Aug 23, 2011

एक रंगीन मुलाक़ात (पटना २)

 

'आप ही  हैं ?' – पान (और/या गुटखा) चबाते मुंह में एक पाव तरल पदार्थ भरे एक सज्जन ने मेरे पास आकर पूछा।

(अब इसका क्या जवाब दिया जा सकता है जी? मैं हूँ या नहीं हूँ? हूँ तो कौन हूँ? ! अगर सवाल ‘मैं कौन हूँ?’ हो गया - तो ये तो वैसे ही सृष्टि के सबसे भारी सवालों में आता है. इस सवाल का जवाब देना मेरी क्षमता के बाहर था !)

मैंने पूछा: 'आपको किससे काम है?'
'अरे काम तो होता रहेगा लेकिन हम पूछ रहे थे कि... माने... आपे इधर आए हैं बाहर से?'
'हाँ।'
'वईसे आप करते का हैं?'
'ये बैंक में हैं' - मेरे एक नए मित्र ने मोर्चा संभाला।
'आछाऽऽ… त आप एमबीए किए हैं?'
'नहीं।'
'त सीए किए होंगे?'
'नहीं, ये आईआईटी किए हैं।' - मेरे मित्र ने फिर बताया। (पटना में लोग डिग्री से मतलब नहीं रखते. आईआईटी करना ही कहते हैं. ये प्रक्रिया कैसे की जाती है जी?)

'आईआईटी? त बैंक में का करते हैं?'
'किस स्ट्रीम से थे ? मनेजर हैं?'
'नहीं। वो... ' उनके प्रवाह को रोक मैंने कुछ बोलने कि कोशिश की.

'अब कलर्क तो नहीये होंगे? हे हे हे। वईसे कउन से  बैंक में हैं?'
'क्रेडिट स्विस।'
'क्रेडिट… काऽऽ? ई कउन बैंक है? …कहाँ पर है बरांच?'
'यहाँ नहीं है, स्विस बैंक है. इधर मुंबई में ऑफिस हैं ।'
'आछा. वही जिसमें काला पईसा जमा होता है?  बंबई में है?' - खुशी से उछल पड़े वो.

'नहीं, नहीं... '
'आछे आप कौन बिभाग में हैं? मैनेजरे न होंगे? अभी त आप बाहर हैं नू? बंबई ब्रांच में थे का पहीले?'
'नहीं वो... ' - वो बस दनादन सवाल दागे जा रहे थे और मुझे बोलने का मौका ही नहीं दे रहे थे.

'आछे सुने हैं कि आजकल अमरीका का भी हालत बहुते टाइट हो गया है?... आछे छोड़िए ई सब। पहिले एक ठो बात बताइये आजकल साफ्टवेयर का मार्केट डाउन में है का? हार्डवेयर का सुने हैं बरी अच्छा चल रहा है आजकल। मेरा लड़का है दसवीं में त हम सोच रहे थे हार्डवेयर स्ट्रीम में डलवा दें उसको, ठीक रहेगा?'

मुझे समझ में नहीं आया क्या बोलूँ... वो धाराप्रवाह में खुद ही सब कुछ बोले जा रहे थे... उन्हें किसी और का कुछ भी सुनना ही नहीं था। आजकल वैसे ही ‘गुड लिसेनर’ बनने की कोशिश में हूँ. मैं अभी सोच ही रहा था कि किस बात को पहले स्पष्ट किया जाय कि वो फिर बोल पड़े...

'लेकिन हमको अभी तक एक बात नहीं बुझाया... आप आईआईटी करके इसमें आ कईसे गए? आछे एक बात बताइये ललूवा का केतना जामा होगा स्विट्जरलैंड में? आप लोग को कुछ पता चलता है? सुने तो हैं कि एकदमे सीक्रेट होता है।' उत्सुकता का ट्रैफिक बढ़ता देख मुझे लगा उनके प्रवाह में कुछ जाम लगेगा. लेकिन…

'आछे रहने दीजिये। पटना में आप लोग का बरांच खुल रहा है का?'
'नहीं. मैं एक... '
'अच्छा त ई बताइये… आप लोग को त जो है सो उपरवार कमाई भी खूब होता होगा? हे हे हे'
'नहीं, अरे आप पहले सुनीये तो... आप मुझे भी कुछ बोलने देंगे ?' - ये मेरा पहला ईमानदार प्रयास था लिसेनर से स्पीकर बनने का.

