मैं कुछ करने के लिए मर जाने को तैयार था। वो नहीं हुआ और आज मुझे पता है कि उससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता था मेरे साथ। जितना हुआ, ...बुरा भी हुआ तो उसके होने के पीछे कारण था...  तुम्हें पता है जिस पाड़े ने मेरे साथ जन्म लिया था... उसी रात वाली ट्रेन के नीचे आ गया... और उसी रात जिस रात मैं उसी ट्रेन को पकड़ कर पहली बार कॉलेज गया। और मेरे जन्म के रात अगर %^&* सांढ ने खेत नहीं चरा होता तो एक क्विंटल अनाज ज्यादा हुआ होता... और.... '

...ऋचा उठ कर चली गयी... अमृत सुनता रहा। पीने के बाद लोग कमाल की बातें करते हैं।

~Abhishek Ojha~

आप सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ। नववर्ष और 'समय' पर भर्तृहरि को पढ़ें: :)

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः, तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।
 

(हमने सांसारिक भोगों को नहीं भोगा बल्कि भोगों ने ही हमें भोग डाला। हमने तपस्या नहीं की बल्कि तापों ने ही हमे तपा डाला । समय नहीं बीता, बल्कि हम ही बीत गए । तृष्णा बूढ़ी नहीं हुई, बल्कि हम ही बूढ़े हो गए) !

Dec 14, 2011

फॉर ईच इन्फाइनाइटेसिमल मूमेंट ऑफ माइ एक्ज़िसटेंस !

 
(एक पत्र जो कभी भेजा नहीं गया...)
 

नोट:- अगर आप यहाँ तक आ गए हैं और इससे आगे पढ़ने जा रहे हैं तो: बीच में सिर्फ इसलिए ना छोड़ें कि इसमें गणित है। असली बात 'सत्य' है वो गणित का मोहताज नहीं !  गणित के अलावा बीच में छोड़ने का बाकी और कोई कारण हो तो कोई बात नहीं - खुशी से जाएँ :)


सोच रहा हूँ कहाँ से शुरू करूँ। मैंने कभी सोचा नहीं तुम्हें चिट्ठी लिखुंगा। लेकिन आजकल कुछ अजीब सा हो रहा है मेरे साथ। तुमने स्टॉकहोम सिंड्रोम का नाम सुना है? ये ऐसा पैराडॉक्स है जिसमें बंधक व्यक्ति अपने बंदीकर्ता से सहानुभूति करने लगता है... कुछ वैसी ही हालत है मेरी। तुमने मुझे एक तरह से गुलाम ही तो बना रखा है और मैं हूँ कि तुम्हारे लिए पागल हुआ जा रहा हूँ तो शायद ये स्टॉकहोम सिंड्रोम की ही चरमावस्था है !
 
मुझे हमेशा लगा कि अगर ये प्यार है तो तुम मेरा मौन समझ लोगी ! आज तक यही सोचता रहा... मेरी ये सोच तो तुम्हें तुम्हें पता ही है कि सत्य को कह देने से वो सत्य भले रहे, परम तत्व सा खूबसूरत नहीं रह जाता। और फिर मैं कैसे कह सकता हूँ कि तुमसे कितना प्यार करता  हूँ? अनंत को परिभाषित कर पाया है कोई?  सत्य और सुंदर को क्या शब्दों में कहा जा सकता है? फूल की खुशबू को भला क्या शब्दों में उलझा कर समझाया जा सकता है?  मुझे तो वैसे भी लगता है कि जब हम कुछ नहीं कहते हैं तो सबसे अच्छे तरीके से व्यक्त होता है। और अगर तुम्हें याद हो तो मैंने तुम्हें कहा भी था कि तुम्हारी खूबसूरती को शब्द और उपमा देकर मैं उसकी सीमा निर्धारित नहीं करना चाहता... फिर अचानक प्लूटो का कहा याद आया कि दोस्तों में सब कुछ कॉमन होता है। और अगर ये सच है तो तुम भी शायद मौन होकर मेरी ही तरह मेरे समझ जाने का इंतज़ार कर रही हो? अब इस मौन-पैराडॉक्स के डेडलॉक का कोई हल तो है नहीं... तो सोचा आज तुम्हें लिख ही डालूँ कि मैं तुम्हारे बारे में क्या सोचता हूँ।... हर समय... समय के हर उस छोटे से छोटे लमहें में...फॉर ईच इन्फाइनाइटेसिमल मूमेंट ऑफ माइ एक्ज़िसटेंस !  
 
