May 22, 2013

हम दुबेजी बोल रहे हैं !

 

"हैलो सर ! हम मेरु कैब से दुबेजी बोल रहे हैं" जिस सम्मान और गर्व के साथ दुबेजी ने अपना नाम लिया मन किया कहूँ - "दुबे जी प्रणाम !"

नाटे कद के काली-सफ़ेद दाढ़ी और लंबे बाल वाले दुबेजी  "हरी ॐ" और "शिव-शिव" करते हुए 12.30 की जगह एक बजे पहुँचे।

"बताइये न मीटर ऑन करना भी भूल गया ! घोडा घास की दोस्ती हो गयी ये तो" थोड़ी देर बाद दुबेजी ने मीटर ऑन करते हुए कहा।

"कुछ बोल नहीं पायी आज ये... इसका ताम-झाम थोड़ा गड़बड़ हो गया है नहीं तो बड़ा बढ़िया बेलकम करती है। अपना मेरु कंपनी का बड़ाई करती है अच्छे से।" - दुबेजी ने मीटर की ओर इशारा किया।  "कल इसको ठीक कराना पड़ेगा। हैंग हो गया है... पैसा जोड़ देगी लेकिन रसीद नहीं निकलेगा। लेकिन आपको चाहिए तो आप कस्टमर केयर पर फोन कर दीजिएगा ईमेल में आ जा जाता है आजकल। आपको कोई असुविधा नहीं हो तो पहले ही बता दिया हमने"।

"कोई बात नहीं चलिये"

"इतनी रात को आप क्यूँ चले? कोई रास्ता पूछने के लिए भी नहीं मिल रहा था मुझे। 12 के पहले निकल लेते तो नाईट चार्ज भी बच जाता आपका। किस रास्ते से ले चलें ?"

"रास्ता आप देख लीजिये। मुझे आइडिया नहीं है... जिधर से कम समय लगे ले चलिये। नाईट चार्ज का क्या करें... आने का प्लान तो जल्दी ही था लेकिन लेट हो गया। बात करते करते पता ही नहीं चला"

"हो जाता है..." उसके बाद दुबेजी भजन गाने लगे... "मेरा आपकी दया से... "

"आप अपनी गाड़ी में बाजा लगवा लीजिये" मैंने कहा।

"बाजा के लिए कंपनी का मनाही है। पहले बाजा होता था। लेकिन बहुत कस्टमर कम्पलेन करने लगा कि एक्सिडेंट हो जाता है। सही बात भी है कुछ ड्राइवर जोश वाला होता है... खासकर बीस से तीस एज का नौजवान का जो है गरम खून होता है। उसमें भी कोई वैसा सवारी लड़की जनाना हो तो... अच्छा फैसला है कंपनी का"

जौनपुर के दुबेजी मेरु के पहले मुंबई में पीली-काली पद्मिनी टैक्सी चलाते थे। उन्होने गाड़ी रोक चाय का निमंत्रण दिया और  हम चाय पीने चले गए। वहाँ कुछ लोग बात कर रहे थे कट्टरपंथी लोगों की तो दुबेजी ने कहा - "देखिये ऐसा है कि नशा ऐसा कि... जैसे इश्क़ में सिनेमा दिखाओ चाहे भजन एक ही बात दिखता है वैसे ही कट्टरपंथी को भी बस अपना बात ही दिखता है। और बेवकूफ ऐसा कि सब्जी लेने भी जाये और मोल भाव में कहे कि 10 रुपये नहीं आठ रुपये। और सब्जीवाला अगर कह दे कि नहीं साहब 5 रुपये में ले जाओ तो भी वो कहेगा कि नहीं मुझे आठ रुपये में ही चाहिए !"

चाय पर ही उन्हें पता चला कि मैं बैंक में काम करता हूँ। तो उन्होने पूछा कि - "केशियर हैं कि कलर्क?"

