Apr 3, 2011

ससराँव

 

एक भोजपुरी आंचलिक कहावत है. 

काहाँ जाताऽर? ससराँव. एगो जाँत लेले अईह.

भोजपुरी के केवल कुछ इलाकों में ही ये कहावत सुनी जाती है. जहाँ तक मुझे पता है बहुत ही Chakki-Jaantछोटे  इलाके में इस्तेमाल होती है. पर है बहुत शानदार  !. कहावत का अनुवाद कुछ यूँ है:

कहाँ जा रहे हो? सासाराम. एक जाँत (जाँता) लेते आना.

सासाराम बिहार का एक जिला** के रोहतास जिले का मुख्यालय है जहाँ पत्थरों की कटाई का काम होता है और उनसे घरेलु इस्तेमाल की सामग्री भी खूब बनती होगी (है?). वहाँ कभी जाँत बहुतायत में मिलते होंगे और ये मनोभावना भी होती होगी कि अच्छे मिलते हैं. वैसे जिन इलाकों में ये कहावत है वहाँ के सारे जाँत सासाराम में ही बनते होंगे तो अच्छे वाली बात का ज्यादा मतलब नहीं है. वैसे ही जैसे अब सबकुछ चीन में  ही बनता है. एपल के सामान आप अमेरिका से लो या सिंगापुर से बने हुए तो चीन के  ही मिलेंगे. हाँ सासाराम में जाँत थोड़े सस्ते जरूर मिल जाते होंगे. यही सासाराम कहावत में ससराँव या सासाराँव हो गया। वैसे कुछ लोग जब ज्यादा जोश में होते हैं तो सरसराँव भी कहते हैं.

तो कहावत का पहला हिस्सा तो स्पष्ट ही है: किसी के पूछने पर जब पता चला कि कोई सासाराम lady crushing wheat on traditional chakkiजा रहा है. तो पूछने वाले ने तपाक से कह दिया कि ठीक है अब जा रहे हो तो मेरे लिए एक जाँत (जाँता) लेते आना. जाँत अर्थात घर की चक्की. वही चक्की जिसे चलता देख कबीर बाबा रो पड़े थे. (चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोए. दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोए.) दुई पाटन के बीच  में कोई साबुत तो नहीं ही बचेगा लेकिन सासाराँव से जाँत लेकर आये तो भी… खैर मैं सोच रहा  था कहावत की व्यापकता. इस आंचलिक हिस्से में उस जमाने में (जब घर की चक्कियां होती थी) यातायात के साधन का अंदाजा लगाना तो मुश्किल काम है क्योंकि आज भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं है. वैसे में अगर किसी से जाँत लाने को कह दिया जाय तो...? !

एक तो जाते हुए को टोका गया जो कि अशुभ माना जाता है. अब भले ना माना जाय उस जमाने में तो अशुभ माना ही जाता होगा। फिर कोई अपने काम से जा रहा है तो उसे एक और काम पकड़ा दिया गया. और फिर काम भी ऐसा जो वैसे तो आसानी से हो सकता है लेकिन करने वाले का कचूमर निकल जाए. कुछ लोगों की आदत सी होती है कुछ मंगाना. "वहाँ का क्या प्रसिद्द है?" अब भले ही नागपुर से संतरे लाने में सड़ जाएँ लेकिन मंगाने वाले तो मंगाएंगे ही !

