Mar 2, 2018

फगुआ


- फगुआ क्यों बोल रहे हो. कैसा तो लगता है सुनने में. चीप. होली बोलो.

- चीप? 'चीप' भी  कैसा तो चीप लगता है सुनने में फूहड़ बोलो. फगुआ इसलिए क्योंकि बात फगुआ की हो रही हो तो उसे होली कैसे कहें?
- दोनों एक ही तो होता है?
- एक  ही कैसे होता है? माने गुझिया और पुआ एक ही होता है? अगर होता है तो फिर फगुआ और होली भी एक ही होता है. वो बात अलग है कि गुझिया ने पुआ को पीछे ठेल कब्ज़ा कर लिया है इस त्यौहार पर.
- मतलब?
- अरे पुआ माने पुआ. गुझिया.. नाम से ही शर्माती इठलाती. सोफिस्टिकेटेड.
- पर उससे क्या फर्क पड़ता है? दोनों ही मिठाई है जिसको जो मन बनाए.

- कैसे फर्क नहीं पड़ता ! अब पहसुल और चाक़ू भी तो दोनों सब्जी ही काटते हैं. पर एक से काटने वाला दुसरे से काटे तो हाथ उतर जाए ! फगुआ पहसुल है. होली शेफ'स नाइफ. झुलनी (ईअर रिंग - कर्णफूल ) लगा वाला पहसुल देखी हो कभी? उस पर काटने वाले अलीबाबा की कहानी के मुस्तफा दरजी की तरह अँधेरे में  भी काट के धर दे.  और तुम्हे तो उन्हें काटते देख के ही गर्मी छुट जाए - ओ माई गोड इट्स सो डेंजरस ! चाक़ू से क्यों नहीं काटते ये लोग ! (पहसुल तो पता है न ?)

-  लेकिन फगुआ और होली का उससे क्या लेना देना?

- अरे वही जैसे सब्जी और तरकारी. सिलबट्टा और मिक्सर।
- कहाँ की बात कहाँ ले जा रहे हो? सब्जी और तरकारी कहाँ से आ गयी?.
- अरे.. उनमें भी वही अंतर है जो होली और फगुआ में है.

- व्हाट्? दोनों एक ही तो होता है.

- वही तो .. एक ही होता है. तरकारी माने... भरपूर. फ़ेंक-फ़ेंक के खाने जैसा. घर का. मन उब जाने तक. और सब्जी माने बाजार से ठोंगे में लाया गया. तरकारी माने घर की मुंडेर और खेत में से तौला के लाया गया बोरा नहीं तो कम से कम झोला भर - आलू टमाटर, धनिया... खेत में लगा धनिया देखा है कभी? बोझा में से तोड़ने को इफरात में मटर की छेमी. सब्जी माने प्लास्टिक के झिल्ली में लाया गया एक पौउवा आलू- एक मुट्ठी धनिया, फ्री का दो मिर्ची और फ्रोजेन मटर. एक टोकरा-बोरा में रखाता है दूसरा रेफ्रिजेरेटर में.

- लेकिन बात तो वही है? अब बावन बीघा पुदीना जैसी बात मत करो.

- बावन बीघा वाली बात में दम है. पर अब भी क्लियर नहीं हुआ ? उस रंग को क्या जाने वाला मामला हो रहा है. फगुआ और होली में वही अंतर है जो चिट्टी और व्हाट्सऐप में. पुरे मौसम बाल्टी भर के जामुन खाने वाले में और साल में एक बार ठोंगा का दो जामुन खा के 'इट इज वैरी गुड टू कण्ट्रोल डायबिटीज' कहने वाले में. फगुआ अभाव में भी इफरात का पर्व है. जो बाल्टी में जामुन खाता है उसको पता ही नहीं डायबिटीज क्या होता है ! बेपरवाह. मस्तमौला. जामुन पेंड पर होता है, खाने में अच्छा लगता है इसलिए खाता है. उसमें कितना कैलोरी है और कितने विटामिन इससे उसको क्या ! तो बस वही फर्क है - रगड़ के रंग खेलने और सिर्फ अबीर का टीका लगा लेने का फर्क जैसा. इ ब्लैके पीते हैं वो भी डीप वाला और मलाई मार के घोट के बनायी गयी चाय का फर्क. बैठ के वाटरलेस और रंग से हार्म हो जाएगा सोचने बनाम उन्मुक्त प्रवाह का फर्क है.

