Sep 13, 2009

फर्माटिंग के चक्कर में बड्डे सेलिब्राट हो गया !

कुछ फर्माटिंग में गड़बड़ हुई और हमारा बड्डे सेलिब्राट हो गया. अब ये वाकया लिखने बैठा तो 'फर्माटिंग' और 'सेलिब्राट' याद आ गए. शब्द चर्चा थोडी देर बाद...

१२ सितम्बर को बिस्तर छोड़ने से पहले ही समीरजी का  ईमेल पढ़ा 'जन्म दिन की बधाई और शुभकामनाएं'. खुरपेंची डॉक्टर की तरह थोडा हम भी कन्फ्यूजियाये कि  कहीं रामखेलावन के पाड़े का असली जन्म दिन तो नहीं पता चल गया. पहला शक गया ऑरकुट/फेसबुक पर नींद में ही पूछा 'अबे ड्यूड ! आज किसी साईट पे मेरा बड्डे तो नहीं दिखा रहा?'
'नहीं भाई !'
मेरे ये मित्र सोशल नेट्वर्किंग साइट्स के अपडेट बाकी लोगों को दिखने के पहले नहीं तो साथ-साथ तो देख ही लेते हैं. फ्लैश ट्रेड्स की तरह. फिर? मुझे तो हर एंगल से अपने दो ही बड्डे याद हैं ९ दिसम्बर और १ जुलाई. और हम पैदा तो ९ दिसम्बर को ही हुए थे. १ जुलाई की बात फिर कभी पर सेलिब्राट तो ९ दिसम्बर को ही होता रहा है. फिर ख्याल आया... १२/९ और ९/१२. मतलब किसी से तो फर्माटिंग की गलती हुई है. यहाँ भी अमेरिकी हाथ निकला... दिन-महिना-साल फर्माट महिना-दिन-साल हो गया कहीं. वैसे भी ९/११ के बाद ज्यादा करने लोग यही वाला फर्माट पसंद करने लगे हैं. ये गडबडी किधर हुई ये तो नहीं पता चला पर एक ट्रेंड दिख रहा था कि सारी शुभकामनाएं अपने हिंदी ब्लागरों से ही आ रही है. एक बार डाउट तो हुआ... 'किसी ने पोस्ट तो नहीं लिख मारी?'

थोड़े-बहुत काम में व्यस्त रहा पर ये बधाइयों और शुभकामनाओं का सिलसिला शाम तक जारी रहा. शाम को एक दो मेल का सधन्यवाद जवाब भेजा ९/१२ और १२/९ की बात बताते हुए तो (वाया द्विवेदीजी) पाबलाजी का फोन आया. और फिर शुभकामनाओं के पेड़ की जड़ ये पोस्ट निकली.

फिलहाल हमें खुश रहने, जिंदगी में बड़े-बड़े काम करने... और ऐसी ही ढेर सारी शुभकामनायें मिली है. तो हम पूरे वीकएंड हैप्पी च लकी फील करते रहे. आप सबको धन्यवाद ऐसे ही किसी भी बहाने शुभकामनायें और आशीर्वाद भेजते रहिये... धन्यवाद के अलावा कुछ और वापस नहीं करूँगा इसकी गारंटी !  इस बार आप चुक गए तो ९ दिसम्बर को फिर मौका है भूलियेगा मत :)  पार्टी-सार्टी लेनी है तो पुणे आइये. वैसे भी जिस ब्लॉगर से मिलता हूँ जूनियर ब्लॉगर होने के नाते पे तो मुझे नहीं ही करने देंगे आप. क्यों? इसे कहते हैं दोनों हाथ में लड्डू...

कभी ऐसे सेलिब्राट होगा सोचा न था. कई बार ये सलाह जरूर मिली: 'करले बर्थडे सेलिब्रेट और बुला ले पार्टी में यही एक तरीका है...'. जो भी हो बढ़िया रहा :)

और अब फर्माटिंग: हमारी एक ट्रेनिग में एक उड़िया इंस्ट्रक्टर थे उनसे हमने सीखा संसार कि सारी समस्याएं या तो भर्जनिंग (version) से होती हैं या फर्माटिंग (Formatting) से. कम से कम प्रोग्रामिंग में तो यही होता है. तब से ये दोनों शब्द हमारे तकिया कलाम हैं :)

सेलिब्राट: कानपूर में एक बार बड्डे पार्टी से लौट कर आते हुए फैसला हुआ कि मेन गेट से हॉस्टल तक पैदल चला जाय. रास्ते में एक टुन्न सज्जन मिल गए... बड़े हैप्पी थे और वो बार-बार कहते 'आज मैं बहुत खुश हूँ और तुम सब मेरे दोस्त हो... आज हम सेलिब्राट करेंगे. लेट्स सेलिब्राट !' ये कह कर वो रुक जाते और एक क्लासिकल गाना गाने लगते. हम कहते 'रुक क्यों गए? चलते-चलते गाइए...'  और वो खड़े-खड़े फिर तान छेड़ देते 'चलते-चलते मेरे ये गीत....'.