पहली बात जो मैंने इन समय के अत्यंत सूक्ष्म लमहों से सीखा है वो ये कि इस समय के बदलने की गति अचर (कोंस्टेंट) नहीं है... समय कैसे गुजरता है? जब तुम साथ होने सी होती हो- भले ही सात समुंदर पार और जब नहीं होती तब - मैं समय के गुजरने के दर में परिवर्तन महसूस कर सकता हूँ...। तुम्हारा एक मैसेज... केवल दिल की धड़कन नहीं समय के बीतने की दर को भी बढ़ा देता है। ऐसा नहीं कि तुम्हारा पास नहीं होना इसे बोझिल बनाता है... मुझे तो लगता है कि हमारा एक दूसरे से दूर होना हमारे रिश्ते को पूर्णता देने में पोजिटिवली स्क्युड़ डिस्ट्रीब्यूशन की तरह काम कर रहा है।

पहले तो मैं तुम्हें लेकर उलझा हुआ था... लेकिन जैसे-जैसे मैं अपनी सोच को तुम्हारे साथ बिताए गए समय के अत्यंत छोटे स्वेच्छित यादगार क्षणों (आर्बिट्रेरी स्माल मोमेंट्स) पर ले गया तो मेरी सारी सोच ही तुम पर कनवर्ज़ हो गयी। और फिर मुझे लगा कि ये नेसेसरी नहीं तो साफिसिएंट कंडीशन तो है ही कि मुझे तुमसे प्यार है। मेरा मन आजकल कुछ-कुछ स्वचालित और अनियंत्रित गति में है। अब मुझे नहीं पता मुझे क्या करना चाहिए। मैं उसे रोक नहीं सकता... अगर उसे उसके रास्ते से मोड़ना चाहूँ तो और बहकने का ड़र है... अगर उसे रोटेशनल ट्विस्ट मिल गया तो उसकी गति की मोडलिंग कर पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। वो तो पहले से ही अनियंत्रित और स्वचालित अवस्था में है !

अच्छा तुमने कभी केओस थियरि का नाम सुना है? उसमें एक छोटा सा परिवर्तन कहीं बहुत बड़ा तूफान तक ला देता है। जैसे एक तितली के पंखों की सिहरन दुनिया के किसी कोने में बवंडर ला देती है। वैसे ही तुम्हारी एक अदा की एक तस्वीर जो दिमाग में बैठ गयी है, उसने मेरे अंदर, कहीं किसी कोने में सुनामी ला दिया है। 
 
मेरे सोचने का जो सीक्वेंस है उसका लिमिट अद्वितीय तरीके से तुम ही हो। हर छोटे लमहें के बाद मेरी सोच तुम पर ही पहुँच जाती है... क्या इससे प्रूफ नहीं होता कि मेरे सोच की सीक्वेंस कनवरजेंट हैं और वो तुम पर कनवर्ज़ करती है? शायद कैलकुलस के इस बेसिक थियोरम को ही दुनिया वाले प्यार कहते हैं ! 

