Feb 21, 2017

सैंयाजी के मालूम (पटना २१)


शनिवार की शाम... ऑफ़िस कॉम्प्लेक्स लगभग खाली हो चुका था. दिन भर भीड़ से भरी रहने वाली सीढ़ियों से उतरते हुए सन्नाटा अजीब सा लगा. जैसे किसी हॉरर फिल्म में पूरा शहर खाली कर लोग भाग गए हों. बाहर निकल कर मैं सड़क के किनारे टहलने लगा. मेरे पास वक़्त इसीलिए था क्योंकि बीरेंदर ने कहा था कि वो मुझे बाइक से छोड़ देगा और मुझे ऐसे मिली फ़ुरसत में इस तरह घूमना अच्छा लगता इसलिए मैंने उसे दुबारा फ़ोन नहीं किया.

चाय की दुकान अभी भी खुली थी पर चाय का मैं उतना शौकीन नहीं कि अकेले चाय की दुकान पर जाता। वैसे लत हो जाने वाला कभी कोई शौक मुझे हुआ नहीं. फिर मुझे आजतक ये भी समझ नहीं आया कि कुछ लोग अपने शौक को लेकर इतने स्पष्ट कैसे होते हैं कि चाय भी ये वाली, शक्कर इतना ही, फेवरेट कलर, फेवरेट मिठाई, फेवरेट इंसान… चाय के शौक़ीन तो ऐसे होते हैं कि गलती से किसी दिन चाय नहीं पी तो उस दिन सूरज नहीं ढलने देंगे लोग. यहाँ चाय लोगे या कॉफी हमारे लिए कठिन सवाल हो जाता है.

खैर… ऑफिस कॉम्प्लेक्स वाली बिल्डिंग से थोड़ी ही दूर बहुत चहल पहल थी. ठेले वाले, चाउमिन, गोल गप्पे, रिक्शा, बस, टेम्पो, गाड़ियाँ। इतनी चहल पहल कि मैं टकराने से बचते बचाते जा रहा था. आसपास की दुकाने देखते. हार्डवेयर स्टोर, पान की दुकान, सुपर स्टोर, सिंगार गृह, फैशन ही फैशन, सत्तू ठेला, फ्रेस जूस, बोर्ड पर दुकानदार के नाम के आगे लिखा प्रो., बोर्ड के नीचे स्टाइल में लिखा कलाकार का छोटा सा साइन - नीरज आर्ट. जिसमें न के ऊपर बड़ी ई की मात्रा मंदिर के ऊपर ध्वज सी लग रही थी. और आर्ट का र्ट क्षैतिज दिल. मैं टहलते टहलते मौर्य लोक पंहुच गया. लोग ही लोग. मैं अकेला ही भटक रहा था पर इतने विभिन्न तरह के रंग बिरंगे लोग दिख रहे थे कि बोर होने की गुंजाईश नहीं थी.

बीरेंदर का फ़ोन आया तो मैंने कहा कि मौर्य लोक आ जाओ.

‘पहिले बताये होते अभी हम उधरे से आये. सनीचर है त मंदिर चले गए थे’
बीरेंदर आया तो मैंने पूछा - ‘तुम मंदिर-वंदिर भी जाते हो? पता नहीं था.’

‘लीजिये, सनीचर के दिन मंदिर नहीं जाएंगे? माने अब भक्ति है या संस्कार उ हमको नहीं पता लेकिन कभी सोचबे नहीं किये कि काहे जाते हैं. आदत है. बैठिये एक ठो काम है उधरे से आप के छोर भी देंगे। एक ठो चिट्ठी बांचने जाना है”

‘चिट्ठी बाँचने? किसे पढ़ना नहीं आता? और चिट्ठी कौन लिखता है आजकल?’

‘आरे नहीं भैया, कोई सरकारी कागज होगा। चिट्ठी कहाँ आएगा अब. बैठिये बैठिये’

बीरेंदर ने बाइक आगे बढ़ाई और मंदिर की बात पर वापस लौटा जैसे चिट्ठी की बात आ जाने से अधूरी रह गयी बात को पूरा करना हो. बाइक पर लगने वाली तेज हवा से बीच में आवाज़ सुनाई नहीं देती पर मैं यूँ हुंकारी भरता और बीच बीच में हँसता जा रहा था जैसे सब सुन रहा हूँ...

‘उ का है भईया कि हमको याद ही नहीं कब से मंदिर जाते हैं त कभी सोचे भी नहीं कि काहे जा रहे हैं या जाना चाहिए कि नहीं. आदत जैसा हो गया है. केतना न चीज देखिये ऐसे ही हो जाता है. जैसे हम एतना न मंतर सुने हैं बचपन में कि सुनिए के केतना याद हो गया. कुछ पिताजी के पढ़ते सुनते थे आ बाकी पड़ोस के कन्हैया चचा भोरे भोर चालु हो जाते थे. न मतलब पता न ई कि उ का बोल रहे हैं. बस सुनते सुनते रटा गया. जो देखे-सुने उ सीख गए. केतना चौपाई को मुहावरा का तरह इस्तेमाल करने लगे बिना जाने कि किस ग्रन्थ का है आ कौन लिखा है. कभी बाहर कोई नया चौपाई सुनते त आके घर पर पूछते.. कई बार नहीं पता होता त ढूंढा जाता. अब लगता है कि भुला गए सब. मजेदार बात बताएं आपको एक ठो... केतना त कुछ का कुछ सोचते रहे हम बहुत दिन तक. ‘हरी ॐ तत्सत्’ का जगह ‘हरी ओम चकचक’ समझते थे. आ सान्ताकारम बुचक सेनम. बहुत बाद में पता चला कि बुचक सेना नहीं है. आ एक दू ठो तो आज तक पता नहीं चल पाया कि क्या था.’ बीरेंदर ने एक दुकान के सामने बाइक लगाई. पता नहीं मैंने हरी ॐ चकचक सही सुना या बीरेंदर ने कुछ और कहा पर बात समझ आ गयी.

‘आ जानते हैं.. पिताजी जिस सुर में पढ़ते हमको लगता वइसही पढ़ा जाता है. अब कहीं सुन लेते हैं आ धुन अलग हो त लगता है कि गलत गा दिया. - बिलोल बीच बल्लरी बिराजमान मुर्धनि. जैसे उ गाना नहीं है दिल से में 'पुंजिरीथंजी कोंजिकों मुन्थिरी मुंथोलि जिंधिकों वंजरी वर्ना चुंधरी वावे' माने वैसे ही. हमको थोड़े न सब बुझाता था. लेकिन उसी ओज में गा देंगे दो चार शब्द इधर उधर करके अगर कोई शुरू कर दिया तो.’

‘सही है. तुम्हे तो बहुत आता है फिर. बचपन की बातें याद रह भी जाती है. कुछ कविताएं मुझे भी वैसे ही याद है. बचपन का रटा दो और पंद्रह के पहाड़े की तरह याद रह जाता है. बाद का पढ़ा समझ भले आ जाये उन्नीस के पहाड़े की तरह होता है’.

‘ई त एकदम सही बोले आप. पंद्रह दूनी तीस तिया…' बोलते बोलते बीरेंदर रुक गया और... 'बनिकपुत्रं कभी न मित्रं, मित्रम भी त दगा दगी. कहाँ गए हैं रे बनिकपुत्रं? बुलाओ त जरा’ पहाड़ा छोड़ प्रणाम की मुद्रा में आकर बीरेंदर ने वहां बैठे लड़के से पूछा.