मैंने बताया कि कुछ इनवेस्टमेंट से जुड़ा काम होता है। पहले उन्हें थोड़ी सहानुभूति हुई कि "प्राइवेट" नौकरी है पर फिर उन्होने मामला संभाला - "सर हम बताएं? इनवेस्टमेंट तो बस समय, जगह और भाग्य का खेल है... मेरे हिसाब से सही समय पर सही जगह प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट कर दीजिये भाग्य चल गया तो... इससे अच्छा कुछ नहीं है। बाकी आप लोग अब जो करते हों।" उन्होने एक लाइन में मेरी नौकरी का कच्चा चिट्ठा खोल दिया और असहमति का सवाल ही नहीं था !

"वैसे एक बात बताएं सर? एक नंबर पर जो है वो बैंक का ही नौकरी होता है। वो क्या है कि... पैसा मिले न मिले दिन भर रहना तो पैसे के बीच में ही होता है। अब कोई नौकरी तो पैसे के लिए ही करता है न? संतोष हो जाता है पैसा देख देख के। और दो नंबर पर जो है वो है मास्टर। कोई कितना भी बड़ा जज-कलक्टर बन जाये अपने शिक्षक के सामने तो सर झुकाएगा ही। है कि नहीं?  और तीन नंबर पर जो है...  तीन नंबर... देखिये न... जबान से ही उतर गया... तीन नंबर ? क्या था?..." अंत तक तीन नंबर जबान पर आ ही नहीं पाया दुबेजी के।

इस बीच दुबे जी ने कहा - "जा! देखिये न ध्यान ही नहीं रहा और रास्ता लग रहा है गलत ले लिया मैंने" दुबेजी ने गाड़ी वापस ले ली और हम वापस चाय की दुकान पर आ गए। "ऑटो वाले को पता होगा रुकिए पूछते हैं"। उन्होने कहा तो मैं सोच रहा था कि रास्ता तो टैक्सी वाले को भी पता होना चाहिए पर कुछ कहा नहीं... मीटर देखा और मन ही मन सोचा कि दुबेजी ने कम से कम सौ रुपये मीटर तो बढ़ा ही दिया रास्ते के चक्कर में।

"एलएनटी तो यही है देखिये न आपका होटल यहीं कहीं होगा। गया कहाँ?" इस बार रास्ता सही था और होटल वहीं था जहां उसे होना चाहिए। "यहाँ आपके कंपनी ने रखा है?" मैंने कहा हाँ तो दुबेजी ने कहा - "तब बढ़िया कंपनी है।"

उतरने पर दुबेजी ने कहा "सर आप उतना ही किराया दीजिये जितना देते हैं। बीच में गलत रास्ते का कम कर देते हैं"

मैंने कहा - "कोई बात नहीं। आपने जानबूझ कर गलत रास्ता नहीं लिया था। आपकी गाड़ी तो चली ही और मुझे पता भी नहीं कितना किराया होता है।"

दुबेजी ने 100 रुपये लौटाते हुए कहा - "आपको जल्दी थी फिर भी आपने चाय के लिए हमें समय दिया उसके लिए धन्यवाद और हम नाजायज पैसा नहीं लेते। आपसे मिलकर हमें बहुत अच्छा लगा।"

दिल्ली का एक ऑटो वाला... "पैसा क्या लेना यार मैं तो घर जा रहा था लिफ्ट समझ लो"  और मुंबई के दुबेजी... यूंही याद आ गए आज :)

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~Abhishek Ojha~

Mar 14, 2013

स्पेशली मेड फॉर...

 

6-8 महीने पहले जोश में आकर नए जूते लिए गए - स्पेशली मेड फॉर रनिंग।

पहली बार पहना तो अच्छा सा लगा। लगा सच में दौड़ने-भागने के लिए ही बनाए गए हैं। बचपन में हमारे मुहल्ले के एक चाचा जब  नयी नवेली रिलीज हुई हीरो होंडा स्प्लेंडर पर पहली बार बैठे तो उन्होंने अपने बेटे से कहा था - "बेटा, ये वाली मोटरसाइकिल खरीद दे मेरे लिए। चलाकर ऐसा लगा मानो कम से कम पांच साल तो जवान हो ही गया मैं !" उतना तो नहीं पर वैसा ही कुछ फील हुआ। पर सर्दियों का मौसम और आलस... जूते पड़े ही रहे। कभी पहना भी तो कंक्रीट, कारपेट, ट्रेडमिल और लकड़ी के फर्श  के अलावा कहीं और रखे नहीं गए। कभी मिट्टी से संपर्क नहीं हो पाया उनका। वैसे भी न्यूयॉर्क में एक 'मिट्टी पर चलना' छोड़ दें तो सब कुछ बड़ी आसानी से मिलता है। जूतों का रंग रूप वैसे का वैसा चकाचक बना रहा !WP_20130309_002[1]