- व्हाटेवर !

- होली का नेशनल एंथम रंग बरसे फ़ोन पर देखने और भांग चढ़ाए ढोल-जाँझ लेकर फाग-चैता गाने वालों में घुल  जाने का अंतर है. अंतर है ... हुडदंग का और 'ओ माय गॉड ! हाउ कैन..' का. अंतर है उन्मुक्त प्रवाह में शामिल होने का और दूर से उसमें मीन-मेख करने का.

[ट्विटर पर पता चला होली को महिला विरोधी और पता नहीं क्या क्या विरोधी करार दिया गया ! फेमिनिस्ट तो खैर वैसे ही एक स्तर के बाद दिमाग से वैर पाल लेते हैं. फेमिनिस्ट ही नहीं किसी भी 'वाद' वाले. पिछले दिनों एक महिला मित्र ने हार्वर्ड क्लब में एक फेमिनिस्ट समूह में कह दिया कि मेरा पति तो... तो बात सुन कर ही सबका मुंह लाल हो गया. उनके गले ही नहीं उतरा कि एक तो पुरुष ऊपर से पति अच्छा हो कैसे सकता है ? ! ऐसा भी होता है क्या !  क्योंकि ये तो फेमिनिस्ट-वाद की मूल धारणा के खिलाफ ही बात हो गयी ! खैर. अपनी अपनी  सोच। अपने अपने संस्कार! ये सब बात नहीं करनी चाहिए देखिये असली बात ही डीरेल हो गयी इनके चक्कर में]

- फगुआ माने मदमस्त मादक (ये भी चीप?) और होली माने.. सेक्सी कह लो अगर वो चीप नहीं लग रहा तो. निराला का प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक पढ़ा है? वैसे ...घुमा फिरा के दोनों एक्के है.

- मतलब दोनों एक ही है?.

- अब जो है सो है. अब कहो कि आम पर फूल लगे हैं और कहो कि आम बौरा गये हैं तो एक ही बात तो नहीं होगी ? कुछ तो कारण है कि उसे बौराना कहते हैं ?

- तुम बौरा गए हो.

- अब तो बात ही ख़त्म !  हद हो ली.


~Abhishek Ojha~

Feb 14, 2018

तीन सामयिक बातें

तीन बातें का मतलब तीन ही नहीं, अब शीर्षक कुछ तो रखना पड़ेगा न ...बातें निकलेगी तो एक दुसरे से लिंकित होते दूर तलक जाए या आस-पास ही मंडराती रहे ...तीन पर तो नहीं ही रुकने वाली। पढ़ते हुए जहाँ भी लिंक मिले लपक के (क्लिक कर के) पढ़ आइयेगा क्योंकि असली बात वहीँ है. -


१. जेएनयू

आधी बात तो आपको जेएनयू पढ़ते ही समझ आ गयी होगी. अब ये कहने को तो यूनिवर्सिटी ही है पर न्यूज में हर बात के लिए आता है ...केवल पढाई-लिखाई से जुड़ी बातों को छोड़कर. किसी नाम को एक विचारधारा विशेष का पर्याय बन जाने के लिए प्रयास तो बहुत करना पडा होगा, नहीं ?

मेरी आदत है वहां टांग नहीं घुसाने की जहाँ का कोई आईडिया नहीं पर यहाँ आइडिया था तो...