अब इसे सोचिए: कोई भारी भरकम जाँत लेकर आया होगा सासाराम से 200-250 किलोमीटर दूर। कैसे लाया होगा ये तो अब लाने वाला ही बता सकता है: गोबिन्द की गति गोबिन्द जानै। कहावत ऐसे तो नहीं ही बनी. कोई तो लेकर आया ही होगा क्योंकि उस जामने में भी लोग होते ही होंगे जिन्हें 'ना' कहना नहीं आता होगा। उफ़्फ़ ! उसकी दुर्गति मुझसे सोची नहीं जा रही। दो भारी पत्थर घसीटते, लुढ़काते, कंधे पर, सिर पर... बैलगाड़ी, ना जाने कैसे लेकर आया होगा। सड़कें तो होंगी नहीं। खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, नदी पार करते... रास्ते में लोग पूछ भी लेते होंगे और उसकी मूर्खता पर हँसते भी होंगे 'यहाँ नहीं मिल जाता जो सासाराम से लेकर आ रहे हो?' बेचारा कह भी नहीं पाया होगा कि किसी और के लिए है !  कुछ बच्चे भी चिढ़ाने के लिए पीछे पड़ गए होAn Old Man is Dressing a Millstone - 19th Century Watercolor on Paper शायद। भगवान जाने कहीं ढेला भी ना मार रहे हों पीछे से।

और मजे की बात तब हुई होगी जब मंगाने वाले ने कह दिया होगा अच्छा नहीं है। ऐसा तो यहाँ भी मिल जाता है। थोड़ा हल्का है, टुँगाई अच्छी नहीं है। वगैरह... और अंत में 'ले लो हींग उधारी, वैशाख के करारी'* के तर्ज पर अगर कह दिया होगा: पैसे तो अभी हैं नहीं वैशाख में ले लेना। तो और मस्त। Thumbs up

मैं ये क्यों सोच रहा हूँ ? अव्वल तो खुश हो रहा हूँ कि जाँतों का जमाना चला गया और दूसरे साथ में वैशाख का इंतज़ार भी तो कर रहा हूँ Smile

*किसी जमाने में नेपाल से हिंग विक्रेता भारत में हींग बेचने आते थे और उधार में हींग देकर चले जाते फिर वैशाख में पैसे वसूलने आते। जाँत की तरह अब वो भी शायद ही कहीं दिखते हों। मैंने भी शायद सुना ही है !
**मनीषजी के कमेन्ट के बाद सुधार: सासाराम जिला नहीं बल्कि रोहतास जिले का मुख्यालय है.

~Abhishek Ojha~

16 comments:

  1. तो कब जा रहे हैं ससराँव? एक जाँत मंगवाने का विचार था, पैसे अगली बैशाख में:))

    बचपन में एक कहानी पढ़ी थी जिसमें लेखक से गोभी के फ़ूल मंगवाये गये थे शायद लखनऊ से। तब तो कोर्स का हिस्सा था, इसलिये बोझ समझकर पढ़ी थी लेकिन उसके बाद बहुत तलाशी वो व्यंग्य-रचना, नहीं मिली। आज फ़िर से उसकी याद ताजा हो गई। क्या जमाना आ गया है देखिये, याद भी आ रही है तो गोभी के फ़ूल की:))

    मिलते जुलते विषय पर सतीश पंचम जी की भी एक पोस्ट आई थी जिसमें भारी भारी पत्थर ऐसे ही दूर तक पहुंचाने की प्रथा का वर्णन था। थी एक चिड़िया ’सामाजिक सहभागिता’ नाम की कभी जो व्यक्तिगत दुरूह कार्य को भी सामूहिक दायित्व बना देती थी।

    nice तो लिख ही दूँ, नहीं तो टिप्पणी न माने जाने का खतरा है:)

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  2. क्लू तो आखीर में आपने खुदै दे दिया -कोई लाता थोड़े ही होगा ..गदहे पर लोग बेचने आते थे और लाना ही रहा होगा तो एक ठू गदहा भी खरीद डालते होंगे -या इनामी योजना रही होगी -जांत के साथ गदहा फ्री! लौट कर गदहे को धोबी को टरका देते होंगें-धोबिन भी खुश!
    एक अच्छी भली वैशाख नन्दन पोस्ट!

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  3. एक साथ बहुतों ने मंगा लिया तो कैसे लायेंगे?