मैं सोच रहा हूँ कि मुझे आखिर हुआ क्या है? ! मुझे लगता है कि तुम्हें सोचते ही मेरे दिमाग के फील्ड में बिलकुल सही मात्रा में रेजोनेन्स एनर्जी, फील्ड तीव्रता और शायद प्रोटोन्स का अलाइनमेंट हो जाता है और फिर स्पेक्ट्रल शिफ्ट से जो तुम्हारी इमेज बनती है - वो ऐसी तुम होती हो जो हर कोण से अच्छी लगती हो। - परफेक्ट तुम ! तुम्हारी छोटी से छोटी बात और साधारण सी साधारण तस्वीरों को मिलाकर दिमाग ने एक नयी 'तुम' का सृजन कर डाला है। अब मैं जो भी सोचता हूँ उसी 'तुम' के इर्द-गिर्द। वैसे ही जैसे इंसान सैकड़ों तस्वीरों में से एक निकाल कर अपनी प्रोफ़ाइल में लगा देता है। दिल ने तुम्हारी उस मल्टी-डाइमेशनल तस्वीर को एक कोने में कैद कर लिया है और अब उसे दिमाग को कुछ इस तरीके से प्रोजेक्ट करता है कि दिमाग कुछ भी और नहीं कर पा रहा !  तुम दूर हो तो स्वाभाविक है कि उसे तुम्हारी नयी अदाएं नहीं मिलती... न्वाइज़ टू सिग्नल रेशियो बहुत कम है तो तस्वीर और साफ बन गयी है ! 

मैं तो ये भी नहीं बता सकता कि मेरे लिए ये बता पाना कितना कठिन है कि मैं तुम्हें कितना मिस करता हूँ। काश! इसे क्वांटिफ़ाई कर पाना संभव होता।  संसार में कितना कुछ है जो हमें नहीं पता, हमारे बस में नहीं... लेकिन मुझे उन अनियंत्रित, अनजान और अज्ञात चीजों पर बहुत भरोसा है। मुझे हमेशा ही केओस और रैंडमनेस में एक पैटर्न मिला है। और अपने इस केओटिक स्टेट ऑफ माइंड से भी, तुम मिलोगी इसकी उम्मीद जाग गयी है।

मुझे ठीक-ठीक याद नहीं मुझे तुमसे प्यार कैसे हो गया। लेकिन मैं समय में वापस जाऊँ तो... कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद सब कुछ बदल गया। प्वाइंट ऑफ इंफ़्लेक्सन? ...नहीं - सिंगुलारिटी। तुम्हें पता है सिंगुलारिटी का मतलब होता है वो बिन्दु या क्षेत्र जहां पर फंक्शन फट जाता है... अब मुझे फट जाना शब्द ही सूझ रहा है! अर्थात् गणित जवाब दे जाता है समीकरणों का कुछ अर्थपूर्ण मतलब नहीं रह जाता। जहां इंसान के बनाए गणितीय मॉडल अर्थपूर्ण परिणाम देने में नाकामयाब हो जाते हैं। सारे नियम कानून फेल ! या तो नियम बदलने पड़ते हैं या फिर जैसा है उसे वैसा ही बिन ज्यादा दिमाग लगाए मान लो। ऐसे सिद्धान्त जिन्हें सोचकर दिमाग का कोई कोना खिल उठता  है, लेकिन ये समझ में नहीं आता कि ये कैसे संभव है? या फिर इसका अर्थ क्या है? ! हम बस इतना समझ पाते हैं कि उस क्षण के पहले कुछ नहीं था लेकिन उसके बाद 'कुछ तो' था... उस क्षण क्या हुआ - ये हम नहीं समझ पाते। जैसे बिग बैंग - जिसने अरबों-खरबों तारों और ग्रहों वाले एक अनंत तक विस्तृत निरंतर फैलते ब्रह्मांड को जन्म दिया। वो क्या था? कैसे था? क्यों था? हम नहीं जानते। वैसे ही कुछ मेरा दिल शून्य से विभाजित सा हो गया है। इसका क्या अर्थ है मैं भी नहीं जानता !  और अब अगर तुम कहो... या मैं चाहूँ भी तो क्या उस सिंगुलारिटी के पहले की अवस्था में वापस जा सकता हूँ? तुम्हें लगता है इस ब्रह्मांड को एक अत्यंत सूक्ष्म, अनंत द्रव्य वाले बिन्दु में समेटा जा सकता है? अब तो जो होना था हो गया ! नो पॉइंट ऑफ रिटर्न से बहुत आगे निकल चुका हूँ।

