Sep 4, 2008

सब कुछ सापेक्ष है... (भाग १ )

मच्छर हत्या से मांसाहार समर्थन तक:

अगर आपको लगे की लम्बी पोस्ट है तो इस डब्बे में बंद लाइनों को छोड़कर सीधे उसके नीचे की लाइनों पर पहुच जाइए। उसके पहले तो बस ये यात्रा है जिससे इस पोस्ट की उत्पति हुई। समय और अवस्था के हिसाब से चीजों के मतलब बदलते रहते हैं ...

दृश्य १: (सी/१३३, हॉल २, आईआईटी कानपुर): मच्छर हत्या !

'आज ओझा ने मर्डर कर दिया !'
'किसका किया बे? इसकी औकात है?'
'मच्छर मारा होगा !'
'हाँ तुझे कैसा पता?'
'इससे ज्यादा ये क्या मारेगा ... '

कई बार ऐसा होता... मुर्गा, दारु के लिए कई बार चुनौती दी जाती. और हर बार मैं हार स्वीकार कर लेता...
'नहीं मारना चाहिए यार ये भी तो जीव है'

फिर लोग मच्छर मारने के फायदे गिनाते... मैं जीव हत्या का मामूली तर्क ही दे पाता. खैर धीरे-धीरे एक-दो सालों में इतना तो बदल ही गया की कोई बगल में कितना भी मुर्गा नोंच के खाता,मुझे दिक्कत होनी बंद हो गई.

दृश्य २: (शाकाहारी स्विस प्रोफेसर) : छूने में क्या समस्या हो सकती है?

एक बहुत अच्छे प्रोफेसर दोस्त हैं (दोस्त ही कहना ज्यादा उचित है) वो 'लगभग शाकाहारी' बने थे जब तक मैं उनका मेहमान रहा... शायद बाद में भी वैसे ही रहने लगे हों. पर मैंने पूछना कभी उचित नहीं समझा. हाँ मछली को कभी-कभी शाकाहार का हिस्सा मानते.
एक दिन हम साथ खाना खा रहे थे, उनके प्लेट में मछली, मेरे में सब्जी... मेरा खाना निकालने के बाद उन्होंने उसी चमचे से मछली भी निकाल ली. अब उन्होंने मुझे दुबारा सब्जी देने की बात की तो मैंने मना कर दिया (वही... आज भूख नहीं है ! भूख लगी हो तो या कहना बड़ा कठिन काम होता है !). कारण ये था की उसी चमचे से निकाली हुई सब्जी शायद मैं न खा पाता. ये बात अलग है की मैंने उन्हें ये बात नहीं बताई... ऐसा नहीं की उन्हें मेरा शाकाहारी होना पसंद नहीं पर मुझे लगा की उनके लिए ये समझ पाना थोड़ा मुश्किल होगा की छूने से क्या समस्या आ सकती है ! बात भी सही है... जब तक दिमाग में कीडा न हो समस्या होनी भी नहीं चाहिए ।

दृश्य ३: (हाँगकाँग, एक किराना दूकान): पड़ गए बीमार !

साँप, बिच्छु, चमगादड़, गीदड़, केंकडा, चींटी, खटमल, जूं, मधुमक्खी, कुत्ता, बिल्ली, कछुवा, घड़ियाल... बस जो नहीं भी सोच सकते वो सब बिकता है! जिन्दा साँप पालीथीन में पकडो और तौल कर ले जाओ... अब क्या बचा? कुछ शुद्ध मांसाहारी दोस्त भी ये देख के २-४ दिन के लिए शाकाहारी हो गए !
और फिर ये डींग कि 'बगल में कोई कितना भी मुर्गा चबाये मुझे कोई दिक्कत नहीं' कि पोल खुली और हम बीमार हो गए. २-३ दिन तक दिमाग में ये भी नहीं आया कि ब्रेड नाम की भी कोई चीज़ होती है, होटल में ख़ुद खाना भी नहीं बना सकते. और फिर शाकाहारी रेस्टोरेंट में जाओ और पता चले की शाकाहारी भोजन के ऊपर थोडी मांस की ड्रेसिंग कर दी गई और आप बिना छुए बिल देकर आ जाओ... और साथ में १०-१५% टिप भी ! तो इन सबके बीच हम फलाहार करते रहे... वो भी बहुत कम... और बीमार हो गए !