‘ऐसे थोड़े न बोलते हैं बुरा लग जाएगा।’

‘इसको बुरा लग जाएगा? ई बनिया थोड़े है इसके मालिक को बोले हैं. आ उ तो गर्वे करते हैं’ बीरेंदर ने हँसते हुए कहा.

‘आ भैया उ आप याद रखने वाला बात एकदम सही बोले’

‘कविता से क्या याद दिलाये दिए आप भी. ई सब बात छेड़ दीजिये त कोई ऐसा नहीं होगा जिसके चेहरे पर मुस्कान नहीं आ जाएगा. अब बात चला है त एगो और मजेदार बात बताते हैं आपको. छोटे थे हमलोग त रोज रात को लालटेन घेर के गोला में बैठ के पर्हते थे. कभी कभी तीन चार भाई-बहन. माने मौसी-मामा सब भी आते रहते थे. उसके बाद माने जे न नींद आता था. दम भर खेल के आते थे त नींद त एबे करेगा. नींद का काट एक्के था - लय में चिल्ला चिल्ला के कविता. आओ बेटा. आ जे न बड़ाई होता था. अरोस परोस का सब आदमी माने ऐसे बोलता था कि बीरेंदर केतना तेज लड़का है. केतना जोर जोर से पढता है. मेरा फेवरेट था - हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ. हम पालथी मार के अपना मुंडी गोल गोल घुमा के पढ़ते थे. ओहिमे नींद आता. मुंडी घूमते घूमते लुढ़क भी जाते थे.

... ढिमलाते…   आ गर्दन झटक के फिर गाने लगते - चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया; गिरी धम्म SSS से फिर, चढ़ी आम ऊपर, उसे भी झकोरा' 


...सोते सोते उसी में कैसेट फंसने जैसा आवाज भी होने लगता.. त उधर से पिताजी चिल्लाते. ऐ बिरेंदर सो रहा है का रे? त हम कुछ बोलने का जगह  और जोर से पढ़ते  - सुनो बात मेरी -  अनोखी हवा हूँ।  बड़ी बावली हूँ,  बड़ी मस्तमौला। हवा हूँ हवा… मैं बसंती हवा हूँ.  जे न बसंती हवा होता था आपको का बताएं. जब तक खाने का टाइम नहीं होता इहे चलता रहता. उ एक ठो अलगे टाइम था’

बीरेंदर ने ऐसे भाव और मुद्रा से सुनाया जैसे पूरा दृश्य सजीव हो गया हो. ये बातें सुन लगा कि हमें खुद कहाँ पता होता है कि ऐसी बचकानी बातों ने भी हमें वो बनाया होता है जो हम हैं.

बनिकपुत्रं (पता नहीं उनका असली नाम क्या था !) लिफाफा लेकर आये - ‘क्या महफ़िल छेड़े हो बीरेंदर? तनी देखो त ई का आया है’

‘बीरेंदर ने लिफाफा खोल कर पढ़ा - कुछ काम का नहीं है. प्रचार में भेजा है कंपनी वाला।’

‘फिर त बेकारे है. अंग्रेजी में था त हमको लगा कुछ जरूरी होगा।’
‘अब वापस काहे ला रख रहे हैं? लाइए इधर फेंकिए. माने ई सब बटोर के घर भर के का करेंगे?’
‘कागज कभी फेंकना नहीं चाहिए। क्या पता कभी कुछ जरुरत पड़ जाए’
‘अरे महाराज बटोरिये।लाटरी का टिकट है जो जरुरत पड़ जाएगा? ना आपका सीसी भरी गुलाब की पत्थर पे तोड़ दूं वाला परेम पत्र है. संभाल के रखना होता है ! रखिये। मर्हवा के टांग दीजिये’ बीरेंदर ने हाथ जोड़कर कहा।

‘भैया आप कभी चिठ्ठी लिखे हैं? माने किसी और के लिए? कोई बोल रहा हो और आपको लिखना हो. माने हम जैसे अभी बांचे वइसही लिखने का भी खूब काम किये हैं. उ एक ठो अलगे ज़माना था. चिट्ठी लिखे नहीं होते त ना तो हमको लिखना आया होता न पढ़ना। माने… मगही, भोजपुरी में सुनते आ हिंदी में अनुवाद करके लिखते।’

'चिट्ठियां तो बहुत लिखी पर किसी और के लिए तो नहीं लिखा' मैंने कहा.

'हम पहिला बार चौथा पांचवे क्लास में पढ़ते थे तब कोई बुलाया था चिट्ठी पढ़ने. आ हम जो न पढ़े हरहरा के. उ हमको बोले बौआ तनी धीरे धीरे बांचो. नंबर नहीं मिलेगा तेज बांचने का. फर्स्ट नहीं आना है. सामने वाले को समझ में आना चाहिए, थोड़ा महसूस करके पढ़ो - धीरे-धीरे। माने हमको त तेजे पर्हने में लगता था कि बड़ाई होगा. आज भी हम कुछ पर्ह्ते हैं त उहे बात याद आता है कि धीरे धीरे पर्हो नंबर नहीं मिलेगा तेज पर्हने का. तेज भी हर जगह  काम नहीं आता है. माने बताइये कोई आपको कहे कि नींद नहीं आ रहा त उल्टा गिनती गिनो सोते समय. आप फटाक से गिन दिए सैया, निनाबे, अंठानबे,... पांच, चार, तीन दो, एक आ उठ के बैठ गए कि नींद तो आया नहीं हम त सबसे तेज गिन दिए ! धीरे धीरे गिनने वाला कैसे सूत गया?.'

‘तुम्हें उस उम्र की बातें याद है?’

‘ई सब भूलने वाला बात है ? माने जब कोई अपने कलकत्ता वाले सैंयाजी के चिट्ठी लिखवाने बुलाती. लिख दो बौवा कि बाद सलाम के सैंयाजी के मालूम हो कि… शुरू में त बुझाया ही नहीं हमको ‘बाद सलाम के’ क्या?  ये ‘मालूम कि’ और ‘मालूम हो’ वाले डायलॉग... पर्हे लिखे हो न हो ये सबको आता था. जैसे आजकल फ़ोन उठाते ही 'हेलो' बोलना होता है. काहे बोलना होता है पूछियेगा त किसी को नहीं पता होगा। वैसे ही एक अलगे शब्दावली था चिट्ठी का. शुरू शुरू में हमें लिखना आता लेकिन ये शब्दावली नहीं। एक बार त जे न हुआ कि हमको एक ठो नयी नवेली दुल्हन का चिट्ठी लिखना था. दस साल का रहे होंगे हम. बोली कि बउवा लिख दे - सैंयाजी के मालूम कि उँहा खइह ईहां अंचSईह. हम को बुझाया ही नहीं कि लिखना क्या है. हम लिख दिया - वहां खाना यहाँ अंचाना। अंचाना माने हाथ धोना हमको पते नहीं था.'