~Abhishek Ojha~

Sep 1, 2009

कभी-कभी इत्तफाक से...

हर व्यक्ति के जीवन में कुछ लोग होते हैं जिनसे वो जाने अनजाने प्रेरणा लेता रहता है. अपने रिश्ते, आस-पड़ोस के लोगों से लेकर ऐतिहासिक, पौराणिक, काल्पनिक और वास्तविक चरित्रों तक से. और अब इन्टरनेट के जमाने में ये लिस्ट लम्बी हुई है इसमें कोई दो राय नहीं. हम जब भी किसी व्यक्ति विशेष के बारे में कुछ पढ़ते-सुनते हैं या किसी से मिलते हैं तो कहीं न कहीं उनके गुणों से प्रभावित तो होते ही हैं.

वैसे प्रभावित होने के लिए ये जरूरी नहीं कि हम उनसे मिलें भी. कई बार तो ये सिर्फ पुस्तकों में बसे चरित्र ही होते हैं या फिर ऐतिहासिक लोग. पर इनमें से अगर किसी से अपने जीवनकाल में कभी मिलना हो जाय तो फिर अतिशय ख़ुशी होना स्वाभाविक ही है.

वैसे प्रेरणा लेने की बात से याद आया. हर प्रेरणा लेने वाले एकलव्य को द्रोणाचार्य तो नहीं मिलते. अगर सोचे तो उस एकलव्य ने तो फिर भी द्रोणाचार्य से मिलने का सौभाग्य पाया.

द्रोणाचार्य को तो 'को नहीं जानत है जग में !' की तर्ज पर भला कौन नहीं जानता होगा/है. तो यहाँ हर एक 'साधारण जिज्ञासु' व्यक्ति की तुलना एकलव्य से करना बेमानी होगी. पर एक बात तो सत्य है... एकलव्य न सही अगर एक साधारण जिज्ञासु भी अगर द्रोणाचार्य से मिलता तो सीखता तो बहुत कुछ. भले ही उनके गुरुकुल में पहुचने के लिए पचासों शर्ते रही हो और हर किसी को ये अवसर ना मिलता हो. पर क्या एक साधारण इंसान की गुरु द्रोण से एक क्षणिक मुलाकात ज्ञान में वृद्धि और सहज हर्ष कि अनुभूति नहीं कराती होगी? क्या आप द्वापर युग के उस व्यक्ति की ख़ुशी का अनुमान लगा सकते हैं जिससे कभी कहीं आते-जाते कोई मिल गया हो. और अचानक ही पता चला हो कि वो जिसके साथ है वो स्वयं द्रोणाचार्य हैं ! वो भले ही घास काटने* का काम करता हो एक बार तो पूछता ही होगा 'क्या मैं भी तीर चला सकता हूँ?'.

यह हर्षातिरेक अनुभूति मुझे पिछले दिनों हुई जब मैं खुद इत्तफाक से एक ऐसे ही गुरु द्रोण से मिला. मेरी हालिया यात्रा के दौरान मुंबई एयरपोर्ट पर एक आचार्यजी मिल गए. मुंबई एअरपोर्ट पर लाउंज में यूँ ही आदतन वायरलेस इन्टरनेट देखकर ऑनलाइन हो गया. मैं अपने मित्र से थोडा जल्दी पहुँच गया था तो अकेले समय काटने का ये तरीका अच्छा लगा. थोडी देर में मेरे मित्र भी आ गए और फिर इधर-उधर की बातें होने लगी. उसी दौरान एक हंसमुख व्यक्ति से अचानक ही बातचीत शुरू हो गयी. वैसे तो किसी अनजान व्यक्ति से बात करना हमेशा ही सुखद होता है पर हम इंसानों ने दूरियाँ कुछ इस कदर बढा दी हैं कि कम से कम हवाई यात्रा में तो दो अनजान यात्रियों का आपस में बात करना एक सामान्य घटना नहीं लगती है. पर इस बार की घटना से तो मुझे सीख मिली कि अगली बार से जरूर एक दो यात्रियों से बात करूँगा 'जाने केही वेश में' कौन मिल जाए. वर्ना अब तक तो अक्सर बगल में बैठने वाले से भी औपचारिकता से आगे बात कम ही बढ़ पायी.