‘आछे बोलिए’

थोड़ी देर के लिए जब मौका मिला तो मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की... पर वो गज़ब के मूड में थे.paan दरअसल उन्हें सुनना नहीं आता. हर बात बिना सुने बस समझ जाते हैं. नहीं… उन्हें समझने की जरुरत ही नहीं होती. समझे तो वो पहले से ही होते हैं. शायद ही उन्होने मेरा कहा कुछ भी सुना हो।

अब पता नहीं लोगों को क्या बता रहे होंगे कि किससे मिल आए।  वैसे खुशी इस बात की है कि जाते-जाते बड़े निराश दिखे:
'आप तब दूसरे टाइप के बैंक में हैं. आ बिभागो आपका दूसरे टाइप का है, आपको कुछो नहीं पता’।

जो भी हो... एक बात तो साफ है। मुझे जो कुछ भी पता है - उनसे तो कम ही पता होगा Smile

जब चले गए तब पता चला क्यों तेजी थी बोलने की । प्रेसर में थे. और बाहर निकलते ही सीढ़ी पर उतरते हुए दूर से ही निशाना लगाकर ठीक कोने में लाल रंग की एक और नयी परत चढ़ा गए। उनके मुंह से निकली पतली लंबी धार रसायन (केमिस्ट्री)की प्रयोगशाला में बनाए गए जेट की याद दिला गयी। ग्लास के पाईप को गर्म कर जेट बनाया था हमने कभी. मुझे लगता है मुंह से जेट बनाना भी शायद एक कला ही है. और निशाना भी अचूक… !

तीसरे तल्ले पर दीवार साफ़ कर फिर से रंगी गयी है. मैं सोचता हूँ चमकती साफ़ दीवार पर पहली बार कोई कैसे  थूकता होगा? खुदा जाने कहीं ऐसा तो नहीं कि चकाचक देख थूकने को मन मचल उठता हो !  फिलहाल मुझे ये भी लगा कि पान खाने वाले कम से कम कोने के लिए तो वैसे ही मचल उठते होंगे जैसे खंबे के लिए...

(पटना १)

~Abhishek Ojha~

Aug 18, 2011

सोनुआ बरी तेज लरका है - (पटना १)


जयप्रकाश नारायण अन्तराष्ट्रीय एयरपोर्ट से बाहर निकलते हुए बिहार टूरिज्म टैक्सी सर्विस का एक बोर्ड दिखा. वहाँ बैठे बुजुर्ग ने बताया कि गाडी नहीं है.

'एक ही थी... जो है सो उसे कोई और ले गया. एतना डिमांड नहीं है पटना में टेक्सी का. बाहर जाइए बहुत गाडी मिलेगा. फ्रेजर रोड का तो जो है सो दुनिया भर का साधन मिलेगा.'

बाहर निकलते ही दुनिया भर के साधनों ने मुझे घेर लिया.

'फ्रेजर रोड? आइये...' मैंने बस फ्रेजर रोड ही कहा उसके बाद उन्होंने खुद मोर्चा संभाल लिया.

'३०० रूपया. आइये - मारुती है'
'अच्छा २५० दे दीजियेगा'
'२०० दीजियेगा? यही सामने वाला टेम्पू है - आइये.'
'अरे हट रे तुम. मेरे साथ जायेंगे. आइये आइये'
'रेक्सा से जायेंगे? पचहत्तर रूपया दे दीजियेगा हमको'
मैंने पूछा: 'अरे बहुत दूर है - आप कैसे जायेंगे?'
'अरे आइये ना, पटना देखाते चलेंगे, जादे दूर नहीं है.' रिक्शे वाले ने अपनी आशा सफल होते हुए देख कर कहा.

