Oct 24, 2010

दास्तान-ए-'चौपट वीकेंड'

‘सोच रहा हूँ मेरे बारे में अगर कोई कुछ पूछे तो उसे तेरे पास फॉरवर्ड कर दूंगा. तुझे तो सब कुछ पता ही है मेरे बारे में.’

‘क्या पता है?’coffeeday

‘हम्म... सब कुछ तो नहीं, पर तू मेरी नॉन-बायस्ड कंसिस्टेंट एस्टिमेटर टाइप्स है.'

'क्या? इसमें भी मैं तुम्हारे लिए... ऊँह ! बड़े आए. रहने दो नहीं चाहिए तुम्हारा कम्प्लीमेंट. पता नहीं कम्प्लीमेंट दे रहे हो या गाली. कुछ भी बोलते हो'

'छोड़ो तुम्हें समझ में नहीं आएगा... उस लड़की को देखो परेशान लग रही है. बिजनेस स्टैट्स की बूक लेकर बैठी है. पढ़ा के आऊँ उसे? ये सड़ी सी किताब है... कुछ नहीं होता है इसमें. और इसके सिलेबस में जो होगा वो तो...'

'हाँ तुमने तो बचपन में ही पढ़ लिया होगा... पर ये बताओ हम… नहीं तुम यहाँ उसे पढ़ाने आए हो?

'पढ़ाने तो नहीं आया पर अगर पढ़ाने से किसी की मुसीबत कम हो जाय तो इसमें बुराई क्या है?'

'चुप रहो तुम. और अगर पढ़ने वाली लड़की हो तो ज्यादा ही अच्छा है, नहीं?'

'पढ़ने वाला कोई भी हो बस उसे थोड़ा समझ में आना चाहिए, तुम्हें तो समझ में आता नहीं कुछ.'

'इक्सक्यूज मी? मैं भी पढ़ी-लिखी हूँ. '

'अच्छा? टॉपर तो नहीं थी?'

(...मुस्कुराते हुए) 'एक्चुअल्ली एक पेपर में थी.'

'टीचर को तुमसे प्यार तो नहीं हो गया था?'

'गिरिईईजेश !'

... एक अलग ही मुद्रा, आँखों में एक अलग सा भाव और ध्वनि तरंगों के खास आरोह-अवरोह पर वो चार अक्षर का नाम बोलकर जब अगले कुछ सेकेंड तक उसी मुद्रा में एकटक देखते हुए मौन रहती तो फिर पिछली बात वहीं रुक जाती. ‘थोड़ा ज्यादा हो गया’ या ‘तुम्हें हो क्या गया है?’ कहने का उसका ये अपना तरीका था. और गिरिजेश, जिसे कभी किसी ने इस नाम से पुकारा ही नहीं था, के कानों को ये बहुत ही सुखद लगता. अपना नाम कभी-कभार सुनने की आदत, कहने का तरीका, बड़ी-बड़ी आँखे या उसके चेहरे के भाव इनमें से कौन ज्यादा प्रभावी था उसे नहीं पता. लेकिन नोक-झोंक की ये सीमा उसे बहुत पसंद थी.

'ठीक है मान लिया, लेकिन किसी को अपने कॉलेज का नाम मत बताना. और अगर कभी गलती से बता भी दिया तो ये मत बता देना कि तुम टॉपर थी. एड्मिशन नहीं कराएंगे लोग वहाँ. वैसे तुम्हारे कॉलेज का नाम क्या था?'

'था नहीं है, बुद्धू. एआईपीकेसीटीइ.'

'पूरा?'

'हा हा... नहीं बताती. पूरा नाम चार सेठों के नाम पर है. लेकिन तुम मेरे कॉलेज को कुछ नहीं बोलोगे.'

'सर वी आर क्लोजिंग टु क्लीन, यू विल हैव टू मुव आउटसाइड. ' सुबह 3 बजे के लगभग रात भर खुलने वाले उस कॉफी शॉप में एक लड़का आकर टोकता. इसका मतलब ये होता कि अब बाहर बैठो और फिर कुछ ऑर्डर करो. सुबह के तीन बज रहे होते लेकिन अगल बगल के कॉलेज के लड़के-लड़कियों से खचाखच भरी होती जगह.

'ओके, वन अज़टेक प्लीज. '

'एनिथिंग फॉर यू मैंम?'

