Dec 2, 2013

धनुहां बोस ! (पटना १८)


बात उस दिन के एक दो दिन बाद की है जिस दिन एक शोरूम  के काउंटर पर बैठे लड़के ने १०% छूट देते हुए कहा था - "आपको बताना था न की बीरेंदर भईया के दोस्त हैं". वो दूकान थी बैरी के दोस्त मंटू के पिताजी की - मंटू, मंटूआ, मंटू  डॉन और दउन मिंटा सब उसी एक इंसान के नाम हैं. हर नाम के पीछे एक किस्सा. दउन मिंटा नाम की कहानी बतायी बैरी ने - 'मंटूआ के बाबूजी के बिजनेस ओहि ज़माना से था। उनको बरी मन था कि पर्ह-लिख के मंटूआ सर्विस में आ जाए. बिजिनेस का झमेला-झंझट से दूर।  उ का है कि बिजनेस वाला को लगता है कि बिजनेस में कुछ नही रखा आ नौकरी वाला के लगता है की बिजनेसे करते त बर्हिया होता. त हुआ का कि उसके बाबूजी पूरा ध्यान देते थे मंटूआ पर. पर्हायी-लिखाई से लेके खाने पीने हर एक चीज का. इस्कूल  का अकेला लरका था बोर्न बीटा पीने वाला. एक दिन कह दिया इस्कूल में कि बरनबीटा पीता है उ। बरनबीटा किसी को बुझैबे नहीं किया कि होता का है आ ओहि दिन से सब इसका नामे धर दिया - दउन मिंटा"

"आ डॉन त बाद में हुआ। हीहें एएन कालेज में आईएसी में था त अपना आपके बरका बोस समझता था। हम लोग  पाहिले नाम रखे थे धनुहां बोस। उ एसे की लम्बा त  हइए है आ ऊपर से इस्टाइल में तनी झुक के चलता था. आ मार पीट में सबसे आगे. भले हर  झगड़ा में पीटाइये के वापस आता था.  लेकिन एगो बात त है केतनो लात खाके भी कभी डरा नहीं होगा किसी से।  जानते हैं  भईया, फेमस त इ हो गया था आठवे क्लास में। अप्लिकेशन लिखा था अंग्रेजी में कि "डियर सर, माई फादर इस नाट फीलिंग वेल. आई वेंट टू हॉस्पिटल विथ हिम एंड आई  डोंट नो इंग्लिश आफ बलतोड़" अब आपे बताइये ? आ अइसा भी नही की भोला था। भोला त छोरिये उ दर दर्जे वाला था. जान बुझ के लिखा था, हम लोग से बाजी लगा के. "

मैंने कहा - यार ! तुम्हारे भी अजब-गजब दोस्त हैं ! तुम बाजी हारने का बदला तो नहीं निकाल रहे उसकी बातें सुना के ?

बैरी ने कहा - "आरे नहीं भईया ! उ का है कि ई पटना है, आ मंटूआ तो कुछो नहीं है। हर मोहल्ला में एगो-दुगो नहीं सब का कहानी अइसने होता है. इहे मंटूआ एक बार अउर बोल दिया था - सर आप 'हिंदी एंड' काहे बोलते हैं हर क्लास का अंत में ? बोलते हिंदी में हैं आ कहते हैं हिंदी एंड !"

फिजिक्स के सर उसको थपड़िया दिए थे बोले कि एक साल से हम तुमको पढ़ा रहे हैं आ अभी तक तुमको नहीं बुझाया कि हम क्लास का अंत में कहते हैं 'इन दी एंड' कौंची पढ़ाये उसका समरी बताने के लिए कहते हैं आ तुमको हिंदी एंड सुनायी देता है ?

" वैसे कई बार ऐसे हो जाता है कुछ का कुछ सुनाई दे जाना. पर जो भी हो मजेदार कैरेक्टर  है ये तुम्हारा मंटू डॉन !"