मुझे हेनरी प्व्याइनकेयर का कहा याद रहा है: "कोई वैज्ञानिक प्रकृति को इसलिए नहीं पढ़ता कि ये उपयोगी है, वो पढ़ता है क्योंकि उसे इसमें आनंद मिलता है क्योंकि ये खूबसूरत है...अगर प्रकृति खूबसूरत नहीं होती तो इसे जानने का इतना महत्त्व नहीं होता... जीवन जीने का महत्त्व नहीं होता।" - मुझे लगता है कि हेनरी ने ये अपने महबूब के लिए लिखा होगा। हम जो भी दिल से करते हैं वो इसलिए नहीं करते कि उससे कोई फायदा होगा... बल्कि इसलिए कि हमें वो करने में आनंद और आत्म संतुष्टि मिलती है। या फिर हम बस इसलिए करते हैं क्योंकि हम करते हैं ! कोई कारण नहीं. तुमने गणितज्ञ जी एच हार्डी का नाम सुना होगा। उन्होने कहा था कि उन्होने कुछ भी ऐसा नहीं किया है जिसका कोई उपयोग हो। वो उपयोग में ले जाने वाले गणित को निम्न कोटी का और घटिया मानते थे... मेरा प्यार ऐसा ही है... बस प्यार ! कोई उद्देश्य नहीं है उसका। वो बस प्यार है... शुद्ध... और कुछ नहीं ! वो कैसा होता है ?  ये शब्द नहीं बता सकते! वो एनलाइटमेंट की तरह है... जब तक तुम खुद नहीं करती... नहीं समझ सकती ! कोई नहीं समझा सकता। तुलसी बाबा ने भी कहा है न 'तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा, जानत प्रिया एकु मनु मोरा'।  मेरा प्यार अगर कॉम्प्लेक्स है... तो इसमें इमाजीनरी पार्ट ज्यादा है ! अगर फंक्शन है तो अनबाउंडेड इंक्रीजिंग... सेट है तो जूलिया सेट से ज्यादा खूबसूरत।

अगर खूबसूरती का प्लॉट बनाऊँ तो तुम आउटलायर हो...किसी ग्राफ में तुम नहीं आ सकती। फिर ऐसा है कि 'खूबसूरत' शब्द तुम्हें पाकर धन्य है! गणित खूबसूरत जैसे शब्दों को अनडिफ़ाइंड कहता है... मैं कहता हूँ तुम मेरे लिए सुंदरता की परिभाषा हो !  मेरे लिए अगर ब्रह्मांड में ओयलर की आइडेंटिटी से ज्यादा खूबसूरत कुछ है तो वो बस तुम ही हो। सौंदर्यनुपात फिबोनाकी से क्या परिभाषित होगा? अगर तुम उस अनुपात में नहीं हो तो प्रकृति के अनुपातों को वैसे ही फिर से परिभाषित होना पड़ेगा जैसे क्वान्टम फिजिक्स से क्लासिकल।

