Feb 14, 2012

प्री-स्क्रिप्टेड शो...

 

(मूल पोस्ट... के बाद आए एक ईमेल और उसके जवाब पर आधारित)

अमृत ने जब अगले दिन विजय से बात की... तो विजय ने बताया-

देख अमृत, दारू के झोंके में मैंने जो बोला वो बोला। पर मैं जो बोलता हूँ वो कोई नियम नहीं है। वो बस उतना ही है जितना मेरी समझ में आता है। ये उन बातों पर निर्भर है कि मैंने क्या पढ़ा, क्या देखा और अब तक कैसा जीवन जीया। ऐसा कुछ भी जो मेरी सोच को सही ठहराता है, वो मुझे सच लगता है पर इसका मतलब ये नहीं है कि दुनिया वैसी ही चलती है। केप्लर और कोपरनिकस के पहले सबको पता था कि सूर्य पृथ्वी के चारो ओर चक्कर लगाता है। और सबको पता था कि ब्रह्मांड कैसे बना है !  कोई झमेला नहीं ! उसी तरह क्लासिकल, न्यूटोनियन फिजिक्स और फिर आइन्सटाइन का क्रांतिकारी सापेक्षता सिद्धान्त और फिर क्वान्टम.... और हम अभी भी हो सकता है कि कुछ नहीं जानते !  ...या फिर जो जानते हैं उसके विपरीत ही कुछ सच हो !  एक दिन एक नया सिद्धान्त सब कुछ बदल सकता है।

सारे सिद्धान्त  बस हमारे आस पास की हो रही घटनाओ को बस सही ही तो ठहराते हैं... कितनी ही चीजों की व्याख्या तो हम कर नहीं पाये आज तक... और हम कह देते हैं कि यही संसार के नियम है। जैसे एक रुई के गोले पर गोली चलाने से अगर गोली अपनी दिशा बदल दे... तो हम नियम बनाते हैं कि रुई के अंदर एक वस्तु है जो गोली की दिशा बदल रही है... पर सच्चाई ये हो भी सकता है नहीं भी !  बिन देखे, बिन रुई खुले.... अनुमान ही तो है ! और कोई भी नियम तभी तक सही होता है जब तक आँखों देखी बातों को सही ठहराने के लिए उससे बेहतर नियम नहीं मिल जाते।

अब अपने को ऐसा लगता है कि जो भी होता है वो पूरे ब्रह्मांड के अच्छे के लिए होता है... कई बार हमें ये बात उसी समय समझ नहीं आती। कई बार हम पूरी जिंदगी नहीं समझ पाते कि इसमें अच्छा क्या है ! लेकिन हमारी जिंदगी के बाद शायद कुछ अच्छा हो ... वैसे भी हमारी जिंदगी की समय सीमा ब्रह्मांड के उम्र की तुलना में है ही क्या !  अब इसी को तू ऐसे कह सकता है कि जब सब कुछ अपने आप होना है तो मैं क्यों टेंशन लूँ ! तो फिर ये कहानी सुन जो मैंने अपने बचपन में सुनी थी:

'एक बार नाव से लोग नदी पार कर रहे थे... और तूफान आ गया। अफरा-तफरी मच गयी। उसी नाव में एक महात्माजी भी थे। वो अपने कमंडल से नदी का जल नाव में डालने लगे...लोगों को लगा बुड्ढा पगला गया। थोड़ी देर में तूफान शांत होने लगा तो बाबा वापस पानी नाव से निकाल  नदी में डालने लगे। लोगों  को कुछ समझ में नहीं आया। पूछने पर बाबा बोले: "मुझे नहीं पता भगवान क्या चाहते हैं। पर इतना पता है कि वो हमसे बेहतर समझते हैं। अगर वो हैं तो हम सबके भले के लिए ही कुछ करेंगे। मैं अपने स्तर पर उनकी मदद करने की कोशिश करता हूँ, जैसे भी कर सकूँ। जब मुझे लगा कि वो नाव डुबाना चाहते हैं तो मैं उनकी मदद कर रहा था और जब लगा कि वो बचाना चाहते हैं तब भी।"'