दृश्य ४: (न्यूयार्क, एक किराना दूकान): खाओ भाई क्या दिक्कत है !

आज फिर एक दूकान में पानी में जिन्दा तैरते हुए बड़े-बड़े केंकड़े दिख गए, मस्ती में तैर रहे थे... उनको क्या पता की ऊपर कीमत टंकी हुई है. मुझे बस दुःख हुआ तो यही की फोटो नहीं ले पाया. पर बीमार और ये सब देख के... ना ! जैसे मुर्गा कोई चबाये और मुझे कोई दिक्कत नहीं वैसे ही अब ये देख के भी कुछ ना होना, वैसे भी क्या प्रोब्लम है.

पर हाँ चर्चा जरूर हो गई... मेरे मित्र ने बताया की चीन में ओलंपिक देखने बहुत लोग गए और उसी सिलसिले में किसी टीवी चैनल पे प्रोग्राम आ रहा था की १-२ किलोमीटर लम्बी 'जिन्दा और पके हुए कीडों-मकोडों' की लाइन से स्टाल लगी थी. इस पोस्ट पर उस चर्चा का बड़ा प्रभाव है।

अब देखिये इस मांसाहार के फायदे: भाई चीन ने तो जनसंख्या पर काबू कर ही लिया और जितने लोग हैं उतने में तो खाद्य समस्या नहीं आनी ! खाओ भाई कीडे-मकोडे... कुत्ते-बिल्ली । आप सोचिये अगर भारत में लोग मच्छर फ्राई खाने लगें तो समस्या ही ख़त्म. बीमारी भी ख़त्म और खाद्य समस्या कुछ तो कम होगी, क्यों? कुछ ज्यादा हो गया पर ऐसा तो नहीं है की संभाव्य नहीं ! अच्छा चलिए मच्छर को छोड़ दिया पर भी हजारों तरह के कीडे-मकोडे और जानवर हैं... साले ये चूहे ! इन्हें तो देखते ही खा लेना चाहिए. इनको खा लो तो खाद्य समस्या क्या चीज़ है, अनाज निर्यात करने पर भारत सरकार को सीजनल सेल ना लगानी पड़ जाय ! और कुत्ते? मुन्सिपलिटी की परेसानी तो बड़ी समस्या है, मेरे जैसे लोग भी ऑफिस से लेट आते हैं तो डरते हैं की कहीं दौड़ा दिया तो हम तो नहीं भाग पायेंगे ! सांप उनको तो नहीं खाना उन्हें दूध पिलाने के जैसा ही है भाई. मत खाओ... मरो !

और इधर आपको तो लग रहा है की हम खा ही रहे होंगे दबा के :-)

हाँ हमें भी ऐतराज हुआ इधर... यहाँ ढूंढ़ के शाकाहारी जगहों पर गए तो पता चला की कई जगह दूध या दूध से बना हुआ कुछ भी नहीं डालते. ये वेगन पता तो था पर कभी पाला नहीं पड़ा था इससे पहले, एकाएक मैं अपने मित्र से बोलने वाला था कि दूध में क्या प्रॉब्लम है यार ! फिर ख़ुद को ही मन में बोल के चुप रह गया... 'साले आज पता चला... दूध में क्या प्रॉब्लम है? तो फिर कुत्ते में ही क्या प्रॉब्लम है? कुत्ता तो छोड़ तुझे तो उस चमचे में ही प्रॉब्लम थी... जो जहाँ है उसको दूसरा बुरा लगता है... आज पता चला लोग क्यों खाते हैं? जैसे तुम्हारे लिए मांस वैसे ही किसी के लिए दूध ! वैसे ही किसी के लिए मुर्गा, किसी के लिए कुत्ता और किसी के लिए जूं, खटमल... भाई ये सीढ़ी में कौन आगे पीछे है ये तो सबके लिए अलग अलग. किसी को कुछ अच्छा लग सकता है किसी को कुछ !'