मुझे एक ही ड़र है कि हम कहीं समांतर रेखाओं की तरह कभी मिले ही नहीं ! या फिर एसीम्प्टोट की तरह हम अनंत तक करीब आते रहें और हमारी आपसी दूरी अनंत पर जाकर ही खत्म हो ! ओह ! बड़ी भयावह वक्रता है ! मैं इसे नहीं सोच सकता।  पर मुझे पता है कि हमारे प्यार का फंक्शन कनवर्ज़ करेगा जरूर।  तुम मेरे जीवन रूपी कॉम्प्लेक्स ओप्टिमाईजेशन प्रॉबलम का सोल्युशन सेट हो। फिलहाल इंकम्पलिटनेस थियोरम की तरह जिंदगी है। उस जिगसा पज़ल की तरह जिसका एक टुकड़ा खो गया है। कैसे भी सुलझाऊँ बिन उस टुकड़े के अधूरा ही रहेगा। तुम्हें पता है वो टुकड़ा क्या है? - तुम हो वो टुकड़ा ! मुझे कभी-कभी तुम्हारे दिमाग के ब्राउनियन मोशन से ड़र लगता है। कितना भी समझने की कोशिश करूँ वो रहता एन-डाइमेन्श्नल ब्राउनियन मोशन में ही है। और फिर तुम्हारा व्यवहार मार्टिंगेल की तरह... पहले का कोई अनुभव उसका पूर्वानुमान लगाने में काम नहीं आता... तुम्हारा मार्कोव चेन सा व्यवहार जिसमें आगे क्या करोगी वो हमेशा तुम्हारे उसी समय के मूड पर निर्भर करता है। पसंद तो मुझे तुम्हारी हर बात है लेकिन ड़र लगता है कभी-कभी।
वैसे मैं इन सब को मॉडल कर लूँगा ! असली डर तो तुम्हारे बाउंड्री कंडीशंस से है। मुझे पता है कि अपने रिश्ते के समीकरणों का क्लोज फॉर्म सोल्युशन मिलना मुश्किल है लेकिन तुम बस हाँ कह दो और फिर देखो ये क्या कोई नेवियर स्टॉक्स या रिमान हाइपोथेसिस है जो मैं हल ना कर पाऊँगा!

द बॉटम लाइन इज आई लव यू ऐंड ओन्ली यू... ऐंड देयर इज आल्सो नेसेसरी ऐंड सफिसिएंट कंडीशन फॉर यू टू लव मी।

बस हाँ कह दो...मैं चाहता हूँ कि मैं धरती का पहला इंसान बनूँ जो ऐसी वैसी नहीं बल्कि बोरोमियन रिंग पहनाए और पंडित से कहे कि वो थ्री-ट्विस्ट-नॉट ही बनाए :)

तुम्हारा,
वही जिसे तुम कभी-कभी पागल कह दिया करती हो... शायद प्यार से !
--

~Abhishek Ojha~

PS:
1. नहीं सर, उस स्टेज तक जब कि प्यार हो (आग दोनों ओर लगी हुई) और इस तरह का इजहार हो, कर्व्स एनलिसिस मायने नहीं रखती। सब कुछ बस यूँ ही हो चुका होता है। मेरा मतलब देह का देह से मिलन भी और वह इम्प्योर नहीं होता। - आचार्य गिरिजेशहार्डी वाज डैम राइट !
2. प्योर मैथेमेटिक्स के पेपर में कभी ट्रेजडी ये नहीं होती कि सवाल हल नहीं  हो पाता... बल्कि ये होती है कि जो दो चार हल कर पाये वो रफ वाले पन्ने में लेकर एकजाम हाल से वापस आ गए। ट्रेजडी ये नहीं है कि मैं तुम्हें चिट्ठी नहीं लिख पाता बल्कि ये है कि लिख कर भी भेज नहीं पा रहा !
3. मैंने बैरीकूल को पटना फोन लगाया कि एक लभ-लेटर लिख रहा हूँ। तो बोला: 'आप तो मते लिखिए भैया। आपके बस का नहीं है। आप जो लिखेंगे उ बरा रिक्सी लग रहा है हमको'। मैंने कहा - 'भाई बिना रिक्स के कहाँ रिटर्न है ! और सारे इनवेस्टमेंट तो रिस्क देख के ही करते हैं। एक बिना रिटर्न एक्स्पेक्ट किए भी कर देते हैं। जो सच्ची बात है कह देते हैं।'
 
'ये बात है तो  लिख डालिए भैया। जो होग देखा जाएगा' :)

4. दुबारा नहीं पढ़ा है...गलतियाँ होंगी। धन्यवाद पाने के लिए ध्यान दिलाएँ :)
5. आपको क्या लगता है अगर इसे दुनिया कि सबसे खूबसूरत लड़की को भेजा जाय तो क्या कहेगी?