'हा हा. पढ़ने वाला भी कंफ्यूज ही हो गया होगा कि करना क्या है'

'नहीं भैया कंफ्यूज क्या होगा। मुहावरा है. किताब से पहिले मुहावरा हम ऐसे ही सीखे। अनुवाद करना भी समझिये यहीं सीखे. एक ठो चिट्ठी होती जो सबके सामने बांचते घर भर के लोग बैठ के सुनते। और कभी कभी सीक्रेट बला भी बांचे हैं. लेकिन हम बिना सोचे पर्हते थे १०-१२ साल का उम्र में का बुझायेगा। छोटो को प्यार बड़ो को प्रणाम। सकुशल। आपकी कुशलता की ईश्वर से प्रार्थना। पूज्य, पूजनीय, सप्रेम। इति शुभम. … हम एक में से पढ़ते दूसरे में लिखते. फेंट फेंट के चिट्टी का एक्सपर्ट बन गए थे.

हमलोग बरा बर्हिया टाइम में पले बर्हे। कलकत्ता जाने वाली चिट्ठी में समझ लीजिये कि माताजी क्या लिखवाती, पिताजी क्या लिखवाते आ पत्नी क्या... धीरे धीरे हमको बुझाने लगा था रिश्ता उस्ता भी. अब कहाँ चिट्ठी और कहाँ पर्हने लिखने वाले. माने इतना तेजी से हमेशा बदलाव आता है कि हमीं लोग इतना कुछ देख लिए? पंद्रह पैसा के पोस्ट कार्ड से व्हाट्सऐप तक !  हमको लगता है पहिले ज़माना धीरे धीरे अपडेट होता था. ई फ़ोन के देखिये पता नहीं भीतरे भीतर दिन भर का अपडेट करते रहता है. हमारे खाने पीने के फ्रिकवेंसी से जादे इसका अपडेट होता है. ओहि गति से दुनिया भी अपडेट हो रही है.

खैर… हमरा नाम था चिट्ठी लिखने में. एक ठो नया दुल्हन का चिट्ठी लिखने गए थे. उसके ससुर बोले कि ‘ऐसा मत लिख देना कि उ पढ़ते ही चला आये. पता नहीं ऐसा क्या लिख देता है. अपना दिमाग भी लगाना होता है थोड़ा। समझे कि नहीं?’

हम पता नहीं उस समय हम क्या समझे पर लिखने का तरीका धीरे धीरे बदला और जब समझ आने की उम्र होने लगी त चिट्ठी लिखना बन्दे हो गया. चिट्ठी को फोन खा गया. आ पोस्टकार्ड, अंतरदेसी, टिकट के कुरियर.

‘सही कह रहे हो, वैसी चिट्ठी देखे तो एक ज़माना हो गया’  - मैंने धारा प्रवाह में बोल रहे बीरेंदर के बीच में बोला जैसे ये दिखाना हो कि मैं भी समझ रहा हूँ.

‘हाँ हम बटोर के रखे हैं कुछ. हमको त बहुत लगाव रहा चिट्ठी से. कैथी लिपि का पुस्तैनी चिट्ठी भी रखे हैं हम. बाबूजी दिए थे हमको. ईस्ट इंडिया कंपनी का स्टैम्प वाला। वैसे अब उ संग्रहालय आइटम हो गया है.’

‘फिर तो सही में देखने लायक होगा. वो होगा मढ़वा कर रखने का चीज’

‘वैसे कभी कभी लगता है कि सहेज के रखने से बर्हिया आजे का ज़माना है. डिलीट मार दिए ख़तम. नहीं त खुशबू में बसे खत गंगा में बहाने का जद्दोजहद हो जाता था शायर सब के.’

हम वापस चलने लगे तो बीरेंदर ने बाइक स्टार्ट करते हुए कहा - ‘आ एक ठो सबसे मजेदार बात तो बताना ही भूल गए. पाता कई लोग बड़ा संभाल के रखते थे जैसे कोई खजाना हो. गाँठ खोल के निकालते - कलकत्ता, सूरत, लुधियाना, बम्बई का पता. चुमड़ाया  हुआ कागज. कभी पुराना लिफाफा जिसमें प्रेषक लिखा होता, कभी किसी ठोंगे पर लिखा हुआ, दफ़्ती पर लिखा हुआ. साक्षरता थी नहीं और ऊपर से अभाव ! चिट्ठी लिखने अपना कॉपी कलम लेकर जाना पड़ता। कई बार हम पते को नए कागज पर उतार कर दे देते. बड़ा आशीर्वाद देते उसके लिए भी लोग । और एक बार एक चाची पता बोल कर लिखा रही थी. ग्राम, पोस्ट, जिला सब लिखाने के बाद बोली - हुहें पान के गुमटिया प दिन भर बैठे रहते हैं.

हम भी लिफाफा पर पता के साथ लिख के आ गए - पान के गुमटिया पर दिन भर बैठे रहते हैं.

बहुत दिन तक ये बात सोच कर लगता कि हम भी क्या बकलोल थे… और आज देखिये कैसे चाव से सुना रहे हैं. यही है नोस्टाल्जियाने का ...   आ ऐसा नहीं है कि लोग एक दूसरे से दूर थे उस जुग में. अब भले व्हाट्सऐप वाले नहीं सोच सकते कि कैसा रहा होगा। चिट्ठी और मोबाइल में माने वही अंतर है जो फेसबुक और कॉफ़ी हाउस आ चौपाल में मिलने में ! व्हाट्सऐप आ इन्टरनेट टूल है. टूल से थोड़े दिल जुड़ता है. पहिले चुमड़ाये कागज में लोग पता संभाल के रख लेते थे अब फ़ोन में नंबर रह के भी  एक दूसरे से नहीं बतिया पाते हैं. का कीजियेगा यही सब है. '

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~Abhishek Ojha~

Nov 30, 2016

न चोरहार्यं न च राजहार्यंन...


मैं लगभग कैशलेस इंसान हूँ. मुद्राहीन - चैन से रहने वाला !*
(*शर्ते लागू)

पिछले कई सालों से कभी मेरे जेब में नोट या सिक्के रहे हो... और वो भी एक दिन से ज्यादा के लिए - मुझे याद नहीं. यात्राएं अपवाद रही. इस अपवाद के दिनों में नोट को लेकर कई अनुभव हुए (जिंदगी में लोग हो या घटनाएं अपवादों का बहुत महत्त्व है - इस पर फिर कभी). कुछ अनुभव सामान्य लेकिन याद रह गए. वैसे तो मुझे बहुत कुछ याद नहीं रहता लेकिन कुछ बातों में कुछ बात होती है जो याद रह जाती है. 'नोट' सामयिक बात है तो ऐसी ही कुछ याद रह गयी बातों से कुछ नोट्स

दृश्य १: (पटना)

उन दिनों मैं एटीम से पांच हजार रुपये निकालता, जब-जब जेब में पांच सौ से कम हो जाते.* जिस दिन की बात है उस दिन मेरे पास छुट्टे नहीं थे और मुझे अपने कपडे वापस लेने थे. दुकानदार ने कहा - "अरे ले जाइए. आपका कौन सा एक दिन का है. फिर त ऐबे करियेगा. तब दे दीजियेगा. कहाँ रहते हैं? नया आये हैं इधर?" मैंने कभी खाता नहीं लिखवाया. पर ये बात कभी भूल नहीं पाया. पहली बार मैंने कपडे दिए थे उस दूकान पर. कुल ढाई महीने के लिए था मैं उस शहर में, रोज का जाना नहीं था मेरा. और कोई मुझे बिना मांगे उधार देने को राजी हो गया था.