'नहीं इन्हें कुछ नहीं चाहिए... '

'नहीं नहीं, मुझे भी चाहिए... हम्म... अ वाटर बॉटल प्लीज.'

....

'चाइए.  वो भी पानी... जो मैं बोलूं बस उसका उल्टा करना होता है तुम्हें. पता है तुम्हें कितना पोल्यूशन. ...छोड़ो लैक्चर देने का मेरा वैसे ही मूड नहीं है.'

'सारे संसार का ठेका मैंने नहीं ले रखा है, तुम हो ना लेने के लिए'

'खैर... तुम्हें सोना नहीं है? तुम्हें तो कोई काम होता नहीं है. और तुम्हारे चक्कर में पूरी रात... मेरा पूरा वीकेंड चौपट हो जाता है.'

... फिर वही मुद्रा... वही बड़ी-बड़ी आँखे... निशब्द... एकटक. ओह !

'मुझे नींद आ रही है. चलो छोड़ दो मुझे... नहीं रहने दो. मैं खुद ही जा रही हूँ. कोई भी लिफ्ट दे देगा. नहीं जाना तुम्हारी सड़ी बाइक से. '

'ठीक है जाओ, बाय.'

'गिरिईईजेश !'

और वो फिर चुप हो जाता. हल्की मुस्कान... पर चुप.

'...तुम्हारी गलती नहीं है मैं ही पागल हूँ, आई ही क्यों मैं? मिलेगी कोई तुम्हें... तुम्हारे जैसी ही पागल. बाल देखे हैं अपने एक दिन कैंची लाकर काट दूँगी. कैसे तो लगते हो... लंबे बालों में. ' ये बोलते-बोलते उसका मुँह हल्का टेढ़ा होता और बात अंत तक आते-आते थोड़ी बनावटी लगने लगती.

'हाँ गलती तो तुम्हारी है ही... मैंने कब कहा मेरी गलती है. क्यों आई? किसी के साथ भी ऐसे...?'

'गिरिईईजेश !'.... (...पाँच सेकेंड...) 'क्या कहा तुमने अभी? और किसके साथ देखा है तुमने मुझे?'

'ओ ओ ओ. सॉरी. रोना मत प्लीज. बैठो कॉफी आने दो. थोड़ी देर में चलते हैं. मुझे भी कुछ काम है कल जल्दी उठना है.'

'हाँ जो मर्जी आए बोल दो. और समझाने में तो तुम आम को अमरूद भी साबित कर दो. अपने आपको महात्मा तो समझते ही हो.'

'थैंक यू.'

'गिरिईईजेश !'

यहाँ पर आवृत्ति थोड़ी बदलती. थोड़ी तेज. इसका मतलब होता अब सही में जाना चाहिए.

...

'वो देखो कितनी अच्छी है. '

'ऊँह, एक टन मेकअप... अरे मैं तो तुम्हारी जैसी हो रही हूँ... ऐसा तुम्ही बोलते हो न. एक टन मेकअप !'

'इसमें मुँह टेढ़ा करने वाली कौन सी बात है? उसकी मर्जी मेकअप करे ना करे. मुझे अच्छी लगी मैंने कह दिया. और तुम तो जैसे मेकअप करती ही नहीं हो !'

'जी नहीं... नहीं करती मैं. और कभी करती भी हूँ तो बहुत कम. और ऐसा क्या अच्छा है उसमें? थोड़े और कम कपड़े पहन लेती तो तुम्हें और अच्छी लग जाती...'

'बता दूँ क्या अच्छा है? बाद में कुछ मत बोलना?'

गिरिईईजेश !

….

और इस तरह एक वीकेंड चौपट हो जाता. कभी-कभी उनके कुछ वीकेंड उन वीकेण्ड्स की याद में चौपट हो जाते हैं !

