Aug 24, 2016

ग्रीक म्यूजिक (यूनान ३)


यादें धुंधली पड़ती जाती हैं. अच्छी-बुरी सब. कुछ यादें स्थायी जैसी होती तो हैं - पर स्थायी नहीं. कुछ उड़ते समय अवशेष छोड़ जाती हैं - रसायन में जिसे अवक्षेप कहते हैं - प्रेसिपिटेट. जिन बातों के होते समय लगता है कि ये अनुभव तो कभी नहीं भूल सकते - सवाल ही नहीं उठता ! ... वो अनुभव भी धुंधले हो ही जाते हैं - एवरी एक्साइटमेंट हैज अ हाफ लाइफ !  

कई बार खुद की डायरी में लिखे नोट्स पढ़ते हुए लगता है कि लिखना क्या चाहा था? लिखावट उतनी बुरी भी नहीं कि खुद का लिखा न पढ़ पाएं पर लिखते समय अक्सर बस एक दो शब्द लिख जाता हूँ...  क्योंकि उस समय तो ऐसा लगता है जैसे ये घसीट कर लिखे हुए शब्द देखते ही सब कुछ आँखों के सामने घूम जाएगा. पर बहुत दिन बीत जाए तो कई बार खुद ही नहीं जोड़ पाता उन शब्दों को !  डायरी पलटा तो  "ग्रीक म्यूजिक? :)" सिर्फ इतना ही लिखा है एक पन्ने पर. पर ये दो शब्द बहुत हैं याद दिलाने को कि हुआ क्या था. वैसे यात्रा में जो बुरे अनुभव होते हैं वो याद रह जाते हैं कोई बचकानी हरकत, कोई समस्या, शर्मिंदगी, फँस जाना - वगैरह. ऐसी बातें हर यात्रा में होती हैं. और जैसे जिंदगी का हर सपना पूरा हो जाने के बाद ओवररेटेड लगने लगता है, वैसे ही हर उलझन से निकल जाने के बाद वो परेशानी हलवा लगती है और हम बाद में उसे चाव से सुनाते हैं. वैसे ये बहुत छोटी सी बात थी.

कहीं जाने के पहले बजट-टाइम कन्स्ट्रेन्स के साथ सोचना पड़ता है कि कहाँ-कहाँ जाएँ. गूगल अपनी जगह है पर किसी जगह के बारे में वहां के लोगों से पूछो तो वो बड़ी ख़ुशी से बताते हैं. किसी को उसकी 'अपनी' जगह के बारे में बताते हुए सुनने में एक अलग खूबसूरती होती है. इतनी ख़ुशी और गर्व होता है बताने वाले के चेहरे पर कि...

मुझे भी एक ग्रीक-दोस्त ने जगहों का विस्तृत ब्यौरा पहले बताया फिर लिखकर भी भेजा. कहाँ जाना, क्या देखना, कहाँ रुकना, क्या खाना, क्या करना, क्या नहीं करना... पर उसने सब कुछ कुछ इस तरह बताया मानो ऑप्टिमाइजेशन बिना किसी कन्स्ट्रेन सोल्व करना हो. बजट और टाइम की फ़िक्र किये बिना !  मुझे उनका विस्तार से बताना और फिर काट-छांट के बनायी गयी यात्रा ! ऐसे याद रहा कि कुछ दिनों पहले जब किसी ने मुझसे पूछा 'भारत देखने के लिए कितने दिन चाहिए'. तो मुझे समझ नहीं आया क्या जवाब दूं. बताने बैठो तो पुराण लिखना पड़ जाए. मैंने कहा 'सवाल गलत है - तुम बताओ तुम्हारे पास कितने दिन हैं और तुम्हें कैसी जगहें पसंद हैं'. ये बात दुनिया के हर जगह के लिए सच है. मुझे नहीं पता लोग कोई भी देश या पूरा यूरोप कैसे देख आते हैं एक सप्ताह में। ग्रीस में भी दो सप्ताह जैसी समय सीमा में बहुत कम देखा जा सकता है. जगहें भी अलग अलग तरह की. हर कदम - इतिहास और मिथ नहीं तो प्राकृतिक खूबसूरती - क्या देखें-क्या छोडें ! फिर जैसे कोई पूछे कि... गोवा के अलावा कहाँ कहाँ जा सकते हैं भारत में. तो अक्सर हम कहेंगे ही कि... 'और भी अनगिनत अच्छी जगहें हैं ! गोवा खुबसूरत है - पर उससे भी अच्छी जगहें हैं'. एक ही जगह के लिए - 'इट्स अ मस्ट सी' से लेकर '... 'वी हैव बेटर प्लेसेस...' जैसे सुझाव दिए थे लोगों ने. पर कुछ जगहें हर लिस्ट में निर्विवाद थी तो वहां जाना ही था! -जब बहुत सारे कंस्ट्रेन हों तो कॉमन मिनिमम एजेंडा टाइप कुछ निकल ही आता है.

मिथ और खंडहरों से भरा पड़ा है ग्रीस - संरक्षित और जानकारी से भरपूर. ग्रीक के द्वीप दुनिया के सबसे खुबसूरत द्वीपों में आते हैं. ये दो सबसे बड़े कारण हैं जिससे ग्रीस हर साल अपनी जनसँख्या के दोगुने से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करता है. इसके बाद भी अर्थव्यवस्था... :)  इकॉनमी फिर कभी.