"अरे मजेदार का मत पूछिए, जब दसवा क्लास में था त मुहला का छोटा छोटा बच्चा-बुतरू सब से चंदा लगा के बॉम्बे भाग गया था।"
"फिर?"
"फिर क्या, कुछ दिन उधरे रहा एक ठो रिश्तेदार के यहाँ. फिर आ गया. वैसे पईसा का कमी तो था नहीं. त बाद में चला गया इंजीनियरिंग पर्हने औरंगाबाद। असल में तेज वहीँ जाके हुआ। पाहिले साल के बाद हिलते हुए आया। धनुहाँ त था ही एक दम डोलते हुए लौटा. माने एतना न पीता  था कि का बताएं आपको . आप मानियेगा? फस्ट इयर  में चिट्ठी लिख के पइसा मंगा लीया था कि पिताजी के मालूम कि प्रयोग कर रहे थे त  लोग टेबल टूट गया है। अब बाबूजी को का मालूम कि लॉग टेबल कैसा होता है ! उनको  लगा बेटा इंजीनियरिंग पढ़ रहा है त होता होगा कोई स्पेसल टेबुल. भेज दिए मनीआर्डर. आ उसमें भी सरत लगाया था दोस्तन सब से कि बाबूजी पैसा भेज देंगे. उनको नहीं बुझाएगा कि लोग टेबल क्या होता है. सेकेंड इयर में नया शौक लगा था इसको एक दम भोरे-भोर उठ के हाथ में दारु आ गाना बजा देता था कम्पूटर पर 'करना फकीरी-फिर क्या दिल गिरी'. आ जम के हेमा मालिनी के साथ भक्ति नाच नाचता था.  साथ रहने वाला लइका सब जो न गरिआता था इसको। आ दारु के साथ बीरी पीने लगा. अब भी बीरीये पीता  है सिगरेट कभी नहीं... एक बार उसके  बाबूजी लतिआए त बोलता का है कि ... नानी से सीखे हैं ! उ भी त  पीती थी। उहे हमको सिखायी पहिला बार। अब का बोलेगा कोई !"

"दारु, बीड़ी और  फकीरी वाला गाना?"

"अरे वही तो ! जानते  हैं उसके बाद वहाँ बिहारी लइकन सब का लीडर बन गया। मार-पीट किया. छुरा-चाक़ू सब.  फिर वहीँ कोई नेता उता का कन्टेक्ट भी निकाल लिया था। इलेक्सन भी लड़ा कालेज में लेकिन ई एक साल का हीरोगिरी में एतना  तेज हो गया कि... मेस चालू कर दिया ओहि पर इस्टूडेंट सब के लिए ... फिर भारा पर फ्लैट लेके उ भी तीन-चार स्टूडेंट का ग्रुप बना के देने लगा. लेकिन असिली कमाई किया उसके बाद. ओहि कालेज का मेनेजमेंट से मिल के ओहि कालेज में कमिसन लेके एडमिसन कराने लगा। पटना, मुज्जफरपुर, दरभंगा ई सब इलाका का बहुते लइकन सब का एडमिसन करवाया।

"यार कुछ भी कहो लेकिन मानना तो पड़ेगा, तेज तो है ! "

हाँ भैया ! आ सर तो देखबे किये होंगे आप उसका ? सब बाल उर गया है. कालेजे में चालू हो गया था झरना.  कोई इसको बता दिया कि उहाँ का पानी खराब है त पूरा फाइनल इयर में बिजलेरिये से बाल  धोया। लेकिन अब का कीजियेगा केतनो बिजलेरी बहाए जब जमीने बंजर है त उखारने भर का भी कुछो कैसे बचेगा?"

मंटू कथा सुनते सुनते बहुत देर हो गयी थी तो मैं चलने लगा... जाते जाते बैरी ने कहा -

"आ लीजिये सबसे बिसेस बात त  आपको बतइबे नहीं किये। तेज है,  बिजनेस भी बर्हिया कर रहा है लेकिन एगो बात है. आपसे बात करेगा नु  त  बुझइबे नहीं करेगा कि अपना दुःख रो रहा है कि बराई कर रहा है। जइसे  एक ठो  बेटा है उसका त  कहेगा कि 'एतना न तेज आ परहाकु हो गया है कि परेसान कर दिया है, हम  को ई सब पर्हायी-उराई  पसंद नहीं है'.
इस्कूल में भी ओइसहीं करता था कि हम पर्हबे  नईं करते हैं नहीं त पर्ह दें त  हमसे जादे नंबर कोई नहीं ला सकता है । हम एक बार उसको बोले की  'तुम्हरा पिछवाड़ा में चक्कर है बे, अस्थिर बैठोगे तब न पर्ह  पाओगे?' त पीनक गया था हमसे।
ओइसहीं कहेगा कि बिजनेस का का कहें एतना  तो टेक्से  भरना पर जाता है कि ...
अब बताइये न का बोलेगा कोई उससे ? कमाई है तबे न टेक्स भर रहा है?