~Abhishek Ojha~

मैं कहूँ कि सब कोरी कल्पना है तो आप मानोगे? मत मानो :)

Oct 3, 2010

टाइम ट्रेवेल कराती एक किताब

ये पोस्ट पुस्तक समीक्षा नहीं है... वरन एक पुस्तक पढ़ने का व्यक्तिगत अनुभव है. बस जैसे पुस्तक उठा ली गयी और फिर खत्म होने पर ही रखी गयी वैसे ही अब पोस्ट लिखनी चालु कर दी है तो इस टटकी पढ़ी पुस्तक से जो बातें याद आएगी लिख दी जायेंगी. जिन्होंने ये किताब पढ़ने की सलाह दी थी उन्होंने ही इस पोस्ट लिखने की भी बात कही. योगदान है उनका इस ब्लॉग को जिन्दा रखने में, मुझे एक दुनिया से दूसरी दुनिया ले जाते रहने में. मेरी दिनचर्या को थोडा और व्यस्त करने में. और जब कांटेक्ट लिस्ट में  ऐसा कोई नंबर ना मिले जिसे परेशान किया जाए ऐसे में एक ऐसा नंबर रखने के लिए जिस पर जाकर अंगूठा रुकने में ज्यादा सोचता नहीं. भुक-भुकाते इन्टरनेट कनेक्शन पर हमसे चैट करने वाले ये हमारे बुरधुधुर मित्र हैं. इन दिनों रोज ५० पन्ने (वित्तीय गणित) पढ़ने का अपना छोटा सा लक्ष्य रहता है. पहले उसे पूरा करना और ये स्वार्थ कि १०-२० पन्ने ज्यादा पढ़ लूं ताकि उपन्यासों का जो जखीरा जमा कर रखा है वो भी पढ़े जाए. पर इक्वेशन लक्ष्य पर आगे बढ़ने नहीं देते. इस दिनचर्या को एक दिन  विराम देकर ये किताब उठा ली गयी... तो अब बातें 'कोहबर की शर्त' की.
--
किताब पर अगर एक लाइन कहूँ तो... 'किताब खोलने के बाद मैं अपनी जगह से तब उठा जब किताब का आखिरी पन्ना आ गया और आँखे तब-तब हटी जब-जब ये लगा कि पुस्तक पर बुँदे टपक जायेंगी.' आधी पुस्तक पढ़ने के बाद आगे पढ़ने के लिए हिम्मत जुटानी पड़ती है. दुखों का अंतहीन सिलसिला... पर गर्मी के दिनों का खुली धुप वाला एक शनिवार, सामने हडसन, हडसन पार मैनहट्टन और इस पार सेहत बनाने के लिए टहलते-दौड़ते लोग (इस दौडने वाले लोगों के व्यू में लडकियां भी शामिल कर ली जाएँ). ये व्यू और पुस्तक में Kohbar ki Shart वर्णित संसार बार-बार एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाते रहे.  व्यू का इंतना तेज परिवर्तन स्लॉटरहाउस ५  में बिली पिलग्रिम के साथ ही होता पढ़ा है मैंने और अनुभव पहली बार. मुझे तो टाइम ट्रवेल करा लाई ये किताब.

'लगभग' आधी पुस्तक वही है जो 'नदिया के पार' में दिखाई गयी है.  पर पुस्तकें हमेशा ही ज्यादा प्रभावी रहती हैं जगहों और चरित्रों के वर्णन में और फिर फिल्म के स्क्रिप्ट की अपनी सीमाएं होती हैं पूरी तरह परिवेश और दृश्यों को दिखाना उनका लक्ष्य भी नहीं होता. पर जहाँ फिल्म में सुखांत होता है वहीँ से पुस्तक में दुखारम्भ होता है.  एक के बाद एक... सुख के क्षण फिर तलाशने पर भी नहीं मिलते. पुस्तक के प्रभाव पर मैं शायद थोडा पक्षपाती हो जाऊं क्योंकि  मेरा अनुभव कहता है कि अगर कुछ भी पढते समय अगर उससे जुड़ाव हो जाए लगे कि कहीं ना कहीं हमने भी ऐसा महसूस किया है. कुछ पढते समय अगर पात्रों के साथ-साथ चलना हो पाता है वो बहुत अच्छा लगता है. कुछ पंक्तियाँ भले ही कितनी साधारण हो हवो मेशा के लिए याद रह जाती है क्योंकि उसमें अपनी या अपने आस-पास की बात दिखती है. ये कहानी वहाँ चलती हैं जहाँ मेरी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा गुजरा है.  और वो हिस्सा जिसे बचपन कहते हैं. मैं घर जाने के लिए आज भी उसी स्टेशन पर उतरता हूँ  जिसका वर्णन पहले पन्ने पर है. उसी गाँव में मैंने प्राथमिक शिक्षा पायी है जो पुस्तक में नायिका का गाँव है. पुस्तक पढते हुए मैं उसमें आये हर रास्ते पर चल पाया. एक-एक दृश्य देखा हुआ मिला. एक एक चरित्र में किसी की छवि दिखती गयी. खेती के तरीके अब भी लगभग वही हैं. उन खेतों में आज भी भदई बोना जुए का खेल ही है... नावों और बैलों को छोड़कर आज भी सबकुछ वैसा ही है. पुस्तक में आया बरगद का पेंड आज भी वैसे ही खड़ा है. आंचलिक शब्दों, दृश्यों और पात्रों से जुडने में जहाँ कोई समय नहीं लगा वहीँ उनको भुलाने में समय लग रहा है.