पिछले सप्ताहांत जब धुप निकली और एक मित्र भी मिल गए तो पार्क तक जाने का कार्यक्रम बन गया । रास्ता कंक्रीट का ही था। पर हुआ कुछ यूँ कि सैंडी देवी के प्रकोप से लकड़ी का एक पूल टूट गया था वो अब भी निर्माणाधीन ही है। अब हमें या तो बहुत लम्बा रास्ता लेना पड़ता या... मिट्टी, घास, पानी, कीचड़ और बर्फ वाला छोटा रास्ता। रास्ता क्या था... हमें ही बनाना था। हम कोई नवाब तो हैं नहीं तो हमने रौंद दिया।

अपना क्या है... हम तो कैसे भी रह लेते हैं  ! बचपन में बरसात के बाद कभी खेत की मेढ़ों पर चलते तो काली मिट्टी पैरों में यूँ लिपटती थी की... खैर वो फिर कभी। फिलहाल हम बहुत खुश थे लेकिन जब जूतों की तरफ देखा... मेड फॉर रनिंग ! बनाए ही गए हैं इस दिन के लिए. सब कुछ झेलने के लिए - ढेर सारे रिसर्च के बाद। जैसे क्रमिक विकास के बाद हमारे और अन्य जानवरों के शरीर प्रकृति के अनुकूल होते हैं कुछ वैसे ही।  पर बेचारों के रंग रूप और हालत देख दया आई। कोई शिकायत नहीं ...'स्पेशली मेड' तो थे ही और ऐसा भी नहीं कि टूट गए या चलने में दिक्कत हुई हो। लेकिन ऐसा लगा कि दस दिन ऐसे पहन लो या गलती से कहीं अगर पहन कर गाँव के इलाके में चले जाओ तो बैरीकूल कहते - "इ सब जूता के बस का नहीं है यहाँ झेल पाना। इ सब उहें पहनियेगा" । जब से बने चकाचक शोरूम के एसी में पड़े रहे।  बिक जाने के बाद भी शान में कुछ कमी तो हुई नहीं। पहली बार जमीन पर पड़े थे... बिकने के पहले तो खैर जूते होते हुए भी हाथो हाथ ही लिए जाते थे! खुद को भी पता नहीं रहा होगा कि पैरों में रहने के लिए बनाए गए हैं! बेचारे जूतों की क्या गलती ! किस्मत ही ऐसी पायी ...मैंने अपने मित्र से कहा - "यार, मेरे जूतों को ऐसी जमीन पर चलने की आदत नहीं है। इनकी हालत देखी नहीं जा रही मुझसे"  Smile.  ...जूते अगर मेरी सोच सुन रहे होते और बोल सकते तो पक्का गरिया देते कि साले हम तो बने ही इसी के लिए हैं... कोई और जानवर  कहे तो समझ में आता है लेकिन तुम इंसान? ! दिमाग में ये जवाब आया तो वो खुद शांत हो गया । इंसानी दिमाग है... न बोलने वाले से भी बुलवा लेता है. और पता नहीं क्या क्या ऊटपटाँग सोचता रहता है ।Smile

इंसानी दिमाग... चला गया कुछ साल पहले जब हम पुणे में रहा करते थे। कभी कभार हम कुछ झोपड़ियों में बच्चों को पढ़ाने चले जाते और कभी कोंकण के ऐसे समुद्री तटों पर जहाँ उन दिनों केवल बीएसएनएल का नेटवर्क आता था - यानी हमारे मोबाइल नहीं चलते। हमारे साथ अक्सर ड्यूड-ड्यूडनी प्रजाति के भी लोग होते - उन जूतों की तरह ही स्पेशली मेड फॉर लिविंग ऑन अर्थ ! पर रनिंग-रनिंग ते सौ गुनी... का फर्क भी होता है न। कुछ जूते मोची के यहाँ सिल पड़े होते हैं... रफ। सुना है किसी जमाने में पहनने के पहले  सरसों तेल में डूबा के रखना होता था... ऐसे भी जूते होते थे। और 'स्पेशली मेड' तो खैर देखा ही है !