हम सबके जीवन में असहनीय बातें होती हैं... पर एक दिन हमें यह पता चलता है कि वैसा किसी अच्छे मकसद के लिए ही हुआ था। किसी बड़े अच्छे काम के लिए। कभी-कभी हमें ये पता नहीं चल पाता। लेकिन वो तो इसलिए कि...आखिर हम देख ही कितना सकते हैं ! भगवान को बस हमारा परिवेश ही नहीं पूरा ब्रह्मांड संभालना होता है... अनंत तक फैला हुआ ! और एक सुदूर ग्रह/तारे से जो हम आज के विज्ञान की मदद से देख भी पाते हैं... वो घटनाएँ तक तो भूतकाल की होती है ! 

अब जो कुछ भी होता है उसे टाइम-स्पेस को-ओर्डिनेट्स में होने वाले इवैंट कह लो या भगवान की मर्जी कह लो। जब भी हमें समझ में नहीं आता कि जो कुछ हमारे साथ हुआ उसमें क्या अच्छा था... तो इसका मतलब ये भी तो हो सकता है कि एक इवैंट हुआ टाइम-स्पेस में जिसका असर किसी ऐसे टाइम-स्पेस में होगा जो हमारी जिंदगी के को-ओर्डिनेट्स के बाहर है।

अब देख फेसबूक का आविष्कार हो सकता है कि भगवान ने बस इसलिए कराया हो कि एक दिन कोई मिस्टर लल्लूलाल किसी स्पेसल चमनबहार से मिलें ! जो बिना फेसबूक के संभव नहीं होता। अब इसके साइड इफैक्ट के रूप में जुकरबर्ग फोकट में ही अरबपति बन गया ! ऐसे ही हो सकता है कि किसी छोटे से काम के लिए ही बाकी सारे आविष्कार भी हुए हों !  केओस थियरि में छोटी सी घटना बड़े घटनाओं को अंजाम देती है। ये दरअसल ऐसा है कि छोटी घटनाओं से बड़ी घटनाएँ होती हैं, बड़ी घटनाएँ छोटी घटनाओं के लिए होती हैं... और कई छोटी-बड़ी घंटनाएँ होती रहती हैं जो एक दुसरे को प्रभावित करती रहती हैं.... और ये सभी घटनाएँ अंततः ब्रह्मांड के 'नेट बेटरमेंट' के लिए ही होती है। कई बार ये बातें हमारी समझ में आती हैं...अक्सर नहीं आती।,

देख! हमेशा इसकी संभावना है कि एक घटना के होने से दूसरी कोई घटना ना हो। लेकिन अगर कुछ हुआ है तो इसका मतलब ये है कि पूरे ब्रह्मांड में उसके होने के लिए घटनाएँ हुई। हर लमहें हम और हमारे आसपास के लोग कई काम ना करके... सिर्फ वही काम करते हैं जो हमें हमारी आज की अवस्था तक ले आते है ।  और रही बात प्री-स्क्रिपटेड की तो मानने की बात है... साबित तो तभी हो सकता है जब हम भविष्य देख सकें और ये साबित कर पाएँ की सबकुछ प्री-स्क्रिपटेड नहीं है ! Smile

(last paragraph by Ajit Thumbs up)

~Abhishek Ojha~

Jan 23, 2012

पाँच लीटर दूध और आधा किलो चीनी (पटना १०)

 

बैरीकूल से अक्सर चाय की दूकान पर ही मिलना होता था. चार बजे के आस पास, ४ रुपये की चाय. नियमित फोन करता था बैरी – ‘आइये भैया नीचे, चाय पी कर आते हैं’. मुझे उस दूकान की चाय अच्छी लगने लगी थी. बिरेंदर को अच्छी नहीं लगती.

‘अबे ! फिर तीता बना दिया है? है न भैया?’ - मेरी तरफ देखते हुए बिरेंदर ने पूछा.