जो कह रहे हैं कि... नोट की कमी से किसानों की बुवाई नहीं होगी मुझे नहीं समझ उन्होंने किस तरह के भारत को देखा है ! एक तो किसान की बुवाई में लाखों रुपये नहीं लगते. फिर बीज बेचने वाला, ट्रैकर वाला... ट्रैक्टर का तेल बेचने वाला. सबको एक दुसरे के साथ ही उठना बैठना होता है. सब एक दुसरे के यहाँ खाते हैं और सबके यहां सबके खाते चलते हैं. अगर आपको लगता है कि विमुद्रीकरण से किसी का खेत बंजर रह गया होगा तो पता नहीं आप किस हिन्दुस्तान में पले बढे हैं ! शायद आपको लगता है कि खेती और फैक्ट्री का प्रोडक्शन एक ही बात है. और जिन्हें लग रहा है कि कुछ दिन ५०० और १००० के नोट नहीं रहने से बार्टर सिस्टम हो गया है. उन्हें एक बात बता दें... दुनिया में कभी भी शुद्ध वस्तु-विनिमय (बार्टर सिस्टम) रहा ही नहीं. भरोसा रहा. उधार रहा. और वो हमेशा मुद्रा से ज्यादा चलन में रहा. आज  भी है. सालभर कोई आपको आपकी जरुरत का सामान दे और साल में एक बार या दो बार जो आपके पास है वो आप उसे दे दें- इसे वस्तु विनिमय नहीं कहते. भरोसा कहते हैं या उधार (डेट). ये दुनिया में मुद्रा के आने के बहुत पहले से है. पर बाते ये है कि जिन्होंने कभी गाँव देखा ही नहीं वो गाँव वालो की समस्या से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं.

*दो लाइने लग रहा है कंप्यूटर प्रोग्राम है. :)
इफ (मनी_इन_जेब < ₹५००){
विदड्रा ₹५०००
}


दृश्य २: (बलिया)

मेरे हाथ में ₹५०० के कुछ नोट थे. किसी ने मुझसे कहा  - "क्यों लहरा रहे हो? ढेर पैसा हो गया है? रुपया दिखाने का चीज नहीं होता है. कोई ठाएँ से मार देगा तो आज ही सब काम हो जाएगा. गंगाजी भी बगले में हैं".
"इतने से रुपये के लिए?"
"इतने से? पैसठ रूपया का कारतूस आता है. सौ रूपया के लिए भी कोई मारेगा तो पैंतीस रूपया का शुद्ध मुनाफा. जोड़-घटाव आता है कि नहीं?"

इस पर कोई टिप्पणी नहीं.

दृश्य ३: (स्विट्ज़रलैंड)

आपको लगेगा कि जरूर कोई राजनितिक बात करने जा रहा है. सारी बातें बना कर बोल रहा है, ज़माना ही वही है. तो २००५ में घटी एक घटना, जो २००८ में पोस्ट की गयी थी - ब्लॉग्गिंग वाले दिनों की पोस्ट है - यहाँ जाकर बांचा जाय - वो लोग ही कुछ और होते हैं ... (भाग II)

दृश्य ४: (रोम)

कॉफ़ी का बिल और साथ में रखा नोट उठाकर  पुनः वापस रखते हुए वेट्रेस बोली  - "इत इज ब्यूयूयूऊऊतीफुल ! बट नोत यूरो माय फ्रेंड" मुझे कुछ समझ नहीं आया कि बोला क्या उसने. और मैं वैसे हँसा जैसे... कुछ ढंग से नहीं सुनाई देने पर या समझ में न आने पर हम फर्जी ही ही करते हुए मुस्कुराते हैं. और वैसे ही मुस्कुराते हुए मैंने धीरे से हिंदी में पूछा - 'क्या बोल रही है? ले क्यों नहीं गयी? बीस का नोट ही तो रखा है'
"ये बोल रही है कि यूरो नहीं है. फिर से देखो तुमने क्या रखा है".

 
हमारे पास एक छोटा सा बैग है. पासपोर्ट रखने भर का. उसमें बची खुची विदेशी मुद्रा पड़ी रहती है. वो तभी निकलता है जब कहीं पासपोर्ट लेकर जाना होता है - माने अंतरराष्ट्रीय. वापस आकर फिर वैसे ही रख दिया जाता है. भूले भटके, मज़बूरी में जिन नोट और सिक्को को देखना हो... क्या समझ में आएगा किस देश की चवन्नी-किसकी अठन्नी, क्या यूरो-क्या फ्रैंक !. हमने यूरो की जगह स्विस फ्रैंक रख दिया था. गांधीजी पहचान में आते हैं और वाशिंगटन, हैमिल्टन, लिंकन धीरे धीरे आ गए है. बाकी सब बिन पढ़े थोड़े पता चलेगा. एक रुपये के नोट का बॉम्बे हाई या पांच रूपये के नोट वाली ट्रैक्टर थोड़े न है कि जीवन भर के लिए छप जाएगा दिमाग पर. (वैसे नोटों की खूबसूरती/डिजाइन और जारी करने वाले देश के विकसित होने में क्या संबंध है ये भी एक रिसर्च की बात हो सकती है. लेकिन खूबसूरती आते ही परिभाषित करने की समस्या आ खड़ी होती है. खूबसूरती न सिर्फ देखने वाले इंसान की आँखों में होती है वक़्त के साथ उन आखों का नंबर भी बदलता रहता है!).

दृश्य ५: (सेंटोरिनी)

एक और पुरानी पोस्ट पढ़ा जाए. वैसे कैश इतना बुरा भी नहीं है. देखिये कैसी कैसी बातें हो जाती हैं छुट्टा न होने से. - ग्रीक म्यूजिक.

दृश्य ६: (न्यू यॉर्क)

बात उन दिनों की है जब हम नए नए अमेरिका में आये थे. बिल था $८.२५. मैंने दस डॉलर का नोट दिया और साथ में २५ सेंट का सिक्का. मतलब अब आदत थी तो थी. और ये तो फर्ज बनता है कि छुट्टा आपके पास है तो सामने वाले का काम आसान बनाइये. ₹४१० देना है तो सामने वाले को ₹५०० की जगह ₹५१० दीजिये. इतना गणित तो सबको आता है. पर यहाँ न टॉफ़ी पकडाते हैं न उन्हें छुट्टे का खेल समझ आता है -
काउंटर पर खड़ी लड़की ने ऐसे देखा जैसे... किसी महामूर्ख अजूबे को देख रही हो. "व्हाई वुड यू गिव मी दिस?" अमरीकी चवन्नी दिखाते हुए उसने मुझसे पूछा.
"आई थोट.... हम्म.. सॉरी" मुझे लगा अब इसको समझाने का क्या फायदा कि व्हाट आई थोट और कैसे करना होता है लेन देन. न ही वो ज्ञान इस देश में किसी के काम आता. लम्बी कहानी अलग होती. अजीब भी लगा कि इस देश में इतनी साधारण बात नहीं पता लोगों को ! उसने मुझे वापस एक मुट्ठी सिक्का पकड़ा दिया. एक एकसेंट लौटा देते हैं लोग ! और हर चीज की कीमत डेसीमल में ही रखेंगे. शुरू के दिनों में इतने सिक्के जमा हो जाते और सिक्के किसी को देने में गिनने का झंझट. ये झंझट मेरे कैशलेस होने के पीछे का सबसे बड़ा कारण था.

