Dec 26, 2011

टाइम, स्पेस और एक प्री-स्क्रिप्टेड शो

 

दृश्य 1: विक्रम संवत 2028, 1971 ईस्वी,  अक्षांश 26.xx देशांतर: 82.xx:

शुक्ल पक्ष की चांदनी रात के दूसरे पहर किसान पिता ने नवजात के जन्म-समय को चिन्हित करने के लिए जमीन पर एक खूंटी ठोंक दी. उज्जवल चांदनी में नीम के पेंड की छाय आँगन के बीचो-बीच से एक विभाजन रेखा बना रही थी. रात को जाने वाली ट्रेन ठीक उसी समय गुजरी थी… इस प्रकार ये समय स्टेशन मास्टर के रजिस्टर में भी दर्ज हुआ. पडोस के चंद्रभान से मांग कर लायी गयी घडी ८.५७ बजे बंद हो गयी थी… उसी समय गाँव के भोथन की भैंस ने पाड़े को भी जन्म दिया...

...रात भर... एक सरकारी सांढ... निर्विघ्न खेत चरता रहा। उसी रात पूर्वी पाकिस्तान में एक नए राष्ट्र के उदय की नींव पड़ रही थी...

पंडित ने खूंटी के निर्देशांको से जन्म-समय निर्धारित कर लाल स्याही से लिखना चालू किया... 'शतपद होढ़ा चक्रानुमतेन...' आपके लड़के के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव है। पिता को मिश्रित शगुन दिख रहे थे। थोड़े चिंतित हुए तो पंडित ने कहा - 'बड़ी घाटियाँ पर्वतों के साथ ही होती हैं, मैदान नहीं है इसकी जिंदगी...'। नाम - विजय। 

दृश्य 2: विक्रम संवत 2029, 1972 ईस्वी, अक्षांश 19.xx देशांतर:72.xx:

वैज्ञानिक पिता के घर पुत्री हुई। 'बर्थ सर्टिफिकेट' पर टाइपराइटर ने अंकित किया 10.47 पीएम। मुंबई से लंदन जाने वाले विमान के उड़ने की तेज आवाज हॉस्पिटल के गलियारों में सुनाई दी थी। अगले दिन बधाई संदेश आए और फूलों के बुके। उस समय भी पुत्री जन्म पर 'शोक-नहीं' करने वाले लोग थे। नाम – ऋचा।

...भारत पाकिस्तान शिमला समझौते पर हस्ताक्षर की तैयारी में थे।

दृश्य 3:विक्रम संवत: 2064, 2007 ईस्वी, अक्षांश: 26.xx  देशांतर:80.xx:

कैंपस प्लेसमेंट का पहला दिन... विजय रात के 11 बजे एक छात्रों के समूह को समझा रहे थे कि उनकी कंपनी क्यों अच्छी है। एक घंटे बाद ऋचा भी एक अलग समूह को। तब दोनों के नाम के आगे डायरेक्टर लगता था।  बस सात छात्र ऐसे थे जिन्होने दोनों को सुना। एक प्रभावशाली लेकिन घिसा हुआ दूसरी स्मूद... इंप्रेसिव। एक उसी कॉलेज का सीनियर, गालियों में खुल कर बात करने वाला.... दूसरी ऑक्सफोर्ड ग्रेजुएट। 'सालों ऐश करोगे' और 'यू काँट बी ए फिल्मस्टार ऑर अ फुटबॉलर नाऊ… बट यू स्टिल कैन मेक मनी लाइक दे डू…' ...दोनों के झूठ बोलने का अपना तरीका था और दोनों अपनी छाप छोड़ गए।  

दृश्य 4: विक्रम संवत:2067, 2010 ईस्वी, अक्षांश: 40.xx देशांतर:-73.xx:

ऋचा, विजय और उन दोनों को सुनने वाला एक छात्र - अमृत... एक इयरएंड पार्टी। तीनों अलग-अलग कंपनियों और दुनिया के विभिन्न कोनों में भटकने के बाद... अब एक ही जगह काम करते हैं। ऋचा की पहले वाली कंपनी 2008 में डूब गयी... विजय का ग्रुप 2009 में। अमृत ने उस तीसरी कंपनी में नौकरी की थी जिसमें वो आज सभी हैं। चर्चा चली... तो विजय ने कहा:

'तुम दोनों को नहीं लगता... ये सब कुछ बस इसीलिए हुआ कि हम आज यहाँ बैठ के ये बातें करें? मुझे तो ये भी लगता है कि मेरे पिता ने जो खूंटी गाड़ी थी उसका भी असर है... जो भी मैं आज हूँ ! जो घड़ी बंद हुई थी - उसका भी। और ये जो बड़ी-बड़ी कंपनियाँ डूब गयी... लड़ाइयाँ हुई... सब कहीं न कहीं इसलिए हुई कि उन्हें मेरे जीवन पर असर डालना था... यहीं वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में 47वें फ़्लोर पर मेरा ऑफिस था कभी ! सोचना कभी.. दुनिया बहुत छोटी है... एक मिस्टीरियस रियालिटि शो है... जिसका सबकुछ प्री-स्क्रिप्टेड है... ये मेरे हाथ में गिलास... और मैं इसे छोड़ रहा हूँ...ये सब कुछ। बस हमें वो स्क्रिप्ट नहीं पता... हमें रोल मिला है... जो रोल मिला बस ऐसी एक्टिंग करो कि... साला जो करना है उसमें डूब जाओ... स्क्रिप्ट लिखने वाला तुमसे बस यही चाहता है... एक जमाना था जब मैं कुछ करने के लिए मर जाने को तैयार था। वो नहीं हुआ और आज मुझे पता है कि उससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता था मेरे साथ। जितना हुआ, ...बुरा भी हुआ तो उसके होने के पीछे कारण था...  तुम्हें पता है जिस पाड़े ने मेरे साथ जन्म लिया था... उसी रात वाली ट्रेन के नीचे आ गया... और उसी रात जिस रात मैं उसी ट्रेन को पकड़ कर पहली बार कॉलेज गया। और मेरे जन्म के रात अगर %^&* सांढ ने खेत नहीं चरा होता तो एक क्विंटल अनाज ज्यादा हुआ होता... और.... '

...ऋचा उठ कर चली गयी... अमृत सुनता रहा। पीने के बाद लोग कमाल की बातें करते हैं।

~Abhishek Ojha~

आप सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ। नववर्ष और 'समय' पर भर्तृहरि को पढ़ें: :)

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः, तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।
 

(हमने सांसारिक भोगों को नहीं भोगा बल्कि भोगों ने ही हमें भोग डाला। हमने तपस्या नहीं की बल्कि तापों ने ही हमे तपा डाला । समय नहीं बीता, बल्कि हम ही बीत गए । तृष्णा बूढ़ी नहीं हुई, बल्कि हम ही बूढ़े हो गए) !

Dec 14, 2011

फॉर ईच इन्फाइनाइटेसिमल मूमेंट ऑफ माइ एक्ज़िसटेंस !

 
(एक पत्र जो कभी भेजा नहीं गया...)
 

नोट:- अगर आप यहाँ तक आ गए हैं और इससे आगे पढ़ने जा रहे हैं तो: बीच में सिर्फ इसलिए ना छोड़ें कि इसमें गणित है। असली बात 'सत्य' है वो गणित का मोहताज नहीं !  गणित के अलावा बाकी और कोई कारण हो तो कोई बात नहीं - खुशी से जाएँ :)

सोच रहा हूँ कहाँ से शुरू करूँ। मैंने कभी सोचा नहीं तुम्हें चिट्ठी लिखुंगा। लेकिन आजकल कुछ अजीब सा हो रहा है मेरे साथ। तुमने स्टॉकहोम सिंड्रोम का नाम सुना है? ये ऐसा पैराडॉक्स है जिसमें बंधक व्यक्ति अपने बंदीकर्ता से सहानुभूति करने लगता है... कुछ वैसी ही हालत है मेरी। तुमने मुझे एक तरह से गुलाम ही तो बना रखा है और मैं हूँ कि तुम्हारे लिए पागल हुआ जा रहा हूँ तो शायद ये स्टॉकहोम सिंड्रोम की ही चरमावस्था है !
मुझे हमेशा लगा कि अगर ये प्यार है तो तुम मेरा मौन समझ लोगी ! आज तक यही सोचता रहा... मेरी ये सोच तो तुम्हें तुम्हें पता ही है कि सत्य को कह देने से वो सत्य भले रहे, परम तत्व सा खूबसूरत नहीं रह जाता। और फिर मैं कैसे कह सकता हूँ कि तुमसे कितना प्यार करता  हूँ? अनंत को परिभाषित कर पाया है कोई?  सत्य और सुंदर को क्या शब्दों में कहा जा सकता है? फूल की खुशबू को क्या शब्दों में उलझा कर समझाया जा सकता है?  मुझे तो वैसे भी लगता है कि जब हम कुछ नहीं कहते हैं तो सबसे अच्छे तरीके से व्यक्त होता है। और अगर तुम्हें याद हो तो मैंने तुम्हें कहा भी था कि तुम्हारी खूबसूरती को शब्द और उपमा देकर मैं उसकी सीमा निर्धारित नहीं करना चाहता... फिर अचानक प्लूटो का कहा याद आया कि दोस्तों में सब कुछ कॉमन होता है। और अगर ये सच है तो तुम भी शायद मौन होकर मेरी ही तरह मेरे समझ जाने का इंतज़ार कर रही हो? अब इस मौन-पैराडॉक्स के डेडलॉक का कोई हल तो है नहीं... तो सोचा आज तुम्हें लिख ही डालूँ कि मैं तुम्हारे बारे में क्या सोचता हूँ।... हर समय... समय के हर उस छोटे से छोटे लमहें में...फॉर ईच इन्फाइनाइटेसिमल मूमेंट ऑफ माइ एक्ज़िसटेंस !  
 
पहली बात जो मैंने इन समय के अत्यंत सूक्ष्म लमहों से सीखा है वो ये कि इस समय के बदलने की गति अचर (कोंस्टेंट) नहीं है... समय कैसे गुजरता है? जब तुम साथ होने सी होती हो- भले ही सात समुंदर पार और जब नहीं होती तब - मैं समय के गुजरने के दर में परिवर्तन महसूस कर सकता हूँ...। तुम्हारा एक मैसेज... केवल दिल की धड़कन नहीं समय के बीतने की दर को भी बढ़ा देता है। ऐसा नहीं कि तुम्हारा पास नहीं होना इसे बोझिल बनाता है... मुझे तो लगता है कि हमारा एक दूसरे से दूर होना हमारे रिश्ते को पूर्णता देने में पोजिटिवली स्क्युड़ डिस्ट्रीब्यूशन की तरह काम कर रहा है।

पहले तो मैं तुम्हें लेकर उलझा हुआ था... लेकिन जैसे-जैसे मैं अपनी सोच को तुम्हारे साथ बिताए गए समय के अत्यंत छोटे स्वेच्छित यादगार क्षणों (आर्बिट्रेरी स्माल मोमेंट्स) पर ले गया तो मेरी सारी सोच ही तुम पर कनवर्ज़ हो गयी। और फिर मुझे लगा कि ये नेसेसरी नहीं तो साफिसिएंट कंडीशन तो है ही कि मुझे तुमसे प्यार है। मेरा मन आजकल कुछ-कुछ स्वचालित और अनियंत्रित गति में है। अब मुझे नहीं पता मुझे क्या करना चाहिए। मैं उसे रोक नहीं सकता... अगर उसे उसके रास्ते से मोड़ना चाहूँ तो और बहकने का ड़र है... अगर उसे रोटेशनल ट्विस्ट मिल गया तो उसकी गति की मोडलिंग कर पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। वो तो पहले से ही अनियंत्रित और स्वचालित अवस्था में है !

अच्छा तुमने कभी केओस थियरि का नाम सुना है? उसमें एक छोटा सा परिवर्तन कहीं बहुत बड़ा तूफान तक ला देता है। जैसे एक तितली के पंखों की सिहरन दुनिया के किसी कोने में बवंडर ला देती है। वैसे ही तुम्हारी एक अदा की एक तस्वीर जो दिमाग में बैठ गयी है, उसने मेरे अंदर, कहीं किसी कोने में सुनामी ला दिया है। 
मेरे सोचने का जो सीक्वेंस है उसका लिमिट अद्वितीय तरीके से तुम ही हो। हर छोटे लमहें के बाद मेरी सोच तुम पर ही पहुँच जाती है... क्या इससे प्रूफ नहीं होता कि मेरे सोच की सीक्वेंस कनवरजेंट हैं और वो तुम पर कनवर्ज़ करती है? शायद कैलकुलस के इस बेसिक थियोरम को ही दुनिया वाले प्यार कहते हैं ! 

मैं सोच रहा हूँ कि मुझे आखिर हुआ क्या है? ! मुझे लगता है कि तुम्हें सोचते ही मेरे दिमाग के फील्ड में बिलकुल सही मात्रा में रेजोनेन्स एनर्जी, फील्ड तीव्रता और शायद प्रोटोन्स का अलाइनमेंट हो जाता है और फिर स्पेक्ट्रल शिफ्ट से जो तुम्हारी इमेज बनती है - वो ऐसी तुम हो जो हर कोण से अच्छी लगती हो। - परफेक्ट तुम ! तुम्हारी छोटी से छोटी बात और साधारण सी साधारण तस्वीरों को मिलाकर दिमाग ने एक नयी 'तुम' का सृजन कर डाला है। अब मैं जो भी सोचता हूँ उसी 'तुम' के इर्द-गिर्द। वैसे ही जैसे इंसान सैकड़ों तस्वीरों में से एक निकाल कर अपनी प्रोफ़ाइल में लगा देता है। दिल ने तुम्हारी उस मल्टी-डाइमेशनल तस्वीर को एक कोने में कैद कर लिया है और अब उसे दिमाग को कुछ इस तरीके से प्रोजेक्ट करता है कि दिमाग कुछ भी और नहीं कर पा रहा !  तुम दूर हो तो स्वाभाविक है कि उसे तुम्हारी नयी अदाएं नहीं मिलती... न्वाइज़ टू सिग्नल रेशियो बहुत कम है तो तस्वीर और साफ बन गयी है !  :)

मैं तो ये भी नहीं बता सकता कि मेरे लिए ये बता पाना कितना कठिन है कि मैं तुम्हें कितना मिस करता हूँ। काश! इसे क्वांटिफ़ाई कर पाना संभव होता।  संसार में कितना कुछ है जो हमें नहीं पता, हमारे बस में नहीं... लेकिन मुझे उन अनियंत्रित, अनजान और अज्ञात चीजों पर बहुत भरोसा है। मुझे हमेशा ही केओस और रैंडमनेस में एक पैटर्न मिला है। और अपने इस केओटिक स्टेट ऑफ माइंड से भी, तुम मिलोगी इसकी उम्मीद जाग गयी है।

मुझे ठीक-ठीक याद नहीं मुझे तुमसे प्यार कैसे हो गया। लेकिन मैं समय में वापस जाऊँ तो... कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद सब कुछ बदल गया। प्वाइंट ऑफ इंफ़्लेक्सन? ...नहीं - सिंगुलारिटी। तुम्हें पता है सिंगुलारिटी का मतलब होता है वो बिन्दु या क्षेत्र जहां पर फंक्शन फट जाता है... अब मुझे फट जाना शब्द ही सूझ रहा है ! गणित जवाब दे जाता है उसका कुछ अर्थपूर्ण मतलब नहीं रह जाता। जहां इंसान के बनाए गणितीय मॉडल अर्थपूर्ण परिणाम देने में नाकामयाब हो जाते हैं। सारे नियम कानून फेल ! या तो नियम बदलने पड़ते हैं या फिर जैसा है उसे वैसा ही बिन ज्यादा दिमाग लगाए मान लो। ऐसे सिद्धान्त जिन्हें सोचकर दिमाग का कोई कोना खिल उठता  है, लेकिन ये समझ में नहीं आता कि ये कैसे संभव  है? या फिर इसका अर्थ क्या है? ! हम बस इतना समझ पाते हैं कि उस क्षण के पहले कुछ नहीं था लेकिन उसके बाद 'कुछ तो' था... उस क्षण क्या हुआ - ये हम नहीं समझ पाते। जैसे बिग बैंग - जिसने अरबों-खरबों तारों और ग्रहों वाले एक अनंत तक विस्तृत निरंतर फैलते ब्रह्मांड को जन्म दिया। वो क्या था? कैसे था? क्यों था? हम नहीं जानते। वैसे ही कुछ मेरा दिल शून्य से विभाजित सा हो गया है। इसका क्या अर्थ है मैं भी नहीं जानता !  और अब अगर तुम कहो... या मैं चाहूँ भी तो क्या उस सिंगुलारिटी के पहले की अवस्था में वापस जा सकता हूँ? तुम्हें लगता है इस ब्रह्मांड को एक अत्यंत सूक्ष्म, अनंत द्रव्य वाले बिन्दु में समेटा जा सकता है? अब तो जो होना था हो गया ! नो पॉइंट ऑफ रिटर्न से बहुत आगे निकल चुका हूँ।