लैपटॉप, यात्रा, काम-धाम, पढाई, हाल-चाल की बात होते-होते अचानक उनका नाम पता चला तो एक बार भरोसा नहीं हुआ... और उसके बाद ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा. हमने तो उन्हें यह बताकर कि 'हम आपको पहले से जानते हैं' और साथ में साबुत के तौर पे ये बता पाया कि उन्होंने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से सांख्यिकी की पढाई की थी. इसी में अपने को धन्य मान लिया.

खैर उमंग में बात ही कहाँ हो पाती है. इस बात को लेकर मन में लड्डू फूटते रहे कि दोस्तों को बताऊंगा... मैं किससे मिला ! किस्मत को धन्यवाद देता फ्रैंकफर्ट पंहुचा. फ्रैंकफर्ट में कुछ पल के साथ में एक त्वरित फोटो खिचाई. आचार्य तो आचार्य थे... पिता सामान आचरण. जब गुरु द्रोण कहा ही है तो ज्ञान कि बात करने वाला मैं कौन? बस इतना ही कहना है कि उनका विनम्र होना... !

हजारों चीजें सीखी हमने इस छोटी सी मुलाकात में. हम लोग फोकट में हीरो बने फिरते हैं... और जिन्हें आदर्श मानते हैं वो ! ज्ञान-श्यान अपनी जगह है... मुझे तो सबसे पहले उनमें एक अच्छा, विनम्र, हंसमुख और मिलनसार इंसान दिखा. वो गुण जो अब गिने-चुने विलुप्त हो रही प्रजातियों में ही पाए जाते हैं.

अगर आपको कभी ऐसे आचार्य से मिलने का मौका मिले तो ख़ुशी से फूलने की जगह अधिक से अधिक ज्ञान लेने की कोशिश कीजियेगा (ये एक सलाह है). वैसे मेरा अनुभव कहता है कि इतनी ख़ुशी मिलने पर कुछ समय के लिए कोई इच्छा नहीं बचती... ज्ञान प्राप्ति की भी नहीं.
ये आचार्य थे दीपक जैन. दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूलों में से एक केल्लोग बिजनेस स्कूल के डीन. उनसे मुलाकात की और बातें फिर कभी.... !

~Abhishek Ojha~

बड़े दिनों बाद इधर लौटा हूँ. व्यस्तता का रोना तो अब पुरानी बात हो गयी है... वैसे आपको पता ही है कि अगर समय मिला तो ब्लॉग्गिंग प्राथमिकता सूची में बहुत ऊपर आता है. हालिया संपन्न यात्रा में तरुणजी से मुलाकात हुई और कई बड़े लोगों से बात हुई आप तो सबको जानते ही हैं... समीरजी, लावण्याजी, अनुरागजी, नीरज भाई से भी १ मिनट :)

हमारे संस्थान के एक सीनियर हैं उनसे मिलना भी सुखद रहा... आप उन्हें शायद ही जानते होंगे. हमारी उनकी पहचान भी इसी ब्लॉग की बदौलत है. वैसे बड़े धाँसू फोटोग्राफर हैं, आप उनकी खिंची तस्वीरें देखकर आइये. उनसे एक हिंदी ब्लॉग बनाने का अनुरोध किया तो है मैंने... पर पहली प्रतिक्रिया से थोडा मुश्किल ही लग रहा है.


*वैसे घास काटना मेरे हिसाब से कहीं से भी कम कौशल का काम नहीं हैं. वो तो मुहावरा समझ कर लिख दिया है जी. बुरा मत मानियेगा :)

Jul 7, 2009

बारिशाना मौसम में शून्य दिमाग !

झम-झम-झम-झम मेघ बरसते हैं सावन के
छम-छम-छम गिरती बूँदें तरुओं से छन के
चम-चम बिजली चमक रही रे उर में घन के
धम-धम दिन के तम में सपने जगते मन के

ऐसे पागल बादल बरसें नहीं धरा पर
जल फुहार बौछारें धारें गिरती झर-झर
उड़ते सोन-बलाक आर्द्र सुख से कर क्रंदन
घुमड़-घुमड़ फिर मेघ गगन में भरते गर्जन

वर्षा के प्रिय स्वर उर में बुनते सम्मोहन
प्रणयातुर शत कीट विहग करते सुख-गायन
मेघों का कोमल तम श्यामल तरुओं से छन
मन में भू की अलस लालसा भरता गोपन

रिमझिम-रिमझिम क्या कुछ कहते बूँदों के स्वर
रोम सिहर उठते, छूते वे भीतर अंतर
धाराओं पर धाराएँ झरतीं धरती पर
रज के कण-कण में तृण-तृण की पुलकावलि भर
पकड़ वारि की धार झूलता है मेरा मन
आओ रे, सब मुझे घेर कर गाओ सावन
इंद्रधनुष के झूले में झूलें मिल सब जन
फिर-फिर आए जीवन में सावन मन-भावन

- सुमित्रानंदन पंत (साभार)