 इहे सब थोरा उसके धनुहा बोस वाला सब आदत नहीं गया. नहीं त है त बरी तेज. आ अइसने सब तेज तर्रार आदमी का ज़माना है. नहीं त उहे कालेज से पर्ह-लिख के इंजीनियर बन के हिहाँ बिना पैसा के भी काम करने वाला भी मिल जाएगा. बताएँगे कभी आपको.  आप कुछो बोलिए नहीं रहे हैं आज !

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~Abhishek Ojha~

Oct 26, 2013

जंजाल बनाम कंगाल

ग़ालिब के  'बहर गर बहर न होता तो बयाबां होता' के तर्ज पर भोजपुरी में एक कहावत होती है - 'जंजाल नीमन,  कंगाल ना नीमन' (नीमन = अच्छा)। कंगाल अगर फक्कड़ या निराला न हो तो फिर ये कहने की जरुरत नहीं कि क्यों अच्छा नहीं। वैसे कंगाल से एक और भोजपुरी कहावत याद आ रही है - 'राजा लो के का, उ त गुरे खाई के रही जात होई लो' (राजाओं का क्या है, वो तो गुड़ खाकर ही रह जाते होंगे !)  आप इस कहावत के मतलबों पर गौर कीजिये हम आगे बढ़ते हैं।

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बात शुरू हुई जेपी मॉर्गन बैंक पर लगे 13 अरब डॉलर के जुर्माने से। (13 अरब डॉलर ! वैसे जेपी मॉर्गन ये आराम से झेल जाएगा... आप सोचिए कितनी बड़ी रकम है Smile ) थोड़ा और पहले जाएँ तो मंदी के लिए जब बैंको को जिम्मेदार माना गया तो एक जुमला प्रसिद्ध हुआ - टू बिग टु फ़ेल। दरअसल बैंको ने ऐसे काम किए थे जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। और जैसे कि करनी का फल मिलता है. जब बुरे दिन आए तो कई बैंको को इतना बड़ा घाटा हुआ कि वो डूब गए। पर सरकार को कुछ बड़े बैंको को  मदद कर बचाना पड़ा क्योंकि वो इतने बड़े थे कि अगर डूब जाते तो अर्थव्यवस्था के लिए तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम हो जाता !  उसके बाद सरकारजी ने कहा कि आगे से ऐसा न हो उसके लिए हम कड़े नियम बनाएँगे। जैसा कि होता आया है बहुत सी समितियां बनी। कड़े क़ानूनों का प्रस्ताव हुआ। फिलहाल जब कुछ दिनों पहले जेपी मॉर्गन पर जुर्माना लगा तो फिर ये बात आई कि जेपी मॉर्गन भी 'टू बिग टु फ़ेल' और 'टू बिग टु मैनेज' है। ये खबर पढ़ हमने ट्वीट किया.. और अजित ने जवाब। अजित के जवाब (तस्वीर में) से मुझे लगा कि कुछ लोग बिल्कुल वही समझ लेते हैं जो हम कहना  चाहते हैं -  भले हम कैसे भी कहें ! उदाहरण, बिम्ब, उपमा के नाम पर कुछ भी कहें (वैसे ये बात भी है कि कई लोग, हम कितने ही साफ-सरल शब्दों में क्यों न कहें, कुछ और ही समझ लेते हैं !)

बात तो सही है जब बैंको को इसलिए डूबने नहीं दिया जा सकता कि वो बहुत बड़े हैं तो उन्हें बड़ा होने ही क्यों दिया जाये?

वैसे बात आ गयी बैंक से - रियल लाइफ, इमोशन, रिलेशनशिप पर ! 