मुझे हेनरी प्व्याइनकेयर का कहा याद रहा है: "कोई वैज्ञानिक प्रकृति को इसलिए नहीं पढ़ता कि ये उपयोगी है, वो पढ़ता है क्योंकि उसे इसमें आनंद मिलता है क्योंकि ये खूबसूरत है...अगर प्रकृति खूबसूरत नहीं होती तो इसे जानने का इतना महत्त्व नहीं होता... जीवन जीने का महत्त्व नहीं होता।" - मुझे लगता है कि हेनरी ने ये अपने महबूब के लिए लिखा होगा। हम जो भी दिल से करते हैं वो इसलिए नहीं करते कि उससे कोई फायदा होगा... बल्कि इसलिए कि हमें वो करने में आनंद और आत्म संतुष्टि मिलती है। या फिर हम बस इसलिए करते हैं क्योंकि हम करते हैं ! कोई कारण नहीं. तुमने गणितज्ञ जी एच हार्डी का नाम सुना होगा। उन्होने कहा था कि उन्होने कुछ भी ऐसा नहीं किया है जिसका कोई उपयोग हो। वो उपयोग में ले जाने वाले गणित को निम्न कोटी का और घटिया मानते थे... मेरा प्यार ऐसा ही है... बस प्यार ! कोई उद्देश्य नहीं है उसका। वो बस प्यार है... शुद्ध... और कुछ नहीं ! वो कैसा होता है ?  ये शब्द नहीं बता सकते! वो एनलाइटमेंट की तरह है... जब तक तुम खुद नहीं करती... नहीं समझ सकती ! कोई नहीं समझा सकता। तुलसी बाबा ने भी कहा है न 'तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा, जानत प्रिया एकु मनु मोरा'।  मेरा प्यार अगर कॉम्प्लेक्स है... तो इसमें इमाजीनरी पार्ट ज्यादा है ! अगर फंक्शन है तो अनबाउंडेड इंक्रीजिंग... सेट है तो जूलिया सेट से ज्यादा खूबसूरत।

अगर खूबसूरती का प्लॉट बनाऊँ तो तुम आउटलायर हो...किसी ग्राफ में तुम नहीं आ सकती। 'खूबसूरत' शब्द तुम्हें पाकर धन्य है ! गणित खूबसूरत जैसे शब्दों को अनडिफ़ाइंड कहता है... मैं कहता हूँ तुम मेरे लिए सुंदरता की परिभाषा हो !  मेरे लिए अगर ब्रह्मांड में ओयलर की आइडेंटिटी से ज्यादा खूबसूरत कुछ है तो वो बस तुम ही हो। सौंदर्यनुपात फिबोनाकी से क्या परिभाषित होगा? अगर तुम उस अनुपात में नहीं हो तो प्रकृति के अनुपातों को वैसे ही फिर से परिभाषित होना पड़ेगा जैसे क्वान्टम फिजिक्स से क्लासिकल।

मुझे एक ही ड़र है कि हम कहीं समांतर रेखाओं की तरह कभी मिले ही नहीं ! या फिर एसीम्प्टोट की तरह हम अनंत तक करीब आते रहें और हमारी आपसी दूरी अनंत पर जाकर ही खत्म हो ! ओह ! बड़ी भयावह वक्रता है ! मैं इसे नहीं सोच सकता।  पर मुझे पता है कि हमारे प्यार का फंक्शन कनवर्ज़ करेगा जरूर।  तुम मेरे जीवन रूपी कॉम्प्लेक्स ओप्टिमाईजेशन प्रॉबलम का सोल्युशन सेट हो। फिलहाल इंकम्पलिटनेस थियोरम की तरह जिंदगी है। उस जिगसा पज़ल की तरह जिसका एक टुकड़ा खो गया है। कैसे भी सुलझाऊँ बिन उस टुकड़े के अधूरा ही रहेगा। तुम्हें पता है वो टुकड़ा क्या है? - तुम हो वो टुकड़ा ! मुझे कभी-कभी तुम्हारे दिमाग के ब्राउनियन मोशन से ड़र लगता है। कितना भी समझने की कोशिश करूँ वो रहता एन-डाइमेन्श्नल ब्राउनियन मोशन में ही है। और फिर तुम्हारा व्यवहार मार्टिंगेल की तरह... पहले का कोई अनुभव उसका पूर्वानुमान लगाने में काम नहीं आता... तुम्हारा मार्कोव चेन सा व्यवहार जिसमें आगे क्या करोगी वो हमेशा तुम्हारे उसी समय के मूड पर निर्भर करता है। पसंद तो मुझे तुम्हारी हर बात है लेकिन ड़र लगता है कभी-कभी।
वैसे मैं इन सब को मॉडल कर लूँगा ! असली ड़र तो तुम्हारे बाउंड्री कंडीशंस से है। मुझे पता है कि अपने रिश्ते के समीकरणों का क्लोज फॉर्म सोल्युशन मिलना मुश्किल है लेकिन तुम बस हाँ कह दो और फिर देखो ये क्या कोई नेवियर स्टॉक्स या रिमान हाइपोथेसिस है जो मैं हल ना कर पाऊँगा !

द बॉटम लाइन इज आई लव यू ऐंड ओन्ली यू... ऐंड देयर इज आल्सो नेसेसरी ऐंड सफिसिएंट कंडीशन फॉर यू टू लव मी।

बस हाँ कह दो...मैं चाहता हूँ कि मैं धरती का पहला इंसान बनूँ जो ऐसी वैसी नहीं बल्कि बोरोमियन रिंग पहनाए और पंडित से कहे कि वो थ्री-ट्विस्ट-नॉट ही बनाए :)

तुम्हारा,
वही जिसे तुम कभी-कभी पागल कह दिया करती हो... शायद प्यार से !
--
~Abhishek Ojha~
PS:
1. ये प्योर प्यार (प्योर मैथेमेटिक्स के तर्ज पर) की बात थी, अपलाइड तक बात पहुँचे तो कर्वस ऐनालाइज किए जाएँ ;) नहीं सर, उस स्टेज तक जब कि प्यार हो (आग दोनों ओर लगी हुई) और इस तरह का इजहार हो, कर्व्स एनलिसिस मायने नहीं रखती। सब कुछ बस यूँ ही हो चुका होता है। मेरा मतलब देह का देह से मिलन भी और वह इम्प्योर नहीं होता। - आचार्य गिरिजेशहार्डी वाज डैम राइट !
2. प्योर मैथेमेटिक्स के पेपर में कभी ट्रेजडी ये नहीं होती कि सवाल हल नहीं  हो पाता... बल्कि ये होती है कि जो दो चार हल कर पाये वो रफ वाले पन्ने में लेकर एकजाम हाल से वापस आ गए। ट्रेजडी ये नहीं है कि मैं तुम्हें चिट्ठी नहीं लिख पाता बल्कि ये है कि लिख कर भी भेज नहीं पा रहा !
3. मैंने बैरीकूल को पटना फोन लगाया कि एक लभ-लेटर लिख रहा हूँ। तो बोला: 'आप तो मते लिखिए भैया। आपके बस का नहीं है। आप जो लिखेंगे उ बरा रिक्सी लग रहा है हमको'। मैंने कहा - 'भाई बिना रिक्स के कहाँ रिटर्न है ! और सारे इनवेस्टमेंट तो रिस्क देख के ही करते हैं। जो सच्ची बात है कह देते हैं।'
'ये बात है तो  लिख डालिए भैया। जो होग देखा जाएगा' :)
4॰ दुबारा नहीं पढ़ा है...गलतियाँ होंगी। धन्यवाद पाने के लिए ध्यान दिलाएँ :)
5. आपको क्या लगता है अगर इसे दुनिया कि सबसे खूबसूरत लड़की को भेजूँ तो क्या कहेगी?











Nov 20, 2011

माल में माल ही माल (पटना ९)

 

बीरेंदर भईया उर्फ 'बैरीकूल' से पहली बार चाय की दुकान पर मिलना हुआ था। मुझे अक्सर ऐसा लगता कि वो मुझसे बात करने की कोशिश कर रहा है लेकिन बात हो नहीं पाती थी। बीरेंदर की अपनी पर्सनलिटी है... ऐसी पर्सनलिटी जिसे देखकर लगता है कि एक जिंदगी तो हमने जी ही नहीं ! दाहिने हाथ की कलाई पर तकरीबन साढ़े तीन इंच चौड़ाई में बंधा लाल-पीला धागा और उसके ऊपर एक अष्टधातु का कड़ा, ट्रिम की हुई दाढ़ी, सिर के बीचों-बीच से निकली हुई मांग वाला हेयर स्टाइल, टाइट हाफ शर्ट, फ़ेडेड जींस, आंखो पर काला चश्मा, सफ़ेद रंग की चौड़ी बेल्ट और लाल रंग के कैनवास के जूते। सुबह के समय अक्सर मैं बीरेंदर को एक हाथ में आईफोन और दूसरे हाथ में चाय का ग्लास लिए देखता। आसपास की  दस बिल्डिंगों और सड़क पर दुकान लगाने वालों में शायद ही कोई  ऐसा इंसान होगा जिससे बीरेंदर छेड़खानी नहीं करता हो। जब तक मेरी उससे बात नहीं हुई थी तब भी मुझे पूरा यकीन था कि उसे मेरे बारे में सब कुछ पता है। मुझे देख थोड़ा संकोच करता और थोड़ी धीमी आवाज में बोलता।

उस दिन मेरे पास रिक्शे वाले को देने के लिए छुट्टे नहीं थे... तो मैं रिक्शे वाले को खड़ा कर छुट्टे की तलाश में निकल गया। तब मुझे बस दो दुकान वाले ही पहचानते थे एक चाय वाला छोटू और दूसरा  जूस वाले मिसराजी। मैंने छोटू से पूछा  'सौ रुपये का छुट्टा होगा क्या?'

'नहीं सर, खुदरा के बहुत दिक्कत है ! सुबहे सुबह कहाँ एतना बरा लमरी टूटेगा ?'
'अरे यार  ! रिक्शे वाले को देना है, उसे खड़ा करके आया हूँ ! हो तो दे दो'
'तो ऐसे बोलिए न सर की रिक्शा वाला को देना है, उसके लिए छुट्टा की क्या जरूरत हैं? कितना देना है?' बीरेंदर ने पीछे से कहा।
'20 रुपये'
'ऐ छोटू ! निकाल बीस रुपया... कोई एक दिन का आना है सर का? ले जाइए सर, बाद में दे दीजिएगा। अभी तो 2-3 महिना हैं न आप?'  बीरेंदर ने छोटू से पैसा लेकर मुझे देते हुए कहा।
'धन्यवाद !'
'अरे धन्यवाद काहे का सर? माइसेल्फ बीरेंदर - फ्रेंड्स कॉल मी बैरी !'

बीरेंदर को बैरी कहना मुझे उसी तरह ठीक नहीं लगा जैसे शत्रुघ्न को शत्रु फिर एक दिन जब मेरा फोन बंद हो गया और मैंने एक कॉल करने के लिए बीरेंदर  का फोन मांगा तो स्क्रीन पर 'बैरीकूल' देख कर मेरी इस समस्या का निदान हो गया  । तभी पता चला कि बीरेंदर के पास हाथी के दाँत की तरह एक और दूसरा फोन भी है। जब पता चला कि एक फोन लैला-मजनू स्कीम के तहत उसने लिया है तो मैंने  पूछ लिया 'शादी क्यों नहीं कर लेते?'
'सादी त करेंगे ही, लेकिन छोटी बहन है त रिक्स नहीं लेना चाहते... उसकी शादी करा दें पहले तब अपना करेंगे। अपने से शादी कर लेंगे त दिक्कत हो जाएगा... इस समाज में अपने से सादी करने के पहिले पचास ठो चीज सोचना परता है'।

फिर मैं कब 'सर' से 'भईया' हो गया और 'बैरीकूल' सिर्फ 'बीरेंदर' पता नहीं चला। बीरेंदर जहां मेरा ऑफिस था उसके पास ही एक बैंक में काम करता है। अपनी ही उम्र का लड़का है... लेकिन गज़ब तेज है। जब मुझे 'बोधगया और राजगीर जाना हुआ तो किसी ने सुझाव दिया 'इतनी सुबह मत निकलिए... नहीं तो पहले राजगीर चले जाइए। सुबह-सुबह गया वाले रास्ते पर थोरा रिक्स  है'
जब बीरेंदर को पता चला तो बोला 'कौन  साला बोल दिया आपको ई सब ? यहाँ से गया तक कहीं भी कुछ भी हो... बस हमारा नाम ले लीजिएगा - आ मेरा नंबर तो हइए है आपके पास ! अपना इलाका है... कहिए त बात करा देते हैं  टोल-टेक्स वाला से... आपका गारी से टोलो नहीं लेगा ! अरे आराम से जाइए।'

सबको जानता है बीरेंदर... और सभी उसे जानते हैं। उसके साथ सड़क पर निकल जाइए... सबसे हाय-हैलो हो जाएगा... और सबके मजे भी लेता है।

'ऐ सदाबहार - रुपया चार ! क्या हाल है ?...  का रे सिखण्डीया ! बीबी मारी है का राते?... आरे मउरिया ! कईसा चल रहा है गारी... सुने हैं खाली जनाना सवारी पर ज़ोर मार रहा है तू...?'

'सदाबहार-रुपया चार' चार रुपया प्रति गिलास गन्ना जूस बेचते हैं, सिखण्डीया रिक्शा चलाता है... मउरिया टेंपू। एक और है 'कैटरीना के खस्ससम'... उनका सत्तू का ठेला है। ये नाम इसलिए क्योंकि उनके ठेले पर कैटरीना की फोटो है। इन सबसे लेकर सारे ऑफिस वाले और बड़े शोरूम वाले तक... सभी 'बीरेंदर' या 'बीरेंदर भईया' को जानते हैं।  एक दिन मैं मौर्य लोक में एक बड़े ब्रांड के शोरूम में था तो बीरेंदर का फोन आया... थोड़ी देर बाद बोला 'अरे वहाँ तो बहुत महंगा मिलेगा... हमसे बोले होते... आछे भईया... एक मिनट फोन दीजिये त जो काउंटर पर बैठा है उसको'। थोड़ी देर बाद मुझे फोन वापस करते हुए काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा 'आपको बताना था न की बीरेंदर भईया के दोस्त हैं' और मुझे दस प्रतिशत की छुट मिल गयी।

बीरेंदर से मिलना अक्सर चाय की दुकान पर ही होता था। अमेरिका में क्या होता है ये जानने में उसे बहुत रुचि थी। खासकर मोबाइल, गन, बाइक, कार और नाइट क्लब्स मे क्या-क्या होता है।

'का रे कैटरीनवा के खस्स्सम ... तनी ध्यान रखो... तुम्हारा बीबी बहुत ओभारटाइम कर रही है आजकल?'
'बीरेंदर भईया... आपको का बुझाएगा... बरा-बरा आदमी सब का लेडीज त काम करबे करती है। आ आपको न हम ल*बक लगते हैं... किस्मत का खेल है भईया... नहीं त हिहाँ एएन कोलेज करके ठेला नहीं लगाते...'  कैटरीनवा के खस्स्सम ने बुरा मानने के लहजे में कहा।  Sattu stall Patna

'अरे त कवनो चोरी-छि*रों कर रहा है... तुम तो साला कैटरीना का खस्स्सम है... अब का चाहिए तुमको? इहें तुम को मिल जाएगा इंजीनियरिंग आ मेडिकल रिटर्न... अईसा पी के टुन्न रहिता है की सब्जियों नहीं बेच सकता...  वैसे बेटा तुमको खस्स्सम बना के उसका फैदा कहीं और लिया जा रहा है... तुमको तो बस एतना ही फैदा है की फोकट का फोटू लगाने दी है।  तुमसे त कुछ नहीं ले रही है... लेकिन किससे-किससे का-का ले रही है... उधरो ध्यान दो...'

'जानते हैं भईया? कैटरीना के फिगर का राज उसके इसी खसम का सत्तू है... हा हा। देखिये त कैसे सत्तू पीते हुए फोटो लगाया है... अबे साला  ! तुम गंजी में फोटो लगाए हो? कम से कम सारी तो पहना देते... बीबी है तुम्हारी... हा हा हा'

'बोले न भैया अब बरा आदमी का बीबी है... त ई सब चलता है... आप का जानेंगे? यहीं गांधी मैदान आ एसपीवर्मा रोड में जिंदगी भर रह गए आप का जानेंगे ? '
' हं बेटा जिस दिन तुम जैसा जितना खसम है... उ सब को खोज के बोलेगी की... एतना दिन से फोटो लगाए हो सब ज़ोर के पैसा दो... तब बुझाएगा'

'आछे भईया, ई दुकानवा वाला जो हीरोइन सब का फोटो लगा लेता है इन सब पर केस नहीं हो सकता है? वैसे इससे क्या फर्क परता है उ सब को ! ...लेकिन अमेरिका में भी अगर अइसही बिना ब्रांड एम्बेस्डर बनाए कोई फोटो लगा दे तो वहाँ तो सब मार लेगा? '  आगे बढ़ते हुए बीरेंदर ने मुझसे कहा।

'का हो ! सदाबहार - रुपया चार? एक ठो हीरोइन का फोटो लगाओ तुम भी इसके तरह... तब न... पब्लिक रस पिएगा  ! ... आ ई ट्रांसफरमारवा के का कर दिये हो?... लाइने नहीं आ रहा है'

'आरे बीरेंदर... कल दिने में बुरुम से उर गया... बरी ज़ोर से आवाज किया... हमको त लगा कि बम-उम फट गया कहीं... आ बेटा जब तोहरे ऊमीर में थे त खूब फोटो लगाए है हम भी... हेमा मालिनी आ बैजानती माला  के... '

'अरे जियो सदाबहार ! ऐसे ही थोड़े ना सदाबहार हो... जिला हिला के आज भी रखते हो तुम तो !'