Nov 20, 2011

माल में माल ही माल (पटना ९)

 

बीरेंदर भईया उर्फ 'बैरीकूल' से पहली बार चाय की दुकान पर मिलना हुआ था। मुझे अक्सर ऐसा लगता कि वो मुझसे बात करने की कोशिश कर रहा है लेकिन बात हो नहीं पाती थी। बीरेंदर की अपनी पर्सनलिटी है... ऐसी पर्सनलिटी जिसे देखकर लगता है कि एक जिंदगी तो हमने जी ही नहीं ! दाहिने हाथ की कलाई पर तकरीबन साढ़े तीन इंच चौड़ाई में बंधा लाल-पीला धागा और उसके ऊपर एक अष्टधातु का कड़ा, ट्रिम की हुई दाढ़ी, सिर के बीचों-बीच से निकली हुई मांग वाला हेयर स्टाइल, टाइट हाफ शर्ट, फ़ेडेड जींस, आंखो पर काला चश्मा, सफ़ेद रंग की चौड़ी बेल्ट और लाल रंग के कैनवास के जूते। सुबह के समय अक्सर मैं बीरेंदर को एक हाथ में आईफोन और दूसरे हाथ में चाय का ग्लास लिए देखता। आसपास की  दस बिल्डिंगों और सड़क पर दुकान लगाने वालों में शायद ही कोई  ऐसा इंसान होगा जिससे बीरेंदर छेड़खानी नहीं करता हो। जब तक मेरी उससे बात नहीं हुई थी तब भी मुझे पूरा यकीन था कि उसे मेरे बारे में सब कुछ पता है। मुझे देख थोड़ा संकोच करता और थोड़ी धीमी आवाज में बोलता।

उस दिन मेरे पास रिक्शे वाले को देने के लिए छुट्टे नहीं थे... तो मैं रिक्शे वाले को खड़ा कर छुट्टे की तलाश में निकल गया। तब मुझे बस दो दुकान वाले ही पहचानते थे एक चाय वाला छोटू और दूसरा  जूस वाले मिसराजी। मैंने छोटू से पूछा  'सौ रुपये का छुट्टा होगा क्या?'

'नहीं सर, खुदरा के बहुत दिक्कत है ! सुबहे सुबह कहाँ एतना बरा लमरी टूटेगा ?'
'अरे यार  ! रिक्शे वाले को देना है, उसे खड़ा करके आया हूँ ! हो तो दे दो'
'तो ऐसे बोलिए न सर की रिक्शा वाला को देना है, उसके लिए छुट्टा की क्या जरूरत हैं? कितना देना है?' बीरेंदर ने पीछे से कहा।
'20 रुपये'
'ऐ छोटू ! निकाल बीस रुपया... कोई एक दिन का आना है सर का? ले जाइए सर, बाद में दे दीजिएगा। अभी तो 2-3 महिना हैं न आप?'  बीरेंदर ने छोटू से पैसा लेकर मुझे देते हुए कहा।
'धन्यवाद !'
'अरे धन्यवाद काहे का सर? माइसेल्फ बीरेंदर - फ्रेंड्स कॉल मी बैरी !'

बीरेंदर को बैरी कहना मुझे उसी तरह ठीक नहीं लगा जैसे शत्रुघ्न को शत्रु फिर एक दिन जब मेरा फोन बंद हो गया और मैंने एक कॉल करने के लिए बीरेंदर  का फोन मांगा तो स्क्रीन पर 'बैरीकूल' देख कर मेरी इस समस्या का निदान हो गया  । तभी पता चला कि बीरेंदर के पास हाथी के दाँत की तरह एक और दूसरा फोन भी है। जब पता चला कि एक फोन लैला-मजनू स्कीम के तहत उसने लिया है तो मैंने  पूछ लिया 'शादी क्यों नहीं कर लेते?'
'सादी त करेंगे ही, लेकिन छोटी बहन है त रिक्स नहीं लेना चाहते... उसकी शादी करा दें पहले तब अपना करेंगे। अपने से शादी कर लेंगे त दिक्कत हो जाएगा... इस समाज में अपने से सादी करने के पहिले पचास ठो चीज सोचना परता है'।