बात थोड़ी दार्शनिक सी हो गयी। आप कहेंगे की ये बैंक और 'टू बिग टु फ़ेल' का गणित घुसाना जरूरी है? सीधे नहीं कह सकते जो कहना है? अब बात ऐसी है कि रविदासजी के सामने कठौती थी तो उसी में उनको गंगा दिखी, अगर सामने कॉफी मग होता तो कहावत कुछ और होती। और कबीर दासजी भी सीधे कह सकते थे कि "दुर्बल को न सताइये" इसके लिए "मुई खाल की स्वास से सार भसम होई जाये" कहने की क्या जरूरत थी? हमें कितने दिनों तक यही समझ में नहीं आया था कि किसकी मुई खाल से किसका सार भस्म हो गया ! (सार का मतलब साला भी होता है।)

वास्तविक जीवन में भी क्या चीजें टू बिग टु फ़ेल हो सकती हैं? टू बिग टु फ़ेल तो अच्छी बात है पर उन बैंको की तरह चीजें इस तरह अनियंत्रित हो जाएँ कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने का विकल्प भी न बचे? अगर जंजाल इतना हो जाये कि इंसान  को लगने लगे कि इससे अच्छा तो कंगाल ही होता? वास्तविक जीवन में रिशतें, भावनायें, आसक्ति, भौतिकता ये जीवन के लिए उतने ही जरूरी लगते हैं जितने अर्थव्यवस्था के लिए बैंक। लेकिन कैसे और किस हद तक? कुछ भी  टू बिग हो जाना बुरी बात नहीं है। ग़ालिब चाचा कहते - जेपीमॉर्गन गर जेपीमॉर्गन न होता सेठ दौलतराम बैंक होता। (ये मत पूछिएगा कि ये कौन सा बैंक है Smile )सब कुछ बहुत ही अच्छा था तभी बैंक इतने बड़े होते गए और किसी ने सवाल भी नहीं किया। पर धीरे धीरे वो अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर के काम भी काम करने लगे। जहां नहीं होना था वहाँ भी वो इतने जरूरी हो गए कि बहुत कुछ उन पर आश्रित होता गया  ।

ऐसी उलझन वास्तविक जीवन में भी वैसे ही होती है जैसे बैंको में। तब तक 'अपार सफल' जब तक डूब न जाएँ ! जैसे हम मानने को तैयार नहीं होते कि हम फेल भी हो सकते हैं। हमें लगता है कि हम बाकियों की तरह नहीं हैं। एक बार कुछ बुरा होने लगे तो भी हम एक घाटा छुपाने को और गलत इनवेस्टमेंट करने लग जाते हैं। फिर एक स्तर के बाद हम ये सोचने लगते हैं कि इतना किया तो हार कैसे मान लें ! हम अपनी गलतियाँ भी नहीं देखते।  फिर से वही गलती करते हैं। हम जीवन में कितने ऐसे काम करते हैं कि इतना किया तो अब कैसे छोड़ दें?... जैसे... मान लीजिये एक मोबाइल फोन कंपनी ने एक नया फोन बनाने में करोड़ो खर्च किए। और उसके पहले ही बाजार में उससे अच्छे फोन आ गए। उन्हें पता है कि ये फोन नहीं चलना... फिर भी उस पर सिर्फ इसीलिए खर्च करते रहना कि... इतना किया तो कैसे छोड़ दें।  इससे बेहतर ये नहीं होगा कि जैसे ही पता चले उसे छोड़ नए प्रोडक्ट में लग जाएँ? पर अक्सर ये नहीं हो पाता... हम हार कहाँ मानने वाले होते हैं। ईमोशनल इनवेस्टमेंट जितना होता है उतना कठिन होता है बाहर निकलना। पर फंसे रहना है तो बेवकूफी। जैसे खाना खराब भी  हो तो इसलिए खाना कि पैसे वसूलने हैं :) एक नुकसान के लिए दूसरा और बड़ा नुकसान। जो गया उसकी सोच में हम बहुत कुछ बर्बाद करते हैं। इतना बड़ा करते जाते हैं कि... टू बिग टु फेल ! पीढ़ी दर पीढ़ी लोग अनुभव से कुछ बातें समझाते रहें पर हमें लगता है कि हम अलग हैं -  उन्हें तो करना ही नहीं आया था।  पर परिणाम वही, दुख वैसे ही!  बैंक में काम करने वालों को भी पिछली गलतियों की केस स्टडी पढ़ाई जाती है और लोग फिर से वैसी ही नयी गलतियाँ करते रहते हैं। हमेशा एक जैसा ही पैटर्न - पहले खूब सफल दिखते हैं फिर बैंक दिवालिया। बैंक में इन सब का कारण लाभ का लालच होता है,  वास्तविक जिंदगी में भावनाएँ, भौतिकता और आसक्ति - स्वार्थ दोनों में । 