..आजकल अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का हवाला देकर जो कुछ भी किसी के मन में आये लिख दे रहे हैं वे सारे सिद्धांत ऐसी ही मूलभूत बातों पर आधारित है. जिनमें से कई भारतीय परिवेश में लागू नहीं होते. उनके तर्क आपको सही लगेंगे पर... जिन बातों को आधार बनाकर वो तर्क देना चालु कर पूरा लेख लिख मारते हैं. जिसे पढ़कर आपको लगता है अरे इतना बड़ा आदमी इतने बड़े बड़े सिद्धांतों की बात कर रहा है.. उसकी बात अगर आप ध्यान से पढ़ें तो पता चलेगा सिर्फ राजनितिक कचरा है ! किसी का भी  लिखा हो उसे दिमाग लगाकर पढ़िए - हाल फिलहाल में जितना पढ़ा ये बात और दृढ होती गयी. इतनी गलत बातें ! अखबार में लिखने और टीवी पर एक्सपर्ट बने सभी विशेषज्ञ निष्पक्ष नहीं होते. विशेषज्ञ तो खैर शायद ही होते हैं. उनके पूर्वाग्राह आपसे बड़े हैं. उनका एजेंडा भी. आँखे खोल कर दुनिया देखना सीखिए. आप किसी को ८.२५ की जगह १०.२५ देकर गलत नहीं कर रहे. ज्यादातर तथाकथित बुद्धिजीवी विशेषज्ञों को पता ही नहीं ये कैसे काम करता है और वो आपको मुर्ख कह दे रहे हैं !

दृश्य ७: (राँची)

"आपको सुखी कहते हैं? आपको ज्यादा पता है कि हमको? अमीर कहते हैं सेठ-मारवाड़ी को ! आप जैसे लोगों को नहीं. आपके कहने से हम आपको अमीर कह देंगे और मान लेंगे कि आपको कोई तकलीफ नहीं है?"

सड़क के किनारे हाथ देखने वाले और साथ में अंगूठी बेचने वाले ज्योतिषी ने एक आदमी को बिल्कुल डांटने वाले अंदाज में कहा था. उस आदमी का गुनाह ये था कि... अंगूठी बेचने वाले की बतायी गयी बात "आप तकलीफ में तो हैं..., आपकी आमदनी से ज्यादा खर्चा हो रहा है. और आप दिल के तो बहुत अच्छे हैं लेकिन लोग आपको समझ नहीं पाते हैं. गरीबी आपको परेशान कर रही है" के जवाब में उसने कह दिया - "नहीं, ऐसा तो नहीं है. हम तो बहुत सुखी हैं. भगवान का दिया सब कुछ है". मैं तब ग्यारहवीं में पढता था. और ये बात मैंने इतने लोगों को सुनाई है कि मैं क्या मुझे जानने वाले कई लोग भी ये बात नहीं भूलेंगे. वे दिन थे कि पैदल चलते चलते कहीं रुक कर ऐसी बाते सुन लेते. कभी भटकिये ऐसे... बहुत मजेदार बातें सीखने को मिलेंगी :)

तो.. ये विशेषज्ञ ऐसे ही हैं. अगर आप कहेंगे कि आपको तकलीफ नहीं है तो वो आपके मुंह में ठूस कर उगलवा लेंगे कि आपको तकलीफ है. वो विशेषज्ञ हैं कि आप? आप कौन होते हैं फैसला करने वाले कि आपको तकलीफ है या नहीं? आप कैसे बता सकते हैं कि आपके लिए क्या अच्छा है? बस यही हो रहा है और कुछ नहीं. आप खुद सोचिये और फैसला लीजिये. क्यों अंगूठी बेचने वाले के चक्कर में पड़े हैं. अखबार वाला भी अंगूठी ही बेच रहा है. टीवी वाला भी. चलिए वो तो कुछ बेंच रहे हैं... पर वो जो उनके कहे को ब्रह्मसत्य मान तर्क पर तर्क दिए जा रहे हैं. व्हाट्सऐप पर फॉरवर्ड किये जा रहे हैं उनका क्या?

गाइड सिनेमा में जब राजू के पास एक व्यक्ति रोजी के हस्ताक्षर लेने आता है... वो सीन याद है आपको?
राजू: 'तो मार्को रोजी के जेवरात हडपना चाहता है?'
'जी नहीं, बल्कि वो तो चाहते हैं कि... सारे गहने रोजी को ही दे दिये जाएँ.'
राजू: 'तो मार्को ये दिखाना चाहता है कि वो बहुत अमीर है" (संवाद अक्षरशः नहीं है, बात याद रह गयी संवाद भूल गया)

दोनों ही निष्कर्षों में गलत तो कुछ नहीं है! पर उदहारण का मतलब ये है कि विशेषज्ञ ऐसे ही देखने लगे हैं दुनिया. वो फैसला कर के बैठे हैं मुद्दा जो भी हो. सामाजिक विज्ञान के बारे में हमारे एक सांख्यिकी के प्रोफ़ेसर कहा करते कि - "सोसिओलोजी के हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट आकर बोलते हैं. सर, एक बहुत अच्छा पेपर लिखा है. कोई अच्छा सा मॉडल बताइये जो उस पर फिट हो जाए. डाटा है बस एक अच्छा मॉडल चाहिए.क्वांटिटेटिव हो जाएगा तो आराम से छप जाएगा और थोडा वजन भी आ जाएगा." खैर इस बात को कहने से जो बात आपके दिमाग में आई वो तो आप समझ ही गए होंगे? आप बोलिये किस बात पर किस पक्ष में लिखना है. हम लिख देते हैं - आंकड़ा, सिद्धांत सब फिट करके।**

बात चली थी कैशलेस होने के फायदे से और कहीं और निकल गयी. खैर शीर्षक से याद आया - कोई भी और धन विद्याधन तो कभी नहीं हो सकता. लेकिन... कैशलेस होने से.. वो क्या है कि..  विद्या के कुछ गुण तो उसमें आ ही जाते हैं जैसे विदेश में इन्सान की बंधु - न एक्सचेंज रेट की समस्या न कमीशन की, न ही अनजान मुद्रा पहचानने-गिनने की (वैसे आपके पास अच्छे वाले कार्ड न हो तो बैंक कमीशन  लेते हैं), धन जिसे कोई चुरा नहीं सकता, राजा नहीं ले सकता, उसका भार नहीं होता और उसका कभी नाश नहीं होता... विद्याधन पर ये सारे श्लोक तो आपने पढ़े ही होंगे?. डिजिटलधन के लिए भी सही है.*

दिमाग अच्छे कामों में लगाइए...अन्यत्र हमने कहा कि दिमागी व्यायाम होना जरूरी है सोच अच्छी रहती है.
बाकी तो भावना अच्छी हो तो दुनिया खुबसूरत ही खुबसूरत है. जाकी रही भावना जैसी -