एक व्हाट्सऐप ग्रुप पर जब जेएनयू के प्रोफ़ेसरों के लिखे कुछ (अटेंडेंस के मुद्दे पर)आर्टिकल आये तो हमें लगा कि लोग कुछ भी लिख दे रहे हैं ! अखबार में छपे और टीवी पर दिखने वाले विद्वताझाड़कों (शब्द सोर्स) से हम प्रभावित होना बहुत पहले छोड़ चुके। उसके कई कारण है. एक कारण ये भी है कि खुद भी थोड़ा बहुत तथाकथित विशेषज्ञ की हैसियत से छप चुके हैं (अब बताइये आज से तीन साल पहले जो बिटकॉइन पर लिखता था उसे तो भर-भर के पैसे बना लेने चाहिए थे, नहीं? ☺) और हार्वर्ड, स्टेंफर्ड, एमआईटी जैसे भारी-भारी डिग्री और प्रोफाइल वाले लोगों के साथ उठाना बैठना कुछ यूँ है कि (बैरीकूल की भाषा में कहें तो -) घंटा हम अब उससे इम्प्रेस नहीं होते☺ ... प्रोफ़ेसरी का भी आईडिया है. और फिर ‘धन्य धन्य ट्विट्टर कुमारा, तुम समान नहि कोउ उपकारा’. ट्विट्टर न होता तो हम बहुत से बे सिर पैर के बात करने वाले विद्वताझाड़कों को सीरियसली ही लेते रह जाते.


तो कुल मिला के हमें लगा कि आर्टिकल लिखने वालों की बात में टांग घुसाने भर का आईडिया हमें है. और ये लिखने वाले लोग कोई तोप-तमंचा नहीं है. तो हमने एक बड़ा संयमित सा जवाब लिखा. कॉलेज के दोस्तों ने कहा ‘चापे हो’ (माने अच्छा है). लेकिन ऐसा है कि विचारधारा विशेष के लोग अपनी बात कह के निकल लेते हैं. आपके तर्क सुनते हैं या नहीं ये आप सोचिये. खैर... तो वो बात यूँ थी. पढ़ा जाय - JNU Attendance Row (वैसे हम बोरिंग बात तो नहीं करते पर पढ़ते-पढ़ते आप पर अगर बोरियत माता सवार हो जाएँ तो अगली बात पर चले जाएँ, शायद उसमें कुछ मजे की बात मिल जाए. फिर से वापस आकर पढ़ने का विकल्प कहीं गया थोड़े है). सोचा हिंदी में अनुवाद किया जाय पर अंग्रेजी में ही पढ़ आइये.


२. आँख मारने वाली लड़की


वायरल, एपिडेमिक, मारक सब हो चूका तो ऐसा तो नहीं है कि आपने क्लिप नहीं देखा होगा. और मौसम भी है फगुआ का तो वैसे भी भूगोल, कर्व, तरंग, एपिडेमिक सबका मतलब और इक्वेशन बदल जाता है. सब कुछ ऐसे पढ़ा जाता है -

तन्वी श्यामा शिखरि दशना पक्व बिम्बाधरोष्ठी. मध्ये क्षामा चकित हरिणी प्रेक्षणा निम्ननाभि।
श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्यां. या तत्रा स्याद्युवतिविषये सृष्टिराद्येव धातुः।

इसका अर्थ गूगल करके पढ़िए. (मघा पर लिखने का साइड इफ़ेक्ट है).