टू बिग टु फ़ेल आसक्तियाँ वैसी होती हैं जिनमें आगे बढ़ना आसान होता है वापस लौटना असंभव। और ये बातें तभी पता चलती हैं जब चीजें टू बिग हो जाएँ। इतना आगे चले जाएँ, इतना उलझ जाये कि...


2008 से 2012 के बीच अमेरिका में 465 बैंक डूबे... पर एक लेहमेन का ही नाम आजतक क्यों आता है? कितनी नावें रोज डूबती हैं... एक खबर भी आ जाये तो बहुत है। पर टाइटनिक का डूबना 100 साल बाद भी किसी न किसी रूप में पढ़ने-देखने को मिल जाता है ।  क्योंकि वो 'वर्चुअली अंसिंकेबल' था। क्योंकि लेहमेन कुछ इस तरह जुड़ा ही था बाकी बैंको और कंपनियों से... वरना कितना फर्क पड़ता है सब झाड कर आगे बढ़ जाने में? छोटे मोटे झगड़ों और रिश्तों से कहाँ फर्क पड़ता है।  पर कुछ 'टू बिग टु फ़ेल'  धोखा दे या डूब जाये तो जीवन भर के लिये... सिस्टम हिल जाता है। डूबने लगे तो न उसे ढो सकते हैं न डूबने दे सकते हैं !

जब बैंको को पता होता है कि सरकार उन्हें कठिन दौर में बचाएगी ही, तो वो और खुल कर खेलते हैं।  वास्तविक जीवन में भी 'मॉरल हजार्ड'  हर कदम पर दिखता है जिसे हम कहते हैं 'मजबूरी का फायदा'। जब लोगों को पता होता है कि ये तो सरकार (भले मानस) हैं ! कहाँ जाएँगे ? मदद करेंगे ही। तो फिर वो और ज्यादा मन मर्जी के काम करते हैं। उसी तरह जैसे बड़े बैंक मन मर्जी रिस्क लेते हैं... ऐसे लोगों को भी कभी-कभी वैसे ही कह देना चाहिए जैसे सरकार ने लेहमेन को कह दिया -  भले हिल जाये पूरी दुनिया। सरकार कहती है कि, अर्थव्यवस्था के लिए, किसी को बचाने की कीमत अगर उसके डूबने की कीमत से कम है तो बचाना ही बेहतर है।  जीवन में भी ऐसी हालत क्यूँ हो जाती है कि - कुआं या खाई ! कुछ उस तरह का कि रिश्ते टूटे तो या बचे तो... कौन कम बुरा है सोचना पड़े ।

जब एक बड़ा बैंक डूबता है तो बरगद के पेड़ कि तरह उसपर आश्रित और फिर आश्रित के आश्रित बहुत कुछ ध्वस्त हो जाता है। वैसे ही हमारे भी तार कहाँ-कहाँ से जुड़ जाते हैं। कई बार हम जो कुछ करते हैं उससे जाने-अनजाने कितने लोग प्रभावित होते हैं। 

और सरकार कितने नियम बनायेगी? क्या निगरानी करेगी? किसे अच्छे दिनों में उड़ना पसंद नहीं? कौन यथार्थ सोचना चाहता है ? और उड़ने वाले एक दिन जमीन पर आएंगे ही ! जैसे... मीर साहब ने जीवन भर की शायरी के बाद वसीयत की - "कुछ भी होना तो आशिक न होना"। हमने कहा - मीर साहब, बहुत केस स्टडी पढ़ी आपके वसीयत के जैसी... आपकी वसीयत से आशिको का बनना उतना ही रुका होगा जितना नए नियमों से बैंको का फेल होना ! आग से नाता और किससे रिश्ता वाला गाना है एक? - किशोर दा आप अकेले नहीं हैं किसी का मन समझ नहीं पाता :)