अगर आप कहीं घुमने जा रहे हैं तो कोई होना चाहिए जो आपको खंडहरों से खींच कर खूबसूरत जगहों पर भी ले जाए. और अगर आप खुबसूरत जगहों के शौक़ीन हैं तो कोई चाहिए जो आपको खींच कर खँडहर और संग्रहालयों में ले जाय. समुद्र-झील-पहाड़-घाटी श्रेणी की खुबसूरत जगहें प्रेमचंद की कहानियों की तरह होती हैं - सदाबहार -सुपरहिट. मुझे अब तक कोई नहीं मिला जिसे पसंद न हो. पत्थरों, खंडहरों और म्यूजियम कुछ लोगों को ही पसंद आ पाते हैं 'घुमने जाते हो कि पढने?' टाइप के लोग. अपनी-अपनी पसंद. और बहुत प्रसिद्द जगह हो तो भी ये जरुरी नहीं कि वो वहां के निवासियों की भी पहली पसंद हो. कई जगहें पर्यटकों के लिए खूब विकसित की गयी हैं . सब कुछ वैसा ही जैसा पर्यटकों को चाहिए - एक तो खूबसूरत ऊपर से सिंगार !  - संतोरिणी.

यूनान - डेमोक्रेसी, रोमन लिपि, गणित, दर्शन, खगोल, ट्रेजेडी, कॉमेडी, खेल, युद्ध, जीयस, वीनस, अपोलो, ओरेकल, अगोरा, अकिलीस, ओडीसस, सिकंदर, पाइथागोरस, सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, ओलंपिक, मैराथन, काठ का घोडा  - अनगिनत - पश्चिमी सभ्यता का सबकुछ. पढ़ते रहो तो ख़त्म न हो घूमते रहने से कहाँ हो पायेगा !

खैर.. लोगों से उनके देश के बारे में पूछने से होने वाली ख़ुशी की ही तरह एक और ख़ुशी होती है  जब आप उस देश की भाषा (अंग्रेजी छोड़कर) बोलने की कोशिश करते हैं. टूटी फूटी ही सही. मुझे ग्रीक नहीं आती पर...  मैंने बस स्टैंड पर जोड़-जाड के पढ़ा ΚΤΕΛ क्टेल? Δρομολόγια - डेल्टा-रो-ओ-म्यु-लैम्ब्डा-गामा-आयोटा-अल्फा - ड्रोमो... ड्रोमो-लोगिया.... ड्रोमोलोग्या ?

'यू स्पीक ग्रीक?'

मैंने कहा नहीं... पर अक्षर पढ़ लूँगा (इस कार्टून की तरह) - ग्रीक लिपि में
एक अक्षर नहीं जो गणित-विज्ञान में इस्तेमाल न होता हो - एक भी नहीं. सिग्मा, थीटा, अल्फा, बीटा, पाई, टाऊ, ओमेगा... वगैरह वगैरह. ग्रीक लिखा हुआ देखकर लगता है किसी नौसिखिये ने फार्मूला लिखने की कोशिश की है. और सारे सिंबल की खिचड़ी बना दी है. पता नहीं बस स्टैंड पर खड़े उस आदमी को पता था या नहीं कि दुनिया में कहीं भी मैथ-फिजिक्स-इंजीनियरिंग के सिंबल ग्रीक अक्षरों में ही लिखे जाते है. पर वो खुश बहुत हुआ. उसने बताया - कटेल यानि बस. और द्रोमोलोग्या माने टाइम टेबल. मुझे ग्रीक पढने में मजा आता. जैसे नया नया पढ़ना सीखे बच्चे सब कुछ पढ़ डालते हैं - बिना मतलब पता हुए. सारे अक्षर पहचान के थे, मतलब कुछ नहीं पता था. κέντρο मैंने एक बोर्ड देखकर पढ़ा - केंत्रो. टैक्सी वाले ने सुधारा -  केद्रो जैसा कुछ कहा उसने. मतलब बताया सेंटर. तब चमका मुझे - केन्द्रो-केंद्र-सेंटर. यूँही तो नहीं हो सकता एक ही शब्द. ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती. नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरू टाइप लगा ॐ संस्कृते च ग्रीके चैव लैटिनं ... टाइप कभी रहा होगा. वीनस सरस्वती हों न हों, इंद्र जीयस हो न हो... केंद्र तो केंद्र होगा ही ! यहाँ से वहां गया हो या वहां से यहाँ आया हो.

 'ग्रीक म्यूजिक?'  - इन दो शब्दों में छुपी कहानी पर वापस आते हैं.  इटरनल, स्पिरिचुअल, खुबसूरत - वगैरह वगैरह कैप्शन वाली जगहें हम भूल सकते हैं पर ऐसे अनुभव नहीं. हुआ यूँ कि इतिहास-खँडहर-पत्थर वाले इंसान को 'व्यू' वाली हाई-फाई जगहों का अनुभव तो वैसे ही नहीं. तो ऐसी जगह जाने पर हर चीज देखकर हम मान लेते हैं -  बड़े लोग हैं  ऐसा ही करते होंगे !  और फिर जितनी सभ्यता-शिष्टता से अपने आप को समेट कर रख सकते हैं रखते हैं. तो ऐसा ही कुछ हुआ एक बड़े लोगों वाले रेस्टोरेंट में. मद्धम मद्धम रौशनी. अभी अभी सूर्यास्त हुआ था. व्यू के साथ सिंगार-पटार वाली जगह. दो संगीतकार टाइप के लोग संगीत बजा रहे थे. अब अच्छा संगीत तो वैसा होता है जो सबको ही अच्छा लगता है. कोई भी बाजा हो - देश-काल-भाषा के इतर. अच्छा संगीत बस अच्छा संगीत होता है.  हमें भी बहुत अच्छा लग रहा था. नाचने-गाने-थिरकने वाली कैटेगरी वाले तो नहीं हैं पर बैठे बैठे पैर वैसे हिल रहे थे.. जैसे हिलाने पर डाँट पड़ती है - 'पैर मत हिलाओ'. थोड़ी देर में वो घूम घूमकर बजाने लगे. हमें देख उन्हें शायद कुछ ज्यादा अच्छा सा लगा होगा. स्पेशल टाइप. सो वो आ गए हमारे टेबल के पास.  बजाने लगे... हम बहुत खुश हुए. माने... बता नहीं सकते. हर टेबल से तुरत ही चले जाते। हमारे यहाँ जम से गए. हम विडियो भी बनाए. ताली भी बजाये. वो भी एक दम लीन होकर  भाव भंगिमा के साथ बजाये. फिर उन्होंने फरमाइसी संगीत का कार्यक्रम टाइप भी किया और पूछा - 'ग्रीक म्यूजिक? ग्रीक म्यूजिक?' सर हिलाते हुए - सिर्फ दो शब्द। और सर ऐसे गिरगिट की तरह हिलाते रहे...  मानों उनको उतनी ही अंग्रेजी आती हो जितनी हमें ग्रीक.