पर सच बताएं तो हमें इस क्लिप में कुछ अलौकिक सा नहीं नहीं लगा (अपना अपना स्टैण्डर्ड है भाई ☺). ये जरूर लगा कि लोग फ़ोन, फ़िल्टर और स्क्रीन में कुछ यूँ घुसे होते हैं कि भूलने लगे हैं अदा होती क्या है ! नैन नक्श, चाल-ढाल, मुस्कुराना, शर्माना ... धीरे-धीरे साधारण बातें भी अद्भुत हो ही जानी है. जैसे फसलें कौन पहचान पाता है? आलू, टमाटर, गेंहू, बैगन, चना इन्हीं को खेत में लगा दिखा दो... कितने लोग पहचान पायेंगे? और एवोल्युशनरी बायोलॉजी की मानें तो इन्हें पहचानना तो हमारे जींस (पहनने वाला नहीं गुणसूत्र वाला) में हो जाना चाहिए था अब तक. वैसे ही... फेसबुक पर फ़िल्टर के पीछे के चेहरे लाइक करते करते हम भूल ही गए हैं कि ‘अदा’, हाव भाव, एक्सप्रेशन होता क्या है ! ज्यादा छोड़िये पिछली बार आपने किसी को सुकून से सोते हुए कब देखा था? किसी को प्यार से कब जगाया था? धुप्प अँधेरी रात में आकशगंगा कब देखा था? किसी के साथ सुकून से बैठ के बात के अलावा और कुछ भी नहीं किया हो... ऐसा कितना समय बिताया.? कभी किसी के साथ बैठकर आकाश में सप्तर्षि और ध्रुव तारा के साथ मृग-लुब्धक-व्याध देखते हुए दिशा और समय का अनुमान लगाया? (एक उम्र में मैंने घडी के साथ साथ इनसे भी देखा है कि रात को पढ़ते पढ़ते कितना समय हो गया!) कितने काम हैं जी.... जो आपने कभी नहीं किया? या अब नहीं करते? खाली पैर चले किसी के साथ? किसी की धड़कन सुने हैं क्या कभी? भारी काम नहीं है ये सब. विशेषज्ञता नहीं चाहिए. लेकिन पता नहीं क्यों मुझे चेतावनी दी जाती है कि तुम रोजमर्रा का काम लिख दो तो “रोमांटिक होने के १००१ तरीके” की किताब हो जायेगी. पर उसके बाद लड़के सब मिले के तुम्हें कूट देंगे और लडकियां तो वैसे ही पीछे पड़ी रहती हैं तुम्हारे”.

हमें नहीं पता था कि ये सब पुरातन काम भी रोमांटिक होना है – बताया गया तो लगा होता होगा. शायद नेचुरले रोमांटिक होते हैं कुछ लोग. जो कर दें वही रोमांटिक हो जाता है. वैसे क्लिप पर लौटें तो। ...हमको कुछ भी समझना-समझाना-पढ़ाना बहुत अच्छा लगता है और जब भी किसी लड़की को फिजिक्स और गणित का ‘तत्व’ समझाने की कोशिश किये... खुदा कसम (खुदा कसम की व्याख्या सीट नंबर ६३ वाली पोस्ट में है) उसके बाद वो हमें जिस नजर से देखी ...उसके सामने ये क्लिप कुछ नहीं है! किसी ने दुनिया में सोचा होगा कि ये भी रोमांटिक होता है? – स्ट्रिंग थ्योरी?! खैर अब और नहीं... बहुत लोग मेरा ब्लॉग पढ़ते हैं ईमेज का बंटाधार हो जाएगा. अब श्री श्री १००८ तरीके में ही लिखा जाएगा डिटेल में. ये सब इसलिए भी कि वायरल होने में तो अदा वगैरह जो था सो तो था ही... पता चला एक फतवा भी आ गया (सही न्यूज़ है न?. नहीं भी है तो ये क्या कम है कि पढ़ के लगा जरूर ऐसा हो सकता है !). फतवा के ऊपर एक लतवा भी जारी होना चाहिए. फतवा जारी करने वाले को देखते ही लतिया देने का. ऐसा फतवा वही जारी कर सकता है जिसने कभी “चकित-हरिणी-काम-कमान” जैसा कुछ देखा ही नहीं. या फिर जिसे कभी किसी ने उस नजर से नहीं देखा जैसे बिल्ली कबूतर को देखती है (ये वाला मेरा अपना ओरिजिनल है). नैन तो बुरखे (ख होता है कि क?), हिजाब में भी दीखते हैं, माने अब क्या? ! खैर... सौंदर्य रस पर कभी और लिखा जाएगा. और वैलेंटाइन से इस पोस्ट का कोई लेना देना नहीं है. वो क्या है कि - सदा भलेनटाईन प्रेमी का, बारह मास वसंत. पर पोस्ट लिखने का मुहूर्त आज ही बन गया. आप वैलेंटाइन की पोस्ट मानकर पढ़ रहे हैं तो भी हमें कोई आपत्ति नहीं. जो बारह मास वसंत वाले नहीं नही उनके लिए एक दिन ही सही ☺