सवाल अब भी वही है कितना बड़ा 'टू बिग' होता है ? कितनी आसक्ति ? कितनी भौतिकता? कैसे (स्वार्थी) रिश्ते?  बेहतर है सब कुछ वैसे हो जैसे हमारे शरीर के अंग... सब अपना काम करते रहते हैं। बिन उनके कुछ नहीं चलना पर ...हम कभी महसूस भी नहीं करते उन्हें ! 

ये तुलना पर बात निकली तो बहुत दूर चली जाएगी। फिलहाल इस  बकवास के बाद कुछ अनुभवी लोगों के ज्ञान पढ़िये -
परिभ्रमसि किं मुधा क्वचन चित्त विश्राम्यतां स्वयं भवति यद्यथा भवति तत्तथा नान्यथा.
अतीतमननुस्मरन्नपि च भाव्यसंकल्पयन् नतर्कितसमागमाननुभवामि भोगानहम्. - भर्तृहरि
(हे मन  ! क्यों निरर्थक भटकता रहता है? कहीं ठहर जा। जो होना है वो वैसा ही होगा। इसीलिए जो बीत गया उसे बिन याद किए, भविष्य के लिए बिन योजनाएँ बनाए,  मैं बिन सवाल किए, जो आता है उसी में आनंद अनुभव करता हूँ)
और  -
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥  - गीता (जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं का त्यागकर निर्मम, निरहंकार और निःस्पृह होकर विचरता है, वह शान्ति प्राप्त करता है।)


सबको शांति प्राप्त हो ... या जैसा कि मैं कहता हूँ जिसके पास जो नहीं है वो प्राप्त हो... ताकि उन्हें समझ आए कि उसमें भी कुछ न रखा :)
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और अब काम की बात -
हमारे नए ब्लॉग को देख आयें। नियमित देखिएगा। आसक्ति होने लायक नहीं  है - गारंटी। फैशन के दौर वाली नहीं,  असली गारंटी :)
ये रहा ब्लॉग के बारे में और ये रही पहली पोस्ट।

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~Abhishek Ojha~

Sep 8, 2013

संयोग

 

एक वाइनरी में अलग अलग तरह की वाइन के बारे में सुनते हुए अनुराग बस ये सोच रहा था कि आज जो कुछ हुआ वो महज संयोग तो नहीं हो सकता। वैसे अनुराग शराब नहीं पीता पर शराब ही नहीं दुनिया के किसी भी चीज के बारे में जानने का उसको नशा है। बात कैसी भी हो रही हो उसके पास हमेशा कुछ नया कहने को होता है। बीच-बीच में वो अपने दोस्तों को कुछ न कुछ नयी जानकारी देता ही रहता है। इतना कि उसके दोस्त उसे 'एनसाइक्लोपेडिया' कहते हैं। 