हम भला क्यों मना करते !

थोड़ी देर बाद हमें लगा अब कुछ ज्यादा हो रहा है. हमारे पास ही ये क्यों बजाये जा रहे हैं ! उनकी मुस्कान भी तल्लीनता से लेफ्ट टर्न लेकर इस मुद्रा में आ गयी थी कि ...वो भी कुछ वैसा ही सोच रहे थे जैसा हम. तब मुझे पहली बार लगा कि इन्हें कुछ देना होगा. तब लगा कि शायद बाकी जगह लोगों ने उतना भाव नहीं दिया या तुरत कुछ दे दिया होगा ! इन दो बातों का उनका इतनी देर तक बजाने और इतने अच्छे से बजाने में जरूर ज्यादा योगदान रहा होगा. हम कितने स्पेशल लग रहे थे वो दिल बहलाने का ग़ालिबी  ख्याल साबित हो गया. खैर ये कोई बात नहीं जो याद रह जाए... बात तब हुई जब हमने जेब टटोला.

जेब खाली तो नहीं थी पर...

ग्रीस हम गए थे ये सोच कर कि - यूरोप है ! हर जगह कार्ड चलेगा. ग्रीस ऐसा है कि एक तो कार्ड कोई नहीं लेना चाहता (कैपिटल कण्ट्रोल भी था तब पर लोगों ने बताया कि बिना उसके भी यही हाल रहता है). जहाँ कार्ड लेते भी वहां - कार्ड से इतना, कैश से उतना का हिसाब. और ये उतना इतने से हमेशा कम. अब दुनिया का कोई भी कोना हो दिमाग एक्सचेंज रेट लगा तुरत जोड़-घटाव कर लेता है  कि कितना घाटा-फायदा हो रहा है. तो हमने उसी शाम कैश तो निकाल लिया था. लेकिन 'जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि' की तरह हमारे  पास १०० यूरो से नीचे कुछ था नहीं. अमेरिका में २० डॉलर से ज्यादा के नोट कभी एटीम से निकलते देखा नहीं. या कभी सौ से ज्यादा कैश निकाला हो ये भी याद नहीं. भारत होता तो वैसे ही कोई जुगाड़ निकल आता. खैर... ऐसे मौके पर दिमाग तुरत हिंदी पर आ जाता है. जीटा-थीटा थोड़े करोगे आपस में अब. हमने अपने साथी से पूछा तो वहां भी यही हाल था. हाथ में वॉलेट लिए.. अब हम बेशर्मी वाली मुस्कान के अलावा ज्यादा कुछ कर नहीं सकते थे. छुट्टा भी नहीं पूछ सकते थे -कलाकार की बेइज्जत्ती हो जाती. हमने एक बार मुस्कुराया.. वो दोनों जो एक वायलिन सरीखा और एक कोई ग्रीक बाजा लिए थे.. मेरे हाथ में बटुआ देख और जोश में बजाने लगे. वो हमें देख मुस्कुराते, हम उन्हें.. ये सिलसिला कुछ देर तक चला. माने हमारे ऊपर थोड़ी देर तक पानी पड़ा जब तक उन्हें समझ आया... अब उन्हें जो भी समझ आया हो.  थोडा बहुत हमें भी समझ आया और हम उठकर काउंटर पर छुट्टा पूछने गये. पर वो अपनी समझ से दूसरी तरफ निकल लिए. मुझे लगा वो इसी  रेस्टोरेंट में काम करते होंगे पर वो निकल कर चले ही गए. माने अब... हम लिखने में इतने सिध्हस्त तो हैं नहीं कि वोसीन लिख सके. यूँ समझ लीजिये... दोनों पार्टियों की ख़ुशी परवर्तित हो रही हो दिमाग की झुंझलाहट में और चेहरे पर मुस्कान बनी रहनी चाहिए! बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ. तो कैसा दृश्य रहा होगा. इससे ज्यादा मैं नहीं लिख सकता. :)

आप  कहेंगे ये भी कोई सोचने की बात हुई.. उनसे अब कौन सा फिर से मिलना है. पर वो क्या है न कि... इवोल्यूशनरी साइकोलॉजी कहती है... किसी और पोस्ट में.

ये पोस्ट भूमिका में ही ख़त्म होने की सी लंबाई को प्राप्त हो गयी !