बीरेंदर की नजरों में स्टाइल की समझ ही नहीं है मुझे... मुझे एक दिन सलाह दी उसने  'भईया आप भी न... एक घड़ी के अलावा  कुछों नहीं ? कम से कम एक ठो सीकरी तो पहना कीजिये... ऐसे अच्छा नहीं लगता है'।

बीरेंदर ने मुझे रविवार को फोन किया... 'भईया बाडीगाड़ देखने चलेंगे ? नए वाले माल में?'
'कैसी फिल्म है? कितने बजे से?'
'फिलिम तो बढ़िए होगा। सलमान खान है आ करीना है त देखने लायक तो होइबे करेगा... नहीं तो माल भी नया है...उहे देखेंगे... अब पटना में उहे त एगो माल है. टाइम पास त होइए जाएगा...'
'देख लो तुम्हें गरिमा के साथ जाना हो तो...'
'अरे नहीं भईया... अईसा भी कुछ नहीं है। आप उसका टेंसन काहे ले रहे हैं... चलिये आपको माल दिखा लाते हैं अब दिल्ली-गुरगाँव जैसा तो नहीं है लेकिन फिर भी..'
'अरे मॉल तो हर जगह एक जैसा ही होता है। दिल्ली हो या पटना !'
'कहाँ भईया ! दिल्ली-गुरगाँव  में बरा-बरा माल होता है आ माल में माल ही माल... यहाँ तो...हा हा हा'

बीरेंदर जैसे मस्त मौला को चित्रित कर पाना बहुत कठिन है... !

~Abhishek Ojha~

Oct 30, 2011

दुई ठो टइटू (पटना ८)

 

'हलो, कौन बोल रहे हैं?' - राजेशजी ने उधर से जवाब दिया।

'राजेशजी, मैं अभिषेक बोल रहा हूँ? आप बीजी तो नहीं हैं?' - मैंने संभलते हुए कहा। मुझे याद है एक दिन राजेशजी ने एक मिस्ड कॉल के जवाब में किसी को बहुत बुरी तरह हड़काया था - 'रखिए फोन ! अभी तुरनते रखिए… नहीं तो ठीक नहीं होगा। अपने मिस्ड काल मारते हैं आ पूछते हैं की कवन बोल रहे हैं? रखिए नहीं तो...'

'अरे अभिसेकजी ! नमसकार-नमसकार ! कैसे हैं? आरे हम कहाँ बीजी होंगे... आप पहुँच गए बढ़िया से? ... ऐ हो ! आप तनी दू मीनट बाद आइये त। आ उ लरकवा खाली हो त हमको बताइएगा... उधर चाय पानी का पूछते रहिएगा' - राजेशजी ने फोन में ही किसी को समझाया।

'आप बीजी हों तो मैं बाद में फोन करूँ?'

'आरे नहीं - आपका फोन आएगा त हम बीजी रहेंगे?! उ श्रीकांतवा को लेकर आए हैं.. लइकी दिखाने। उ घूमने वाला होटलवा नहीं है बिस्कोमान में? उधरे?' श्रीकांत राजेशजी का भतीजा है... बंगलुरु में रहता है। इंजीनियर है इसलिए राजेशजी उसे 'पूरे बकलोल है' कहते हैं। एक बार पहले भी उन्होने बताया था 'जानते हैं सर, एक ठो इंजीनियर बंगलउर से पर्ह के हमरे गाँव आया त पूछता का है कि पापा एतना ऊंचा बांस में झण्डा कईसे लग गया?!... हम वहीं थे बोले कि भो** के तेरी अम्मा को सीढ़ी लगा के चढ़ाये थे... इंजिनियर सबसे तेज तो हमारे गाँव का बैलगाडी हांकने वाला होता है… .' इस घटना के बाद बंगलुरु रिटर्न इंजीनियर सुनते ही राजेशजी उसके ललाट पर 'चू**-कम-बकलोल' का ठप्पा लगा देते हैं - भले ही उनका भतीजा ही क्यों न हो। मुझे श्रीकंतावा से ध्यान आया पटना में हर नाम के आगे तीन प्रत्यय लगाए जाते हैं 'वा', 'जी' और 'सर'। जहां तक मुझे पता है मेरे लिए आखिर के दो ही प्रयोग होते थे... वैसे मेरे पीछे पहला भी उपयोग होता ही होगा !

‘और सुनाइये, बाकी सब ठीक?’

'हाँ ठीके है... अभी गोलघर क्रॉस कर रहे हैं... और ठीक नहीं रहेगा त एके दिन में अइसा का हो जाएगा... हे हे हे'

'आप तो होटल में बैठे थे न? गोलघर कैसे पहुँच गए ?' - राजेशजी के सिखाये ज्ञान के बाद मैंने होटल को रेस्टोरेन्ट कहने की गलती दोबारा नहीं की।

'हाँ सर... हैं तो होटलवे में...लेकिन इ गोल-गोल घूमता है न, जब आए थे त मउरिया के पास थे, पंद्रह मिनट हुआ… अभी गोलघर क्रोस कर रहे हैं... कर का रहे हैं समझिए कि करिए गए।' - राजेशजी ने पटना के रिवोल्विंग रेस्टोरेंट में बैठे थे. Patna

'अच्छा-अच्छा, और घर में सब ठीक है? श्रीकांत कब तक है पटना में ?'

'अरे उ बकलोल को त छुट्टीयो लेने नहीं आता है। 2 सप्ताह का भी कभी छुट्टी लिया जाता है? अरे एक महीना भी घर नहीं आए त का आए? ! हमलोग होते त आईटी हो चाहे फ़ाईटी अपने कायदे से चला देते। बताइये तो कोई अइसा भी जगह है संसार में जहां तिकड़म ना चले? खैर छोड़िए... उ त बकलोल हइए है...   हम सोचे कि आया है त दो-चार ठो लइकी भी दिखा देते हैं। लेकिन दिक्कत है... अब बंगलौर जाये चाहे लंदन है तो बिहारीये लरका न... आ हमलोग के घर का...माने अब हमलोग को तो आप जानते हैं... ! …लरकी सब एड़भांस हो गयी है... त बात कुछ बन नहीं रहा है... जानते हैं? सोसीओ-पालिटिकल कारण है इसके पीछे भी...'

'सोसीओ-पॉलिटिकल?'

'अरे सर, देखिये लइका बंगलौर में एंजीनियर, अब उ भले बकलोल है लेकिन लोग के त लगता है कि एंजीनियर है। त पैसा वाला पढ़ा-लिखा पार्टी ही आता है... आ दिक्कत है कि सोसाइटी के उस क्लास में सोसीओ-पालिटिकल फार्मूला लग जाता है ' बात मुझे अब भी समझ में नहीं आई। लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं। राजेशजी आगे बताने लगे...

'अभी देखिये श्रीकांतवा गया था मिलने एक ठो लइकी से... त उ पुछती है कि 'तुमको टइटू पसंद है? मेरे को तो बहुते पसंद है... मेरेको दुई ठो है भी'. टइटू जानते हैं न सर? - गोदना। अब श्रीकांतवा को त दिखा नहीं एको ठो भी गोदना, पता नहीं कहाँ गोद्वायी थी ! ... अब आपे बताइये मेरे घर का लरका... कभी गोदना आ कान छेदवा पाएगा ? कुछ भी हो अभी हमारे  घर का... ऐ इधर सुनो, एक ठो स्टाटर में से मसरूम वाला आइटमवा ले आइये त.... हाँ वही… जो भी नाम हो... नाम तो सब अइसा हाई-फाई रखता है न सर ! आ देगा का? त कुकुरमुता भूँज के... हे हे '।

'हा हा, आपका जवाब नहीं है राजेशजी'

'हाँ त सर टइटू वाला बताए न आपको, उसके बाद एक ठो लइकी बोलती है कि बाइक कौन है तुम्हारे पास? हम लौंग ड्राइव पर जाती हूँ अब इ  पल्सर 180 रखा है उ भी ओफिसे जाने के लिए रखा है... त उ बोलती है कि नहीं उसके कवनों फ़रेन्ड़-दोस्त के पास ड़कौटी-डौकटी है...   उ त छोरिए महाराज ! एक ठो बंगलौर में भी देखने गया था त उ बोलती है कि हमको एक ठो ब्वायफ़रेण्ड है तुम भुलाने में हेल्प करो आ तब हम तुमसे सादी कर लेंगे... आ इ गया है !... जानते हैं? दो सप्ताह से जादे ही...फिलिम-विलिम दिखाया… आ एगो त काफी आजकल पीता है न सब बरका सहरवन में... उसके बाद जाके उ बोलती है... सऊरी हम उसको नहीं भूल पाउंगी ! हम अइसे थोड़े न बकलोल बोलते हैं इसको... ल*बक है एकदमे... अब बुझे आप? सोसीओ-पालिटिकल फारमूला?... आज से २०-२५ साल पहिले लइकी सब को उहे जादे पर्हाता था जिसको अफारात में पईसा था… तो जो जादे पर्ही-लिखी लइकी है ऊ बहुते एडभांस हो गयी है. आ बिहारी लइका सब तो खिचरी खा के रगर-रगर के पर्हा… इहे सब जो सोसियोलोजी का ज्ञान है सबको नहीं बुझाता है !’ मैं राजेशजी के ज्ञान पर बार-बार मुग्ध हो जाता हूँ. चाहे ‘भासा’ का ज्ञान हो, ‘मनेजमेंट’ का या फिर ‘समाज’ का.

‘बात तो आपकी ठीक है लेकिन आपको पता है कुछ लोग आपके विचार से भड़क जायेंगे’ मैंने पोलिटिकली करेक्ट होते हुए कहा.

‘आरे मारिये गोली भडकने वाले को… अब हम न झेल रहे हैं… लरकी को ड़कौटी-डौकटी का एड्भेंचर चाहिए… आ हमारा घर के लड़का कहाँ से करेगा… आरे उससे जादे त पटना का कुतवो एड्भेंचर कर लेता है… हे हे हे… (अचानक अपनी ही बात पर जोश में आए राजेशजी हंसने लग गए) जानते हैं सर पटना का कुतवन का एड्भेंचर तो अइसा है कि सड़क तबे पार करेगा जब आप गाडी लेके जायेंगे… ऊ सब को अइसे सड़क पार करने में मजे नहीं आता है ! जान पे खेलने का मजा पटना के कुत्ता सब से बढिया कोई नहीं सीखा सकता है !’

‘राजेशजी, ज्ञान तो ढूंढने वाला आप जैसा होना चाहिए… आप हर बात से ज्ञान निकाल लाते हैं’

‘हे हे, एक बात बताइए सर. आपको हमारे बात पे हंसी तो जरूर आता होगा? ’

‘किसी बात कर रहे हैं, आप बोलते तो सच ही हैं’ - मैंने गंभीर होते हुए कहा.

‘हाँ सर ऊ त हैये है… लेकिन अब आप जैसा कोई सुनबो त नहीं न करता है… बोलेगा कि मार सार के पकपका रहा है. …ए इ नहीं नल का ही पानी लाइए…. जानते हैं सर पटना में नल का पनिया साफ रहता है. बोतल तो जालिये रहता है… पटना में पानी आ ठंढा आपको असली मुसकिले से मिलेगा. सुनते हैं कि बाजपेयीजी आये थे त उनको भी सब जालिये दे दिया था. उहे हाल किताब का है… जेतना इंजीनियरिंग-मेडिकल तैयारी का किताब है सब जाली मिलेगा आपको… ओइसे उसमें तो एस्टूडेंट का फायदा ही है… अब यही देखिये हिन्दुस्तान में पटना ही एकमात्र अइसा सहर हैं जहाँ सिनेमा हाल के बाहर आपको फिजिक्स भी मिल जाएगा… उसमें भी लरका सब जोडता है कि जाली खरीदें कि फोटो कापी…’

‘हाँ वो तो देखा मैंने…’

‘सर, बस देख के आप कितना देखेंगे ? आपको एक ठो और बात बताते है, जानते हैं हम लोग कैसे पत्रिका पढते थे? वैसे आपका बिल तो नहीं उठ रहा?’

‘अरे नहीं राजेशजी… बताइये-बताइये’

‘अब हर महीना केतना पत्रिका खरीदेंगे ? दू-चार सौ रूपया त उसी में लग जाएगा… त हम लोग तीन-चार लरका अलग अलग दूकान पे जाके अलग अलग पत्रिका चाट जाते थे… उसके बाद एक-दूसरे को बताते थे कि कवन वाला में क्या काम का है… ऊ सब जाके फिर से दूसरा दूकान में पर्ह आते थे… आ कभी कभी… किसी दोस्त से खरीदवा भी देते थे !  हे हे हे.  अब ऐसे तो पढ़े हैं हम लोग… हमारा अगला पीढ़ी भी ओइसहीं पढ़ा है… श्रीकंत्वा जब छोटा था त अपना छोटा भाई के पीठ में पेंसिले घोंप दिया था… आ हम लोग के बचपन में तो बाढ़ आता ही था आ फिर घरे-घर ठेहुना पानी… एक मिनट सर… का रे हीरो ! कुछ बात बना ? सर, आ गया श्रीकांत… ’

‘ठीक है मैं आपको फिर कभी कॉल करता हूँ… अभी आप निकलिए… वैसे भी रात हो रही होगी.’

‘रात का डर नहीं है सर, अपना इलाका है… लेकिन ठीक है हम भी थोडा सलाम-परनाम कर लेते हैं.’

‘ठीक है नमस्कार !’

न्यूयोर्क आये हुए एक सप्ताह हो गया. पटना का सुरूर धीरे-धीरे उतर रहा है !

~Abhishek Ojha~

पटना सीरीज

Oct 18, 2011

टाटा की भोलभो (पटना ७)

 

'सर चलिये न... आज आपको एसी बस से ले चलते हैं' राजेशजी मुझे नयी चमचमाती बस में ले गए। शायद बस का सड़क पर पहला ही दिन था। पुजा के बाद बनाए गए स्वास्तिक का सिंदूर अभी भी बस के शीशे पर मौजूद था और शंकर भगवान की प्रतिमा पर चढ़ाये गए चमेली के फूलों की माला के साथ-साथ गेंदे की बनी लड़ियों के फूल अभी भी ताजे ही थे। लोगों के आने-जाने से बने  पैरों के निशान के अलावा बाकी बचा चमचमाता फर्श भी इसी बात की गवाही दे रहा था. लेकिन पर्दा और पंखा लगी बस में एसी जैसी कोई चीज नहीं थी।

'एसी तो है नहीं इसमें?' मैंने पूछा।

'... अरे सर उ का है न कि बसवा का नामे है मिलन एसी कोच। हे हे हे' - राजेशजी ने अपनी मुस्कराहट को हंसी में परिवर्तित करते हुए बताया।

'‘है गाँधी मैदान ! हर एक माल 10 रुपया' खलासी गेट पर खड़ा चिल्ला रहा था।

'अबे हर एक माऽल काहे बोल रहा है रे... तनी इस्टाइल से  बोल - दस रुपया मूरी हाथ गोर फीरी' - गेट के समीप पहली सीट पर बैठे एक व्यक्ति ने उसे समझाया। शायद वो भी बस का स्टाफ था.

'दस रुपया मूरी, हाथ गोर फीरी। का समझे?' राजेशजी ने मुझसे सवाल किया। राजेशजी हमेशा सामने वाले को सोचने-समझने का भरपूर मौका देते हैं।

'किराया दस रुपया है?' मैंने बताया।

'हाँ, यही तो खासियत है एसी बसवन का...कहीं से कहीं जाइए दसे रुपया। टेम्पू वाला को क्भी बोलते सुने है नीचे बीस ऊपर दस.’

‘नहीं कभी सुना तो नहीं. लेकिन टेम्पू वाले कैसे ऊपर बैठाएंगे ?’