हमारे साथ वाले अक्सर कहते कि - इन झोपड़ियों और गाँवों में रहना कितना सुकून भरा होता है न। कितनी अच्छी किस्मत है इन लोगों की... सब कुछ प्राकृतिक ! पोल्यूशन नहीं ...सुकून की जिंदगी... कोई झंझंट नहीं... हेवेनली ! वॉव ! ...वगैरह वगैरह। मुझे सारी बातें तो याद नहीं पर आपके पास भी इंसानी दिमाग है... आप यहाँ कुछ 'वगैरह' खुद जोड़ सकते हैं. Smile
मैं और मेरे एक बनारसी दोस्त कुछ कहते तो नहीं पर आपस में हम बात जरूर करते कि एक बार ऐसे रहना हो तो इन्हें पता चले। हमें लगता कि उन्होने वास्तविकता देखी ही कहाँ है ! उन्हें तो उन जूतों की तरह पता भी नहीं होता कि ....खैर ... खेतों में लगी फसलें न पहचानने वालों का हम मजाक उड़ाते हुए कह देते कि अरे गेंहू तो फैक्ट्री में बनता है। आप माने न माने एक दिल्ली के लड़के ने मानने से इनकार कर दिया था कि गुड (गुड़) मिल में नहीं बनता ।

वैसे हमारे और उनमें कोई फर्क तो होता नहीं था... सब साथ जाते, एक जगहों पर रहते। बनाए गए तो वो भी हैं हमारी ही तरह कहीं भी रहने को... पर उन जूतों की तरह - "झेल न पायेंगे ! " वाली बात लगती। ऐसा नहीं कि मेरे जूते झेल नहीं पाएंगे पर ... उनका रंग रूप देखा नहीं जाता :)

हम दोनों अक्सर बात करते कि हम दोनों में से किसने ज्यादा देहाती जीवन देखा और जीया है। खैर हम तो सबकी तरह यही सोचते रहे कि बाकी क्या रह पायेंगे ऐसी जगहों पर और अपना क्या है... हम तो रह ही लेंगे। एक ऐसे ही दिन कोंकण में कहीं हम गाडी के अन्दर बैठे जा रहे थे। सड़क पर एक भैंस जा रही थी तो गाडी धीरे करनी पड़ी। ... भैंस ने सर झटका और मैंने फ्रंट सीट पर बैठे बैठे अपना सिर झटक कर किनारे कर लिया। कार का सीसा बंद था। मेरे बनारसी मित्र ने तुरत कहा - "ओझा ! यही गाँव में रहे हो? ! आज पता चल गया कितना रहे हो।" Smile

बाकी इसके बाद हमने डिफेंड किया ही होगा... आप समझ ही गए... इंसानी दिमाग आप भी रखते हैं !

हम अपने को लेकर बहुत कुछ सोचते हैं... दूसरों को लेकर भी। पर दूसरों की तो छोडिये अपने बारे में भी कहाँ पता होता है कि हम क्या हैं ! वैसे जो गरीबी, झोपड़ी, गाँव वगैरह को देख... हेवेंली और वॉव ! कहते है... मैं उन्हें अब भी 'स्पेशली मेड फॉर' की श्रेणी में ही रखता हूँ - वो झेल न पायेंगे :)

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~Abhishek Ojha~

Feb 18, 2013

नए जमाने के विद्वान (पटना १६)

 