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~Abhishek Ojha~

पुनश्चः एक और बात - आजकल लोग लिखना शुरू करते हैं - मेरी काम वाली बाई, मेरा  ड्राइवर, मेरा दोस्त, मजदूर, मेरा पलम्बर, किसान फिर बताते हैं कि उसे विमुद्रीकरण से कितनी तकलीफ है. पढ़े लिखे लोग आजकल ऐसे ही बात करते हैं. संभवतः ऐसे लोगों को खुद कभी कोई परेशानी नहीं होती, खासकर जब पैसे की बात हो. काम करने वाले और गरीब लोगों को क्या आप इंसान नहीं समझते? वो क्या बेवकूफ हैं? अशिष्ट हैं. हमें लगता था दासप्रथा अंत हुए कुछ साल हो चुके हैं - आपके ड्राइवर? खैर हमें व्यक्तिगत रूप से न तो ड्राइवर रखने का अनुभव है न काम वाली बाई का. पर जो शुरू ही ऐसे करते हैं उनकी बात आगे क्या पढ़ी जाए ! आप बताएंगे कि उनको तकलीफ है क्योंकि उन्हें खुद नहीं पता? और आपको कोई तकलीफ नहीं?... उनके पास इफरात में ५०० और १००० के नोट हैं जो ख़त्म ही नहीं हो रहे, ये कह कर आप गरीब का अपमान नहीं कर रहे? और आपके पास तो कुछ था नहीं? और उनको तकलीफ है तो मदद करने की जगह आप उसे ट्वीट करते हैं? अंगूठी बेचने वाले विशेषज्ञ! - जो कह रहा है मुझे कोई तकलीफ नहीं उसे तो जीने दो. मेरी मानो तो गया चले जाओ - बहुत स्कोप है. वहां मुर्दे को भी तकलीफ में दिखा देने वाले लोग होते हैं :)

**पता चला किसी ने खुले में शौच के समर्थन में लेख लिख दिया. उसके बाद लगा अपने इस स्टेटमेंट पर भी स्टार लगा देना चाहिए. मुझमें उतनी योग्यता नहीं. :)

Oct 2, 2016

एथेंस (यूनान ४)


किसी नई जगह जाने पर सबसे पहले वो बातें ध्यान में आती हैं जो बाकी जगहों से थोड़ी अलग होती हैं. उन बातों से फ़टाफ़ट किसी देश के बारे में धारणा बनानी चाहिए या नहीं वो तो पता नहीं  पर...

चर्च, सुट्टा और राष्ट्रीय झंडा  ग्रीस में ये तीनों बाकी देशों (जितनी दुनिया हमने देखी है) की तुलना में ज्यादा दीखते हैं - हर जगह. और एक बात अलग लगी वो है रेस्टोरेंट में आप आराम से बैठे रहिये. किसी को जल्दी नहीं होती ...न आर्डर लेने की ना बिल लाने की. जब तक आप खुद बुला कर ना बोलें. बिल आता है... रोल करके, छोटे से शॉट ग्लास में, टोकरी में या ऐसे ही किसी चीज में. छोटी सी बात है पर अलग होती है तो ध्यान में आ जाती है. देश भी इंसानों की तरह होते हैं - संस्कार कह लीजिये या अदा ! एथेंस में एक और बात अजीब लगी वो ये कि देर रात बच्चे पार्क में खेलते मिल जाते। जब डिनर का टाइम होना चाहिए तब शाम की कॉफ़ी का टाइम होता। जब सब कुछ इतनी रात ख़त्म होता तो स्वाभाविक है सुबह सब कुछ देर से शुरू होता। मुझे किसी की बतायी एक जापानी मान्यता याद आयी..  जिसके अनुसार सूर्य से सृष्टि चलती है. जीवन चलता है. इसलिए सूर्य का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। हर सभ्यता में सूर्य की पूजा की जाती रही है.  और सूर्य की पूजा मंदिर में नहीं होती सूर्य के साथ अपने को एकाकार कर होती है... जिस सभ्यता में लोग सूर्योदय के बाद उठते हैं वो सूर्य का अपमान करते हैं. सूर्य को पैर नहीं दिखाना चहिये। एक जापानी वर्ग ऐसे लोगों के साथ व्यापार नहीं करते थे जो देर से सोकर उठते। मान्यता भले अंधविश्वास हो लेकिन कहने का मतलब ये कि - ग्रीस इस मामले में जापान नहीं है. वैसे कुछ दिन रह कर किसी देश के बारे में कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए। पर लोगों की तरह देश भी आलसी और देर से उठने वाले तो हो ही सकते हैं?

ग्रीक इतने सपाट जवाब देते हैं कि कई बार (कम से कम बाकी यूरोप के तहजीब की तुलना में) थोडा रुखा लग सकता है.  जैसे -

"कैन वी हैव ग्रीक कॉफ़ी?"

"ग्रीक कॉफ़ी?  इट्स नॉट गुड. इट्स फॉर ग्रीक पीपल. यू विल नॉट लाइक. ट्राई फ़िल्टर कॉफ़ी ऑर कैपेचीनो" मैंने सोचा भाई ये अजीब है. मुझे अच्छी नहीं लगेगी तो नहीं दोगे?  (फ़िल्टर कॉफ़ी से मद्रास ही दिमाग में आता है उसके अलावा यहीं सुना). वैसे बाद में लगा सही ही कहा था उसने. मुझे पसंद नहीं आई ग्रीक कॉफ़ी. जो है वो मुंह पर ही बोल देते हैं.

झंडे और सुट्टे का तो पता नहीं। पर चर्च का ऐसा है कि ईसाई धर्म का 'इस्टर्न (ग्रीक) ऑर्थोडॉक्सी' सम्प्रदाय ग्रीस का सवैधानिक धर्म है. (अगर आपको लगता है कि पूरा यूरोप संवैधानिकली धर्मनिरपेक्ष है तो ऐसा नहीं है). रोमन कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट और ईस्टर्न ओर्थोडोक्सी इसाई धर्म के तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं. ये विभाजन धार्मिक कम राजनितिक ज्यादा थे - रोमन, बीजान्टिन साम्राज्य और मार्टिन लूथर से बने. आगे बात करने पर ये पोस्ट इसाई धर्म के इतिहास की क्लास लगने लगेगी. वैसे घुमने का ये सबसे बड़ा फायदा होता है - क्रैश कोर्स हो जाता है इतिहास का. कुछ देखकर, कुछ सुनकर बाकी पढ़कर. मजेदार गाइड मिल जाए तो मिर्च मसाले के साथ. खैर हम अभी इतिहास के इस कोने में नहीं जा रहे.

एथेंस ऐतिहासिक जगह है. वैसे इतिहास में जिस स्वर्णिम काल के लिए एथेंस का इतना नाम है वो बहुत कम समय के लिए था. सौ साल से भी कम. ऐसे समझ लीजिये कि एथेंस सौ साल से भी कम पाटलीपुत्र  रहा बाकी समय पटना. वैसे निष्पक्ष विश्व इतिहास पढ़ें तो पता चलेगा कि एथेंस-स्पार्टा का इतिहास और उससे प्रेरित ३०० फिल्म वगैरह वगैरह में वर्णित गौरव बहुत हद तक पश्चिमी इतिहासकारों का पक्षपात है. हर पैमाने पर इससे अच्छी, सभ्य और विकसित सभ्यताएं संसार में अन्यत्र रही. उस काल में भी और उससे पहले भी. पर इतिहास ऐसे लिखा गया कि... जैसे - बारबेरियन का मतलब था वो कोई भी जो रोमन या ग्रीक भाषा न बोलता हो. वास्तव में भले वो हजार गुना सभ्य रहा हो - कहते हैं कि बारबेरियन शब्द बना ही ऐसे कि... जिनकी भाषा सुनकर समझ में न आये. सुनने में  - बार्ब-बार्ब-बार्ब लगे वो हो गया बारबेरियन - असभ्य. उसी तरह ग्रीक-रोमन गौरव काल की अच्छाई वालीं बातें बढ़ा चढ़ा कर लिखी गयीं. उस समय की सैकड़ों कुरीतियों को नजरअंदाज करते हुए. इतिहास लिखने (और पढने) का तरीका आने वाले समय का बहुत कुछ निर्धारित करता है ! ... वैसे हम भी पश्चिमी इतिहासकारों का लिखा इतिहास ही पढ़ते हैं. खैर हम अभी इतिहास के इस कोने में भी नहीं जा रहे.