‘अरे दूर जाने वाला विक्रमवन सब एक सवारी त ऊपर बैठाईये लेता है माने जब जादे पसेंजर रहता है तभी. हाजीपुर साइड में जाइयेगा त दिखेगा. ऊपर बैठ के एसी आ व्यू दोनों का का मजा दसे रूपया में. हा हा हा ! ’.  बगल से एक टाटा स्टारबस गुजरी जिसके पीछे नीले रंग से बड़े-बड़े अक्षरों में वॉल्वो लिखा हुआ था। उसके नीचे काले अक्षरों में लिखा हुआ था ‘बुरी नजर वाले तेरा बेटा भी जीए, तू भी पीये तेरा बेटा भी पीये’  राजेशजी ने मुझे दिखाया। और बोले:

'देखिये ई दूर जाने वाला एसी बस है। उसमें दो तरह का बस होता है अभी भोलभो नया-नया चला है इसके पहिले जादे करके भीडियो कोच ही चलता था।… आ इ लिखने वाला तो जो कलाकार होता है न… लेकिन एक बात है मिटाने वाला उससे भी बड़ा होता है. जानते हैं… एक बार बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला में से मुंहे मिटा दिया. अब बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला पढके हमको ऐसा चीज याद आ गया कि… आपको का बताएं… हंसीये नहीं रुका था दू घंटा तक….' 

'लेकिन ये तो टाटा की बस है, वोल्वो कैसे हुई?' - मैंने उनकी बात पर मुस्कुराते हुए पूछा।

'अरे त भोलभो माने एसीये बस न हुआ, बढ़िया वाला एसी बस को भोल्भो कहते हैं - बस तो सब टटे का ना आएगा' राजेशजी ने समझाया।

'अच्छा… वैसे वीडियो कोच में वीडियो दिखाते हैं?' - मुझे शंका हुई।

'हाँ हाँ... जादे करके एक्सन फिलिम दिखाता है. माड-धाड़ वाला. लेकिन कवनों-कवनों में बस एक ठो खाली जगह बना दिया है टीवी रखने का। अब देखिये… बस तो ई भी बना है एसी चलाने के लिए। ऐसा है कि जब बस का बाडी बनता है तबे नाम रखा जाता है... किसी का एसी कोच, किसी का भोलभो आ किसी का ?' राजेश जी प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखने लगे।

‘वीडियो’ - मैंने राजेशजी के अधूरे वाक्य को पूरा किया। 'आपके कहने का मतलब ये है कि इन बसों के नाम ही हैं एसी कोच, विडियो कोच और वॉल्वो ?'

'हाँ नामे न रखता है सब ! लगता है आप समझे नहीं... बस का बाड़ी भी ओइसने है लेकिन अब मालिक नहीं लगवाएगा एसी आ विडियो त कहाँ से चलेगा ? अब जहाँ ड्राइवर बैठा है उहाँ पायलट लिख देता है त थोड़े न पायलट आएगा बस चलाने… हा हा हा' - राजेशजी ने मुझे समझाया। मैंने वॉल्वो के बारे में और ना पूछना ही बेहतर समझा। मुझे याद आया जब मैं पटना नया-नया आया था तब एक पान की दुकान वाले ने मुझे पानी बोतल देते हुए कहा था - 'ई भी बीजलेरिए है लेकिन दूसरा कंपनी का है' उसी प्रकार मैंने मान लिया कि है तो भोल्भो ही लेकिन टाटा कंपनी का

'भारा बढा दीजियेगा’ - कंडक्टर ने मुझसे कहा। IMG-20111003-00693

'तू आते ही पैसा माँग लिया कर... सवारी सब खिसियाएगा कि नहीं? थोरा देर बईठ लेने देगा तब न मांगना चाहिए... और जो गांधी मैदान दस रुपया बोल रहा है त कोई आएगा बइठे? इहाँ से कौन देगा दस रुपया? उधर से आते समय चिड़िया घरवा के बाद से खाली गांधीये मैदान बोल। दूर का कोई भी दस रूपया दे देगा लेकिन नजदीक का कौन देगा !' - राजेशजी ने कंडक्टर को फ्री की कंसल्टेंसी दी।

'उ पांडे को जानते हैं सर ?' - कंडक्टर को समझाने के बाद उन्होने मेरी तरफ अति उत्सुकता से देखते हुए कहा। राजेशजी को बड़े अद्भुत विचार आते हैं और यूं तेजी से कह देना चाहते हैं मानो तुरत भूल जाएँगे और कहीं अगर ऐसा हो गया तो सृष्टि में कहीं कुछ उथल-पुथल न हो जाए। ऐसा ही कुछ उनके दिमाग में फिलहाल चल रहा था जिसे वो बक देना चाहते थे.

'हाँ - वो जो कल पांडेजी आए थे वही न' - मैंने कहा.

'हाँ वही... सब समय-समय का बात है सर... उ पड़इया अब पांडेजी हो गया है !' बड़े निराश से दिखे राजेशजी। इस तरह निराश वो कम ही दिखते हैं। उनकी सारी उत्सुकता जैसे फुर्र हो गयी.

‘जूनियर इम्प्लोयी से बड़े बुरे तरीके से बात करते हैं वो. प्यार से बात करने से सब काम हो जाता है लेकिन….’ - कल की कोई बात याद करते हुए मैंने कहा.

‘अरे नहीं सर ऊ त ठीके है. बिना उसके इहाँ काम चले वाला है? इहाँ नहीं चलेगा आपका परेम-मोहबत. आप नहीं समझेंगे यहाँ का मनेजमेंट… यहाँ परेम देखाइयेगा त जूनियर एम्प्लाई आपका बेटीओ लेके भाग जाएगा’ - उन्होंने मुझे एक बार फिर समझाया.

'जानते हैं सर... हमलोग एक्के गाँव के हैं... बरी धूर्त आदमी है इ पड़इया... लंदर-फंदर वाला आदमी है। उ आपके साथ रहा न त... ओइसही करेगा जईसे सल्य करन को कर देता था। अब आपे बताइये करन किसी मामले में अरजुन से कम था?' उन्होने कुछ यूं आत्मविश्वास के साथ कहा जैसे कर्ण और अर्जुन दोनों के साथ उनका रोज का उठना-बैठना था। राजेशजी में एक अद्भुत गुण है वो कुछ बोलकर इस तरह प्रश्नवाचक दृष्टि से आपकी तरफ देखते हैं कि आप उनसे असहमत हो ही नहीं सकते !  

'हमको वही नहीं बढ़ने देता है. नहीं तो जइसा एक्सपीरिएंस है कहाँ से कहाँ गए होते. हमारे मोटरसाइकल पर ही घूमा है साला जिनगी भर। ओही ज़माना से जब हमारे बाबूजी येजदी खरीद दिये थे...
उस जमाना में दू गो त मोटरसाइकिले था येजदी आ जावा। आ तीन रुपया किलो पेटरौल... उस समय गाडीये कहाँ होता था… जब हमलोग छोटा थे त गाँव में या त भोट के परचार वाला गाड़ी आता था नहीं त बालू ढोने वाला टेकटर... आ उस पर दौड़ के किसी तरह जो है सो… हमलोग चर्ह जाते थे...'  बात पड़इया से चलकर उस जमाने में पंहुच गयी.

'चर्ह त जाते थे लेकिन अब उ थोरे ना रोकेगा आपके लिए। त अब उसी में अपना किसी तरह… जो है सो… कूदना पड़ता था' ये बोलते समय उनके चेहरे पर चमक देखने लायक थी। 'जो है सो कूदना पड़ता था' बोलते सामय उन्होंने अपना सर गोलाई में घूमा कर यूं धप से गर्दन नीचे किया जैसे सर ही गाड़ी से गिर गया हो। अपने चेहरे पर फूटे नाक-आँख की अजीबोगारीब आकृति बनाते हुए उन्होने आगे बताया 'उसके बाद नाक-हाथ जो टूटे लेकिन अगले चार दिन तक जो खुशी होती थी कि गारी पर चढ़े हैं उ मत पूछिए - उ सब भी एगो समये था'  पानी पीकर एक ठंडी आह भरी उन्होने। वो अपना गिलास साथ लेकर चलते हैं। स्टील के गिलास की तरफ दार्शनिक की तरह देखते हुए उन्होने आगे बताया:

‘ई जब नया आया था न सर… त नेपाल से स्मगलिंग होके आता था - आ जिसके घर में आ गया समझिए कि... स्टील का बरतन !... बाप रे...आ उसके पहले जस्ता जब आया था तब त लोग समझते थे कि चानिए का बर्तन है। जानते हैं? स्टील का त एगो चाय का कप आता था कि आधा पहिले से ही भरल... कई लोग त बोलते थे… आरे एतना चाय नहीं कम कराइए... नहीं मालूम होता था सबको कि बस देखने ही में बड़ा है’ हँसते हुए उन्होने बताया।

‘आ असली मजा त उसके भी पहिले आता था जब चाय दू-चार घर में ही बनता था... माने जो थोड़ा सम्पन्न टाइप के लोग थे... ई पड़इया के बाप-दादा जैसे लोग आइडिया लगाते फिरते थे कि केतना बजे कहाँ चाय बनेगा... आ आके डेरा डाल देते थे।
अब कप तो घर में होता नहीं था... हुआ भी त किसी का हंडिल टूटा त किसी का मुंहे नहीं... अब उसी में चाय दिया जाता था।  आ जिसको फूल के गिलास में मिल गया उसका त समझ जाइए कि… गमझा से दूनों हाथ में गिलास पकड़े-पकड़े...’ दोनों हाथ से गिलास पकड़ने का अभिनय करते हुए राजेशजी लोट-पोट हो गए।

'चाय ठंडा जाये लेकिन उ साला गिलास कभी नहीं ठंढाएगा'

धन्य हो राजेशजी का ज्ञान वरना लोगों ने तो मुझे भी सजेस्ट किया था कि ‘भोलभो से बिहार घूम आइये’. उस जमाने की बात के चक्कर में पड़इया से पांडेजी हुए व्यक्ति की बात अधूरी ही रह गयी !

~Abhishek Ojha~

पटना प्रवास के आखिरी सप्ताह का दूसरा दिन !

पटना सीरीज

Sep 30, 2011

लेबंटी चाह (पटना ६)

 

‘सर, लेबंटी चाह पीएंगे ?’ एक दिन सुबह सुबह फील्ड ट्रिप पर मुझसे किसीने पूछा.

‘वो क्या होता है?’ मैंने दिमाग पर जोर डालने के बाद पूछा.

‘सर लाल चाह - लेम्बू डाल के !’ उसने स्पष्ट किया.

‘अरे सर ऊ लेमन टी बोल रहा है. ब्लैक टी बिथ लेमन' – राजेशजी ने मुझे समझाया.

‘हाँ हाँ ले आइये… ये अंग्रेजी भी न’ - मैंने राजेशजी की तरफ देखते हुए कहा.

राजेशजी से मेरे पहली मुलाकात थी. गाडी में बजने वाले गाने पर वो अपनी अंगुलियों को कभी अपने जांघों पर और कभी सीट पर फिरा रहे थे. इस तरह संगीत में डूबे हुए मैंने किसी को पहले देखा हो ऐसा याद नहीं… आँखे बंद, सिर मंद-मंद एक छोटी गोलाई में घूमता हुआ और दाहिने हाथ की अंगुलियाँ संगीत के हर सुर का साथ देती हुई. गाना रुका तो उनकी तंद्रा भंग जरूर हुई पर फिर उसी मुद्रा में जाकर ‘पंछी बिछड गए मिलने से पहले’ गुनगुनाते हुए कहीं खो गए. इस गाने को गाते हुए असीम दर्द सा झलक रहा था उनके चेहरे पर. उनकी तन्मयता के कारण उनसे ज्यादा बात नहीं हो पा रही थी। सुषुप्तावस्था से कब वो संगीतप्रेमी वाली मुद्रा में आते और कब वापस सुषुप्त हो जाते ये समझ पाना थोडा कठिन हो रहा था. बीच में जब-जब इनोवा झटके लेती तब तब उनकी अंगुलियों और सिर में गति आ जाती।IMG-20110925-00457

‘लिया जाय’ - उनकी आवाज और लेबंटी चाह सामने देख मैंने प्लास्टिक के कप की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘बैगवा को सुता दीजिए न’ - उन्हें चाह लेने में थोड़ी परेशानी हुई तो उन्होंने मेरी गोद में 'खड़े' बैग की तरफ इशारा किया.

'जानते हैं?' - ये शब्द सुनकर मुझे आनंद की सी अनुभूति हुई। ऐसा लगा जैसे इनकी मुझे वर्षो से तलाश थी। स्कूल के दिनों में रेणु की एक कहानी में ठीक यही सवाल पढ़ा था जिसमें उन्होने अगली लाइन लिखी थी 'मैं कुछ भी नहीं समझ सका कि मैं क्या जानता हूँ और क्या नहीं !' ऊँ डीनो की पढ़ी वो लाइन अब भी याद है पहली बार अनुभूति हुई।

मैंने कहा 'नहीं बताइये'

'आप जब लेबंटी सुन के कन्फ़्यूजिया गए त हमको याद आया। अङ्ग्रेज़ी में बहुत बर्ड का मीनिंग हम लोग उलट दिये हैं। अब देखिये खाना खाने वाले जगह को हमलोग क्या बोलते हैं?'

'रेस्टोरेन्ट?'

'यहीं मार खा गया न इंडिया ! होटल कहते हैं। का समझे ?'

'होटल'

'हाँ। होट माने गरम, त गरमागरम खाना जहां मिलेगा उसको होटले ना कहेंगे? और जहां दु-चार दिन ठहरना हो उसे क्या कहते हैं?'

'आप ही बताइये !' मैंने कहा।

'रेस्टूरेंट ! अच्छा आपे बताइये रेस्ट माने का होता है ?'

'आराम करना?' - मुझे ये बताते हुए भी थोड़ा ड़र तो था ही पता नहीं वो इसका मतलब क्या बता देते !

'तो रेंट देके जहां आराम करना हो उसको  कहेंगे?....' और वो मेरे बोलने का इंतज़ार करने लगे।

'रेस्टोरेन्ट' मैंने उनकी बात पूरी की।

'हाँ ! ये भासा का असली ज्ञान जो है न बहुत कम लोगों के पास होता है। जादेतर सब्द जो है सब आइसही न बना है... आछे एक ठो और... आपको मालूम है कि बिर्हनी किसको कहते हैं?'

'...'

'अरे एक ठो पीला रंग के कीरा होता है... काट लेता है तो बरी फनफनता है। मधुमक्खीये समझिए बस उ सब मधु जमा नहीं करता है। अब बिर्हनी से हो गया बीहनी आ बीहनी से बी आ हनी अलगा करके अङ्ग्रेज़ी में हो गया मधु आ ?...का समझे?....'

'मक्खी' मैंने उन्हें एक बार फिर पूरा किया।

'हाँ - यही सब है भासा के ज्ञान' - उन्होने सगर्व बताया।

ड्राइवर ने किसी चौराहे पर गाड़ी रोकी और फिर आगे का रास्ता पूछने के लिए हमने खिड़की का काँच नीचे किया । 'भैया, शकुंतला एन्क्लेव किधर होगा?' मैंने पूछा तो जवाब देने के लिए चार-पाँच लोग उत्सुकता से आगे आ गए।

'सकुन्तला एंक्लेभ...' एक ने सोचते हुए दुहराया। 'अरे सकुन्तला एंक्लाभ जानता है किधर है?' उसने सवाल आगे बढ़ाया।

'सकुन्तला का ? हूँऊँऊँ... उ जज के मेहरारू हैं का?' एक ने सोचते हुए पूछा।

'आरे जज-कलक्टर आ मेहरारू नहीं रे बुरबक ! आपाटमेंट है सकुन्तला एनकलेभ' - राजेशजी ने मामला संभाला।

'आपाटमेंट? त इधर कहाँ होगा... आप गलत आ गए आपको त किदवई नगर जाना परेगा। आपाटमेंट सब त उधरे है ' - एक ने बताया।

'रुकिए ना जी ई धोबिया के पाता होगा। अरे सुंदरवा... सुन इधर। सकुन्तला इंकलैब अपार्टमेंट जानता है कहाँ है?'

'सकुन्ताला इंकलाब? अइसा त नहीं है इधर' -सुंदरवा ने बताया।

इंक्लेभ, इंकलाभ, इंकलैब, इंकलाब इत्यादि होता देख राजेशजी थोड़े जोश में आ गए। 'साला गलत पता बताया है, देख लेंगे *&^% को...'