किराया उनके आपसी प्रतिस्पर्धा से ही फेयर वैल्यू की ओर कनवर्ज होता जा रहा था. मैं बस चुपचाप सुन रहा था. रिक्शे की तरफ झुकाव जरूर हुआ. शायद ७५ रूपया भी एक कारण था. उसी बीच दौडता हुआ सोनुआ आ गया.

'हट ड़े. चलिए सड़. उ तिहत्तड़ चौड़आसी देख ड़हे हैं, उहे माडूती है. २३० फाइनल - इससे कम में त कोई नहीं ले जाएगा. सड़काड़ी अम्बेसडरवा वाला भी तीन सउ लेता है.'

उसको समझ में आ गया कि मैं रिक्शे से जाने की सोच रहा हूँ. उसे ये भी पता लगा कि मैं पैसे दे दूँगा. पता नहीं क्या-क्या बात की उसने. मुझे ठीक-ठीक याद नहीं. और फिर मेरा सामान उठाकर अपनी गाड़ी की तरफ चल दिया. सब ताकते रह गए.

'अरे यार बहुत गर्मी है इसमें? पेड़ के नीचे पार्क कर देते. ये तो आग उगल रही है' मैंने बैठते हुए कहा.
'अड़े सड बईठीये न. दू मिनट हवा लगा नहीं की फ्रेस हो जाएगा.'

फिर उसका पुराण चालू हुआ... उसकी अभी इतनी उम्र नहीं हुई कि लाइसेन्स मिले. ये गाड़ी (मारुति 800) बहुत अच्छी है 20 का एभरेज देती है और कलकत्ता तक घूम आई है. परमिट नहीं था तो थाने में ही गाड़ी छोड़ के चला गया था सोनुआ. वापस आते समय कुछ पैसा देके गाड़ी निकाल लाया. ठीके हुआ था - गाड़ी भी सेफ रही उतने दिन !

गाड़ी उसकी नहीं है, मालिक की है. उसके पास मोबाइल भी नहीं है - चोरी हो गया. अपने मालिक का नंबर लिखवाता है मुझे. राजगीर, पावापुरी, बोधगया और नालंदा बस चार जगह है बिहार में. और कहीं जाने का कोई मतलबे नहीं है. सोनुआ के मालिक को फोन करने पर इंतजाम हो जाएगा गाड़ी का. अच्छी गाडियाँ भी है उसके मालिक के पास. टूर पर जाने के लिए भी. सोनुआ को उसका मालिक बीदेसी लोगों के साथ नहीं जाने देता. क्योंकि उसके पास लायसंस नहीं है. लेकिन मेरे साथ जा सकता है. उसे अच्छा लगेगा. वो चाहता है कि मैं टूर के लिए जब भी गाड़ी के लिए फोन करूँ तो उसके मालिक से कहूँ कि सोनुआ को ही भेजे.

पिछली बार एक गलत मोड के कारण ट्रैफिक पुलिस ने उससे 100 रुपये लिए थे. अब वो उस गलत वाले मोड़ के पहले ही एक गलत मोड़ ले लेता है. उसे पता है पुलिस वाले कहाँ खड़े होते हैं. सड़क कहाँ टूटी है और बरसात में कहाँ पानी भरा होता है. किस समय कहाँ ट्रैफिक होगा… वो जोड़ लेता है. पेट्रोल पंप पर कोन्फ़िडेंस में बोलता है 'काहे तेजीया टेढ़ीया रहे हैं, बता रहे हैं न'. फिर मुझे समझाता है 'बरका चोड़ है सब. देख नहीं ड़हे हैं अभी खरा करबे नहीं किए तले पूछ ड़हा है कै लिटड़'.

मुझे जहां जाना है उसे ठीक-ठीक नहीं पता. लेकिन नाम पता हो तो 10 मिनट में वो पटना की कोई भी जगह खोज सकता है. वो गुटखा नहीं खाता - दारू भी नहीं. अभी पंद्रह साल का हुआ है. गाड़ी ही चलाएगा. और उसके पास पटना के ट्रैफिक में चलाने के सारे स्किल हैं. हॉर्न बजाना, ट्रैफिक में रास्ते खोज लेना और कट तो ऐसा मारता है कि गर्दन ना हो तो कलेजा मुंह के बाहर ग्लास तोड़कर सड़क पर आ जाये. 2 सेकेंड इधर उधर हुआ कि गए काम से ! लेकिन नहीं न होगा काहे कि गज़ब का कट्रौल है उसका गाड़ी पर.