‘हम्म…. हाँ, पर ठीक है' - मुझे ताज़ी पत्तीयों की खुशबू लिए कम देर तक उबली चाय अच्छी लगती. मैं चाय का शौक़ीन तो नहीं पर मुझे लगता है कि चाय अच्छी-बुरी नहीं होती. पीने वाले पर निर्भर करती है. कितना दूध, कितनी पत्ती और कितनी देर तक उबाली जाय. इन सबका अपना व्यक्तिगत पैमाना होता है  ! चाय बनाने के सबके अपने-अपने तरीके भी होते हैं. चाय के शौकीनों को एक-दूसरे की बनाई चाय अच्छी नहीं लगती ! वैसे बैरी कहता है कि लोग जैसे-जैसे ‘बड़े आदमी' बनते जाते हैं – ‘ब्लैक टी' की तरफ बढते जाते हैं. चीनी और दूध दोनों की मात्रा कम करते जाते हैं. ज्यादा बड़े लोग बिना शक्कर बस ब्लैक ही ‘परेफर’ करते हैं.

उस दिन मुझे जुकाम हुआ था.  जुकाम हो तो मेरी आँखें ज्यादा परेशान होती हैं…. सूजी हुई, लाल और अनवरत आंसू !  कुल मिला कर हालत ऐसी होती है कि जो भी मेरी हालत देख ले उसे चिंतित होने का अभिनय तो करना ही पड़ता है. और फिर बैरी तो… जान लड़ा देने वाला इंसान है.

बैरी ने कहा ‘भैया, आज कॉफी पी लीजिए. छोटू, एक अच्छी कॉफी बना के ले आ’.

‘… दूध ज़रा कम डालना.’ - मैंने चाय वाले से कहा. उससे दो दिन पहले कॉफी किसी तरह पी पाया था.

‘सर ! त काफी बनेगा कैसे? काफी त दूध में ही नू बनता है ?!’ - चाय वाले ने कहा.

बैरी ने उसे मना कर दिया. ‘चलिए भैया… आज आपको बढिया काफी पीला के लाते हैं.’ बैरी अपनी बाइक ले आया और ५ मिनट में हम मोना सिनेमा पंहुच गए.  और… यहाँ भी सभी बैरी को पहचानते थे. बीच में एक लड़का दिखा तो बैरी चला गया. २ मिनट बाद आया तो हंसते-हंसते लोट-पोट. मैंने पूछा ‘क्या हुआ?’

‘कुछ नहीं भैया, उ जो लड़का था न, मेरा दोस्त है. यहीं मोना में टिकट काउंटर प रहता है, बोलता है कि भैया को बोलो… काहे पहने हैं इ सब फूटपाथ वाला कपरा… आ इ चाइना मोबाईल काहे लिए हैं?’

‘हा हा' - मुझे बात समझ में नहीं आई. और कई बार ना समझ में आये तो साथ हंस देना एक अच्छा उपाय होता है.

बैरी ने समझाया ‘इ जो ए एक्स लिखा है न आपके टी-शर्ट पर इ यहाँ फूटपाथ पर ही मिलता है. इ हो गया… फिर से… केल्विन क्लेन हो गया… इ सब फूटपाती कपरा है पटना का. आ फोन तो टच स्क्रीन बड़ा… माने चाइना मोबाईल ही होगा.’

तब तक हमारी कॉफी आ गयी. ‘आछे, एक ठो बात का बुरा मत मानियेगा भैया. लेकिन ऐसा नहीं है आजकल ऑफिस में सब काफी इसलिए पीता है कि इसी बहाने एक ठो ब्रेक मिलेगा?’

‘नहीं नहीं, ऐसा नहीं है. कई लोग तो अपने डेस्क पर ही कॉफी पीते हैं.’

‘अरे ! लेकिन लाने त जैबे करेगा. अब देखिये… मजदूर सब एतना खैनी काहे खाता है?’

‘नशा है !’