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~Abhishek Ojha~

Feb 9, 2016

...उस पार


ज्ञान देना (भाषणबाजी) बहुत मस्त काम है।

ज्ञान देने वाला खुद वैसा ही हो या नहीं इस बात से इसका कोई लेना देना नहीं. और फिर गूगल-फेसबुक-ट्विट्टर-विकिपीडिया के जमाने में जिसे देखिये वही घनघोर ज्ञान और संवेदना से लबालब भरा बैठा है. इतना कि उसे छलकाने के लिए मुद्दे-मौके कम पड़ जा रहे हैं ! भाषणबाजी से  याद आया कि जो लोग असल जिंदगी में चंद लोगों के साथ भी ढंग से न रह पाते उनसे अच्छा रिश्तों पर कोई नहीं बोलता ! घर में अँधेरा हो तो हो महफ़िल में चराग-ए-भाषण जरूर जलाते है. और ये तो खैर फैक्ट ही है कि लभ-गुरु बनने का सबसे ज्यादा पोटैन्श्यल होता है असफल प्रेमियों में।

पहले का पता नहीं पर आजकल ज्ञान देते-देते लोग लड़ने पर उतर आते हैं. ये कैसा अद्भुत ज्ञान? ! जैसे कोई कहे.... मैं बहुत अहिंसक हूँ और सामने  वाला  न माने तो उसकी गर्दन ही तोड़ दो - बोला था अहिंसक हूँ ! समझते ही नहीं हों लोग ! और एक लेवल के बाद दोनों ही पक्ष एक दूसरे को मुर्ख करार देते हैं! मुर्ख को उपदेश देना क्रोध को बढ़ाना है, मूरुख हृदयँ नहीं चेत , नेवर आर्ग्यु विथ स्टुपिड पीपल... वगैरह वगैरह कोट तो वैसे ही बरसाती मेंढक हैं इंटरनेट के.  वैसे आप विवाद का हिस्सा नहीं हैं तो कई बार मुश्किल होता है समझ पाना कौन बुद्धिमान वाला पक्ष है कौन मुर्ख वाला। लड़ते हुए देख लेने के बाद लगता है बुद्धिमता और मूर्खता अन्योन्याश्रित हो चली है। अगर आप एक पक्ष के साथ हैं तब तो मुर्ख ऑब्वियस्ली सामने वाला ही होगा।

खैर.. भाषणबाजी सुनकर अक्सर लगता है... कि भाषणबाजी अगर इस पार का काम है तो उसे जीना उस पार का। ज्ञान सुनाने वाले को समस्या हलवा लगती है और संसार बेवकूफ ! वहीँ सुनने वाले को लगता है - मेरी जगह होते तो इन्हें पता चलता ! सही भी है जब तक आप इस पार रहते हैं तब तक उस पार का सोच पाना कठिन सा होता है - एक अलग डाइमेन्शन में सोचने जैसा

पर अक्सर लोग उस पार जाकर भी कुछ ज्यादा सीख नहीं पाते। छात्र जीवन में शिक्षकों को खडूस कहते रहे, शिक्षक बने तो छात्रों को नालायक करार दिया. उस पार गए तो इस पार का भूल गए - याद नहीं रहती खुद की अनुभव की हुई सारी बातें। डिस्टोर्टेड वर्जन याद रह जाता है। वैसे भी जो झेल चूका होता है उससे उम्मीद करना कि जो आप झेल रहे हैं वो बेहतर समझेगा तो आप भोले हैं - मैं ही नहीं कह रहा बड़े लोग भी ऐसा कह रहे हैं  - It’s Harder to Empathize with People If You’ve Been in Their Shoes

 - भाँति-भांति के लोग !

...भूमिका ख़त्म. बात पर आते हैं।

ज्ञान के नाम पर गर्दन तोड़ देने वाली चीज देखने को मिली पिछले दिनों। न्यू यॉर्क में एक प्रतियोगिता हुई जिसमें कई विश्वविद्यालयों के पढ़ने लिखने वाले छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। (यहाँ ध्यान दीजिएगा कि सारे छात्र पढ़ने लिखने वाले नहीं होते हैं - दंगा, धरना-प्रदर्शन, मार पीट, लफंगई  वगैरह वगैरह करने वाले भी छात्र होते हैं) न्यू यॉर्क ही नहीं छः-आठ घंटे दूर तक से छात्र छात्राएं आए थे...  (कभी कभी दूरी में वजन डालने के लिए उसे घंटे में भी नाप दिया जाता है)। छात्रों को एक 'केस' सोल्व करना था-एक कंपनी का केस।

अब छात्र माने बैचलर से पीएचडी तक। कुछ बिलकुल ही नवा-नवा कॉलेज में नामांकन कराये ... जिन्होंने कभी जेब खर्च के लिए भी नहीं सोचा होगा कि कहाँ से आ रहा है कहाँ जा रहा - उन्हें भी उसी केस के बारे में सोचना था। जिसके बारे में एमबीए, पीएचडी वाले भी सोच कर आए थे। पाँच-सात साल अनुभव वाले भी थे!  बोली भी अंग्रेजी होते हुए भी सबकी अलग (वैसे बहुमत - चाइनीज अंग्रेजी) । फिर ऐसे भी थे जो जबान से दनादन 'जार्गन' उगलते हैं - प्रति मिनट सौ-डेढ़ सौ की रफ्तार से - भले उसका केस से कोई लेना देना नहीं हो। वैसे मुझे लगता है दुनिया में मैं अकेला तो नहीं ही होऊंगा जिसे मीटिंग, कॉन्फ्रेंस  में काम के बात की जगह 'जार्गन' की दवनी होता सुनकर लगता है... छोड़िए फिर कभी :)

बहुत मेहनत की थी सबने... लेकिन प्रेजेंट करने वाला जैसा भी हो 'जज' (अक्सर) होता है - बेशर्म - भाषणबाज -  ज्ञान झाड़ने वाला- गर्दन तोड़ने वाला अहिंसक। सवाल पूछने से पहले ये भी नहीं सोचता कि... जिसे क, ख, ग ढंग से नहीं पता हो उससे उपनिषद एक्सप्लेन करने को कहना - मतलब क्यों? ! ... जज का एक काम शायद सामने वाले को बेइज्जत करना भी होता है! वो प्रजेंट करने वाले से प्यार से बात नहीं कर सकता।

मुझे उस पार ...यानी जज वाले साइड बैठना था. मेरे बगल में बैठे एक सज्जन बार बार - "व्हाट द [अगला शब्द आप समझ ही गए होंगे]" - और बार बार टीम्स के किये कराये को "[बैल का गोबर]" करार दे रहे थे। खैर इट्स कूल टु टॉक लाइक दैट दीज डेज। मैं उस पार बैठने वाला नवा-नवा मैं क्या ही बोलता ज्यादा कुछ.  सोचा पूछ लूँ - "आपको उस उम्र में पता था कि जो पढ़ रहे हो वो इंडस्ट्री में इस्तेमाल नहीं होता?" फिर ये सोच रहने दिया कि हो सकता है वो अभिमन्यु रहे होगे !