निष्कर्ष तो यही है... खाओ भाई खाओ ! सब खाओ !

आप भी खाइए... जो भी मिले दबा के ! खाद्य समस्या के साथ-साथ कई समस्याएं हल हो जायेंगी... बस अब अपनी राम कहानी इतनी गाई है तो अब ये भी बता दूँ की इस जन्म मुझसे से ये काम तो ना हो पायेगा... मैंने कहा था ना की दिमाग में कीडा हो तो थोडी दिक्कत होती है. सब कुछ सही लगते हुए भी देश का भला नहीं कर सकता... इतना जो लिखा है यही पढ़ लिया मेरे किसी मित्र ने तो कहेंगे कि 'बहुत हीरो बनता है अंडा ही छू के दिखा !'

अगर आपके दिमाग में ऐसा कीडा है फिर तो थोडी दिक्कत है. नहीं तो भाई दबा के खाना जरूर ! बहुत भला होगा देश का... वस्त्र समस्या के लिए तो किसी उपदेश कि जरुरत नहीं वो तो वैसे ही कुछ दिनों में हल हो जाने वाली है !

अब भाई इस पूरे लेख का मूल यही है कि बाबा आइन्स्टीन के नियमानुसार संसार में कुछ भी निरपेक्ष (Absolute) नहीं है सब सापेक्ष (Relative) है... इसकी चर्चा किसी और परिपेक्ष्य में अगले पोस्ट में करते हैं. पर ये तो मानना ही पड़ेगा कुछ भी निरपेक्ष नहीं सब कुछ तुलनात्मक है ! ये तुलना की सीढ़ी संसार की हर बात पर लागू होती है और इसका कोई अंत नहीं... ये तो कभी सोचना भी मत की आप इस सीढ़ी के किसी एक सीरे पर हो... क्योंकि वो तो सम्भव नहीं !

~Abhishek Ojha~


अब ये बताइए की आपका क्या ख्याल है इस वचन पर ! (प्रवचन, सुवचन, कुवचन, दुर्वचन कुछ भी हो सकता है सामने वाले पर निर्भर करता है ! आख़िर सब तुलनात्मक है. )

Sep 1, 2008

सेंट बोरिस पब्लिक स्कूल !

(ये प्रसंग मेरे एक करीबी मित्र के जीवन से है... बिहार के एक गंवई इलाके के रहने वाले हैं, आईटी बीएचयु के ग्रेजुएट हैं और एक प्रतिष्ठित सॉफ्टवेर कंपनी में कार्यरत हैं)

...जब मैं आईटी बीएचयु मैं पढने पहुँचा तो एक रात सब बैठकर अपने-अपने स्कूलों की चर्चा करने लगे. हॉस्टल में स्कूल की चर्चा अक्सर लड़कियों से ही शुरू होती है और अक्सर वहां तक जाती है कि आजकल क्या कर रही है? कैसी दिखती है? कहाँ है? और फिर... ऑरकुट पर है क्या?

सबने चालु किया सेंट थॉमस, सेंट जेवियर्स, सेंट जॉन्स... इतने 'सेंट' और 'पब्लिक' सुना कि लगा अच्छे स्कूल के नाम में दोनों में से एक तो होना ही चाहिए. अगर आगे सेंट और पीछे पब्लिक लगा हो तो फिर सोने पे सुहागा ! मुझे भी किसी ने टोक दिया... तुम किस स्कूल से पढ़े हो? अब मैं क्या बोलता!... स्कूल सोचूँ तो सबसे पहले याद आता है... बोरा ! बोरा भी बड़े काम का होता था... एक दम मस्त ! स्कूल में बिछा के बैठते फिर धुप लगे या बारिश हो तो ओढ़ के चले आओ. और मास्टरजी भी याद आते हैं. खेलते कूदते जाते रास्ते में खेत, बगीचे... खाते-पीते अपनी मस्ती में.