'अरे कोई गलत पता क्यों देगा?' मैंने पूछा।

'अरे आप को का बुझाएगा... जब-जब कुछ गरबर करता है तब तब ई मा*#^#* सब गलत रास्ता आ पता बताता है। रुकिए साले को फोन करते हैं।'
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'देखे ! नहीं उठा रहा $%&$% का ! किसी के केरेक्टर का कीजिएगा साला अब उ आज गायबे रहेगा' पटना में पहली बार पूरे फ्लो में गाली सुनने को मिल रही थी ।

'अजीब हाल है !' - मैं कह भी क्या सकता था।

'अरे सर आप निश्चिंत रहिए, हम यही तो करते हैं... अभी देखिये न आधा घंटा में कईसे सब ठीक होता है। हमारा यही सब काम है... आप लोग से ई सब नहीं न हो पाएगा। हम तो अइसा-अइसा प्रोडक्ट पर काम किए हैं इस एरिया में कि आपको क्या बताएं। आ एक-से-एक %$#$^ सब को ठीक किए हैं...  जब $%^& (एक मोबाइल सर्विस) आया था त उसका नाम कुत्तो-बिलाई भी नहीं जानता था। सब हमहीं देखे। फील्ड का बहुते एक्सपीरिएन्स है हमको।

...आता है सब कोट पहिर के होटल में टरेनिंग देने आ दिन भर इस्ट्रेटजी समझाता है। अइसा अक-बक बोलता है कि माथा पगला जाता है। अब इसमें लगाए ससुर कौंची का इस्ट्रेटजी लगाएगा? उ त हमलोग हैं कि अपने हिसाब से काम कर लेते हैं। आपको एक ठो बात बाताते हैं जो भी लेपटोप लेके अङ्ग्रेज़ी में भाषणबाजी किया... बुझ जाइए कि उ एक्को काम का बात नहीं बोल रहा ! हमको तो जाना पड़ता है, महाराजा होटलवा में टरेनिंग होता है। खाना-पीना भी होता है त हम तो उसके लिए ही चले जाते हैं। हमारे टरेनिंग में कभी आइये एकदम काम का बात बताते हैं हम... ' - भरपूर जोश और गर्व में राजेशजी ने बताया।

शकुंतला ढूँढने में मदद करने वाली भीड़ तब तक चली गयी थी। और राजेशजी अपने सूत्रों और तरीकों से काम पर लग गए। मुझे खुशी हुई कि साथ में मेरा लैपटॉप नहीं था... और इसी बात पर एक लेबंटी चाह पीने का मन हो आया।

सोच रहा हूँ किसी दिन राजेशजी का ट्रेनिंग सेसन अटेण्ड कर लूँ !

~Abhishek Ojha~

*तस्वीर: रेल और सड़क मार्ग का बंटवारा करती दीवार पर गोइंठा आर्ट !

Sep 27, 2011

सबका कारण एक है !

 

ओढ़निया ब्लॉगिंग – बहुत दिनों बाद मजा सा आया इस पोस्ट को पढ़कर। सतीशजी के ब्लॉग पर मैं बहुत कम टिपियाता हूँ बस फीड में पढ़ लेता हूँ लेकिन इस पोस्ट पर दो टिप्पणी लूटा आया। याद आया कानपुर में जब फिल्म देखने जाते तो आइटम टाइप के गाने पर कुछ लोग कहते - फेंक 10 रुपए इस गाने पर ! Smile

विवादों के हिसाब मेरे सिलेबस में नहीं आते तो हम उनसे दूर ही रहते हैं। कभी-कभी बदबू दिखी भी तो अपने ऊपर ही परफ्यूम छिड़ककर आगे बढ़ लेते हैं। गंदगी से उलझने में कुछ फायदा नहीं दिखता। बचपन में ही सीखा दिया गया था कि कुछ प्राणी ऐसे होते हैं जिन्हें ‘ना ढेला मारना चाहिए ना प्रणाम ही करना चाहिए’। वैसे तो ये कहावत किसी अशुभ (और शायद शुभ भी) मानी जाने वाली चिड़िया* को लेकर कही जाती है लेकिन ये इन्सानों पर भी बखूबी लागू है। दोस्ती-दुश्मनी दोनों से समान दूरी में ही भलाई !  (वैसे किसी को पता है क्या उस चिड़िया को क्या कहते हैं? सफ़ेद काले रंग की गौरैया के साइज़ की होती है।)

मुझे कभी-कभी विवादों में समझ में नहीं आता कि क्या सही है. कौन पक्ष गलत है और कौन सही. और कभी-कभी प्रत्यक्ष ही एक पक्ष गलत दिखता है. लेकिन हमें क्या पड़ी है ! एक आम भारतीय नागरिक हूँ जो हर बात पर आँख मुँदना जानता है।

कई बार सीधे-सीधे गलत दिखाई देने पर भी जब हमें जो दिखाई देता है कारण हमेशा वही नहीं होता जो हमारे पूर्वाग्रह कहते हैं... थोड़ा तो सोचना चाहिए क्या गलत है क्या सही ! क्या हम किसी बात का बस इसलिए समर्थन कर देंगे कि हम किसी ‘फलानेवाद’ के समर्थक - फलानेवादी हैं?

मोजा फटा होने का मतलब आप हम क्या समझते हैं? यही न कि मोजा पुराना होगा। हम ये सोचते हैं कभी कि पहनने वाले के नाखून बढ़े हुए भी हो सकते हैं ! लेकिन हमें जो देखना है वही देखते है। उसी तरह कई बार जहां जरूरत नहीं वहाँ भी दिमाग लगा लेते हैं। और दिमाग लगाकर भी वही देख लेते हैं जो हमें देखना होता है। मोजा पुराना है या नाखून बढ़ा ये तो उसे पहनने वाला ही जानता है लेकिन देखने वाले को उससे क्या मतलब तो अपने हिसाब से ही लगा लेता है ! फटे मोजे से आगे बढ़ते हैं अच्छा उदाहरण नहीं लग रहा Smile एक भोजपुरी में कहावत है अक्षरशः याद तो नहीं लेकिन मतलब होता है - "कोई भूखा भी लड़खड़ा रहा हो और लोग कहते हैं कि दारू पीए हुए है"।

चाइल्ड लेबर गलत है उन्हें बंद करवा दो. हम भी सपोर्ट करते हैं. मैं एक रिपोर्ट पढता हूँ एक देश में सरकार चाइल्ड लेबर बंद कराने की उपलब्धियां गिनाती है और अगले कुछ ही दिनों में चाइल्ड-प्रोस्टीच्युशन बढ़ जाता है. पटना में एसी बसों की नयी फ्लीट आती है और रिक्शे–ऑटो वाले धीरे-धीरे ही सही परेशान दिखते हैं. अनजाने में एसी कारों की बंद खिड़कीयाँ भिखारियों की आमदनी कम कर देती है – और उन्हें समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हो क्या रहा है। ‘लोग बदल गए – पहले अच्छे थे !’ उन्हें एसी खिड़की के बारे में मालूम हो भी तो कैसे ?!  अंधाधुंध डेवेलपमेंट का सपोर्टर और चाइल्ड लेबर का विरोधी दोनों ही मैं हूँ। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि बिन सोचे...

समहाउ मूड ऑफ था कल – विकट विचार दिमाग में आये. ...मूड को ऑन करने के लिए बाहर निकाल 15 मिनट टहल कर आया। एक चाय पीया और कुछ लोगों की बात सुना। मूड ठीक सा हो गया। कुछ उसी तरह जैसे बदबू हुई तो परफ्यूम छिडकर दिया वो भी ब्रांडेड टाइप – अजारो !

फ्रेंड ऑफ फ्रेंड सर्कल में हर तरह का अपराध करने वालों को आपमें से कौन नहीं जानता?! मैं तो जानता हूँ। लेकिन हम आँखें बंद लेते हैं. नहीं है साहस सच सुनने का. पोलिटिकली करेक्ट बने रहना है. मुझे नहीं याद मेरा किसी से झगड़ा हुआ हो। कुछ भी देख-सुन कर ‘नहीं सभी ऐसे नहीं होते हैं, अब ऐसे लोगों का क्या किया जा सकता है, आप उधर ध्यान ही क्यों देते हैं’ जैसी क्लासिक टैग लाइन से मैं बड़े से बड़े सच को इग्नोर करता रहता हूँ. मैं नहीं कहने जाता कि ये गलत हो रहा है. पुलिस वाला रिक्शे वाले से पाँच-पाँच रुपये वसूलता है. मैं पुलिस वाले से कुछ नहीं कहता। मैं कह सकता हूँ – लेकिन मुझे क्या पड़ी है ?! मैं कभी-कभी रिक्शे वाले को पाँच रुपये अधिक दे देता हूँ - गंदगी पर परफ्यूम छिड़कने की आदत हो चली है !

मेरे जैसे लोग इसी बात से खुश हैं कि भगवान ने मुझे ऐसी जगह नहीं भेजा जहां उन्हें भ्रष्ट होना पड़ता। समाज देख अपने आप पर भी भरोसा नहीं रहा। मेरी माँ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पढ़ रहीं हैं मुझसे अधिक तेजी से और अच्छे से विवेचन कर पढ़ती हैं. अगर मेरे जैसा पढ़ने का मौका उन्हें मिला होता तो... खैर... उनके प्रश्न मेरे कुछ सिद्धांतों को हिला कर रख देते हैं. मैं उन्हें कुछ समझा नहीं पाता। बाहर जाकर फिर 15 मिनट टहल आता हूँ !

कोई किसी तरह दलदल में फंस जाय तो मैं उसे सब कुछ भूल आगे बढ्ने की सलाह दे देता हूँ। भले ही उसे घसीट ले जाया गया हो - मैं पूछ लेता हूँ ‘आप उधर गए ही क्यों?’।  गंदगी पड़ी रहने दीजिये परयुम छिड़कना सीखिये - अपने ऊपर, गाड़ी में, घर में, ऑफिस में...

हमें कहीं भी विवाद दिखता है – तो हम अक्सर निकल लेते हैं। कभी सही-गलत मन में सोच लेते हैं – लेकिन किसी एक का साथ देने में ड़र लगता है। कहीं उलझ ना जाएँ। हमारी बहुत इज्जत है – हम सिविलाइजड लोग हैं। या फिर शायद ये मेरा भ्रम है। लेकिन मैं तो अक्सर गंदगी पर परफ्यूम छिड़क आँख बंद कर निकल लेता हूँ।

ये तो एक तरह के लोग हुए। इसके अलावा हर मामले में कुछ लोग इस तरफ हो जाते हैं कुछ उस तरफ। लेकिन कुछ कहीं नहीं होते और हर जगह भी होते हैं। कुछ को खुद नहीं मालूम होता कि मैं इस तरफ क्यों हूँ... और भी कई क्लास है लोगों के। बिन देखे सुने कुछ लोगों की हुआं-हुआं करने की आदत होती है। वैसे लोगों पर परसाई जी याद आ रहे हैं:

“हर भेड़िये के आसपास दो – चार सियार रहते ही हैं। जब भेड़िया अपना शिकार खा लेता है, तब ये सियार हड्डियों में लगे माँस को कुतरकर खाते हैं, और हड्डियाँ चूसते रहते हैं। ये भेड़िये के आसपास दुम हिलाते चलते हैं, उसकी सेवा करते हैं और मौके-बेमौके “हुआं-हुआं ” चिल्लाकर उसकी जय बोलते हैं।” – परसाई जी के मामले में तो हड्डी इन्सेंटिव हुआ करता था। मुझे तो ऐसे लोग भी दिखते हैं जो बिन हड्डी के भी हुआं-हुआं करते हैं। पता नहीं किस चीज की आस होती है। परसाई जी आगे लिखते है:

“पीले सियार को हुआं-हुआं के सिवा कुछ और तो आता नहीं था। हुआं-हुआं चिल्ला दिया। शेष सियार भी `हुआं-हुआं’ बोल पड़े। बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना कर दिया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला, “भई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं। पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? उनकी कविता में से शाश्वत के स्वर फूट रहे हैं।”

बिन हड्डी के हुआं-हुआं करने और हुआं-हुआं को शाश्वत स्वर समझने वाले कितने हैं आपके आस-पास? आस-पास नहीं तो टिप्पणी बक्से में तो आते होंगे?

जो भी हो एक बात है इस मार्केट की उठा-पटक में किसी भी इनवेस्टमेंट पर गारंटीड़ रिटर्न और कहीं मिले न मिले हिन्दी ब्लॉगिंग में जरूर है ! हुआं-हुआं फॉर्मेट ही सही।

मेरे कहने से कुछ बदल नहीं जाएगा। मैंने पहले भी एक बार कहा था कि एक ब्लोगर के विचार बस टिप्पणी बटोर सकते हैं Smile हाँ मेरा गुस्सा थोड़ा जरूर कम हो जाएगा और मैं फिर चुपचाप आँख बंदकर निकल लूँगा। ब्लॉग पर गुस्सा लिख देना भी परफ्यूम छिड़क लेने जैसा ही नहीं है?

कुछ फलानेवादी टाइप के लोग होते हैं जो हर बात का एक ही कारण बताते हैं। वैसे ही जैसे आजकल ग्लोबल वार्मिंग का भी बहुत फैशन है। इस वाद के लोग गर्मी हुई तो ग्लोबल वार्मिंग, बारिश हुई तो भी और ठंड हो गयी तब भी - सबका मालिक एक टाइप सबका कारण ग्लोबल वार्मिंग । कल पटना में मुझे एक ऑटो वाले ने बताया ‘अच्छा हुआ बारिश हो गयी अब भूकंप नहीं आएगा’। मैंने पूछा वो कैसे? तो बताया: ‘अरे आपको नहीं पता? ये सब गर्मी से होता है।’ झील सुख गयी तो, भर गयी तो भी। वो तो फिर भी ठीक है शायद किसी तरह जुड़े हुए भी हों ग्लोबल वार्मिंग से। अब हम भूगोल के विद्यार्थी तो थे नहीं इसलिए इस पर कमेन्ट नहीं करना चाहिए लेकिन कल एक लड़का-लड़की साथ भाग गए और कोई कह रहा था “क्या जमाना आ गया है ! ग्लोबल वार्मिंग से ये सब थोड़ा ज्यादा ही बढ़ गया है पहले कम होता था”। अब ये कैसे रिलेटेड है मेरी समझ के बाहर था !

हर बात का ना तो कारण ही एक होता है ना समाधान ही एक ! अगर हर समस्या का कारण ग्लोबल वार्मिंग और समाधान अनुलोम-विलोम हो जाये तो दुनिया बड़ी आसान हो जाती। नहीं? किसी ने मुझे बताया था कि अनुलोम-विलोम करने से उसे गर्लफ्रेंड मिल गयी ! होता भी होगा – न भी हो तो अनुलोमविलोमवादी तो कहेंगे ही।

मैं खुश हूँ कि मैं गिने हुए दर्जन भर ब्लॉग पढ़ता हूँ। और उन दर्जन में से कइयों को ये पता भी नहीं है कि मैं उन्हें पढ़ता हूँ। मैं *$%^वादी ब्लोगरी से दूर हूँ (*$%^ की जगह आपको जो मर्जी आए भर लें !)। अगर दिखे भी तो आँख बंद करने की आदत जो है। गंदगी सफाई अभियान वाले लगे रहे – फैलाने वाले भी लगे रहें।

सतीशजी के ओढ़निया पर कहीं हुई चर्चा को देख मन भटका तो मन को कीबोर्ड से जोड़ दिया। पटनहिया पोस्ट इस ब्रेक के बाद जारी रहेगी Smile

आज सुबह ऑटो में इतनी सुंदरियाँ बगल में बैठी थी। मैं फोटो खींचने लगा तो ऑटो वाले ने कहा - ‘मोबैल में रखके का माजा आएगा। उ भी फोटो से फोटो खेञ्च रहे हैं - त बर्हिया नहीं नू आएगा। कहिए तो दिला दें बरा वाला पोस्टर। लगा लीजियेगा देवाल प’।

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~Abhishek Ojha~

*पोस्टोपरांत अपडेट: अभी पता चला कि ये चिड़िया खड़िच या खड़िलीच के नाम से जानी जाती है। साइबेरियन माइग्रेटरी बर्ड है और इसे देखना शुभ माना जाता है। लेकिन किसी खास दिशा/कोण में बैठे तो अशुभ ! अंतिम अपडेट : यह पक्षी खंजन (wagtail) है.

Sep 22, 2011

खतरनाक मस्त ! (पटना ५)

 

जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से एक बार फिर निकालना हुआ और इस बार एक 'आइये भैया ! ऑटो होगा?' का जवाब मैंने 'हाँ' से दिया.

'भैया, जो सही किराया हो आप बता दो, कुछ ऐसा मत बोल देना कि मुझे मना करना पड़े.' - मैंने ऑटो में बैठने के पहले कहा.

'अब सर जब आप हमीं पर छोर दिए त आपसे नाजायज थोरे लेंगे. बइठीये. कहाँ चलियेगा' -  बाएं हाथ से ऑटो चालु करने वाला डंडा नीचे से उपर खींच दाहिने हाथ से ऑटो को हुर्र-हुर्र कराते ऑटोवाले ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा.

'आपका ऑटो तो बिल्कुल चकाचक है.' मैंने हाथ जोड़ स्वागत करती ऐश्वर्या, दाहिनी तरफ कैटरीना, बायीं तरफ करीना और सामने शायरी के साथ मादक मुद्राओं में अदा बिखेरती बॉलीवुड अभिनेत्रियों की तस्वीरों को देख कर कहा.

'हे हे हे...हाँ सर, अब दिन भर एही में रहते हैं त लगवा लिए हैं. मन लगा रहता है... आ सवारी को भी त आछा लगबे करता है.'  ऑटो बढाते हुए उसने कहा.