फिर मैं कब 'सर' से 'भईया' हो गया और 'बैरीकूल' सिर्फ 'बीरेंदर' पता नहीं चला। बीरेंदर जहां मेरा ऑफिस था उसके पास ही एक बैंक में काम करता है। अपनी ही उम्र का लड़का है... लेकिन गज़ब तेज है। जब मुझे 'बोधगया और राजगीर जाना हुआ तो किसी ने सुझाव दिया 'इतनी सुबह मत निकलिए... नहीं तो पहले राजगीर चले जाइए। सुबह-सुबह गया वाले रास्ते पर थोरा रिक्स  है'
जब बीरेंदर को पता चला तो बोला 'कौन  साला बोल दिया आपको ई सब ? यहाँ से गया तक कहीं भी कुछ भी हो... बस हमारा नाम ले लीजिएगा - आ मेरा नंबर तो हइए है आपके पास ! अपना इलाका है... कहिए त बात करा देते हैं  टोल-टेक्स वाला से... आपका गारी से टोलो नहीं लेगा ! अरे आराम से जाइए।'

सबको जानता है बीरेंदर... और सभी उसे जानते हैं। उसके साथ सड़क पर निकल जाइए... सबसे हाय-हैलो हो जाएगा... और सबके मजे भी लेता है।

'ऐ सदाबहार - रुपया चार ! क्या हाल है ?...  का रे सिखण्डीया ! बीबी मारी है का राते?... आरे मउरिया ! कईसा चल रहा है गारी... सुने हैं खाली जनाना सवारी पर ज़ोर मार रहा है तू...?'

'सदाबहार-रुपया चार' चार रुपया प्रति गिलास गन्ना जूस बेचते हैं, सिखण्डीया रिक्शा चलाता है... मउरिया टेंपू। एक और है 'कैटरीना के खस्ससम'... उनका सत्तू का ठेला है। ये नाम इसलिए क्योंकि उनके ठेले पर कैटरीना की फोटो है। इन सबसे लेकर सारे ऑफिस वाले और बड़े शोरूम वाले तक... सभी 'बीरेंदर' या 'बीरेंदर भईया' को जानते हैं।  एक दिन मैं मौर्य लोक में एक बड़े ब्रांड के शोरूम में था तो बीरेंदर का फोन आया... थोड़ी देर बाद बोला 'अरे वहाँ तो बहुत महंगा मिलेगा... हमसे बोले होते... आछे भईया... एक मिनट फोन दीजिये त जो काउंटर पर बैठा है उसको'। थोड़ी देर बाद मुझे फोन वापस करते हुए काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा 'आपको बताना था न की बीरेंदर भईया के दोस्त हैं' और मुझे दस प्रतिशत की छुट मिल गयी।

बीरेंदर से मिलना अक्सर चाय की दुकान पर ही होता था। अमेरिका में क्या होता है ये जानने में उसे बहुत रुचि थी। खासकर मोबाइल, गन, बाइक, कार और नाइट क्लब्स मे क्या-क्या होता है।

'का रे कैटरीनवा के खस्स्सम ... तनी ध्यान रखो... तुम्हारा बीबी बहुत ओभारटाइम कर रही है आजकल?'
'बीरेंदर भईया... आपको का बुझाएगा... बरा-बरा आदमी सब का लेडीज त काम करबे करती है। आ आपको न हम ल*बक लगते हैं... किस्मत का खेल है भईया... नहीं त हिहाँ एएन कोलेज करके ठेला नहीं लगाते...'  कैटरीनवा के खस्स्सम ने बुरा मानने के लहजे में कहा।  Sattu stall Patna

'अरे त कवनो चोरी-छि*रों कर रहा है... तुम तो साला कैटरीना का खस्स्सम है... अब का चाहिए तुमको? इहें तुम को मिल जाएगा इंजीनियरिंग आ मेडिकल रिटर्न... अईसा पी के टुन्न रहिता है की सब्जियों नहीं बेच सकता...  वैसे बेटा तुमको खस्स्सम बना के उसका फैदा कहीं और लिया जा रहा है... तुमको तो बस एतना ही फैदा है की फोकट का फोटू लगाने दी है।  तुमसे त कुछ नहीं ले रही है... लेकिन किससे-किससे का-का ले रही है... उधरो ध्यान दो...'