एक दिन शाम बीरेंदर ने कहा - "चलिये भईया आज थोड़ा घूम-टहल के आते हैं, चाय तो रोजे पीते हैं। आज गांधी मैदान साइड साइड चलते हैं। बिस्कोमान भवन के पास भी जूस वाला सब ठेला लगाता है।" हमें कोई ऐतराज तो होना नहीं था अभी थोड़ी दूर ही चले थे कि सदालाल सिंग दिखे। बैरी ने हमेशा की तरह उनकी चुटकी ली और मुझसे बोला - "एकरा बारे में तो आप जानिए रहे हैं। ई जिस कटेघरी का सायर है उसी कटेघरी का आजकल बिदवान-बिसेसज्ञ भी होता है।"

"फेसबूक-ब्लॉग पर लिखने वालो की बात तो नहीं कर रहे? " मैंने तुरत पूछा।

"आप धर लिए भईया। वईसे फेसबूक-ओसबूक तो सब भरल है अइसा आदमी से लेकिन ओइसा आदमी हर जगह है। अइसा अइसा बिदवान कि कुछ का कुछ, माने कुछ भी  बोल सकता है। फूल कन्फ़िडेंस में.... आ अपने हिसाब से उ गलत भी थोड़े होता है। "

"अपने हिसाब से माने?"

"अब देखिये। हमारा गाँव का एक ठो लरका दिल्ली गया था काम करने। लौट के आ रहा था त उ सुना होगा किसी को इलाहाबाद स्टेसन पर बतियाते कि वहाँ से गया जाने का कोई डायरेक्ट गारी है। त हुआ का कि एक दिन गाँव में कोई बात कर रहा था गाया जाने का त उ बोलता है कि - इलाहाबाद चले जाओ वहाँ से सीधा सुपर फास्ट मिलेगा गया का। अब उ त सहीये कह रहा है। आ गाँव वाले को भी लगा कि लरका दिल्ली रह के आया है उसको त सुपर फास्ट भी पता है त सहिए कह रहा होगा ! हो गया सदालाल सिंग ब्रांड बिदबान ! आ उसी में जिसको पता है कि पटना से गया जाना है तो... समझ गए न आप ? साला उ इलाहाबाद का करने जाएगा ?"

"हा हा हा , यार तुम इतना सॉलिड एक्जाम्पल देते हो कि अब क्या कहें..."

"आरे नहीं भईया हसने का बात नहीं है। सच्ची बात है। कसम से ! बना के नहीं बोल रहे हैं। आजकल नया जमाना का अइसा अइसा बिदवान हो गया है। जानते हैं पहिले हम टीबी बड़ा ध्यान से देखते थे लेकिन धीरे धीरे हमको बुझाया कि जो जेतना जादे टीबी पर दिखता है ओतने बड़ा सादलाल सिंग ब्रांड बिसेसज्ञ होता है। देखिये हम जादा पर्हे लिखे नहीं है लेकिन जब उ सब अर्थबवस्था आ ग्लोबल बारमिंग जैसा सब्द बोलता है न त हमको एकदम कीलियरे दिखता है कि उसको कुछों नहीं आता है। हम गारंटी से बोल सकते हैं कि उ सब से जादे तो सदालाल सिंगवा को सायरी आता है। आ टीवी का तो का कहें...  हिंहे खरा हो के  सब जो रोज बोलता है 'पटना ब्यूरो'... हम नहीं जानते हैं उ सब को... साला अइसा अइसा भी है कि मजबूरी में बिसेसज्ञ बन गया है सब... और कुछ करने लायक हइए नहीं था... "

"मजबूरी में विद्वान और विशेषज्ञ बन जाना तो अल्टिमेट है बीरेंदर ! गज़ब है। "