३. पकौड़े बेचना

पकौड़े बेचने का बड़ा हौव्वा रहा आजकल. मेरा एक गुजराती दोस्त है. सिविल इंजिनियर. वो पिछले पांच साल से कह रहा है – “बाबा, बहुत हुई नौकरी. अब एक फ़ूड जॉइंट खोलते हैं. डॉलर छापेंगे. देख दीप फ़ूड वाले को”. वो बस इसीलिए नहीं खुल पा रहा क्योंकि सारी रेसिपी मेरी है. और भगवान ने गिने-चुने लोगों के भाग्य में लिखा मुझ जैसे आलसी के हाथ का खाना ! नौकरी की इतनी तौहीन और पराठा बेचने की ऐसी इज्जत उससे ज्यादा कोई और नहीं कर सकता. पर लोग साधारण सी बात को भी अपनी विचारधारा में लपेट के उलझा देते है. एक लाइन की बात है – मज़बूरी और शौक का फर्क. मैकडोनाल्ड्स भी अमरीकी वडा पाव बेचने वाला रहा होगा कभी. दीप फ़ूड वगैरह वगैरह तो खैर पकौड़ा ही बेचते थे. अगर आपको रूचि हो तो पूछियेगा हम सुनायेंगे दो चार सक्स्सेस स्टोरी.

हमको जिंदगी में सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बातों में से एक सीख मिली थी – ‘जो काम करो अच्छे से करो, घास ही छिलो तो ऐसे कि उधर से जाने वाला देख के कह उठे ...कौन है जो ऐसा काट के गया है? ! (प्लीज नोट दैट घास काटने की बात है कुछ और नहीं.)’ कालान्तर में हमने उसे थोड़ा मॉडिफाई कर दिया कि ‘जिंदगी में घास ही छिलो तो ऐसे कि कम से कम दो चार गोल्फ कोर्स का कॉन्ट्रेक्ट तो मिले ही!’ काम छोटा बड़ा नहीं होता. मैं जहाँ भी रहा वहां किसी न किसी चाय वाले की आमदनी जरूर जोड़ा और हमेशा लगा कि उसकी आमदनी ज्यादा है. मार्जिन-रेवेन्यु-प्रॉफिट हम जोड़ते ही रह गए वो आगे बढ़ते चले गए. दुनिया-जहाँ के तर्क-कुतर्क पढ़े. चिदंबरम साहब को कहते सुना कि मैं आपको देता हूँ ४५,००० रुपये - करके दिखाओ बिजनेस.

इससे पता चलता है कि किस दुनिया में जी रहे हैं लोग ! जब लोग कहते हैं कि पचास हजार महीने में बहुत मुश्किल है आज के टाइम में सरवाइव करना. सरवाइवल शब्द की बेइज्जती लगती है मुझे. मुझे पचास हजार वाली मुद्रा योजना का कुछ नहीं पता. उससे किस किस ने क्या किया वो भी मुझे नहीं पता. कितना सफल होगा... नहीं पता.

दो बातें जो पता हैं –

पहली ये कि मैं जानता हूँ ऐसे व्यक्ति को जिन्होंने किसान क्रेडिट के लोन से गाडी खरीद लिया एक के बाद दूसरी और फिर तीसरी. लोन माफ़ होता गया...  किसान जो हैं.

ये करप्शन है? - हाँ.
इससे किसी को फायदा हुआ – हाँ.
जैसे होना था हुआ - नहीं.