मैं उसे 230 की जगह 250 रुपये देता हूँ. वो बहुत खुश है. उसी दिन सुबह मैंने 3064 रुपये किराये वाली टैक्सी में अँग्रेजी बोलने वाले समीर को 100 रुपये टिप दिया था. वो इतना खुश नहीं हुआ था. सोनुआ ने पूछा नहीं कि गाना बजाना है या नहीं सीधे बता दिया कि प्लेयर खराब है मालिक बनवा नहीं रहा. समीर जो टोपी, दस्ताना और ड्रेस पहनता है. मुझे पूरे रास्ते मुंबई का इतिहास-भूगोल बताते आया. उसने पूछा था 'सर, डू यू लाइक म्यूजिक?' मेरे हाँ कहने पर उसने मंद आवाज में ऐसे गाने बजाए कि मैं कह भी नहीं सकता था कि मुझे ऐसे गानों की समझ नहीं ! सोनुआ बजाता तो तुरत कहता ‘वॉल्यूम कम कर दो’ Smile

--

इन दिनों मैं अपनी कंपनी के कॉर्पोरेट रिस्पोन्सिबिलिटी प्रोग्राम के सिलसिले में पटना आया हुआ हूँ। उसका ब्लॉग यहाँ है : क्रेडिट स्विस - ग्लोबल सिटिज़नस प्रोग्राम।

--
~Abhishek Ojha~

Jul 12, 2011

तुमने जो देखा-सुना…

 

…सच था मगर, कितना था सच ये किसको पता.

ये गाना तो आपने भी सुना ही होगा? कुछ गानों के बस कुछ खास शब्द ही याद रह जाते हैं. फिर वो गाना हमारे लिए वहीँ से शुरू होता है और वहीँ खत्म !  जैसे कोई कहानी-कविता-उपन्यास पढ़ने के बाद केवल कुछ पंक्तियाँ ही याद रह जाती है. कुछ वाक्यों का शब्द विन्यास दिल को छूते हुए दिमाग के किसी कोने में जा बसता है. ये पंक्ति भी मेरे लिए कुछ ऐसी ही है. अक्सर ये दिमाग के किसी कोने में रिवाइंड हो जाती है.

सुना तो अक्सर सच नहीं ही होता है देखा भी हमेशा सच हो जरूरी नहीं होता. वैसे आँखों का क्या दोष ! सच-झूठ का वर्गीकरण तो दिमाग को करना होता है. और इस चक्कर में अक्सर बात क्या से क्या हो जाती है और फिर नए रूप में उसमें वर्षों के विश्वास को पल भर में तहस-नहस कर देने की गजब की क्षमता आ जाती है. हम इंसानों को भगवान ने एक प्रतिभा खुले हाथों से बांटी है और वो है किसी की बात सुनकर किसी अन्य को सुनाने से पहले उसमें मिर्च-मसाला मिलाकर बात को परिवर्तित कर देने की कला.  कुछ यूँ कि हाइड्रोजन और ऑक्सिजन से मिलकर बनी निर्मल जल की तरह की बात में भी चट से कार्बन, नाईट्रोजन का तड़का लगा के आरडीएक्स तैयार ! और फिर दे मारा धीरे से… बूम… !

आधे-अधूरे सच या झूठ से बनते-बिगडते रिश्ते देखे हैं मैंने. जब आप किसी बात की उत्पति से लेकर उसके बतंगड बन जाने तक हर मोड पर साथ होते हैं तो पता चलता है कि कितनी क्षमता होती है इस प्रक्रिया पूरे में.  गजब की ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया होती है.