'हाँ वो तो है. कल भूकंप आया था इधर? कुछ नुकसान तो नहीं हुआ?'

'हाँ सर. ...लेकिन बहुते मामूली था. कुछो हुआ नहीं है. खाली राजा बाजार में एक ठो बिल्डिंगिए हइसे लप गया है' - ऑटो वाले ने बायां हाथ ऊपर उठा कर तिरछा करते हुए बताया. 'आ हमको तो एकदम साफा बुझाया कि पलट जाएंगे. अइसा लगा... कि पाटारा प खारा हैं आ उ जो है सो हइसे-हइसे लप-लप कर रहा है.' हवा में हथेली लपलपाते हुए उसने समझाया.

'सर, आगे सवारी बइठा लें? पीछे आप अकेलहीं रहिएगा आ हमको बस एक ठो पचस टकिया दे दीजियेगा. मान लीजिए दू सवारी पांच-पांचो रुपया देगा त हमको कुछ एक्स्टारा कमाई हो जाएगा. अब आप हमरे प छोर दिए हैं त आपसे का कहें… नहीं त एयरपोर्ट से थोरा जादे लेते हैं हमलोग.'

'हाँ हाँ, बैठा लीजिए'

इस अप्रूवल के बाद दो लड़के आगे की सीट पर बैठा लिए गए. दोनों संभवतः बीए-बीएससी प्रथम या द्वितीय वर्ष के छात्र थे. उनके आने के बाद हमारी बातचीत बंद हो गयी. और उनकी चालु...

'अबे प्रियांकावा को देखा? दिल्ली जाके एकदम भयंकर हो गयी है - बिल्कुल मस्त'

'तू कहाँ देख लिया ?'

'भाई का बड्डे मनाने आई है. साला एतना खतरनाक हो गयी है कि मत पूछ.' खतरनाक और भयंकर का अद्भुत उपयोग किया लडके ने. कौन अलंकार होता है जी ये सब? फिलहाल मुझे उनके बातों में रूचि आने लगी. IMG-20110916-00403

'अबे एक बात है जो भी बाहर जाती है. मस्त हो जाती है. वैसे आजकल तो सभे चली जाती है. सब बेकार वाली ही इधर रह जाती है. इहाँ कम कोचिंग है?... बेटा ! एक बात जान लो एतना कोचिंग हिन्दुस्तान के किसी सहर में नहीं है... लेकिन दिल्ली-कोटा का जो फईसन है न...'

'हाँ पढाई इहाँ बुरा थोरे है, एक से एक टीचर है'

'अबे हम उ वाला फईसन नहीं कह रहे हैं... असली वाला भी त फईसन है. इहाँ त वीमेंस कोलेजवा में वइसा कपरवे नहीं पहनने देगा. आ घर में रहेगी त का पहिनेगी. घर वाला भी नहीं पहनने देता है. दिल्ली-कोटा में सब ओइसही पहनता है. सलवार सुट भी पहनेगा त दूसरे तरह का '

'हाँ बे, यहाँ तप एक-दू ठो बची है थोडा ठीक... लेकिन साला उ सब भी पढ़ने वाला सब को ही भाव देती है. हम तो साला दुए दिन में सोच लिए कि बाप का पैसा बरबाद नहीं करेंगे... कोचिंग छोर दिए.'

'अबे हमको तो फीरी-बॉडी डायग्राम में आज तक इहे नहीं नहीं बुझाया कि कब किधर तीर लगाना है. जिस दिन सिनाहावा बताया कि साइकिल का कौन पहिया में किधर फ्रिक्सन लगेगा तभिये हमको बुझा गया कि आगे पढ़ के बस पैसा बर्बादे है. लाइन मारने के लिए बाप का पैसा नहीं बर्बाद कर सकते बॉस... अपने बाप के पास एतना पैसा नहीं है'

'साले दिमाग में से बॉडी आ फ्रिक्सनवा निकालोगे तब न बुझायेगा'

'हे हे हे'

'अबे इ देख क्लियर कंसेप्ट वाला भी टेम्पू पर प्रचार लगवा दिया.' - बगल से जाते ऑटो के पीछे एक कोचिंग का ऐड देखकर एक ने कहा.

'साला इ तो सही में एकदम कंसेप्टवे क्लियर कर देता है. एकदम जड़ से पूरा माइंडवे क्लियर कर देता है. अइसा क्लियर कि कुछो बचबे नहीं करेगा फिर समझने को... हा हा हा'

'सब कोचिंग वाला साला हरामी होता है. एक ठो माल लइकी का फोटो जरूर लगाता है. जेतना प्राइभेट कोलेज वाला है, मीडिया-सीडिया, एमबीए, जावा, बीटेक, सीटेक सबमें एक माल का फोटो... '

'सेकपुरा मोरवा के आगे एक ठो एतना मस्त इलियाना का फोटो लगाया है... उ तो साला गजबे कर दिया है.'

'इलियानावा वही न... साउथ वाली?'

'हाँ, उ भी भयंकर मस्त है. हिंदी में उ भी एक दिन जरूर आएगी.'

'उधर देख.. इसको त हम एक दिन फोन करके पूछेंगे कि इ लरकी कौन है तुम्हारा पोस्टर में?. उसका नंबर जुगाड़ता हूँ'... सामने एक मीडिया कोर्स के प्रचार में लगे बड़े होर्डिंग की तरफ इशारा करते हुए एक ने कहा.

'हाँ इ तो लोकले लग रही है कोई. लेकिन बताएगा नहीं.'

'अबे बताएगा कइसे नहीं. साला कुछ करते हैं. चन्दनवा के भैया हैं न उनका जान पहचान है इस इन्स्टिच्युट में'

तब तक मैं अपने ठिकाने पर पहुँच चूका था....

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Recently Updated--

~Abhishek Ojha~

- राजाबाजार की वो 'लपी' हुई बिल्डिंग अभी पटना का सबसे बड़ा आकर्षण हैं. गोलघर से ज्यादा भीड़ लगती है वहाँ.

- दीवार: रंगाई के बाद की चमचमाती दीवार पर फिर लाल परतें चढनी शुरू हो गयी हैं. कुल चमचमाते दिन: ८-१० रहे होंगे. बस पहली बार का संकोच होता है. एक बार किसी ने परत चढा थी फिर क्या ! अब तो आते जाते कोई भी...

- शायरी (ऑटो से):

१. दुल्हन वही तो पिया मन भाये, गाडी वही जो मंजिल तक पहुँचाये.
२. ऐ सनम तू जन्नत की हूर है, कमी यही है कि तू मुझसे दूर है.
३. ड्राईवरी में हम दुनिया के नज़ारे करते हैं, हम नहीं चाहते लेकिन वो इशारे करते हैं.

- पटना: बस कुछ दिन और !

पटना १, पटना २, पटना ३, पटना ४

Sep 14, 2011

हर तरह का पब्लिक है ! (पटना ४)

 

गाँधी मैदान !... गाँधी मैदान !... गाँधी मैदान !

‘गाँधी मैदान हैं ?’ एक ऑटो वाले ने बिल्कुल सामने ऑटो खड़ा करते हुए पूछा.

स्टेसन !... स्टेसन !... स्टेसन !

‘जक्सन हैं?’ एक दूसरे ऑटो वाले ने मेरे और पहले से खड़े ऑटो के बीच में बची जगह में अपना ऑटो फिट करते हुए पूछा.

मुझे एक पुराने शिक्षक याद आये. जब वो अटेंडेंस लेते और कुछ बच्चे उन्हें ‘यस सर’ की जगह ‘यस मैडम’ कह देते तो वो अटेंडेंस लेना बीच में ही रोककर मुस्कुराते हुए बड़े प्यार से पूछते ‘ए जी, आपको हमारी मूंछ नहीं दिखती है?’. मेरा अक्सर वैसे ही ऑटो वालों से पूछने का मन होता है… एक अच्छा ख़ासा इंसान जंक्शन और (या) मैदान कैसे हो सकता है !

इतना घुसकर पूछने की क्या जरुरत? जिसे जाना हो वो खुद ही आएगा. लेकिन बात ऐसी है नहीं. इस मामले में पटना में कुछ लोग गजब हैं - ऑटो वाले पूछते रहते हैं और लोग चुप ! बिल्कुल उदासीन ! निशब्द ! चेहरे पर कोई भाव नहीं. हाथों से भी कोई संकेत नहीं. कुछ उसी उदासीन भाव में इधर उधर ताकते हुए बिना कोई संकेत दिए आहिस्ते से आकर बैठ भी जाते हैं. ऑटो वाले चिल्लाने और पूछने के अलावा करें भी तो क्या करें. बड़ा कठिन है ये अनुमान लगा पाना कि किसे जाना है किसे नहीं. बेचारे शेयरधारक और भारतीय क्रिकेट फैन्स की तरह आस लगाये रहते हैं शायद इनमें से कोई चल जाए. और ठीकAuto-in-Patna उसी तरह कभी-कभी कोई चल देता है. कभी सभी चल जाते हैं तो कभी कोई नहीं. वो भी चल जाते हैं जिनसे कोई आस ही नहीं होती.

‘नींद में रहता है’ – मुझे ऑटो वाले ने बताया.

‘सब तरह का पब्लिक है. कुछ तो कभी नहीं बोलेगा. आप केतनोहू पूछ लीजिए उ बोलबे नहीं करेगा, जाना होगा तपर भी नहीं. आ कुछ अईसा पब्लिक भी है जो अभी गलिये में रहता है त हाथ हीला देगा कि नहीं जाना है… उसीमें से कुछ किनारे पर बईठ गया त अंदरे नहीं जाएगा. उसको हवा खाते हुए ही जाना है. सवारी आयेगा त पैर टेढा कर लेगा लेकिन उ भीतर नहीं जाएगा. …सब तरह का पब्लिक है. अब लेडिस सवारी आये तो कुछ लोग आगे नहीं आता है…. उ पीछे ही बैठेगा आगे ऐबे नहीं करेगा. …कई बार त हमलोग को सवारी छोड़ना पड़ता है. लेकिन अब वईसा आदमी भी हए जो लेडिस देखके खुदे उतर जाता है. मान लीजिए कि आपके घर में भी बहन हैं त आप चाहियेगा कि उसको आगे बैठना पड़े… आ ई पुलिसवन सब त ताकते रहता है कि कौन टेम्पू में आगे पसेंजर नहीं बईठा है. आके बइठ जाएगा. ना टरेन में पईसा देता है ना टेम्पो में… बसवा वलन सब तो ले लेता है. स्टाफ हैं तो का भारा नहीं देगा?’

‘आपलोगों को भी मांग लेना चाहिए’ – मैंने कहा.

‘अरे नहीं सर, हम लोग को तो अईसा परेसान कर देता है कि पूछीये मत. बोल देगा कि यहाँ काहे खरा किया है. परमिट, लायसेंस, ई लाओ, उ लाओ... हेन-तेन… पचास ठो नाटक है.’

‘गांधी मैदान?… बैठिये… अरे आइये ना महाराज. केतना तो जगह है. आगे-पीछे हो जाइए थोडा-थोडा.’ एक सवारी बैठाने के बात वार्ता आगे बढ़ी:

‘अब आपसे बात हो रहा है तो बता रहे हैं. एक ठो अऊर बात है. पहिले लईका सब रंगबाजी करता था तब तक ठीक था. … मान लीजिए हम भी कम से कम दु बात बोलते तो थे. लेकिन दू साल से जो ई लैकियन सब रंगबाजी कर रही है तो कुछो नहीं कर पाते हैं… एक बार उसको बस बोलना है कि कईसा बतमीज है रे टेम्पू वाला… इतना बोला कि उसके लिए १० ठो लफुआ तैयार खड़ा है. …अभी पाँच ठो लड़की गया मेरा टेम्पो में… आगे-पीछे करके बैठ गयी सब…  मोरया लोक उतर के बोलता है कि तीन सीट है त उसी का न भारा देंगे. हम बोले कि टरेन में जाइयेगा आपलोग खरा होके तो कए सीट का भारा दीजियेगा?... एतने में मोटरसाइकिल होएँ होएँ करते चार ठो आ गया. ‘क्या हुआ - क्या हुआ?’ …हम उहो पन्द्रह रूपया लौटा दिए. बोले कि लो तुमसे वसूलने वाला ले लेगा’.

‘उन्होंने पन्द्रह रुपये वापस ले लिए?’ – मैंने बीच में ही पूछा.

‘हाँ नहीं त. पर ई तो कुच्छो नहीं है. पहिले तो पूजा में हजार दो हजार चंदा ले लेता था लड़का सब. दस जगह रंगदारी तो हम भरते थे. पान खा लेगा आ लाल गमछा… बोलेगा ‘ऐ रोकअ तनी, पूल के ठेका हुआ है अपना’. अब दीजिए उसको दस-बीस. आ उसी में बोल दीजिए कि नहीं देंगे त… ‘ए खोल ले रे चाका’. उसमें ऐसा है कि प्रसासन का भी त हिस्सा होता था’ उसने आवाज धीरे करते हुए कहा.

‘उ देख रहे हैं न वहीँ पर सुलभ सौचालय के पीछे बैठ के पूलिसवन सब दारु पीता था. अब प्रसासन थोडा टाईट हुआ है… नितीस कुमार के बाद ई सब तो खतम हो गया… बस ई एसी बसवन के आने से थोडा मार्केट डाउन हुआ है. लेकिन उसमें कहीं से कहीं जाइए पन्द्रहे रूपया भारा है. तो छोटा रूट पर हम लोग का ठीक रहेगा’

‘पूरे दिन कोई चलते रहा तो भी?’ – एक दूसरे यात्री ने पूछा.

‘अरे नहीं महाराज तब त खटीये ठाड़ा हो जाएगा. जब उतारियेगा तब टिकटवा लेके फार देता है. वइसे दो हजार बारह से हमलोग का अच्छा कमाई होगा. भारा दोबरी हो रहा है’

‘दोबरी?’ 

‘हाँ. लेकिन खाली तीने ठो सवारी बैठेगा’

तब तक मैं गाँधी मैदान पहुँच चूका था. जैसे ही उतर कर आगे बढ़ा एक ऑटो वाले ने पूछा ‘आइये, जक्सन हैं?’ मैंने कहा ‘नहीं भैया अब कहीं नहीं जाना है’ और आगे बढ़ गया...

…हर तरह का पब्लिक है !

 

~Abhishek Ojha~

जा बढ़ा के ! वाया:  पटना १, पटना २, पटना ३

Sep 1, 2011

सरभरवा त डाउन होइबे करेगा (पटना ३)

 

करीब २ साल पहले एक नयी कंपनी ने मोबाईल के इस्तेमाल से पैसा भेजने का काम चालू किया था. इस सेवा के अंतर्गत कंपनी के किसी भी ग्राहक सेवा केन्द्र से भारत के किसी भी बैंक खाते में पैसे जमा किया जा सकता है. ग्राहक सेवा केन्द्र अक्सर छोटी दुकानों में होता है जैसे: किराने की दूकान, पान वाला, मोबाईल रिचार्ज कूपन वाले इत्यादि. पैसा ट्रांसफर करने के लिए ग्राहक सेवा केंद्र वाले अपने मोबाईल से बस एक मेसेज भेजते हैं और फिर भेजने वाले, पाने वाले और ग्राहक सेवा केन्द्र तीनों के मोबाईल पर इस लेनदेन की पुष्टि के लिए एक मेसेज आता है.  इस मोबाईल बैंकिंग का इस्तेमाल माइक्रोफाइनांस लोन के किस्त जमा कराने के लिए इस्तेमाल भी किया जा सकता है. जिसका आजकल परीक्षण चल रहा है. 

पिछले दिनों इसी सिलसिले में गुप्ताजी से मिलना हुआ. गुप्ताजी १९९३ से पटना में दैनि़क इस्तेमाल के चीजों की एक छोटी सी दुकान चला रहे हैं. उनकी दूकान मोबाईल बैंकिंग का एक ग्राहक सेवा केन्द्र भी है. गुप्ताजी के दूकान-कम-रेसीडेंस में हुई बातचीत का अंश पढ़ा जाय Smile

‘अभी ये जो पेमेंट आया उसको आपने प्रोसेस तो किया नहीं?’ - मैंने गुप्ताजी को एक नोटबुक में लिखते हुए देख पूछ लिया.

‘अभी सरभर डाउन है'

‘ओह! कब तक डाउन रहेगा?’IMG-20110825-00307

‘अब उ तो दू मिनट में भी चालु हो सकता है आ दू घंटा भी लग सकता है'

‘जनरली कितने टाइम मे ठीक हो जाता है?’

‘अभी त बताए आपको - कवनो ठीक नहीं है कब चलेगा’

‘अगर सर्वर पूरे दिन डाउन रहे तब?’

‘आप ही बताइए जब सरभरवे डाउन रहेगा तो हम का कर सकते हैं? लिख के रख लेते हैं आ जब चालु होता है तब जामा करा देते हैं’

‘मान लीजिए कि सर्वर बहुत देर तक डाउन रहा और बाद में आपने कह दिया कि आपके पास कोई पेमेंट ही नहीं आया तब?’