हमारा दिल पिघल रहा था.. हम उस पार होके भी नहीं थे. हम सोच रहे थे किस किताब की लाइन उठा के लाये हैं... जो बोल रहे हैं वैसा क्यों बोल रहे हैं? कहाँ से सीखा होगा? हंसी नहीं आई मुझे कॉपी-पेस्टीय अनभिज्ञता पर - जहाँ हो सकता था ज्ञान से प्रभावित जरूर हुआ। पता तो वैसे भी चल ही जाता है जो रट के बोल रहे होते हैं ...जिनका मतलब भी नहीं पता उन्हें ! पर मैं ये सोच रहा था कितनी मेहनत की है एक एक शब्द पर...  कितना तैयार होकर आए हैं... बाहर गया तो देखा... लड़के-लडकियां रट रहे थे टहलते हुए। आखिरी मिनट तक।  स्लाइड देख कर न बोलना पड़े... सूट, जूते, घड़ी, बाल... सब एक दम चकाचक। एक बाल इधर की जगह उधर नहीं... जैसे चमको छाप डिटर्जेंट के एजेंट हों ! कब स्माइल करना है, कैसे अभिवादन करना है. कब तक किसे बोलना है. हमें अपने दिन याद आ रहे थे - प्लेसमेंट सीजन के पहले दो चार लोगों को छोड़ दें तो सूट और जूते क्या बेल्ट भी उधार का होता था - "अबे जल्दी जाओ तैयार होके... आधे घंटे में इंटरव्यू है"। खबर हॉस्टल में आती तो लोग अभियान शुरू करते कपड़े ढूंढने का..."..."अबे जल्दी जाओ, इसी के ऊपर पहन लो !"। कितनी बार सब कुछ आते हुए भी नहीं बोल पाना...

मैं ये भी सोचता रहा कि किसका बैकग्राउंड क्या होगा। उनसे पूछ भी लिया   - सही ही सोचा हर बार। फाइनन्स, मैथ, कम्प्युटर साइंस, एकोनोमिक्स, मार्केटिंग... फर्क दिखता है कौन क्या पढ़ा है। कौन कैसे तर्क देता है. किसने कितनी मेहनत की है वो भी दिखता है। हमेशा एक दो टीम ही बहुत अच्छी होती है... वो ऐसे ही दिख जाता है। पर एक बात मुझसे देखी नहीं जा रही थी  - जजों द्वारा तौहीन ! - [बैल का गोबर]

एक दो ग्रुप से सवाल पूछे जाने के बाद लड़के-लड़कियों की शक्ल देखने लायक हो गयी ! घोर हताशा... जैसे एक पल में सारी मेहनत चली गयी हो ! दिल टूटता हुआ दिखता है चेहरे पर। उम्मीद का टूट जाना. बोलने से पहले काँपती है आवाज। गया सब कुछ... करुणा टाइप का हो जाता है।  ...उनका गला सुखने लगा हो जैसे... और मेरे बगल में बैठे सज्जन ने भकोसी हुई कुकी को कॉफी से गले के नीचे उतारते हुए कह दिया  - [बैल का गोबर] - राम राम !

मैं सोच रहा था क्या चल रहा होगा उनके दिमाग में वैसे सवाल पर जो उन्हें ढंग से समझ भी नहीं आया?

- क्या होगा इसका सही उत्तर? सुना हुआ तो लग रहा है... जैसे दिमाग के सारे न्यूरॉन एक साथ चमक गए हों... - ओह ! तो ये बोलना था? आसान था यार पर समझ ही नहीं आया। ...क्या पूछ रहा था यार वो मैंने तो कभी सुना ही नहीं था... फिर से सवाल रिपीट करने को बोला तो जो थोड़ा बहुत समझ आया था वो भी हवा हो गया. विनिंग टीम को देखा तुमने? अबे यार इतने सीनियर लोग आएंगे तो क्या ही होगा। लेकिन क्या ही प्रेजेंटेशन था यार उनका - फ्लॉलेस! हमने तो कुछ किया ही नहीं। मुझे तो अब सोच के ही शर्म आ रही है, हम क्या ही बोल रहे थे ...हम कहीं नहीं टिकते। अबे यार पर उस खडूस जज को कुछ नहीं आता ! पता नहीं किसने बना दिया उसे जज।  कितना समझाया मैंने उसे... उसे समझ ही नहीं आया कि हमने किया क्या है। पता नहीं क्या पूछ रहा था। उस बात का  इस केस से क्या लेना देना ?- पकड़ के बैठ गया एक ही बात। इतना कुछ किया था किसी ने कुछ सुना ही नहीं, सब बेकार हो गया! हड़बड़ी में जो एक कोट रट के गया था वो तो बोल ही नहीं पाया। छोड़ यार अब... ...वैसे हमारा तो उनसे अच्छा ही था... मेहनत तो की ही थी हमने. बस लटके झटके अच्छे थे उस टीम के  हमने कितना काम किया था।  उन्होने तो कुछ किया भी नहीं और जीत गए.

