Nov 30, 2008

झिलमिलाता लाउडस्पीकर (माइक्रो पोस्ट)

गर्मी की एक खुली हवादार रात में एक गाँव का छत:
दूर साइकिल पर लाउडस्पीकर का लंबा भोंपू बाँध कर ले जाता लाउडस्पीकरवाला और हवा के झोंके के साथ आती एक 'क्लासिक' गाने में विविधता, कमी-बेशी, झिलमिलाहट... क्या आपने कभी सुना है?


LoudSpeaker

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कल सड़क पर लाउड स्पीकर देखकर यूँही एक रात याद आ गई !
~Abhishek Ojha~

22 comments:

  1. सुना तो है ही-अक्सर मिस भी करता हूँ.

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  2. बहुत सुना है! 1965 के युद्ध के वक्त रेडियो भी इने गिने हुआ करते थे तब हर घंटे समाचार नगरपालिका के हर चौराहे पर बिजली के खंबों पर टांगे लाउडस्पीकरों से ही हम तक पहुंचते थे। आप ने वह दृश्य सजीव कर दिया।

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  3. बहुत सुंदर ! पुरानी यादे ताजा हो रही है ! आज शास्त्री जी के चिट्ठे पर बालपेन की कहानी है और आपने ये तवा वाला भोंपू याद दिला दिया !

    रामराम !

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  5. अब तो किसी मन्दिर पर कोई कीर्तन या किसी मस्जिद पर अजान सुनाई दे जाती है

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  6. हम्म दिखता है यह अभी भी गुरुद्वारे पर

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  7. यह तो सुनते ही रहते हैं - यूपोरियन परिदृष्य का यह अनिवार्य अंग है।
    वैसे आजकल सर्दी है। मेरे घर के बगल के गंगा के कछार में सियार रहते हैं। रात में ठण्ड लगती है तो चेन रियेक्शन में हुआं हुआं करते हैं। रोज रात में सुनाई पड़ता है बेडरूम में।

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  8. हम तो चौबीसों घंटों सुनते ही रहते हैं। हमारा गांव जीटी रोड के किनारे है..अक्‍सर वाहन में लाडस्‍पीकर बांध कर प्रचार करनेवाले गुजरते रहते हैं। ट्रकचालक बोरियत मिटाने के लिए रात को टेप बजाते हैं, वह भी सुनाई देता है। जब खेत वाले घर में होते हैं तो रात में सीजन के अनुसार झींगुर, मेढक और सियार की आवाज भी सुनाई देती है।

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  9. सुना तो है!!!!!!!!!!!!!!!!

    यही तो सच्चा भोंपू है!!!

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  10. अभी हमारे शहर में चुनावो के समय थोक में चुंगा (भोपू) देखने को मिले. कभी कभी मुंह से बोलने भोपू भी देखने को मिल जाता है . वैसे ये भौपू आज भी चलन में है .

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  11. मुझे यह भोपू मन्दिरो,मस्जिदो ओर गुरु दुवारो पे लगा ओर शोर मचाता दिख जाता है, लेकिन सच बात यह है की श्राधा की जगह गुस्सा ज्यादा आता है, क्योकि हमारा सब का मालिक बहरा नही फ़िर जिस ने भी अपने ईष्ट का नाम लेनी है वह खुद ही लेलेगा, फ़िर यह भोपू किस लिये????यह शोर शराबा किस लिये?? यह दिखावा किस लिये??

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  12. यादोँ मेँ आज भी दीख जाता है
    काश कि,
    शाँति और अमनो- चैन का सँदेशा ही फैलाता रहे ये !

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  13. भइये, हमें तो ये भोंपू बहुत कष्‍ट देता है। चाहे किसी के घर शादी हो या कोई धार्मिक आयोजन, जब तक बजता है, मजाल है कोई सुकून से अपना काम कर सके।

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  14. खूब सुना है, झीना झीना भी.

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  15. मैंने सुना तो है ..पर यह की "नक्सली गांव की तरफ़ आ गएँ हैं कृपया घर के दरवाजे बंद कर लें,धैर्य और शान्ति बनाये रखें"

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  16. अभिषेक जी, मुझे गर्मी की रातों में छत पर सोने में अक्सर डर लगता था, लेकिन दूर कहीं काली माई के थान पर हो रहे कीर्तन की आवाज़ से ढाढस बंधा रहता था.

    वहीं अक्सर किसी न किसी गाँव में चल रही 'नाच' का गाना सुनाई पड़ जाता था- "आधी-आधी रतिया के बोले कोइलरिया"

    अब तो वहां भी यह परम्परा समाप्तप्राय है. सिर्फ़ चुनाव प्रचार में ही भोंपू दिखाई देते हैं.

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  17. purani yaadon ki misri ghulti rahi.....hum andekhe ko nihaarte rahe....

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  18. ...ऐसी यादें बहुत कष्‍ट देती हैं आजकल

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  19. चिंता ना करें बंधुवर अभी इलैक्शन आने वाले हैं गांव-घाट नगर चौराहों पर भी खूब दिखेंगें

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  20. दो हफ्ते पहले लाजपतराय मार्केट(लाल कि‍ले के पास) गया था, इस इलेक्‍ट्रोनि‍क बाजार के एक कोने में यह लाउड स्‍पीकर थोक में दि‍खा था, देखते ही सोचा कि‍ दि‍ल्‍ली में क्‍या अब भी इसकी उपयोगि‍ता बची है।

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  21. तांगे में बंधे भोंपू, फिंकते गुलाबी पर्चे और तांगे के पीछे पीछे दौडते हम और बजता हुआ गाना
    हो ओ बचपन के दिन भुला न देना..........

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