एक भोजपुरी आंचलिक कहावत है.
काहाँ जाताऽर? ससराँव. एगो जाँत लेले अईह.
भोजपुरी के केवल कुछ इलाकों में ही ये कहावत सुनी जाती है. जहाँ तक मुझे पता है बहुत ही छोटे इलाके में इस्तेमाल होती है. पर है बहुत शानदार !. कहावत का अनुवाद कुछ यूँ है:
कहाँ जा रहे हो? सासाराम. एक जाँत (जाँता) लेते आना.
सासाराम बिहार का एक जिला** के रोहतास जिले का मुख्यालय है जहाँ पत्थरों की कटाई का काम होता है और उनसे घरेलु इस्तेमाल की सामग्री भी खूब बनती होगी (है?). वहाँ कभी जाँत बहुतायत में मिलते होंगे और ये मनोभावना भी होती होगी कि अच्छे मिलते हैं. वैसे जिन इलाकों में ये कहावत है वहाँ के सारे जाँत सासाराम में ही बनते होंगे तो अच्छे वाली बात का ज्यादा मतलब नहीं है. वैसे ही जैसे अब सबकुछ चीन में ही बनता है. एपल के सामान आप अमेरिका से लो या सिंगापुर से बने हुए तो चीन के ही मिलेंगे. हाँ सासाराम में जाँत थोड़े सस्ते जरूर मिल जाते होंगे. यही सासाराम कहावत में ससराँव या सासाराँव हो गया। वैसे कुछ लोग जब ज्यादा जोश में होते हैं तो सरसराँव भी कहते हैं.
तो कहावत का पहला हिस्सा तो स्पष्ट ही है: किसी के पूछने पर जब पता चला कि कोई सासाराम जा रहा है. तो पूछने वाले ने तपाक से कह दिया कि ठीक है अब जा रहे हो तो मेरे लिए एक जाँत (जाँता) लेते आना. जाँत अर्थात घर की चक्की. वही चक्की जिसे चलता देख कबीर बाबा रो पड़े थे. (चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोए. दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोए.) दुई पाटन के बीच में कोई साबुत तो नहीं ही बचेगा लेकिन सासाराँव से जाँत लेकर आये तो भी… खैर मैं सोच रहा था कहावत की व्यापकता. इस आंचलिक हिस्से में उस जमाने में (जब घर की चक्कियां होती थी) यातायात के साधन का अंदाजा लगाना तो मुश्किल काम है क्योंकि आज भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं है. वैसे में अगर किसी से जाँत लाने को कह दिया जाय तो...? !
एक तो जाते हुए को टोका गया जो कि अशुभ माना जाता है. अब भले ना माना जाय उस जमाने में तो अशुभ माना ही जाता होगा। फिर कोई अपने काम से जा रहा है तो उसे एक और काम पकड़ा दिया गया. और फिर काम भी ऐसा जो वैसे तो आसानी से हो सकता है लेकिन करने वाले का कचूमर निकल जाए. कुछ लोगों की आदत सी होती है कुछ मंगाना. "वहाँ का क्या प्रसिद्द है?" अब भले ही नागपुर से संतरे लाने में सड़ जाएँ लेकिन मंगाने वाले तो मंगाएंगे ही !
अब इसे सोचिए: कोई भारी भरकम जाँत लेकर आया होगा सासाराम से 200-250 किलोमीटर दूर। कैसे लाया होगा ये तो अब लाने वाला ही बता सकता है: गोबिन्द की गति गोबिन्द जानै। कहावत ऐसे तो नहीं ही बनी. कोई तो लेकर आया ही होगा क्योंकि उस जामने में भी लोग होते ही होंगे जिन्हें 'ना' कहना नहीं आता होगा। उफ़्फ़ ! उसकी दुर्गति मुझसे सोची नहीं जा रही। दो भारी पत्थर घसीटते, लुढ़काते, कंधे पर, सिर पर... बैलगाड़ी, ना जाने कैसे लेकर आया होगा। सड़कें तो होंगी नहीं। खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, नदी पार करते... रास्ते में लोग पूछ भी लेते होंगे और उसकी मूर्खता पर हँसते भी होंगे 'यहाँ नहीं मिल जाता जो सासाराम से लेकर आ रहे हो?' बेचारा कह भी नहीं पाया होगा कि किसी और के लिए है ! कुछ बच्चे भी चिढ़ाने के लिए पीछे पड़ गए हो शायद। भगवान जाने कहीं ढेला भी ना मार रहे हों पीछे से।
और मजे की बात तब हुई होगी जब मंगाने वाले ने कह दिया होगा अच्छा नहीं है। ऐसा तो यहाँ भी मिल जाता है। थोड़ा हल्का है, टुँगाई अच्छी नहीं है। वगैरह... और अंत में 'ले लो हींग उधारी, वैशाख के करारी'* के तर्ज पर अगर कह दिया होगा: पैसे तो अभी हैं नहीं वैशाख में ले लेना। तो और मस्त।
मैं ये क्यों सोच रहा हूँ ? अव्वल तो खुश हो रहा हूँ कि जाँतों का जमाना चला गया और दूसरे साथ में वैशाख का इंतज़ार भी तो कर रहा हूँ
*किसी जमाने में नेपाल से हिंग विक्रेता भारत में हींग बेचने आते थे और उधार में हींग देकर चले जाते फिर वैशाख में पैसे वसूलने आते। जाँत की तरह अब वो भी शायद ही कहीं दिखते हों। मैंने भी शायद सुना ही है !
**मनीषजी के कमेन्ट के बाद सुधार: सासाराम जिला नहीं बल्कि रोहतास जिले का मुख्यालय है.
~Abhishek Ojha~