हमेशा अंत में बात यहीं रुकती है... एक टीम का प्रेजेंटेशन अच्छा था और एक का काम अच्छा था। और एक टीम हमेशा होती है जो अच्छी होकर भी नहीं जीतती।... मेरा दिल और वोट हमेशा उनको जाता है। ये अनुभव हुआ कई बार... पहले भी और इस  बार भी.

खैर... बात जब दूसरे पार की हो तो थोड़ा मुश्किल भी होता है समझना... जैसे मान लीजिये पढ़ाने वाला निश्चय कर ले कि मैं किसी को फेल नहीं करूंगा और ये कि... जिसे मन हो वो पढे नहीं तो क्लास आने की जरूरत नहीं है। पढ़ाने वाले को लगेगा कि इतना रोचक है, मैं इतना अच्छा समझाता हूँ... कैसे नहीं पढ़ेगा कोई ? और स्टूडेंट को लगे... अबे एक दम गाय है प्रोफेसर... एक दम कूल। इस कोर्स में कोई टेंशन नहीं... दूसरा वाट लगा देगा उसीका पढ़ते हैं !

पटना में राजेसजी से हुआ वार्तालाप याद आया - मैंने कहा था- ‘जूनियर इम्प्लोयी से बड़े बुरे तरीके से बात करते हैं वो. प्यार से बात करने से सब काम हो जाता है लेकिन….’
‘अरे नहीं सर ऊ त ठीके है. बिना उसके इहाँ काम चले वाला है? इहाँ नहीं चलेगा आपका परेम-मोहबत. आप नहीं समझेंगे यहाँ का मनेजमेंट… यहाँ परेम देखाइयेगा त जूनियर एम्प्लाई आपका बेटीओ लेके भाग जाएगा’।...एक ये पहलू भी है जो अनुभवी लोग बताते हैं, मैं सहमत होऊं या नहीं!

 ...खैर अंत में हुआ यूं कि उस पार  बैठे हुए भी मेरी इस पार वालों से खूब दोस्ती हुई. भाषणबाजी ही कहेंगे पर मैंने जो टीम रोने-रोने सी हो गयी थी और वो एक टीम जो अच्छी होकर भी नहीं जीतती। उनसे बहुत देर बात की... अच्छा अनुभव रहा. बहुत कुछ सीखने को मिलता है खासकर उस पार बैठने पर जब आपको हार जीत की फ़िक्र नहीं होती !

और सबसे अंत में हुआ यूँ कि... किसी ने एक फोटो शेयर की कैप्शन था - 'विनिग टीम विथ जजेस'... उसमें एक चेहरा हमारा भी था. हमें विनर होने के बधाई के कुल छःमेसेज आये । हम विनर तो थे नहीं ...उस पार वाले हो चुकने के बाद यही सोच खुश हो लिए कि... शायद हमारी त्वचा से हमारी उम्र का पता ही नहीं चलता होगा ! :)

~Abhishek Ojha~


Dec 8, 2015

... 'ओक्सिटोसिन' क़हत टैटू मोरा


बात शुरू हुई एक रस-आयनिक टैटू वाले ट्वीट से - 

Oxytocin Tattoo
इस पर पोस्ट लिखने की बात हुई तो याद आया - चित्र देखकर कहानी लेखन जैसा कुछ होता तो था हिन्दी-व्याकरण की किताबों में। हर व्याकरण की किताब में एक तस्वीर जरूर दी ही होती थी। सारस और लोमड़ी. तस्वीर देखते ही कहानी समझ आ जाती कि दोनों ने एक दूसरे  को कहा होगा - "कभी खाने पर आओ हमारे घर"... आगे की कहानी तो आप समझ ही गए होंगे। हमारी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है ! दस बटा दस पाने वाले विद्यार्थी को भी तस्वीर दे दीजिये कहानी लिखने को तो वो उसमें भेड़िया, लोमड़ी, सारस ही तो ढूंढेगा? हमने भी बहुत गौर से देखा लेकिन इसमें ऐसा कुछ दिखा नहीं। मोबाइल उल्टा करके देखना पड़ा तब थोड़ा बहुत समझ आया कि ये चित्र है क्या ! 

...बैकग्राउंड पर से ध्यान हटा गौर से देखा तो ये संरचना कुछ तो देखी-देखी सी लगी. ख्याल आया कि ओक्सिटोसिन तो नहीं ? गूगल किया तो ख्याल 'अटेस्ट' हो गया। ओक्सिटोसिन माने प्यार-मोहब्बत का रसायन- लव हार्मोन। अब अनुमान तो यही लगाया जा सकता है कि ये टैटू, ये मुद्रा... 'ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा' टाइप्स प्यार से ही जुड़ा होगा. किसी ने कह दिया होगा - यही है असली केमिकल लोचा तो गोदवा ली होंगी अपनी काया पर ! (टैटू से टैटूवाना क्रिया बने न बने हिन्दी में गोदवाना/गुदवाना ही कहते हैं) या फिर हो सकता है बुद्ध के चार सत्य की तरह अनुभूति हो गयी हो मोहतरमा को - 
इस दुनिया में प्यार ही प्यार है। प्यार का कारण ओक्सिटोसिन है। प्यार को पाया जा सकता है। और फिर प्यार प्राप्ति के अष्टांग मार्ग में एक टैटू गोदवा लेना होता होगा या अभय मुद्रा, धर्मचक्र मुद्रा इत्यादि की तरह प्यार प्राप्ति के बाद की टैटू-मुद्रा होगी ये.