‘अरे नहीं भैया. नशा तो खैर हैये है. लेकिन इसी बहाने उसको दस-पन्द्रह मिनट का बरेक मिल जाता है. पाँच मिनट बनाएगा, बांटेगा… ऐसे करके सब मटिया लेता है… वइसेही आजकल काफी का फैसन है. अपना ऑफिस से निकले १० मिनट टाइम पास किये… काफी बरेक !’

‘बात तो सही है  तुम्हारी'

‘आछे , एक ठो और बात है. इ वाला काफिया आप पी कैसे लेते हैं?’

‘क्यों?’ मैंने पूछा.

‘एक बार हम भी पीये हैं… यही वाला. बहुते कड़वा होता है. एकदम जानलेवा… अइसा जहर जैसा चीज कोई काहे पीता है. हमको तो नहीं बुझाता है.'

‘अरे चीनी-दूध डाल लेते’ - मैंने हंसते हुए कहा.

‘चीनी-दूध? देखिये भैया ! एक ठो बात बोलें? इसमें पांचो लीटर दूध आ एको पौवा चीनी डाल दीजियेगा त आपको लगता है कि ई पीने लायक बन पायेगा? लेकिन अब कड़वाहट के लिए ही पीते हैं, यही कह दीजिए. सब कहता है कि नींद भाग जाता है, सर दर्द ठीक हो जाता है. अरे इहे नहीं कवनो जहर जैसा कड़वा चीज पी लीजिए…. त पीने के बाद १० मिनट तक तो अइसही माथा झनझनाते रहेगा… अईसा कड़वा मुंह में गया त कोई और टेंसन बचेगा? !  अरे यही काम नीम का पत्ता  भी कर सकता है, करेला भी… नहीं तो दुई ठो मिर्ची चबा लीजिए… गारंटी है नींद भाग जाएगा. हा हा हा. है कि नहीं भैया ? लेकिन अब फैसन है तो है.’

‘हे हे हे. बोल तो तुम बिल्कुल सही रहे हो' मैंने हंसते हुए कहा.

‘ऐ जिम्बाज ! इधर आओ तनी...’ बैरी ने एक लड़के को बुलाया.

‘देख रहे हैं भैया. इ जिम्बाज है पटना का. अरे आओ न इधर… सर्माता काहे है, परनाम कर भैया को’ बैरी ने कहा. ‘दो मिनट में आया बीरेंदर भैया’ कहकर जिम्बाज कहीं चला गया तो बैरी ने आगे सुनाना शुरू किया ‘लौंडा बड़ा जिम्बाज है? जिम्बाज समझते हैं? जांबाज नहीं - जिम बाज. साला काम करेगा नहीं. आ जिम जाएगा. हमको देखिये… हम जानते ही नहीं है जिम होता क्या है !’ बैरी ने सगर्व बताया.

‘ज़माना बदल गया है भैया… अब देखिये न पहिले बाबूजी भोरे-भोर गाते थे. ‘जागिये ब्रजराज कुंवर पंछी बन बोले’… अब साला फोन का अलारम ही भजन कीरतन है. ‘जागिये ब्रजराज कुंवर घंटी टन-टन बोले’… सब जगह वही हाल है. हमरा मनेजर है…. जानते हैं… नहैबो करता है त फोन बगल में रखता है. सबसे पहिले खाली हाथ पोछ के एक बार फोनवा देख लेगा तब जाके बाकी देह पोछता है. पता नहीं साले को अइसा का चेक करना होता है हर दू मिनट में फोन जरूर देखेगा. और इ लईका सब तो एतना मेसेज करता है कि… मूतने भी जाएगा त एक हाथ से एसेमेस करते रहेगा… दूसरा हाथ त… हा हा… . सच्ची बोल रहे हैं भैया… अभीये इंटरवल में यहीं मोने में आपको दिख जाएगा…’ बैरी ने फोन पर कुछ टाइप करते हुए कहा.

‘लेकिन तुम भी तो इसी जमाने के  हो?’ मैने हंसंते हुए पूछा.

