Feb 18, 2011

कितने हामिद !

एक छुटंकी पोस्ट:

'तुम्हे कुछ चाहिए?'

इस सवाल का जवाब भी सवाल ही था. 'क्या?'
'तुम बताओ... कुछ भी. कुछ भी माने... कुछ भी. हाथी, घोडा, गाडी जो चाहिए बोल Smile. सस्ता है या महंगा  मत सोचना. जो अच्छा लगता हो बताओ.'
'हम्म... नहीं, कुछ नहीं.'
'कुछ नहीं? अच्छा चलो ऐसा कुछ बताओ जो तुम्हारे दोस्तों के पास हो और तुम्हारे पास नहीं हो?, या कभी कुछ जो किसी के पास दिखा हो और तुम्हे लगा हो कि मेरे पास भी होता? कुछ टीवी पर दिखा हो कभी ? कुछ खाने की चीज, ड्रेस, खिलौना, आईपॉड ?... '
'हम्म... नहीं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा. '
'अरे कुछ तो बोल. बेवकूफ है तू. दोस्तों को दिखाना मेरे चाचा अमेरिका से लाये हैं... '
'अरे भाग ! नहीं चाहिए कुछ.... वैसे और एक वीक रुक जाओ ना आप या बाद में आओ, जब आ रहे हो तब तो मेरे एक्जाम होंगे. और फिर उसके चार दिन बाद ही चले जाओगे... '
'... हाँ... बट उसका कुछ नहीं कर सकता. अच्छा चलो सोच के बताना.'
'हम्म... चाहिए तो कुछ नहीं. पर आपको मेरे लायक कुछ दिखे तो ले आना.'
'ठीक है, लेकिन तुम्हे कुछ स्पेसिफिक चाहिए तो बताना. ठीक है?'
'ठीक है. वैसे आपको कुछ चाहिए?'
'हा हा . अरे ना रे. वैसे क्या देने की सोच रही है? और कहाँ से'
'मेरे पास भी ना… कुछ पैसे हैं... तो आपको कुछ चाहिए तो बोलो मैं भी खरीद सकती हूँ कुछ.'
'पैसे? कहाँ से?'
'मैंने न चुराए हैं?'
'सच में?'
'हा हा, नहीं. वो मैंने बचा के रखा है और कुछ इधर उधर से मिला है. कोई आता है तो भी कभी दे देता है'
'अच्छा वो !. कितनी कमाई कर ली तुने?'
'बहुत है, …आप बताओ तो क्या चाहिए?'
'चुप कर..., पैसो से कुछ करना. कुछ खरीदना. कुछ खरीद के खाना...'
'हाँ ठीक है. आप आओगे तो चलेंगे खाने'
.....
आज तक उसके चाचा को समझ में नहीं आया क्या ख़रीदे. आपके पास कोई आईडिया है? उसके चाचा तक पंहुचा दूँगा.
मेरा एक दोस्त कहता है... ईदगाह के हामिद तो हर घर में होते हैं. बस लिखने वाले प्रेमचंद ही नहीं पैदा हो पाते !

~Abhishek Ojha~


अपडेट: शायद 'हामिद' से सबको भतीजा ही लग रहा हैं. ध्यान से वार्तालाप देखें तो लड़की की बात है. पर उससे क्या फर्क पड़ता है !

Feb 10, 2011

प्रेम गली अति...


ठीक ऐसी ही हिला देने वाली ठंड और ऐसी ही बर्फ... आज वो फिर सोच रहा है... ये बर्फ पिघलेगी कैसे? सेंट्रल पार्क के उन रास्तों  से बर्फ हटाई नहीं जाती और लोगों का चलना भी अनवरत जारी रहता है। पार्क के रास्तों पर पड़ी बर्फ पत्थर की तरह हो जाती है। उसे भी पता है कि जैसे ही तापमान बढ़ेगा पत्थर दिखने वाली बर्फ को पानी बनने में कुछ वक्त नहीं लगना ... फिर भी जब कभी वो ऐसी बर्फ देखता है उसे लगता है कि ये नहीं पिघलनी। उसे बर्फ कभी अच्छी नहीं लगी... बस देखने में खूबसूरत... स्वच्छता की मरीचिका।  उसे ये भी पता है कि इन पर गिरने से कितनी चोट लगती है।  अचानक वो दिन याद आया जब उसने यहीं पर पहली बार स्केटिंग करने की कोशिश की थी। आज ही की तरह उस दिन भी किसी का इंतज़ार कर रहा था।