अब हम और सोच भी क्या सकते हैं? हमसे कोई पूछे तो। ...टैटू बनवाने में दर्द भी, पैसा भी और ऊपर से परमानेंट... वो भी एक केमिकल का फॉर्मूला ! हम एक और सवाल पूछ बैठेंगे - मतलब... क्यों? कोई मज़बूरी थी?... मान लीजिये कल को पता चला कि हाइड्रोक्साइड गलत जगह पर लग गया हो, कल को ये भी हो सकता है प्यार पर से भरोसा ही उठ जाये, बेहतर केमिकल का आविष्कार हो जाये तब? दाहिने भुजा टैटू बनाए के बाद अहिरावण की भुजा उखाड़े स्टाइल में कुछ करना पड़ जाएगा. (अगर टैटू भुजा पर हो तो नहीं तो जो भी अप्रोप्रिएट हो)। वैसे भी साइंस का क्या भरोसा ! रिलिजन तो है नहीं... किसी ने कह दिया तो वो शाश्वत सत्य हो गया।  विज्ञान की तो खूबसूरती ही इसीमें है कि सवाल उठाओ! आइंस्टीन को भी गलत कर दिए तो कोई फतवा थोड़े जारी करेगा. उलटे और वाह-वाही होगी। कल का सही आज तक गलत नहीं हुआ तो कल गलत नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं। गलत नहीं भी होगा तो बेहतर सत्य आते रहेंगे ! खैर... इतना सोचने वाले टैटू नहीं बनवाते होंगे।

प्यार की बात आती है तो मुझे तुलसी बाबा कि ये बात जरूर याद आती है। बड़ी रोमांटिक लाइन है - 

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥

तुलसी बाबा संत आदमी थे। वैसे हमेशा से संत नहीं थे. मैंने तूफ़ान से लड़ते आशिकों को भी तुलसीदास कहे जाते सुना है। नदी पार करने वाली उम्र में होते तो शायद कुछ और कहे भी होते... लेकिन ये बातें उन्होने आत्मज्ञान और प्रभु दर्शन हो जाने के बाद कही। प्रेम का सार, प्रीति-रस इतने में ही है - विशुद्ध बात। पर टैटू से पता चलता है वो ओक्सिटोसिन नामक प्रेम-रस तक सीमित प्रेम की बात है ! लव-केमिकल यानि प्रीति-रस का नाम पता चला टैटू बनवा लिया - प्रीति रसु एतनेहि माहीं. 

खैर... हमने भी ट्वीट का जवाब ट्वीट से दे दिया  - "तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। ओक्सिटोसिन कहत टैटू मोरा।" ट्वीटर पर अक्सर 140 अक्षर में ही बात वहीँ की वहीँ निपट जाती है। पर जवाब के बाद भी पोस्ट की बात बाकी रह गयी। और आप तो जानते ही हैं कि उधार-बाकी ओक्सिटोसिन का एंटीडोट है... (प्रेम उधार की कैंची है का अनुवाद !)

अब बात निकली तो बता दें कि हम भी टैटू एक्सपर्ट रह चुके हैं। मेरे एक मित्र को टैटू टैटूवाना था - दाहिनी भुजा पर गर्लफ्रेंड का नाम - तमिल में। बिना गर्लफ्रेंड को बताये। तमिल उन्हें खुद आती नहीं थी। समस्या ये थी कि गूगल इनपुट टूल्स पर ज्यादा भरोसा किया नहीं जा सकता। पता चला कुछ और ही गोदवा लिए ! "गोदनाधारी अपने गोदना के लिए खुद ज़िम्मेवार है" टाइप डिस्क्लेमर ना भी हो तो गोदनाहार को तो आप जो देंगे वो तो वही बना देगा। ...रिस्क लेना भारी काम है। जैसे इसी गोदना में... मान लीजिये एक दो हाइड्रोक्साइड गलत जगह पर लग गए और पता चला ओक्सिटोसिन की जगह कोर्टिसोल की तरह काम करने लगा ! केमिस्ट से प्यार होगा तो वो तो पकड़ लेगा कि फार्मूला ही गलत है.

दोस्त-दोस्त के काम आने वाले सिद्धान्त के तहत हमने अपने एक तमिल सीनियर को ईमेल किया। हमारे सीनियर तब हार्वर्ड में थे। बहुत बड़े फिजिस्ट हैं। पर मामला भी गंभीर ही था। गंभीर न भी हो तो अब किसी दोस्त को कल को नोबल प्राइज़ भी मिल जाये तो ऐसा थोड़े न होगा कि पीएनआर कन्फर्म हुआ या नहीं जानने के लिए उसको फोन नहीं करेंगे? (वो बात अलग है कि अब फोन में इन्टरनेट हो गया पर अपने जमाने का डायलॉग मार दिया तो आप दोस्ती के वसूल का मर्म समझ ही गए होंगे)। मेरे सीनियर ने भी इस बात को उम्मीद से कहीं ज्यादा गंभीरता से लेते हुए विस्तृत जवाब भेजा। निष्कर्ष ये था कि वो उत्तर भारतीय नाम तमिल में शुद्ध तरीके से लिखा ही नहीं जा सकता! तमिल भाषा की अपनी सीमाएं हैं। (तभी पता लगा कि त को थ क्यों लिखा रहता है कई तमिल नामो में)। खैर उनके सुझाव के हिसाब से जो सबसे सटीक हो सकता था वो हमारे मित्र ने अपने हाथ पर गुदवा लिया ! गलत नाम गुद जाने के अलावा एक रिस्क ये भी था... जो तनु वेड्स मनु में कंगना ने राजा अवस्थी के नाम का टैटू करा ले लिया था! उसमें उन्होंने हल भी बताया था - सरनेम का टैटू है उसी नाम का  कोई और ढूंढ लुंगी। उनके इस डर से ये बात भी सीखने को मिली थी कि आधुनिक इश्क़ में चीजें 'वैरिएबल' होनी चाहिए - परमानेंट कभी नहीं। लभ लेटर हो या टैटू... पुनः इस्तेमाल होने वाले होने चाहिए। रिसाइकल होने वाले। ओरगेनिक - ग्रीन टाइप्स। - मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।