काफी इन्तजार के बाद आखिर बारिश होने ही लगी. उजड़ कर गंजे हो चुके पहाडों पर हरियाली लौटने लगी है. काले-सफ़ेद उमड़ते-घुमड़ते बादल, चमकती बिजली, पहाड़, हरियाली, सडकों पर पड़ती बूंदें... ! अब सुमित्रानंदन पंत ने तरुओं से छनते हुए बूंदों का जिक्र किया. हमें तो बिल्डिंग, सड़कें, नंगे चट्टानों... गाड़ियों और कंक्रीट पर ही बूंदें गिरती दिखाई देती है. कल्पना शक्ति जैसी कोई चीज तो अपने पास है नहीं. फिर भी कंक्रीट और गाड़ियों से टकराती हुई बूंदें भी मनभावन ही लगती हैं.

बारिश से लगाव कब हुआ याद नहीं ! बारिश में भीगने का मन हमेशा करता है. अब जेब में मोबाइल और बटुआ जैसी बाधाएं हो तो भी मन तो करता ही है. पर वो दिन कुछ और ही थे जब बारिश में... घुटने तक पानी पार करते हुए स्कूल के बस्ते को पानी में तैराते हुए घर लौटते ! सेट बोरिस स्कूल का 'बोरिस' कुछ लोगों के लिए रेनकोट होता तो बाकी लोगों के लिए सिर्फ बस्ते को बचाने के काम में आता. और उसके पहले तो बस्ते के नाम पर काठ की एक पटरी हुआ करती जो पानी में मस्त तैरती. शायद तभी से भीगने में मजा आने लगा था. हाँ तब ये कविता नहीं पढ़ी हुई थी पर बुँदे जरूर पत्तों से छन कर गिरती. स्कूल से घर Puneतक बीच में बगीचा ही था कुछ २ किलोमीटर तक. अब डायरेक्ट बुँदे गिरती हैं... छनने का झंझट लगभग ख़त्म हो चला है. सीधे गाडी के शीशे से टकराती हैं. तब जमा हुए पानी में पटरी तैराने में मजा आता, ठीक से याद नहीं कि वो भी इतना ही गन्दा होता जितना सड़क पर जमा पानी जिसे देख कर अब चिढ होती है.

चीजें बड़ी तेजी से बदलती हैं... ! तब बारिश में भीगते हुए और छींटे उडाते हुए दिमाग शून्य हो जाया करता था... बिल्कुल खाली... निशब्द ! बस एक अजीब सा सुकून... आनंद बचा रह जाता. अब भीगने पर भी वो अनुभूति नहीं होती. बीमार हो जाने की चिंता तो अब भी नहीं सताती. पर दिमाग शून्य नहीं हो पाता... अब भीगते हुए... दिमाग में मणिरत्नम की फिल्मों के बारिश के सीन चलते हैं... नायकन का मुंबई की बारिश वाला सीन सबसे ज्यादा. अब 'सिंगिग इन द रेन' याद आता है. नौवी क्लास की हिंदी पुस्तक में पढ़ी सुमित्रानन्दन पंत की ये कविता याद आती है जिसे मैंने बक्से में बंद किया है. पर दिमाग शून्य नहीं हो पाता.

दो दिन पहले रात को करीब ग्यारह बजे रेनकोट में पैक, बाईक से घर लौटते हुए अचानक मूड बदला... बाईक रोकी... रेनकोट समेत मोबाइल और बटुआ पीठ पर लदे बैग में ठूंस दिया और... भीगते हुए लौटा. फिर काफी देर टहलता रहा. उतने समय तक दिमाग ने बूंदों और बरसात के अलावा कुछ और नहीं सोचा ! यानी 'लगभग' शुन्य अवस्था ! वैसे तो समुद्र के किनारे और किसी मनोरम दृश्य वाली पहाड़ी के ऊपर ही ऐसी अवस्था में दिमाग पहुच पाता है जब और कुछ नहीं सोचता. तेज मन भी जैसे रुक जाता है...

'पगला गए हो का बे? बीमार पड़ जाओगे !' ये सुनकर सपना टूटा और आ गया वापस 'अपनी' दुनिया से 'अपनी' दुनिया में. अगली सुबह थोडा गला कुछ ढीला हुआ और थोडी थकान. पर बीमार नहीं पड़ा :) यूँ तो आजकल अक्सर मन करता है भीगने का. पर 'फोर्मल ड्रेस' में घुसा हुआ ऑफिस आ जा रहा इंसान अगर मन की ऐसी बातें मानने लगे तो सिरफिरा कहलायेगा. वैसे कभी-कभी ऐसी लंठई करने का अपना ही मजा है ! वैसे आपको भी बारिश से इतना लगाव है क्या?

~Abhishek Ojha~