खासकर ऐसी जगहों पर तो वो इन बातों में खो सा जाता है। आश्चर्य था कि आधे घंटे से उसने कुछ नहीं कहा ! आज वो कहीं और ही खोया हुआ है। उसके कानों से कुछ शब्द टकराते तो उसे अंदाजा होता कि यहाँ क्या चल रहा है। थोड़ी देर बाद बिना किसी से कुछ कहे वो उठ कर अंगूर के बागान में टहलने चला गया। आज उसे वो सभी याद आ रहे हैं जिनसे जीवन में पता नहीं कैसे मिलना हो गया! वो अपने खुद के जीवन के बारे में सोच आश्चर्यचकित सा हो रहा है। एक दार्शनिक के से विचार उसके दिमाग में चले जा रहे हैं - दुनिया के किस-किस कोने में जन्मे, कहीं से कहीं होते हुए कैसे 'अनजान' लोगों से जीवन के रास्ते टकराए और जीवन की दिशा बदलती गयी। इतने ही सालों में कितनी जगहें और कितने लोगों से मिलना हुआ  - कितने अच्छे लोग। जहां कोई और भी मिल सकता था उसे वही लोग क्यूँ मिले? जैसे लॉटरी में हर बार उसका वही नंबर लगा हो जो लगना चाहिए था। वो पीछे मुड़ कर देखे तो क्या ऐसा नहीं है कि वो इन्हीं सब के लिए ही तो बना था ! चुन-चुन कर तराशे हुए ऐसे लोग मिले जैसे उसकी किस्मत बड़ी फुर्सत से किसी ने बैठ कर लिखी हो। कुछ चेहरे अब तक कितने साफ दिखाई देते हैं... वहीं कुछ के पीछे के इंसानी नाम तक याद नहीं। और कुछ जिनके नाम तो याद हैं पर और कुछ भी याद नहीं !  एक समय जो सब कुछ थे आज बस हल्की यादें हैं...  जैसे किसी पुराने गड्ढे को साल दर साल बरसात धीरे धीरे भर कर लगभग समतल कर गयी हो। स्कूल के दिन के दोस्तों के चेहरे धुंधले पड़ गए हैं। फेसबुक के जमाने में भी किसी से संपर्क नहीं रहा। उसका बचपन रहा भी तो ऐसा जहां अब भी किसी को फेसबुक नहीं पता ! कहाँ से  चला और किन-किन मोड़ों से होते हुए कहाँ तक आया है वो । और अब जो जीवन में हैं ये भी तो बस संयोग से आते गए... कुछ सालों बाद क्या ये भी वैसे हीं धुंधले हो जाएँगे? कभी तो स्थिर नहीं रहा उसका जीवन... कितना तेज और बदलता रहा है - सब कुछ !  कभी रुककर कुछ देखने का वक़्त ही न मिला हो जैसे !


आज जो हुआ ये तो निश्चय संयोग ही था। पर शायद कुछ भी एक बार घटित हो जाये उसके बाद जब हम पीछे मूड कर देखते हैं तो लगता है कि नहीं ये महज संयोग नहीं हो सकता। ये तो नियति ही रही होगी।


इन दिनो अनुराग अपने कुछ दोस्तों के साथ यूएस-कनाडा के सीमावर्ती इलाके में छुट्टियाँ बीताने आया है। आज होटल वापस आते हुए अनुराग ने जीपीएस बंद कर दिया। गाँवो से होकर जाने वाला एक दूसरा रास्ता निकाल लिया था उसने। अगर एक जैसी ही जगहें हों तो उसे घूमना बेकार लगने लगता है। जिस रास्ते गया उसी रास्ते से वापस तो वो आ ही नहीं सकता था। कल ही तो वो कह रहा था कि यायावरी में बुरे अनुभव भी होने चाहिए बस दो चार जगहें देखने और तस्वीरें खीचने को घूमना नहीं कहते।  अनुभव याद रहते हैं... जगहें और तस्वीरें तो बस कहने और दिखाने के लिए होती हैं। अंजान रास्ते से गुजरते हुए उसने अचानक एक हरे भरे फार्म के सामने गाड़ी रोक दी और कहा चलो देख कर आते हैं। आनाकानी करने के बावजूद उस 'प्राइवेट प्रॉपर्टी'  पर सभी उसके पीछे आ ही गए। यूँ भटकते हुए अनायास ही कहीं रुक जाने को संयोग ही तो कहेंगे? या सचमुच ऐसा है  कि जहां जहां जाना लिखा है, जिनसे मिलना लिखा है... वहाँ हम चले ही जाते हैं? और कुछ हो जाता है जीवन के रैंडमनेस में खूबसूरत पैटर्न सा।


घास के मैदान में अपनी मशीन दौड़ाते हुए एक बुजुर्ग सबसे पहले मिले। पर ऐसे मिले जैसे वर्षों से उन्हें जानते हों। उन्होने अपने फार्म की जानकारी बड़े गर्व और प्यार से दी। फिर उनकी पत्नी भी मिल गयीं। दोनों उम्र के सत्तर वर्ष पार कर चुके हैं... पता चला वो किसी जमाने में मशहूर ठीकेदार और शिकारी थे और उनकी पत्नी शिक्षिका। उन्होने अपने फार्म और घर की एक एक चीज ऐसे दिखायी जैसे कोई म्यूजियम की गाइड रहीं हो। एक घंटे से ज्यादा का वक़्त कैसे निकला किसी को कुछ पता ही नहीं चला।