‘देखिये हम हियाँ १९९३ से दूकान चला रहे हैं आ जिनके यहाँ खाते हैं हम उनके यहाँ खाते है आ उ हमरे इहाँ खाते हैं’ - उनका जोश और आवाज मेरे सवालों की संख्या के समानुपात में बढ रहे थे.

‘वो तो ठीक है लेकिन हर कस्टमर सर्विस पॉइंट तो आपके जैसा नहीं होगा? इस समस्या का कोई उपाय नहीं है? ’ - मैंने फिर हिम्मत कर पूछा.

‘कवंची उपाय करेंगे आप सरभर डाउन होने का, आपे बताइये ?’

‘ये तो आपको पता होना चाहिए ?’

‘नहीं ! कवनो उपाय कर लीजिए  सरभरवा त डाउन होइबे करेगा.’

‘लेकिन ऑपरेशनल इसु है तो कुछ तो उपाय होगा. धीरे-धीरे कुछ महीनों बाद…'

‘क्या होगा? आप आज आये हैं आ हम पांच साल से रोजे ई देख रहे हैं. अउर खराबे हुआ है. पहिलही ठीक था’  - मुझे बीच में ही रोककर बोले.

उनकी धर्मपत्नी बार-बार पर्दा हटाकर देख लेती कि किससे झगडा हो गया. इस बार उनसे नहीं रहा गया. बाहर आकर बोलीं: ‘का हो गया जी?’

‘कुछो नहीं हुआ, अईसही बात कर रहे हैं. आप अंदर जाइए.’

‘लेकिन इसका कुछ तो उपाय होना चाहिए. जैसे सर्वर मेंटेनेंस उस समय किया जाय जब बिजनेस नहीं होता. रात को दो घंटे डाउन रहे. समय के साथ और खराब कैसे होता जा रहा है?' - मैंने फिर से प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा.

इस बार वो भड़क गए.

‘आप समझते काहे नहीं हैं? कौंची उपाय कराएँगे आप? आ काहे का मेंटेनेंस? पहिले ध्यान से मेरी बात सुनिए तब कुछ बोलियेगा. डीजल का पैसा दिया कंपनी वाला आ आपरेटरवा बेच के खा जाए तो का कीजियेगा? बताइये? अच्छा एक बात बताइये - सर्भर क्या होता है? व्हाट डू यू मीन बाई  सरभर?’ -उनकी आवाज का वोल्यूम उनकी पत्नी को फिर बाहर लाने के लिए पर्याप्त था. (‘का हो गया जी?’’)

जीवन में परीक्षा-प्रश्नपत्र के अलावा मुझसे किसी ने इससे पहले ‘व्हाट डू यू मीन बाई’ वाला सवाल किया हो - मुझे याद नहीं ! मैं थोड़ी देर के लिए सकपका गया कि कैसे समझाया जाय कि सर्वर क्या होता है. पर उसकी नौबत नहीं आई और वो खुद बोल पड़े.

‘बताइये ई का है?’ - अपना मोबाईल हाथ में लेते हुए उन्होंने मुझसे पूछा.

‘मोबाईल'

‘और ये  ?’ - मोबाईल का कवर खोल बैटरी  निकालते हुए उन्होंने अगला सवाल किया.

‘बैटरी'

‘हाँ तो ई जो आप मोबाईल देख रहे हैं उ होता है नेटवर्क और ई जो बैटरी है उ हुआ सरभर. अब मोबाईल चलेगा त बैटरी डाउन होगा कि नहीं ?’

‘होगा’

‘त बस ओइसेही सरभर भी डाउन होता है !’

उनकी मुद्रा, विवरण और आत्म विश्वास देख मुझे कुछ और पूछने कि हिम्मत नहीं हुई.  मेरे साथ गए लोग हंसी-मिश्रित सीरियसनेस किसी तरह मेंटेन कर पा रहे थे.

उनकी धर्मपत्नी ने फिर पूछा – ‘हुआ का है? काहे झगडा कर रहे हैं?’

‘कुछो नहीं. होगा का. अईसहिये बात कर रहे हैं. चाय बनाइये आप.’

‘बात कर रहे हैं त आराम से बईठ के नहीं कर सकते !’ - उनकी धर्मपत्नी थोड़ी परेशानावस्था में अंदर चली गयीं.

‘आप बैठिये, चाय-वाय पीजिए’ - मेरी तरफ देखकर उन्होंने कहा. वैसे थे अभी भी भरपूर गुस्से में.

‘नहीं -नहीं चाय फिर कभी पियेंगे. थैंक यू ! सर्वर समझाने के लिए’ - आगे सवाल जवाब करने पर पीटने पिटने का डर भी था. तो हम मुस्कुराते हुए निकलने का रास्ता देखने लगे.

‘उ का है कि हम कभी-कभी थोडा समझाने में जोसिया जाते हैं, बुरा मत मानियेगा… बईठीये ना… हमारा घर भी इसी में है. चाय बनवाते हैं… पी के जाइयेगा. और ई हमारी धर्मपत्नी हैं…. बचपन से ही उ का है कि हम जादे पढ़े तो नहीं लेकिन जब समझाने का बात आता है तो हम अइसा समझा देते है कि….’ मैं चलने को हुआ और अब गुप्ता जी धीरे-धीरे थोडा नोर्मल हो रहे थे.

…और इस तरह मुझे समझ में आया कि सर्भर क्या होता है और क्यों डाउन होता है… और आगे भी होता रहेगा ! आपसे भी कोई पूछे तो समझा दीजियेगा, डाउट की गुंजाइश नहीं बचेगी.

~Abhishek Ojha~

Aug 25, 2011

अन्ना: एक चैट लॉग - नवंबर २००६

 

अंतराग्नि २००६ के इंडिया इंस्पायर्ड इवेंट में अन्ना हजारे को मैंने १० फीट दूर से सुना था. तब शायद अन्ना का नाम भी पहली बार ही सुना था. अंतराग्नि का अंतिम दिन था और मेरा सर दर्द कर रहा था. जहाँ तक मुझे याद है मुझे कोई पकड़ कर ले गया था इस इवेंट में.

आज अपने जीमेल में ‘अन्ना’ सर्च किया तो अंतराग्नि के ठीक बाद दो दोस्तों से किये गए चैट मिल गए. ये उसी चैट का एक अंश हैं.  २००६ अंतराग्नि में नुक्कड़ नाटक और पैनल डिस्कशन दोनों में आरटीआई छाया रहा था. आरटीआई पर नुक्कड़ नाटक काफी मशहूर हुआ था जो एमटीवी के ‘क्या बात है’ पर भी आया था. बाद में उस टीम को राज कुमार संतोषी से भी प्रसंशा मिली थी. उन्होंने ये भी कहा थे कि वो कुछ अंश अपनी आने वाली फिल्म (हल्ला बोल) में इस्तेमाल करना चाहेंगे. 

उस पैनल डिस्कशन में कई लोग थे सबकी अपनी उपलब्धियां थी लेकिन अन्ना सबसे इम्प्रेसिव थे. Annaठीक इसी तरह पिछले दिनों न्यू योर्क में एक कॉन्फ्रेंस में मुझे ईला बेन ने भी बहुत प्रभावित किया था. ये वार्तालाप जब हुआ था तब अन्ना इतने प्रसिद्द नहीं थे. तब मैं फाइनल इयर का छात्र था और कुछ दोस्त जो चार साल वाले प्रोग्राम में थे, ग्रेजुएट हो गए थे. उन्हीं दोस्तों में से दो के साथ ये बात हुई थी. खतरनाक, इंट्रेस्टिंग और ‘क्या आदमी है !’ जैसे शब्द आये हैं अन्ना के लिए. बाकी बातें तो अब सबको पता है उस समय के लिए नयी थी. आप शायद उतना एन्जॉय ना कर पाएं जितना मैंने किया. फिर भी…

कुछ सेंसर कर बाकी चैट लॉग वैसे का वैसा:

चैट लॉग १:


2:45 PM me: भाई, कहाँ रहते हो आजकल?

2:49 PM Friend-beta: हाय

Friend-beta: कैसे हो?

2:50 PM me: ठीक हूँ, तुम बताओ

Friend-beta: बस मजे में हूँ

2:51 PM me: इस बार अंतराग्नि का पैनल डिस्कशन मिस कर दिया तुमने. आरटीआई पर था. बहुत ही मस्त हुआ.

2:52 PM Friend-beta: हाँ पता चला है

me: अन्ना हजारे, अरुणा रॉय, मधु भंडारी, प्रभाष जोशी, संदीप पांडे और ओ पी केजरीवाल.

2:53 PM मेरा सर दर्द कर रहा था जाने के पहले ऐसे ही जाके बैठ गया. फिर ३ घंटे तक उठाने का मन ही नहीं किया. अन्ना हजारे क्या आदमी है. सुनके लगा कि कैसे लोग गांधी को बैठ के सुनते और इंस्पायर होते होंगे.

…इरिलेवेंट कन्वर्सेसन…

2:59 PM me: वैसे तुम्हे तो पता ही होगा इन्हीं लोगों ने बहुत हद तक आरटीआई बनवाया है.

3:00 PM Friend-beta: हाँ भाई इतना तो पता है.

me: ओ पी केजरीवाल सीआईसी कमिशनर हैं.. बेचारे को बहुत गाली दी सबने. बोल रहे थे कि ये तो अच्छे आदमी हैं लेकिन सीआईसी बहुत बेकार काम कर रहा है.

3:01 PM एक मनीष कुमार भी आया था पहले जी टीवी में था अब परिवर्तन में है.

3:02 PM Friend-beta: सीआईसी का तो हिद्यातुल्ला है?

3:04 PM me: यार अब यहाँ तो केजरीवाल ही आया था clip_image001

Friend-beta: चीफ इन्फोर्मेशन कमिश्नर? वो भी होगा. ३ लोग हैं.

Friend-beta: वो क्या बोल रहा था

3:05 PM me: वो कुछ बोला ही नहीं. पहले उसे ही मोडरेट करना था. लेकिन बोला कि मैं गवर्मेंट का आदमी हूँ… यहाँ आये लोग बोलेंगे कि मुझे बोलने नहीं दिया. इसलिए संदीप पाण्डेय को मोडरेटर बना दिया.

3:06 PM Friend-beta: ओके

me: एंड में बोला कि आप लोग जो बोल रहे हैं वो सही है और ९०% केस हमारे पास गोवेंमेंट ईम्प्लोयीज और ओफिसर्स के आते हैं. जनरली प्रोमोशन से रिलेटेड. कोई पब्लिक इंटरेस्ट में केस फाइल ही नहीं करता. और सजेस्ट किया कि आप लोग गंगा एक्शन प्लान पर आरटीआई में एक अप्लिकेशन डालिए.

Friend-beta: पांडे भी आये थे.

me: हाँ

3:07 PM Friend-beta: प्रोमोशन से रिलेटेड ?

me: हाँ.  मेरा प्रोमोशन क्यों नहीं हुआ. मेरे जूनियर का कैसे हो गया. मुझे छुट्टी क्यों नहीं मिली यही सब. ये भी बोला कि आरटीआई में अमेंडमेंट आये तो आपलोग विरोध कीजिये clip_image001[1]

Friend-beta: clip_image001[2]वो तो होगा ही.

3:09 PM me: और बोला कि जब उसकी सीआईसी में पोस्टिंग हुई तो उसे खुद घर नहीं मिला था तब उसने खुद ही आरटीआई फ़ाइल करके पूछा तब उसे घर मिला clip_image001[3]

3:10 PM बाकी खूब सारी सक्सेस और स्ट्रगल की कहानियाँ सुनाई सबने.

3:15 PM Friend-beta: गंगा एक्शन प्लान में क्या हो रहा है.


5 minutes

3:20 PM me: गंगा एक्शन प्लान सुप्रीम कोर्ट के आर्डर पर बना था टू प्रोटेक्ट गंगा फ्रॉम पोल्यूशन (पता नहीं स्टेट का है या सेण्टर का)… और कानपुर में अभी तक वाटर क्लीनिंग प्लांट्स नहीं लगे. लेदर इंडस्ट्री वाले लोबी और फ्रॉड करके अभी भी गन्दा पानी डाल रहे हैं गंगा में.

Friend-beta: हाँ ये तो राजीव गाँधी के टाइम ही शुरू हुआ था. कई फेज में काम हो रहा था पर फ्रॉड तो हुआ ही है.

3:22 PM देखो अगर कुछ ठीक हो जाए तो बढ़िया है.

me: हाँ. एक मधु भंडारी भी थी अभी परिवर्तन के लिए काम करती है. रिटायर्ड आईएफएस है. पोर्चुगल की अम्बेसडर थी रिटायर्ड होने के पहले.

3:23 PM अन्ना हजारे का लेकिन जवाब नहीं है… क्या आदमी है.

Friend-beta: क्या बोला?

3:24 PM me: वो बुड्ढा ८X६ फीट का रूम, एक गद्दा, एक ओढने का, एक थाली/लोटा, और २ धोती-कुरता. ये उसकी सारी संपत्ति है. आरटीआई के लिए महारष्ट्र सर्कार से लेकर सेंटर तक…

3:26 PM बोलता है कि मैंने आडवाणी को बोला कि देखो कल तक कर दो नहीं तो मैं तुम्हारे दरवाजे पर बैठ रहा हूँ, आगे तुम्हारी मर्जी clip_image001[4]तेलगी वाला केस कोई लेके नहीं जा रहा था… इसे कहीं से डिटेल मिल गया… लेके पहुँच गया सीधे मिनिस्ट्री में. खूब सिक्यूरिटी मिली थी उसके बाद… उसी दिन सबको भगा दिया.

3:27 PM Friend-beta: खतरनाक आदमी है तब तो.

me: एक आइडियल विलेज बनाया है महाराष्ट्र में. जहाँ अभी रहता है पहले वहाँ दारु की भट्ठियां थी. बोल रहा था अब वहाँ पान भी नहीं बिकता.

3:28 PM पहले वहाँ पानी की प्रॉब्लम थी अब वहाँ से पानी बाहर जाता है. गांधीयन थोट का आदमी है. और सब कुछ किया है जीवन में.

3:29 PM २६ साल की उम्र तक आर्मी में था. बोल रहा था कि उसे नहीं पता अभी उसके घर वाले कहाँ है और घर में कौन-कौन है. सब छोड़ के उस गाँव में ही लग गया,

3:30 PM Friend-beta: कितना बुड्ढा है?

me: बोलता है कि उसके पहले दारु भी पिया है आर्मी में था तब... थोडा-बहुत छोटी-मोती मारपीट भी. तब मुंबई में फूल बेचता था.

3:31 PM १९४० टाइप का है... विवेकानंद की एक किताब पढ़ी तब से कूल हो गया.

Friend-beta: रुको मैं भी उसके बारे में कुछ पढता हूँ.

3:32 PM me: अभी एक स्कूल भी चलाता है जिसमें वो बच्चे पढते हैं जिन्हें मुंबई-पुणे जैसी जगहों के स्कूलों से निकाल दिया जाता है. या वैसे जिनका कहीं और एडमिशन नहीं होता.

Friend-beta: इंटरेस्टिंग आदमी है.

me: अरे जरुरत से ज्यादा इंटरेस्टिंग आदमी है. रुको विडियो आने दो तो भेजने का जुगाड करता हूँ. मुझे तो बहुत अच्छा लगा.

Friend-beta: ओके

me: आता हूँ थोड़ी देर में.

3:33 PM Friend-beta: ओके

बाय

मैं भी जा रहा हूँ फ्रूटी पीने, बाय.


चैट लॉग २: (इसमें अन्ना से जुड़ी बस एक ही लाइन है, लेकिन सर्च रिजल्ट में आया तो… )

12:01 PM me: हाँ बोलो

Friend-Alpha: कहाँ थे इतने दिन !!

me: अंतराग्नि. अभी सोके उठा हूँ, अभी ब्रश भी नहीं किया.

Friend-Alpha: कर के आओ

me: आता हूँ


9 minutes

12:11 PM me: मैं आ गया clip_image001[5]

Friend-Alpha: clip_image001[6]कैसी रही अंतराग्नि ?

me: अच्छी रही. मैं जिस-जिस इवेंट में गया वो तो अच्छे थे. ओपनिंग थोड़ी ठीक रही.

Friend-Alpha: सही. कोई कन्या पटाई?

12:12 PM me: नहीं यार, कन्या कहाँ…

Friend-Alpha: (एक नाम) मुझे कुछ कुछ बता रहा था तुम्हारे और (एक और नाम) के बारे में clip_image002

me: ही ही, हमने कुछ नहीं किया भाई.

12:13 PM Friend-Alpha: हाँ मुझे पता है. और सुना… कि हाल. ?

इरिलेवेंट कन्वर्सेसन

me: खैर… और बताओ

12:17 PM Friend-Alpha: बस सब ठीक

me: कल कवि सम्मेलन अच्छा हुआ.