खैर... ओक्सिटोसिन को वैज्ञानिक प्रेम-मुहब्बत के लफड़े वाला केमिकल मानते हैं। यही वो केमिकल है जिससे उल्फ़त वाला लोचा होता है। माँ के 'माँ' जैसी होने के पीछे भी लोग-बाग इसका होना ही कारण बता देते हैं। और भी कई चीजें - भरोसा वगैरह। दरअसल भोले लोग बहल जाते हैं। इतना आसान होता तो... दो चार सुई घोंप देते(-लेते) इश्क़ कम पड़ने लगता तो. नहीं? दरअसल बस इतना भर है कि किसी न्यूज चैनल वाले को बता दीजिये तो 'गॉड पार्टिकल' की तरह इस पर भी आलंकारिक भाषा में प्रोग्राम कर देंगे - वैज्ञानिकों के ढूंढा लोचा-ए-उल्फ़त का केमिकल। और वो देख बायोलॉजिस्ट-केमिस्ट वैसे ही सर पीट लेंगे जैसे गॉड पार्टिकल पर प्रोग्राम देख फिजिसिस्ट ! इस बात पर कैसी कैसी हेडलाइन बनाएँगे न्यूज बेचने वाले वो आप यहाँ एक ब्रेक लेकर सोच-सोच मुस्कुरा लीजिये। 

ब्रेक के बाद -

ऐसे ही एड्रेनालीन, डोपामिन जैसे कई केमिकल लोग बताते हैं ख़ुशी वगैरह के लिए। पर खुशी, प्रेम... जैसी जटिल चीजों को एक केमिकल में सिमटा देना वैसे ही हो जाएगा जैसे भोले लोग खुशी का फॉर्मूला दे देते हैं - माइनस और माइनस मिला के प्लस बन जाता है। बिल्कुल सही बात है ! पर यहाँ कर्ल-डाइवरजेंस-इंटेग्रेशन-स्टोकास्टिक-अगैरह-वगैरह भी लगा दीजिये तो संभव है कभी खुश हो जाने का फॉर्मूला लिख पाना?

पर जिसने टैटू कराया उससे कह दीजिये कि ये प्यार का फॉर्मूला नहीं है तो बिगड़ ही जाएगा ! भोले लोग हैं...  साइंस, फिलोसोफी, गायक, भगवान, शंख, चक्र, गदा, क्रॉस, चिड़िया, फूल, पत्ती, जो पसंद आये छपवा लेते हैं. किसी ने भेजा था मुझे एक मैथ वाला टैटू...

Math Tattoo 
मैंने कहा - खूबसूरत है ! पर ध्यान भटक जा रहा है। गणित ऐसे तो नहीं पढ़ा जा सकता। और जगह भी कम पड़ गयी है। जगह कम होता देख फ़र्मैट का मार्जिन याद आ गया। एक महान गणितज्ञ हुए फ़र्मैट, वो लिखते लिखते लिख गए थे एक धांसू प्रमेय। और उसके बाद लिख गए - "मेरे पास इस प्रमेय का प्रूफ भी है पर उसे लिखने के लिए ये मार्जिन बहुत कम है"। जो प्रमेय लिख के गए वो गणित का सबसे कठिन सवाल बन गया. सदियों बाद हल भी हुआ तो ७०० पन्नों का हल छपा. गणित के लिए मार्जिन होना बहुत जरूरी है. बड़ी महिमा गायी है गणित के विद्वानो ने. फ़र्मैट साहब के पास थोड़ा और मार्जिन होता तो गणित का इतिहास शायद आज कुछ और होता ! और इस टैटू में... कालिदास के शब्दों में जिसे "मध्‍ये क्षामा" कहेंगे वहां तो... ना हो पायेगा. 







लीजिये लिखते लिखते एक किताब में मिले मॉडलस-ऑन-मॉडलस वाला आलंकारिक गोदना भी याद आ गया - मॉडल मॉडल ते सौ गुनी मादकता अधिकाय

Models on Models 
कुछ लोग संस्कृत के मंत्र ही गुदवा लेते हैं। श्लोक के उच्चारण का महत्त्व तो पढ़ा है। गुदवाने का भी कुछ तो फायदा होता ही होगा। नहीं तो कम से कम संस्कृत तो पढ़ ही लेते होंगे थोड़ा बहुत। जैसे केटी पेरी का टैटू देखा तो लगा ये सबसे अच्छा तरीका हो सकता है लोट लकार, प्रथम पुरुष का उदाहरण पढ़ाने के लिए। खट से याद हो जाएगा ! 
और कुछ लोग - अजंता एलोरा के भित्ति चित्र  की तरह पूरा शरीर ही चलता फिरता कला का संग्रहालय बनवा लेते हैं! खैर हमसे किसी ने एक बार पूछा था धार्मिक कुछ बताओ टैटू करवाने को तो हमने कहा था कीर्तिमुख बनवा लो ! 

...टैटू का अच्छा मार्केट है. एक टैटू सलाहकार की दुकान खोली जा सकती है. बढ़िया चलेगा।

अभी ही देखिये बात निकली तो तमिल भाषा की सीमा से लेकर, प्रेम, ओक्सिटोसिन, किर्ति मुख, फ़र्मैट... कितना कुछ है जी जो अभी चर्चा में आ गया। प्रेम और टैटू का तो खैर गहरा संबंध है। 
वैसे... गोदना की डिजाइन के साथ साथ अंग चयन की भी बड़ी महिमा बताई है टैटू-विद्वानो ने :)

(टैटू पर बहुत अच्छा पढ़ना हो तो यहाँ पढ़िये)

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~Abhishek Ojha~