इतिहास जानने से बहुत कुछ सीखने को मिलता है. जो जगह आज जैसी है वैसी क्यों है. वहां के लोग, उनकी सोच और उनकी मान्याताएं। जगहों के चरित्र उनके इतिहास से बनते हैं. क्यों जगहों के हजारों सालों के इतिहास में 'वो भी क्या ज़माना था' वाले कुछेक साल ही बस हर जगह देखने को मिलते हैं. बाकी जगहों की कोई चर्चा ही नहीं मिलती। अगर ज्यादा नहीं सोचना है तो किसी शहर में बिकने वाला सूवनिर किस काल से आता है देखकर समझ लीजिये वो उस शहर का गौरवशाली काल था - एथेंस में एक्रोपोलिस, रोम में कोलोसियम, फ्लोरेंस में डेविड, वेनिस में मास्क, न्यू यॉर्क में एम्पायर स्टेट और लिबर्टी।

एथेंस और डेल्फी के खंडहर की बात करने से पहले  बात करते हैं एक कम प्रसिद्द जगह की. एथेंस में सुकरात की जेल के नाम से जानी जाने वाली एक लगभग अज्ञात सी जगह है. एक पहाड़ी पर गुफा जैसी. विश्वप्रसिद्ध एक्रोपोलिस से थोड़ी ही दूर. पेंड़ों के बीच - उपेक्षित. स्वाभाविक उत्सुकता थी उस जगह पर जाने की. थोड़ी मुश्किल से ढूंढते ढूंढते मिली. वहां जाकर पता चला कि - ये स्थानीय लोगों की बस एक मान्यता है कि सुकरात को यहाँ स्थित एक जेल में रखा गया होगा. पर ऐतिहासिक प्रमाण कुछ नहीं है... जितना है वो उल्टा ये है कि ये जगह सुकरात की जेल नहीं रही होगी. भूले भटके कुछ लोग पंहुच जाते हैं. हम ये सोचते लौट आये कि.... यहाँ ऐसी कोई बात नहीं लिखी होती तो हम थोडा ज्यादा सोचते और खुश होते। इस बोर्ड को यहाँ से हटा देना चाहिए. सुकरात ने ही कहा था - “The only true wisdom is in knowing you know nothing.”. खैर इस जगह से एक्रोपोलिस का अच्छा व्यू दीखता है.

एक्रोपोलिस  - देख कर लगता है. क्या अद्भुत मंदिर रहा होगा ! वास्तुकला, इतिहास, इंजीनियरिंग. देखने के पहले हम काल्पनिक मॉडल देख आये थे म्यूजियम में - आलिशान. पर वहां जाते हुए अब कहीं से मंदिर जाने वाली अनुभूति नहीं आती. अब सिर्फ खंडहर है. कितना कुछ बदल देता है वक़्त. हमें कभी महसूस नहीं हो सकता जैसा यहाँ आने वालों को कभी हुआ करता होगा. ना उन दिनों किसी ने सोचा होगा कि कभी एक दिन ऐसी हालत होगी उस आलिशान मंदिर की. अब मंदिर वाली भावना की जगह ये ध्यान आता है कि बनाया कैसे होगा. बिना विकसित गणित-कंप्यूटर के सिविल इंजिनियर काम कैसे करते होंगे? वगैरह वगैरह. और ये कि कैसे एक सभ्यता ने दूसरे का बेरहमी से विनाश किया। वैसे कुछ चीजों को पुनर्जीवित करने के प्रयास अच्छे लगे. जैसे एक थियेटर हैं जिसे फिर से इस हालत में लाया गया है जहाँ अब भी वहां कलाकार परफॉर्म करते हैं.

एथेंस - एथेना देवी के नाम पर बना शहर है. उल्लू प्रतीक-विजय-ज्ञान-बुद्धि की देवी यानि सरस्वती-लक्ष्मी-काली जैसी देवी। अनगिनत समानताएं।

एथेंस का ज्ञात इतिहास सिर्फ २५०० सालों में बिखरा है. अगर एक पैराग्राफ में नाप लेना हो तो कुछ यूँ होगा -

एथेंस २५०० साल पहले एक साधारण महाजनपद (शहर-राज्य) था. जिसे ईपू ५००-४८० में फारसी बादशाह ने ध्वस्त किया. पर उसके बाद फारस के खिलाफ युद्ध में एथेंस कई ग्रीक महाजनपदों का नेता बना.  ईपू ४५०-४०० का काल - स्वर्णिम काल. फारसियों पर विजय के बाद एक्रोपोलिस बना. वहां एथेना देवी की विशाल मूर्ति बनी. हम जो भी पढ़ते हैं वो अधिकतर इसी काल से आता है. कला-थियेटर-वास्तु-सुकरात-प्लेटो-एक्रोपोलिस-पार्थेनन-गणित-दर्शन-वगैरह. उसके बाद ईपू ३३८ में सिकंदर ने जीता. ईपू १४६ में रोमन साम्राज्य ने. पर जीतकर वो यहाँ की संस्कृति से प्रभावित ही हुए, उसे अपनाया और बाकी दुनिया में फैलाया भी. रोमन साम्राट कॉन्सटेंटाइन ने जब ईसाई धर्म को मान्यता दी और खुद भी धर्म परिवर्तन कर लिया। उसके बाद पेगन के नाम पर उस समय तक के सारे मंदिर या तो चर्च बन गए या तोड़ ताड़ दिए गए. पार्थेनन चर्च बन गया. सारे पेगन प्रतीक मिटा दिए गए. उधर रोमन साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हुआ और इधर एथेंस पर 'बारबेरियन' हमले. एथेंस ४७६ ई के बाद एक हजार साल तक बीजान्टिन साम्राज्य के अधीन रहा (इसी काल में इस्टर्न ऑर्थोडॉक्सी यहाँ हमेशा के लिए जम गयी). बीजान्टिन यानी पूर्वी रोमन साम्राज्य जिसकी राजधानी थी कुस्तुन्तुनिया (आज का इस्ताम्बुल). १४५३ में जब कुस्तुन्तुनिया का पतन हुआ तब अगले ४०० सालों के लिए एथेंस तुर्कों (ओटोमन साम्राज्य) के अधीन रहा. कुस्तुन्तुनिया का पतन (बीजान्टिन के लिए) कहिये या कुस्तुन्तुनिया विजय (ओटोमन के लिए). ...स्कूल में कुछ चीजें ऐसी थी जिन्हें पढ़ कर या सुनकर बहुत मजा आया. जैसे पंद्रह का पहाडा ! आपने पढ़ा है तभी जान सकते हैं क्या स्पेशल होता है उसके बारे में - पंद्रह दूनी तीस तियान पैतालिस... वैसे ही था 'कुस्तुन्तुनिया का पतन'. नौवी के इतिहास में था. Fall of Constantinople पढ़ के भी क्या पढ़े होते ! 'कुस्तुन्तुनिया का पतन' सुन कर लगता था कुछ भारी भरकम बढ़िया सी चीज पढ़ रहे हैं ! खैर... तो यही था मोटा-मोटी एथेंस का इतिहास. एक्रोपोलिस पर एक के बाद दूसरी सभ्यता ने अपना कब्ज़ा किया. पार्थेनन पैगन मंदिर से मिटाकर चर्च, चर्च मिटाकर मस्जिद, उसे मिटाकर संग्रहालय और यूनेस्को हेरिटेज बना. वहां की सबसे अच्छी मूर्तियाँ और पत्थर कोहिनूर गति को प्राप्त हुए. यानी अब ब्रिटिश म्यूजियम लन्दन में पड़े हुए हैं. ग्रीक जिसपर अपना हक़ और वापस लाने की बात करते रहते हैं. [ब्रेक्जिट नहीं हुआ होता तो कुछ उम्मीद भी होती :)]. १८२१ में ग्रीक में आजादी आन्दोलन/क्रांति हुआ.. वैसे इस आजादी के बाद लोकतंत्र नहीं आया. लम्बे समय तक राजशाही रही. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नाज़ी कब्ज़ा... फिर मार्शल प्लान.  (मुझे नहीं पता बाकी लोगों को कितना अच्छा या पकाऊ लगा होगा ये पढ़ना. तो एक पैराग्राफ में बात ख़त्म.)