'जानते हैं भईया? कैटरीना के फिगर का राज उसके इसी खसम का सत्तू है... हा हा। देखिये त कैसे सत्तू पीते हुए फोटो लगाया है... अबे साला  ! तुम गंजी में फोटो लगाए हो? कम से कम सारी तो पहना देते... बीबी है तुम्हारी... हा हा हा'

'बोले न भैया अब बरा आदमी का बीबी है... त ई सब चलता है... आप का जानेंगे? यहीं गांधी मैदान आ एसपीवर्मा रोड में जिंदगी भर रह गए आप का जानेंगे ? '
' हं बेटा जिस दिन तुम जैसा जितना खसम है... उ सब को खोज के बोलेगी की... एतना दिन से फोटो लगाए हो सब ज़ोर के पैसा दो... तब बुझाएगा'

'आछे भईया, ई दुकानवा वाला जो हीरोइन सब का फोटो लगा लेता है इन सब पर केस नहीं हो सकता है? वैसे इससे क्या फर्क परता है उ सब को ! ...लेकिन अमेरिका में भी अगर अइसही बिना ब्रांड एम्बेस्डर बनाए कोई फोटो लगा दे तो वहाँ तो सब मार लेगा? '  आगे बढ़ते हुए बीरेंदर ने मुझसे कहा।

'का हो ! सदाबहार - रुपया चार? एक ठो हीरोइन का फोटो लगाओ तुम भी इसके तरह... तब न... पब्लिक रस पिएगा  ! ... आ ई ट्रांसफरमारवा के का कर दिये हो?... लाइने नहीं आ रहा है'

'आरे बीरेंदर... कल दिने में बुरुम से उर गया... बरी ज़ोर से आवाज किया... हमको त लगा कि बम-उम फट गया कहीं... आ बेटा जब तोहरे ऊमीर में थे त खूब फोटो लगाए है हम भी... हेमा मालिनी आ बैजानती माला  के... '

'अरे जियो सदाबहार ! ऐसे ही थोड़े ना सदाबहार हो... जिला हिला के आज भी रखते हो तुम तो !'

बीरेंदर की नजरों में स्टाइल की समझ ही नहीं है मुझे... मुझे एक दिन सलाह दी उसने  'भईया आप भी न... एक घड़ी के अलावा  कुछों नहीं ? कम से कम एक ठो सीकरी तो पहना कीजिये... ऐसे अच्छा नहीं लगता है'।

बीरेंदर ने मुझे रविवार को फोन किया... 'भईया बाडीगाड़ देखने चलेंगे ? नए वाले माल में?'
'कैसी फिल्म है? कितने बजे से?'
'फिलिम तो बढ़िए होगा। सलमान खान है आ करीना है त देखने लायक तो होइबे करेगा... नहीं तो माल भी नया है...उहे देखेंगे... अब पटना में उहे त एगो माल है. टाइम पास त होइए जाएगा...'
'देख लो तुम्हें गरिमा के साथ जाना हो तो...'
'अरे नहीं भईया... अईसा भी कुछ नहीं है। आप उसका टेंसन काहे ले रहे हैं... चलिये आपको माल दिखा लाते हैं अब दिल्ली-गुरगाँव जैसा तो नहीं है लेकिन फिर भी..'
'अरे मॉल तो हर जगह एक जैसा ही होता है। दिल्ली हो या पटना !'
'कहाँ भईया ! दिल्ली-गुरगाँव  में बरा-बरा माल होता है आ माल में माल ही माल... यहाँ तो...हा हा हा'

बीरेंदर जैसे मस्त मौला को चित्रित कर पाना बहुत कठिन है... !

~Abhishek Ojha~