सब कुछ पर्फेक्ट ! इतना अच्छा जैसे सपना हो। इतनी गर्मजोशी से उनका मिलना। एक एक बात प्यार से बताना... कैसे सब कुछ उन्होने खुद अपने हाथों से बनाया। टाइल, पर्दे, दीवार, हीटिंग सिस्टम ... सबकुछ उन्होने खुद डिज़ाइन  किया। सब कुछ अविश्वसनीय सा लगा। कितनी तो नयी बातें पता चली। उनके घर का तीन तरफ से मिट्टी में होना। सब कुछ अत्याधुनिक के साथ साथ प्राकृतिक भी। सेव और ब्लूबेरी के बागान, भेड़ें, तालाब, बतखें, मछलियाँ... घर में शिकारी बंदूक, अलास्का में शिकार किए हुए भालू के साथ पत्रिका में छपी तस्वीर और दीवारों पर ढेर सारे शिकार किए हुए जानवर ।

सभी को बहुत अच्छा लगा.। सबने यही कहा - ये होती है जिंदगी !  कितने अच्छे लोग हैं ।


अनुराग के लिए सब कुछ इतना रोचक था कि वो खुद बीच बीच में बताता जा रहा था कि इसका क्या मतलब है। पर सब कुछ ही बदल गया जब एक कोने में लगे पत्थर और उन पर पड़े फूलों पर नजर गयी... पूछने पर पता चला उनके एकलौते बेटे... 25 साल पहले प्लेन क्रैश... उनका इस दुनिया में अब कोई नहीं... इस अंजान जगह में ये विशाल फार्म और...


उसके बाद उन्होने और क्या-क्या बताया... उसे याद नहीं। वो सुन ही कहाँ पाया कुछ। डिज़ाइन वाली बात में से बस एक ही लाइन उसके कानो में गूँजती रही... "हमने ये इसलिए ऐसा बनाया कि व्हील चेयर आसानी से आ जा सके "!


वो सोचता रहा... क्या ऐसा नहीं है कि इन सबके होते हुए भी जो खालीपन है वो कहीं ज्यादा गहरा है? क्या ये इसलिए इतने प्यार से सब कुछ बता रहे थे क्योंकि इन्हें बात करने को लोग ही नहीं मिलते? क्या सब कुछ होने और कुछ न होने में इतना महीन अंतर है?  ये सब कुछ क्या वो खालीपन दूर करने को है जो भरा ही नहीं जा सकता ? क्या हर पूर्णता में खालीपन होता ही है? उसे याद आ रही हैं उसके दोस्त की माँ... उनके पास भी सब कुछ है। बेटे ऐसे जो कोई भी सपना देखता है। दुनिया जीत सी ली हो उन्होने.... वो अनुराग से घंटो बात करती हैं... बस बड़ी हवेली में अकेली रहती हैं।  अजीब दर्द दिखता हैं उसे उनकी बातों में ! जीवन की  हर उपलब्धि बताते हुए एक अजीब खालीपन... बेटों की सफलता वाली पत्रिकाओं की कतरन दिखाते हुए गर्व और खालीपन का जो मिश्रण होता है उसे पता नहीं क्या कहते हैं !


अनुराग को उत्तर नहीं मिल पा रहा क्यूँ मिलना हुआ इस दंपत्ति से. उसे इतना पता है कि कुछ भी यूँ ही तो नहीं होता संयोग हो या नियति.. फिलहाल वो इतना जानता है कि जिनका नाम भी नहीं पता उन्हें वो इस जन्म भुला नहीं पाएगा ।


'इतने सेंटी क्यूँ हो बे? हुआ क्या तुम्हें?" जब ये आवाज कानो में पड़ी तो अनुराग ने बस इतना कहा - "नहीं, कुछ नहीं। चलो"।


उसे पता है वो बुद्ध नहीं हो सकता... दो चार दिन में... ये बातें वैसे ही समतल हो जाएंगी जैसे हर साल की बरसात से कुछ सालों में गड्ढे... !

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~Abhishek Ojha~