[एक अनावश्यक चेतावनी: आगे बात का बतंगड होने की संभावना है Laughing out loud]

अब क्या करें… बात जब निकली थी तब तो प्राकृतिक लौह अयस्क थी लेकिन उन तक पंहुचते-पंहुचते कब और कैसे परिष्कृत होकर गोली बन गयी पता ही नहीं चला. सुना है पहले लोग अखबार में विज्ञापन देख जब वीपीपी से सामान मंगवाते थे तब अक्सर खोलने पर भूसा निकल आता था ! बातों के बदलते स्वरुप देख मुझे तो भरोसा हो चला है कि भेजने वाले सही सामान ही भेजते होंगे.  इतने हाथों में इधर-उधर होते हुए लोगों के अनुमान और बातें ही उसे भूसे में परिवर्तित कर देती होंगी. अब मैंने गिफ्ट भेजा वो नाराज हो गयीं कि मैंने भूसा भेज दिया. अब उन्हें मुझपर भरोसा ही नहीं तो मैं क्या करूँ. एक मैं हूँ कि वो सच में भूसा भी भेज दें तो मैं हीरा मान लूं… विषयान्तर? ओके. बैक टू भूसा… सॉरी ‘बात’.

हाँ तो बात जब मेरे यहाँ से चली तब तो एक सरल हल होने वाले समीकरण जैसी थी. सिंपल ! वास्तविक हल थे ! इतना ईजी की पांचवे दर्जे का बच्चा भी हल कर ले… लेकिन उसमें किसी ने कुछ जोड़ दिया. और उन तक पंहुचते-पंहुचते अब उसका हल कॉम्प्लेक्स हो गया है. उसमें एक तो लोगों के जोड़े काल्पनिक हिस्सा आ गया है और जो वास्तविक वाला हिस्सा भी उन्हें दिख रहा है वो भी तो वो नहीं जो मैंने कहा था. लेकिन उन्हें एक तो गणित से मतलब नहीं ऊपर से जो सीधे-सीधे हल दिख रहा है उससे आगे वो क्यों सोचें? !  ये ससुर गणित भी न… कहाँ से उदहारण ले आया मैं ! पर ये उदाहरण है बड़ा सटीक.

तो दरअसल हुआ कुछ यूँ कि बात जब मेरे यहाँ से चली तो इलेक्ट्रोन की तरह थी. लेकिन लोगों ने उसके लिए मैग्नेटिक फिल्ड की तरह काम किया. ओह ! ये उदहारण भी…

ऐसे समझते हैं -  बातें सदिश राशि की तरह होती हैं. एक ही बात अगर मैं किसी से सीधे कहूँ और वही बात कहीं से घूम कर आयें तो दोनों का मतलब अलग-अलग होता है.  दूरी और विस्थापन की तरह?  …ये भी सही उदहारण नहीं है.

वैसे उदहारण की जरुरत नहीं है. सीधी सी बात है…

‘तुमने जो देखा-सुना सच था मगर, कितना था सच ये किसको पता.’

…  वैसे गलती उनकी भी नहीं है उन तक जो पंहुचा वही तो सुना उन्होंने. बस भरोसे का सीमेंट कहीं कम पड़ गया शायद.

खैर…   मुझे तो लगता है कि भरोसा कुछ ऐसा होना चाहिए कि ‘वो’ धक्का भी दें तो भी यकीं नहीं होना चाहिए कि ‘वो’ ही धक्का दे रहे हैं !

जो मैं कहना चाहता था समझ में आया? नहीं ? बातें होती ही ऐसी हैं. जिस फोर्मैट में कहना चाहो उस फोर्मैट में नहीं  निकलती है !

--

सोच रहा हूँ कि इसे किसी विदेशी कवि की कविता के अनुवाद वाले फोर्मैट में लिख देता तो हिट हो जाता. नहीं?  आजकल बहुत चलन में है… Smile 

~Abhishek Ojha~

इस पोस्ट में आये शब्द: १. आरडीएक्स २. ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया (exothermic reaction) ३. लौह अयस्क (iron ore) ४. कॉम्प्लेक्स हल (complex solution) ५. मैग्नेटिक फिल्ड में इलेक्ट्रोन ६. सदिश (vector). और ७. भूसा तो सबको मालूम ही है.