...ठीक ऐसी ही ठंढ थी... उसे गुस्सा आ रहा था। एक तो उसे ठंड पसंद नहीं थी ऊपर से बर्फ... और ये लड़की। ...'समझती क्या है अपने आपको? ...वैसे गलती मेरी है, मैं इंतज़ार ही क्यों कर रहा हूँ? ...आज तो पक्का इगनोर करूंगा उसे। फिर देखता हूँ। शुरू के आधे घंटे तक तो बात ही नहीं करनी आज... और जब बात करना चालू भी करूंगा तो...'। क्या-क्या बोलना है, इसकी पूरी लिस्ट बना चुका था अब तक... ।  पौन घंटे... जैसे-जैसे पार्क की लाइटें तेज होती गयी तापमान गिरता गया और वैसे-वैसे उसका गुस्सा बढ़ता गया। ...और फिर वो आती दिखी...Central Park NYC

'सॉरी !...सॉरी!... सॉरी!  ...आई एम रियली-रियली सॉरी।  चलो-चलो अब जल्दी चलते हैं।' एक साँस में बोल गयी वो। ऐसा लगा जैसे सब कुछ छोड़ के भागी आई हो। एक ही साथ मुस्कान और हड़बड़ी का ऐसा समिश्रण देखते ही उस एक सेकेंड के किसी अंश में ही उसका खूब सोचने वाला दिमाग शून्य सा हो गया। ऐसा क्षणिक बदलाव... पिछले पौन घंटे की एक भी बात याद नहीं रही उसे।  वो अभी पूरा बोल भी नहीं पायी थी कि...'इट्स ओके'। ...मुस्कुराने के अलावा कुछ भी तो नहीं बोल पाया था।

उस रात वो स्केटिंग करते हुए ऐसी ही कठोर दिखने वाली बर्फ पर गिरा था... ठंड में चोट ! 

ग्रांड सेंट्रल स्टेशन से दोनों को अलग-अलग ट्रेन पकड़नी थी। 'चलो बाय...वीकेंड पर कुछ प्लान हो तो बताना'।  ...'ओके बाय।' गुडनाईट बोलने के बाद जब अपने प्लेटफॉर्म की ओर चला तो वो मुस्कुरा रहा था... शायद इसीलिए पलटकर नहीं देखा। प्लेटफॉर्म पर पंहुचने पर वो सामने वाले प्लेटफॉर्म पर खड़ी मुस्कुराती दिखी थी...

'द नैक्सट स्टॉप इज...' सबवे में चलते-चलते इस आवाज की वैसे भी आदत हो चली थी अब... वो सोच रही थी 'कितना सीधा लड़का है ! गुस्सा भी नहीं करता... कहीं सेंटी तो नहीं हो रहा ?'। और वो सोच रहा था... 'व्हाट द ** ! मैं कर क्या रहा हूँ? हमेशा ही लेट आती है...  हमेशा झूठे बहाने। सीधे-सीधे मना करने में उसका क्या जाता है? खुद बुलाकर भी लेट आती है... और मैं कुछ बोल क्यों नहीं पाया? कम से कम उसे पता तो चलना चाहिए कि मैं सोच क्या रहा था पौन घंटे। बस अब बहुत हो गया... आज घर पहुँच कर मैं नहीं कर रहा मेसेज।... उसकी जब मर्जी हो मैं तैयार रहूँ और मैडम को तो  फुर्सत कभी होगी नहीं... और खासकर जब मुझसे मिलना हो तब तो... उसे पता है मैं कितना बीजी रहता हूँ ! फिर भी...  हद हो गयी अब तो ! आज देखता हूँ वो मेसेज करती है या नहीं।'

अचानक किसी को बर्फ पर गिरता देखकर उसके मुंह से निकला... 'ओओओ उ उ उ ह'... उसे याद आया जब वो उस दिन गिरा था तब किसी ने हँसते  हुए कहा था  'गुड जॉब !'... सोचने की बीमारी उसको बहुत पहले से है। फिर सोचने लगा... 'ऊपर वाले की स्टॉप वाच कितनी सटीक है न... ! कुछ और दिन पहले मैंने शहर छोड़ दिया होता तो उससे प्यार नहीं हुआ होता और अगर कुछ और दिन रुक गया होता तो प्यार हो गया होता... इस प्यार हो जाने और नहीं हो पाने के बीच में जो कुछ भी संकरा सा है उसके बीच से ही कई जिंदगी निकलवा दे ये ऊपर वाला भी ! और क्या ठीक समय पर उसका स्टॉप वाच रुकता है? !'