"अल्टिमेट नहीं भईया, अब हम त आप जानबे करते हैं कि केतना मजा लेते हैं।  एक दिन मेरा मुहल्ला में सब कोई टीबी पर पैनल डिस्कसन देख के बतिया रहा था क्राइम पर। अर्थसास्त्र, राजनीति, साहित्य ये, वो, सिनेमा कुछों कारन दे रहा था। हम एकदम सिरियस होके बोल दिये कि कल एक ठो इन्टरनेट पर आर्टिकल पढे हैं कि ग्लोबल बारमिंग सबसे बरा कारन है क्राइम का... आ मजा का बात देखिये किसी को नहीं लगा कि हम मज़ाक कर रहे हैं। सबको लगा कि बीरेंदरवा सही में पढ़ा होगा इंटरनेट पर। आधे को इंटरनेट नहीं पता था बाकी सब को ग्लोबल वरर्मिंग। आ शुरू में एक दू ठो को मज़ाक लगा पर बाद में सब सीरियसली सुनने लगा ! जाम के समझाये भी हैं हम। आ सही भी है जो उ सब टीबीया पर बोलता है उससे हम कम सच थोरी बोले थे? त जो टीबी पर आता है उसब को त सब सीरियसली लेगा ही। उ बात अलग है कि कोई समझदार हमको सुना होता त या त हमको थपरिया देता नहीं  त अपना मूरी पटक के मरिए गया होता।"

"हा हा यार कह तो बिलकुल सही रहे हो पर कुछ सही में विशेषज्ञ भी तो होते ही हैं।"

"हाँ लेकिन आपको एक और मजेदार बात बताते हैं उसमें से बहुत सारा जो है उसको लगता है कि उ सच में बिदवान है। अब धीरे धीरे बिदवान का माने ही यही हो रहा है। जब छोटे थे तो सक्तिमान देख के हम लोग उंगुली घूमा के लगता था उड़िए जाएँगे हावा में उहे हाल ई विदबान सब का भी  है। हवा में उंगुली घूमा के अपना आप को सक्तिमान बुझता है।"

"यार इस मामले पर तो तुमसे लंबी बात हो सकती है" मैंने कहा।

इसी बीच बीरेंदर को जानने वाले कोई ठीकेदार मिले। तीन चार लोगों के साथ वो रिवोल्विंग रेस्टोरेन्ट डिनर करने जा रहे थे। बीरेंदर ने कहा "बरी माल कमाए हो, चलो हम भी आते हैं थोरी देर में" ।  थोड़ी देर उनसे बीरेंदर ने बात की तो बात बदल गयी। और पता नहीं कहाँ से बातें "वाद" पर आ गयी। बहुत सी बातें हुई। उन लोगों पर जो हर बात में अपना 'वाद' ही देखते हैं। सामने वाला चाहे जो कहे। सारे तर्क और सिद्धांतों का नाम देते हुए, जिनका उनकी कही गयी बातों से कोई लेना देना तक नहीं होता। बैरी ने बताया  कि 'विद्वान' और 'वादी' होना भी एक प्रोफेशन हो चला है –फैशन और स्टाइल।

इन्हीं संदर्भों में एक उदाहरण उसने दिया था - "भईया, हमारे साथ एक ठो लरका पर्हता था। उ बस एक मगरमच्छ पर निबंध रट लिया था आ कुछो आ जाए परिछा में उहे लिख के आता था। एक बार आ गया महात्मा गांधी पर लिखने को । हम खुश हुए कि साला इस बार देखते हैं का लिखता है । बाहर आए त उ बोला कि साले इसमें क्या है ! गांधीजी सुबह नदी किनारे घूमने जाते थे तो नदी में उनको मगरमच्छ दिखबे करेगा ! आ फिर लिख आया उ मगरमच्छ पर... ओइसही है आजकल का जादेतर बिदवान-बिसेसज्ञ आ वादी सब"।

फिर हम थोड़ी देर के लिए रिवोल्विंग रेस्टोरेन्ट भी गए। वहाँ किसी को फोन पर जोश में चिल्लाते हुए सुना था - "कब तक आओगे बे तुम लोग, बरी मजा आ रहा है, जल्दी पहुँचो हम लोग गोलघर क्रॉस कर रहे हैं"।

मेरी मुस्कुराहट देख बीरेंदर ने समझाया कि वो झूठ नहीं बोल रहे हैं जब आए होंगे दूसरी तरफ होंगे अब घूम कर इधर आ गए हैं तो उन्हें गोलघर और गंगा किनारे का व्यू दिख रहा है उन्हें Smile वो सच में गोलघर क्रॉस कर रहे थे !

(पटना सीरीज)

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~Abhishek Ojha~