मैंने कहा: 'सेंट बोरिस पब्लिक स्कूल'
'अबे ये कौन सा स्कूल है? कभी नाम ही नहीं सुना !'
'नाम नहीं सुना? अबे साले हमारे जिले में एक ही तो अंग्रेजी मीडियम स्कूल है... मस्त स्कूल है, मेरे बैच से ही पाँच का जेइइ में हुआ है. '

सबने मान भी लिया... बात आई गयी हो गयी। मानते भी कैसे नहीं ! सेंट भी है और पब्लिक भी और बोरिस भी तो पूरा अंग्रेजी ही लगता है. सेंट बोरिस स्कूल की एक और बात बता दूँ. एक बार जब परीक्षाफल निकलने का दिन था तो मास्टरजी आए और उन्होंने सुनाया: 'फलनवाँ फस्ट, चीलनवाँ सेकेण्ड... और बाकी सब पास ! और आज से एक महीने की गर्मी छुट्टी'
घर आके पिताजी ने पूछा: 'रिजल्ट क्या हुआ रे? '
मैंने कहा 'मास्टर जी बोले कि फलनवाँ और चीलनवाँ के रिजल्ट में कोई दिक्कत है बाकी सब पास हैं'
बाबूजी भी खुश ! ससुरे फलनवाँ फस्ट, चीलनवाँ सेकेण्ड... आख़िर कुछ तो सीखा था सेंट बोरिस में, बोरा-बस्ता फेंका और खेलने भागे !

अब स्कूल से तो दो ही बातें बता सकता हूँ बाकी बता दूँ तो गंवार ही कहेंगे लोग। लोगों को भरोसा ही उठ जायेगा जेइइ की कठिनता से. पर क्या करुँ पास कर गया क्योंकि तब आरक्षण नहीं होता था और शायद मेरे जैसे बहुत गंवार वहां पहुच जाते थे... अब ना तो बिना सेंट और पब्लिक के स्कूल ही बचे ना वो परीक्षा ही बिना आरक्षण के रह गई. मेरे जैसे सेंट बोरिस के अलुम्नी कहाँ-कहाँ पहुँच गए... मैं गंवार रह गया ये अलग बात है.

ये सेंट बोरिस का असली मतलब पूरे बीएचयु के चार सालों में कभी किसी को नहीं बताया आज तुम्हें सुना रहा हूँ. '

और मैं आपको सुना रहा हूँ... किसी को बताइयेगा मत :-)



समीरजी और लावण्याजी से बात के बाद निठल्ला चिंतन वाले तरुणजी के साथ लंच पर जाना हुआ... बहुत खुशी हुई, ये यात्रा बहुत अच्छी साबित हो रही है. कमाल की वर्चुअल रियलिटी है ब्लॉग्गिंग भी और हिन्दी ब्लॉग्गिंग वालों में जो आत्मीयता है... वो शायद किसी और भाषा के ब्लोगरों में नहीं.



~Abhishek Ojha~

Aug 28, 2008

लाली देखो लाल की... !

शीर्षक से तो आप अनुमान लगा ही नहीं सकते कि मैं क्या लिखने जा रहा हूँ. पहले इस दुःख और खुशी के संगम को बताने से पहले दो बातें बता दूँ.

- पहली ये की शुक्रवार का बड़ा बेसब्री से इंतज़ार रहता है. पहला तो सनातन कारण है: सप्ताहांत की शुरुआत. पुणे ऑफिस में ये खुशी दुगुनी हो जाती है क्योंकि इस दिन जींस-टी-शर्ट-स्पोर्ट-शू पहन कर ऑफिस जा सकते हैं. इसमें जो खुशी है वो शायद वही समझ सकता है जो चप्पल-हाफ पैंट और टी-शर्ट में क्लास जाता हो और अचानक आप उसे फोर्मल पहनने के बोझ तले दबा दो. साल में जीतनी बार दाढी बनाता हो महीने में उससे ज्यादा बार बनाने को बोल दो.