पर वो क्या है कि चीजें इतनी साधारण नहीं होती कि जिसे भी ५०,००० रुपये मिलेंगे वो बिजनेस ही खड़ा कर देगा. वो उससे अपनी बेटी की शादी भी कर सकता है. करेगा भी. गरीबी के उस स्तर पर विचारधारा और अर्थशास्त्र नहीं चलता. और आपको लगता है कि पचास हजार में बेटी की शादी नहीं होती तो.. पचास हजार में पाँच भी होती है. आपने बस वो भारत देखा नहीं. जिसने देखा है वो जानता है. योजना की बात है तो स्वच्छ भारत योजना में बने टॉयलेट में गोईठा रखाएगा। हमने देखा है रखाते. लेकिन... कोई तो जाना चालु करेगा. आपका तर्क वैसे ही है जैसे... मनी कैन’ट बाई हैप्पीनेस सो तो ठीक है लेकिन व्हाट द हेल कैन पॉवर्टी बाई?

क्या ५०,००० से बिजनेस खड़ा हो सकता है?

इस पर दूसरी बात. स्वयं का अनुभव –

ये २०११ की बात है. इस लिंक पर इस नाचीज का लिखा. पेज नंबर ५. पढ़िए इसमें कितने रुपये के लोन की बात है और कितने रुपये के रिचार्ज कूपन का. किराए पर लेकर रिक्शा चलाने वाले के लिए ५०,००० नहीं... सिर्फ उतना जो वो रोज किराए के लिए देता है वो अपने खुद के रिक्शे के लिए क़िस्त में भरने लगता है तो उसकी जिंदगी बदल जाती है. जब मैंने माइक्रोफाइनांस में काम किया था (खाली पटना सीरीज  लिखने नहीं गया था, कुछ काम भी किया था).. लोन ५०००, १०००० के होते थे. ५०,००० के तो सबसे बड़े लोन थे. किश्तें ... २०, ५०,१००... आश्चर्य है कहाँ रहते हैं लोग? किस दुनिया में? जब किरोसिन को सोलर से रिप्लेस करने के प्रोजेक्ट पर काम किया था तो आईडिया था कि जितना एक परिवार किरोसिन के लिए महीने में खर्च करता है अधिक से अधिक उतनी ही क़िस्त होनी चाहिए सोलर लैम्प की.

क्या ये जो भी मुद्रा योजना है उसी तरह काम करेगी जैसे माइक्रोफाईनांस? –संभवतः नहीं. माइक्रोफिनांस में ब्याज दर सुन कर आपके होश उड़ जायेंगे. पर वहां स्वार्थ (इन्सेन्टिव) होता है पैसे देने वाले का कि वो सही बिजनेस में लगे. ताकि पैसे वसूल हो सके... सरकारी बाबुओं के पास ऐसा कोई इन्सेन्टिव नहीं. पर बिल्कुल ही बेकार, व्यर्थ या ये कह देने वाले कि ४०-५०,००० रुपये में कुछ हो नहीं सकता ! बिडम्बना है कि आपने कभी देखा ही नहीं भारत ढंग से. खाए पीये अघाए लोग कुछ भी लिखते-कहते हैं. और उसी तरह के लोग फिर बिना सोचे समझे जो दीखता है बिना पढ़े, सोचे फॉरवर्ड कर देते हैं. कम से कम सिर पैर तो देख लेना चाहिए ! आपके लिए पचास हजार कुछ नहीं. लेकिन आपके एक कॉफ़ी के पैसे से कम में दिन भर का खर्चा चल जाता है किसी का !

चलिए अब जाइए मौज कीजिये. पहले ही बोला था तीन पर नहीं रुकने वाली बात J

वैलेंटाइन हैं आज. तो अमेरिका में प्यार ‘सेल’ पर होता है – सुपर मार्किट, रेस्टोरेंट – हर जगह. और फ्लावर की तो खैर महिमा अपरम्पार है ही.  बाकी १००८ वाली किताब कभी आयी तो पढियेगा जरूर :)

~Abhishek Ojha~