अब एथेंस का केंद्र है सिंतागमा स्क्वायर. जो एक साथ ग्रीस का संसद, धरना के लिए जंतर मंतर और अमर जवान तीनो है. नो डिसृस्पेक्ट पर वहां जैसे ड्रेस में गार्ड खड़े होते हैं - फैंसी ड्रेस लगता है (अगर मैं नौटंकी कहने से अपने को रोकूँ तो). वैसे वो बहुत ही अच्छी मद्धम चाल और भाव भंगिमा में अपनी जगहें बदलते हैं. माने बहुत ही अच्छा. एक और जानकारी - उनके ड्रेस में ४०० चुन्नट होते हैं. तुर्कों के हर एक साल की गुलामी के लिए एक चुन्नट.

डेल्फी... खुबसूरत जगह पर है. पहाड़ों में बसा. अच्छी चढ़ाई होती है. ऐसा लगा जैसे ओरेकल (पुजारन कह लीजिये) ने जान बुझ कर बनाया होगा ऐसी जगह कि कठिन चढ़ाई कर वही आ सकें जिन्हें सच में श्रद्धा/उत्सुकता हो. फिर वहां खड़े खड़े एक बार को जरूर ये ख़याल आता है कि कैसे घोड़े पर या पैदल थके-हाँफते एथेंस, स्पार्टा, ओलंपिया वगैरह से लोग पहाड़-घाटियां पार करते आते होंगे अपना भविष्य जानने. बहुत मुश्किल होता होगा तब आना.

लिखते लिखते लगता है बहुत इतिहास लिखा गया... डेल्फी में अपोलो का मंदिर था. और साथ में उन दिनों पूजे जाने वाले कई देवताओं के मंदिर. एक थियेटर और खेलों का एक प्रसिद्द स्टेडियम. (ओलंपिक की तरह यहाँ पिथियन  गेम्स होते थे). रोमन जमाने में एक रोमन अगोरा। पर इस जगह को सबसे अधिक प्रसिद्धि दिलाई ओरेकल और अपोलो  के मंदिर ने. ओरेकल यहाँ की पुजारन होती थी. मंदिर प्रांगण में एक जगह धुंआ जैसा कुछ निकलता जहाँ बैठकर वो भविष्यवाणी करती. माने साधारण भाषा में कहें तो गांजा जैसे कुछ फूंक के बता देते रहे होंगे। एक समय ऐसा था कि कोई भी राजा बिना ओरेकल से सलाह लिए बिना फैसला नहीं करता था. क्या और कैसे इस पर बहुत कहानियाँ और थियरिस  हैं.

पुराने जमाने में ग्रीक ये भी मानते थे कि डेल्फी दुनिया का केंद्र है. इसीलिए वहां पर अपोलो का मंदिर बना. कहते हैं कि दुनिया का केंद्र पता करने के लिए जीयस ने दुनिया के दो छोरों से दो बाज उडाये. एक ही समय पर, विपरीत दिशा में, एक ही गति से. [अपने युग का विज्ञान !] दोनों बाज जहाँ मिले वहां से जीयस ने एक पत्थर फेंका. वो पत्थर जहाँ गिरा वही हुआ संसार का केंद्र और वहां बना अपोलो का मंदिर !

खैर... पोस्ट अपनी लम्बाई को प्राप्त हुई. लिखने के पहले लगता है क्या लिखें... लिखना शुरू करो तो जो बात लिखनी थी उसके पहले ही पोस्ट पूरी हो जाती है. ना ना करते इतना इतिहास ही लिख गए. अपोलो के मंदिर के स्थान पर जो वर्णन लिखा हुआ है उसमें लंबी सी कहानी के अंत में ये भी लिखा हुआ है कि पत्थरो पर सात ऋषियों के ज्ञान का सार लिखा हुआ था - γνῶθι σεαυτὸν - "know thyself". और μηδὲν ἄγαν- 'Nothing in excess'. बात तो सुनी हुई लगी. सप्तर्षि  एक ही रहे होंगे?


एक बात कुलबुला रही थी दिमाग में. ग्रीस में हमें लोग समझाते कि वॉलेट सामने की जेब में रखना. मैं अभी कहीं और गया था वहां भी लोगों ने यही कहा. मैं सोच रहा था पश्चिम के पॉकेटमार बिलकुल ही पगलेट होते हैं क्या? सलाह देने वाले सबको पता है सिर्फ उन्हें नहीं पता कि आजकल लोग वॉलेट कहाँ रखते है? गया-मुगलसराय जाके ट्रेनिंग लेनी चाहिए उन्हें !

लोगों से की गयी बातों वाली पोस्ट ज्यादा रोचक होती है. इतिहास सुनाने की चीज है तभी अगर कोई सुनने वाला हो. लिखते हुए बार बार लगता है कौन पढ़ेगा? ! पोस्ट लिखने में न्याय नहीं हो पाता। सुनाने में पता होता है सुनने वाला कितने चाव से सुन रहा है... सुनाने में फिर वही चाव आ जाता है.

और... आप जो करते हैं वो नहीं कर रहे होते तो क्या करते के जवाब में बहुत कुछ आता है दिमाग में. उन्हीं में से एक 'टूर गाइड' बनना भी बहुत दिलचस्प लगता है. पर फतेहपुर-सिकरी, आगरा में शेर सुनाने वाले टूर गाइड याद आते हैं तो लगता है हममें ना तो वो हुनर है न वो करना चाहते ! आपने झेला है तो आप जानते हैं :)

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~Abhishek Ojha~