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  4. ससरांव आने की क्‍या जरूरत है.. हम हैं ना.. पश्चिम जानेवाले किसी भी ट्रक पर डाल देंगे आप उतार लीजिएगा :)

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  5. हम्म ये कहावत तो हमने सुनी ही नहीं....जबकि मेरी मम्मी का ननिहाल सासाराम है...फोन लगाती हूँ उन्हें...:)

    जांता के बहाने बढ़िया चिंतन कर डाला...

    लगता है....जरूर पिछले जनम में किसी ने जांता मंगवाया होगा..आपसे...:)...तभी सोच इतनी दूर तक गयी...:)

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  6. @संजयजी: जाना हुआ तो आपको बताता हूँ :) ’सामाजिक सहभागिता’ नमक चिड़िया अभी उडी नहीं है. कभी-कभी बोलते सुनाई दे जाती है. वैसे ही जैसे आम के बागों के ख़त्म हो जाने पर भी कोयल कन्फ्यूज होकर सीजन में कभी बोल ही देती है :)

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  7. @अरविन्दजी: धन्य हैं आप पंडीजी. हम काहे नहीं पाए आपके जैसा दिमाग :) जाँत के जाँत गदहे का मुनाफा और धोबिन का डिवीडेंड़ अलग से. व्हाट एन आईडिया सर जी! वाह.
    @प्रवीणजी: फिलहाल तो गदहे वाला आईडिया ही जम रहा है. :)
    @अशोकजी: बिलकुल आपको खबर करता हूँ :)
    @रश्मिजी: पिछले क्या इसी जन्म. गनीमत है जाँत नहीं कुछ और था. आशा है वैशाख तक पैसे मिल ही जायेंगे :)

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  8. यह जुमला उन लोगों को लक्ष्य करके कहा जाता है जो किसी अवसर का स्वार्थवश लाभ उठाने (दुरुपयोग करने) के चक्कर में दूसरों की परेशानी पर ध्यान नहीं देते।

    ढेका और जाँता से जुड़ी कुछ अनुभव जन्य बातें व लोकोक्तियाँ यहाँ देखें।

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  9. ये कहावत सुनी तो है खूब।
    अच्छा है जाँता पुराण।
    घर में एक है, अब मंगवाया किससे गया था, ये नहीं पता। लेकिन २-३ ख़ास दिनों को कुछ न कुछ पीस लेती हैं माँ।

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  10. @इसलिए ही तो कहत हैं जी के कभी कभार हम बड़े बूढों की शागिर्दगी कर लेने में कौनो हरज नाही है !

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  11. @सिद्धार्थजी: वही तो असली बात है. लिंक के लिए धन्यवाद.
    @अविनाशजी: अपने घर की भी बिलकुल यही कहानी है.
    @अनुरागजी: :)
    @अरविन्दजी: अरे, ऐसे थोडा न फैन है हम आपके :)

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  12. अरे ये सासाराम कहाँ से याद आ गया तुम्हें ! अपनी शुरुआती जिंदगी के कई वर्ष बिताए हैं यहाँ। पर इस 'जाँत' के बारे में आज ही पता चला। मुझे तो सासाराम के नाम से झट से दो चीजें याद आती हैं। एक तो ग्रैंड ट्रंक रोड और दूसरे शेरशाह सूरी का वो मकबरा जो हमारे स्कूल के ठीक सामने दिखता था।

    और हाँ सासाराम कोई जिला नहीं है बल्कि बिहार के रोहतास जिले का मुख्यालय है।

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  13. शुक्रिया मनीषजी. सुधार कर दिया है. आपके गोलघर के साथ मकबरे की चित्र वाली पोस्ट याद है. अभी फिर से देखकर आ रहा हूँ.

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  14. का कहें इस पोस्ट पर ...ठीक ठीक बुझा नहीं रहा....

    खुश रहो....आनंदित कर दिया....

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  15. @रंजनादी: धन्यवाद :)

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