पुस्तक में कई यादगार क्षण आते हैं चाहे वो थोड़े ढीले चरित्र के काका का चतित्र परिवर्तन हो, होली का वर्णन या फिर नदी पार करने वाले दृश्यों का जीवंत वर्णन. गाँव में हो रही नौटंकी और खेत के दृश्य. और फिर बचपन-किशोर के पड़ाव का मासूम वार्तालाप. पढते समय पाठक अपने आपको कहीं न कहीं आस पास बैठा पाता है. सरेह में चलते चन्दन-गुंजा के साथ और नदी पार करते उन नावों पर...

सब कुछ सही चल रहे माहौल हंसती-खेलती भोली मासूम जिंदगीयों में अचानक ही चरित्रों के मन में द्वंद्व और जीवन में असहनीय दुखो का जब सिलसिला चालु होता है तो आँखे कई बार नम हो आती हैं. किताब बंद कर आँख बचानी पड़ती है. कई बार पढते-पढते मन करता है कि ऐसा क्यों नहीं हो गया… पर किसी की गलती भी नहीं दिखती. सभी अपनी जगह पर सही दिखते हैं. लेकिन एक घर में  त्रिभुज के तीन बिंदु की तरह जुड़े मगर अलग भी. क्या बिडम्बना है सभी एक दूसरे का भला चाहने वाले और फिर भी चीजें उलटी पड़ती जाती हैं. पैराडॉक्स जिसका नाम है जिंदगी. हर कुछ पन्नों के बाद लगता है चलो थोड़ी संतुलित हुई कहानी…पर  दुर्भाग्य का सिलसिला थमता ही नहीं और सब कुछ उल्टा होता चला जाता है.

किताब थोड़ी निराशावादी लगती है कई जगह. लगता है कुछ भी करो जिंदगी मैं जो होना होता है वही होता है. तो कई बार ठीक इसका उल्टा... चन्दन के दिमाग की हलचलें और उसकी दृढ़ता. कई डाइमेंशन में ले जाती है कहानी. ग्रामीण जीवन के कई पहलुओं का सटीक चित्रण तो है ही.

एक ही  बार में समाप्त हो जाने वाली किताब निश्चय ही मोटी नहीं है (कीमत भी सिर्फ ५० रुपये). पर सोचे गए स्तर से कहीं ज्यादा दुःख पढने को मिल जाता है. पुस्तक पढते-पढते जब लगता है कि परिवेश, जगहों के नाम सब सही हैं और सारे चरित्र भी बिल्कुल वास्तविक से तो फिर कहानी भी सच सी लगने लगती है.  मन को याद दिलाना पड़ता है कि नहीं ये सिर्फ कहानी है... वैसे कितनों को ही ऐसे समझौते करने पड़ते हैं जिंदगी में.  मैं अपने आपको समझाने की कोशिश करता हूँ… सबकी परिणति शायद इतनी बुरी नहीं होती. कुसमय का शिकार भी कितने ही लोग होते हैं. पर अभी भी मन ये मानने को तैयार नहीं कि ये सभी एक साथ किसी की जिंदगी में हो जाते हों. वैसे इन सभी के एक साथ होने की सम्भावना शून्य भी तो नहीं !


डूबते-उतराते, इस दुनिया से उस दुनिया आते-जाते गंगा-सोना की धार दिमाग में और हडसन की धार सामने... एक शनिवार का दिन कुछ यूँ बीता.

~Abhishek Ojha~


पोस्टोपरांत अपडेट: मेरे एक दोस्त ने सवाल लिख भेजा है "आपका ब्लॉग पढने वालों में से कितने जानते होंगे कि 'कोहबर' का मतलब क्या होता है?". मुझे लगता है... लगभग सभी?