‘नहीं भैया. हमलोग अभी भी…’ बैरी ने विस्तार से बताया कि वो कैसे नहीं है अपनी उम्र के बाकी लड़कों के जैसा.

‘यार बिरेंदर कुछ भी हो तुम बात बहुत सही कहते हो, एकदम ज्ञानी की तरह' मैंने कहा.

‘अरे नहीं भैया, हमलोग जमीन से जुरे आदमी हैं. और जहाँ तक ज्ञान का बात है तो एक बात जान लीजिए इ बिहार है यहाँ किसी को ज्ञान हो जाएगा. आपको क्या लगता है बुद्ध को यहीं ज्ञान क्यों मिला? आये अपना… इधर कुछ दिन… राजा आदमी थे… इधर आके लूटे-पीटे होंगे आ जब भूख से पटपटाये… हो गया ज्ञान !’ बैरी ने हंसते हुए कहा.

हम वापस आ गए. अभी बैरी की कई बातें याद आ रही हैं… नींद से उठते ही आँखों के सामने पहली चीज मोबाईल स्क्रीन  होती है तो बैरिकूल की बातें याद आती हैं. और ये नया प्रभात मन्त्र:

फोनाग्रे वसते ट्विटर: फोनमध्ये जीमेलः| फोनमुले तू फेसबुक: प्रभाते कर फोन* दर्शनं ||

मुझे पूरा भरोसा है कि आप भी किसी ऐसे ‘आजकल के लोग’ को जानते हैं जो फोन में घुसे रहते है. लेकिन आप खुद ऐसा नहीं करते होंगे. …कई बार मुझे समझ में नहीं आता कि ये ‘आजकल के लोग' होते कौन हैं. Smile क्योंकि सभी तो दूसरों को ही आजकल के लोग कहते हैं… खुद तो वैसे होते नहीं Smile

~Abhishek Ojha~

बहुत दिन हो गए पटना से लौटे हुए. पटना सीरीज को १० तक ले जाने के लिए आज फिर बैरी को खींच लाये. संभवतः पटना सीरीज की आखिरी पोस्ट हो.

*सुधार के लिए आभार: आराधना चतुर्वेदी.

Jan 9, 2012

२०११...

 

साल 2011 का कुछ-कुछ अपने पास पड़ा रह गया है... वो तो अब वापस लेने आएगा नहीं... ये अब अपने साथ ही रह जाएँगे। हमारा कुछ अगर किसी के पास रह गया होगा तो ये उन्हें पता होगा... हमें याद नहीं। हाँ, हमारे पास जमा हो गए हैं... - कुछ अनुभव – कुछ यादें – कुछ किताबें – कुछ तस्वीरें - कुछ अपेक्षित - कुछ अनापेक्षित – कुछ लोगों से मिलना - कुछ जगहों से ।

कुछ जगहों और लोगों से लगभग एक दशक बाद मिलना हुआ। बचपन के चौराहों और मुहल्लों से गुजरना हुआ। बस स्टैंड, मंदिर, चौक... वो हर हर टूटी फूटी चीजें जिनसे यादें जुड़ी हुई हैं।  ऐसी जगहों पर भी जाना हुआ जहां शायद योजना बनाकर कभी नहीं जा पाता। कुल मिलाकर वैसे ही जैसे एक मानव के जीवन के दिन गुजरते हैं...

पटना – रांची - मुंबई - दिल्ली - सुंदरबन - कोलकाता - बोध गया - राजगीर - नालंदा - पावापुरी - वाराणसी - सारनाथ - बैंगलोर - न्यू यॉर्क –

बहुत सारे अच्छे लोग... और कुछ... हम्म... अच्छे लोग। बाकी अनुभव और ज्ञान सिखा देने वाले लोग। ऐसे अनुभव देने वाले चंद लोगों को (एक ही) जब मैं याद कर रहा हूँ... तो...  दरअसल मेरा कुछ बिगड़ा नहीं  ! बल्कि एक बात सीखने को ही मिली और ये कि मैं किसी और के साथ उनके जैसा कभी कर नहीं पाऊँगा। बिन उनके ऐसे कहाँ से सीख पाता जी !  मैं उनसे जीवन में शायद दुबारा नहीं नहीं मिलूँ... मुझे तो लग रहा है कि वो बस मिले ही थे मुझे सीखाने के लिए :)