- दूसरी ये की न्युयोर्क ऑफिस में ऐसा नहीं होता यहाँ लोग कोई भी दिन हो शूट बूट में आते हैं, पर हमने ये फैसला लिया की चाहे जो भी हो पहले शुक्रवार को तो कुछ भी पहन के जाना बनता है. आगे से तो वैसे भी नहीं पहन पायेंगे ! तो हमने अपनी नई टी-शर्ट का उदघाटन कर दिया.

पूरे दिन तो ठीक रहा कुछ लोग अजीब निगाहों से देखते तो बस यही लगा की 'ऐसे ड्रेस में क्यों आ गए हो भाई?' वाली प्रश्न भरी दृष्टि है. असली बात तो शाम को पता चली.

अब किस्मत फूटी उसी दिन हमारे बॉस लंच पर लेकर चले गए, उन्हें भी यही दिन मिला था :( ... ख़ुद को बुरा लगा की ये क्या ड्यूड बन के आ गए हैं. चलिए इतना तो ठीक, ऐसी बातों से ज्यादा परेशान नहीं होता.

शाम को हमारे एक बहुत करीबी दोस्त हैं जो यहीं रहते हैं पिछले दो सालों से, पहला सप्ताहांत... तो मिलने आए. ४-५ घंटे साथ रहे, खूब भटके उनके साथ न्युयोर्क की गलियों में. बहुत अच्छा लगा, बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई थी पर चलते-चलते असली बात बता गए.
बोले:
'ये क्या पहन रखा है?'
'क्यों इसमें क्या बुराई है? भाई बहुत मंहगे कपड़े हैं, अच्छे नहीं लग रहे क्या?' (ना समझ में आए तो सवाल का जवाब सवाल ही हो सकता है !)
'देख अच्छे तो हैं, मस्त लग रहा है पर ये रंग...'
'रंग?'
'हाँ ये लाल-नीला रंग... ये सब यहाँ पहनोगे तो लोग समलैंगिक समझेंगे'
'व्हाट?' (ऐसे उलूल-जुलूल झटके लगे तो अंग्रेजी बोलना ही पड़ेगा)
'Welcome to America Dude ! चिल्ल मार, कोई नहीं!'

कोई तो नहीं और चिल्ल भी मार ली मैंने पर अब जाके माजरा साफ़ हुआ, कहाँ सुबह सोंच के निकले थे की आज तो कहर ढाएँगे और यहाँ .... ! अमेरिकी अंग्रेजी का एक ही शब्द मुंह से निकल सकता है: F*** !
क्या सोच रहे होंगे दिन भर लोग... ऑफिस में ! खैर उसने समझाया की वो भी कई बार पहन के चला गया और ठीक है इतना भी कुछ नहीं है पर आगे से मत पहनना ! जब इतना कुछ नहीं ही है तो आगे से क्यों नहीं पहनूं ? अब दोस्त है तो क्या कहे बेचारा ! तसल्ली देना तो फर्ज बनता है.

अब आप कहेंगे की इस दुःख भरी दास्ताँ में खुशी का लम्हा कहाँ मिल गया? अरे भाई नई टी-शर्ट कम से कम एक दिन तो पहन ली पहले ही पता चल गया होता तो बेचारी धरी की धरी रह जाती. अब क्या करुँ कैसे भी हालात हो अपनी तो खुशी ढूंढ़ लेने की आदत है :-)



किसी समलैंगिक भाई को बुरा लगे तो माफ़ी भई, इस पोस्ट का मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाना नहीं है. मैं तो शत-प्रतिशत सच और आपबीती सुना रहा हूँ. आपलोग सामान्य न सही सामान्य रूप से रह तो सकते हैं, मानता हूँ सबको आपना साम्राज्य विस्तार अच्छा लगता है पर कपडों को तो छोड़ सकते थे... ऐसे ही लडकियां नहीं मिलती और अगर कपडों के कारण (वो भी जब अपने दिमाग में हो की मस्त कपड़े पहन रखे हैं) ऐसा हो तो.

छोडो यार आप लोगों को क्या मालूम कि लड़की क्या चीज़ होती है !


~Abhishek Ojha~