Friend-Alpha: अच्छा? गुड. यूफोरिया कैसा था.

me: ठीक ठाक.

12:18 PM खूब इधर उधर के गाने गाये उसने. डिस्क बना दिया बाद में तो.

Friend-Alpha: अब अपने गाने इतने अच्छे नहीं होंगे तो कोई क्या करेगा.

me: और एक पैनल डिस्कशन भी था आरटीआई पर. वो भी बहुत अच्छा था.

12:19 PM Friend-Alpha: अच्छा… कूल.

me: बहुत इन्फ्लुएंसिंग स्पीकर आये थे.

Friend-Alpha: सही है

12:20 PM me: अन्ना हजारे का लेक्चर सुन कर लगा कि शायद लोग गाँधी को ऐसे ही सुन कर इन्फ्लुएंस होते होंगे. बहुत अच्छा बोला

Friend-Alpha: अच्छा… सही है.

me: बाकी डांस इवेंट्स वगैरह नोर्मल ही थे… ऋतंभरा भी ठीक था. बहुत अच्छी टीम्स नहीं थी एक चंडीगढ़ को छोड़कर.

12:21 PM Friend-Alpha: अच्छा, निफ्ट टाइप कुछ नहीं था?

me: थे ३-४ आईएनआईएफडी

12:22 PM Friend-Alpha: अच्छा. और सुनाओ… बाकी जनता कैसे है?

me: सब मस्त हैं.

…इरिलेवेंट कन्वर्सेसन…

[एसेट मैनेजमेंट, क्वांटिटेटीव जोब्स, बीसीजी, मैकेंजी, ऑयल कंपनीज, एक दोस्त की गर्लफ्रेंड, उसका ब्रेकअप … उससे जुड़ी कुछ बातें जैसे ‘इतनी जल्दी थी क्या उसे शादी की? थोड़े दिन वेट नहीं कर सकती थी.?… बुरा हुआ. अनलिमिटेड टॉक की स्कीम लिया… फिर उसने १३ रेडिफ अकाउंट बनाए थे एसेमेस करने के लिए… वैसे अभी भी ये चाहे तो वो कहीं गयी नहीं है… लेकिन बोलता है अजीब लड़की है ! …और अभी कोई उम्र है कम से कम २-४ साल तो जॉब करनी ही चाहिए. पर उस कन्या के लिए तब तक तो देर हो जायेगी. …फाईट है ! अरे नहीं… वो भी टाइम पास करता था… लोग ऐसा टाइम पास क्यों करते हैं? सीधे बता देना चाहिए जब भी बात आये कि… लुक मी टाइम पास… सो यू डोंट गेट सीरियस clip_image001[7]

फिर लंच के लिए जाने की बात हुई… मेस बंद हो जाएगा. और एक हिप्पो दोस्त की जो अब तक सो रहा था. मुझसे कहा गया ‘लंच करने मत जाओ.' प्लीज जल्दी आना क्योंकि मेरे पास आज कोई काम नहीं है clip_image001[8]‘. तकरीबन १३.४५ पर ये वार्तालाप खतम हुई थी मेस बंद होने के १५ मिनट पहले. ]


अल्फा-बीटा को मेरे कॉलेज के दोस्त आसानी से पहचान लेंगे. अंतराग्नि का ग्लैमर कैम्पस के मरुस्थल की दो बूंद हुआ करती. उसके बाद भी जिसे यही मिले बात करने को Smile  उसे पहचानना कौन सी बड़ी बात है जी.

~Abhishek Ojha~

(पटना सीरीज जारी रहेगी)

Aug 23, 2011

एक रंगीन मुलाक़ात (पटना २)

 

'आप ही  हैं ?' – पान (और/या गुटखा) चबाते मुंह में एक पाव तरल पदार्थ भरे एक सज्जन ने मेरे पास आकर पूछा।

(अब इसका क्या जवाब दिया जा सकता है जी? मैं हूँ या नहीं हूँ? हूँ तो कौन हूँ? ! अगर सवाल ‘मैं कौन हूँ?’ हो गया - तो ये तो वैसे ही सृष्टि के सबसे भारी सवालों में आता है. इस सवाल का जवाब देना मेरी क्षमता के बाहर था !)

मैंने पूछा: 'आपको किससे काम है?'
'अरे काम तो होता रहेगा लेकिन हम पूछ रहे थे कि... माने... आपे इधर आए हैं बाहर से?'
'हाँ।'
'वईसे आप करते का हैं?'
'ये बैंक में हैं' - मेरे एक नए मित्र ने मोर्चा संभाला।
'आछाऽऽ… त आप एमबीए किए हैं?'
'नहीं।'
'त सीए किए होंगे?'
'नहीं, ये आईआईटी किए हैं।' - मेरे मित्र ने फिर बताया। (पटना में लोग डिग्री से मतलब नहीं रखते. आईआईटी करना ही कहते हैं. ये प्रक्रिया कैसे की जाती है जी?)

'आईआईटी? त बैंक में का करते हैं?'
'किस स्ट्रीम से थे ? मनेजर हैं?'
'नहीं। वो... ' उनके प्रवाह को रोक मैंने कुछ बोलने कि कोशिश की.

'अब कलर्क तो नहीये होंगे? हे हे हे। वईसे कउन से  बैंक में हैं?'
'क्रेडिट स्विस।'
'क्रेडिट… काऽऽ? ई कउन बैंक है? …कहाँ पर है बरांच?'
'यहाँ नहीं है, स्विस बैंक है. इधर मुंबई में ऑफिस हैं ।'
'आछा. वही जिसमें काला पईसा जमा होता है?  बंबई में है?' - खुशी से उछल पड़े वो.

'नहीं, नहीं... '
'आछे आप कौन बिभाग में हैं? मैनेजरे न होंगे? अभी त आप बाहर हैं नू? बंबई ब्रांच में थे का पहीले?'
'नहीं वो... ' - वो बस दनादन सवाल दागे जा रहे थे और मुझे बोलने का मौका ही नहीं दे रहे थे.

'आछे सुने हैं कि आजकल अमरीका का भी हालत बहुते टाइट हो गया है?... आछे छोड़िए ई सब। पहिले एक ठो बात बताइये आजकल साफ्टवेयर का मार्केट डाउन में है का? हार्डवेयर का सुने हैं बरी अच्छा चल रहा है आजकल। मेरा लड़का है दसवीं में त हम सोच रहे थे हार्डवेयर स्ट्रीम में डलवा दें उसको, ठीक रहेगा?'

मुझे समझ में नहीं आया क्या बोलूँ... वो धाराप्रवाह में खुद ही सब कुछ बोले जा रहे थे... उन्हें किसी और का कुछ भी सुनना ही नहीं था। आजकल वैसे ही ‘गुड लिसेनर’ बनने की कोशिश में हूँ. मैं अभी सोच ही रहा था कि किस बात को पहले स्पष्ट किया जाय कि वो फिर बोल पड़े...

'लेकिन हमको अभी तक एक बात नहीं बुझाया... आप आईआईटी करके इसमें आ कईसे गए? आछे एक बात बताइये ललूवा का केतना जामा होगा स्विट्जरलैंड में? आप लोग को कुछ पता चलता है? सुने तो हैं कि एकदमे सीक्रेट होता है।' उत्सुकता का ट्रैफिक बढ़ता देख मुझे लगा उनके प्रवाह में कुछ जाम लगेगा. लेकिन…

'आछे रहने दीजिये। पटना में आप लोग का बरांच खुल रहा है का?'
'नहीं. मैं एक... '
'अच्छा त ई बताइये… आप लोग को त जो है सो उपरवार कमाई भी खूब होता होगा? हे हे हे'
'नहीं, अरे आप पहले सुनीये तो... आप मुझे भी कुछ बोलने देंगे ?' - ये मेरा पहला ईमानदार प्रयास था लिसेनर से स्पीकर बनने का.

‘आछे बोलिए’

थोड़ी देर के लिए जब मौका मिला तो मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की... पर वो गज़ब के मूड में थे.paan दरअसल उन्हें सुनना नहीं आता. हर बात बिना सुने बस समझ जाते हैं. नहीं… उन्हें समझने की जरुरत ही नहीं होती. समझे तो वो पहले से ही होते हैं. शायद ही उन्होने मेरा कहा कुछ भी सुना हो।

अब पता नहीं लोगों को क्या बता रहे होंगे कि किससे मिल आए।  वैसे खुशी इस बात की है कि जाते-जाते बड़े निराश दिखे:
'आप तब दूसरे टाइप के बैंक में हैं. आ बिभागो आपका दूसरे टाइप का है, आपको कुछो नहीं पता’।

जो भी हो... एक बात तो साफ है। मुझे जो कुछ भी पता है - उनसे तो कम ही पता होगा Smile

जब चले गए तब पता चला क्यों तेजी थी बोलने की । प्रेसर में थे. और बाहर निकलते ही सीढ़ी पर उतरते हुए दूर से ही निशाना लगाकर ठीक कोने में लाल रंग की एक और नयी परत चढ़ा गए। उनके मुंह से निकली पतली लंबी धार रसायन (केमिस्ट्री)की प्रयोगशाला में बनाए गए जेट की याद दिला गयी। ग्लास के पाईप को गर्म कर जेट बनाया था हमने कभी. मुझे लगता है मुंह से जेट बनाना भी शायद एक कला ही है. और निशाना भी अचूक… !

तीसरे तल्ले पर दीवार साफ़ कर फिर से रंगी गयी है. मैं सोचता हूँ चमकती साफ़ दीवार पर पहली बार कोई कैसे  थूकता होगा? खुदा जाने कहीं ऐसा तो नहीं कि चकाचक देख थूकने को मन मचल उठता हो !  फिलहाल मुझे ये भी लगा कि पान खाने वाले कम से कम कोने के लिए तो वैसे ही मचल उठते होंगे जैसे खंबे के लिए...

(पटना १)

~Abhishek Ojha~

Aug 18, 2011

सोनुआ बरी तेज लरका है - (पटना १)


जयप्रकाश नारायण अन्तराष्ट्रीय एयरपोर्ट से बाहर निकलते हुए बिहार टूरिज्म टैक्सी सर्विस का एक बोर्ड दिखा. वहाँ बैठे बुजुर्ग ने बताया कि गाडी नहीं है.

'एक ही थी... जो है सो उसे कोई और ले गया. एतना डिमांड नहीं है पटना में टेक्सी का. बाहर जाइए बहुत गाडी मिलेगा. फ्रेजर रोड का तो जो है सो दुनिया भर का साधन मिलेगा.'

बाहर निकलते ही दुनिया भर के साधनों ने मुझे घेर लिया.

'फ्रेजर रोड? आइये...' मैंने बस फ्रेजर रोड ही कहा उसके बाद उन्होंने खुद मोर्चा संभाल लिया.

'३०० रूपया. आइये - मारुती है'
'अच्छा २५० दे दीजियेगा'
'२०० दीजियेगा? यही सामने वाला टेम्पू है - आइये.'
'अरे हट रे तुम. मेरे साथ जायेंगे. आइये आइये'
'रेक्सा से जायेंगे? पचहत्तर रूपया दे दीजियेगा हमको'
मैंने पूछा: 'अरे बहुत दूर है - आप कैसे जायेंगे?'
'अरे आइये ना, पटना देखाते चलेंगे, जादे दूर नहीं है.' रिक्शे वाले ने अपनी आशा सफल होते हुए देख कर कहा.

किराया उनके आपसी प्रतिस्पर्धा से ही फेयर वैल्यू की ओर कनवर्ज होता जा रहा था. मैं बस चुपचाप सुन रहा था. रिक्शे की तरफ झुकाव जरूर हुआ. शायद ७५ रूपया भी एक कारण था. उसी बीच दौडता हुआ सोनुआ आ गया.

'हट ड़े. चलिए सड़. उ तिहत्तड़ चौड़आसी देख ड़हे हैं, उहे माडूती है. २३० फाइनल - इससे कम में त कोई नहीं ले जाएगा. सड़काड़ी अम्बेसडरवा वाला भी तीन सउ लेता है.'

उसको समझ में आ गया कि मैं रिक्शे से जाने की सोच रहा हूँ. उसे ये भी पता लगा कि मैं पैसे दे दूँगा. पता नहीं क्या-क्या बात की उसने. मुझे ठीक-ठीक याद नहीं. और फिर मेरा सामान उठाकर अपनी गाड़ी की तरफ चल दिया. सब ताकते रह गए.

'अरे यार बहुत गर्मी है इसमें? पेड़ के नीचे पार्क कर देते. ये तो आग उगल रही है' मैंने बैठते हुए कहा.
'अड़े सड बईठीये न. दू मिनट हवा लगा नहीं की फ्रेस हो जाएगा.'

फिर उसका पुराण चालू हुआ... उसकी अभी इतनी उम्र नहीं हुई कि लाइसेन्स मिले. ये गाड़ी (मारुति 800) बहुत अच्छी है 20 का एभरेज देती है और कलकत्ता तक घूम आई है. परमिट नहीं था तो थाने में ही गाड़ी छोड़ के चला गया था सोनुआ. वापस आते समय कुछ पैसा देके गाड़ी निकाल लाया. ठीके हुआ था - गाड़ी भी सेफ रही उतने दिन !

गाड़ी उसकी नहीं है, मालिक की है. उसके पास मोबाइल भी नहीं है - चोरी हो गया. अपने मालिक का नंबर लिखवाता है मुझे. राजगीर, पावापुरी, बोधगया और नालंदा बस चार जगह है बिहार में. और कहीं जाने का कोई मतलबे नहीं है. सोनुआ के मालिक को फोन करने पर इंतजाम हो जाएगा गाड़ी का. अच्छी गाडियाँ भी है उसके मालिक के पास. टूर पर जाने के लिए भी. सोनुआ को उसका मालिक बीदेसी लोगों के साथ नहीं जाने देता. क्योंकि उसके पास लायसंस नहीं है. लेकिन मेरे साथ जा सकता है. उसे अच्छा लगेगा. वो चाहता है कि मैं टूर के लिए जब भी गाड़ी के लिए फोन करूँ तो उसके मालिक से कहूँ कि सोनुआ को ही भेजे.

पिछली बार एक गलत मोड के कारण ट्रैफिक पुलिस ने उससे 100 रुपये लिए थे. अब वो उस गलत वाले मोड़ के पहले ही एक गलत मोड़ ले लेता है. उसे पता है पुलिस वाले कहाँ खड़े होते हैं. सड़क कहाँ टूटी है और बरसात में कहाँ पानी भरा होता है. किस समय कहाँ ट्रैफिक होगा… वो जोड़ लेता है. पेट्रोल पंप पर कोन्फ़िडेंस में बोलता है 'काहे तेजीया टेढ़ीया रहे हैं, बता रहे हैं न'. फिर मुझे समझाता है 'बरका चोड़ है सब. देख नहीं ड़हे हैं अभी खरा करबे नहीं किए तले पूछ ड़हा है कै लिटड़'.

मुझे जहां जाना है उसे ठीक-ठीक नहीं पता. लेकिन नाम पता हो तो 10 मिनट में वो पटना की कोई भी जगह खोज सकता है. वो गुटखा नहीं खाता - दारू भी नहीं. अभी पंद्रह साल का हुआ है. गाड़ी ही चलाएगा. और उसके पास पटना के ट्रैफिक में चलाने के सारे स्किल हैं. हॉर्न बजाना, ट्रैफिक में रास्ते खोज लेना और कट तो ऐसा मारता है कि गर्दन ना हो तो कलेजा मुंह के बाहर ग्लास तोड़कर सड़क पर आ जाये. 2 सेकेंड इधर उधर हुआ कि गए काम से ! लेकिन नहीं न होगा काहे कि गज़ब का कट्रौल है उसका गाड़ी पर.

मैं उसे 230 की जगह 250 रुपये देता हूँ. वो बहुत खुश है. उसी दिन सुबह मैंने 3064 रुपये किराये वाली टैक्सी में अँग्रेजी बोलने वाले समीर को 100 रुपये टिप दिया था. वो इतना खुश नहीं हुआ था. सोनुआ ने पूछा नहीं कि गाना बजाना है या नहीं सीधे बता दिया कि प्लेयर खराब है मालिक बनवा नहीं रहा. समीर जो टोपी, दस्ताना और ड्रेस पहनता है. मुझे पूरे रास्ते मुंबई का इतिहास-भूगोल बताते आया. उसने पूछा था 'सर, डू यू लाइक म्यूजिक?' मेरे हाँ कहने पर उसने मंद आवाज में ऐसे गाने बजाए कि मैं कह भी नहीं सकता था कि मुझे ऐसे गानों की समझ नहीं ! सोनुआ बजाता तो तुरत कहता ‘वॉल्यूम कम कर दो’ Smile

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इन दिनों मैं अपनी कंपनी के कॉर्पोरेट रिस्पोन्सिबिलिटी प्रोग्राम के सिलसिले में पटना आया हुआ हूँ। उसका ब्लॉग यहाँ है : क्रेडिट स्विस - ग्लोबल सिटिज़नस प्रोग्राम।

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~Abhishek Ojha~