बहुत कुछ लिखने का मन हो तो समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करें। वो सारे शिक्षक जो एक दशक बाद पहचान गए और... या फिर वो जिनसे मिलना था और... ! वो अनजाने लोग जो  आपके लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं... निःस्वार्थ-अकारण प्रेम करने वाले... या वो जिनके लिए बिन वास्तविकता जाने जाने मन गुस्से से भर जाता हो और अंत में आपको वो कुछ भी बोलने का मौका ही नही देते ! दुनिया भले लोगों से भरी हुई है। इतने अच्छे लोगों से कि उनसे मिल कर लगता है... 'इनसे अच्छे लोग भी होते हैं क्या? अगर होते हैं तो कैसे होते होंगे  !'

ऐसी जगहों से गुजरना हुआ जहां से गुजरना अपने आप में एक अजीब अनुभव था। कई जगहें तीर्थंकर महावीर और तथागत दोनों से जुड़ी हुई हैं.... एक विचार अक्सर आता कि क्या दोनों कभी मिले होंगे? संभव है ! अगर हाँ, तो कैसा रहा होगा ? मैं अक्सर तुलसी और सुर सूर को लेकर भी ऐसा सोचता हूँ... अक्सर एक कहानी सी चल उठती है मन में... कैसा अद्भुत रहा होगा ! क्या बातें की होंगी उन्होने ? हिन्दू-बौद्ध-जैन ये धर्म सहिष्णुता के अद्भुत मिसाल  हैं !  राजगीर, बराबर की गुफाएँ और एलोरा इन जगहों पर ये सोच कर रोमांच हो उठता है कि कैसे इन तीनों धर्मों के लोग एक साथ मंत्रणा करते होंगे ! खैर...

इस साल की साथ रह गयी यादें... कभी न कभी, कहीं न कहीं... किसी बात में, किसी पोस्ट में, किसी कहानी में, किसी से बात करते हुए जाने-अनजाने आते रहेंगे। मैं अक्सर लोगों की तस्वीरें नहीं लेता... शायद जरूरी नहीं। वो अपने साथ रह गए हैं... वो याद रहें ना रहें उनकी बातें अचेतन मन पर अपना असर छोड़ जाती हैं। डायरी पलटता हूँ तो कितनी बातें हैं...

फिलहाल कुछ तस्वीरें...

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वणावर (बराबर) गुफाएँ, जहानाबाद बिहार। तीसरी शताब्दी पूर्व तक की गुफाएँ। हिन्दू, बुद्ध, और जैन तीनों धर्मों से जुड़ी हुई धार्मिक सहिष्णुता की प्रतीक, संभवतः भारत की प्रथम ज्ञात मानव निर्मित गुफाएँ हैं। गुफाओं  की अद्भुत चिकनी भीतरी दीवारें मौर्यकालीन कला की उत्कृष्टता दर्शाती हैं।

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बोधगया। अद्भुत शांति !

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मैनहट्टन -मेरे अपार्टमेंट से, और ब्रोन्क्स ज़ू में रॉयल बंगाल टाइगर।

microfinancepatna

पटना में एक माइक्रोफाइनान्स ग्राहक और गोलघर से पटना।

nalandapawapuri

नालंदा विश्वविद्यालय अवशेष और जल मंदिर पावापुरी।

rajgirranchi

विश्व शांति स्तूप राजगीर और रांची में मेरी पसंदीद जगह - जगन्नाथ मंदिर।

sundarbankolkata

सुंदरबन और कोलकाता।

varanasisarnath

वाराणसी और सारनाथ।

mumbai

मुंबई में एक दिन।

~Abhishek Ojha~