'क्या सोच रहे हो?' एक खनकती आवाज कानों में पड़ी और फिर वापस लौटा वो उसी ठंड और सेंट्रल पार्क के गेट पर जहां खड़ा वो ये सब कुछ सोच रहा था।
'हाय ?! तुम्हारे जैसी ही एक लड़की की बातें सोच रहा था?'
'कौन है? बताओ? बताओ?'
'तुम्हें तो पता ही है कितनी लड़कियों को जानता हूँ मैं। फिर ये सवाल क्यों?'
'ओके। रहने दो। चलो अभी देर हो रही है... सॉरी मैं थोड़ा लेट हो गयी आने में।'
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आज नहीं गिरा वो... अब उसे ठंड भी उतनी बुरी नहीं लगती। आज रात को उसने मेसेज भी नहीं किया, करेगा या नहीं ऐसा सोचा भी नहीं।

...पिछली बार सोचा था मैसेज तो नहीं ही करेगा कुछ भी हो जाये... पर उस रात मैंने देखा था उसे... मुस्कुराते हुए मोबाइल पर कुछ टीप तो रहा था...

~Abhishek Ojha~


पोस्टोपरांत अपडेट: शिकायतें आई हैं कि ब्लॉग नहीं खुल पा रहा ! और मेरे यहाँ से खुल रहा है... समझ में नहीं आ पा रहा क्या समस्या हो सकती है. कोई बता सकता है क्या ?

Jan 29, 2011

विडंबना

अनावश्यक चेतावनी: पता नहीं जो मैं लिखने जा रहा हूँ उसके लिए विडम्बना सही शब्द है भी या नहीं।

दुनिया बड़ी अजीब है और वो सब भी होता है जो हम नहीं चाहते हैं। हमारे होने में जो बातें हुई उनका योगदान तो होता ही है पर उससे कम योगदान उन बातों का भी नहीं होता जो नहीं हो पायी। हम जैसे हैं वो कई बार उन बातों के कारण ही होते हैं जो ना हो पायी। 'यूं होता तो क्या होता?' क्या होता? इसका तो नहीं पता। पर हाँ इतना तो है कि अभी जैसा है वैसा नहीं होता। होने ना होने की बात पर मुझे कई छोटी-छोटी बातें याद आ रही है। बड़ी बातों का क्या?... छोटी बातें अपनी होती हैं (कभी-कभी मुझ जैसे लोगों तक भी पहुँच जाती है वो अलग बात है)। बड़ी बातें तो वैसे भी अपनी नहीं रह पाती सबकी हो जाती है Smile  ऐसी ही कुछ बातें जिनमें कहा और सोचा कुछ गया और निकला कुछ और ही।

पहली बात: सप्ताहांत पर वो मुंबई में था। बस 2 सप्ताह में वो भारत से बाहर जाने वाला था। बैंगलोर से फोन कॉल: 'कल आ सकते हो इंटरव्यू के लिए?' फ्री की फ्लाइट और दोस्तों से मिलने का लालच ! उसने हाँ कर दी। एक दिन की छुट्टी के लिए वही... बीमारी का बहाना। नौकरी वैसे भी नहीं चाहिए थी तो लगभग 25 हजार रुपये मुफ्त के उड़ाने और बैंगलोर में मस्ती करने के बाद अगली सुबह भागते-भागते बैंगलोर हवाई अड्डे पर पहुंचा तो अनाउंसमेंट हो रहा था 'दिस इस लास्ट अँड फाइनल कॉल टु मिस्टर...'। तुरत फोन किया दोस्त को 'अबे दो मिनट और लेट होता तो फ्लाइट छूट जाती सुन अभी नाम बुला रहे हैं मेरा एयरपोर्ट पर, पुणे पहुँच के फिर कॉल करता हूँ'। अभी तक सब चकाचक चल रहा  था। ...और मोबाइल पर उसके खडूस मैनेजर का नाम दिखा। '...उफ़्फ़! इसे चैन नहीं, सुबह-सुबह जाने ऐसा क्या हो गया ! तीन घंटे ही तो और हैं ऑफिस पहुंचने में'। फोन उठाया तो:

'..., कहाँ हो? कैसी तबीयत है अब? जल्दी करो नहीं तो फ्लाइट छूट जाएगी। मैं अभी-अभी बैंगलोर एयरपोर्ट पहुंचा तुम्हारा नाम सुनाई दिया तो सोचा बता दूँ तुम्हें। जल्दी करो' Smile

दूसरी बात: वही आदत... पता नहीं कहाँ खो जाता है, भागते -भागते सबसे आखिर में फ्लाइट में घुसा। सभी यात्री और एयरहोस्टेस उसे ही घूर रहे हैं। हर बार ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है, चलो क्या करना है इनके गुस्से का... फ्लाइट तो नहीं छूटी । मोबाइल स्विच ऑफ करने के लिए फोन निकाला तो उसका नाम दिखा। ना चाहते हुए भी हरा बटन दबाया और उधर से आवाज आई:

'क्या कर रहे हो? दरवाजा खोलो?' Madison Park 27 Jan
‘कहाँ हो तुम?’
’तुम्हारे दरवाजे पर। सरप्राइज़ की तो वाट लगा दी तुमने। पता नहीं क्या कर रहे थे, खोलो अब।'
'क्या? तुम मेरे फ्लैट के बाहर हो? ! मुंबई से कोई ऐसे आता है ? पहले बता नहीं सकती थी? हो जाओ फिर अच्छे से सरप्राइज़। मैं दिल्ली की फ्लाइट में बैठा हूँ, अभी बात भी नहीं कर सकता। लो इन्हीं से बात कर लो। दिल्ली पंहुचने के पहले ये मुझे अब किसी से बात नहीं करने देंगी'... और एयर होस्टेस की तरफ मुड़ते हुए उसने कहा: 'आई एम सॉरी, बस स्विच ऑफ ही कर रहा था कि ये फोन आ गया।' मोहतरमा आई थी सरप्राइज़ देने और...

तीसरी बात: एक इंटरव्यू में उससे पूछा गया '$^$^& कैसे करते हैं?' उसने गलत जवाब दिया। बाहर आकर पता चला गलत बोल आया। दो महीने बाद उसके टेबल पर एक रेज्युमे पड़ा था। मुस्कुराते हुए उसने फोन लगाया और पहला ही सवाल '$^$^& कैसे करते हैं?' वही गलत जवाब जो कभी उसने खुद दिया  था।... 'नो, दिस इस नॉट द राइट वे...' । वो उसी इंसान का इंटरव्यू ले रहा था जिसने दो महीने पहले उसका इंटरव्यू लिया था। द्निया बहुत छोटी है !

चौथी बात: पिछले दिनों अंजान शहर में ईमेल से हुई जान पहचान वाले व्यक्ति ने पूछा:

'तुम तो उसे जानते हो ना?'
'नहीं तो?'
'अरे ऐसे कैसे? उसने ही तो मुझे तुम्हारे बारे में बताया। बता रही थी कि मिली थी तुमसे किसी कॉन्फ्रेंस में। और थोड़ी बात भी की थी तुमसे। पर उसे लगा कि तुम थोड़े हाई-फ़ाई टाइप  हो।'
'क्या? अरे ऐसे कैसे सोच सकता है कोई मेरे बारे में। वैसे वो है कौन? कुछ और बताओ'
--------- 'कुछ और' पता चलने पर...
'अरे वो क्या? अरे यार! एक बार कुछ तो बोल के देखा होता उसने! मैंने तो उसके बारे में ठीक वैसा ही सोचा था जैसा उसने मेरे बारे में सोचा ! ट्रैजड़ी हो गयी ये तो'। हमेशा जैसा सोचा जाय वैसा कहाँ निकलता है कोई। पर दोनों ने एक दूसरे के बारे में वही सोचा... खैर...

पाँचवी बात: मैं अपने लैपटाप का केबल देख रहा हूँ, जब तक भारत में था अमेरिकी केबल था और आने के ठीक पहले खराब हुआ तो रिप्लेस कराकर जो लिया वो भारतीय है। उसकी किस्मत में बिना किसी और प्लग का सहारा लिए सीधे बोर्ड में लगना नहीं लिखा है !

बहुत बकवास हुई। और आपको कोई काम-वाम है कि नहीं? अब अपने-अपने काम पर लगते हैं Winking smile

आजकल यहाँ बहुत बर्फ पड़ रही है। तस्वीर में मेरे ऑफिस की बिल्डिंग है। 27 जनवरी की तस्वीर, फ्लिकर से उड़ाई हुई है।

~Abhishek Ojha ~